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Tibet ki Lok Kathayen-4/ तिब्बत की लोक कथाएँ-4

कहानी-दो बहनें और एक भाई: तिब्बती लोक-कथा

बहुत पहले की बात थी। च्येच्युन नाम की जगह पर दो बहनें और एक भाई रहते थे। उन के मां बाप चल बसे थे। दो बहनें अपने से छोटे भाई का लालन-पालन करती थी। बड़ी बहन खूबसूरत और लावण निकली, किन्तु दिल में वह जालिम और क्रूर थी, उसे आदमी का मांस खाने की लत पड़ गयी थी, जान पड़ता था कि उस के शरीर में राक्षस छिपा हुआ हो। दूसरी बहन सहृदय और दयालु थी और बड़ी बहन का सम्मान तथा छोटे भाई को प्यार करती थी। वह अपने भाई को दिल का टुकड़ा और आंखों की पुतली समझती थी। छोटा भाई परवान चढ़ते हुए बहुत प्यारा और कोमल दिखा। उसे देखकर बड़ी बहन के मुंह में लार टपकती थी। वह उसे कच्चा खाने की ताक में थी।

एक दिन, बड़ी बहन ने अपनी बहन से बकरी चराने को कहा, कहती थी कि वह घर में ठहरते खाना पकाएगी और भाई की देखभाल करेगी। पर दूसरी बहन को बड़ी बहन की कुत्सिक नीयत भांक आयी। वह भाई को अकेले घर में छोड़कर कही कतई नहीं जाएगी। उस ने कहा, बहन जी, तुम पहले की तरह बकरी चराने जाए। मैं घर में आप के लिए बड़े कडाही का पसंदीदा मांस पकाऊंगी। नाखुश होकर बड़ी बहन चली गयी। दूसरी बहन ने बाड़े से एक बकरी पकड़कर वध किया। बड़ी बहन के घर लौटते वक्त भाई को कहीं सुरक्षित छिपाया। बड़ी बहन के लौटने के बाद उस ने पका पकाया मांस लाकर बड़ी बहन को खाने के लिए परोसा और कहा, खा जाए, बहन जी, यह भाई का मांस है। सुन कर बड़ी बहन की बांछें खिल उठीं और हाथ पांव नाचे हुए। उस ने चाव से मांस खाया। लेकिन खाने के बाद उसे मालूम हुआ कि यह आदमी का मांस नहीं है। फिर भी मुंह से एक शब्द भी नहीं निकला। दूसरे दिन, बड़ी बहन ने दूसरी बहन से चराने जाने को भेजा, इस बार दूसरी बहन के पास घर ठहरने के लिए कोई बहाना नहीं रह गया। विवश होकर छोटे भाई को छिपाने के बाद वह बाहर चली गयी।

शाम को दूसरी बहन घर लौटी, बड़ी बहन ने भाई की एक उंगली निकालकर उस से कहा, तुम ने कल मुझे धोखा दी थी, आज मैं ने भाई का वधकर खाया है, यह लो, तुम्हारे लिए एक ऊंगली बची है। बात सुनकर दूसरी बहन को असह्य दुख हुई और अपार आक्रोश हुआ। परन्तु बड़ी बहन पर वह कुछ नहीं कर पाती। असीम पीड़ा सहते हुए वह बड़ी दुख से रो रही थी और भाई की ऊंगली थामे पहाड़ के पास एक स्तूप बनाया और ऊंगली को स्तूप के अन्दर रखी। वह बार बार पूजा-अर्चना करती रही और भाई की आत्म के शांत होने की दुआ करती रही।

दूसरे दिन, दूसरी बहन बकरी चराने पहाड़ पर गयी. वहां उस ने पाया कि स्तूप एक छोटे मंदिर के रूप में बदला। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ, देखते देखते ही हवा की एक तेज झोंका आयी, जिस से उस की गोद में रखी ऊंनी तौलिया बाहर निकलकर हवा के साथ मंदिर के भीतर चली गयी। तौलिया का पीछा करते हुए दूसरी बहन भी मंदिर के अन्दर पहुंची। मंदिर में लाल पीला रंग का चोगा पहने एक भिक्षु उस के आगे आया और उस ने बहन को ढेरों रत्न-मणि और मोती जेवर भेंट किए।

खूबसूरत जौहर आभूषण लेकर दूसरी बहन घर लौटी, उस के हाथों में इन सुन्दर कीमती चीजें देखकर बड़ी बहन को बड़ा लालच हुआ, उस ने ऐसी चीजों के आने का रहस्य पूछा। ईमानदार दूसरी बहन ने उसे सच सच बताया।

फिर दिन आया, बड़ी बहन अपनी बहन की नकल पर गोद में ऊनी तौलिया लिए मंदिर के सामने गयी। वहां पहुंचने के बाद हवा की कई झोंकें आयीं, लेकिन उस की गोद से तौलिया नहीं हिला, लाचार होकर बड़ी बहन ने तौलिया को मंदिर की छत पर फेंका। वह खुद मंदिर के भीतर गयी, कल के उस भिक्षु ने उस का आवभगत किया और उस के सिर और गर्दन पर अनेकों रत्न मणि और जौहर मोती पहन दिए। अनंत प्रसन्नता केसाथ बड़ी बहन घर की ओर चली गयी।

राक्षस जैसी बड़ी बहन तब एक हरीभरी झील के पास पहुंची, वह यह देखना चाहती थी कि पानी में सुन्दर आभूषण पहनी उस की परछाई कैसी है। किन्तु झील के पानी में अपनी परछाई देखकर भय आतंक के मारे वह अथाह झील में गिरकर काल के मुंह में चली गयी। दरअसल, उसने अपनी परछाई पर जो पहनी हुई चीजें देखी थीं, वह कोई रत्न पन्ने और जेवर नहीं थे, वो उस के सिर माथे पर कुंडली मारे बैठे जहरीले सांप और गर्दन छाती पर रेंगते विषाक्त कीड़े मकोड़े थे।

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