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Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Kahani : Lal Dant Manjan (हास्य कहानी: लाल दंत मंजन)

यादों के पुराने पन्नों से…

बात उन दिनों की है, जब मास्क की तरह लाल दंत मंजन भी हर घर का एक अभिन्न हिस्सा हुआ करता था| टूथपेस्ट कोई भी आए, दंत मंजन तो लाल ही आना था वो भी डाबर का| युवावस्था की दहलीज़ पर खड़े कईयों ने कई बार घर में इसके विरुद्ध हरे –सफ़ेद –काले दंत मंजन लाने का प्रयास किया पर एक आध महीने में ही अपनी गलती का अहसास अपने आप ही हो गया| वो स्वाद….वो नशा…वो सुबह –सुबह की किक जो लाल दंत मंजन दिया करता था वो सफ़ेद- हरे पाउडर में कहाँ|

खैर लाल दंत मंजन ऐसे ही घर –घर में आम न था, एक वही तो था तो मंजन के ख़त्म होने पर भी अपने बहुउद्देशीय प्रतिभा के चलते अपनी छाप हर दिमाग में रखता था| चाहे स्कूल प्रोजेक्ट के लिए ढक्कनों से चौपहिया गाड़ी के पहिए बनाने हों, डिब्बे से गुल्लक बनानी हो या कम्युनिकेशन डिवाइस| उम्मीद है काग़ज पर गाने लिख कर खाली कैसेट भरवाने वाली पीढ़ी का हर शख्स लाल दंत मंजन से जुड़ी कोई न कोई याद ज़रूर संजोएँ होंगा|

आज लाल दन्त मंजन से जुड़ी एक दास्तान यादों के पुराने पन्नों से…

बात उन दिनों की है जब हम तरुणावस्था के दरमियानी पड़ाव पर थे, फिल्में देखना पसंद था पर परिवार के अलावा दोस्तों के साथ फिल्में देखना नया- नया शुरू हुआ था| दोस्तों के साथ सिनेमा हाल में बैठ कर समोसे चटकाना, जोर- जोर से ठहाके मारना और सीटी बजाना सब नया था और बेहद रोमांचक भी|

छोटे शहर के मध्यम वर्गीय परिवारों में टेलीफोन का प्रचलन अभी दूर था, फिल्मों की समीक्षा और सिनेमा हाल का पता अखबार के आठवें या नौवे पन्नों पर मिला करता था| तरीका बेहद सरल था सुबह अखबार में फिल्मों की जानकारी लेना, सिनेमा हाल का नाम देखना, कालेज में दोस्तों से गोष्ठी करना, पैसों का इंतज़ाम करना और फिर घर वालों को मनाना कि यह फिल्म हमारी जिंदगी में कितना मायने रखती है|

बात 1998 की गुलाबी सर्दी के दिनों की होगी…धर्मेन्द्र जी के दूसरे पुत्र और सनी देओल के छोटे भाई बॉबी देओल हर जवां दिल की धड़कन होना शुरू ही हुए थे….पहले ‘बरसात’ फिर ‘गुप्त’ जैसी सुपर हिट फिल्मों में उनकी अदाकारी की चर्चा आम थी| अखबार में उनकी आने वाली फिल्म ‘सोल्जर’ हम मित्रों में कौतुहल का विषय थी और लगभग सभी तैयार थे कि यह फिल्म सभी दोस्त मिल कर जाएंगे| घरवालों ने बरसात और गुप्त देख रखी थी तो अनुमति मिलना कठिन न था, बस इंतज़ार था शुक्रवार के अखबार का, कि पता चले साइकिल का पहिया कौन से सिनेमा हॉल की तरफ मोड़ना है|

शुक्रवार आया….अखबार बरामदे में गिरा….हमने दौड़ कर अखबार का आठवां पन्ना खंगाला तो पता चला जिस फिल्म का हम सभी को बेसब्री से इंतज़ार था वो ‘सोल्जर’ संगीत सिनेमा में लगी थी| उस ज़माने में मल्टीप्लेक्स तो थे नहीं पर हमारे छोटे शहर में उस ज़माने में भी एक ही कंपाउंड में तीन –तीन सिनेमा हाल ज़रूर थे, गौतम –संगीत –दर्पण| उत्साह चरम पर था बस लगा कि अब दोस्तों के संग जाएंगे और प्रीटी –बॉबी के गानों पर दिल खोल कर सीटी बजाएंगे| बस अखबार पिताजी को देने ही वाले थे कि अचानक नज़र पहले पन्ने पर पड़ी|

