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Bade Babu ka Pyar (बड़े-बाबू का प्यार)

भाग 1: हैप्पी बर्थ डे वन्स अगेन…..( Ch 1: Happy Birthday Once Again..)

 “बड़े-बाबू…..ओ बड़े-बाबू…..दरवाज़ा खोलिए, कब से घंटी बजा रहे हैं”, मंदार दरवाज़ा पिटते हुए बोला|थोड़ी देर में दरवाज़ा खुला और दिवाकर झांकते हुए बोले, “अरे मंदार, तुम यहाँ, इतनी रात…..?”

मंदार दरवाज़ा धकेल कर अन्दर आते हुए बोला, “अरे हटिए बड़े-बाबू, सारा सवाल दरवाज़े पर ही कीजिएगा क्या….कब से दरवाज़ा पीट रहे हैं| वैसे जनमदिन की फिर से शुभ-कामना, हैप्पी बर्थ डे वन्स अगेन…..”        

दिवाकर ने सिटकनी चढ़ाई और अपना हाथ तौलिये में पोछते हुए बोले, “अरे वो कपड़े धो रहा था तो घंटी की आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी….आओ बैठो|”

दिवाकर न्यू इंडिया इन्श्योरेन्स में ब्रांच ऑफिसर थे और स्वभाव से बेहद ही इन्ट्रोवर्ट| ऑफिस में काम से काम और फिर घर| पिछले छह साल से ट्रांसफर हो कर कोटा से जयपुर आए थे पर मजाल है जो एक आदमी भी जानता हो दिवाकर कहाँ से हैं और उनका परिवार क्या है|

बस कुर्सी का लिहाज़ था जो सभी बड़े-बाबू कहते थे, बाकि न चाय न गपशप, खाना भी तब खाते थे जब सब खा कर उठ जाते| शुरू – शुरू में तो लोगों ने कोशिश की पर जब अगले ने ही कोई इंट्रेस्ट न दिखाया तो लोगों ने पूछना भी बंद कर दिया| अब तो बस सुबह गुड-मॉर्निंग और शाम गुड-नाईट का नाता था|

“अरे क्या बड़े-बाबू, आज जनमदिन है आपका और आप कपड़े धो रहे हैं, पार्टी-वार्टी कीजिए, कहीं घूमने जाइए| क्या बड़े-बाबू…..?” मंदार ताना मारते हुए बोला|

मंदार भी दिवाकर के साथ ही इन्श्योरेन्स ऑफिस में था, छह महीने पहले ही जोधपुर से ट्रांसफर हो कर आया था और अब जयपुर में असिस्टेंट ब्रांच ऑफिसर था| रहने वाला रांची का और व्यवहार में दिवाकर का बिलकुल उलट, छह महीने में पूरा ऑफिस मंदार को अन्दर और बाहर से जानने लगा था और मंदार पूरे ऑफिस को| क्या महिला कर्मचारी, क्या कैशिअर और क्या चपरासी हर कोई मंदार का फैन था| कोई भी विषय उठा लो मंदार घंटों बातें कर सकता था| जितना व्यवहारी था उतना ही कार्यकुशल| ऐसा नहीं था की दिवाकर से बात बढ़ाने की कोशिश न की हो पर जब हर सवाल का जवाब हाँ या ना में आए तो बात बढ़े भी तो कैसे? बस पूरे ऑफिस में शर्त लगी थी कि मंदार बड़े-बाबू को शीशी में न उतार पाएगा, और मंदार ने शर्त मंज़ूर कर ली थी, कहता था हारना पसंद नहीं है उसे| इसी सिलसिले में सीधे दिवाकर के घर आ धमका था|

“अब कहाँ घूमने जाएं, अपने लिए तो अपना घर ही सही है, इतना काम रहता है, इसी में समय कट जाता है|” दिवाकर चेहरे पर नकली मुस्कान लाते हुए बोले|

“छह साल हो गए आपको जयपुर में बड़े-बाबू, सब बता रहे थे……अच्छा बताइए तो कितना जान पाए हैं जयपुर को, क्या- क्या घूमें हैं…?” मंदार ताना मारते हुए बोला|

दिवाकर थोड़ा गंभीर हुए और बोले, “ऐसी बात नहीं है, हवामहल और चाँदपोल गए थे जब माँ और बाऊ जी आए थे| और वो क्या….हाँ, जलमहल भी गए थे|”

“अरे क्या बड़े बाबू, हम स्रवनकुमार वाले दर्शन की बात नहीं कर रहे हैं, इतने मॉल हैं, शापिंग कॉम्प्लेक्स हैं, सिनेमा हाल हैं……ये बताइए कितना उमर हो गया आपका|” मंदार बोला

“ऐसी बात नहीं है….वैसे उम्र से क्या मतलब है तुम्हारा…., तुमसे एक या दो साल बड़े होंगे या बराबर|” दिवाकर जोर देते हुए बोले|

मंदार मुस्कुराया और  बोला, “अरे वो बात नहीं है बड़े-बाबू, आज जनमदिन है  तो केक– वेक कटेगा…..आफिस में तो सब इंतज़ार करते रह गए, इसीलिए तो हम आए हैं| अब अकेले है तो क्या सेलिब्रेट भी नहीं कीजिएगा…….बताइए क्या व्यवस्था है| खाने की क्या तैयारी है|”

“अरे क्या सेलिब्रेट….देखते हैं फ्रिज में मटर रखी होगी, अभी आलू मटर बनाते हैं|” इस बार दिवाकर का कॉन्फिडेंस खिल के आया, लगा की पाक कला में काफी महारत है और उन्हें इस पर गर्व भी|

सारे गुमान को ठेंगा दिखाते हुए मंदार बोला, “अरे क्या बड़े-बाबू…आपका जनमदिन है…मज़ाक है क्या…. आलू – मटर…..अरे आलू को रखिए डलिया में, देखिये हम क्या लाए हैं|….आज बनेगा मटर-पनीर और साथ में पूड़ी….बताइए तो फ्रिज कहाँ है? पनीर रख दें…..और लाइए प्याज़…सब्जी की तैयारी करते हैं|”

इतना बोल कर मंदार उठा ही था कि दिवाकर ने लपक कर मंदार का हाथ पकड़ लिया| खाना बनाने का मौका और वो भी कोई दिवाकर के हाथ से छीन ले, हो ही नहीं सकता था| उधर हाव भाव से लगा की दिवाकर थोड़ा खुलने लगे थे, मुस्कुराते हुए बोले, “अरे मंदार क्या है ये सब, बोल देते, मैं पहले से तैयारी कर के रखता” दिवाकर ने पनीर मंदार के हाथ से पकड़ी और फ्रिज में रख आए|

“अच्छा बड़े-बाबू, कभी जानने का मौका नहीं मिला, अपने परिवार के बारे में तो बतलाइए….” मंदार बात बढ़ाने की कोशिश करता हुआ बोला|

“हम लोग टोंक से हैं, शुरुआती पढाई टोंक में, फिर ग्रेजुएशन जयपुर से| ग्रेजुएशन के बाद इसी कंपनी में नौकरी वो भी कोटा शहर में घर के पास और अब छह साल से जयपुर में हूँ|”

“और फैमिली?”  मंदार ने पूछा

“वो सब टोंक में ही हैं, माँ , बाऊ जी और छोटी बहन|” दिवाकर ने जवाब दिया|

“और शादी?….वाइफ ?” मंदार ने जोर देते हुए पूछा|

“ये बताओ, कैसी मटर पनीर खाओगे, गाढ़े रसे वाली या नार्मल?” दिवाकर मंदार का सवाल लगभग गोल करते हुए बोले|

मंदार रुका, फिर कुछ सोच कर बोला, “जैसा भी बना लीजिए बड़े-बाबू, हमें तो पनीर से मतलब है, बस पनीर मस्त फ्राई कर दीजिएगा|” फिर कुछ देर ठहरने के बाद मंदार बोला, “अच्छा ये बताइए बड़े-बाबू, बर्थडे सूखा –सूखा मनेगा क्या, सेलिब्रेट नहीं कीजिएगा का?”

