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Kashmir ki Lok Kathayen-6 (कश्मीरी लोक कथाएँ-6)

अकनंदुन कश्मीरी लोक-कथा

प्राचीन काल में कश्मीर के एक भाग पर जिसका नाम नाम संघिपत नगर था एक राजा राज करता था। यह जगह अब जलमग्न हो गई है और उसकी जगह अब झील वुलर है। राजा के कोई पुत्र न था। अत: राजा और उसकी रानी, जिसका नाम रत्नमाला था, पुत्र पाने की इच्छा से, साधु संतों की बड़ी सेवा किया करते। एक दिन उनके महल में एक जोगी आया। उन्होंने इस जोगी की बड़ी आव-भगत की और अपनी मनोकामना उसके सामने प्रकट की।

जोगी ने उत्तर दिया-राजन् आपको पुत्र प्राप्त होगा, मगर एक शर्त पर।

राजा-रानी एक साथ बोले-कहिए वह कौन सी शर्त है, हम भी तो सुनें?

यह उत्तर पाकर जोगी बोला-शर्त कठिन है। संभवत: आप स्वीकार न करें। वह यह है कि यदि मेरी कोशिश से आपके पुत्र जन्मेगा तो वह केवल ग्यारह वर्ष तक आपका होगा, और उसके बाद आपको उसे मुझे सौंपना होगा। कहिए, क्या आपको यह शर्त स्वीकार है?

राजा और रानी कुछ समय तक एक-दूसरे का मुंह ताकते रहे और फिर बाद में बोले-जोगी महाराज! हमें पुत्र चाहिए, चाहे वह ग्यारह वर्षों तक ही हमारे पास रहे। हमें आपकी शर्त मंजूर है।

सुन कर जोगी ने उत्तर दिया-अच्छा, तो आज से नौ मास के बाद आपके यहां पुत्र होगा। कह कर वह उन्हें आशीर्वाद देकर चला गया।

रानी ने सचमुच ही यथा समय एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। उसका नाम अकनंदुन रखा गया। अकनंदुन बड़ा होकर पाठशाला में पढ़ने लगा तो वहां वह अपनी कक्षा के छात्रों में सबसे बुद्धिमान गिना जाने लगा। दिन बीतते गए और उसका ग्यारहवां जन्म दिन आया। उस दिन वही जोगी न मालूम कहां से फिर आ पहुंचा और राजा-रानी से बोला-अब आप अपनी शर्त पूरी कीजिए और अकनंदुन को मेरे हवाले कीजिए।

भारी मन से राजा-रानी ने अकनंदुन को पाठशाला से बुलवाया और जोगी से कहा-जोगी महाराज, यह है आपकी अमानत।

उसे देखते ही जोगी गंभीर होकर बोला- तो फिर देर क्या है? मैं भूखा हूं, इसका वध करके, इसके मांस को पकाइए और मुझे खिलाइए। जल्दी कीजिए मुझे भूख सता रही है।

राजा-रानी ने रो-रो कर जोगी को इस घृणित और क्रूर कार्य से रोकने का प्रयत्न किया, पर वह एक न माना और क्रोधित होकर बोला-इसके सिवा मुझे और कुछ स्वीकार नहीं। हां एक और बात, इसका वध तुम दोनों के हाथों ही होना भी जरूरी है।

खैर रोते-धोते और मन में इस दुष्ट जोगी को बुरा-भला कहते हुए उन्होंने अकनंदुन को मार डाला। उसका मांस रसोईघर में जब पक कर तैयार हुआ तो जोगी बोला-अब देर क्या है? इसे चार थालियों में परोसो। एक मेरे लिए, दो तुम दोनों के लिए और चौथी स्वयं अकनंदुन के लिए।

