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Sri Lanka ki Lok Kathayen-1 (श्रीलंका की लोक कथाएँ-1)

कहानी- करामाती टोपी: श्रीलंका की लोक कथा

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एक बार की बात है, एक गरीब लड़का था। इतनी बड़ी दुनिया में उसका कहीं कोई नहीं था। न मा-बाप, न भाई-बहन। पर वह लड़का बहुत परिश्रमी था। एक बार उसकी मेहनत से प्रसन्न होकर एक किसान ने उसे एक बैल दे दिया। लड़के ने सोचा, बैल से किसी बंजर ज़मीन को जोतूंगा और उस पर कोई फसल उगाने की कोशिश करूंगा। वह बैल लेकर चल पड़ा।

गर्मी के दिन थे। लड़के के बदन पर न कपड़े थे और न पैरों में जूते। फिर भी वह अपनी धुन में बैल हांकता चला जा रहा था। अचानक उसे लगा, जैसे कोई उसे बुला रहा है। उसने मुड़कर देखा तो तीन शरारती आदमी खड़े मुस्करा रहे थे। लड़के ने उनसे पूछा-“आपने मुझे पुकारा था? क्या कोई काम है?”

उनमें से एक व्यक्ति ने कहा-“तुम यह बकरा कहां लिए जा रहे हो?”

लड़का चौंक उठा-“बकरा! यह बकरा नहीं, बैल है।”

वह व्यक्ति ठहाका मार कर हंस पड़ा और अपने साथियों से बोला, “देखा इस पागल को! यह बकरे को बैल बता रहा है। ज़रूर इसने कोई नशा कर रखा है।”

उसकी बात सुनकर दूसरे व्यक्ति ने कहा, “और बकरा भी कैसा, बिलकुल मरियल। कोई एक रुपया भी न दे।”

तीसरा व्यक्ति बोला “पर हमें इस बेचारे की सहायता करनी चाहिए। चार-पांच रुपयों में यह बकरा खरीद लेना चाहिए।”

यह सुनते ही पहले व्यक्ति ने अपनी पोटली से पांच रुपए निकाले और लड़के के हाथ में थमाते हुए बैल की रस्सी छीन ली। वह लड़का बेचारा कुछ समझ भी नहीं पाया कि क्या करे, क्या कहे! वह अकेला था और वे थे तीन। वह यह भी समझ गया था कि वे तीनों मिलकर उसे मूर्ख बना रहे हैं। वह यह भी जान गया था कि ज्यादा चूं-चपड़ करने पर वे तीनों उसे पीटने लगेंगे और मुफ्त में ही बैल लेकर चल देंगे। सो उसने उस समय चुपचाप रहना ही उचित समझा।

वे तीनों बैल लेकर चल पड़े, अभी थोड़ी ही दूर पहुंचे होंगे कि वह लड़का भागता-भागता उनके पास आया। उसने कहा, “आप लोग बहुत दयालु हैं। मेरे मरियल बकरे को सचमुच कोई न पूछता, पर आपने उसके पांच रुपए दे दिए। आपसे बढ़कर सज्जन मुझे कहां मिलेंगे। मेरा दुनिया में कोई नहीं है। यदि आप लोग मुझे नौकर रख लें तो मेरे कुछ दिन सुख से कट जाएंगे।”

तीनों व्यक्तियों ने सोचा, यहां तो मुफ्त में ही नौकर मिल रहा है। उन्होंने उसे भी अपने साथ ले लिया।

लड़का बड़ा मेहनती था। कुछ ही दिनों में उसने तीनों का विश्वास जीत लिया। वह उनके सारे काम करता। घर-खर्च और पैसों का भी हिसाब रखता। तीनों उससे बड़े खुश थे।

एक दिन वह लड़का एक विचित्र-सी टोपी लगाए घर लौटा। उसकी तीन नोकों वाली टोपी देखकर तीनों व्यक्ति हंस पड़े। वे बोले, “यह जोकरों की टोपी कहां से ले आया है?”

