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Andhra Pradesh ki Lok Kathayen-6 (आंध्र प्रदेश की लोक कथाएँ-6)

जिंदा भूत: आंध्र प्रदेश की लोक कथा

एक दिन राजू के मन में आया कि लोगों को भूत बनकर डराया जाए। वह सांस रोकर बैठ गया । उसकी पत्नी ने उसको हिलाया-डुलाया लेकिन राजू चुपचाप आंख बंद किए बैठा रहा। “हे भगवान! लगता है ये सचमुच मर गए।” वह रोती हुई बाहर निकली और पास-पड़ोस वालों को बुला लाई। राजू उसी तरह बिना सांस लिए, बिना हिले-डुले बैठा था। पड़ोसियों ने भी समझा कि राजू मर गया है। “अब इसका दाह संस्कार करना चाहिए,” वे बोले।

वे राजू को लेकर नदी किनारे आए। उसे लकड़ियों के ढेर पर लेटा दिया। फिर उसके ऊपर और लकड़ियां रख दीं। राजू ने जब देखा कि पड़ोसी चिता में आग लगाने जा रहे हैं तो वह लकड़ियां फेंककर उठ खड़ा हुआ। जब पड़ोसियों ने राजू को इस तरह उठकर खड़ा होते देखा तो, भूत… भूत…” चिल्लाते हुए गांव की तरफ़ भागे। राजू उनके पीछे रुको… रुको…” कहते हुआ भागा। गांव पहुंचकर वे बोले, “राजू मरकर भूत बन गया है और गांव की तरफ़ आ रहा है।” इतना सुनना था कि सारे गांववाले अपने घरों में घुस गए और दरवाज़े बंद कर लिए। जब राजू गांव में पहुंचा तो वहां सन्नाकटा छाया था। राजू अपने घर की तरफ़ चल दिया। राजू की पत्नी नागम्मा ने भी सुन लिया था कि उसका पति भूत बन गया है। उसने भी जल्दी से घर का दरवाज़ा बंद करके कुंडा लगा लिया। घर पहुंचकर राजू बोला, “नागम्मा दरवाज़ा खोलो, मैं राजू हूं।”

“तुम राजू नहीं राजू के भूत हो। कृपा करके यहां से चले जाओ। मैं तुम्हारा बहुत अच्छी तरह से श्राद्ध कर दूंगी और ब्राह्मणों को भोजन भी करवाऊंगी। बस, तुम यहां से चले जाओ।” राजू दरवाज़ा खटखटाता रहा पर नागम्मा ने दरवाज़ा नहीं खोला।

‘अप्पा। अब मैं क्या करूं। मेरी पत्नी भी मेरा विश्वास नहीं कर रही कि मैं भूत नहीं हूं।’ राजू ने सारे दिन से कुछ नहीं खाया था। अब उसे बहुत ज़ोर की भूख लगी थी। ‘मुझे कौन भोजन देगा? जब मेरी पत्नी भी मुझे भूत समझ रही है।’ वह चलते-चलते गांव के मंदिर पहुंचा। ‘चलो रात यहीं काट लेता हूं। सुबह जब पुजारी प्रसाद चढ़ाने आएगा तो उससे प्रसाद लेकर खा लूंगा।’ राजू मूर्ति के पीछे छिपकर बैठ गया और पुजारी की प्रतीक्षा करने लगा।

रात बीती, सुबह हुई । गांववालों ने धीरे से दरवाज़े खोले और बाहर झांका। राजू का भूत कहीं दिखाई नहीं दिया। सब लोग घरों से बाहर आ गए और अपने काम-धंधों में लग गए। पुजारी भी प्रसाद बनाने लगा। प्रसाद बनाया, बड़े बनाए, लड्डू बनाए। फिर सारा प्रसाद एक थाली में सजाकर मंदिर की तरफ़ चल दिया। मंदिर में पहुंचकर उसने प्रसाद की थाली एक ओर रख दी, फिर कुएं से बाल्टी निकाली और मंदिर धोने लगा। तभी राजू मूर्ति के पीछे से निकला और बोला,“स्वामी आज आपने बड़ी देर कर दी। मैं कब से आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूं।” इतना सुनना था कि पुजारी बाल्टी पटककर गांव की तरफ़ भागा। उसके पीछे-पीछे राजू, “स्वामी… स्वामी…” कहता हुआ। गांववालों ने जब राजू को पुजारी के पीछे आते देखा तो फिर से घरों में घुस गए और दरवाज़े बंद कर लिए। राजू एक बार फिर अपने घर गया लेकिन नागम्मा ने दरवाज़ा नहीं खोला।

