Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Lok Kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-13 (कश्मीरी लोक कथाएँ-13)

परियों के देश में कश्मीरी लोक-कथा

अगली शाम कश्मीरी की दुकान में एक स्टूल पर बैठे हुए कमल ने कहा, ‘तो यह था वह सबसे असाधारण विवाह, जिसके बारे में आपने हमें कल बताया था, जावेद खान।’

‘यह एक परी कथा थी।’ अनिल ने कहा, ‘ऐसी सभी कहानियों का अंत सुखद होता है।’

‘ऐसा नहीं है, हुजूर। कोई कहानी कभी समाप्त नहीं होती है और खुशी एक ऐसी चीज है, जो आती है और चली जाती है। यह इंद्रधनुष की तरह दुर्लभ है।’

‘क्या राजकुमार और बाद में राजकुमारी बन जानेवाली बंदरिया के साथ कुछ और हुआ था?’ शशि ने पूछा।

‘बहुत सी बातें।’ जावेद खान ने कहा, ‘आओ, पास-पास आकर इकट्ठे हो जाओ, नहीं तो ठंड तुम्हारी हड्डियों में चली जाएगी। अब सुनो…’

जावेद खान ने कहा, ‘अन्य राजकुमार जल्दी ही अपने सबसे छोटे भाई के अच्छे भाग्य से ईर्ष्या करने लगे और उसे गिराने के लिए चालें चलने लगे।’

एक दिन उन्होंने उससे कहा, ‘भाई, तुम्हारी पत्नी एक परी है। लोगों की एक ऐसी नस्ल से संबंधित है, जो अपने अविश्वसनीय और शैतानी तरीकों के लिए प्रसिद्ध है। हम जानते हैं कि तुमने वह खाल अभी तक रखी हुई है, जिसे वह पहले पहनती थी। तुम उसे क्यों रखे हुए हो? तुम कभी नहीं जान सकते कि कब उसका मन बदल जाए और वह फिर से बंदरिया बन जाए! हमारा सुझाव है कि जितना जल्दी संभव हो, उस खाल को नष्ट कर दो।’

राजकुमार ने उनके सुझाव पर सोचा और यह देखते हुए कि उनकी बात में दम है, उसने वह खाल निकाली और जलती हुई आग में झोंक दी।

तुरंत आग में से तेज चीखें आने लगीं और राजकुमारी खुद धुएँ में से प्रकट हुई और महल की तरफ दौड़ी। और उसके बाद पूरा महल, बाग और हर वह चीज, जो परी अपने साथ लाई थी, एक साथ गायब हो गए।

राजकुमार का दिल टूट गया।

‘लेकिन एक मनुष्य और एक वायु-पुत्री के बीच में प्रेम कैसे रह सकता है?’ राजा ने कहा, ‘वह हवा से आई थी और उसी में गायब हो गई है। उसके लिए विलाप मत करो।’

फिर भी, राजकुमार को इससे कोई सांत्वना नहीं मिली और एक दिन सुबह जल्दी वह नगर से निकल पड़ा और इस उम्मीद में उस पुराने बरगद के पेड़ के पास पहुँच गया कि वहाँ उसकी राजकुमारी का कोई सुराग उसे मिल जाए। लेकिन पेड़ भी वहाँ से गायब हो चुका था। कई दिन और कई रात तक जंगली फलों को खाकर, जंगली पोखरों से पानी पीकर और खुले आसमान के नीचे सोकर वह गाँवों में भटकता रहा। हर दिन वह नगर से दूर, अधिक आगे और अधिक आगे चलता गया। एक दिन वह एक ऐसे आदमी के पास आया, जो एक टाँग पर खड़ा था (दूसरे पैर को हाथ से पकड़े हुए था) और चिल्ला रहा था, ‘एक बार मैंने तुम्हें देखा था, एक बार और प्रकट हो जाओ!’

राजकुमार ने उससे पूछा कि क्या बात हुई थी? तो एक टाँग पर खड़े आदमी ने जवाब दिया, ‘मैं इन जंगलों में शिकार कर रहा था, तब मैंने एक बहुत ही सुंदर स्त्री को यहाँ से जाते हुए देखा था। वह दौड़ी जा रही थी और मेरे पुकारने पर भी रुकी नहीं। मैं उसके सौंदर्य और दुःख को देखकर इस प्रकार जड़वत् हो गया कि मैं अपने स्थान से हिल भी नहीं सकता।’ और उसने फिर से दोहराया, ‘एक बार मैंने तुम्हें देखा था, एक बार और प्रकट हो जाओ!’