“अरे बन तो रहा है पनीर-पूरी, अब क्या खीर भी खाओगे?” दिवाकर पूछते हुए बोले|

“अब इतने भी भोले न बनिए बड़े-बाबू…..कुछ गला गीला करने का इंतज़ाम है या मेहमान को बिलकुल सूखा रखिएगा?…..आप बिलकुल नहीं लेते क्या?” मंदार चुटकी लेटे हुए बोला|

भाग 2: मज़ाक है क्या… (Ch 2: Mazaak hai kya…)

अब दिवाकर खुलने लगे थे, तो बोले, “ऐसी बात नहीं है, जब हम ग्रेजुएशन में जयपुर थे तो….”| “बस!!” मंदार बीच में ही बात काटते हुए बोला| “बस, हम जानते थे, ये देखिए, हम पूरी व्यवस्था से आए हैं| अरे बड़े-बाबू का जनमदिन है मज़ाक है क्या…..ये बताइए, रम चल जाएगी ना…वरना कुछ और ले कर आएं|”

“अरे ये सब क्या है मंदार…बहुत साल हो गए….इसकी क्या ज़रुरत थी|” दिवाकर संकोचते हुए बोले|

“कुछ नहीं बड़े-बाबू, अपने घर से इतना दूर रह रहे हैं, वो भी अकेले….अरे जनमदिन है आपका….आज तो बनती है..मना मत कीजिएगा|” मंदार जोर देते हुए बोला|

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दिवाकर मंदार का लिहाज़ रखते हुए बोले, “अच्छा ठीक है, ले आए हो तो ले लेंगे, पर ये प्लास्टिक का ग्लास रहने दो…हम कांच का लाते हैं|”

मंदार उचकते हुए बोला, “ये हुई न बात बड़े-बाबू….अब आएगा मज़ा…..खूब ज़मेगा रंग जब मिल बैठेंगे तीन यार…हम, हमारे बड़े-बाबू और हमारे अकेलेपन का साथी रम|…. बड़े-बाबू, नमकीन –शमकीन हो तो लेते आइएगा|….क्या बात है बड़े-बाबू दिल खुश कर दिया”

तभी मंदार के फ़ोन की घंटी बजी|

“हलो….हाँ डार्लिंग कैसी हो?”

“हम भी बढ़िया हैं….बस तुम्हारी याद में जी रहे हैं और दिन काट रहे हैं….”

“हाँ, आज तो बड़े-बाबू का जनमदिन है तो जशन की तैयारी है…बस वहीँ आया हूँ…”

“प्रॉमिस, ज्यादा नहीं पिऊंगा….अरे अभी तो शुरू भी नहीं की है”

“हाँ डोंट-वरी, परेशान मत हो….हम ठीक ठाक घर पहुँच जाएँगे….”

“मिस यू टू….अरे मेरा बस चले तो कल ही आ-जाऊँ तुम्हे लेने….”

“ओके….गुड नाईट….लव यू टू…”

जब तक मंदार की बातें चालू थी तब तक दिवाकर तैयारी कर चुके थे| मेज़ पर नमकीन और दो कांच ग्लास भी सज चुके थे| दिवाकर फ्रिज से कोल्डड्रिंक लाते हुए बोले, “किसका फ़ोन था?”

मंदार मुस्कुराते हुए बोला, “अरे वो हमारी मिसेज़ का फ़ोन था, खोज़ खबर ले रहीं थीं….आज कल मायके में हैं न इसीलिए|” फिर बात बढ़ाते हुए बोला, हम लोग तो रांची से हैं, पर डॉली का घर पाली में है| पहले तो हमारी पोस्टिंग जोधपुर थी तो नजदीक था, अब जयपुर पटक दिया है तो पांच महीने बाद मायके गई है|”

“और तुम्हारी आज़ादी चालू है…” दिवाकर चुटकी लेटे हुए बोले|

मंदार ने ग्लास हाथ में उठाई और सधे हाथों से पेग बनाते हुए बोला, “ऐसा नहीं है बड़े-बाबू, वो तो आपका जनमदिन है सो हम ले आए, वरना हमारा रेगुलर नहीं है…..जब डॉली की याद आती है तो कभी-कभी पी लेते हैं, वो भी पूछ कर…..बहुत प्यारी है हमारी मिसेज़|” ऐसा लगा बोलते- बोलते कहीं खो गया हो, फिर अचानक बोला, “ये लीजिये बड़े-बाबू…चियर्स, आपकी लम्बी उमर के लिए….वन्स अगेन हैप्पी बर्थडे बड़े-बाबू|” इतना बोलते ही मंदार पूरा ग्लास एक सांस में गटक गया|

उधर दिवाकर ने एक बार ग्लास को देखा फिर मदार को देखते हुए बोले, “लगता है काफी स्ट्रांग बना है|”

“अरे क्या बड़े-बाबू, नार्मल ही तो है, इतना भी नहीं पीजियेगा क्या?….अरे जनमदिन है आपका मज़ाक है क्या..” मंदार उकसाते हुए बोला|

दिवाकर ने ग्लास होंठों से लगाई और धीरे –धीरे गटकने लगे, खैर एक दो बार नमकीन चबाने के बाद वो भी ग्लास खाली करने में कामयाब रहे|

अब मामला एक –एक की बराबरी पर था|

“क्या बात है बड़े-बाबू! ये हुई न बात…..ज्यादा स्ट्रांग तो नहीं था?” मंदार दिवाकर को टटोलते हुए बोला|

अब दिवाकर भी सुर पकड़ने लगे थे, बोले, “अरे नहीं ये तो हल्का है….चल जाएगा| ये बताओ कुछ स्नैक्स में बनाऊँ?”

मंदार बेहिचक बोला, “अरे बड़े-बाबू तकल्लुफ़ न कीजिए, नमकीन काफी है, बैठिए, कुछ बातें कीजिए….आप से बातें करने को तो पूरा ऑफिस तरस जाता है| आप किसी से घुलते ही नहीं बड़े-बाबू|’

इतना बोलते –बोलते मंदार ने दोनों ग्लास वापस भर दिए|

दिवाकर ने अपना ऐनक उतार कर साइड टेबल पर रखा और ग्लास हाथ में उठा ली, ग्लास को ध्यान से देखते हुए बोले, “ऐसा नहीं है मंदार, बस समझ नहीं आता बेफजूल क्या बात करें…बात होगी तो लगाव होगा, और अब किसी से इमोशनली कनेक्ट होने का जी नहीं करता|”

मंदार ने पहले की ही तरह एक घूँट में ग्लास खाली कर दिया और होंठों पर उँगलियाँ फेरते हुए बोला, “छोटा मुँह बड़ी बात बड़े-बाबू, लेकिन हमने तो यही सीखा है, बात करने से दूरियां कम होती हैं….और वैसे भी चार दिन की ज़िन्दगी में क्या चुप-चुप रहना| बात करेंगे तो न किसी को जानेंगे…..अब देखिए, इससे पहले आप को पता था क्या, हम रांची से हैं और दो साल पहले हमारी शादी हुई है…वो भी आप के ही प्रदेश में, और आज कल हम बैचलर लाइफ जी रहे हैं ….”