लाल दंत मंजन का विज्ञापन दिखना तो आम था पर दंत मंजन के साथ सोल्जर की जुगलबंदी कौतुहल पैदा कर गई, लिखा था, ‘डाबर लाल दंत मंजन के दो खाली डिब्बों पर सोल्जर फिल्म का एक टिकट मुफ्त!’ कंपनी ने दिमाग तो खूब लगाया था पर बड़े शहर के एसी में बैठ कर बनाई गई स्ट्रेटजी हर छोटे शहर में कारगर हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं|

फिर क्या था हमने दिमाग दौड़ाया…कुल जमा सात दोस्त थे जिन्होंने सोल्जर फिल्म में इन्ट्रेस्ट दिखाया था..सात गुड़े दो- चौदह..मतलब चौदह डिब्बे लाल दंत मंजन के और सोल्जर फिल्म फ्री…घर से लिया पैसा जेब में और चुन्नी लाल के छोले भठूरे पेट में| चोरी-छुपे छोले भठूरे खाने का मज़ा वो भी चुन्नी लाल की दुकान के, अलग ही अहसास था|

समय कम था क्योंकि अखबार में साफ़ –साफ़ लिखा था स्कीम सिर्फ पहले दिन पहले शो के लिए ही, कॉलेज जाना फिर हर घर से डिब्बे इकठ्ठा करना और फिर समय पर सिनेमा हॉल पहुँचना संभव न था| क्या करें, दुविधा बहुत थी…घर का हर कोना छान लिया पर गुल्लक मिलाकर तीन ही डिब्बे इकठ्ठा हो पाए, अब भी ग्यारह डिब्बे कम थे| काश उस ज़माने में मोबाइल या टेलीफोन आम होते ….कितना आसान होता|

लेकिन सोचता हूँ अच्छा ही था जो नहीं थे वरना न जुगाड़ू दिमाग होते और न आप को सुनाने को इतने मनोरंजक किस्से|

तो हुआ यों की हम घर से लाल दंत मंजन के तीन खाली डिब्बे बैग में डाल कर कॉलेज को रवाना हो गए| वैसे तो एक डब्बा और था पर उसमे मंजन करीब तीस प्रतिशत बचा था, एक बार को तो लगा चलो बहा देते है…देखा जाएगा, पर लगा प्रीटी –बॉबी के लिए इतनी मार कौन सहेगा, फैन तो थे पर इतने बड़े नहीं…..हाँ गोविंदा की फिल्म होती तो बात अलग थी|

खैर कॉलेज में जब दोस्तों से मिले तो सभी तैयार थे पर लाल दंत मंजन वाली योजना पर अमल लाना हर किसी के बस की बात न थी, वो तो हम थे जो दोस्तों की खातिर बीड़ा उठाए चल पड़े थे| दोस्तों को योजना सुनाई, उससे बचने वाले पैसों से आने वाले छोले भठूरे की बात छेड़ते ही सभी उत्साहित हो गए, बस पेंच फंसा तो डिब्बे पर आ कर…अभी भी ग्यारह डिब्बे कम थे| फिर क्या दिमाग के घोड़े दौड़ए और ऐसा हल निकाला जो बाकी रायों से एकदम अलग और कारगर था|

ये जो डिब्बे हजारों घरों से निकलते थे, जाते कहाँ थे…जी हाँ मोहल्लों में आने वाले कबाड़ी अक्सर अखबार और बोतलों के साथ इन डिब्बों को भी ले जाया करते थे|

बस फिर क्या हमने सबसे फुर्तीले मित्र से कहा, “साइकिल उठाओ” और बाकी दोस्तों से बोले, “तुम सब संगीत टाकिज पर मिलो हम आते हैं| इतने सालों की दोस्ती थी और अच्छा खासा भरोसा कमा रखा था तो सभी आश्वस्त थे|

