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Bharatiya Lok Kathayen-8 (भारतीय लोक कथाएँ-8)

कमल का फूल: (भारतीय लोक-कथा)

कमल के सम्बन्ध में अनेक विश्वास, मिथक एवं किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। इनमें कहीं इसे एक प्रेमी युवक बताया गया है और कहीं इसे स्वर्ग का देवता कहा गया है। एक रोचक किंवदन्ती के अनुसार कमल एक अभिशप्त प्रेमी है।

बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव में एक नवयुवक रहता था। वह बहुत हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर था। उसके माता-पिता दोनों मर चुके थे। बस एक बड़ा भाई था। युवक के पास माता-पिता की दी हुई थोड़ी-सी जमीन थी। उसी पर वह अपने भाई के साथ खेती करता था। युवक और उसका बड़ा भाई दोनों बहुत मेहनत करते थे। वे खेती किसानी के साथ ही मेहनत-मजदूरी भी करते थे । लेकिन इतना सब करने के बाद भी दोनों का गुजर-बसर बहुत कठिनाई से होता था।

एक बार युवक गाँव के जमींदार के खेतों में पानी दे रहा था। सुबह का समय था। जमींदार के खेत गाँव के बाहर थे और खेतों के पास एक बड़ा-सा मैदान था। मेलों और त्योहारों के समय गाँव के लोग इसी मैदान में एकत्रित होते थे। कभी-कभी इस मैदान में बंजारे भी आ जाते थे और अपने डेरे लगा लेते थे। बंजारे कुछ दिन गाँव में रुकते और फिर आगे बढ़ जाते थे।

जमींदार के खेतों में एक बड़ा कुआँ था। युवक कुएँ से पानी खींचता और पास की नाली में डाल देता। नाली खेतों के बीच से होकर गुजरती थी। अतः पानी खेतों में पहुँच जाता था। युवक पूरे तन-मन से काम कर रहा था। अचानक उसे लगा कि कोई उसके पास खड़ा है। युवक ने पीछे मुड़कर देखा। उसके सामने एक बंजारन हाथ में मटका लिए खड़ी थी। युवक ने बंजारन को देखा तो, देखता ही रह गया। बंजारन पन्द्रह-सोलह वर्ष की थी और बहुत सुन्दर थी। युवक ने आज तक कभी इतनी सुन्दर लड़की नहीं देखी थी।

बंजारन युवक को बड़ी देर से देख रही थी। उसने अपने जीवन में इतना हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर युवक कभी नहीं देखा था। बंजारन युवक के पास पानी लेने आई थी, लेकिन वह उस पर इतनी मुग्ध हो गई कि पानी माँगना भूल गई थी और उसे एकटक देखे जा रही थी।

युवक ने बंजारन को अपनी ओर प्यार भरी नजरों से एकटक घूरते हुए देखा तो घबरा गया। उसके हाथ से रस्सी छूट गई और बाल्टी सहित कुएँ में जा गिरी।

बंजारन ने युवक की यह स्थिति देखी तो खिलखिलाकर हँस पड़ी। उसने युवक से कोई बात नहीं की और दौड़ती हुई अपने डेरे में आ गई। उसने डेरे से एक पतली रस्सी और काँटा उठाया और युवक के पास वापस आ गई।

युवक अब अपने पर पूरी तरह नियन्त्रण कर चुका था। वह मुस्करा रहा था और बंजारन को बड़े प्यार से देख रहा था।

बंजारन ने काँटा कुएँ के भीतर डाला और कुछ ही क्षणों में रस्सी और बाल्टी बाहर निकाल दी।

युवक बंजारन की आँखों की भाषा समझ चुका था। उसने बंजारन का घड़ा भरा और बिना कोई बात किए रस्सी-बाल्टी लेकर अपने घर आ गया।

युवक को रातभर नींद नहीं आई। वह सारी रात आँखें बन्द किए बंजारन के बारे में सोचता रहा। बंजारन बहुत सुन्दर थी।

अगले दिन प्रातःकाल युवक पुनः जमींदार के खेतों में पानी देने के लिए कुएँ पर आ पहुँचा। उसकी आँखें अलसाई हुई थीं और आज उनमें पहले जैसी ताजगी नहीं थी।