मंदार ने पास ही रखे मोबाइल पर अपनी पत्नी की तस्वीर को देखा| कुछ कह न पाया पर मन ही मन बहुत मिस कर रहा था मानो| फिर बात को घुमाते हुए बोला, “छोड़िए ये सब बड़े-बाबू, ये बताइए शादी काहे नहीं किए अब तक?….कोई प्यार –व्यार का चक्कर है क्या?”

“रुको हम पनीर फ्राई कर के आते हैं….” दिवाकर सोफे से उठने लगे तभी मंदार ने उनकी आखों में देखा और हाथ पकड़ते हुए बोला, “क्या बात है बड़े-बाबू? पहले भी देखा, ऐसे ही सवाल पर बिलकुल कन्नी काट गए…..कुछ बताइए तो सही…अरे दिल में रख कर घुटियेगा इससे अच्छा बोल दीजिए, पता तो चले कौन हमारे बड़े बाबू को मुरझाता छोड़ बैठी है|”

“चलो –चलो, ज्यादा भावुक न हो मंदार, पेग बनाओ पेग…हम अभी पनीर फ्राई कर के आते हैं|” दिवाकर पूरे रौब से बोले और किचन की ओर चल दिए|

इधर मंदार ने ग्लास हाथ में उठाई, आँखों से पैमाना मापा और एक-एक पेग और बना दिया| फिर दोनों ग्लास हाथ में उठाते जा टिका किचन के दरवाज़े पर, बोला, “ये लीजिए बड़े-बाबू आपका पेग” फिर कटी हुई पनीर में से एक टुकड़ा मुंह में डालते हुए बोला, “बड़े-बाबू ऐसे नहीं जाने देंगे, आज तो आपको बताना ही होगा…..अरे आपका जनमदिन है….कोई मज़ाक है क्या?”

दिवाकर ने मंदार को देखा फिर कुछ देर ग्लास को घूरते रहे और फिर अचानक पूरा ग्लास खाली कर दिया, बोले, “बैठो आता हूँ| तुम एक पेग और बनाओ….लेकिन थोड़ा हल्का”

मंदार ने दिवाकर की ग्लास को देखा, फिर दिवाकर को और आश्चर्य के भाव में सर झटकते हुए बोला, “क्या बात है बड़े-बाबू….आइए जल्दी आइए”

भाग 3: गम का साथी रम… (Ch 3: Gum ka Saathi Rum )

कमरे में पहुँचते-पहुँचते मंदार भी अपना ग्लास खाली कर चुका था, अभी मामला बराबरी पर था, तीन –तीन|

उधर मंदार कमरे में बैठा मोबाइल पर इमोशनल मैसेज टाइप करने लगा, अभी पंद्रह सेकंड भी नहीं बीते होंगे मैसेज भेजे कि तपाक से जवाब आ गया| लगा जैसे उधर डॉली भी मैसेज के इंतज़ार में ही बैठी थी| फिर क्या, मंदार मैसेज भेजता और पलटते ही जवाब आ जाता, सिलसिला खीचने लगा|

“अरे ग्लास खाली है मंदार….क्या हुआ? कहाँ खो गए?” दिवाकर कमरे में दाखिल होते हुए बोले| हाथ में एक प्लेट थी जिसमे कुछ कच्चे और कुछ फ्राई किये पनीर के टुकड़े थे| “सलाद खाओगे मंदार?…बोलो तो ले कर आता हूँ..”

“अरे बैठिए बड़े-बाबू, देखिए आप नहीं थे तो अकेलापन महसूस हुआ और बीवी की याद आ गई, डॉली को ही याद कर रहे थे और मैसेज- मैसेज खेल रहे थे”, मंदार शरारती अंदाज़ में बोला|

ग्लास में चौथा पेग गिर चुका था, मंदार ने ग्लास दिवाकर को थमाई और बोला, “बड़े-बाबू, कसम है आपको आपके प्यार की, अब बात न घुमाइएगा| अब आप कहीं नहीं हिलेंगे, पहले हमें मुखातिब तो कराइए आपकी मिस्टर इंडिया से|

“मिस” दिवाकर जोर देते हुए बोले, “मिस्टर नहीं मिस….पता नहीं प्यार बोल सकते हैं या नहीं पर थी एक लड़की हमारी भी ज़िन्दगी में…..बात जयपुर की है, जब हम ग्रेजुएशन करने टोंक से जयपुर आए थे| शहर की चमक धमक और दोस्तों के साथ मस्ती…. वो उमर ही कुछ अलग होती है दोस्त…कभी भी बिन बुलाए मेहमान बन गए और खाना खा लिया….या सारे दोस्तों ने मिल कर प्लान किया और घूमने निकल गए….क्या दिन थे|”

मंदार बेटक सुनता रहा और सोचता रहा, इतनी भी पुरानी क्या बात है जो बार -बार…क्या दिन थे बोल रहे हैं | पर बोला कुछ नहीं|

इधर दिवाकर मानों चौथे पेग के सुरूर में आने लगे थे, न जाने क्या सोचते रहे फिर बोले, “चार दोस्त थे दिलीप, बंटी फ़िरोज़ और हम| फ़िरोज़ और हम टोंक से और दिलीप और बंटी जोधपुर से| शुरू-शुरू में तो हम और बंटी एक ही कमरे में रहते थे पर जब कॉलेज में दोस्ती हुई तो हमने मिल कर दो कमरे का फ्लैट ले लिया था| दिन भर कॉलेज फिर देर रात तक मस्ती यही काम था उन दिनों| पढ़ाई के समय पढ़ाई, फिर मस्ती|”

दिवाकर ने एक और लम्बा घूँट लगाया और सुरूर में बोले, “जाड़े का दिन होगा…. बंटी के मामा के घर शादी थी, मामा जी शापिंग करने जयपुर आए थे तो सभी को बोल गए थे| सेमेस्टर एग्जाम हो चुके थे तो सभी थोड़ा आराम से थे, प्लान बना कि जोधपुर जाएंगे और खूब धमाल करेंगे| चारों ने एक ही बैग पैक किया और ट्रेन पकड़ कर सीधे जोधपुर|” फिर आगे बोले, “सुबह- सुबह का समय होगा, स्टेशन पर उतरे ही थे कि एक सज्जन कुली से बहस रहे थे| प्लेटफॉर्म पर आठ –दस सूटकेस और साथ में दो महिलाऐं, एक अधेड़ जो उनकी माँ लग रही थीं और दूसरी उनकी पत्नी| साथ में था एक बारह- तेरह साल का लड़का और एक ख़ूबसूरत सी लड़की….एक पल तो लगा, देखते ही रहें पर जब देखा वो हमें देखते देख रही है तो नज़रें हटा ली| बात बढ़ गई थी और तीन चार कुली और आ गए थे| सब जानते थे मजबूर है, सामान ज्यादा है, और हाथ लगाने वाला कोई नहीं। अंकल जी बेचारे बहस तो रहे थे पर असहाय जान पड़ रहे थे|”

