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Misr (Egypt) ki Lok Kathayen-3 (मिस्र की लोक कथाएँ-3)

कहानी-राहगीर की बुद्धिमत्ता (Rahgir ki Buddhimata): मिस्र की लोक कथा

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बहुत पुरानी बात है, एक व्यापारी था । जिसका नाम था ज़बारी। उसने अपने पिता का व्यापार कुछ समय पहले ही संभाला था । एक बार वह अपने ऊंट पर कुछ सामान लादकर दूसरे शहर के लिए चल पड़ा। बहुत तेज गर्मी थी और रास्ते कंटीले व रेतीले थे| अचानक तेज़ आंधी चलने लगी, ज़बारी एक ठीक-ठाक सी सराय देखकर वहां रुक गया।

उसने ऊंट से सामान उतारा और ऊंट को बाहर ही बांध दिया । वह दिन भर का थका हुआ था तो उसे लेटते ही गहरी नींद आ गई । सुबह को जब वह सोकर उठा तो ऊंट गायब था यह देखकर वह घबरा गया । तभी उसने देखा कि उसका सामान भी वहां नहीं है, वह रोने लगा ।

ज़बारी रोते-रोते सराय के मालिक से पूछने पहुंचा पर सराय मालिक को ऊंट के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी । ज़बारी ऊंट की खोज में तेजी से शहर की ओर चल दिया । परंतु दूर- दूर तक सड़कें सुनसान थीं । ऊंट तो क्या,  कोई आदमी भी नजर नहीं आ रहा था । काफी दूर चलने पर उसे एक राहगीर मिला, ज़बारी ने उस राहगीर से पूछा, “भाई, क्या आपने इधर से किसी आदमी को ऊंट ले जाते देखा है ?”

राहगीर बोला, “ऊंट तो क्या मैंने कोई गधा-घोड़ा भी इधर से जाते नहीं देखा पर न जाने क्यों मुझे लगता है कि आपका ऊंट काना है ?” ज़बारी उस राहगीर का हाथ पकड़ कर खड़ा हो गया और बोला, “मैं आपको यूं ही न जाने दूंगा । आपने अवश्य ही मेरा ऊंट इधर से जाते देखा है ।” राहगीर ने हाथ छुड़ाकर आगे बढ़ते हुए कहा, “मैं सच कह रहा हूं कि मैंने आपका ऊंट नहीं देखा । देखा होता तो अवश्य बता देता ।”

ज़बारी राहगीर के साथ-साथ बातें करते हुए चलने लगा । उसने सोचा कि शायद बातों-बातों में वह राहगीर उस ऊंट के चोर के बारे में सही-सही बता देगा । हो न हो इसने मेरा ऊंट अवश्य देखा है। वरना उसे कैसे पता चलता कि मेरा ऊंट काना है । परंतु कुछ ही मिनटों में राहगीर बोला, “भाई साहब, आप क्यों अपना समय बरबाद कर रहे हैं । यह सड़क सीधे शहर को जाती है, चोर अवश्य ही इधर से ऊंट ले गया होगा । आप बिना समय गंवाए तेजी से जाएंगे तो अवश्य ही आपका ऊंट मिल जाएगा । मुझे लगता है आपके ऊंट के एक तरफ शक्कर की बोरी लदी हुई थी ।”

ज़बारी हैरत में पड़ गया कि यदि राहगीर ने ऊंट को नहीं देखा तो यह कैसे बता रहा है कि उसके एक तरफ शक्कर लदी थी । ज़बारी ने पूछा, “आप ठीक फरमाते हैं, परंतु क्या आप बता सकते हैं कि ऊंट के दूसरी तरफ क्या था ?” राहगीर बोला, “शायद कोई अनाज होगा ।” अब तो ज़बारी का शक यकीन में बदल गया और वह राहगीर से झगड़ने लगा कि वह ऊंट चोर को अवश्य जानता है अथवा उसने किसी को ऊंट ले जाते देखा है ।

राहगीर ने ज़बारी को सड़क की ओर धकेलते हुए कहा, “यदि अब तुमने समय गंवाया तो ऊंट भी गंवा दोगे ?”

ज़बारी को कुछ न सूझा । वह सड़क पर तेजी से दौड़ने लगा । वह कुछ घंटों तक शहर जाने वाली सड़क पर दौड़ता रहा, तभी उसने एक स्थान पर ऊंटों का झुंड देखा । वहां कुछ छायादार पेड़ भी थे, जिनके नीचे यात्री आराम कर रहे थे ।

ज़बारी जल्दी से अपना ऊंट तलाशने लगा । तभी उसने देखा कि उसका ऊंट एक पेड़ से बंधा है और जुगाली कर रहा है, साथ ही गेहूं और शक्कर के बोरे भी उतरे हुए रखे हैं । ज़बारी चीख-चीखकर पूछने लगा, “यह मेरा ऊंट है, इसे कौन यहां लाया है ?”

