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Hasya Kahani: Credit Card ki Barsi/ हास्य कहानी: क्रेडिटकार्ड की बरसी

नमस्ते! आज बात किसी ऐसे की जिसको साथ होने पर हम कोसते रहते है पर जब पास न हो तो याद ज़रूर आती है| इंसान के जीवन में लगभग हर मोड़ पर ऐसा कोई मिलता ही है, चाहे यार हो या रिश्तेदार| अजी वो छोड़िये अपनी ही औलाद जब हाथ से निकल जाए तो क्या हम कोसते नहीं है? पर अपने तो अपने ही होते हैं, जब छोड़ कर चले जाते हैं तो हर छोटी से छोटी बात याद आती है|
आज इमोशनल होने का कारण और तिथी दोनों ही वाज़िब है, आज हमारे ऐसे ही सुख दुःख के साथी की दूसरी बरसी जो है| मैट ब्लैक फिनिश, उस पर चमकदार रंग से उभरता हमारा नाम साथ ही चमचमाता मास्टर कार्ड का लोगो…..जी हाँ हमारा अपना क्रेडिटकार्ड,….ठीक दो साल पहले आज ही के दिन एक्सपायर हुआ था| ना –ना करते हुए भी तेरह- चौदह साल का साथ तो रहा ही होगा| आज जब दीपावली की सफाई का ड्राई-रन चल रहा था तो अचानक पुराना लिफाफा हाथ में आ गया और वो दिन, वो सारी यादें आँख के सामने आ गई…..लगा मानों कल की ही बात हो……
नौकरी करते करीब तीन-चार साल बीत चुके थे और शुरुआती पड़ाव में ही हम बम्बई की चहल-पहल और लखनऊ की तहजीब देख चुके थे| जैसे ही लखनऊ छोड़ जबलपुर पहुंचे लगा कि गृहस्ती के नाम पर जो कुल जमा दो अटैची लिए फिरते थे अब उसको आगे बढ़ाने का समय आ चुका था| हालाँकि बैचलर थे पर लगा कब तक? आज नहीं तो कल गले मैं माला तो चढ़नी ही है…तो सबसे पहले 2BHK का बड़ा सा घर किराए पर ले लिया| पूरे घर में एक गद्दा, दो अटैची और हम….गलती से भी छींक निकल जाए तो ऐसा लगता था मानो किसी हिल स्टेशन के ईको पॉइंट पर खड़े हो….अपनी ही छींक घूम फिर कर तीन चार बार गूंजती थी| बड़े कॉर्पोरेट की नौकरी थी तो ऑफिस के सहकर्मियों के घर आने से पहले, घर रहने लायक दिखे ऐसा बनाना था….ऐसा नहीं था कि इसके पहले की नौकरियां बुरी थी जो गृहस्ती न जुटा पाए, पर लड़कपन की खुमारी उतरते- उतरते हम बंबई से लखनऊ और लखनऊ से जबलपुर पहुँच चुके थे|
वो उदाहरण तो आप ने सुना ही होगा न कि ‘दो पेपर कप लीजिये और उसके तले में सुराख़ कर दीजिए…एक में एक दो महीन सुराख़ और दुसरे कप में बहुत बड़ा छेद…फिर दोनों कप में पानी डालिए, बारीक सुराग वाले कप में पानी ठहरेगा और धीरे धीरे कर गिरेगा’, यह हुआ उधाहरण उनका जिनकी कमाई और खर्चे में बड़ा अंतर होता है….ठहरने वाला पानी यानी सेविंग| अब अगला उदाहरण हमारे जैसों के लिए….वही बड़े छेद वाला पेपर कप….जितना कमाया सब बाहर बिना किसी देरी के….काहे की सेविंग| माता-पिता तो कह-कह कर थक गए पर हमें तो यही लगता था कि जो आता है वो जाता ही है….एविंग-सेविंग सब मोह माया है|