वहां से निकल हमने दो –चार दुकानों पर तफ्तीश की और पहुँच गए एक बड़े कबाड़ डीलर की दुकान पर| चेहरा तो वैसे ही मासूम था, उसने आने का आश्रय पूछा तो बोल दिया कॉलेज का प्रोजेक्ट है और लाल दंत मंजन के डिब्बों की ज़रुरत है|

चचा ने पहले तो पूछा ‘कोई और डिब्बा चलेगा?’ पर हमने लाल दंत मंजन पर ही जोर दिया तो उन्होंने अन्दर एक प्लास्टिक के ढेर की ओर इशारा किया और बोले, “वहां देख लो, शायद मिल जाए|”

हमारे मित्र साइकिल की रखवाली में बाहर ही खड़े रहे और हम खोजी कुत्ते की तरह प्लास्टिक के ढेर में लाल रंग के डिब्बे ढूँढ़ते रहे| पाच –दस मिनट की मेहनत के बाद एक दर्जन डिब्बे हमारे हाथ में थे| इससे पहले कि हम चचा तक पहुँचते हम हिसाब लगा चुके थे…पंद्रह का टिकट, अगर डिब्बा एक रुपये में भी पड़ा तो लगभग चौदह रुपए की बचत, सौदा बुरा न था|

मासूमियत भरा चेहरा ले कर हम चचा के पास आए और बोले, “अंकल ये बारह डिब्बे हैं….इतने बहुत हैं…इनमे काम हो जाएगा|”

चचा किसी छोटे कबाड़ी से जूझ रहे थे, बीड़ी अपनी लोहे की कुर्सी के पाए में बुझाते हुए बोले, “बोलो क्या दोगे?”

हमने मासूमियत से कहा, “एक रुपया..”

इससे पहले हम कुछ और बोल पाते चचा मुस्कराए और बोले, “बच्चे एक रुपए में क्या होता है…पच्चीस पैसे के हिसाब से कम से कम तीन रुपए दो…वो तो पढाई लिखाई के लिए ले जा रहे हो वरना पांच रुपए से कम में न देता|”

हमें लगा हम ही बेफकूफ थे, जो एक रुपए के हिसाब से बारह रुपए देने चले थे, पर दिमाग अभी रुका नहीं था, उनकी बात पर अपनी मासूमियत का वज़न रखते हुए बोले, “अंकल दो रुपए में दे दीजिए..स्टूडेंट हैं..” चचा इतने नुक्सान को तैयार न हुए और तीन रुपए पर अड़े रहे| हमें भी लगा पच्चीस पैसे के हिसाब से भी कौन सा बुरा है| एक- एक के तीन सिक्के चचा के हाथ पर रखे, उनका शुक्रिया अदा किया और मंद – मंद मुस्कराते हुए दुकान से बाहर निकल गए| अन्दर से धड़कन बढ़ी हुई थी कि ऐसा न हो चचा अखबार पलट लें और असलियत सामने आ जाए| हमने दोस्त को इशारा किया, उन्होंने सायकिल का स्टैंड सरकाया, थैली में डिब्बे पकड़े हम साइकिल के डंडे पर बैठे और दोनों निकल लिए|

थोड़ी दूर जाने के बाद एक लम्बी सांस ली और सूखते गले को सुकून दिलाने पचास पैसे, दो ग्लास ठन्डे पानी की मशीन पर खर्च दिए|

आधे घंटे बाद हम दोनों चौड़े सीने के साथ संगीत सिनेमा के गेट पर थे पर छाती की हवा कब फुस्स हो गई पता ही न चला| गेट के बाहर तक लम्बी क़तार लगी हुई थी| हमें लगा था एक हम ही जुगाड़ू थे पर यहाँ तो माहौल ही अलग था, जुगाड़ूओं का मजमा लगा था| जिसे देखो वही हाथ में दो लाल दंत मंजन के डिब्बे लिए लाइन में खड़ा था और अभी कितने ही साइकिल स्टैंड और गेट पर खड़े लाइन में लगने का इंतज़ार कर रहे थे|

