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Uttar Pradesh ki Lok Kathayen-6 (उत्तर प्रदेश की लोक कथाएँ-6)

टेसू और झेंझी का प्रेम विवाह: उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

यह तो किसी को नहीं मालूम कि टेसू और झेंझीं के विवाह की लोक परंपरा कब से पड़ी पर यह अनोखी, लोकरंजक और अद्भुद है परंपरा बृजभूमि को अलग पहचान दिलाती है,जो बृजभूमि से सारे उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड तक गांव गांव तक पहुंच गई थी जो अब आधुनिकता के चक्कर में और बड़े होने के भ्रम में भुला दी गई है।इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह परंपरा महाभारत के बीत जाने के बाद प्रारम्भ हुई होगी।क्योंकि यह लोकजीवन में प्रेम कहानी के रूप में प्रचारित हुई थी इसलिए यह इस समाज की सरलता और महानता प्रदर्शित करती है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो युद्ध के दुखद पृष्ठभूमि में परवान चढ़ने से पहले ही मिटा दी गई।यह महा पराक्रमी भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की कहानी है जो टेसू के रूप में मनाई जाती है ।नाक, कान व मुंह कौड़ी के बनाए जाते हैं।

जिन्हें लड़कियां रोज सुबह पानी से उसे जगाने का प्रयास करती हैं। विवाह के बाद टेसू का सिर उखाड़ने के बाद लोग इन कौड़ियों को अपने पास रख लेते हैं। कहते हैं कि इन सिद्ध कौड़ियों से मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं।

विजयादशमी के दिन से शुरू होकर यह शादी का उत्सव यद्यपि केवल पांच दिन ही चलता है और कार्तिक पूर्णिमा को शादी सम्पन्न हो जाने के साथ ही समाप्त हो जाता है किंतु हैम उम्र बच्चे इसकी तैयारी पूरी साल करते हैं।कानपुर से लेकर झांसी तक और कानपुर से उरई होते हुए इटावा तक और बृजभूमि से राजस्थान के कुछ गांवों में होती हुई मुरैना में यह प्रथा घुसती है और भिण्ड होते हुए दोनों ओर से बुंदेली धरती पर परंपरागत रूप से टेसू गीत गूंजने लगता थे। अपने कटे सिर से महाभारत को देखने वाले बर्बरीक की अधूरी प्रेम कहानी को पूरा कराकर भविष्य के नव जोड़ों के लिए राह प्रशस्त करने की ब्रज क्षेत्र में प्रचलित टेसू झांझी की परंपरा को मध्य उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड की धरती सहेज रही है। कहीं बाकायदा कार्ड छपवाकर लोगों को नेह निमंत्रण दिया जाता है तो कहीं आज भी बैंड बाजा के साथ बरात पहुंचती है और टेसू का द्वारचार के साथ स्वागत किया जाता है। कहीं झांझी, कहीं झेंझी तो कहीं झिंझिया या झूंझिया, अलग-अलग नाम से जानी जाने वाली इस परंपरा का भाव समान है। टेसू-झांझी के विवाह के बाद ही इस क्षेत्र में शहनाई बजने की शुरुआत होती है।

ब्रज के घर-घर में टेसू झांझी के विवाह की मनाई जाने वाली परंपरा का उल्लास औरैया के दिबियापुर में भी पालन होता है। यहां टेसू झांझी के विवाह में सारी रस्में निभाई जाती हैं। लोग मिलकर टेसू और झांझी तैयार करते हैं। बाकायदा कार्ड छपवाया जाता है। जनाती होते हैं, बराती होते हैं। बैंड बाजा लेकर टेसू की बारात इलाके में घूमती है और बाराती नाचते हुए झांझी के घर पहुंचते हैं। टेसू का द्वारचार से स्वागत होता है। विवाह की रस्म की जाती है। झांझी की पैर पुजाई होती है। इसके बाद कन्यादान किया जाता है। झांझी की ओर से आए लोग व्यवहार लिखाते हैं। प्रीतिभोज भी दिया जाता है।

एक दौर था जब गांव में छोटे छोटे बच्चे – बच्चियां टेसू-झांझी लेकर घर-घर से निकलते थे और गाना गाकर चंदा मांगते थे। इसके लिए टेसू झांझी समिति बनाई। हर साल कोई एक परिवार झांझी के लिए जनाती बनता और एक परिवार टेसू की तरफ से बराती। कुछ इलाकों में शरद पूर्णिमा के दिन बृहद स्तर पर आयोजन होते । गांव-कस्बा, हर जगह आयोजन होता है। ट्रैक्टरों से बारात निकलती है। शहर में रथ व कारों के काफिले की बारात होती है। लोग यह भी मानते हैं कि अगर किसी लड़के की शादी में अड़चन आ रही है तो तीन साल झांझी का विवाह कराए, लड़की की शादी में दिक्कत आ रही है तो टेसू का विवाह कराने का संकल्प लेते हैं। कुंभकार ही टेसू झांझी बनाते हैं और लोग उनसे ले जाते हैं। इसके बाद शरद पूर्णिमा को झांझी की शोभायात्रा निकाली जाती है। दशहरा पर रावण के पुतले का दहन होते ही, बच्चे टेसू लेकर निकल पड़ते हैं और द्वार-द्वार टेसू के गीतों के साथ नेग मांगते हैं, वहां लड़कियों की टोली घर के आसपास झांझी के साथ नेग मांगने निकलती थे।

