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Yugoslavia ki Lok Kathayen-1 (युगोस्लाविया की लोक कथाएँ-1)

कहानी-अन्याय और अज्ञान का अन्त-युगोस्लाविया की लोक-कथा

समुद्र के किनारे मछुआरों की एक छोटी सी बस्ती थी। एक दिन जब मछुआरे मछली पकड़ने जा रहे थे, उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा पानी में खड़ा है। वह हाथ हिला-हिलाकर कह रहा था, “मत जाओ, रुक जाओ, तूफान आ रहा है, सब डूब जाओगे!”

उस बूढ़े को पहले कभी किसी ने नहीं देखा था। अधिकतर मछुआरों ने समझा, शायद कोई पागल भटककर इधर आ गया है। वे अपनी नावें लेकर आगे चले गए। वे बूढ़े पर हँस रहे थे। पर कुछ मछुआरों पर बूढ़े की बात का असर हुआ और वे मछली पकड़ने नहीं गये। थोड़ी देर बाद सचमुच बहुत ज़ोर का तूफान आ गया। गये हुए मछुआरे नहीं लौटे-वे तूफान की चपेट में आकर डूब गए थे।

अब बस्ती के लोगों ने बूढ़े की चेतावनी की सच्चाई समझ गई थी। वे सब इकट्ठे होकर उसे ढूंढने निकल पड़े । वह समुद्र के किनारे बैठा था, बस्तीवालों को देखकर बोला, “मैंने तो उन लोगों को पहले ही मना किया था। अपने से बड़े आदमी की बात पर ध्यान देना अच्छा रहता है।”

बूढ़े ने एक चट्टान पर झोपड़ी बना ली और वहीं रहने लगा। मछुआरों ने भी निश्चय कर लिया कि आगे से बूढ़े की हर चेतावनी सुनेंगे। बूढ़े की हर भविष्यवाणी सही होती थी। वह कई दिन पहले बता देता था कि अमुक दिन इस समय तूफान आयेगा। जिससे उस बस्ती का कोई भी मछुआरा तूफान में नहीं फँसा।

जल्दी ही उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई अब तो बड़े-बड़े जहाजों के कप्तान भी मौसम के बारे में सलाह लेने उसके पास आने लगे। सब हैरान थे कि आखिर उसकी भविष्यवाणियां इतनी सटीक कैसे उतरती हैं। कुछ लोग उसकी जासूसी करने लगे कि वह कहां जाता है, क्या करता है। लेकिन कुछ पता नहीं चल सका । दिनभर समुद्र के किनारे बैठा रहता था। किसी ने उसे कहीं आते-जाते नहीं देखा।

उस प्रदेश के राजा ने भी बूढ़े के बारे में सुना। वह बहुत ही घमण्डी और निर्दयी राजा था। उसने बूढ़े की विचित्र शक्ति से फायदा उठाने की सोची। उन दिनों शमी द्वीप के राजा से उसकी दुश्मनी थी। उसने सोचा शमी द्वीप पर हमला करते समय बूढ़ा बहुत काम आ सकता है। पिछले आक्रमण में हमारी नौसेना भयंकर तूफान में फंस गई थी। अगर हमले से पहले मौसम की सही सूचना मिल जाए तो हम जीत सकते हैं।

बस, फिर क्या  था! राजा अपने साथ कुछ सैनिक लेकर चल दिया। मछुआरों की बस्ती के बाहर ही उसने पड़ाव डाल दिया। फिर एक नाविक का रूप बनाकर वह अकेला ही बूढ़े से मिलने चल पड़ा। बूढ़े को अपना परिचय देकर वह बोला, “भविष्य में तुम सिर्फ मेरे कहने पर ही मौसम की भविष्यवाणी करोगे–और केवल मेरे लिए करोगे ।”

“इसका मतलब यह कि आप राजा होते हुए भी राजा नहीं हैं!” बूढ़े ने कहा, “राजा के लिए तो उसकी प्रजा की भलाई सबसे पहली चीज़ होती है। आप कैसे राजा हैं? मैं आपकी आज्ञा नहीं मान सकता।”

बूढ़े की फटकार सुनकर राजा लज्जित हो उठा। उसे गुस्सा तो बहुत आया पर अभी उसे बूढ़े का रहस्य जानना था। वह खून का घूंट पी गया। बोला, “अच्छा, एक बात बताओ, तुम्हें ये खबरें कौन देता है?”

