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Andhra Pradesh ki Lok Kathayen-2 (आंध्र प्रदेश की लोक कथाएँ-2)

मलण्णा का बैल: आंध्र प्रदेश की लोक कथा

मलण्णा किसान का बैल खो गया। अब बैल जैसे जीव को खोजा भी कैसे जाए ? बेचारे किसान ने जमीन- आसमान एक कर दिया।

कुछ दिन की तंगी के बाद मलण्णा ने पत्नी से कहा-

‘अरी भाग्यवान ! बैल के बिना हल नहीं चलेगा, हल नहीं चला तो खेती नहीं होगी, खेती नहीं हुई तो अनाज कहाँ से आएगा, अनाज न आया तो पेट कैसे भरेगा ?’

मलण्णा की पत्नी बेहद चतुर थी। पति से बोली, ‘बैल तो खरीद ही लेते हैं परंतु तुम ठहरे बुद्धूराम । मैं भी साथ चलूँगी।’

मलण्णा को क्या आपत्ति हो सकती थी। दोनों बैल खरीदने जा पहुँचे। मेले में घूमते-घूमते मलण्णा की पत्नी ने अपना बैल पहचान लिया। चोर महाशय बैल बेचने आए थे। मलण्णा ने बैल पर अपना दाबा जताया तो अच्छी खासी बहस हो गई। चोर अपनी बात पर अड़ा था। बार-बार यही कहता था-

‘तुम्हारा बैल मेरे बैल का हमशक्ल होगा।’

तभी मलण्णा की पत्नी ने बैल की आँखें ढाँपकर कहा-

‘यदि यह तुम्हारा बैल है तो जल्दी बताओ, यह किस आँख से काना है ?’

चोर ने चतुराई दिखाई और झट से बोला, ‘इसकी बाईं आँख खराब है।’

‘अच्छी तरह सोच लो, पछताओगे।’ मलण्णा की पत्नी बोली। अब तो चोर बौखला गया। बैल तो चुरा लिया था पर उसकी शक्ल अच्छी तरह नहीं देख पाया था। वह तो बुरा फँसा। अनुमान से बोला-

‘नहीं-नहीं, इसकी तो दाईं आँख खराब है।’

मलण्णा ने सारे बाजार को बुला लिया। सबके सामने बैल की आँखों के आगे से हाथ हटाया गया। बैल की दोनों आँखें ठीक-ठाक थीं। चोर रंगे हाथों पकड़ा गया। उसकी जमकर पिटाई हुई। मलण्णा और उसकी पत्नी अपने खोए हुए बैल को लेकर खुशी-खुशी घर लौटे।

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