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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang Story

शादी और लॉकडाउन (Shaadi aur Lockdown) Ch-4

पार्ट 4 – लॉकडाउन और हनीमून :

परम और कविता का तो बनता था, लॉकडाउन मे उनका हनीमून जो बर्बाद हो गया था और जाना भी केरल था| भाई साहब और भाभी को टिकट मिला केरल का, तो केरल हि सही| पिता जी की ट्रेन पहुंची कन्याकुमारी वहां दर्शन किया और माँ से बोले चलो केरल यहाँ से पास है बीच चलते हैं, तुम्हारी बचपन की इच्छा आज पूरी कर देते है| कन्याकुमारी से बस पकड़ी और पहुंच गए कोवलम बीच| सुना बहुत था पर इतना सुन्दर बीच देख न सिर्फ पिता जी बल्कि माँ का भी मन जवान हो गया| होटल के पास से तीन चश्में खरीद लिए गए और शाम को बीच घूमने निकल पड़े|

उधर परम और कविता बहुत खुश थे, परम को इस बात की ख़ुशी कि, जो वादा किया वो पूरा किया, और कविता को केरल घूमने की ख़ुशी| शाम होते ही दोनों ऐसे निकले जैसे अक्सर टूरिस्ट प्लेस पर नव विवाहित दम्पति| हाफ पैंट, शर्ट और छह- छह इंच के लाल चूड़े पहने कविता और थ्री फोर्थ पैंट और टी-शर्ट पहने परम| 

चलो यह तो फिर भी नव विवाहित दम्पति थे, इनका तो बनता था, उधर बड़े भाईसाहब से भी न रहा गया, ऐसा लगा शादी के बाद घूमने न जा पाने के पश्च्याताप का प्रायश्चित आज ही कर लेंगे| बाज़ार से जीन्स और टी-शर्ट ले आये साथ दो चश्मे| जिसने बारह साल में सलवार सूट भी सिर्फ मायके में पहना हो, उसको जीन्स….खैर भाईसाहब ने कसम दे दी तो भाभी के पास आप्शन न बचा, मन तो उनका भी था पर मोहल्ला, समाज और लोग क्या कहेंगे वाले प्रश्नों के चलते कभी हिम्मत न जुटा पायीं| यहाँ न मोहल्ला था, न समाज| शाम होते ही भाई साहब और भाभी अपने नए अवतार में बीच घूमने निकल पड़े|

हल्की- हल्की बारिश शुरू हुई तो माँ, पिताजी का हाथ पकड़ते हुए बोलीं, ज्यादा हीरो न बनिए, कही आड़ देख के रुक जाइये, बारिश थमेगी तो फिर चलेंगे| पिताजी एक चाय की दुकान पर रुक गए, शाम थी सो चाय पीने भी बैठ गए, दो चाय और एक फ्रूटी भी बोल दी| अभी चाय आ ही रही थी कि माँ के चेहरे के भाव बदलने लगे, भुनभुनाते हुए बोलीं, “शर्म नहीं आती, आजकल के बच्चे फैशन के नाम पर क्या वाहियात कपड़े पहनते है, एक पल को तो लगा अपनी ही बहू है फिर याद आया उसकी तो तबियत ख़राब है|” पिताजी बोले, “तबियत नहीं ख़राब है मामा जी मरे हैं| याददास्त घर पर रख आई हो क्या?” माँ ने तेवर बदले और बोली, “लगता है आपको समुंदर की हवा लग गयी है…. याददास्त अपनी सुधारो, मामा जी मरे है बड़ी बहू के, हम बात कर रहे है छोटी बहू की|” पिता जी ने माँ को देखा फिर उधर देखा जिधर माँ देख रहीं थी…. यह क्या? यह भी!, माँ बोली, “यह भी से क्या मतलब|” तब तक समीर की नज़र अपनी मम्मी पर जा चुकी थी, चिल्लाया “मम्मी!!”, बड़ी मुश्किल से पिताजी ने मुहं पर हाथ रख कर चुप कराया| पर वाह रे ममता, इतनी भीड़ में भी भाभी को “मम्मी” सुनाई दे गया, मुड़ कर एक दो बार देखा भी फिर सोचा टीवी पर संतूर का एड चल रहा होगा| आगे बढ़ती भाईसाहब से बोलीं, “लगा समीर बुला रहा है…..|” भाई साहब भी मुस्कुराये और सर पर हांथ फेरते हुए बोले, “माँ हो ना, बच्चे की याद तो आयेगी ही|” उधर पिता जी समीर को समझा रहे थे, बेटा हम लोग सरप्राइज टूर पे है ना, घर चल के सबको सरप्राइज करेंगे, पर मन ही मन में गुस्से और डर का भाव बना हुआ था| माँ से बोले, “तुम काहे बुत बनी बैठी हो कुछ बोलती क्यों नहीं….|” थोड़ा संभलने के बाद माँ बोली, सारे के सारे निकम्मे है, हमें बेवक़ूफ़ बना कर समुंदर घूम रहे हैं… उधर मनीष और बड़ी बहू और इधर परम और छोटी| पिताजी का गुस्सा डबल था पर बोले, “अरे लेकिन कहेंगे क्या? हम भी तो समुंदर घूमने आये है, बच्चे क्या कहेंगे, गाँव बोल कर केरल घुमने आ गए|” माँ बोली, “चलो सोचेंगे, फिलहाल यहाँ से चलो घर चलते है|”