अकनंदुन की थाली का नाम सुनकर वहां उपस्थित लोग क्रोध से लाल-पीले और हैरान हो उठे। पर जोगी की आज्ञा का पालन करके चार थाल परोसे गए। सभी अपने-अपने आसन पर बैठे। राजा-रानी के नेत्रों से निरंतर अश्रुधारा बह रही थी। इतने में ही जोगी बोला-रानी रत्ना! उठो और खिड़की में से वैसे ही अपने पुत्र को बुलाओ जैसे रोज बुलाती हो। जल्दी करो खाना ठण्डा हो रहा है।

रानी रत्नमाला भारी हृदय से उठकर खिड़की की ओर गई और रोते-विलाप करते हुए उसने अकनंदुन का नाम पुकारा। उसके पुकारने की देर थी कि सीढ़ियों पर से दिन प्रतिदिन की तरह ‘आया माताजी’ कहता हुआ अकनंदुन वहां पहुंच गया। रत्नमासला और राजा से लपक कर गले लगा। पर यह क्या? जब उन्होंने थालियों और जोगी की ओर देखा तो वहां न तो जोगी ही था और न वे परोसे गए थाल ही। जोगी की हर जगह तलाश की गई पर वह कहीं न मिला। वह कहां से आया था और कहां गया, इसका भी किसी को पता न चला।

राजा-रानी अकनंदुन को पुन: पाकर अत्यंत हर्षित हुए।

(इस लोककथा को रमजान भट नामकएक कवि ने गाथा-गीत के रूप में कविताबद्ध किया है। यह गाथा-गीत कश्मीरियों का एक लोकप्रिय गीत है।)

रस्सीये जकड़, डण्डे मार कश्मीरी लोक-कथा

एक गांव में एक दर्जी रहता था। उसने एक बकरी पाली हुई थी। वह बकरी बातें करती थी। उस दर्जी के तीन बेटे थे। वे दर्जी-पुत्र जब बड़े हुए तो दर्जी ने उन्हें बकरी चराने का काम सौंपा। वह बकरी दिन भर चरती और भर पेट खाती। पर जब दर्जी शाम को उस पर हाथ फेर कर उससे हाल पूछता, तो वह कहती-आपके बेटे मुझे मैदान में एक खूंटे से बांध कर रखते हैं। वह स्वयं खेलते रहते हैं और मैं भूखी रहती हूं।

दर्जी बहुत दिनों तक बात टालता रहा। फिर एक दिन उसने बेटों को डांट-डपट कर कहा-निकल जाओ घर से, तुम सब निकम्मे हो।

बेकसूर लड़के भी एक दम घर से निकल गए। उनके जाने के बाद दर्जी को बकरी की धूर्तता का पता चला। वह अब अपनी गलती पर पछताने लगा और बेटों के घर लौट आने की राह देखता रहा।

दर्जी के तीनों पुत्रों को घर से दूर एक-दूसरे से अलग-अलग नौकरी मिल गई। उनके मालिक उनके काम से खुश हुए। सबसे बड़ा लड़का लड़की का साज-सामान बनाने वाले के पास नौकर हो गया। दूसरा उसी नगर में एक पनचक्की पर नौकर हो गया और तीसरा एक दुकानदार के यहां।

दोनों बड़े भाइयों को पिता की याद सता रही थी। उन्होंने फैसला किया कि वह घर लौट जाएंगे। उनके मालिक भी इस बात को मान गए। बड़े भाई को उसके मालिक ने एक छोटी सी मेज देकर कहा-बेटा, इस मेज से जिस तरह का भोजन मांगोगे, वह तुम्हें इस पर तैयार मिलेगा।

दूसरे भाई को चक्कीवाले ने एक गधा देते हुए कहा-जाओ खुश रहो। इस गधे को भी ले जाओ। जयों ही तुम इससे कहोगे-मुझे मुहरें दो, त्यों ही यह मुंह से मुहरें उगलने लगेगा। जब तक तुम ‘बस करो’ न कहोगे यह मुहरें उगलता रहेगा।

