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पागल (Paagal) Ch. 3

बदला (Badla): Vengeance  

चारों तरफ रौनक दिख रही थी, सुबह से ही सड़कों पर सफाई चल रही थी, त्योहारों के दिनों में फिज़ा की खुशबू ही कुछ और होती है| संतोष नहा-धो कर तैयार हुआ, यूनिफार्म पहनी, साइकिल उठाई और चल दिया ड्यूटी| चेहरा ऐसा मानों किसी बड़े काम को अंजाम देने जा रहा हो, बदले की आग ने उसे और भी तपा दिया था| सोसाइटी पहुंच कर सीधे सिन्हा जी के घर गया और घंटी बजा दी| त्यौहार था तो सभी घर पर थे, सिन्हा जी बोले, “हाँ संतोष बोल!” संतोष धीमी आव़ाज में बोला, “नमस्ते सर, दिवाली मुबारक…आप से कुछ काम था!” सिन्हा जी बोले, “नमस्ते-नमस्ते, तुमको भी दीपावली की शुभकामना! बताओ भाई क्या बात है?” संतोष बोला, “सर, कुछ एडवांस चाहिए…”  सिन्हा जी दिखते सख्त थे, पर उसूलों के पक्के थे, जानते थे तीज-त्यौहार में हर किसी को पैसे की ज़रुरत होती है, बोले, “अच्छी बात है…बोलो कितने दूं…हज़ार में काम चल जाएगा?” संतोष बोला कुछ नहीं, बस हां में सर हिला दिया| सिन्हा जी अन्दर से लौटे और पांच सौ के दो नोट पकड़ा दिए| संतोष बोला, “सर, एक दो घंटे की छुट्टी चाहिए|” सिन्हा जी त्यौहार के मूड में थे सो बोले, “ठीक है, पर गेट पर किसी को बोल जा, त्यौहार का दिन है लोगों  का आना जाना लगा रहेगा|” धीरे से संतोष ने सर हिलाया, नमस्ते किया और चल दिया| पीछे से सिन्हा जी की पत्नी बोलीं, “ज़बरदस्ती सब पागल-पागल बोलते है, सीधा साधा लड़का है, बस बोलता कम है….” सिन्हा जी मुस्कुराये और बोले, “अरे पागल तो बोलेंगे ही ना….इंसानों से बात करता नहीं, बस कुत्तें-बिल्लियों से बतियाता रहता है|”

संतोष नीचे पंहुचा, साइकिल उठाई और मनोहर से बोला, “ज़रा गेट देख लेना, कुछ काम है एक दो घंटे में वापस आ जाऊंगा|” मनोहर अपनी पत्नी के साथ सोसाइटी के आउट-हाउस में ही रहता था, दिन में लोगों के कपड़े प्रेस करता और रात में चौकीदारी| मनोहर हँसते हुए बोला, “का रे पगला, सुबह-सुबह कहाँ? ज़ल्दी आ जाना, सब कपड़ा प्रेस को पड़ा है वरना सब भड़के गा|” संतोष ने पैडल मारा और बढ़ा दी साइकिल परेड ग्राउंड की ओर, आज कल पटाखों की दुकानें ऐसी ही जगहों पर लगती हैं, वैसे सुरक्षा के दृष्टीकोण से सही भी है|

हाथ पीछे बांधे कुछ देर तक दुकानों का मुआयना करता रहा फिर एक दुकान पर रुका और बोला, “वो बड़ा वाला रॉकेट कितने का है?” दुकानदार बोला, “ले लो बहुत बढ़िया है, आसमान तक जाता है फिर धमाके के साथ फटता भी है|” संतोष के चेहरे पर अजीब से मुस्कान आई, न जाने क्या सोच रहा था…फिर बोला, “दो रॉकेट दे दो, और वो सबसे बड़ी वाली लड़ी भी|” न दाम कम कराये, न पीछे मुड़ कर देखा, सीधे क़दमों से चलता हुआ साइकिल तक पंहुचा, थैली टांगी और चल पड़ा वापस सोसाइटी की ओर| रास्ते से दवाई, पट्टी, दूध और मिठाई भी खरीद ली थी|

लंच का समय हो चुका था, पहले दूध ले कर रूबी और पिल्लों के पास गया फिर वहीँ टिफिन खोल कर बैठ गया, न जाने ऐसा लग रहा था मानो आश्वासन दे रहा हो|