मंदार ने ग्लास उठाई और इशारा किया कि दिवाकर भी ग्लास ख़तम करें पर दिवाकर तो जैसे अपनी पुरानी यादों में रम से गए थे मानो, बोले, “दूर खड़ी वो चुइंगम चबा रही थी, सारे टंटे से बेफिक्र, जैसे लगा रोज़ की बात हो| हमसे रहा न गया, बीच बचाव करने पहुँच गए, पूछा क्या बात है? तो पता चला अंकल जी तो रेटलिस्ट वाले दाम पर अड़े थे, ऊपर से दो- चार ताने पूरी कुली जात पर और देश में फैलते भ्रस्टाचार पर पहले ही झाड़ चुके थे|”

दिवाकर ने ग्लास होंठों से लगाया, एक लम्बी चुस्की ली और पनीर का एक टुकड़ा चबाते हुए बोले, “हमने जैसे ही बीच-बचाव का प्रस्ताव रखा, अंकल जी को लगा मानों समर्थन मिल गया और वो और ताव में आ गए| बड़ी मुश्किल से दोनों को समझाया और मामला शांत किया| बातों- बातों में पता चला की वो भी शादी में ही आए थे| बंटी ने तो इशारा किया कि खिसक लेते हैं पर हमसे न रहा गया, बोल पड़े परेशान न होइए अंकल जी हम भी आपके साथ ही हैं, चलिए गाड़ी तक सामान पहुँचा देंगे| सामान उठा कर जैसे स्टेशन से बहार निकले, एक टेम्पो ट्रैक्स इंतज़ार कर रही थी| सारा सामान लाद दिया और जैसे ही आगे बढे, अंकल जी ने बोल दिया की जब एक ही घर जा रहे हो तो साथ ही चलो…सुबह सुबह कहाँ परेशान होगे| मामा जी का घर शहर से करीब पचास किलोमीटर दूर था सो साथ जाने में ही समझदारी थी| चारों ने पीछे की सीट पकड़ ली, करीब बीस –बाईस किलोमीटर गए होंगे की अंकल जी ने गाड़ी रुकवा दी, बोले सुबह हो गई है, ब्रश कर के चाय-वाय पी लेते हैं|”

दिवाकर ने बात जारी रखी, बोले “अब हम ठहरे लौंडे-लपाड़ी, न ब्रश का ध्यान था, न पेस्ट का| जब देखा उसे ब्रश करते हुए तो बेबाक पहुँच गए और बोल दिया, ब्रश –वश तो है नहीं, ऊँगली पर थोड़ा टूथपेस्ट दे दीजिए तो दांत साफ़ कर चाय पिए| यह शायद पहला मौका था जब हमने उसे इतनी करीब से देखा था और बात भी की होगी|”

दिवाकर न जाने किस दुनिया में खो गए|

“बड़े-बाबू,…..ओ बड़े-बाबू, ख़तम कीजिए भाई….अभी चौथे पर ही अटके हैं”, मंदार जोर देता, अपनी ग्लास दिखाते हुए बोला|

दिवाकर ने एक लम्बी चुस्की ली और फिर बोले, “सिगरेट है?”

भाग 4: तेरे बिना ज़िन्दगी से कोई…..शिकवा, तो नहीं…. (Ch 4: Tere bina zindagi se koi Shiqwa, to nahi….)

“बड़े-बाबू? क्या बात है…..आज से पहले तो कभी नहीं…..” मंदार अचम्भे में बोला, फिर जेब से सिगरेट का पैकेट निकाल एक सिगरेट उसने दिवाकर की ओर बढ़ा दी|

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दिवाकर ने ग्लास खाली की और ग्लास मेज़ पर रख सिगरेट जलाते हुए बोले, “बनाओ अगला….आज तो फिर वही दिन जीने को दिल कर रहा है….वैसे थैंक्स मंदार….तुम न होते तो शायद ये यादों का पिटारा कभी खुलता ही नहीं|”

मंदार ने झट अपनी सिगरेट जलाई और सिगरेट मुहं में रखते हुए दोनों की ग्लास तैयार करने लगा|

“फिर क्या मंजन मिला?….. बड़े-बाबू….” मंदार चुटकी लेते हुए बोला|

दिवाकर भी हल्का सा मुस्कुराए और बोले, “बिलकुल मंजन भी और आँखें भी….” फिर हँसते हुए बोले, “ वो मुस्कुरा कर बोली और कुछ चाहिए….फेश वाश, क्रीम, पाउडर….उसके मूड से लगा मज़े ले रही हो पर हमने ज़ाहिर न होने दिया, बोल दिया ज़रुरत होगी तो मांग लेंगे, अभी के लिए तो फिलहाल टूथपेस्ट|”

“फिर सबने मिल कर नास्ता किया और उमेद नगर की यात्रा शुरू, एक घंटे में हम शादी के घर में थे| हम दोस्तों ने मिल कर सामान उतारा और मौका देख हमने भी थैंक्यू बोल दिया, पलट कर जवाब आया, इट्स ओके….क्रीम , पाउडर चाहिए हो तो बता देना, फिर धीरे- धीरे हँसने लगी, मानों चुटकी ले रही हो|”

“गाँव की शादी और शादी का घर, हम सब काम में ऐसे लगा दिए गए जैसे घर की ही शादी हो, कभी हलवाई के साथ बैठना, कभी कुर्सियां उतरवाना तो कभी रज़ाई गद्दे| आते जाते नज़र उसे ही ढूँढ़ती रहती,  पर पूरा दिन बीत गया, न दर्शन हुए न आवाज़ सुनी, लगा हाथ से गई| अब सीधे –सीधे बंटी को बोल भी नहीं सकते थे|”

“फिर क्या हुआ बड़े-बाबू…?” मंदार ने ग्लास हाथ में उठाते हुए पूछा|

दिवाकर ने भी अपना ग्लास उठाया और उसे देखते हुए बोले, “फिर शाम हुई तो सभी रिश्तेदार गाने बजाने में लग गए, तभी बंटी आया और बोला, मेहँदी कॉम्पटीशन है और उसने हमारा नाम दे दिया है| हमने कहा भी कि भाई, पेंट-ब्रश चलता हूँ…मेहँदी थोड़े ही..पर जवाब मिला कलाकार तो हो ना , वो भी कॉलेज के अव्वल, जीतना ही होगा|”

“अच्छा! तो आप आर्टिस्ट भी है बड़े-बाबू…क्या बात है….ज़ारी रखिए” मंदार पनीर मुहं में डालते हुए बोला|

दिवाकर मुस्कुराए और बोले, “किस्मत देखो, मेहँदी लगाने मिली भी तो कौन….”

