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Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Lekh: Diwali Ki Jhalar/ हास्य लेख : दिवाली की झालर

नमस्ते! उम्मीद है आप सब अच्छे होंगे, अजी उम्मीद क्या पूरा विश्वास है| वैसे कई दिनों से लिखने की सोच रहा था पर लिख नहीं पा रहा था….वो क्या कहते है…करंट नहीं पहुँच रहा था| अब दिन में तो हजारों काम होते है…और लिखने के लिए चाहिए शांति और सुकून, तो हमारे जैसों के लिए तो रात ही अनुकूल है| कल रात की भी यही सोच थी कि खा–पी कर रात को लिखने की महफ़िल जमाएंगे….बस हम, हमारी डायरी और हमारा पेन| अब बस एक छोटा सा बहाना चाहिए था जिससे श्रीमति जी को अल्पावधि के लिए नाराज़ कर सकें ताकी महफ़िल में कोई बाधा न आए| काम लगता आसान है पर नाराज़गी की श्रेणी में सूत के धागे जितना ही फ़र्क होता है, बात ज़रा इधर से उधर हुई नहीं कि लेने के देने पड़ सकते हैं| खैर साल बीतते –बीतते शादी के ये हुनर अपने आप ही विकसित हो जाते है|

फिर क्या, खाना खाने और रसोई का ताम झाम निपटाने के बाद जैसे ही श्रीमति जी बेडरूम में आईं और डबल बेड पर बैठते ही हाथ पैर पर लगाने के लिए बॉडी लोशन उठाया, हमने छेड़ दिया, “ये सूट छोटा हो गया है क्या…थोड़ी मोटी लग रही हो”, बस फिर क्या उनके जवाब मिलते गए और योजनानुसार हम उन जवाबों में मिर्च मसाला लपेट कर उन्हे वापस सवालों में तब्दील कर श्रीमति जी की तरफ दागते गए….तीन-चार सवालों के बाद तो हम, हमारा तकिया और चादर तीनों कमरे के बाहर थे|

आ!हा! जैसा चाहते थे वैसा ही हुआ, अगले कमरे में हम थे, हमारी डायरी थी और पेन| बस एक समस्या थी कि पूरी लाइट नहीं जला सकते थे वरना श्रीमति जी को शक़ हो जाता कि सब बहाना था और वही सूत के धागे वाला फ़रक…..नाराज़गी की श्रेणी में बदलते देर न लगती|

अभी सोच ही रहे थे कि पुराने दिन याद आ गए जब घर में टेबल लैंप हुआ करता था, ‘बल्ब वाला’| कमरे में पढ़ना हो तो कमरे में पढ़ो, और अगर शक्ल सूरत ठीक-ठाक हो और कॉन्फिडेंस भी तो खिड़कियों और छतों पर भी ले जा सकते थे| बस तीन –चार बार स्विच ऑन –ऑफ किया और दूर कही किसी खिड़की या छत से रिटर्न सिग्नल मिलना तय था| इतने तो IAS न बने होंगे जितने पति बन गए होंगे इस टेबल लैंप की बदौलत|

खैर टेबल लैंप का महिमामंडन फिर कभी, आज बात हमारी और हमारे लेखन की| तो हुआ यूँ कि जब पुराने टेबल लैंप की याद आई तो बिना आवाज़ किए स्टोर रूम के कबाड़ में टेबल लैंप की तलाश शुरू हो गई| दो चार गत्ते सरकाए फिर जा कर नज़र आया हमारा नीले रंग का टेबल लैंप| झाड़ –पोछ कर कमरे में ले कर आए और टेबल पर वैसे ही लगा दिया जैसे तब लगा करता था, दाहिने हाथ पर किताबों के पास| डायरी रखी, पेन निकाला और एक लम्बी सांस ले कर बैठ गए, सोचा कि पहले ‘ॐ’ का चिन्ह बनाएंगे, तारीख डालेंगे और फिर सोचेंगे क्या लिखना है| सोचते-सोचते जैसे ही टेबल लैंप का स्विच ऑन किया, एक हलकी रोशनी चमकी फिर वापस अँधेरा….शायद इतने साल से रखा था तो होल्डर ढीला हो गया होगा| बस यही विचार मन में रखते हुए जैसे ही बल्ब होल्डर को कसने के लिए हाथ होल्डर तक पहुँचाया पूरे शरीर में एक तरंग सी दौड़ गई, जी हाँ एक जबरदस्त करंट का झटका पूरे तन, मन और मस्तिष्क को झंझोड़ गया था|