युवक ने कुएँ पर पहुँचकर अभी एक बाल्टी पानी भरा था कि बंजारन पुनः आ गई। ऐसा लगता था कि वह अपने डेरे के पास खड़ी उसी की राह देख रही थी।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा और आँखों ही आँखों में बहुत-सी बातें हो गईं।

युवक के मन की बात जानने के बाद बंजारन उसे अपने डेरे में ले आई और उसे अपने बापू से मिलाया।

बंजारन का बापू बहुत लालची आदमी था। उसे जब यह मालूम हुआ कि युवक एक गरीब किसान है, तो उसने उसके साथ बंजारन का विवाह करने से साफ मना कर दिया। लेकिन बंजारन की माँ के बहुत समझाने पर वह इस शर्त पर अपनी बेटी का विवाह करने के लिए तैयार हुआ कि ग्रामीण युवक उसे पाँच सौ चाँदी के सिक्के लाकर देगा। बंजारन के बापू ने युवक से साफ-साफ कह दिया कि पाँच माह बाद नवदुर्गा की अष्टमी के दिन कामाख्या मन्दिर में वह बकरे की बलि चढ़ाएगा। इस दिन तक यदि उसे चाँदी के सिक्के मिल जाएँगे तो वह कामाख्या मन्दिर में ही अपनी बेटी का विवाह कर देगा और यदि युवक चाँदी के सिक्के नहीं ला सका तो वह अपनी बेटी किसी और को सौंप देगा।

युवक ने बंजारन के बापू की शर्त मान ली। वह शरीर से हृष्ट-पुष्ट और मजबूत होने के साथ ही बड़ा साहसी भी था। उसे विश्वास था कि वह किसी तरह मेहनत-मजदूरी करके चाँदी के पाँच सौ सिक्के इकट्ठे कर लेगा।

बंजारे तीन दिन गाँव में रुककर चले गए। उनके साथ बंजारन भी चली गई। ग्रामीण युवक अपनी बंजारन को जाते हुए देखता रहा। बंजारन भी उसे बार-बार मुड़-मुड़कर देख रही थी।

बंजारन के जाने के बाद युवक अपने घर आ गया। उसे पाँच महीने में पाँच सौ चाँदी के सिक्के कमाने थे। युवक ने बहुत सोच-विचार किया। इतना धन उसे केवल जमींदार ही दे सकता था।

अगले दिन युवक जमींदार की हवेली पहुँचा और उसने जमींदार को अपनी समस्या बताई। जमींदार ने उसकी बात बड़े ध्यान से सुनी। वह युवक को सौ सिक्के प्रतिमाह इस शर्त पर देने के लिए तैयार हो गया कि वह दिन-रात जमींदार का काम करेगा और सभी तरह के काम करेगा।

युवक ने जमींदार की बात मान ली और जमींदार की सेवा में लग गया | युवक बहुत मेहनती था | वह दिनभर जमींदार के खेतों में काम करता और रात को जमींदार की हवेली में आ जाता। और जमींदार उसे जो भी काम देता, वह करता। दिन-रात मेहनत करने के बाद युवक बीमार भी पड़ा, किन्तु उसने बीमारी में भी जमींदार के सभी कार्य किए।

धीरे-धीरे एक महीना हो गया।

युवक अपने चाँदी के सौ सिक्के लेने जमींदार के पास पहुँचा, लेकिन जमींदार ने चौँदी के सिक्के देने से इनकार कर दिया। उसने युवक से साफ कह दिया कि उसकी इस तरह की कोई बात उसके साथ नहीं हुई थी।

युवक को क्रोध आ गया। उसने जमींदार को बहुत बुरा-भल्ना कहा और उसे उठाकर पत्थर की एक चट्टान पर पटक दिया । इससे जमींदार का सिर फट गया और वह मर गया।

इसी समय जमींदार के घरवाले और उसके नौकर-चाकर आ गए। लेकिन इसके पहले कि वह युवक को पकड़ पाते, वह भाग निकला।

