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Bharatiya Lok Kathayen-4 (भारतीय लोक कथाएँ-4)

चतुराई: भारतीय लोक-कथा

एक ग़रीब आदमी था। एक दिन वह राजा के पास गया और बोला- ‘महाराज, मैं आपसे कर्ज़ मांगने आया हूं। कृपा कर आप मुझे पांच हजार रुपये दें। मैं पांच वर्ष के अंदर आपके रुपये वापस कर दूंगा।’ राजा ने उसकी बात पर विश्वाास कर उसे पांच हजार रुपये दे दिए। पांच वर्ष बीत जाने के बाद भी जब उस व्य’क्ति ने राजा के पांच हजार रुपये नहीं लौटाये तब राजा को मजबूरन उसके घर जाना पड़ा। लेकिन वहां वह व्यतक्ति नहीं मिला। जब भी राजा वहां जाता बहाना बना कर उसे वापस भेज दिया जाता। एक दिन फिर राजा उस व्य क्ति के घर गया। वहां और कोई तो नहीं दिखा, एक छोटी लड़की बैठी थी। राजा ने उसी से पूछा- ‘तुम्हाररे पिता जी कहा हैं ?’

लड़की बोली- ‘पि‍ताजी स्व’र्ग का पानी रोकने गये हैं।’

राजा ने फिर पूछा- ‘तुम्हा रा भाई कहां है ?’

लड़की बोली- ‘बिना झगड़ा के झगड़ा करने गये हैं।’

राजा के समझ में एक भी बात नहीं आ रही थी। इसलिए वह फिर पूछता है- ‘तुम्हािरी माँ कहां है ?’

लड़की बोली- ‘मां एक से दो करने गई है।’

राजा उसके इन ऊल-जुलूल जवाब से खीझ गया। वह गुस्से’ में पूछता है- ‘और तुम यहां बैठी क्याभ कर रही हो ?’

लड़की हंसकर बोली- ‘मैं घर बैठी संसार देख रही हूं।’

राजा समझ गया कि लड़की उसकी किसी भी बात का सीधा जवाब नहीं देगी। इसलिए उसे अब इससे इन बातों का मतलब जानने के लिए प्याकर से बतियाना पड़ेगा। राजा ने चेहरे पर प्या र से मुस्कानन लाकर पूछा- ‘बेटी, तुमने जो अभी-अभी मेरे सवालों के जवाब दिये, उनका मतलब क्याआ है ? मैं तुम्हातरी एक भी बात का मतलब नहीं समझ सका। तुम मुझे सीधे-सीधे उनका मतलब समझाओ।’

लड़की ने भी मुस्कारा कर पूछा – ‘अगर मैं सभी बातों का मतलब समझा दूं तो आप मुझे क्याब देंगे ?’

राजा के मन में सारी बातों को जानने की तीव्र उत्कं ठा थी। वह बोला- ‘जो मांगोगी, वही दूंगा।’

तब लड़की बोली- ‘आप मेरे पिताजी का सारा कर्ज माफ कर देंगे तो मैं आपको सारी बातों का अर्थ बता दूंगी।’

राजा ने कहा- ‘ठीक है, मैं तुम्हाफरे पिताजी का सारा कर्ज माफ कर दूंगा। अब तो सारी बातों का अर्थ समझा दो।’

लड़की बोली- ‘महाराज, आज मैं आपको सारी बातों का अर्थ नहीं समझा सकती। कृपा कर आप कल आयें। कल मैं ज़रूर बता दूंगी।’

राजा अगले दिन फिर उस व्यूक्ति के घर गया। आज वहां सभी लोग मौजूद थे। वह आदमी, उसकी पत्नीअ, बेटा और उसकी बेटी भी। राजा को देखते ही लड़की पूछी- ‘महाराज, आपको अपना वचन याद है ना ? ‘

