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Kashmir ki Lok Kathayen-13 (कश्मीरी लोक कथाएँ-13)

परियों के देश में कश्मीरी लोक-कथा

अगली शाम कश्मीरी की दुकान में एक स्टूल पर बैठे हुए कमल ने कहा, ‘तो यह था वह सबसे असाधारण विवाह, जिसके बारे में आपने हमें कल बताया था, जावेद खान।’

‘यह एक परी कथा थी।’ अनिल ने कहा, ‘ऐसी सभी कहानियों का अंत सुखद होता है।’

‘ऐसा नहीं है, हुजूर। कोई कहानी कभी समाप्त नहीं होती है और खुशी एक ऐसी चीज है, जो आती है और चली जाती है। यह इंद्रधनुष की तरह दुर्लभ है।’

‘क्या राजकुमार और बाद में राजकुमारी बन जानेवाली बंदरिया के साथ कुछ और हुआ था?’ शशि ने पूछा।

‘बहुत सी बातें।’ जावेद खान ने कहा, ‘आओ, पास-पास आकर इकट्ठे हो जाओ, नहीं तो ठंड तुम्हारी हड्डियों में चली जाएगी। अब सुनो…’

जावेद खान ने कहा, ‘अन्य राजकुमार जल्दी ही अपने सबसे छोटे भाई के अच्छे भाग्य से ईर्ष्या करने लगे और उसे गिराने के लिए चालें चलने लगे।’

एक दिन उन्होंने उससे कहा, ‘भाई, तुम्हारी पत्नी एक परी है। लोगों की एक ऐसी नस्ल से संबंधित है, जो अपने अविश्वसनीय और शैतानी तरीकों के लिए प्रसिद्ध है। हम जानते हैं कि तुमने वह खाल अभी तक रखी हुई है, जिसे वह पहले पहनती थी। तुम उसे क्यों रखे हुए हो? तुम कभी नहीं जान सकते कि कब उसका मन बदल जाए और वह फिर से बंदरिया बन जाए! हमारा सुझाव है कि जितना जल्दी संभव हो, उस खाल को नष्ट कर दो।’

राजकुमार ने उनके सुझाव पर सोचा और यह देखते हुए कि उनकी बात में दम है, उसने वह खाल निकाली और जलती हुई आग में झोंक दी।

तुरंत आग में से तेज चीखें आने लगीं और राजकुमारी खुद धुएँ में से प्रकट हुई और महल की तरफ दौड़ी। और उसके बाद पूरा महल, बाग और हर वह चीज, जो परी अपने साथ लाई थी, एक साथ गायब हो गए।

राजकुमार का दिल टूट गया।

‘लेकिन एक मनुष्य और एक वायु-पुत्री के बीच में प्रेम कैसे रह सकता है?’ राजा ने कहा, ‘वह हवा से आई थी और उसी में गायब हो गई है। उसके लिए विलाप मत करो।’

फिर भी, राजकुमार को इससे कोई सांत्वना नहीं मिली और एक दिन सुबह जल्दी वह नगर से निकल पड़ा और इस उम्मीद में उस पुराने बरगद के पेड़ के पास पहुँच गया कि वहाँ उसकी राजकुमारी का कोई सुराग उसे मिल जाए। लेकिन पेड़ भी वहाँ से गायब हो चुका था। कई दिन और कई रात तक जंगली फलों को खाकर, जंगली पोखरों से पानी पीकर और खुले आसमान के नीचे सोकर वह गाँवों में भटकता रहा। हर दिन वह नगर से दूर, अधिक आगे और अधिक आगे चलता गया। एक दिन वह एक ऐसे आदमी के पास आया, जो एक टाँग पर खड़ा था (दूसरे पैर को हाथ से पकड़े हुए था) और चिल्ला रहा था, ‘एक बार मैंने तुम्हें देखा था, एक बार और प्रकट हो जाओ!’

राजकुमार ने उससे पूछा कि क्या बात हुई थी? तो एक टाँग पर खड़े आदमी ने जवाब दिया, ‘मैं इन जंगलों में शिकार कर रहा था, तब मैंने एक बहुत ही सुंदर स्त्री को यहाँ से जाते हुए देखा था। वह दौड़ी जा रही थी और मेरे पुकारने पर भी रुकी नहीं। मैं उसके सौंदर्य और दुःख को देखकर इस प्रकार जड़वत् हो गया कि मैं अपने स्थान से हिल भी नहीं सकता।’ और उसने फिर से दोहराया, ‘एक बार मैंने तुम्हें देखा था, एक बार और प्रकट हो जाओ!’