“अच्छा..क्या बात है….वाकई…” मंदार बोला|

“जी हाँ, हमारी किस्मत में जो हाथ आया वो उसका ही था| फिर क्या, इम्प्रेशन ज़माने के चक्कर में जो कलाकारी की कि मेहँदी वाले भी भौचक्के रह गए….| इस बार थैंक-यू बोलने की बारी उसकी थी, और जैसे ही उसने थैंक-यू बोला हमने पलट कर हिसाब पूरा कर लिया, बोल दिया कि कभी मेहँदी- वेहंदी लगवाना हो तो बोल देना| वो भी मुस्कुरा कर चली गई पर बोल गई, “ज़रूर”|”

“अब तो धड़कन और भी बढ़ गई थी, निगाहें उसे ही ढूँढती रहती, कभी छत, तो कभी आँगन, बस यही लगता की अब दिखी कि तब|”

“ऊपर वाले की दुआ से रात जब सब खाने बैठे तो नज़र मिल ही गई, अब तो उसकी मुस्कराहट भी इज़हार कर रही थी| खाना खाने के बाद हाथ धोने के बहाने एक दूसरे के करीब आए तो हमने पूछ ही लिया की टहलने चलोगी क्या? वो पहले तो हड़बड़ाई फिर बोली, इतनी रात…सर्दी बहुत है| हमें लगा बात ख़तम, पर जैसे ही मुड़े पीछे से आवाज़ आई, गेट पर रुकना, शाल ले कर आती हूँ| हमारे मन में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन का गाना आ गया|”

“हा..हा..हा, आंधी फिल्म वाला…”, मंदार जोर से हँसा, “फिर बड़े-बाबू….”

दिवाकर ने एक लम्बा घूँट लगाया और हिलते हुए खड़े हो गए, बोले, “अबे, बड़े-बाबू के बच्चे….ऐसे ही बहकाता रहेगा तो पूरी रात निकल जाएगी, चल पहले खाना तैयार करते है|” इतना बोल हिलते कदमों से दिवाकर किचन की ओर चल दिए|

मंदार ने एक और सिगरेट जलाई, अपनी और दिवाकर की ग्लास उठाई और आ खड़ा हुआ किचन के दरवाज़े पर| जली हुई सिगरेट दिवाकर को पकड़ाते हुए बोला, “बड़े-बाबू आगे तो बताइए क्या हुआ….”

दिवाकर ने सिगरेट का एक लम्बा कश खींचा फिर एक घूँट मारते हुए बोले, “फिर क्या, शादी को दो दिन थे और मिलने को एक अंजान गाँव और बड़ा सा घर| कोई न कोई बहाना देख हम दोनों मिल ही लिया करते थे| वहां से जो सिलसिला शुरू हुआ तो जयपुर तक चला, उसने हमारे ही कॉलेज में एडमीशन ले लिया था, हमारी ही जूनियर थी| बंटी को छोड़ पूरा कॉलेज जानता था|….फिर एक दिन बंटी ने भी हमें देख लिया|” दिवाकर बोलते- बोलते रुक सा गए|

मंदार भी दिवाकर की चुप्पी भांप गया था…कुछ न बोला|

एक गहरी सांस ले कर दिवाकर बोले, “फिर वही मेरे दोस्त, जात-पात, ऊँच-नीच  और मार पीट, अपना ही जिगरी यार अपना दुश्मन हो गया| सोचा आज नहीं तो कल मामला ठंडा होगा और बात बन जाएगी पर एक बार जो बात बढ़ गई तो बढ़ गई| राजे –रजवाड़े चले गए पर राजपूतों की अकड़ न गई….”

“अरे क्या बड़े-बाबू…हम भी तो राजपूत है, लेकिन सोच एकदम मॉडर्न….सोच-सोच का फ़रक होता है बड़े-बाबू…भाग जाना चाहिए था आप लोगों को…..भाग कर शादी कर लेते….लोग चार दिन छाती पीटते फिर सब नार्मल हो जाता|” मंदार समझाते हुए बोला|

“कहना आसान है दोस्त….ऐसा नहीं कि हमने कोशिश नहीं की थी पर जब पता चला कि इतनी सी बात पर घर में मार पीट हो रही है तो भागते पकड़ी जाती तो उसके साथ क्या -क्या होता…साला उसकी हालत सोच कर हिम्मत ही नहीं हुई|”

“अरे क्या बड़े-बाबू, कोई अपने प्यार को ऐसे छोड़ देता है क्या?….देखिए हमारी तो अरेंज मैरिज है फिर भी इतना प्यार करते है कि उसके लिए पूरी दुनिया से लड़ जाएं….क्या बड़े-बाबू..” मंदार के भाव में गुस्सा और हताशा साफ़ नज़र आ रही थी|

दिवाकर कुछ बोल न पाए, एक घूँट लगाया और सब्जी चलाने लगे|

मंदार जैसे कुछ सोच रहा हो, बोला, “फिर क्या हुआ बड़े-बाबू…..आगे क्या हुआ?”

दिवाकर चेहरे पर हताशा को मुस्कुराहट से छिपाते हुए बोले, “फिर क्या, हमारी वज़ह से इतनी मार पीट, हम कैसे बर्दाश्त करते, आखिर बोल ही दिया भूल जाओ….और….”

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“और क्या बड़े-बाबू….मज़ाक है क्या…  बड़े-बाबू….आपका प्यार…अपनी हालत देखी है आपने…बोलते तो हैं भूल गए हैं पर असलियत यही है कि उनकी याद में आप दुनिया भूल गए हैं बड़े-बाबू…” मंदार बीच में टोकते हुए बोला|

मंदार ने गुस्से और हताशा में एक ही झटके में ग्लास खाली कर दी थी, दोनों पांच-पांच की बराबरी पर थे और शराब अपना असर दिखने लगी थी|

मंदार ने घड़ी पर नज़र डाली, रात के दस बज चुके थे, हिचकिचाते हुए बोला, “बड़े-बाबू बहुत लेट हो गया है चलते हैं, कल आफिस भी जाना है|”

भाग 5: पुराने यार (Ch 5: Purane Yaar)

अब तक दिवाकर पूरे सुरूर में आ चुके थे, बोले, “अबे कहाँ चल दिए…पूरा खाना बन गया है….शाम जवाँ हैं ….हमारे अन्दर आग लगा कर कहाँ चल दिए, वैसे भी कल सन्डे है मंदार….चुपचाप पेग बनाओ…हमारा जन्मदिन अभी ख़त्म नहीं हुआ है|”

वैसे मंदार का जाने का मूड भी न था, वो तो पत्नी को दिया वादा था सो निकल रहा था पर जब कहानी इतने अच्छे मोड़ पर हो और रात पूरी बची हो तो कौन हिलता है भला| मंदार मुस्कराते हुए वापस सोफे पर आया, बोतल उठाई और पेग बनाने लगा|

छठा पेग तैयार था और टेबल पर खाना भी लग चुका था, दोनों ने हिलते हाथों से खाना प्लेट में डाला और निवाला मुहं में डालने लगे|

मंदार ने एक घूँट वापस खींचा और बात बढ़ाते हुए बोला, “बड़े-बाबू तो उसके बाद से कभी नहीं मिले…?कभी फ़ोन पे बात तो हुई होगी….वैसे हैं कहाँ हमारी न हो सकीं भाभी जी ? कोई खोज खबर?”