राजा बोला- ‘हां मुझे याद है। तुम अगर सारी बातों का अर्थ बता दो तो मैं तुम्हा,रे पिताजी का सारा कर्ज माफ कर दूंगा।’

लड़की बोली- ‘सबसे पहले मैंने यह कहा था कि पिताजी स्व र्ग का पानी रोकने गये हैं, इसका मतलब था कि वर्षा हो रही थी और हमारे घर की छत से पानी टपक रहा था। पिताजी पानी रोकने के लिए छत को छा (बना) रहे थे। यानि वर्षा का पानी आसमान से ही गिरता है और हमलोग तो यही मानते हैं कि आसमान में ही स्वरर्ग है। बस, पहली बात का अर्थ यही है। दूसरी बात मैंने कही थी कि भइया बिना झगडा़ के झगड़ा करने गये है। इसका मतलब था कि वे रेंगनी के कांटे को काटने गये थे। अगर कोई भी रेंगनी के कांटे को काटेगा तो उसके शरीर में जहां-तहां कांटा गड़ ही जायेगा, यानि झगड़ा नहीं करने पर भी झगड़ा होगा और शरीर पर खरोंचें आयेंगी। ‘

राजा उसकी बातों से सहमत हो गया। वह मन-ही-मन उसकी चतुराई की प्रशंसा करने लगा। उसने उत्सुउकता के साथ पूछा- ‘और तीसरी-चौथी बात का मतलब बेटी ? ‘

लड़की बोली- ‘महाराज, तीसरी बात मैंने कही थी कि माँ एक से दो करने गई है। इसका मतलब था कि माँ अरहर दाल को पीसने यानि उसे एक का दो करने गई है। अगर साबुत दाल को पीसा जाय तो एक दाना का दो भाग हो जाता है। यानि यही था एक का दो करना। रही चौथी बात तो उस समय मैं भात बना रही थी और उसमे से एक चावल निकाल कर देख रही थी कि भात पूरी तरह पका है कि नहीन। इसका मतलब है कि मैं एक चावल देखकर ही जान जाती कि पूरा चावल पका है कि नहीं । अर्थात् चावल के संसार को मैं घर बैठी देख रही थी।’ यह कहकर लड़की चुप हो गई।

राजा सारी बातों का अर्थ जान चुका था। उसे लड़की की बुद्धिमानी भरी बातों ने आश्चरर्य में डाल दिया था। फिर राजा ने कहा- ‘बेटी, तुम तो बहुत चतुर हो। पर एक बात समझ में नही आई कि यह सारी बातें तो तुम मुझे कल भी बता सकती थी, फिर तुमने मुझे आज क्यों। बुलाया ?’

लड़की हंसकर बोली- ‘ मैं तो बता ही चुकी हूं कि कल जब आप आये थे तो मैं भात बना रही थी। अगर मैं आपको अपनी बातों का मतलब समझाने लगती तो भात गीला हो जाता या जल जाता, तो माँ मुझे ज़रूर पीटती। फिर घर में कल कोई भी नही था। अगर मैं इनको बताती कि आपने कर्ज़ माफ कर दिया है तो ये मेरी बात का विश्वा स नहीं करते। आज स्वतयं आपके मुंह से सुनकर कि आपने कर्ज़ माफ कर दिया है, जहां इन्हें  इसका विश्वातस हो जायेगा, वहीं खुशी भी होगी। ‘

राजा लड़की की बात सुनकर बहुत ही प्रसन्नं हुआ। उसने अपने गले से मोतियों की माला निकाल उसे देते हुए कहा- ‘बेटी, यह लो अपनी चतुराई का पुरस्कायर! तुम्हाईरे पिताजी का कर्ज़ तो मैं माफ कर ही चुका हूं। अब तुम्हें  या तुम्हा रे घरवालों को मुझसे बहाना नहीं बनाना पड़ेगा। अब तुम लोग निश्चिंत होकर रहो। अगर फिर कभी किसी चीज की ज़रूरत हो तो बेझिझक होकर मुझसे कहना।’

