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Fiji ki Lok Kathayen-1/ फिजी की लोक कथाएँ-1

नारियल की खेती: फिजी की लोक-कथा

कैलाशवासी भगवान शंकर को एक दिन समुद्र-यात्रा की धुन सवार हुई। माता पार्वती को साथ लेकर भोलेनाथ सिंगापुर, जकार्ता, सिडनी, ऑकलैंड होते हुए फीजी द्वीप के लोमोलोमो टापू पर जा पहुंचे। टापू के सुनहरे तट पर दोनों प्राणी टहलने लगे।

इसी लोमोलोमो टापू पर एक अनाथ युवक रहता था। उसका नाम था तिमोदी तिमोदी बहुत गरीब था । कभी-कभी उसे भरपेट खाना भी नसीब नहीं होता था। तब वह समुद्र से मछली पकड़ लाता और पहाड़ से कंदमूल-फल खोद लाता और यही उसके पेट भरने के साधन हो जाते । तिमोदी को गहरे समुद्र में नाव चलाने का बड़ा शौक था। उसे विश्वास था कि फिजी का कोई भी नाविक उसके बराबर नाव नहीं खे सकता । एक दिन तिमोदी की भेंट एक अमीर नाविक से हो गई। तिमोदी उसके आगे भी अपनी डींग मारने लगा। अमीर नाविक भी उस्ताद खेवैया था। उसे भी अपनी ताकत पर गर्व था। गरीब तिमोदी की बात अमीर को पसन्द नहीं आयी। उसने तिमोदी को बाजी के लिए ललकारा। तिमोदी भी पीछे हटने वाला नहीं था। अमीर की चुनौती उसने स्वीकार कर ली। शर्त यह थी कि दोनों अपनी-अपनी नाव को लोमोलोमो के तट से वीतीलेवू के तट तक दौड़ाएं। जिसकी नाव बीतीलेवू का तट सबसे पहले छू लेगी बह बाजी जीत जाएगा । शर्त दस नाव की थी। हारा नाविक दस नाव विजयी को देगा अथवा अमानत के तौर पर अपने दोनों हाथ विजयी के यहां तब तक गिरवी रख देगा, जब तक कि दस नाव लाकर न दे देगा । शर्त दोनों को मंजूर थी। बाजी के लिए दिन और समय निश्चित हो गया।

निश्चित दिन दोनों नाविक अपनी-अपनी नाव लेकर लोमोलोमो के तट पर पहुंच गये। निश्चित समय पर दोनों ने नावें खेनी शुरू कीं। उसी समय समुद्र में एक जोर की लहर आयी और तिमोदी की नाव उलट गई। जब तक वह उसे सीधी करे तब तक अमीर खेवैया बड़ी दूर निकल गया धा। बाजी अमीर के हाथ रही। तिमोदी हार गया। शर्त के अनुसार उसे दस नाव देनी थीं। लेकिन वह गरीब था और उसके पास केवल एक ही नाव थी। अब तो उसे अपने दोनों हाथ अमीर नाविक के पास रहन रखने पड़े।

दस नाव खरीदकर अपने हाथों को लौटा लेने की चिन्ता में तिमोदी घर से निकल पड़ा। उसे तो अब खाना भी नसीब नहीं था क्योंकि बिना हाथ के न वह मछली ही पकड़ सकता था, न कंद-मूल ही खोदकर ला सकता था। वह तीन-चार दिन भूखा ही रहा। उसे फल तक खाने को नसीब न हुए। वह फल-फूल की तलाश में जंगल जा पहुंचा । लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी। पांचवें दिन भी बेचारा भूखा-प्यासा जंगल में भटकता रहा। अब वह बहुत थक चुका था और उसमें चलने की हिम्मत भी नहीं रही थी, वह एक पेड़ के नीचे बैठकर बिलख-बिलखकर रोने लगा।

उधर तटों की सैर करते हुए भगवान शंकर माता पार्वती के साथ उसी जंगल में जा पहुंचे। उन्हें किसी के रोने की आवाज़ सुनाई पड़ी। संसारी प्राणी की आवाज सुनकर भगवान शंकर रुके नहीं, चलते रहे। लेकिन माता पार्वती बड़ी द्रवीभूत हुईं। उनसे रहा न गया। उन्होंने दौड़कर भोलेनाथ का हाथ पकड़ लिया और कहने लगीं-“महाराज, किसी दुखिया के रोने की आवाज़ आ रही है। हमें चलकर पता लगाना चाहिए ।”

“नहीं, गौरी!” भोले बाबा ने कहा, “हमें तो इस माया-मोह से दूर ही रहना है। हम क्योंह इस फसाद में पड़ें! चलो, अब हमें कैलाश पर पहुंचना है।”

रोने की आवाज़ बराबर आती रही। गौरी मैया अपने आपको रोक न सकी और भोलेनाथ को मनाकर उस पेड़ के नीचे ले गईं जहां पर बैठा हुआ तिमोदी रो रहा था। भगवान शंकर तिमोदी से बोले-“भाई, तू रोता क्यों है? तेरे हाथ कहां गये?”