“मेरे कुछ दोस्त।”

“कौन-से दोस्त?” राजा ने फिर पूछा।

“आप उन्हें नहीं देख सकते, इसलिए बताना बेकार है।” कहकर बूढ़ा हंसने लगा।

राजा को लगा बूढ़ा उसका मजाक उड़ा रहा है। चिल्लाकर बोला, “अगर नहीं बताओगे तो मैं तुम्हें जेल में डाल दूंगा ।”

“कैद से मैं नहीं डरता।” बूढ़े ने लापरवाही से कहा, “लेकिन जब आप इतनी ज़िद कर रहे हैं तो आज रात को मैं आपको अपने उन दोस्तों के पास ले चलूंगा। रास्ता जोखिम भरा है। अगर आप संकट में फंस जाएं तो बाद में मुझे दोष न दीजिएगा ।”

राजा ने हामी भर दी, वह हर कीमत पर बूढ़े का भेद जानना चाहता था।

रात हुई, चाँदनी में समुद्र का पानी चाँदी-सा चमकने लगा। बूढ़ा झोंपड़ी में से लोहे के दो भारी डण्डे ले आया। बोला, “इन्हें मजबूती से पकड़कर मेरे पीछे-पीछे आओ।”

सिपाहियों ने बूढ़े को कैद करना चाहा पर बूढ़ा हर बार उनके बन्धन से मछली की तरह फिसल जाता। आखिर सेनापति ने मौका पाकर अपना डण्डा जोर से बूढ़े के सिर पर दे मारा। बूढ़ा बेहोश होकर गिर पड़ा।

सिपाहियों ने झटपट उसे घोड़े पर बैठाकर रस्सियों से कस दिया और पड़ाव की ओर चल दिए। अभी वे थोड़ी ही दूर गए होंगे कि जोर का तूफान आ गया। ऐसे में सफर नहीं किया जा सकता था। उन लोगों ने एक पहाड़ी गुफा में डेरा डाला और तूफान थमने का इन्तजार करने लगे। थोड़ी देर बाद बूढ़े को होश आ गया, लेकिन उसने बंधन से छूटने की कोई कोशिश नहीं की। उसका चेहरा पीला पड़ गया था। उस पर झुर्रियां दिखाई पड़ने लगी थीं।

उसकी ओर से निश्चिन्त होकर वे लोग खाने-पीने की तैयारियां करने लगे। खाना खा-पीकर जब वे आराम करने लगे तब कहीं उन्हें बूढ़े का ध्यान आया। वह बेचारा उसी तरह घोड़े की पीठ पर बंधा हुआ था।

बूढ़े की हालत देखकर सेनापति के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसका चेहरा एकदम काला हो गया था। आंखें बन्द थीं। वह बहुत धीरे-धीरे सांस ले रहा था। ऐसा लगता था जैसे वह पल-दो-पल का ही मेहमान हो।

सेनापति राजा के गुस्से से भली-भांति परिचित धा। उसे मालूम था कि अगर बूढ़े को कुछ हो गया तो उसकी जान की खैर नहीं। उसने तुरन्त एक सिपाही को राजा के पास भेज दिया, क्योंकि बूढ़े की हालत सफर करने लायक नहीं थी। बाकी लोग बूढ़े की देखभाल में लग गए। नज़दीक ही एक तालाब था। एक सिपाही दौड़कर पानी ले आया