पर लड़का गंभीर बना रहा। उसने कहा, “यह टोपी जोकरों की नहीं है। यह एक करामाती ताज है। इसे पहनकर बाज़ार में हर चीज़ मुफ्त ली जा सकती है। इसी के कारण तो मैं आपसे अपने खर्च के लिए कुछ नहीं लेता।”

तीनों व्यक्तियों को उसकी बात पर विश्वास नहीं हुआ, यह जानकर लड़के ने कहा-“आपको मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है। कल बाज़ार में चलिएगा और इस ताज की करामात स्वयं देखिएगा।”

तीनों व्यक्तियों ने हामी भर दी और अपने काम-धंधे पर निकल गए।

उधर वह लड़का वही टोपी पहनकर बाज़ार चला गया। उसने तीन बड़ी दुकानें चुनीं। फिर उनके मालिकों को बड़ी-बड़ी रकमें देकर बोला-“कल मैं अपने तीन मेहमानों के साथ आऊंगा। पहचान के लिए यही टोपी पहने रहूंगा। वे जो भी खाएं-पिएं, जो मांगें दे देना, पर एक पैसा भी नहीं मांगना। यह पेशगी रकम लो। बाद में मैं हिसाब कर लूंगा।”

दुकानदारों को इसमें क्या आपत्ति होती! लड़के का भी इसमें कोई नुकसान नहीं था। उसने वह रकम उन तीनों व्यक्तियों की एक गुल्लक में से निकाल कर दी थी।

दूसरे दिन सुबह वह तीनों व्यक्तियों को लेकर बाज़ार में पहुंचा। तब तक बाज़ार में उसके पेशगी रकम देने की बात फैल चुकी थी। सबने उसे कोई सिर-फिरा रईस समझ लिया था। इसलिए जिस दुकान के सामने से वह निकल जाता, उसका मालिक सिर झुकाकर अदब से खड़ा हो जाता। सारे बाज़ार का चक्कर लगाने के बाद वह लड़का उन्हें एक बड़ी दुकान में ले गया। यहां खाने-पीने की बड़ी स्वादिष्ट चीज़ें रखी थीं। चारों ने जमकर भोजन किया। भोजन करने के बाद लड़का उठा। उसके साथ तीनों व्यक्ति भी उठ खड़े हुए। जब वे बाहर जाने लगे तो दुकान का मालिक हाथ जोड़कर उठ खड़ा हुआ। वह बोला-“फिर कभी ज़रूर पधारिएगा। दुकान आपकी ही है।”

लड़का मुस्कराकर रह गया। दुकान के आइने में उसने अपनी विचित्र टोपी कुछ ठीक की और फिर दुकान के बाहर हो गया। तीनों व्यक्तियों की तो आंखें फटी रह गईं। उन्होंने सपने में भी टोपी के चमत्कारी होने की बात नहीं सोची थी। वे अभी सोच-विचार में डूबे ही थे कि लड़के ने कहा “आइए, अब और कहीं चलें।”

तीनों व्यक्ति चुपचाप उसके पीछे हो लिए। वह लड़का दिनभर उन्हें बाज़ार में घुमाता रहा। दोपहर में वह उन्हें एक और होटल में खाना खिलाने ले गया। शाम को भी उसने उनकी इसी तरह खातिरदारी की। तीनों व्यक्तियों को तो जैसे सब-कुछ सपना-सा लग रहा था। जहां भी वह लड़का टोपी पहने जाता, वहीं उसकी बड़ी आवभगत होती।

रात को वे घर लौटने लगे। राह में उन तीनों व्यक्तियों ने वह चमत्कारी टोपी खरीदने का निश्चय किया और घर पहुंचते ही वह उस लड़के से टोपी खरीदने की बात करने लगे। लड़के ने टोपी बेचने से इनकार कर दिया। वह बोला, “मेरे पास यही तो एक पैतृक संपत्ति है। मैं इसे किसी भी कीमत पर नहीं बेचूंगा।”

