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Dakshin Africa ki Lok Kathayen -7(ज़ुलु लोक कथाएं-7)

कहानी-चतुर सियार(Clever Jackal)-दक्षिण अफ्रीका की लोक कथा

“कैसे हो प्यारे बच्चों?” बूढ़ी दादी ने शाम बच्चों को पास बुला कर पूछा| वह आगे बोली, “क्या तुम्हे पता है, कभी- कभी चतुर होना भी ज़रूरी होता है, देखो अपनी चतुराई से कैसे नोजवागा कितनी ही बार खाने के बर्तन से बहार निकल पाया है|

“सियार भी तो बहुत चतुर जानवर होता है…सच है न दादी!” छोटा शिपोह बोला| सिपोह किसी और जानवर का भी नाम ले सकता था पर उसने जानबूझ कर सियार का ही नाम लिया क्योंकि सब प्यार से उसे म्पू-न्गु-शे बुलाते थे, जिसका मतलब होता है सियार| जब वह बहुत छोटा था तो रोते हुए वह सियार की ही तरह आवाजें निकाला करता था इसलिए उसकी दादी गोगो ने उसको यह नाम दिया था| जबकि सिपोह को लगता था कि उसका नाम म्पू-न्गु-शे अर्थात सियार इसलिए रखा गया क्योंकि वह बहुत चुस्त और फुर्तीला है|

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बूढ़ी दादी हंसी और शिपोह को देखते हुए बोली, “सही बात है मेरे बच्चे, सियार बहुत ही चतुर होता है, इतना चतुर कि चतुराई से अपनी जान भी बचा लेता है|”

“हाँ दादी, मुझे याद है कैसे सियार ने चतुराई से चरवाहे जाबु की जान बुबेशी शेर से बचाई थी| दादी सियार की कोई और कहानी सुनाओ ना”, सिपोह प्यार से बोला|

“हाँ दादी” सभी बच्चे एक साथ बोले “सुनाओ ना दादी”

“ठीक है बच्चों, सुनाती हूँ..ध्यान से सुनो और सीखो|” इतना बोलकर बूढ़ी दादी पेड़ के तने से टिक कर आराम से बैठ गई, और बोली “बहुत समय पहले…..”

एक जंगल में सियार एक पतले संकरे चट्टानी रास्ते से गुजर रहा था| हमेशा की ही तरह उसने अपनी नाक जमीन की तरफ कर रखी थी ताकि कोई भी अनजानी गंध को आसानी से पकड़ सके| “क्या पता कब मुझे कुछ खाने को मिलेगा|” वह अपने आप से बोला| हालाँकि दोपहर की तेज़ गरमी में एक चूहा भी मिलना मुश्किल था| यह ज़रूर था की उसे एक दो छिपकली ज़रूर मिल जाए|

तभी उसे उस रास्ते में जानी पहचानी सी हलचल महसूस हुई, “अरे नहीं!” सियार मन ही मन भुनभुनाया और अपनी जगह पर ही ठिठक गया| जब उसने देखा की शेर उसकी ओर ही आ रहा है और भागने का और कोई रास्ता भी नहीं है तो डर के मारे उसका बुरा हाल हो गया| वह पहले भी कई बार बुबेशी शेर को मूर्ख बना चुका था, उसे लगा इस बार ज़रूर महान बुबेशी अपना बदला ले लेगा| तभी अचानक ही उसे एक चाल सूझी|

“बचाओ! बचाओ!” ऊपर की ओर देखते हुए वह चट्टानी संकरे रास्ते पर घुटनों के बल सरकने लगा|

यह देख शेर आश्चर्य से रुक गया|

“बचाओ!” सियार डर का भाव लाकर रोते हुए बोला|

सियार ने शेर को देखा और बोला, “ओ महाराज बुबेशी, बचाइए, हमारे पास समय बिलकुल नहीं है, ऊपर देखिये वो बड़ी –बड़ी चट्टानें गिरने वाली हैं| हम दोनों दब कर मर जाएंगे| ओ ताकतवर महान राजा कुछ कीजिए, हमें बचाइए|” सियार अपना सर हाथ से ढक कर झुक गया|

शेर ने सावधानी से ऊपर देखा लेकिन इससे पहले कि वह कुछ सोच पाता सियार गिड़गिड़ाते हुए बोला, “महाराज अपनी ताकत का प्रयोग कीजिए और इन लटकती हुई चट्टानों को रोकिए|”

शेर ने अपने ताकतवर कंधे चट्टानों से टिकाए और उन्हें ऊपर की ओर धकेलने लगा|

“ओ महाराज, धन्यवाद!” सियार फ़ौरन बोला| “मैं फ़ौरन ही एक बांस ढूँढ कर लाता हूँ और इस पत्थर से टिका देता हूँ, इससे हम दोनों को जान बच जाएगी|” यह बोल कर सियार वहां से रफूचक्कर हो गया|

अब शेर वहां अकेला खड़ा चट्टान को ऊपर की ओर धकेलने की कोशिश करता रहा| न जाने कितने दिनों तक शेर उस चट्टान को पकड़े खड़ा रहा और न जाने कब उसे यह अहसास हुआ कि सियार उसे फिर एक बार अपनी चतुराई से मूर्ख बना अपनी जान बचा गया था|

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