दिवाकर ने निवाला मुंह में डाला और बोले, “कहाँ मंदार, अब तो बस यादों में है| उस हादसे के बाद तो हमने सबसे रिश्ता ही तोड़ दिया था| बस अपने में ही जीते रहे….दोस्त, तुमने सही कहा था, उसको तो हम कभी भूल ही नहीं पाए थे …हाँ दुनिया ज़रूर भूल बैठे है|”

इस बार दिवाकर की आखें नम थीं, अपना दर्द छुपा न सके…इतनी शराब में कौन भला अपना दर्द रोक सकता है| ऐसा लगा बरसों का दर्द आज मंदार के सामने छलका हो|

मंदार खुद को संभालते हुए दिवाकर के करीब आया और हौसला दिलाने लगा, फिर बोला, “चलिए फ़ोन लगाइए, ऐसा भी क्या रूठना…पता तो चले कैसी हैं, कहाँ हैं….किस हाल मैं हैं…कहीं आप की तरह वो भी देवदास बनी न बैठी हों…लाइए नंबर दीजिए हम फ़ोन मिलते हैं|

दिवाकर कुछ संभले और मंदार को संभालते हुए बोले, “चलो खाना खाओ….उस समय के बाद से न नंबर है न पता….बची है तो बस पुरानी यादें|”

मंदार ने ग्लास दिवाकर को पकड़ाई और बोला, “और आपके वो दोस्त…क्या नाम था…हाँ दिलीप और फ़िरोज़…उनको तो पता होगा| उन्होंने थोड़े सन्यास ले रखा है दुनिया से…पूछिए तो सही किसी को तो पता होगा|”

दिवाकर समझाते हुए बोले, “अरे अब कोई टच में नहीं है….उस हादसे के बाद हमने हर उस शक्स को अपनी ज़िन्दगी से अलग कर दिया जो जाने या अनजाने उसकी याद दिलाता|”

मंदार नाराज़ होते हुए बोला, “बहुत बढियां बड़े-बाबू, जिन दोस्तों के साथ एक घर सा रिश्ता था उनको एक पल में भुला दिया….मज़ाक है क्या बड़े-बाबू| सच्ची किसी के टच में नहीं हैं…?”

दिवाकर ने सर ना में हिलाया और एक घूँट खींच लिया, चेहरे पर अफ़सोस के भाव साफ़ नज़र आ रहे थे, मानों सोच रहे हों…काश वो दोस्त साथ होते|

मंदार कुछ सोचता रहा फिर जेब से मोबाइल निकालते हुए बोला, “बड़े-बाबू आपके कालेज का नाम तो बोलिए|”

“महेश्वरी कॉलेज! पर क्यूँ?” दिवाकर ने पूछा

“बैच बताइए….किस सन में पास किया था और आर्ट्स था या साइंस”

“बीएससी, 2002, क्या कर रहा है मंदार?” दिवाकर ने फिर पूछा

“दिलीप मिश्रा…जोधपुर, मंडोर….छरहरा बदन, सांवला रंग, मोटी मूंछे और सर पर कम बाल….देखिए यही है क्या?” मंदार ने अपने मोबाइल के फेसबुक पर एक फोटो ढूँढ कर दिखाई|

दिवाकर ने मोबाइल हाथ में लिया तो देखते ही रहे, फिर कुछ देर बाद बोले, “हाँ यही है…साला..कितना बदल गया है, पहले तो मूंछे नहीं थी पर बाल शुरू से कम थे|” न जाने क्या सोच कर मोबाइल पर पूरी प्रोफाइल पढ़ने लगे|

मंदार ने जोर दे कर फ़ोन माँगा और बोला, “लाइए तो ज़रा आज तो राम –भरत मिलाप कराते ही हैं” इतना कहते ही उसने प्रोफाइल पर दिए नंबर पर फ़ोन लगा दिया|

“क्या कर रहा है मंदार? टाइम तो देख….”

“अरे रुकिए बड़े-बाबू, आज ही तो सही टाइम है, हम आपसे न मिलते तो आपको दोस्त से कौन मिलाता….आप तो बस ग्लास खाली कीजिए,….हलो…..हलो दिलिप भाई साहब बोल रहे हैं?”

उधर दिलीप चौकते हुए बोले, “कौन बोल रहा है भाई….रात के साढ़े दस बज रहे हैं…बोलिए दिलिप बोल रहा हूँ|”

मंदार के चेहरे पर रौनक बढ़ गई थी, चहकते हुए बोला, “याद कीजिये जब आप ग्रेजुएशन में थे तो आपका एक साथी था…आपके साथ ही रहा करता था…आप, फिरोज़, बंटी और ….”

“हाँ था एक बेवकूफ….दस साल से लापता है….एक लड़की के चक्कर में साला दोस्तों को भूल गया….पर तुम कौन हो भाई, और इतनी रात पहेली क्यूँ बुझा रहे हो?…..नशे में हो क्या?” दिलीप बोले

मंदार के चेहरे पर एक शरारती मुस्कान थी, बोला, “अब अगली आवाज़ आपके उसी प्यारे दोस्त की….लीजिए बात कीजिये…” बोलते ही मंदार ने फ़ोन दिवाकर को थमा दिया|

“दिवाकर के हाथ काँप रहे थे, पहले तो कुछ देर सन्नाटा रहा फिर बोले, “….हेलो….दिलीप…” आवाज़ में भारीपन साफ़ झलक रहा था|

“अबे कुत्ते…कमीने…साले कहाँ हो बे….कितने साल हो गए तुमको ढूढ़ते हुए, न कोई पता, न कोई खबर….अबे ऐसे कोई अपने दोस्तों को भूलता है क्या?” दिलीप का भी गला रुंध सा गया था|

भारी आवाज़ में दिवाकर बोले, “सॉरी यार….माफ़ कर दो….न हम तुम सब को कभी भूल पाए….न उसको….”इतना कहना था की फफ़क कर रो पड़े|

मंदार ने दिवाकर को संभाला और फ़ोन लेते हुए बोला, “दिलिप भाईसाहब, आपको बड़े- बाबू का नंबर अभी मैसेज कर देता हूँ, फिर चाहे जब जी आए गालियाँ निकालते रहिएगा…..और पीटने का मन करे तो जयपुर आ जाइएगा, स्टेशन से घर हम ले आएंगे…अभी तो आप एक मदद कीजिए…..”

दिलीप ने अपने आप को संभाला और बोले, “हाँ बोलो भाई, तुमने तो एक बिछड़े दोस्त को मिलाया है…क्या कर सकते हैं तुम्हारे लिए…”

मंदार बोला “बस भाईसाहब…ये काम भी इन्ही का है…कुछ अंदाज़ा है आपकी वो भाभी, जो भाभी न बन सकीं आज कल कहाँ हैं? और क्या कर रही हैं?”