अजी करंट क्या लगा पुराने दिन याद आ गए और लिखने का विषय भी…..थोड़ा संभालने के बाद निश्चय किया की आज लिखेंगे अपने समय के त्योहारों और उनसे उभरते खतरों के खिलाड़ियों के बारे में…..

शायद यही कारण है कि जो इंतज़ार या तड़प त्योहारों को ले कर पुरानी पीढ़ी में थी वो आज की पब-जी और टिक-टाक वाली जनरेशन कभी समझ ही नहीं पाएंगी |

भारत में मूलतः दो त्यौहार ऐसे हैं जो अखंड भारत के सूचक हैं, एक तो होली, और दूसरा दिवाली| कश्मीर से कन्याकुमारी तक दोनों ही त्योहार सदियों से परंपरागत तरीके से मनाए जाते रहे हैं| तो आज बात दिवाली की, एक तो त्योहार नज़दीक है, ऊपर से ताज़ा –ताज़ा करंट लगा था| तो शुरू करते हैं बात करंट के त्योहार…..माफ़ कीजिएगा, रोशनी के त्यौहार की|

तो होता यूँ था कि जो पुरानी कहावत है न ‘फिजाओं में त्योहार की खुशबू’, शायद इसी त्योहार से पनपी होगी…दशहरे में रावण के जलने के बाद से जो कागज़ के जलने और पटाखे के बारूद की खुशबू नाक में घुसती थी, दिवाली का खुमार वहीँ से चढ़ना शुरू हो जाता था|

फिर क्या, जिसकी जितनी पॉकेट मनी उसकी दिवाली उतनी पहले शुरू, उम्र के हिसाब से अपने-अपने असलहे चुन लिए जाते थे…पांच से आठ तक फुलझड़ी और चुटपुटिया, नौ से तेरह मिर्ची बम, चौदह से अठारह बुलेट बम, उन्नीस से ऊपर सुतली बम और फिर अनार, राकेट, और चकरी| बड़ों के अपने काम हुआ करते थे, घर की साफ़-सफाई, रंगाई-पुताई और सबके कपड़े सिलवाना वगैरह | समय पर नाप न दो तो मोहल्ले का दर्ज़ी भी ऐसे नखरे दिखता था मानों ‘मनीष मल्होत्रा’ हो|

खैर हमारे जैसे टीन-एजर्स के पल्ले एक बड़ा काम आता ही आता था, जिसके बिना न त्योहार तब त्योहार लगता था न अब लगता है| जी हाँ बात झालर वाली लाइट की, कोई सीरीज बोलता है तो कोई मिर्ची लाइट पर होती वह झालर ही है…काम घरों को जगमग रौशन करना|

आज कल तो यूज़ एंड थ्रो का ज़माना है वरना हमारे समय में तो झालर तैयार करना वाकई जिम्मेदारी का काम माना जाता था, और चूँकि हम तरुण खुद को घर का जिम्मेदार सदस्य समझते थे तो ये काम स्वेच्छा से ख़ुशी-ख़ुशी करते थे|

सबसे पहले तो स्टोर रूम से पुरानी झालरें निकालो फिर अपने ईष्टदेव का नाम ले कर प्लग लगाओ और स्विच ऑन करो और फिर सर खुजाते हुए झालर को निहारो की वो जली क्यों नहीं| ऐसा नहीं था की ईष्टदेव की कोई नाराज़गी थी पर पिछले कई सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ कि पुरानी झालर को ऑन किया हो और वो एक बार में चमक पड़ी हो|

जैसे राजपूतों में युद्ध से पहले तलवार से ऊँगली काट कर ईष्टदेव को अपना रक्त चढ़ाने की परंपरा थी, ठीक वैसे ही खुद को करंट लगवा कर ईष्टदेव को प्रसन्न करना हमारी त्योहारी परंपरा थी, वरना दिवाली, दिवाली नहीं लगती थी|