इतना कहकर राजा लड़की को आशीर्वाद देकर चला गया। लड़की के परिवारवालों ने उसे खुशी से गले लगा लिया।

पंछी बोला चार पहर: लोक-कथा

पुराने समय की बात है। एक राजा था। वह बड़ा समझदार था और हर नई बात को जानने को इच्छुक रहता था। उसके महल के आंगनमें एक बकौली का पेड़ था। रात को रोज नियम से एक पक्षी उस पेड़ पर आकर बैठता और रात के चारों पहरों के लिए अलग-अलग चार तरह की बातें कहा करता। पहले पहर में कहता :

“किस मुख दूध पिलाऊं,

किस मुख दूध पिलाऊं”

दूसरा पहर लगते बोलता :

“ऐसा कहूं न दीख,

ऐसा कहूं न दीख !”

जब तीसरा पहर आता तो कहने लगता :

“अब हम करबू का,

अब हम करबू का ?”

जब चौथा पहर शुरू होता तो वह कहता :

“सब बम्मन मर जायें,

सब बम्मन मर जायें !”

राजा रोज रात को जागकर पक्षी के मुख से चारों पहरों की चार अलग-अलग बातें सुनता। सोचता, पक्षी क्या कहता ?पर उसकी समझ में कुछ न आता। राजा की चिन्ता बढ़ती गई। जब वह उसका अर्थ निकालने में असफल रहा तो हारकर उसने अपने पुरोहित को बुलाया। उसे सब हाल सुनाया और उससे पक्षी के प्रशनों का उत्तर पूछा। पुरोहित भी एक साथ उत्तर नहीं दे सका। उसने कुछ समय की मुलत मांगी और चिंतित होकर घर चला आया। उसके सिर में राजा की पूछी गई चारों बातें बराबर चक्कर काटती रहीं। वह बहुतेरा सोचता, पर उसे कोई जवाब न सूझता। अपने पति को हैरान देखकर ब्राह्रणी ने पूछा, “तुम इतने परेशान क्यों दीखते हो ? मुझे बताओ, बात क्या है ?”

ब्राह्मणी ने कहा, “क्या बताऊं ! एक बड़ी ही कठिन समस्या मेरे सामने आ खड़ी हुई है। राजा के महल का जो आंगन है, वहां रोज रात को एक पक्षी आता है और चारों पहरों मे नितय नियम से चार आलग-अलग बातें कहता है। राजा पक्षी की उन बातों का मतलब नहीं समझा तो उसने मुझसे उनका मतलब पूछा। पर पक्षी की पहेलियां मेरी समझ में भी नहीं आतीं। राजा को जाकर क्या जवाब दूं, बस इसी उधेड़-बुन में हूं।”

ब्राह्मणी बोली, “पक्षी कहता क्या है? जरा मुझे भी सुनाओ।”

ब्राह्मणी ने चारों पहरों की चारों बातें कह सुनायीं। सुनकर ब्राह्मणी बोली। “वाह, यह कौन कठिन बात है! इसका उत्तर तो मैं दे सकती हूं। चिंता मत करो। जाओ, राजा से जाकर कह दो कि पक्षी की बातों का मतलब मैं बताऊंगी।”

ब्राह्मण राजा के महल में गया और बोला, “महाराज, आप जो पक्षी के प्रश्नों के उत्तर जानना चाहते हैं, उनको मेरी स्त्री बता सकती है।”

पुरोहित की बात सुनकर राजा ने उसकी स्त्री को बुलाने के लिए पालकी भेजी। ब्राह्मणी आ गई। राजा-रानी ने उसे आदर से बिठाया। रात हुई तो पहले पहर पक्षी बोला:

“किस मुख दूध पिलाऊं,

किस मुख दूध पिलाऊं ?”

