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Czechoslovakia Lok Kathayen-1 चेकोस्लोवाकिया लोक कथाएँ-1

बारह महीने: चेकोस्लोवाकिया लोक-कथा

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एक जंगल के पास के गाँव में एक बूढ़ी महिला रहती थी। उसके दो बेटियां थीं। एक का नाम था कतिंका और दूसरी का डोरबंका। कतिंका  बूढ़ी महिला की अपनी पुत्री थी, किंतु डोरबंका उसकी सौतेली पुत्री थी। इस कारण घर के सारे काम-काज का भार डोरबंका के ही कंधों पर आ पड़ा । डोरबंका देखने में भली तो थी ही, भोली और मृदु-स्वभाव की भी थी। कभी कोई शिकायत नहीं करती और बिना किसी आना कानी के बूढ़ी महिला और सौतेली बहन की फटकार-भरी आज्ञाओं का पालन किया करती।
डोरबंका सौतेली मां और अपनी बहन की बातों का कभी बुरा नहीं मानती और उनके बताए हर काम को पूरा करने के लिए तत्पर रहती, पर कतिंका और उसकी मां के लिए फिर भी वह बोझ बनती गई।
दोनों उस पर तरह-तरह के ताने कसतीं और दुत्कारा करतीं। “देखो, कितना खाना खाती है!” बुढ़िया चिल्लाती, “हम लोगों के पास इतना पैसा कहां है कि हम इसका ढोल-जैसा पेट रोज़ भर सकें!”
“हां, मां!” कतिंका झट जवाब देती; “और तो और अपने को मुझसे भी अधिक सुंदर समझती है। इसके क्या नखरे हैं?” उसकी तीखी बातों से मानो बुढ़िया को राहत मिल जाती।


दोनों ने विचार किया कि उससे किसी तरह पिंड छुड़ाया जाए। दोनों ही इस बात पर तुल गईं और डोरबंका को घर से निकालने के लिए बहाना ढूंढने लगीं।
एक दिन जब कड़ाके की सर्दि पड़ रही थी और बर्फ़ीली हवा तेज़ बह रही थी, कतिंका डोरबंका के पास गई और बोली, “मुझे बनफ़शा के कुछ फूल चाहिएं। मेरे मन उन्हें पाने का बड़ा मन है। जंगल में चली जाओ और थोड़े फूल मेरे लिए तोड़ लाओ।”
“पर मेरी प्यारी बहन,” डोरबंका घबराकर बोली, “इस कड़ाके की ठण्ड में भला मुझे बनफ़शा के फूल मिलेंगे कहां? तुम जानती हो, जंगल बिलकुल उजाड़-सा पड़ा है। पेड़ों पर एक पत्ता भी नहीं उग रहा और तुम मुझे बनफ़शा के फूल लाने को कह रही हो ।”
“मुझे इसकी कोई परवाह नहीं,” कतिंका चिल्लाकर बोली । क्रोध से वह तिलमिला उठी, “मुझे फूल चाहिए और हर हालत में चाहिए। तुम जाओ और बिना फूल लिए घर में वापस मत आना।”
“हां,” भीतर से हुक्का पीते हुए बुढ़िया बोली, “कतिंका के लिए बनफ़शा के फूल तोड़ लाओ और बिना लिए मत लौटना।”
बेचारी डोरबंका क्या करती! रोती-बिलखती वह जंगल में घुसी और बनफ़शा के फूलों की तलाश करने लगी। पर फूल मिलते कैसे, कड़ाके की ठण्ड थी। उसके हाथ-पांव ठिठुर रहे थे और दांत किटकिटा रहे थे। फूलों की तलाश में वह बढ़ती ही चली जा रही थी।
इतने में कुछ दूर उसने देखा, आग की लपटें निकल रही थीं और आग के चारों तरफ़ एक दर्जन आदमी बैठे हुए हाथ ताप रहे थे। उन आदमियों की शक्ल-सूरत अजीब थी। डरती-घबराती वह किसी तरह उनके पास पहुंची।
डोरबंका ने कांपते स्वर में कहा-“आप लोग मुझ पर थोड़ी दया करेंगे? सर्दी से मैं बड़ी ठिठुर गई हूं। मुझे आग तापने देंगे, आपकी बड़ी कृपा होगी।”
एक बूढ़ा आदमी, जिसकी सफ़ेद बड़ी बड़ी दाढ़ी थी और उस पर जच बड़ी रही थी, उठा और अपनी चादर छोड़ता हुआ बोला, “आओ बेटी, इधर आओ ।” उसके स्वर में दया का भाव था। उसने बड़े प्यार से कहा, “लो, मेरे पास बैठ जाओ । मैं जनवरी हूं। तुम कौन हो, कहां से आयी हो और इस समय यहां क्या कर रही हो?”
