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Tibet ki Lok Kathayen-2/ तिब्बत की लोक कथाएँ-2

कहानी-राख की रस्सी: तिब्बती लोक-कथा

लोनपो गार तिब्बत के बत्तीसवें राजा सौनगवसैन गांपो के मंत्री थे। वे अपनी चालाकी और हाज़िरजवाबी के लिए दूर-दूर तक मशहूर थे। कोई उनके सामने टिकता न था। चैन से जिंदगी चल रही थी। मगर जब से उनका बेटा बड़ा हुआ था उनके लिए चिंता का विषय बना हुआ था। कारण यह था कि वह बहुत भोला था। होशियारी उसे छूकर भी नहीं गयी थी। लोनपो गार ने सोचा, “मेरा बेटा बहुत सीधा-सादा है। मेरे बाद इसका काम कैसे चलेगा!”

एक दिन लोनपो गार ने अपने बेटे को सौ भेड़ें देते हुए कहा, “तुम इन्हें लेकर शहर जाओ। मगर इन्हें मारना या बेचना नहीं। इन्हें वापस लाना सौ जौ के बोरों के साथ। वरना मैं तुम्हें घर में नहीं घुसने दूँगा।” इसके बाद उन्होंने बेटे को शहर की तरफ रवाना किया।

लोनपो गार का बेटा शहर पहुँच गया। मगर इतने बोरे जौ खरीदने के लिए उसके पास रुपए ही कहाँ थे? वह इस समस्या पर सोचने-विचारने के लिए सड़क किनारे बैठ गया। मगर कोई हल उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था। वह बहुत दुखी था। तभी एक लड़की उसके सामने आ खड़ी हुई।

“क्या बात है तुम इतने दुखी क्यों हो?” लोनपो गार के बेटे ने अपना हाल कह सुनाया। “इसमें इतना दुखी होने की कोई बात नहीं। मैं इसका हल निकाल देती हूँ।” इतना कहकर लड़की ने भेड़ों के बाल उतारे और उन्हें बाज़ार में बेच दिया। जो रुपए मिले उनसे जौ के सौ बोरे खरीद कर उसे घर वापस भेज दिया।

लोनपो गार के बेटे को लगा कि उसके पिता बहुत खुश होंगे। मगर उसकी आपबीती पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वे उठकर कमरे से बाहर चले गए। दूसरे दिन उन्होंने अपने बेटे को बुलाकर कहा, “पिछली बार भेड़ों के बाल उतारकर बेचना मुझे ज़रा भी पसंद नहीं आया। अब तुम दोबारा उन्हीं भेड़ों को लेकर जाओ। उनके साथ जौ के सौ बोरे लेकर ही लौटना।”

एक बार फिर निराश लोनपो गार का बेटा शहर में उसी जगह जा बैठा। न जाने क्यों उसे यकीन था कि वह लड़की उसकी मदद के लिये जरूर आएगी । और हुआ भी कुछ ऐसा ही, वह लड़की आई। उससे उसने अपनी मुशिकल कह सुनाई, “अब तो बिना जौ के सौ बोरों के मेरे पिता मुझे घर में नहीं घुसने देंगे।”

लड़की सोचकर बोली, “एक तरीका है।” उसने भेड़ों के सींग काट लिए। उन्हें बेचकर जो रुपए मिले उनसे सौ बोरे जौ खरीदे। बोरे लोनपो गार के बेटे को सौंपकर लड़की ने उसे घर भेज दिया।

भेड़ें और जौ के बोरे पिता के हवाले करते हुए लोनपो गार का बेटा खुश था। उसने विजयी भाव से सारी कहानी कह सुनाई। सुनकर लोनपो गार बोले,”उस लड़की से कहो कि हमें नौ हाथ लंबी राख की रस्सी बनाकर दे।” उनके बेटे ने लड़की के पास जाकर पिता का संदेश दोहरा दिया। लड़की ने एक शर्त रखी, “मैं रस्सी बना तो दूँगी। मगर तुम्हारे पिता को वह गले में पहननी होगी।” लोनपो गार ने सोचा ऐसी रस्सी बनाना ही असंभव है। इसलिए लड़की की शर्त मंज़ूर कर ली।

अगले दिन लड़की ने नौ हाथ लंबी रस्सी ली। उसे पत्थर के सिल पर रखा और जला दिया। रस्सी जल गई, मगर रस्सी के आकार की राख बच गई। इसे वह सिल समेत लोनपो गार के पास ले गई और उसे पहनने के लिए कहा। लोनपो गार रस्सी देखकर चकित रह गए। वे जानते थे कि राख की रस्सी को गले में पहनना तो दूर, उठाना भी मुशिकल है। हाथ लगाते ही वह टूट जाएगी। लड़की की समझदारी के सामने उनकी अपनी चालाकी धरी रह गई। बिना वक्त गँवाए लोनपो गार ने अपने बेटे की शादी का प्रस्ताव लड़की के सामने रख दिया। धूमधाम से उन दोनों की शादी हो गई।

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