खैर देर से ही सही सद्बुद्धि आई, लगा कि धीरे-धीरे ही सही पर अब गृहस्ती का सामान जोड़ा जाय| दोस्तों और सहकर्मियों से बात की तो सभी ने अपनी बुद्धि, विवेक और अनुभव के आधार पर अपनी –अपनी राय रख दी….शादी शुदा की राय अलग थी और कुवारों की अलग| न जाने क्यों ऐसी ही किसी राय में क्रेडिटकार्ड का जिक्र चल निकला…नाम तो याद नहीं पर ज़रूर कोई कुंवारा ही होगा, वरना शादी शुदा ऐसी राय दे, कम ही सुना है| हमने खुद शादी के बारह साल में कभी ऐसी सलाह न दी होगी|
तो ज़नाब क्रेडिटकार्ड में दिलचस्पी बढ़ी और थोड़ी रिसर्च के बाद एक नामी बैंक का क्रेडिटकार्ड अप्लाई कर दिया गया..घबराहट तो हो रही थी पर उस ज़माने में क्रेडिटकार्ड अपने आप में स्टेटस सिंबल हुआ करता था, तो एक अलग तरह का एक्साईटमेंट भी था|
सीना तो तब चौड़ा हुआ जब पूरे ऑफिस के सामने ब्लू-डार्ट के कुरियर बॉय ने हमारा नाम पुकारा और एक कड़क शानदार पैकेट हाथ में थमा गया| पूरी जिंदगी खाकी रंग के डाकिये को देखने वाले और बेहद ही इमरजेंसी में मधुर या मारुती कूरियर की सेवा लेने वाले को ब्लू-डार्ट का पैकेट आना वो भी ऑफिस के दसियों लोगों के बीच…..समान की और सामान को रिसीव करने वाले की पर्सीव्ड वैल्यू तो ऐसे ही बढ़ जानी थी|
खैर सारे एक्साईटमेंट और उस ब्लू-डार्ट के पैकेट को हमने डाला दराज़ में और लग गए अपनी दिनचर्या निपटाने| शाम बिना भूले पैकेट अपने बैग में डाला और पहुच गए अपने ईको पॉइंट अर्थात 2BHK फ्लैट पर| एक्साईटमेंट इतना था की खाना पैक कराना ही भूल गए थे, वैसे भी भूख किसे थी| बस फटाफट पैकेट निकला और बिना पलक झपके क्रेडिटकार्ड की अनबॉक्सिंग कर डाली| बीसियों कागज के बीच एक काले रंग का कार्ड….मैट फिनिश और उसपर चमकदार रंग से उभरा हमारा नाम….वाह! लगा मानों देखते ही रहें| कुछ कागजों को उलटने पलटने पर ज्ञात हुआ की निन्यानबे हज़ार की लिमिट थी ….मतलब निन्यानबे हज़ार की खरीददारी….मतलब बहुत सारी| फिर क्या, बाकी कागजों को पलटने की ज़हमत ही नहीं उठाई…वैसे भी इतने बारीक अक्षरों में लिखे थे कि आँख न भी ख़राब हो तो आदमी शक़ में आई-टेस्ट करवा ले|
वो पहला दिन था जब हम, हमारा क्रेडिटकार्ड और हमारा लेदर का पर्स एक दुसरे के पूरक हुए थे, उसके बाद तो दीवान..घड़ी…जूते…टीवी….म्यूजिक सिस्टम…किचन का सामान…….बस एक बार दुकानदार कह भर दे की ‘जी हाँ क्रेडिटकार्ड एक्सेप्ट करते हैं!’, मजाल है जो हम दुकान से खाली हाथ उतर जाएं| पैंतालिस दिन का रोटेशन सर्किल वाकई मज़े दे रहा था…..शापिंग का सिलसिला यूँ की चलता रहा जब तक कि हमारे 2BHK फ्लैट में प्रतिध्वनि होना बंद न हो गया….