‘मैं भी उसी की तलाश कर रहा हूँ।’ राजकुमार ने कहा।

‘तो उसे जल्दी ढूँढ़ो। और जब तुम्हें मिल जाए तो कृपया मुझे उसको एक बार और देखने देना। मेरी यह छड़ी निशानी के रूप में लेते जाओ। यह रास्ते में तुम्हारे लिए काम आ सकती है, क्योंकि इसे अपने स्वामी के आदेशों का पालन करने का वरदान प्राप्त है।’

राजकुमार ने तपते रेगिस्तानों में अकसर परी राजकुमारी को पुकारते हुए कई दिनों तक सफर किया, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। अनेक कठिनाइयों का सामना करने के बाद उसे एक नखलिस्तान मिला, जहाँ उसने एक छोटे से झरने से अपनी प्यास बुझाई। जब वह एक पेड़ की छाया में विश्राम कर रहा था, उसने गिटार के सुर सुने और उस संगीत के स्रोत की तलाश में जाने पर उसे बीस वर्षीय एक सुंदर युवक अपने वाद्य यंत्र पर झुका हुआ उसे बजाने में तल्लीन मिला। संगीत इतना मधुर था कि पक्षी भी खामोश हो गए थे। युवक ने बजाना समाप्त किया और एक लंबी साँस ली और कहा, ‘एक बार मैंने तुम्हें देखा था, एक बार और प्रकट हो जाओ!’

उसने भी परी को दौड़कर दूर जाते हुए देखा था और उसके सौंदर्य से अपने स्थान पर ऐसे जड़वत् हो गया था कि जहाँ वह गिटार बजा रहा था, उस स्थान से हिल भी नहीं सकता। संगीतकार ने राजकुमार को अपना गिटार दे दिया और उससे कहा कि इसमें इसका संगीत जहाँ तक सुना जाएगा, वहाँ तक किसी भी चीज को आकर्षित करने की क्षमता थी। इसके बदले में जब राजकुमार को परी मिल जाएगी तो वह परी को केवल एक बार और देखना चाहता था।

राजकुमार ने विशाल पर्वतों और नदियों को पार करते हुए अपना सफर जारी रखा। एक दिन जब वह भारी बर्फ में से धीरे-धीरे जा रहा था, उसने फिर से चिल्लाने की आवाज सुनी, ‘एक बार मैंने तुम्हें देखा था, एक बार और प्रकट हो जाओ!’

इस बार यह एक पीला और पतला-दुबला नौजवान था, जिसने उसी परी को पहाड़ों की तरफ दौड़कर जाते हुए देखनेवाली कहानी सुनाई। और यहाँ वह पहाड़ की चोटी को छोड़कर नहीं जा सकता था, जब तक वह उस सुंदर राजकुमारी को फिर से देख नहीं लेता।

उसने एक टोपी राजकुमार को देते हुए कहा, ‘यह टोपी ले लीजिए जब भी आप इसे पहनेंगे, यह आपको अदृश्य कर देगी और यह आपकी राजकुमारी की तलाश में उपयोगी साबित हो सकती है। लेकिन जब वह आपको मिल जाए तो मुझे उसको एक बार देखने देना, नहीं तो मैं यहीं प्राण त्याग दूँगा!’

छड़ी, गिटार और टोपी लेकर राजकुमार पर्वतों पर और फिर एक घाटी में गया, जहाँ उसने बर्फ का एक मंदिर देखा, जिसके खंभे, छत और शिखर सब बर्फ के बने हुए थे। मंदिर के भीतर राजकुमार को एक नंग-धड़ंग योगी मिला, जिसने केवल एक कौपीन पहन रखी थी। वह आसन लगाकर जमीन से लगभग तीन फीट ऊपर हवा में, अधर में, बैठा था। उसका सारा शरीर मंदिर की भीतरी दीवार से छनकर आ रहे प्रकाश में दमक रहा था।

राजकुमार हाथ जोड़कर योगी के सामने बैठ गया। योगी ने आँखें खोलकर सीधे राजकुमार की तरफ देखते हुए कहा, ‘मैं तुम्हारी कहानी जानता हूँ। तुम जिस राजकुमारी की तलाश कर रहे हो, वह परियों के राजा की पुत्री है, जिसका महल कॉकेशस पर्वत के शीर्ष पर स्थित है। राजकुमारी बहुत बीमार है, गुल मेहँदी का यह डिब्बा ले लो। इसमें ठीक करने की शक्तियाँ हैं और ये ऊनी चप्पलें तुम्हें, जहाँ तुम जाना चाहोगे, पहुँचा देंगी।’

जैसे ही राजकुमार ने ऊनी चप्पलें पहनीं, वह हवा में ऊपर उठने लगा और फिर बहुत तेजी के साथ पर्वतों के ऊपर से परियों के देश की ओर उड़ चला। वह एक बहुत बड़े नगर के बाहर उतरा, जहाँ टोपी पहनते ही वह अदृश्य हो गया और वह बिना किसी रोक-टोक के द्वार में से अंदर चला गया।

नगर में मुख्य चौराहे पर राजकुमार ने गिटार बजाना शुरू कर दिया। गिटार से निकला संगीत इतना मधुर था कि उसे सुनने के लिए सारी परियाँ आकर चौराहे पर एकत्र हो गईं। जब राजा को पता चला कि एक गजब का जादूगर उसकी प्रजा को मोहित कर रहा था तो वह उससे मिलने के लिए बाहर निकला। वह उसके संगीत से इतना प्रभावित हुआ कि वह राजकुमार के सामने अपने घुटने टेककर बोला, ‘मेरी पुत्री कई महीनों से बीमार पड़ी है। वह विचित्र प्रकार के बुखार से पीडि़त है। उसे ठीक कर दो, मैं आपसे विनती करता हूँ, क्योंकि वह मेरी आँखों की रोशनी और मेरे बुढ़ापे की आशा है।’