राजा ने कहा, “पंडितानी, सुन रही हो, पक्षी क्या बोलता है?”

वह बोली, “हां, महाराज ! सुन रहीं हूं। वह अधकट बात कहता है।”

राजा ने पूछा, “अधकट बात कैसी ?”

पंडितानी ने उत्तर दिया, “राजन्, सुनो, पूरी बात इस प्रकार है-

लंका में रावण भयो बीस भुजा दश शीश,

माता ओ की जा कहे, किस मुख दूध पिलाऊं।

किस मुख दूध पिलाऊं ?”

लंका में रावण ने जन्म लिया है, उसकी बीस भुजाएं हैं और दश शीश हैं। उसकी माता कहती है कि उसे उसके कौन-से मुख से दूध पिलाऊं?”

राज बोला, “बहुत ठीक ! बहुत ठीक ! तुमने सही अर्थ लगा लिया।”

दूसरा पहर हुआ तो पक्षी कहने लगा :

ऐसो कहूं न दीख,

ऐसो कहूं न दीख।

राजा बोला, ‘पंडितानी, इसका क्या अर्थ है ?”

पडितानी ने समझाया, “महाराज ! सुनो, पक्षी बोलता है :

“घर जम्ब नव दीप

बिना चिंता को आदमी,

ऐसो कहूं न दीख,

ऐसो कहूं न दीख !”

चारों दिशा, सारी पृथ्वी, नवखण्ड, सभी छान डालो, पर बिना चिंता का आदमी नहीं मिलेगा। मनुष्य को कोई-न-कोई चिंता हर समय लगी ही रहती है। कहिये, महाराज! सच है या नहीं ?”

राजा बोला, “तुम ठीक कहती हो।”

तीसरा पहर लगा तो पक्षी ने रोज की तरह अपी बात को दोहराया :

“अब हम करबू का,

अब हम करबू का ?”

ब्राह्मणी राजा से बोली, “महाराज, इसका मर्म भी मैं आपको बतला देती हूं। सुनिये:

पांच वर्ष की कन्या साठे दई ब्याह,

बैठी करम बिसूरती, अब हम करबू का,

अब हम करबू का।

पांच वर्ष की कन्या को साठ वर्ष के बूढ़े के गले बांध दो तो बेचारी अपना करम पीट कर यही कहेगी-‘अब हम करबू का, अब हम करबू का ?” सही है न, महाराज !”

राजा बोला, “पंडितानी, तुम्हारी यह बात भी सही लगी।”

चौथा पहर हुआ तो पक्षी ने चोंच खोली :

“सब बम्मन मर जायें,

सब बम्मन मर जायें !”

तभी राज ने ब्राह्मणी से कहा, “सुनो, पंडितानी, पक्षी जो कुछ कह रहा है, क्या वह उचित है ?”

ब्रहाणी मुस्कायी और कहने लगी, “महाराज ! मैंने पहले ही कहा है कि पक्षी अधकट बात कहता है। वह तो ऐसे सब ब्राह्मणों के मरने की बात कहता है :

विश्वा संगत जो करें सुरा मांस जो खायें,

बिना सपरे भोजन करें, वै सब बम्मन मर जायें

वै सब बम्मन मर जायें।

जो ब्राह्मणी वेश्या की संगति करते हैं, सुरा ओर मांस का सेवन करते हैं और बिना स्नान किये भोजन करते हैं, ऐसे सब ब्राह्मणों का मर जाना ही उचित है। जब बोलिये, पक्षी का कहना ठीक है या नहीं ?”

राजा ने कहा, “तुम्हारी चारों बातें बावन तोला, पाव रत्ती ठीक लगीं। तुम्हारी बुद्धि धन्य है !”

राजा-रानी ने उसको बढ़िया कपड़े और गहने देकर मान-सम्मान से विदा किया। अब पुरोहित का आदर भी राजदरबार में पहले से अधिक बढ़ गया।

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