दया और स्नेह-भरे शब्द सुन कर डोरबंका अपने को थाम न सकी और रोने लगी।
“बाबा, मेरी मां और सौतेली बहन ने मुझे जंगल से अपने लिए बनफ़शा के फूल तोड़ लाने को भेजा है और कहा है कि जब तक फूल न मिलें, मैं घर लौटकर नहीं आऊं। ऐसे मौसम में भला मैं कहां से यह फूल ला सकती हूं?”
“आह!” जनवरी की नीली-नीली आंखें एक बार चमक उठीं, “मैं तुम्हारी मदद करूंगा, बेटी। भाई मार्च, मैं समझता हूं, यह काम तुम्हारे बस का है ।” उसने पास बैठे, हरी चादर ओढ़े हुए अपने मित्र की ओर घूमते हुए कहा। हरी चादर क्या थी, मानो हरी-हरी घास का एक सुंदर सुहाना आवरण ही था और उस युवक के चेहरे की रंगत भी बड़ी मनुहारी थी।
बूढ़े जनवरी का आदेश सुनकर भाई मार्च उठा और सिर हिलाकर, हाथ फैलाकर उसने हाँ में उत्तर दिया। देखते ही देखते हवा में बनफ़शा की खुशबू फैल गई, जहां देखो, वहीं बनफ़शा केे फूलों के झुंड-ही-झुंड खिल उठे।
“जाओ बेटी, फूल तोड़ लो!” बूढ़े बाबा ने डोरबंका को कहा, “और खुशी-खुशी अपने घर लौट जाओ।”
डोरबंका की ख़ुशी का ठिकाना न रहा! उसने फूल बटोर कर अपने आंचल में भर लिए । फिर दौड़ती हुई अपने घर को भागी।
उसे घर आते देख उसकी मां और कतिंका, दोनों बड़ी अचंभित हुईं और आपस में कानाफूसी करने लगीं “अरे, इसे फूल कहां से मिल गए? अब क्या होगा? अब हम लोगों को कोई दूसरा उपाय दूंढना होगा। उसे अब कोई अधिक कठिन काम बताना होगा।”
कुछ ही दिनो बाद, कतिंका डोरबंका के पास आकर दुखी मन से बोली-“मुझे बेर चाहिए, नहीं तो मैं मर जाऊंगी, अपनी जान दे दूंगी। जाओ और मेरे लिए जंगल से एक टोकरी अच्छे बेर ले आओ!” उसने आदेश दिया, “और हां, देखो, बिना बेर लिए न लौटना।”
डोरबंका का यह सुनकर घबरा गयी। “भला इस जाड़े में बेर कहां मिलेगी?” यह कहती वह जंगल को चल पड़ी।
बेरों की ख़ोज में वह इधर से उधर भटकती रही। सर्द हवा और पत्थर कर देने वाली कड़ाके की सर्दी, साथ में इतनी थकान! उसे लगा, वह बेहोश हो जाएगी, उसके प्राण भी ठंड में कांप रहे थे।
तभी उसे वही पुराने दोस्त-महीने-उसे नज़र आए, जो आग के चारों तरफ़ बैठकर हाथ ताप रहे थे।
“मुझे भी थोड़ा आग के पास बैठने को जगह देंगे आप लोग?” उसने कपकपाती आवाज में पूछा।
सफ़ेद दाढ़ी वाले उस बूढ़े ने ऊपर देखा “अरे, यह तो हम लोगों की वही छोटी सी दोस्त है! अब तुम्हें क्या तकलीफ है, बेटी?” उसने डोरबंका को पास बैठने की जगह देते हुए पूछा।
डोरबंका बोली “बाबा, देखो न, अब मुझे अपनी सौतेली बहन के लिए बेर ढूंढ़ने पड़ रहे हैं।”
इतना कहकर वह फिर रोने लगी और उसके फूल से कोमल चेहरे को आंसुओं ने बुरी तरह भिगो दिया।बूढ़े ने उसे ढांढस बंधाया, “इस तरह रोया नहीं करते, बहादुर बनना चाहिए ।”
“भाई जून!” बूढ़े ने मुढ़कर उस ओर इशारा करते हुए कहा, जिधर गेहूं से सुनहरे-भूरे बालों के रंग की चादर ओढ़े जून बैठा था। “देखो, इस नन्हीं बिटिया के लिए कुछ कर सको तो करो।” उसे आदेश मिला।
जून ने सिर हिलाया और हाथ फैलाकर हामी भर दी। यह क्या! हर कहीं बेर के फल उग आए। फिर से डोरबंका उठी और उसने बेरों से अपनी टोकरी भर ली।