दिलीप थोड़ा नाराज़ होते हुए बोले, “अरे अब तक बुखार उतरा नहीं क्या उसका…बात तो कराओ…उसकी तो शादी हो गई कब की …अब तो जोधपुर के आस पास रहती है कहीं|”

“मतलब आपके ही शहर में….वैसे शहर तो हमारा भी है….पर आज कल हम जयपुर में रहते है…एक हेल्प कर दीजिये प्लीज…कोई नंबर है क्या उनका?” मंदार बोला|

“क्या कर रहा है मंदार….सुना नहीं क्या….उसकी शादी हो चुकी है…” दिवाकर ने लगभग मंदार को डांटते हुए कहा| लेकिन दिल कुछ और कह रहा था….काश नंबर मिल जाए और एक बार उसकी आवाज़ सुन ले|

“अरे रुकिए बड़े-बाबू, आपकी प्रेम कहानी है….ऐसे ही थोड़े ख़तम हो जाएगी…..मजाक है क्या….दिलिप भाई साहब….कुछ बोलिए, यहाँ आपके दोस्त देवदास बने पड़े हैं, और आप हैं की मौनी बाबा हो गए हैं|”

उधर से दिलीप बोले, “हमारे पास तो नहीं है….पर बंटी को पता होगा….लेकिन हम नहीं पूछेंगे, साला फिर लड़ाई –झगड़े की नौबत आ जाएगी|”

मंदार शराब के सुरूर में बोला, “अरे ऐसे कैसे झगड़ा हो जाएगा दिलीप भाईसाहब, वो भी हमारे रहते…मज़ाक है क्या….वो तो हम नहीं थे आप लोगों के साथ वरना ये नौबत ही न आने देते….कुछ भी करते पर दोनों को मिलवा कर ही दम लेते, भले लाठी –बंदूक चल जाती| अरे हमारे बड़े-बाबू का प्यार है… मजाक है क्या…”

वापस अपना आपा काबू में लाते हुए बोला, “खैर छोड़िए, हम कुछ करते हैं…आप अपना खयाल रखियेगा दिलीप भाईसाहब….और मौका मिले तो जयपुर आइए…वरना हम कभी आते है जोधपुर, आपके घर, अपनी मिसेज़ के साथ| चलिए मिलते हैं….गुड नाईट|” इतना कहते मंदार ने फ़ोन काट दिया|

उधर दिवाकर मंदार का सिर्फ मुहँ ताक रहे थे , बोले, “अरे ये क्या?…फ़ोन तो देते…बात तो करने देते…तुमने तो…”

भाग 6: ग्यारह बीस की बस (Gyarah Bees ki Bus)

“अरे वाह बड़े-बाबू, दस साल में तो याद न आई….आज हमने बात करा दी तो हम पर ही नाराज़गी….”मंदार चुटकी लेते हुए बोला|

थोड़ी देर न जाने मोबाइल में क्या ढूढ़ता रहा फिर एक कागज़ पर एक नम्बर नोट करने के बाद मंदार ने अपना ग्लास उठाया और सिगरेट जला कर बाहर गैलरी में चला गया|

उधर दिवाकर पुरानी यादों में खोए रहे, न खाने की सुध थी न पीने की…जलती सिगरेट वैसी की वैसी राख में तब्दील हो गई….शराब का नशा ज़ोरों पर था और प्यार का नशा उससे कहीं ऊपर|

दस-पंद्रह मिनट बाद मंदार सिगरेट बुझाता हुआ कमरे में घुसा और बोला, “चलिए समान पैक करिए, हम पाली जा रहे हैं…”

“पाली…इस समय….पता भी है पाली कहाँ है….अबे चाँदपोल नहीं जाना है….ज्यादा हो गई है क्या मंदार?” दिवाकर चौंकते हुए बोले|

“पता है बड़े-बाबू…हमारा ससुराल है पाली…और यहाँ से लगभग तीन सौ किलोमीटर…अभी की बस पकड़ेंगे तो तड़के पाली में होंगे….आपको पता है पाली मैं कौन है?” मंदार ने दिवाकर की आँखों में देखा फिर बोला, “जी हाँ, आपका दिल लूटने वाली आज कल पाली में हैं|”

दिवाकर का चेहरा और आँखें देखने लायक थीं….बेबसी और कुछ वापस पाने की लालसा का मिला जुला भाव था उनके चेहरे पर|

फिर कुछ सोचते हुए बोले, “मंदार उसकी शादी हो चुकी है..पूरा परिवार होगा….पति… बच्चे….गलत है ये सब, पाप है पाप|”

“काहे का पाप बड़े-बाबू,, आप ने तो तब भी कोई पाप नहीं किया था | जब देखा की उन पर जुल्म हो रहा है, आपने तो अपने प्यार की क़ुरबानी दे दी| और वैसे भी अब कौन सा भगाने की बात कर रहे हैं| बस चलेंगे, दोस्त बन कर मिलेंगे और लौट आएंगे| इसमे पति, बच्चों को क्या एतराज़| आखिर कालेज के पुराने दोस्त यार मिलते ही है ना”, मंदार ने समझाया|

“अरे लेकिन मालूम है ना, पिछली बार मार पीट हो गई थी, अब वापस….”

“अरे चलिए बड़े-बाबू,…पिछली बार हम नहीं थे….इस बार हम हैं| वैसे भी हमारा ससुराल है पाली, पूरा शहर हिला देंगे….अरे हमारे बड़े बाबू का प्यार है…मजाक है क्या| आप तो बस चलिए यह पुण्य का काम आप अपने छोटे भाई के हाथ से होने दीजिए बस|”

वैसे तो दिवाकर मना कर देते पर दिल के हाथों मजबूर थे, ऊपर से शराब का सुरूर, बोले, “चलो फिर जो होगा देखा जाएगा, बस एक बार मिल कर वापस लौट लेंगे|”

मंदार का अलग स्वार्थ था, उसे लगा दिवाकर का सही, इसी काम के बहाने अपनी पत्नी से मिल लेगा और लगे हाथ साथ लौटा भी लाएगा| जितना दिवाकर में अपने प्यार से मिलने की तड़प थी, उतनी ही मंदार में अपनी पत्नी से मिलने की|

“चलेंगे कैसे?” दिवाकर ने पूछा

मंदार पूरे जोश में था, बोला, “वैसे तो 11.20 की जोधपुर की बस है….वो छूट गयी तो ट्रेन पकड़ लेंगे वरना टैक्सी कर लेंगे बड़े बाबू…..आपके प्यार के खातिर ये तो कुछ भी नहीं| चलिए फटाफट अपना ग्लास ख़तम कीजिये और कुछ खा लीजिये….ज्यादा समय नहीं है अपने पास|”

किस्मत अच्छी थी, थोड़ी दौड़ भाग बढ़ी पर 11.20 वाली बस हाथ लग ही गई, दोनों पीछे की सीट पकड़े झूम रहे थे|

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“बड़े बाबू, क्या बोलिएगा मिल कर…कुछ सोचें है?” मंदार मुस्कुराते हुए बोला|

दिवाकर बोले कुछ नहीं बस मुस्कुराते रहे, फिर थोड़ा रुक कर बोले, “मंदार ये बताओ, पता कैसे लगा कि वो पाली में है…घर का पता ठिकाना कुछ है?”