अब समय के साथ बदलाव आया है। अब कम लोग ही इस पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। कानपुर देहात के ग्रामीण इलाके हों या फिर शहरी, यहां सामूहिक आयोजन भले न हो लेकिन घर-घर में टेसू झांझी का विवाह होता था। मान्यता थी कि इस विवाह के बाद अन्य वैवाहिक कार्यक्रमों में कोई अड़चन नहीं आती। शरद पूर्णिमा की रात में मनाए जाने वाले इस विवाह समारोह में महिलाएं मंगलगीत गाती थीं। किवदंती हैं कि भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को महाभारत का युद्ध देखने आते समय झांझी से प्रेम हो गया। उन्होंने युद्ध से लौटकर झांझी से विवाह करने का वचन दिया, लेकिन अपनी मां को दिए वचन, कि हारने वाले पक्ष की तरफ से वह युद्ध करेंगे के चलते वह कौरवों की तरफ से युद्ध करने आ गए और श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काट दिया। वरदान के चलते सिर कटने के बाद भी वह जीवित रहे। युद्ध के बाद मां ने विवाह के लिए मना कर दिया। इस पर बर्बरीक ने जल समाधि ले ली। झांझी उसी नदी किनारे टेर लगाती रही लेकिन वह लौट कर नहीं आए।

इधर “टेसू अटर करें, टेसू मटर करें, टेसू लई के टरें… यह गाना गाते हुए लड़कों की टोली उधर झांझी के विवाह की तैयारियों में जुटे किशोरियाँ भी झेंझीं गीत गातीं प्रयास किये जाते कि शादी से पहले झेंझी के एक झलक किसी भी प्रकार से टेसू को मिल जाएं।पर मजाल क्या की लड़कियां यह सब होने देतीं। दशहरा मेला में लड़कियां झांझी और लड़के टेसू के नाम की मटकी खरीदकर लाते थे। झांझी कन्या के रूप में टेसू को राजा के रूप में रंग कर टेसू वाली मटकी में अनाज भर कर एक दीया जलाते थे और घर घर जाकर अनाज और धन इकट्ठा करते थे। लोग बच्चों को इस आयोजन में खुले दिल से सहयोग करते और विवाह की रात पूरा साथ देते थे। सामाजिक सद्भाव नक यह परवे था। हर घर का अनाज और पैसा एक साथ मिलकर एक हो जाता है। न कोई ऊंचा न कोई नीचा। लड़कियों में अजब उल्लास रहता था तो लड़कों में भी। लड़कियों को भी उतना ही सहयोग दिया जाता था, जितना लड़कों को। गांव के बड़े लोग शामिल होते थे। कुछ लोग बराती बनते थे, कुछ लोग जनाती। फिर दशहरा से लेकर चतुर्दशी तक तैयारी चलती थी। रात में स्त्रियां और बच्चे इकट्ठा होते थे। नाच गाना होता था। बरात आती थी। खील, बताशे, रेवड़ी बांटी जाती थी।आतिशबाजी होती और फिर अंगले वर्ष के लिए यह समारोह चला जाता।

अड़ता रहा टेसू, नाचती रही झेंझी : – ‘टेसू गया टेसन से पानी पिया बेसन से…’, ‘नाच मेरी झिंझरिया…’ आदि गीतों को गाकर उछलती-कूदती बच्चों की टोली आपने जरूर देखी होगी। हाथों में पुतला और तेल का दीपक लिए यह टोली घर-घर जाकर चंदे के लिए पैसे मांगती है। कोई इन्हें अपने द्वार से खाली हाथ ही लौटा देता है, तो कहीं ये गाने गाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं।

ऐसे होता है विवाह :- टेसू-झेंझी नामक यह खेल बच्चों द्वारा नवमी से पूर्णमासी तक खेला जाता है। इससे पहले 16 दिन तक बालिकाएं गोबर से चांद-तरैयां व सांझी माता बनाकर सांझी खेलती हैं। वहीं नवमी को सुअटा की प्रतिमा बनाकर टेसू-झेंझी के विवाह की तैयारियों में लग जाती हैं। पूर्णमासी की रात को टेसू-झेंझी का विवाह पूरे उत्साह के साथ बच्चों द्वारा किया जाता है। वहीं मोहल्ले की महिलाएं व बड़े-बुजुर्ग भी इस उत्सव में भाग लेते थे। प्रेम के प्रतीक इस विवाह में प्रेमी जोड़े के विरह को बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया जाता है।

हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार लड़के थाली-चम्मच बजाकर टेसू की बारात निकालते हैं। वहीं लड़कियां भी शरमाती-सकुचाती झिंझिया रानी को भी विवाह मंडप में ले आती हैं। फिर शुरू होता है ढोलक की थाप पर मंगल गीतों के साथ टेसू-झेंझी का विवाह। सात फेरे पूरे भी नहीं हो पाते और लड़के टेसू का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। वहीं झेंझी भी अंत में पति वियोग में सती हो जाती है।

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