पिता जी अगली सुबह ही बस पकड़ कर तत्काल का टिकट कराने त्रिवेंदम पहुँचे और लग गए तत्काल की लाइन में| वहीँ परम और कविता स्टेशन पहुचें कन्याकुमारी की ट्रेन पकड़ने, प्लान के हिसाब से केरल से कन्याकुमारी और वहां से रामेश्वरम फिर भोपाल| अभी थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि कविता बोली देखो एकदम पिता जी का हमशक्ल| परम ने देखा तो घिग्गी बंध गयी, कहे का हमशक्ल, जिसने पैदा किया हो उसको भूल सकता है क्या?, एक नजर में पहचान लिया, फिर छुपते हुए बोला, हमशक्ल नहीं है पिता जी ही हैं, लेकिन यहाँ क्या कर रहे हैं? दोनों की हवाइयां उड़ चुकी थीं, समझ नहीं आ रहा था घर पर क्या जवाब देंगे| एक नेक, होनहार मेधावी बेटा शादी होते ही माँ – बाप से झूठ बोलने लगा…पूरे समाज में थू- थू हो जायेगी| कुछ सोचने के बाद परम कविता से बोला, “चलो बाकी का टूर गया भाड़ में, बच गए तो फिर कभी घूम लेंगे, वर्ना जिंदगी भर सुनना पड़ेगा| चलो एअरपोर्ट चलते है वहां से फ्लाइट पकड़ के सीधे भोपाल|” ऑटो पकड़ी और पहुंच गए एअरपोर्ट, हालत तो ख़राब थी पर था तो अपने ही बाप का बेटा, विषम परिस्थिति में दिमाग को संतुलित रखना वो जानता था| परम बुकिंग काउंटर पर सर खपा रहा था और कविता बेंच पर बैठी नाखून चबा रही थी, साथ ही अपनी आगे की ज़िन्दगी और कुछ डेली सोप को जोड़ कर सोच रही थी| इधर उधर नज़रें फिराते अचानक उसकी नज़र कही रुकी, बोली, जेठ जी! का भी हमशक्ल या जेठ जी खुद ही हैं?….चेहरे के भाव बदलती भागते हुए परम के पास पहुंची और बोली, “जेठ जी!”, परम के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गयी, मन ही मन बोला, ये हो क्या रहा है? पहले पिता जी अब भाईसाहब…., मुड़ कर देखा तो वाकई भाईसाहब, बाहर की ओर फ़ोन पर बातें कर रहे थे| मन ही मन बोला, “घूमना न हुआ मुसीबात हो गया, न जाने किस घड़ी में…”, मुहं से इतना ही निकला था कि कविता पर नजर पड़ी, चेहरे के भाव तीन चार साल पुरानी पत्नियों से हो रहे थे सो अपने शब्दों को वही रोक दिया और बोला चलो चलते है, शाम पांच बजे का टिकट मिला है, त्रिवेंद्रम से बैंगलोर और वहां से भोपाल| जो नहीं बताया वो यह की सस्ती टिकट के फेर में कुल यात्रा का समय था चौबीस घंटे| दोनों बचते बचाते एअरपोर्ट से निकले और बोले पांच-छह घंटे की बात है किसी रेस्टोरेंट में काट लेंगे|