| अब क्रेडिट पर लिया था तो चुकाना भी था, शुरू-शुरू में तो 2-3 हज़ार का सामन आता था पर चार-पांच महीने बीतते पेमेंट का सिलसिला किश्तों में तब्दील हो गया| हर महीन सात-आठ हज़ार चुकाना ही था| खैर अकेले थे तो संभव था, बस पेपर कप के नीचे जो बड़ा छेद था उस पर टेप मार कर छेद छोटा करना था, और इकठ्ठा होने वाले पानी से क्रेडिटकार्ड की किश्त चुकानी थी| मजबुरी थी तो किया और चुकाते –चुकाते साल बीत गया| अब हम जबलपुर को टाटा –बॉय बोल कर राजस्थान आ चुके थे| नयी नौकरी, नयी जगह, नए लोग…पहले तो लगता था की सभी बड़ी-बड़ी मूछों वाले और पगड़ी पहनने वाले होंगे पर हकीकत अलग थी..जब जयपुर में उतरे तो पता चला विज्ञापन में दिखने वाला राजस्थान और हमारी कर्मभूमि बनने जा रहा राजस्थान दोनों अलग थे|
बैचलर अभी भी थे पर 2BHK का चस्का लग चुका था, वैसे भी मकान ईको पॉइंट न बने जितना सामान तो अब इकठ्ठा हो चुका था तो ब्रोकर की मदद से एक 2BHK जयपुर शहर में भी ले लिया| शुरुवाती कुछ दिन तो क्रेडिटकार्ड की सेवा को विराम दिया पर जुआ, शराब और क्रेडिटकार्ड की लत एक बार लग जाए तो छुटाए नहीं छूटती….वही हुआ जिसका डर था क्रेडिटकार्ड की घिसाई वापस शुरू|
दिन बीते और देखते ही देखते वो दिन भी आ गया जिसका इंतज़ार हर कुंवारा करता है…जी हाँ हमारी शादी तय हो गई थी, अब शादी तय हुई थी तो शादी से जुड़े खर्चे भी होंगे….मोटे तौर पर दिखने वाले और बड़े खर्चों की जिम्मेदारी माता-पीता ने उठा ली थी पर हमारा भी कुछ फ़र्ज़ बनता था आखिरकार अपने ही घर की शादी थी..वो भी अपनी…, ताल ठोक कर कह दिया की अपने कपड़े और हनीमून का खर्चा हम खुद उठाएँगे| घरवालों को भी लगा कि बेटे को जिम्मेदारी का अहसास है तो सभी ने हामी भर दी|
हाँ तो कर दिया था पर लाते कैसे पेपर कप का छेद अब भी काफी बड़ा था, तो बस….. ‘हारे का सहारा….क्रेडिट कार्ड हमारा’…,लिस्ट बनाई और चल पड़े शॉपिंग करने, सूट-शेरवानी…घड़ी…जूते…बेल्ट सब खरीद डाला, करना क्या था बस काले कार्ड को घिसना था और पिन डालना था …इतना ही नहीं हनीमून का होटल….फ्लाइट का टिकट सब बुक हो गया….भला हो क्रेडिट कार्ड का|
लोग भले ही दिन रात कोसे पर उम्मीदों की उड़ान के लिए जिन पंखों की ज़रुरत होती है वो पंख क्रेडिटकार्ड की लगता है ….भले ही कुछ दिन बाद हवा में ही उखाड़ भी दे और आप औंधे मुह ज़मीन पर आ गिरें| वही हुआ क्रेडिटकार्ड की किश्त अब तनख्वाह का मोटा हिस्सा खाने लगी थी पर वाह रे नशा, मजाल है जो एक भी दुकान पर दाम सुन कर शिकन आई हो|
खैर शादी अभी तय हुई थी…हुई नहीं थी, हम अब भी अकेले थे और किस फ़िज़ूल खर्ची पर मेढ़ बाँध कर रोकना है और उस पैसे की नहर से कैसे क्रेडिट कार्ड की सिचाई करनी है हम मैनेज कर ले रहे थे….वैसे भी हम उस विचारधारा के समर्थक थे जिसमें नहाते समय बनियान को पैरों के नीचे रख देते है ताकी शरीर पर लगने वाला साबुन शरीर से होता हुआ बनियान पर गिरे और कपड़े धोने के साबुन के खर्चों में कटौती हो….साथ खुशबू वो बोनस|