हमने और हमारे मित्र ने फटाफट साइकिल स्टैंड में लगाई और थैली पकड़े पहुच गए लाइन के पास| थोड़ी तहकीकात के बाद एक खबर राहत की मिली, हमारे पांच मित्र एक के बाद एक लाइन में डटे थे और काउंटर के काफी करीब थे| एक तो सटीक पोजीशन ऊपर से संख्या बल दोनों ही हमारे समर्थन में थे| बस अब क्या, दोस्तों को डिब्बे पकड़ना था और फिर सिनेमा हॉल के अन्दर प्रीटी जिंटा के गानों पर बेतहाशा सीटी|

पांच – दस मिनट बीता होगा की अचानक हलचल मच गई, हुड़दंगियों ने पुलिस वालों को उकसा दिया था, दो हवलदार आए, लाठी भांज कर लाइन सीधी करा कर चले गए, जो अगल बगल कुकुरमुत्ते की तरह उगे थे, सभी छांट दिए गए थे| हम और हमारे सारथी भी छटनी में आ चुके थे और अब गेट के बाहर खड़े दोस्तों का इंतज़ार कर रहे थे| एक लाठी हमारे पैर को छू कर निकल गई थी पर प्रीती और बॉबी के मोह में हम वो दर्द भी सह गए थे| एक –एक मिनट दस-दस मिनट पर भारी पड़ रहा था|

करीब आधे घंटे बाद हमारे पांच पांडव कमीजों की सिलवटें सीधी करते बाहर आते नज़र आए, हम और हमारे दोस्त उन पाचों का पलके बिछाए इंतज़ार कर हि रहे थे| हमने मुस्कुराते हुए पूछा, “मिला?”

जवाब मिला, “मिला तो…लेकिन पांच”

शायद हमने कुछ गलत सुन लिया था हमने दोबारा पूछा, “मतलब?”

उनमे से एक खुल कर बोला, “अबे! एक आदमी को एक ही टिकट दिया”

सात दोस्त और टिकट पांच, नाइंसाफी तो थी….सभी सोच रहे थे, वो कौन दो बलिदानी महापुरुष होंगे जो बॉबी देओल का एक्शन और प्रीटी जिंटा की अदाएं छोड़ेंगे|

तैयार कोई न हुआ बस सभी एक दूसरे को देखते रहे| ऐसे कैसे चलता, हमारे दिमाग में एक और खुराफात उपजी, हमने कहा अगर इज़ाज़त हो तो एक सुझाव रखें| सबको लगा चलो एक बलिदानी तैयार हुआ, इशारा मिलते ही हम बोले, “अबे, क्यूँ न टिकट ब्लैक कर दें और आने वाले पैसों से अगले दिन का टिकट खरीद कर शान से फिल्म देखें|” सुझाव दमदार था, अचानक सभी की आँखें चमक उठी थी और सभी के दिल में हमारे लिए इज्ज़त और भी बढ़ गई थी|

हम अपने हिस्से की मेहनत पहले ही कर चुके थे सो दो सबसे खुराफाती और उम्र में बड़े दिखने वाले दोस्तों को टिकट ब्लैक की ज़िम्मेदारी दे दी गई| काम खतरे से भरा था पर खतरा मोल कर जीत हांसिल करने का मज़ा सिर्फ बाज़ीगर ही जानते हैं|

दो ने हवलदारों पर नज़र रखी, दो टिकट लिए साइकिल स्टैंड में खड़े रहे और दो प्रीटी जिंटा के हार्डकोर फैन की तलाश में इधर उधर भटकने लगे, महाभारत के संजय की तरह हम दूर से ही पूरी योजना कार्यान्वित होते देख रहे थे|

करीब पन्द्रह –बीस मिनट बीते होंगे और हमारी दमदार योजना रंग दिखा चुकी थी, तीन रुपए का इन्वेस्टमेंट और हाथ में थे एक सौ पच्चीस रुपए| शान से शनिवार के सात टिकट ख़रीदे, घर से लाए पैसों और टिकट के बाद बचे बीस रुपए जोड़कर सातों ने छक कर चुन्नीलाल के छोले भठूरे और लस्सी का भोग लगाया, दिल हि दिल में चचा का शुक्रिया अदा किया और घर लौट आए|

सच कहें, फिल्म की यादें तो अब धुंधली हो गई पर उस फिल्म के लिए जो पापड़ बेले वो आज भी यादों में ताज़ा है|

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