राजू मंदिर में लौट आया और पुजारी जो प्रसाद लाया था, उसे खाकर अपनी भूख मिटाई। पेट भर जाने के बाद राजू ने अपनी तरफ़ देखा। उसकी वेष्टि फट गई थी, शरीर धूल-मिट्टी से सना था, बाल बिखरे थे। “लोग ठीक ही मुझे भूत समझते हैं, मेरी हालत तो देखो!” वह बोला। ‘सबसे पहले रमैया धोबी से साफ़ कपड़े मांगकर पहनना होगा।’ ऐसा सोचकर राजू नदी किनारे पहुंचा। रमैया धोबी अभी आया नहीं था। राजू कपड़े धोने की भट्टी में छिपकर बैठ गया।

उस दिन राजा का कोतवाल घोड़े पर बैठकर गांव का निरीक्षण करने आया था। उसने देखा कि गांववाले बजाय अपना काम-धंधा करने के, घरों में बैठे हैं। उसने दरवाज़ा खटखटाकर गांववालों को बाहर बुलाया और पूछा, “काम-धंघे के समय तुम लोग घरों में क्यों बैठे हो?”

“राजू चरवाहा मरकर भूत बन गया है और गांव में घूम रहा है। उसके डर से हम घरों में बैठे हैं।” गांववालों ने उत्तर दिया।

“कोई भूत-वूत नहीं होता। चलो सब लोग अपना-अपना काम शुरू करो,” कोतवाल ने डांटा। सब लोग एक बार फिर घरों से निकलकर अपने-अपने काम पर लग गए। रमैया धोबी भी घाट की तरफ़ चल दिया। कोतवाल को अपने कपड़े धुलवाने थे इसलिए वह भी घोड़े पर सवार नदी की तरफ़ चल दिया। जैसे ही दोनों घाट पर पहुंचे, राजू भट्टी में उठकर खड़ा हो गया और बोला, “अरे रमैया अप्पा, कहां थे अब तक? मैं कब से भट्टी में बैठा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं।” इतना सुनना था कि रमैया सिर पर पैर रखकर गांव की ओर भागा। कोतवाल भी सरपट घोड़ा दौड़ाता गांव से दूसरी तरफ भागा। गांववाले फिर घरों में घुस गए।

राजू ने धोबी के कपड़ों में से एक साफ़ वेष्टि और एक क़मीज़ निकाली। फिर नदी में जाकर नहाया, साफ़ कपड़े पहने और अपने घर की तरफ़ चल दिया।

घर पहुंचकर उसने दरवाज़ा खटखटाया और बोला, “नागम्मा दरवाज़ा खोलो। मैं भूत नहीं हूं। अरे जब मैं मरा ही नहीं तो भूत कैसे बन सकता हूं?”

“हमने तुम्हें मरा हुआ देखा था,” नागम्मा अंदर से बोली। “न तुम सांस ले रहे थे, न हिल-डुल रहे थे।”

“मैं समझा था कि मैं मर रहा हूं इसलिए मैं सांस रोककर बिना हिले- डुले लेट गया था।” राजू ने कहा। “असल में एक यात्री ने मुझे एक सूत का धागा दिया था और कहा था जिस दिन यह धागा खो जाएगा, उस समय, मैं मरने वाला हूं। तुम दरवाज़ा खोलकर देखो तो। मैं मरा नहीं हूं, जीवित हूं।”

नागम्मा ने धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला। सामने राजू नहाया-धोया, साफ़ वेष्टि और क़मीज़ पहने खड़ा था। ‘यह भूत नहीं लग रहा,’ नागम्मा ने सोचा। फिर उसने हाथ बढ़ाकर राजू को छुआ और ज़ोर से चिकोटी काटी। “अप्पा!” राजू चिल्ला।या। नागम्मा समझ गई कि राजू भूत नहीं है। उसने जल्दी से दरवाज़ा खोलकर उसे अंदर कर लिया। उसे भरपेट खाना खिलाया। राजू खा-पीकर सो गया। नागम्मा गांव की तरफ़ चल दी सबको बताने के लिए कि राजू भूत नहीं है।

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