त्यौहार का दिन था सो चहल पहल दिन भर थी, गेट खोलते- बंद करते कब शाम हो गयी पता ही न चला| पूरी सोसाइटी जगमगा रही थी, इस त्यौहार की रौनक अलग ही होती है| देखते ही देखते घरों से शंख और घंटियों की आवाज़ आने लगी, हर परिवार अपनी बालकनी में दिए और मोमबत्ती लगा रहा था| कुछ ही देर बीती थी कि धमाके शुरू हो गए, पूरा शहर ऐसे गूँज रहा था मानों लड़ाई छिड़ गयी हो| थोड़ी देर और बीती कि मिठाई देने दिलाने का सिलसिला शुरू और फिर साथ मिल कर पटाखे फोड़ने का| कोई फुलझड़ी जला रहा था, कोई अनार तो कोई पटाखों की लड़ी, न जाने किस बात की होड़ थी, पूरा इलाका धुआं-धुआं हो गया था, बारूद की गंध का नशा सा हो मानों| खैर बड़े बड़े देशों के असलहे ख़तम हो जाते है, यहाँ तो हज़ार- दो हज़ार के पटाखे थे, कब तक फूटते, ख़तम तो होना ही था| देखते ही देखते आवाज़े कम होने लगीं साथ ही गंध भी| अब समय था अपने अपने घर जाने का और पूरी-पकवान खाने का| अचानक से ही पूरे शहर में सन्नाटा सा हो गया, इक्का दुक्का छोड़ कर पटाखों की आवाज़ ख़तम सी हो गयी थी|

मनोहर भी परिवार के साथ दिवाली मना कर गेट पर आ गया था, बोला, “का रे पगला, दिवाली न मनाओगे का? जाओ घर, अब हम देख लेंगे|” संतोष कुछ न बोला, बस थैली उठाई और चल दिया| सीधा पंहुचा रूबी के पास, सर पर हाथ फेरा और अपने साथ ले जाने लगा| यूँ तो पटाखों की आवाज़ से सभी दुबके पड़े थे पर संतोष बुलाए और रूबी न सुने….., रूबी बढ़ी तो साथ साथ पिल्ले भी चल पड़े, सीधा पहुंचे असेम्बली एरिया में जहाँ से ‘ए’ और ‘बी’ विंग की बालकनी दिखती थीं| चिराग और मयंक के घर भी तो ‘बी’ विंग में थे….न जाने संतोष ने क्या सोच रखा था|

पहले तो अखबार पर मिठाई रखी फिर रूबी और पिल्लों को बुलाया, थैली से दो कांच की बोतलें निकाली और उनका मुंह कर दिया चिराग और मयंक की बालकनी की ओर| फिर भाग कर गया और मयंक और चिराग की साइकिल उठा लाया और चारो ओर लड़ी लपेट दी|

मिठाई का एक टुकड़ा अपने मुंह में डालते हुए बोला, “दिवाली मुबारक!!” न जाने क्यों चेहरे पर अजीब सी  मुस्कान  थी| अचानक से दो ज़ोरदार धमाके हुए, एक चिराग की बालकनी  में दूसरा मयंक की, अभी कोई कुछ समझ पाता की लड़ियों की आवाज़ पूरी सोसाइटी में गूंजने लगी| देखते ही देखते लोग बालकनियों में आ गए थे, उधर चिराग के परदे में आग लग गयी थी बड़ी मुश्किल से आग बुझाई और सभी बाहर आये| बाहर का नज़ारा तो अलग ही था, लड़ियाँ ही लड़ियाँ और बीच में दो साइकिल, कुछ ही दूर संतोष बैठा चिराग और मयंक की बालकनी को देख रहा था और मुस्कुरा रहा था|

लोगों को समझते देर न लगी, थोड़ी ही देर में भीड़ लग गयी और कुछ ने तो हाथ भी उठा दिया, चिराग के पापा ने पी.सी.आर फोन कर दिया था सो कुछ ही देर में पुलिस भी आ गयी, दो तीन थप्पड़ हवालदार ने भी जड़े और ले जाने लगे जीप में बैठाने| संतोष सिर्फ मुस्कुरा रहा था, कभी चिराग और मयंक को देखता तो कभी रूबी और पिल्लों को| उस दिन के बाद से संतोष को उस मोहल्ले में किसी ने नहीं देखा था| दुनिया की नज़र में वो पागल था पर रूबी जानती थी, उस दिन उसने क्या किया था| आज भी जानवरों को इंसानियत पर भरोसा है तो सिर्फ संतोष जैसे लोगों की वज़ह से|                                                                                                                   

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