जमींदार के नौकरों ने उसका पीछा किया, किन्तु वे युवक को पकड़ नहीं सके और खाली हाथ वापस आ गए।

युवक भागता रहा, भागता रहा और भागते-भागते बंगाल आ पहुँचा । यह एक नया स्थान था। युवक को लगा कि वह यहाँ सरलता से चाँदी के पाँच सौ सिक्के कमा लेगा और अपनी बंजारन को ले आएगा और यहीं बस जाएगा। उसके लिए अब गाँव वापस लौटना खतरे से खाली नहीं था।

युवक को काम की खोज करते-करते तीन दिन हो गए। लेकिन उसे कहीं कोई काम नहीं मिला। इस बीच उसने कुछ भी खाया-पिया नहीं था, अतः भूख से उसकी हालत खराब हो रही थी।

चौथे दिन प्रातः युवक एक बगीचे में बैठा हुआ कुछ सोच रहा था। इसी समय उसके पास एक सुन्दर युवती आकर खड़ी हो गई और उसे देखकर मुस्कराने लगी।

युवक को लगा कि वह स्त्री उसकी कुछ सहायता करना चाहती है। उसने उसे अपने पास बैठाया और सारी बातें बता दीं।

सुन्दर स्त्री ने युवक की बातें बड़े ध्यान से सुनीं। उसने उसे सभी प्रकार से सहायता करने का विश्वास दिलाया और अपने महल में ले आई। सुन्दर स्त्री का महल बड़ा आलीशान था।

सुन्दर स्त्री ने युवक को भोजन कराया और आराम करने के लिए एक शानदार बिस्तर दिया।

युवक बहुत थका था। अतः भोजन करने के बाद उसे नींद आ गई।

युवक कब तक सोता रहा, इसका उसे पता ही नहीं चला, लेकिन जब उसकी आँख खुली तो आधी रात हो चुकी थी। चन्द्रमा का हल्का प्रकाश एक खिड़की से कमरे के भीतर आ रहा था।

युवक उठकर खड़ा हो गया। उसने इधर-उधर देखा। सुन्दर स्त्री का कहीं पता नहीं था। युवक को बड़ा आश्चर्य हुआ।

अचानक युवक के कानों से सुन्दर स्त्री के गाने की आवाज टकराई । इस आवाज में गजब का आकर्षण था। युवक को ऐसा लगा कि मस्ती भरा गीत गाकर वह उसे बुला रही है।

युवक अपने पर नियन्त्रण नहीं रख सका और आवाज की ओर बढ़ा। कुछ कदम चलने के बाद युवक ने देखा कि भरपूर श्रृंगार किए सुन्दर स्त्री आईने के सामने खड़ी अपना रूप निहार रही है।

सुन्दर स्त्री ने आईने में युवक को देख लिया। वह उसकी ओर मुस्कराते हुए बढ़ी और उससे लिपट गई तथा उसे अपने पलंग पर ले आई।

युवक की समझ में कुछ नहीं आ रहा था। फिर भी वह यह तो समझ ही गया था कि सुन्दर युवती उससे क्याम चाहती है।

इसी समय सुन्दर युवती ने उससे कहा कि यदि वह उसका साथ दे तो वह उसे अगले दिन ही चाँदी के पाँच सौ सिक्के देगी।

युवक के हृदय में बंजारन बसी थी। वह किसी स्त्री के साथ सोना नहीं चाहता था। लेकिन अपनी बंजारन को पाने के लिए उसने सुन्दर युवती की बात मान ली।

अगले दिन फिर यही हुआ। युवक दिन भर सोया और आधी रात के बाद उठा। उसे सुन्दर युवती सोलह श्रृंगार किए प्रतीक्षा करती मिली। उसने उससे कहा कि बस वह एक रात का सुख उसे और दे दे। इसके बाद वह उसे चाँदी के पाँच सौ सिक्केक दे देगी।

धीरे-धीरे चार महीने हो गए। सुन्दर स्त्री युवक को रोज आधी रात के बाद छलती और उससे अगले दिन चाँदी के पाँच सौ सिक्के देने का झूठा वादा कर देती।