उधर तीनों व्यक्तियों ने किसी भी तरह वह टोपी हथियाने का निर्णय कर लिया था। उन्होंने हाथ जोड़ उससे विनती की, अपना सब-कुछ देकर भी टोपी खरीदने की बात कही तो लड़के ने कहा, “आप लोग मुझे इतना शर्मिंदा न करें। मैं आपको यह टोपी दे दूंगा।”

उसी रात तीनों व्यक्तियों ने अपनी सारी संपत्ति लड़के को देकर उससे टोपी खरीद ली। लड़का उनकी सारी संपत्ति अपने उसी बैल पर लादकर चल पड़ा और रातों-रात बहुत दूर निकल गया।

सुबह हुई और तीनों व्यक्ति टोपी की बदौलत बाज़ार-का-बाज़ार खरीदने के लिए चल पड़े बाज़ार पहुंचने पर वे पहले उसी दुकान में गए, जहां एक दिन पहले उस लड़के ने उन्हें छककर भोजन कराया था। टोपी के कारण दुकान का मालिक उन्हें फौरन पहचान गया। उसने उठकर उनकी आवभगत की और स्वयं खाने-पीने की चीज़ें ला-लाकर उनके सामने रखता गया। तीनों व्यक्तियों ने सोचा, टोपी अपना कमाल दिखा रही है। उन्होंने खूब छककर खाना खाया, फिर डकार लेते हुए उठ खड़े हुए। जब वे बिना पैसे दिए बाहर जाने लगे तो दुकानदार ने कहा, “जनाब, पैसे तो देते जाइए।”

तीनों व्यक्ति तमक उठे, “पैसे, पैसे किस बात के?” और यह कहते हुए उनमें से एक ने टोपी दुकानदार की आंखों के सामने नचा दी। दुकानदार काफी मोटा-तगड़ा था। वह अकेला ही तीनों के लिए काफी था। उसने लपककर टोपी वाले व्यक्ति की गर्दन पकड़ ली और बोला, “अब बताऊं तुझे पैसे किस बात के?”

तीनों व्यक्ति बड़े सकपकाए। उनमें से एक ने जल्दी से पैसे देकर अपना पीछा छुड़ाया और दुकान से बाहर हो गए।

बाहर आकर वे आपस में झगड़ने लगे। टोपी पर उन्हें अभी भी विश्वास था। दो व्यक्तियों ने अपने तीसरे साथी से कहा-“’तुमने टोपी हाथ में ले रखी थी, इसी कारण उसका असर नहीं हुआ। तुम इसे सिर पर पहनो।”

तीसरे व्यक्ति को इस बात में सच्चाई लगी। उसने टोपी सिर पर रख ली। उसे बड़ी शर्म लग रही थी, पर क्या करता! अब वे तीनों फिर एक दुकान में गए। वहां भी उन्होंने मनचाही चीज़ें खरीदीं। जब वे उनकी गठरी बांधकर चलने लगे तो दुकानदार ने उनसे चीज़ों के दाम मांगे। तीनों व्यक्तियों को कुछ सूझ न पड़ा। घबराहट में टोपी पहना व्यक्ति दूकानदार के सामने आकर अपना सिर हिलाने लगा ताकि दुकानदार टोपी से प्रभावित हो जाए। पर इसका उल्टा असर हुआ। दुकानदार ने उसे जोर का थप्पड़ मारा तो टोपी उड़कर भट्ठी में जा गिरी और क्षणभर में जलकर राख हो गई।

टोपी को इस तरह भस्म होते देखकर तीनों व्यक्ति चीख-चीखकर रोने लगे। अब तो उस दुकान के सामने भीड़ लग गई। जब तीनों व्यक्तियों ने रोते-रोते करामाती टोपी के गुण बतलाए तो लोगों का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया।

दुकानदारों ने उन्हें असली बात बतलाई। अब तो उन तीनों व्यक्तियों के होश उड़ गए। वे समझ गए कि उस लड़के ने उन्हें बेवकूफ बनाकर अपना बदला ले लिया है। उस दिन से उन्होंने किसी को धोखा न देने की कसम खा ली।

सीख : कभी किसी के साथ छल नहीं करना चाहिए

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