पानी में जैसे जादू था। पानी पीते ही बूढ़े ने आंखें खोल दीं। उसके चेहरे पर छाया कालापन भी कुछ कम हो गया। पर अब भी खतरा टला नहीं था।

दूत घोड़ा दौड़ाता हुआ राजा के शिविर में पहुंचा। सुनते ही राजा भी घबरा गया। वह तुरन्त सैनिक के साथ बूढ़े को देखने चल दिया।

बूढ़े को देखते ही राजा समझ गया कि यह अधिक देर तक जीवित नहीं रहेगा। यही मौका है। अगर अब इसका रहस्य पता नहीं चला तो फिर कभी नहीं जाना जा सकेगा। उसने मधुर आवाज़ में कहा, “देखो, तुम मौत के दरवाज़े पर हो। अब तो तुम्हें अपना भेद बता देना चाहिए।”

बूढ़ा कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “मुझे गर्मी लग रही है। मैं पहले नहाना चाहता हूं। उसके बाद बता दूंगा।”

“पास में ही एक तालाब है।” एक सिपाही बोला।

राजा ने इशारा किया तो सिपाही बूढ़े को सहारा देकर नदी की तरफ ले चले। बूढा दौड़कर नदी में घुस गया और बहुत देर तक नहाता रहा।

राजा को एक-एक पल भारी हो रहा था। वह किनारे से पुकारकर बोला, “जल्दी बाहर आओ। हमें वापस भी पहुंचना है ।”

“तो जाओ?” बूढ़े ने कहा। उसका चेहरा धूप में चमक रहा था। वह एकदम स्वस्थ दिखाई दे रहा था।

“लेकिन वह बात…” अभी राजा की बात पूरी नहीं हुई थी कि बूढ़ा ज़ोर से हँस पड़ा । फिर बोला, “तुमने तो अपनी मूर्खता के कारण मुझे मार ही डाला था। मैंने पहले ही कहा था कि मैं समुद्र से, पानी से दूर नहीं रह सकता। मैं फिर कहता हूँ कि तुम राजा के वेश में शैतान हो, स्वार्थी हो। प्रजा की भलाई नहीं चाहते। प्रजा को नया राजा चाहिए। तुम मेरा रहस्य जानना चाहते हो। मैं पूछता हूं, तुम प्रकृति के कितने भेद जानते हो?”

राजा को गुस्सा चढ़ आया। उसने तलवार खींच ली। सेनापति से बोला, ‘पकड़ो शैतान को! मैं अभी इसका सिर काट दूंगा ।”

सिपाही पानी में कूदे, लेकिन बूढ़ा उनके हाथ नहीं आया। वह पानी में काफी दूर चला गया था।

यह देखकर राजा आपे में न रहा। तलवार लेकर वह पानी में कूद पड़ा। कूदते ही वह तालाब की तली में उगी झाड़ियों में फंस गया। वह निकलने के लिए बहुत छटपटाया, लेकिन बाहर न आ सका। सिपाही उसे बचाने आए पर राजा उनके पहुंचने से पहले ही डूब गया।

बूढ़ा जोर से हँस पड़ा और काफी देर तक हँसता रहा। फिर सेनापति से बोला, “अन्याय और अज्ञान का अन्त इसी तरह होता है।” अगले ही पल सैनिकों ने देखा कि बूढ़ा पानी में गायब हो गया था। वे काफी देर तक खड़े रहे, लेकिन फिर बूढ़ा पानी से बाहर नहीं आया।

उसके बाद बूढ़े को किसी ने नहीं देखा। लोग अकसर उसकी झोंपड़ी पर जाते कि शायद वह लौट आया हो। पर वह नहीं लौटा। उसे लेकर तरह-तरह की कहानियां चल निकलीं जो आज तक चल रही हैं।

सीख: अन्याय और अज्ञान अधिक समय नहीं टिकते

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