पर आप की विचारधारा तब तक ही कारगर है जब तक आप कुंवारें है…एक बार आपने दाम्पत्य जीवन में प्रवेश किया तो सारी विचारधारा की पुड़िया बना कर आप ही की शेरवानी की जेब में डाल दिया जाता है…और आप की पत्नी की विचारधारा ही आप की विचारधारा बन जाती है| सुनने में अजीब लगेगा पर शादी-शुदा लोग हमारी बात से सहमत होंगे ऐसा हमें द्रढ़ विश्वास है| हमारे साथ भी कुछ वैसा ही हुआ…हमारी विचारधारा बदलने लगी…शॉपिंग का एक्सपीरियंस ही बदल गया….एक समय था जब दूर से ऊँगली दिखा कर ही बोल दिया करते थे कि फलां घड़ी या फलां जूता पैक कर दो, पर एक उस हादसे के बाद से तो हमे कल्चरल शॉक लग गया था…कभी सोचा नहीं था की शॉपिंग का ये प्रारूप भी होता होगा….
हुआ यूँ की शादी के कुछ दिन बाद हमारी श्रीमती जी हमारे साथ जयपुर आ गईं, दांपत्य जीवन सुखमय बीतने लगा…हमारी पहली सालगिरह आने वाली थी तो हमने श्रीमति जी को सोने की चेन दिलाने का वादा कर डाला| दोनों खुश थे, वो इस बात से कि पति को साल गिरह याद थी और हम इस बात से कि श्रीमति जी खुश थीं| सालगिरह का दिन आया, प्लान यह बना की पहले शॉपिंग करेंगे फिर शाम किसी शानदार रेस्टोरेंट में डिनर करेंगे..कॉकटेल के साथ| ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों एक बड़ी ज्वेलरी शॉप में पहुचे और सेल्समेन को अपनी आमद का कारण कह सुनाया| हमें क्या पता था कि सोने की चमक में खोना क्या होता था…एक मिडिल क्लास आदमी की नज़र में सोने की चेन, मतलब …वो पतली वाली…एक या सवा तोले की, पर इनसेंटिव पाने वाले ‘स्टार ऑफ़ द मंथ’ सेल्समैन क्या होते है वो तो हमने उस दिन ही महसूस किया| दिखाते ही दिखाते उसने एक तोले से होते हुए चेन का वज़न और हमारी श्रीमति जी का मानस कब साढ़े तीन तोले तक पंहुचा दिया पता ही न चला| आखिरकार एक चेन को देख हमारी श्रीमति जी की आँखों में चमक आ ही गई, उन्होंने हलके से मुस्कुरा कर हमें देखा और बोलीं, ‘ये वाली कैसी है’| हम क्या बोलते, उड़ता तीर भी तो हमने ही लिया था सो बोल दिया, ‘अच्छी है’| इधर चेन से श्रीमतीजी की आँखें चमक रही थी और उधर वजन का कांटा देख हमारे सर पर सितारे चमक रहे थे| दर्द छुपाते हुए सेल्समेन से बोले, ‘हाँ भाई कितने की है…?’ सेल्समेन की वो कुटिल मुस्कान हम आज तक न भूल पाए| वो तो भला को क्रेडिटकार्ड का जो उस समय हमारा सम्मान बच गया, यह बात अलग है की क्रेडिटकार्ड की किश्ते भरते-भरते हमारा आत्मसम्मान ही हमें धिक्कारने लगा था|
खैर समझदार वही होता है जो अपनी गलतियों से सीखता है, उस हादसे के बाद तो हमने तौबा कर लिया कि आगे से चलकर कभी कोई वादा नहीं करेंगे…सरप्राइज गिफ्ट दे दो वो बात अलग है|