टोकरी लिए जब वह घर पहुंची, तो उसकी मां और बहन देखकर आश्चर्यचकित रह गईं। कहां से बेर मिल गए इसे? उन्होंने सोचना शुरू किया।
कतिंका जल-भुनकर लाल हो रही थी। उसके क्रोध की कोई सीमा नहीं थी। और इसी क्रोध वश उसने कुछ ही समय बाद डांट कर डोरबंका से कहा, “चली जाओ, और अब मेरे लिए कुछ सेब ले आओ।”इतना कहने के साथ ही इस बार डोरबंका को पकड़कर उसने अपने हाथों से घर के बाहर धकेल दिया।और, इस तरह डोरबंका को फिर जंगल की ख़ाक छानने के लिए निकल जाना पड़ा।
अंत में वह थककर भूखी-प्यासी एक जगह बैठ गई और चिल्ला-चिल्लाकर रोने लग गई। वह बेहद निराश हो गई थी। पर, वहीं उसके वह पुराने दोस्त-महीने-आ पहुंचे। उससे पूछताछ की और सारी बातें सुनकर बूढ़े जनवरी ने मुस्काते हुए कहा-“अच्छा, तो अब सेब चाहिए।”“भाई सितंबर!” बूढ़े ने पके अंगूरे के रंग की चादर लपेटे हुए अपने दोस्त को बुलाया, “इधर सुनो और अपना कर्त्तव्य पूरा करो।”सितंबर ने सिर हिलाते हुए हाथ फैलाए और लो, देखो, एक पेड़ वहीं उग गया, जिसमें ढेरों सुंदर-सुंदर, मीठे-मीठे सेब लटक रहे थे।उसने डोरबंका से कहा-“इस पेड़ को एक ही बार हिलाना और जो फल गिर जाएं, उठा लेना।”डोरबंका ने पेड़ को धीरे-धीरे हिलाया और दो सेब नीचे गिरे। उन दोनों सेबों को उठाकर वह ख़ुशी-ख़ुशी घर चली गई।
तीसरी बार भी डोरबंका को सफलता के साथ लौटते देख कतिंका और उसकी मां की जल भुन उठीं और दोनों आपे से बाहर हो गई।
“बस, केवल दो सेब?” कतिंका चिल्लाई, किंतु उसने एक सेब को जब चखा, तो उसे और भी सेब खाने की इच्छा हो गई।“अब मैं स्वयं जाऊंगी और अधिक-से-अधिक सेब लाऊंगी।” वह बोली और जंगल की ओर चल पड़ी।वह थोड़ी दूर ही गई थी कि आग तापते हुए बारहों महीने उसे मिले।“एक तरफ खिसक जाओ!” रूखे स्वर में बोलती हुई उनके बीच से घुसकर वह स्वयं आग के सामने चली गई और आग तापने लग गई।“क्या बात है, किसलिए यहां आयी हो तुम?” सफ़ेद दाढ़ी वाले बूढ़े बाबा ने उससे पूछा।“इससे तुम्हें क्या मतलब?” रूखे स्वर में कतिंका ने उत्तर दिया और आग तापती रही। उसे क्या पता था कि यही बूढ़ा उसे सेब दे सकता है!
इस पर बूढ़े जनवरी ने अपनी बर्फ़ीली सफेद चादर फैला दी और एक बर्फ़ीली आंधी बह चली। कतिंका उस आंधी में ऐसी खोई कि फिर किसी ने उसका नामो-निशान तक नहीं पाया।इतनी जोर की आंधी देखकर बुढ़िया अपनी प्यारी बेटी को ढूंढने के लिए निकली और वह भी उसी आंधी में खो गई।
डोरबंका अब उस कुटिया में अकेली थी, पर शांति से रह रही थी। वह आनंदपूर्वक घर के काम-काज करती और फल-फूल पर वह जीवन व्यतीत कर रही थी। एक दिन एक राजकुमार ने उसी रास्ते से गुज़रते देख लिया। इतने सुन्दर चेहरे पर वह  मंत्रमुग्ध हो गया। डोरबंका को वह अपनी रानी बनाने अपने राजमहल में ले गया। धूमधाम से विवाह हुआ और डोरबंका रानी बन गई। दोनों पति-पत्नी सुखपूर्वक रहने लगे।

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