दोनों भाई अपने-अपने उपहार लेकर घर की ओर चल दिए। वे सायंकाल के समय एक गांव में पहुंचे। वे रात भर आराम करने के लिए एक सराय में ठहरे। सरायवाला दुष्ट था। उसने उन्हें रात भर रहने की जगह दी पर बात ही बात में उनके उपहारों की विशेषता के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर ली। जब उसे मेज और गधे के गुणों का पता लगा तो उसने उन्हें हथियाने की बात सोची। वे दोनों भाई जब सोकर खर्राटे भर रहे थे तब उस दुष्ट ने मेज के बदले हू-ब-हू वैसी ही मेज रख दी और गधा भी उसी शक्ल का खूंटे से बांध दिया। सुबह वे दोनों भाई इन नकली चीजों को लेकर चल दिए।

घर पहुंचे तो उनका पिता बहुत खुश हो गया। उसने गधे और मेज की करामात सुनी तो और भी प्रसन्न हो गया। परंतु जब दोनों भाइयों ने अपने-अपने उपहार की परख और प्रदर्शन करना चाहा, तो हैरान हो गए। उनका बाप यह देख बड़ा नाराज हो गया। वह समझा कि बेटे मुझसे धोखा कर रहे हैं। बहुत कुछ समझाने पर भी उसकी शंकर दूर न हुई। अत: उन्होंने अपने छोटे भाई को आपबीती लिखकर भेजी और उसे सराय वाले से सतर्क रहने को कहा। इसी के साथ उसे यह भी बताया कि अगर संभव हो तो वह उससे चुराई हुई चीजें भी प्राप्त करने की कोशिश करें।

पत्र पाकर तीसरे भाई ने भी स्वामी से घर लौट जाने की स्वीकृति ली, तो उसे उपहार में एक थैला देते हुए मालिक ने कहा-यह थैला लो। इसका गुण यह है कि जब कभी तुमको सहायता की जरूरत पड़े तो इसे यों कहो-रस्सीये जकड़, और डंडे मार। तुम्हारे कहने के साथ ही इसमें से एक रस्सी निकलेगी और तुम्हारे शत्रु को जकड़ लेगी। साथ ही इसमें से एक डंडा निकल आएगा जो उसकी खोपड़ी पर चोट करने लगेगा।

खैर, यह दर्जी पुत्र भी घर की ओर चल दिया। वह रात को उसी सराय में रुका। जब वह सोने लगा तो उस थैले को अपने तकिये के नीचे यों रखा, जिससे सराय वाले को शंका हुई कि इसमें माल भरा है। आधी रात को सरायवाला थैले का धन चुराने के इरादे से आया। दर्जी पुत्र इसी ताक में आंखें बंद किए हुए लेटा हुआ था। ज्यों ही उसने सिरहाने के नीचे से थैला निकाला त्यों ही वह बोला-रस्सीये जकड़, और डंडे मार।

कहने की देर थी कि थैले में से सचमुच ही एक रस्सी निकली, जिसने सराय वाले को जकड़ लिया। साथ ही एक डंडा भी उछल-उछल कर उसकी खोपड़ी पर पटाख-पटाख करता हुआ बरसने लगा। सरायवाला रोने-धोने और चिलाने लगा-भाई माफ करो, माफ करो। हाय मरा! मरा!!

जब उस डंडे ने सरायवाले की खोपड़ी पर अच्छी मार बरसाई तो दर्जीपुत्र बोला-बदमाश कहीं का, ये चीजें तभी थैले में लौट जाएंगी जब तू मेरे भाइयों से हथियाया हुआ माल लौटाने का वायदा करेगा।

लहूलुहान सरायवाले ने उससे वायदा किया तो उसने इन दोनों चीजों को वापस बुलाया। इसके बाद सरायवाले से मेज और असली गधा प्राप्त करने के बाद वह घर लौटा।

जब वह घर पहुंचा तो तीनों भाइयों ने पिता सहित खूब दावत उड़ाई। पिता अपने पुत्रों की सफलता पर बड़ा खुश हुआ। वह धूर्त बकरी रात के समय ही घर से भाग गई। अब बाप बेटे उन तीनों करामती चीजों के कारण बड़े सुख से रहने लगे।

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