‘मैं भी उसी की तलाश कर रहा हूँ।’ राजकुमार ने कहा।

‘तो उसे जल्दी ढूँढ़ो। और जब तुम्हें मिल जाए तो कृपया मुझे उसको एक बार और देखने देना। मेरी यह छड़ी निशानी के रूप में लेते जाओ। यह रास्ते में तुम्हारे लिए काम आ सकती है, क्योंकि इसे अपने स्वामी के आदेशों का पालन करने का वरदान प्राप्त है।’

राजकुमार ने तपते रेगिस्तानों में अकसर परी राजकुमारी को पुकारते हुए कई दिनों तक सफर किया, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। अनेक कठिनाइयों का सामना करने के बाद उसे एक नखलिस्तान मिला, जहाँ उसने एक छोटे से झरने से अपनी प्यास बुझाई। जब वह एक पेड़ की छाया में विश्राम कर रहा था, उसने गिटार के सुर सुने और उस संगीत के स्रोत की तलाश में जाने पर उसे बीस वर्षीय एक सुंदर युवक अपने वाद्य यंत्र पर झुका हुआ उसे बजाने में तल्लीन मिला। संगीत इतना मधुर था कि पक्षी भी खामोश हो गए थे। युवक ने बजाना समाप्त किया और एक लंबी साँस ली और कहा, ‘एक बार मैंने तुम्हें देखा था, एक बार और प्रकट हो जाओ!’

उसने भी परी को दौड़कर दूर जाते हुए देखा था और उसके सौंदर्य से अपने स्थान पर ऐसे जड़वत् हो गया था कि जहाँ वह गिटार बजा रहा था, उस स्थान से हिल भी नहीं सकता। संगीतकार ने राजकुमार को अपना गिटार दे दिया और उससे कहा कि इसमें इसका संगीत जहाँ तक सुना जाएगा, वहाँ तक किसी भी चीज को आकर्षित करने की क्षमता थी। इसके बदले में जब राजकुमार को परी मिल जाएगी तो वह परी को केवल एक बार और देखना चाहता था।

राजकुमार ने विशाल पर्वतों और नदियों को पार करते हुए अपना सफर जारी रखा। एक दिन जब वह भारी बर्फ में से धीरे-धीरे जा रहा था, उसने फिर से चिल्लाने की आवाज सुनी, ‘एक बार मैंने तुम्हें देखा था, एक बार और प्रकट हो जाओ!’

इस बार यह एक पीला और पतला-दुबला नौजवान था, जिसने उसी परी को पहाड़ों की तरफ दौड़कर जाते हुए देखनेवाली कहानी सुनाई। और यहाँ वह पहाड़ की चोटी को छोड़कर नहीं जा सकता था, जब तक वह उस सुंदर राजकुमारी को फिर से देख नहीं लेता।

उसने एक टोपी राजकुमार को देते हुए कहा, ‘यह टोपी ले लीजिए जब भी आप इसे पहनेंगे, यह आपको अदृश्य कर देगी और यह आपकी राजकुमारी की तलाश में उपयोगी साबित हो सकती है। लेकिन जब वह आपको मिल जाए तो मुझे उसको एक बार देखने देना, नहीं तो मैं यहीं प्राण त्याग दूँगा!’

छड़ी, गिटार और टोपी लेकर राजकुमार पर्वतों पर और फिर एक घाटी में गया, जहाँ उसने बर्फ का एक मंदिर देखा, जिसके खंभे, छत और शिखर सब बर्फ के बने हुए थे। मंदिर के भीतर राजकुमार को एक नंग-धड़ंग योगी मिला, जिसने केवल एक कौपीन पहन रखी थी। वह आसन लगाकर जमीन से लगभग तीन फीट ऊपर हवा में, अधर में, बैठा था। उसका सारा शरीर मंदिर की भीतरी दीवार से छनकर आ रहे प्रकाश में दमक रहा था।

राजकुमार हाथ जोड़कर योगी के सामने बैठ गया। योगी ने आँखें खोलकर सीधे राजकुमार की तरफ देखते हुए कहा, ‘मैं तुम्हारी कहानी जानता हूँ। तुम जिस राजकुमारी की तलाश कर रहे हो, वह परियों के राजा की पुत्री है, जिसका महल कॉकेशस पर्वत के शीर्ष पर स्थित है। राजकुमारी बहुत बीमार है, गुल मेहँदी का यह डिब्बा ले लो। इसमें ठीक करने की शक्तियाँ हैं और ये ऊनी चप्पलें तुम्हें, जहाँ तुम जाना चाहोगे, पहुँचा देंगी।’

