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पागल (Paagal) Ch. 2

रखवाला (Rakhwala): Protector

समय बीतता चला गया, संतोष ने भी बच्चों को टोकना बंद कर दिया था, पर पूरा ध्यान रखता कि रूबी और उसके पिल्लों के आस-पास कोई न जाए| पिल्ले भी अब थोड़े बड़े होने लगे थे पर संतोष के अलावा और किसी इंसान से घुलते मिलते न थे|

दिवाली आने वाली थी, चलते फिरते पटाखों की आवाज़ सुनाई देने लगी थी| बच्चों का क्या है, जहाँ चार दोस्त इकठ्ठा हुए, पटाखा निकाला और फोड़ दिया| लोगों को परेशान करने में मानों मज़ा आता हो| खैर बचपन में तो सभी शरारत करते हैं पर चिराग और मयंक तो अलग ही थे, एकदम हाथ से निकले बिगड़ैल बच्चे| माँ-बाप ने भी मानों सर पर चढ़ा रखा हो| दोस्तों में वर्चस्व दिखाने की होड़ में कभी इंसानों को परेशान करते तो कभी जानवरों को| मोहल्ले से ले कर स्कूल तक सभी को पता था कि बच्चे शैतान हैं|

रूबी भी परेशान थी, उसके और बच्चों के तो खासे दुश्मन थे दोनों| बेचारी खाने की मजबूरी में सोसाइटी में टिकी थी| उस दिन तो एक पिल्ले को कान से उठा लिया था और दो की टांग एक साथ बांध दी, जब बचने को चिल्लाए तभी तो संतोष ने डांटा था और बात बढ़ गयी थी|

संतोष अभी सोसाइटी पहुंचा ही था, साइकिल लगाने के बाद जैसे ही गार्ड-रूम की ओर बढ़ा तभी ज़ोरदार लड़ियों की आवाज़ शुरू हो गई, लड़ियों के साथ- साथ रूबी और पिल्लों की दर्द भरी चीख़ भी| संतोष भागते हुए पंहुचा, देखा तो सकते में आ गया, किसी ने रूबी की पूँछ में पटाखों की लड़ी बाँध दी थी, बेचारी बेतहाशा भाग रही थी| संतोष ने जलती लड़ी को हाथ से ही बुझा दिया| हाथ तो जला पर गुस्से की आग में मानों ये जलन कही दब सी गयी थी| एक पल को तो चाहा कि यही लड़ी चिराग और मयंक को बांध कर तमाशा देखे और दुनिया को भी दिखाए, पर मन ही मन कुछ सोच कर चुप रह गया| अभी-अभी तो सिन्हा जी ने बुला कर डांटा था, कुछ बोल दिया तो नौकरी गयी, और नौकरी नहीं तो पैसा नहीं, फिर इन मासूमों को खाना कौन खिलायेगा|

पिल्ले तो सदमे में थे पर रूबी को कुछ चोटें आई थी, पटाखों की चिंगारियों से पूँछ और टांग थोड़ी जल  सी गयी थी| जानवर को देखिए नेक इंसानों की पहचान इंसान से बेहतर कर लेते हैं| एक ओर इंसान ने ही ज़ख्म दिया था फिर भी संतोष के ही आस- पास घूम रही थी, मानों उम्मीद थी कि यही मदद करेगा| संतोष ने भरोसा टूटने न दिया, पहले नलके से पानी ला कर जख्म धोए फिर गार्ड रूम के फर्स्टऐड बॉक्स से दवाई ला कर लगा दी| दर्द तो था पर मज़ाल है रूबी ने एक आवाज़ की हो, इतना भरोसा था उसे संतोष पर| पिल्ले भी अब थोड़ा शांत लग रहे थे, पर चेहरे पर डर अब भी बना था|

उस दिन गुस्से में संतोष ने खाना भी नहीं खाया, बस हर आधे घंटे में जाता और देख कर लौट आता, सारा खाना उसने पिल्लों और रूबी को डाल दिया था| शाम ड्यूटी ख़त्म कर सीधे रुबी के पास पहुँच गया, पालथी मार कर बैठ गया और दूध का पैकेट फाड़ कर पिल्लों को डाल दिया| रूबी भी संतोष को ऐसे देख रही थी मानों किसी अपने को, पर आँखों में सवाल बहुत से थे….,हम मासूम ही क्यों? हमने किसी का क्या बिगाड़ा था? पिल्लों की खातिर ही तो इंसानों में शरण ली थी, ऐसा क्यों किया?

संतोष रूबी को देख रहा था मानों हर सवाल समझ रहा हो, धीरे से बोला, “ये सब पागल हैं, एक दूसरे के सगे तो होते नहीं, तुम्हारे क्या होंगे….तू परेशान मत हो, मैं हूँ….सब ठीक कर दूंगा|” रूबी ने हल्की सी पूँछ हिलाई और बगल में आ कर कंधे से सर सटा दिया| संतोष चुपचाप बैठा सोसाइटी के बोर्ड को देख रहा था, फिर दो बार सर हिलाया और उठ खड़ा हुआ| चेहरे का भाव, शरीर की सहजता और मन में फूट रहे ज्वालामुखी से संतोष अलग ही दिख रहा था| आज उसके अन्दर जो आग थी उसका अहसास खुद उसे भी नहीं था, अहसास था तो सिर्फ रूबी को, संतोष में उसे एक रखवाला नज़र आ रहा था|

आगे की कहानी “बदला”https://ishhoo.co.in/2020/07/19/hindi-story-save-the-dog3/

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