“अरे क्या बड़े बाबू….आप की तरह थोड़े है जो दस साल में न ढूंढ पाए…..हमारा नाम मंदार है, जिस काम को हाथ में ले लेते हैं वो पूरा कर के ही छोड़ते हैं….मजाक है क्या…” मंदार गर्व से बोला|

“अरे फिर भी ढूँढा कहाँ से?”  दिवाकर कहीं ज्यादा उत्सुक दिखे|

मंदार ने धीरे से प्लास्टिक की ग्लास निकाली फिर कोल्डड्रिंक की बोतल से शराब उड़ेलते हुए बोला, “पकड़िए बतलाता हूँ…”

फिर एक लम्बा घूँट लेने के बाद होंठों को साफ़ करते हुए बोला, “अरे आफिस वाली दिव्या है ना , उसे ही फ़ोन कर के बोल दिए थे कि पहले फ़िरोज़ को फ़ोन करो, मैडम की कुंडली निकालो और फिर बंटी को  फ़ोन कर के पता ठिकाना| पता चला आज कल पाली में हैं|”

यह सुन कर मानों दिवाकर को सुकून मिला हो, बोले कुछ नहीं बस अपना ग्लास उठाया और एक घूँट अन्दर उतार लिया|

“अरे लेकिन रहती कहाँ है?…..घर पर कौन- कौन हैं?..मिलेंगे कैसे?” दिवाकर अचानक से बोले|

मंदार नाराज़ होते हुए बोला, “सब कुछ हमसे ही कराइयेगा का बड़े बाबू| अरे इतना बड़ा काम हो गया है…आपकी महबूबा का शहर ढूंढ लाए है, पता भी ढूँढ लेंगे….हैं हमारे भी लोग पाली में| साले साहब और उसके दोंस्तों में बोल देंगे…कही न कहीं तो मिल ही जाएंगी|….कोई फोटो –वोटो है या वो भी दिल में ही छुपा कर रखे हैं|”

दिवाकर कुछ बोल न सके, फोटो तो वाकई न थी, हाँ यादें ज़रूर थीं, जैसा मंदार ने कहा था…दिल में|

मंदार ग्लास को देखते हुए बोला, “परेशान न होइए बड़े बाबू, अपना ससुराल है, पहले चलते हैं, आराम से खातिरदारी कराएंगे, फिर दिल लगा कर भाभी को ढूँढेंगे|  

“एक तो तुम भाभी –भाभी कहना बंद करो….शादी शुदा है वो, किसी और की अमानत| वो तो तुमने बोला तो चल रहे हैं वरना…..”

“आय –हाय बड़े बाबू….सारा इलज़ाम मंदार के सर….खैर आपके प्यार के खातिर ये इलज़ाम भी झेल लेंगे| आखिर इसी बहाने सही इतने दिन बाद अपनी मिसेज से मिलने का मौका भी तो मिल रहा है….| चियर्स बड़े बाबू…..ख़तम कीजिए|

फिर थोड़ा रुकते हुए मंदार वापस बोला, “वैसे बड़े बाबू, हम क्या कहते हैं, प्यार अगर दोनों तरफ बराबर है तो उसके पति से बात कर लेंगे….भला आदमी होगा तो समझा देंगे| अगर प्यार करने वाला होगा तो  समझ जाएगा|”

दिवाकर डांटते हुए बोले, “पागल हो गये हो क्या? कोई खेल थोड़े है जो समझा दिया…अरे समाज है…मर्यादा है …लोक लाज है|”

मंदार नाराज होते हुए बोला, “अरे समाज –वमाज सब ढोंग है बड़े बाबू….आपका प्यार सच्चा है तो कोई नहीं रोक सकता, उसका पति भी नहीं| हम समझाएँगे….आप चुप रहिएगा….वरना पहले की तरह गोड़ दीजियेगा| अरे तीन –तीन ज़िन्दगी बर्बाद हो इससे अच्छा है कोई एक क़ुरबानी दे दे, आखिर दो प्यार करने वाले तो मिल जाएंगे| हम संभाल लेंगे बड़े- बाबू…आप बस साथ खड़े रहिएगा|”

दिवाकर बस मंदार को देखते रहे और मन ही मन मना रहे थे, काश ये जो कह रहा है सच हो जाए|

भाग 7: तब भी था…आज भी.. (Ch 7: Tab bhi tha…Aaj bhi..)

बातों –बातों में कब नींद लग गई पता ही न चला….छह –सात ग्लास का सुरूर कम होता है क्या? कंडक्टर ने जब पाली उतरने की आवाज़ लगाई तब जा कर कहीं नींद खुली|

ठंडक का दिन और भोर के पांच बजे का समय, दिवाकर का मन तो किया कि एक सिगरेट और चाय पी ली जाए पर मंदार के पैरों में तो मानों मोटर फिट हो गई हो, चाह रहा था बस कैसे भी कर के ससुराल पहुँच जाए और अपनी बीवी से मिल ले|

पिछली रात इतने नशे में भी मंदार का दिमाग अच्छा चला था, रात न जाने कब पत्नी को मैसेज कर दिया कि मिलने आ रहा है|

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जब बस स्टॉप पर उतरा तो उसका साला इंतजार में खड़ा था|

“आइए बड़े- बाबू, ये है योगेश, हमारे साले साहब| और योगेश ये हैं बड़े- बाबू….पाली के मेहमान|”

दोनों ने एक दूसरे का अभिनन्दन किया और बाइक पर बैठ तीनों घर को चल दिए|

जाड़े का दिन था अँधेरा अभी छंटा नहीं था, मंदार दिवाकर को गेस्ट रूम में ले गया और बोला, “बड़े- बाबू, अब थोड़ा कमर सीधी कर लीजिए, भोर में आपको सबसे मिलवाते हैं| पानी का ग्लास यहीं टेबल पर रखा है और लाइट का बटन तखत के सिरहाने ही है, तीसरे नंबर का|”

इतना बोल कर मंदार कमरे से निकल गया, दिवाकर ने हैण्ड बैग साइड में रखा और तखत पर लेट गए| थकान तो थी पर नींद गायब थी , लगा सपना न हो,…सो कर उठें और सब गायब….बस लेटे- लेटे पुराने दिनों को याद करते रहे|

“बड़े-बाबू…..ओ बड़े- बाबू”, मंदार ने दिवाकर को धीरे से हिलाया| “उठिए बड़े- बाबू नाश्ता तैयार है….चलिए उठ कर मुंह हाथ धो लीजिए |”

दिवाकर रात के थके थे सो सोचते –सोचते कब सो गए थे उन्हें होश ही न था, जब मंदार ने हिलाया तो नींद टूटी, बस संतोष इस बात का था कि कुछ भी सपना नहीं था| दिवाकर बाकायदा पाली में थे और अपने प्यार से मिलने वाले थे|

“अरे मंदार, ब्रश और पेस्ट तो रखना ही भूल गए कल…ज़रा मंजन तो देना”

“हाँ –हाँ आप आँगन में तो चलिए सब मिल जाएगा”, मंदार आश्वासन देते हुए बोला| “डॉली! टूथपेस्ट तो लाना, बड़े- बाबू जाग गए हैं|”

डॉली टूथपेस्ट ले कर आई, दिवाकर ने टूथपेस्ट पकड़ने के लिए नज़र उठाई, तो दोनों की आखें चौड़ी हो गई|   

इधर डॉली के मुंह से निकला “तुम”  उधर मंदार के मुहं से निकला “डॉली इनसे मिलो ये हैं बड़े- बाबू”

दोनों के शब्द लगभग एक समय पर छूटे होंगे|

मंदार ने चौंकते हुए पूछा, “तुम जानती हो बड़े बाबू को?”

“हाँ….जानते हैं,….दिवाकर हमारे कॉलेज में था …..बड़े बाबू…. कॉलेज में थे” डॉली शब्दों को बांधते हुए बोली|

संयोग देखिये, जाड़े का दिन तब भी था आज भी, सुबह का समय तब भी था आज भी, निगाहें मिलीं थी टूथपेस्ट पर तब भी आज भी…..

मंदार भी अब चुप –चुप सा था, तीनों जानते सब थे पर बोल कोई कुछ न पा रहा था, दिन बड़ा लम्बा कटा था मानो|

शाम तीनों बस स्टैंड पर खड़े बस का इंतज़ार कर रहे थे, ऐसा लगा जानते हुए भी अजनबी हों सारे|                                                                              

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