राजकुमार राजा के साथ सोने के एक उड़न खटोले पर, जिसे परियाँ उठाए हुए थीं, महल के अंदर गया। उसे राजकुमारी के कक्ष में ले जाया गया, वहाँ उसने देखा कि परी गहरी नींद में सोई हुई थी। उसने योगी द्वारा दी गई गुल मेहँदी निकाली और वहाँ खड़ी सेविका से कहा कि इसे अपनी स्वामिनी के पूरे शरीर पर लगा दे। जैसे ही ऐसा किया गया, राजकुमारी बिस्तर पर उठकर बैठ गई। वह खुद को बहुत बेहतर महसूस कर रही थी। राजकुमार को देखकर वह उसका नाम लेकर बोलने ही वाली थी कि राजकुमार ने अपने होंठों पर उँगली रखकर अनुनय के भाव लिये आँखों से चुप रहने का अनुरोध किया।

जब राजा को पता चला कि उसकी पुत्री ठीक हो गई है तो उसने कहा, ‘आप महान् हैं, स्वामीजी, कोई उपहार माँगिए।’

राजकुमार ने बिना झिझके फौरन उत्तर दिया, ‘राजन्, विवाह में आपकी पुत्री का हाथ!’

राजा योगी की वाचालता पर अत्यधिक क्रुद्ध हुआ और सिपाहियों को उस भिखारी को गिरफ्तार करने और जेल में डालने का आदेश दे दिया। लेकिन राजकुमार ने अपनी टोपी पहन ली और वह सिपाहियों के लिए अदृश्य हो गया तथा अपनी छड़ी को आदेश दिया कि वह सिपाहियों को दूर रखे। जब राजा ने देखा कि राजकुमार तो गायब हो गया था और उसकी छड़ी सिपाहियों की पीठ पर प्रहार कर रही थी तो उसने दया की याचना की।

राजा ने कहा, ‘हमें क्षमा कर दीजिए, फिर से सामने आ जाइए। मैं वचन देता हूँ कि आपको वही मिलेगा, जो आप चाहेंगे।’

राजकुमार फिर से प्रकट हो गया और बोला, ‘मुझे खेद है कि मुझे आपके विरुद्ध अपनी शक्तियों का प्रयोग करना पड़ा। अब मुझे एक उड़न खटोला दीजिए, जिसे बनाना केवल परियाँ जानती हैं और इसे मुझे तथा आपकी पुत्री दोनों को मेरे पिता के राज्य में ले जाने दें।’

राजा तुरंत अपनी पुत्री को लेकर आया, जिसकी सेवा में तीन परियाँ लगी हुई थीं। उन्होंने राजकुमार को एक सुंदर पालकी में बिठाया और पालकी हवा में ऊपर उठकर राजकुमार के देश की तरफ उड़ चली।

शशि ने पूछा, ‘लेकिन एक टाँग पर खड़े आदमी और दूसरे, जिन्होंने उसकी मदद की थी, उनका क्या हुआ?’

‘अरे हाँ, उनके बारे में तो मैं लगभग भूल ही गया था।’ जावेद खान ने जोड़ा, ‘लेकिन राजकुमार नहीं भूला था। रास्ते में उन लोगों की चीजें उन्हें लौटाने के लिए वह रुका था और उसे परी के साथ वापस आया देखकर वे बहुत खुश हुए थे और वे फिर से अच्छी तरह चलने-फिरने लगे थे।’ थोड़ी देर सोचने के बाद जावेद खान ने कहा, ‘वे वापसी में राजकुमार के साथ ही उसके राज्य में गए। वहाँ उन्होंने उन तीन परियों से विवाह किया, जो राजकुमारी की दासियाँ थीं। और वे सब हमेशा खुशी-खुशी रहने लगे।’

‘तो आखिरकार अंत सुखद हुआ।’ अनिल बोला।

अब कमल ने पूछा, ‘उन ईर्ष्यालु भाइयों का क्या हुआ?’

‘जहाँ तक राजकुमार के भाइयों की बात है, जब उनके पिता, राजा को उनके द्वारा की गई शैतानी का पता चला तो वह इतना क्रुद्ध हुआ कि उसने उन्हें उत्तराधिकार से वंचित कर दिया और उन्हें जेल में डाल दिया गया होता, अगर सबसे छोटे राजकुमार ने राजा को उन्हें माफ करने के लिए मनाया नहीं होता। उन्हें माफी दे दी गई और उनके लिए उपयुक्त पेंशन तय कर दी गई। और अब मेरे दोस्तो, अब तुम सबके घर जाने का समय हो गया है।’

(रस्किन बांड की रचना ‘कश्मीरी किस्सागो’ से)

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