युवक के लिए अब और प्रतीक्षा करना कठिन हो रहा था। एक रात उसने सुन्दर स्त्री का साथ देने से मना कर दिया। सुन्दर युवती ने उसे बहुत समझाया। उसके समझाने का जब युवक पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा तो उसने तरह-तरह की धमकियाँ दीं । जब धमकियों का भी युवक पर असर नहीं हुआ तो वह क्रोध में आ गई और उसने रौद्र रूप धारण कर लिया।

वास्तव में सुन्दर युवती एक जादूगरनी थी। उसे जब लगा कि युवक उसकी बात किसी कीमत पर नहीं मानेगा तो उसने अपनी जादुई शक्ति से उसे एक फूल बना दिया और अपने बगीचे के तालाब में लगा दिया।

इधर बंजारन ने युवक की पाँच माह तक प्रतीक्षा की, लेकिन जब युवक नहीं आया तो वह उसकी खोज में निकल पड़ी।

एक दिन अचानक बंजारन जादूगरनी के महल में आ पहुँची | प्रातःकाल का समय था। जादूगरनी अलसाई-सी महल के एक कमरे से बाहर देख रही थी। उसने एक बंजारन को अपने महल के सामने देखा तो उसे शक हुआ कि कहीं यह वही बंजारन तो नहीं है?

बंजारन को देखते-देखते जादूगरनी के मन में यह विचार आया कि बंजारन को बहला-फुसलाकर महल में रोक लिया जाए और उसकी सहायता से युवक के साथ मनमानी की जाए।

यह विचार आते ही जादूगरनी महल के द्वार पर आई और बंजारन को महल के भीतर ले गई। उसने बंजारन को युवक की पूरी कहानी बताई। उसने बंजारन को यह भी विश्वास दिलाया कि वह आज की रात ही उसे उसके प्रेमी से मिलवा देगी। लेकिन उसने उसे यह नहीं बताया कि उसने युवक को कमल का फूल बनाकर बगीचे के तालाब में लगा दिया है।

बंजारन खुश हो गई। उसे लगा कि सामने खड़ी स्त्री एक देवी है और वह उसकी इच्छा अवश्य पूरी कर देगी।

जादूगरनी ने बंजारन से दिनभर अच्छी-अच्छी बातें कीं और उसके प्रेमी युवक की बहुत प्रशंसा की। उसे जब लगा कि बंजारन उसके जाल में पूरी तरह फँस चुकी है तो उसने बंजारन से कहा कि वह भी उस युवक को बहुत प्यार करती है, अतः दोनों को उसका प्यार बराबर-बराबर मिलना चाहिए।

बंजारन को जादूगरनी से ऐसी आशा नहीं थी। वह सब कुछ बाँट सकती थी, लेकिन अपना प्यार नहीं बाँट सकती थी। वह अपना प्यार पाने के लिए ही अपना घर-बार छोड़कर आई थी।

जादूगरनी ने बंजारन को समझाने का बहुत प्रयास किया, किन्तु बंजारन नहीं मानी और भड़क उठी।

जादूगरनी को भी क्रोध आ गया। उसने अपने जादू से बंजारन को एक कीड़ा बना दिया।

बंजारन को सब समझते देर नहीं लगी। लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। फिर भी वह खिड़की के रास्ते महल के बाहर आ गई।

इसी समय कीड़ा बनी बंजारन के कानों से उसके प्रेमी युवक की आवाज टकराई। यह आवाज उसे अपने पास बुला रही थी। बंजारन ने इधर-उधर देखा। यह आवाज महल के तालाब में खिल रहे एक कमल से आ रही थी।

बंजारन की समझ में सब आ गया। जादूगरनी ने उसके प्रेमी को कमल बना दिया था। वह तेजी से कमल के पास पहुँची और उसमें समा गई। इसी समय खिला हुआ कमल बन्द हो गया।

जादूगरनी बहुत क्रोध में थी। वह कीड़ा बनी बंजारन को ढूँढ़ते-दूँढ़ते बगीचे के तालाब तक आ गई, लेकिन उसे वह नहीं मिली।

इसी समय कमल मुरझाया और अपने भीतर कीड़ा बनी बंजारन को लिए हुए पानी में समा गया।

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