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Tibet ki Lok Kathayen-6/ तिब्बत की लोक कथाएँ-6

कहानी-नीली लोमड़ी बनी राजा: तिब्बती लोक-कथा

एक लोभी खाऊ लोमड़ी थी, वह गांव के सभी घरों में खाने की चीजों की चोरी करने जाया करती थी। एक दिन, वह रंगसाज के घर में घुस गयी, असावधानी के कारण वह एक नील के बड़े बड़े मग में जा गिरा और उस का पूरा शरीर नील के रंग से सना हुआ। मग से बाहर निकलने के बाद लोमड़ी का देह एकदम बेरूप हो गया, नील के रंग को नहाकर धोने के लिए लोमड़ी जल्दबाजी से नदी में कूद पड़ी । लेकिन नदी में नहाने के बाद जब वह तट पर आयी, तो पाया कि सूर्य की किरणों में उस का नीला शरीर चमकीला दिखाई देता है और बिलकुल नीलमणि की भांति प्रतीत हुआ है।

उसे देखकर दूसरी लोमड़ी बड़ी आश्चर्यचकित हुईं और कुतुहल से पूछा:”तुम कौन हो?” मैं काच्वो हूं” लोमड़ी ने जवाब दिया। तिब्बती भाषा में काच्वो का अर्थ है इंद्र होने वाला । इसलिए स्वर्ग में इंद्र ने सुना कि इस लोमड़ी का नाम इंद्र से नाते-रिश्ते का है, तो उस ने तुरंत लोमड़ी को जानवरों का राजा घोषित किया। नीली लोमड़ी बहुत खुश हुई और उस ने लोमड़ियों को उसे दूसरे जंगली जानवरों से परिचित करने की हुक्म दी।

दूसरे जानवरों ने भी लोमड़ी के इस प्रकार के नील रंग को कभी नहीं देखा और उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ । अचंभे में आकर सभी जानवरों ने नीली लोमड़ी को राजा माना और उससे हाथी की पीठ पर बैठे घूमने का सुझाव दिया। इस के बाद हर शुभा यात्रा के वक्त आगे आगे शेर, शेर के पीछे बाघ और बाघ के पीछे अन्य जंगली जानवर रास्ता बनाते थे और उन के पीछे पीछे लोमड़ी हाथी पर शान से बैठे इतराते हुए चल रही थी।

नीली लोमड़ी की मां भी जीवित थी, वह एक दूसरी पहाड़ी गुफा में रहती थी। नीली लोमड़ी ने अपनी माता के नाम पत्र लिखकर उसे भी शुभा-यात्रा में शामिल होने का निमंत्रण दिया। लोमड़ी के संदेश वाहक के हाथों से पत्र माता लोमड़ी को पहुंचाया गया।

पत्र में लिखा गया था:”पूज्य माता जी, तुम्हरा पुत्र अब राजा बन गया है, कृपया आप मेरे पास आएं और एक साथ सुखमय जीवन का साझा करें।”माता लोमड़ी ने संदेश वाहक से पूछा :”राजा लोमड़ी के मातहत कौन कौन हैं?”तो जवाब मिला:”हमारी लोमड़ियों के अलावा शेर, बाघ और हाथी आदि भी हैं।” सुनकर माता लोमड़ी बड़ी घबराते हुए बोली:”यह कोई खुशखबरी नहीं है, मैं नहीं जाऊंगी।”

संदेश वाहक खाली हाथ लौटा और जंगली जानवरों के बीच घूमते हुए चिल्लाया:”गजब की बात है, हमारा राजा असल में एक लोमड़ी है, मैं अभी अभी उस की माता से मिल कर लौटा हूं। मैं ने खुद आंखों से देखा है कि वह असली लोमड़ी है।” अन्य लोमड़ियों ने संदेश वाहक की बातें सुनने के बाद असलियत जानना चाहा और एक साथ ऊंची आवाज में चिल्लाए: तुम असलियत बताओ, नहीं तो हम तुम्हारे शरीर के रंग को झाड़कर साफ करेंगे।”

फिर भी नीली लोमड़ी धैर्य का स्वांग करती रही, किन्तु हाथी की पीठ पर बैठे हुए नाराजगी की वजह से उस के मुंह से लोमड़ी की ची ची ची जैसी ध्वनि निकली, इस तरह उस का पोल एकदम खुल गया।

हाथी को बड़ा अपमानित होने का महसूस हुआ और वह आगबबुला होकर बोला :”तु लोमड़ी है, कैसे मेरी पीठ पर बैठने का साहस हुआ हो!”उस ने लोमड़ी को पकड़ कर जोर से जमीन पर पटका दिया, फिर अपने एक मजबूत बड़े बड़े पांव को लोमड़ी पर दबाकर उसे जान से मारा।

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