मोहल्ले के जिस घर की झालर के सबसे ज्यादा बल्ब रौशन हो समझो उसी घर का बालक सबसे बड़ा गौरवशाली था, आखिरकार सबसे अधिक झटके भी तो उसी ने खाए होते थे| आम दोस्तों में अपने करंट के झटके का बखान करना भी वीरता का पर्याय माना जाता था| और हो भी क्यों ना आखिर पिछले साल की रखी हुई झालर को वापस जीवंत कर देना कोई आसान काम था क्या? सबसे पहले तो हथियार दुरुस्त होने होते थे, एक टेस्टर, थोड़ा तार और दस- बारह कंचे के अकार वाले बल्ब, वही जिसे कड़क तार की दो टाँगे निकली होती थी| टांगे क्या थीं बल्ब का दिल ही थी समझो, एक भी टूट गई तो बल्ब की लीला समाप्त|

तो सबसे पहले एक बल्ब से दूसरे बल्ब झालर की धड़कन परखो, फिर टूटी टांग वाले बल्ब की बाई पास सर्जरी| बस यही वो नाज़ुक मोड़ होता था जिसमे अक्सर हमारे जैसे खतरों के खिलाड़ी बिजली के झटकों  के शिकार हो जाया करते थे| करंट के झटके देते- देते भी उस ज़माने की झालरें चार-पांच साल साथ तो निभाती ही थी| आज कल की चाइना लाइट की तरह नहीं कि खुद को ही न पता हो कि इसी साल भाईदूज तक टिकेगी या नहीं|

खैर अपनी वाली झालर के चार –पांच साल चलने के बाद उसे रिटायर कर ही दिया जाता था और उसके बाद बाकायदा दोस्तों में राय मश्वरा होता था कि आज कल फैशन में क्या है, सफ़ेद टोपी वाली, पीली टोपी वाली या चार रंगों वाली सदा बहार| एक बार टोपी का चुनाव हो गया तो काम आसान था, जितना पैर उतनी चादार| यानी जितनी लम्बी छत उसके हिसाब से ही झालर की लम्बाई| ज्यादा पैसे हों तो मीटर में 7 या 8 बल्ब और हाथ तंग हो तो 4 या 5 बल्ब से भी काम चल जाता था| बस फिर क्या स्वादानुसार तार को सामान लम्बाई में काटा, दो अलग-अलग तारों को साथ में रख कर झालर की टोपी के अन्दर डाला, फिर एक निश्चित दूरी पर गाँठ दे कर छोड़ दिया, बस अब एक तार का एक सिरा बल्ब की एक टांग में और दुसरे तार का दूसरा सिरा बल्ब की दूसरी टांग में कस दिया, लो जी ऐसे करते- करते झालर तैयार| बीच-बीच में एक आध झटके और, और फिर हमारी झालर हमारे त्योहार को जगमग रौशन करने के लिए तैयार होती थी|

एक बार झालर तैयार हो गई और छतों पर सुशोभित हो गई तो समझो एक बड़ा काम समाप्त और दिवाली तक जिम्मेदारी से फुर्सत| इसके बाद तो अगली जिम्मेदारी सीधे त्योहार वाले दिन, सबसे पहले नए कपड़े पहन कर पूजा में शामिल होना फिर घर की दीवारों और छतों पर दिए और मोमबतियां लगाना, आखिर में मोहल्ले के घरों में लाई-खील और मिठाइयाँ पहुंचना| बस, एक बार ये काम ख़तम तो पूरी छत, पूरा मैदान अपना, अब तो बस पटाखे और सिर्फ पटाखे, पूरा मोहल्ला धुआं-धुंआ|

कुछ भी कहिए, ये छोटे-छोटे काम ही सही पर हमें एक दूसरे से घुलने- मिलने, अपने रीति-रिवाज़ और परम्पराओं को समझने और समझ कर निर्वाह करने और छुटपन से ही अपनी जिम्मेदारियों को निभाने  की सीख देते रहे हैं| उम्मीद है ऐसा ही कुछ हम अपनी अगली पीढ़ी को भी सिखा पाएं|                             

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