धीरे-धीरे समय बदला तो शॉपिंग का नजरिया भी बदला, अब हमारा एक प्रमुख काम कोचवान की तरह गाड़ी इस दुकान से उस दुकान ले जाना भी था| श्रीमति जी का क्या था एक –एक घंटे दुकान पर पचासों कपड़े निकलवाने के बाद कहा ‘पसंद नहीं आया, कही और चलते हैं’, अच्छा ऐसा भी नहीं था की खुद बोल दें, दुकानदार को नए- नए बहाने सुनाकर वहां से बाहर निकालने की जिम्मेदारी भी हमारी थी| समय के साथ समझ आ ही गया कि लेडीज कपड़ों के व्यापारी सिद्ध बाबाओं से कम नही होते…चेहरा पढ़ लेते हैं| शुरू-शुरू में तो लगता था कि आज पिटे या कल पर कसम से पिछले बारह साल में ऐसा मौका आया ही नहीं…इस धैर्य के लिए हम पूरे लेडीज शॉपिंग से जुड़े व्यापारी वर्ग के कृतज्ञ हैं|
लेडीज शॉपिंग के चलते दुकानदारों की महिमा के साथ साथ एक और बात का दिव्यज्ञान हुआ कि शॉपिंग में हमारी राय कोई खास मायने नहीं रखती हम तो बस सपोर्ट के लिए ले जाये जाते हैं….ताकी कल को कोई ऊँच-नीच हो तो बोल सकें ‘आप भी तो थे!’
खैर बात वापस क्रेडिटकार्ड पर…अब जिम्मेदारी और बढ़ गई थी, एक तो क्रेडिटकार्ड की बढती किश्त ऊपर से लेडीज शॉपिंग के लिए घंटों दुकान पर इंतज़ार करना| इतना ही नहीं, हर वो सामान जो हमने नग के हिसाब से खरीद रखा था अब वो सेट में था और वो भी स्टील, मेलामाइन और बोन-चाइना की वैरायटी में| ढाई लोगों की गृहस्ती में तीन अलग-अलग साइज़ के कूकर और दो अलग-अलग साइज़ की कढ़ाई क्यों चाहिए भला, ये बात न हम शॉपिंग करते समय समझ पाए थे न आज|
क्रेडिटकार्ड की बदौलत देखते ही देखते ढाई लोगों के परिवार में कब 2BHK छोटा पड़ने लगा पता ही न चला और क्रेडिटकार्ड की किश्तों का सिलसिला जबलपुर से होता हुआ, जयपुर, दिल्ली और हैदराबाद पहुच गया| जब भी किसी माल या दुकान के पास से गुज़रते मन की इच्छा उम्मीद की उड़ान भरना चाहती, क्रेडिटकार्ड पर्स से निकलता और उड़ान को पंख लगा जाता…और जाते जाते किश्तों की बेड़ियाँ पैर में डाल जाता|
खैर हर किसी की जिंदगी में वो दिन आता ही है जब उनका कोई ख़ास, कोई अपना उन्हें छोड़ कर चला जाता है..हमारे साथ भी यही होने वाला था..पता तो था पर इस बार हम अपना दिल मज़बूत कर चुके थे|
आखिरकार दो साल पहले आज ही के दिन हमारा क्रेडिटकार्ड एक्सपायर हो गया| आज इस बात को बीते दो साल हो चुके है पर हमने हिम्मत दिखाई और क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख ही लिया|
अगर आप भी क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख चुकें है तो आप बधाई के पात्र हैं और उम्मीद है सुखी होंगे और यदि किसी करणवश आप यह मोह अभी तक नहीं छोड़ पाए है तो हिम्मत जुटाइये और धीरे- धीरे ही सही पर इसको अपनी जीवनशैली से अलग करना शुरू कीजिये….विश्वास दिलाता हूँ इसके बिना जीवन कहीं ज्यादा सुखमय महसूस कीजियेगा|

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