तिमोदी ने उन्हें अपनी रामकहानी सुनायी, “प्रभु, अमीर नाविक से मैं दस नाव हार गया । लेकिन मेरे पास नाव थीं नहीं कि मैं उसे देता। अतः उसने मेरे हाथ तब तक के लिए रहन रख लिए जब तक कि मैं दस नाव उसे कहीं से लाकर नहीं दे देता। मैं बहुत गरीब और अनाथ हूं। मेरे आगे-पीछे कोई नहीं है जो मुझे भोजन दे सके । आज पांच दिन हो गये हैं, मैं भूखा-प्यासा इस जंगल में भटक रहा हूं। मुझमें चलने की शक्ति भी अब नहीं रही। चारों तरफ से निराश होकर मैं यहां बैठकर रोने लगा हूं।

भगवान शंकर को तिमोदी पर दया आ गई। उन्होंने तेज्ञ हवा चलाकर वहां फलों का ढेर लगा दिया। फिर भगवान ने धरती पर ज़ोर से अपना पांव लटका और वहां पानी की एक धारा फूट निकली। लहलहाते हुए जल और पके हुए खुशबूदार फलों को देखकर तिमोदी बड़ा प्रसन्नर हुआ और भगवान शंकर की जय-जयकार करने लगा।

भगवान शंकर चले गये। माता पार्वती भी साथ ही लौट गईं। तिमोदी अब उसी पेड़ के नीचे भगवान शंकर की भक्ति करने लगा। वह समाधि में लीन हो गया । कुछ दिन बाद भगवान शंकर फिर माता पार्वती के साथ उसी जंगल में आ पहुंचे। उन्हें अपने भक्त को देखने की इच्छा भी थी। जब वह पेड़ के नीचे पहुंचे तो देखते हैं कि तिमोदी उनके ध्यान में लीन है। भगवान ने उसे दर्शन दिए और उसे ऐसे पेड़ों की खेती करने की सलाह दी जिसके फलों से पीने को पानी भी मिले और खाने को गरी भी ।

तिमोदी ने पूछा-“भगवन्‌, ऐसा कौन-सा पेड़ है जिसके फल में अमृत-सा जल भी हो और खाने के लिए स्वादिष्ट गरी भी?”

“ऐसा फल देने वाला पेड़ नारियल का होता है।” भगवान शंकर ने कहा।

“लेकिन प्रभु, वह हमें मिलेगा कहां से? और फिर मेरे पास बैल भी तो नहीं हैं, हाथ भी नहीं हैं, फिर खेती किससे और कैसे करूंगा?” तिमोदी ने सिर झुका भगवान शंकर से पूछा।

“चिन्ता नहीं करो वत्स, सब कुछ ठीक हो जाएगा। यह खेती बिन बैल के ही होगी।” इतना कह भगवती के साथ भगवान शंकर अंतर्ध्यान हो गये।

कैलाक्ष पर्वत पर पहुंचकर उन्होंने अपने बेटे गणेश को बुलाया और कहा-“बेटे, तुम इसी वक्तभ केरल (दक्षिण भारत) पहुंच जाओ और वहां से एक नारियल लेकर फिजी द्वीप पहुंचो। वहां के लोमोलोमो टापू में तिमोदी नाम का मेरा एक भक्त है, उसे नारियल देकर और उसके बोने की तरकीब बताकर चले आओ ।”

“जैसी आपकी आज्ञा, पिताजी!” कहकर गणेशजी ने उन्हें प्रणाम किया और केरल जा पहुंचे। वहां से एक नारियल लेकर केकड़े पर सवार हो गणेशजी सातों समुद्र पार फिजी द्वीप जा पहुंचे। तिमोदी उधर धूनी रमाये बैठा था। अतः गणेशजी को उसे ढूंढने में तकलीफ नहीं हुई । गणेशजी ने तिमोदी को नारियल दिया और उसे बोने की तरकीब भी बता दी। तत्पश्चात्‌ गणेशजी अपने धाम को लौट आये।

तिमोदी ने उस एक नारियल से अनेक नारियल पैदा किए।

धीरे-धीरे नारियल प्रशान्त महासागर के सभी द्वीपों में फैल गया। तिमोदी ने इन्हें बेचकर. बहुत-सा धन इकट्ठा कर लिया। उस धन से उसने अनेक नावें खरीदीं और उनमें से दस नाव उस अमीर खेवैये को देकर अपने हाथ वापस ले लिये और अपनी शादी कर सुख से रहने लगा!

कहा जाता है कि भगवान शंकर के तीन नेत्र हैं इसीलिए नारियल की खोपड़ी में भी तीन आंखें अथवा आंखों जैसे छिद्र होते हैं और सिर पर शिवजी की जटा के समान जटा भी होती है। और चूंकि गणेशजी केकड़े पर सवार होकर नारियल पहुंचाने के लिए फिजी द्वीप गए थे, इसीलिए आज भी सभी केकड़ों की पीठ पर गणेशजी की मूर्ति बनी होती है।

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