परंतु किसी ने कोई जवाब नहीं दिया । ज़बारी कुछ देर आराम करना चाहता था, परंतु उसकी इच्छा थी कि वह ऊंट-चोर को सजा अवश्य दिलवाए, यदि वह आराम करने रुक जाता तो चोर उसके हाथ से निकल जाता । वह सोचने लगा कि उसका ऊंट कौन चुरा सकता है ? सोचते-सोचते उसका शक उसी राहगीर पर अटक गया । उसे लगा कि हो न हो वह राहगीर या तो स्वयं चोर है या उस चोर का साथी है ।

वह अपना ऊंट लेकर तेजी से सराय की ओर चल पड़ा ताकि राहगीर को बीच सड़क पर ही पकड़ सके । थोड़ी-सी दूर जाने पर ही राहगीर मिल गया । ऊंट को लाते देखकर राहगीर ज़बारी से बोला, “मिल गया आपका ऊंट ?”

परंतु ज़बारी को क्रोध आ रहा था । वह तुरंत उस ऊंट से उतरकर उस राहगीर को पकड़कर बोला, “एक तो ऊंट चुराते हो, ऊपर से भोले बनकर कहते हो, मैंने ऊंट नहीं देखा ।”

ज़बारी राहगीर को पकड़ कर काजी के पास ले गया । उसने काजी से शिकायत की कि इस राहगीर ने मेरा ऊंट चुराया है और ऊपर से कहता है कि इसने मेरा ऊंट देखा तक नहीं है । उसने राहगीर की पूरी बात काजी को बता दी ।

काजी को सुनकर लगा कि अवश्य कोई गड़बड़ है, वरना राहगीर सारी बातें सही कैसे बता सकता है ? उसने सख्ती बरतते हुए राहगीर से पूछा, “सच बताओ कि क्या तुमने ऊंट चुराया या चुराने में मदद की ?”

राहगीर शांत भाव से बोला, “हुजूर, मैंने तो इसका ऊंट देखा तक नहीं था, फिर मैं ऊंट चुरा कैसे सकता हूं ?”

काजी ने पूछा, “देखो, यदि तुमने झूठ बोला तो तुम्हें कारागार में डाल दिया जाएगा । अब तुम यह बताओ कि यदि तुमने ऊंट देखा ही नहीं तो तुम्हें यह कैसे पता लगा कि ज़बारी का ऊंट काना है ?”

यह सुनकर राहगीर के चेहरे पर डर के कोई भाव प्रकट नहीं हुए । वह बेहिचक बोला, “जिस रास्ते से मैं गुजर रहा था, उस रास्ते के दाहिनी ओर के वृक्षों की डंडिया व पत्तियां बिल्कुल सही-सलामत थीं, जबकि बाईं ओर की पत्तियां ताजी- ताजी खाई हुई जान पड़ती थीं । इससे मुझे ऐसा जान पड़ा कि इधर से जो जानवर गया है वह अवश्य एक आंख से काना है । तभी उसने केवल एक ही ओर की पत्तियां खाई हैं ।”

राहगीर की बात सुनकर ज़बारी व काजी दोनों संतुष्ट हो गए । अब काजी ने राहगीर की बुद्धिमत्ता का लोहा मानते हुए धीमे स्वर से पूछा, “राहगीर, अच्छा तुम्हें यह कैसे पता लगा कि ऊंट के एक तरफ शक्कर लदी थी । दूसरी तरफ कोई अनाज ?” राहगीर बोला, “उस रास्ते में स्थान-स्थान पर शक्कर के दाने बिखरे थे । जिन पर मक्खियां भिनभिना रही थीं । हो सकता है कि शक्कर की बोरी में कोई छेद हो । इसी से मैंने अंदाज लगाया कि उधर से निकलने वाले जानवर की पीठ पर शक्कर लदी होगी । इसी प्रकार कहीं-कहीं अनाज के दाने जमीन पर बिखरे थे, जिन्हें चिड़ियां चुग रही थीं । हुजूर, सड़क पर अनाज यूं ही तो नहीं उग सकता । अनाज तो खेतों में ही उगता है । इसलिए मैंने अंदाजा लगाया कि इधर से जाने वाले जानवर की पीठ पर कोई अनाज लदा था ।”

राहगीर की बात सुनकर ज़बारी अपने व्यवहार पर बहुत लज्जित होते हुए उससे माफी मांगने लगा । काजी ने भी राहगीर की बुद्धिमत्ता की प्रशंसा की और उसे छोड़ दिया।

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