उधर भाई साहब फ़ोन पर भाभी से कह रहे थे, टिकट अभी तीन बजे का है, तुम फटाफट सामन पैक करो, ऑटो पकड़ो और एअरपोर्ट आ जाओ| भाभी झुंझलाई, “हर काम जल्दी का, टिकट लेना ही था तो शाम या रात का ले लेते इतनी जल्दी क्या थी|” अब उन्हें कौन बताये, सर्ज प्राइस का दर्द, अभी बैठे बैठाए एक दो घंटे के फेर में हज़ारों के वारे न्यारे हो जाते| खैर भाभी झुंझलाती जरूर थीं पर करती वही थीं जो भाईसाहब सुझाते| फ़ौरन सामन पैक किया और होटल वाले से बोला एक ऑटो बुला दो….टूरिस्ट डेस्टिनेशन है तो ऑटो टैक्सी भी टूरिस्ट से ज्यादा दिखते है सो पांच मिनट में ऑटो भी आ गया, भाभी ऑटो में बैठी और बोली, “भईया एअरपोर्ट”| ऑटो अभी मुश्किल से 200 मीटर ही गया होगा की सामने से पिता जी पैदल आते दिख गए, भाभी ने दुपट्टे को घूंघट की तरह ओढ़ लिया और लगी ज़ोर ज़ोर से साँसें लेने| धड़कन कुछ वैसी थीं जैसे टीवी सीरियल में ट्विस्ट आने से पहले एड ब्रेक आ गया हो| फ़ौरन भाई साहब को फ़ोन लगाया| इधर भाईसाहब इंतज़ार करने कॉफ़ी शॉप की ओर बढ़ ही रहे थे की नजर अन्दर बैठे परम और कविता पर पड़ गयी| गुस्से और डर का भाव तो था पर मिश्रण में गुस्सा कम डर ज्यादा था| तभी भाभी का फ़ोन बजा, फ़ोन उठाया और बोले, “परम और कविता”, उधर भाभी बोलीं, “अरे वो दोनों ठीक ही होंगे यहाँ मैंने पिता जी को देखा है|” सुनते ही भाईसाहब के शरीर में फिर से केमिकल रिएक्शन हुआ और गुस्से के भाव उड़ गए, रिक्त स्थान की पूर्ति डर ने कर दी थी| थोड़ी देर तो चुप रहे फिर बोले, “क्या बकवास कर रही हो, मज़ाक मत करो, यहाँ वैसे ही मेरी हालत खराब है, परम और कविता मेरे सामने बैठे कॉफ़ी पी रहे हैं”| भाभी बोलीं, “केरल? कविता की तो तबियत ख़राब थी|” भाई साहब झुंझला कर बोले, “ऐसे तो तुम्हारे मामा जी भी मरे है, अब क्या करें|” भाभी बोलीं, “पर यहाँ तो पिता जी को देखा है …अब क्या होगा|” भाई साहब बोले, “अभी कुछ नहीं सूझ रहा, रास्ते में सोचेंगे, तुम जल्दी आ जाओ|”

उधर पिताजी होटल पहुंचें और बोले, चलो जुगाड़ से टिकट मिल गयी है, आज रात की ही है| चेहरे के भाव में गुस्से, डर के साथ अफ़सोस भी था…इतने सालों में पहली बार सीनियर सिटीजन की छूट जो न ले पाए थे|

खैर, कोई और होता तो ऐसे हालात पर तरस खाता, पर विधाता को शायद चुटकी लेने में आनंद आ रहा था…. संजोग कुछ ऐसा बना कि दो रिक्शा और एक ऑटो एक साथ घर के गेट पर रुके, एक में माँ पिताजी और समीर, एक में भाईसाहब और भाभी और एक में परम और कविता| सभी के सभी रंगमंच के मंझे हुए कलाकारों की तरह लग गए अपना अपना किरदार मंचन करने| परम बोला, अरे, आप लोग एक साथ….अभी अभी कविता को डॉक्टर से दिखा के लौट रहा हूँ| डॉक्टर बोले सब ठीक है, ज्यादा खाने से तबियत बिगड़ गयी थी| पिता जी मन मसोस कर रह गए, जानते तो सब थे फिर भी रहा न गया बोले, “और ये सूटकेस?”, परम भी तैयारी से था बोला, “वो कविता की कुछ  साड़ियाँ थीं, ड्राईक्लीनर को दी थी|” भाईसाहब बोले, “पिताजी! गाँव की यात्रा कैसी रही? सब ठीक- ठाक? गाँव में सब कैसे हैं?| पिताजी मन ही मन गरियाते हुए बोले,” सब ठीक, सब तुम्हे पूछ रहे थे,  तुम बताओ बहू के वहां सब ठीक-ठाक हो गया? जल्दी जल्दी में ये भी न पूछ पाए कौन से वाले मामा जी का देहांत हुआ था?” भाभी लपक कर बोलीं, “पिताजी, दूसरे नंबर वाले मामा जी का|” पिता जी को कौन सा याद था, खैर ताना मारना था सो मार दिया|

उस दिन से हालात ऐसे हो गए की, सब कुछ सामान्य होते हुए भी असामान्य लग रहा था | सबसे ज्यादा सुखी कोई था तो वह था “समीर”, घूमने की बात छेड़ता और अपनी फरमाइश पूरी करा लेता|                          

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