जैसे ही राजकुमार ने ऊनी चप्पलें पहनीं, वह हवा में ऊपर उठने लगा और फिर बहुत तेजी के साथ पर्वतों के ऊपर से परियों के देश की ओर उड़ चला। वह एक बहुत बड़े नगर के बाहर उतरा, जहाँ टोपी पहनते ही वह अदृश्य हो गया और वह बिना किसी रोक-टोक के द्वार में से अंदर चला गया।

नगर में मुख्य चौराहे पर राजकुमार ने गिटार बजाना शुरू कर दिया। गिटार से निकला संगीत इतना मधुर था कि उसे सुनने के लिए सारी परियाँ आकर चौराहे पर एकत्र हो गईं। जब राजा को पता चला कि एक गजब का जादूगर उसकी प्रजा को मोहित कर रहा था तो वह उससे मिलने के लिए बाहर निकला। वह उसके संगीत से इतना प्रभावित हुआ कि वह राजकुमार के सामने अपने घुटने टेककर बोला, ‘मेरी पुत्री कई महीनों से बीमार पड़ी है। वह विचित्र प्रकार के बुखार से पीडि़त है। उसे ठीक कर दो, मैं आपसे विनती करता हूँ, क्योंकि वह मेरी आँखों की रोशनी और मेरे बुढ़ापे की आशा है।’

राजकुमार राजा के साथ सोने के एक उड़न खटोले पर, जिसे परियाँ उठाए हुए थीं, महल के अंदर गया। उसे राजकुमारी के कक्ष में ले जाया गया, वहाँ उसने देखा कि परी गहरी नींद में सोई हुई थी। उसने योगी द्वारा दी गई गुल मेहँदी निकाली और वहाँ खड़ी सेविका से कहा कि इसे अपनी स्वामिनी के पूरे शरीर पर लगा दे। जैसे ही ऐसा किया गया, राजकुमारी बिस्तर पर उठकर बैठ गई। वह खुद को बहुत बेहतर महसूस कर रही थी। राजकुमार को देखकर वह उसका नाम लेकर बोलने ही वाली थी कि राजकुमार ने अपने होंठों पर उँगली रखकर अनुनय के भाव लिये आँखों से चुप रहने का अनुरोध किया।

जब राजा को पता चला कि उसकी पुत्री ठीक हो गई है तो उसने कहा, ‘आप महान् हैं, स्वामीजी, कोई उपहार माँगिए।’

राजकुमार ने बिना झिझके फौरन उत्तर दिया, ‘राजन्, विवाह में आपकी पुत्री का हाथ!’

राजा योगी की वाचालता पर अत्यधिक क्रुद्ध हुआ और सिपाहियों को उस भिखारी को गिरफ्तार करने और जेल में डालने का आदेश दे दिया। लेकिन राजकुमार ने अपनी टोपी पहन ली और वह सिपाहियों के लिए अदृश्य हो गया तथा अपनी छड़ी को आदेश दिया कि वह सिपाहियों को दूर रखे। जब राजा ने देखा कि राजकुमार तो गायब हो गया था और उसकी छड़ी सिपाहियों की पीठ पर प्रहार कर रही थी तो उसने दया की याचना की।

राजा ने कहा, ‘हमें क्षमा कर दीजिए, फिर से सामने आ जाइए। मैं वचन देता हूँ कि आपको वही मिलेगा, जो आप चाहेंगे।’

राजकुमार फिर से प्रकट हो गया और बोला, ‘मुझे खेद है कि मुझे आपके विरुद्ध अपनी शक्तियों का प्रयोग करना पड़ा। अब मुझे एक उड़न खटोला दीजिए, जिसे बनाना केवल परियाँ जानती हैं और इसे मुझे तथा आपकी पुत्री दोनों को मेरे पिता के राज्य में ले जाने दें।’

राजा तुरंत अपनी पुत्री को लेकर आया, जिसकी सेवा में तीन परियाँ लगी हुई थीं। उन्होंने राजकुमार को एक सुंदर पालकी में बिठाया और पालकी हवा में ऊपर उठकर राजकुमार के देश की तरफ उड़ चली।

शशि ने पूछा, ‘लेकिन एक टाँग पर खड़े आदमी और दूसरे, जिन्होंने उसकी मदद की थी, उनका क्या हुआ?’

‘अरे हाँ, उनके बारे में तो मैं लगभग भूल ही गया था।’ जावेद खान ने जोड़ा, ‘लेकिन राजकुमार नहीं भूला था। रास्ते में उन लोगों की चीजें उन्हें लौटाने के लिए वह रुका था और उसे परी के साथ वापस आया देखकर वे बहुत खुश हुए थे और वे फिर से अच्छी तरह चलने-फिरने लगे थे।’ थोड़ी देर सोचने के बाद जावेद खान ने कहा, ‘वे वापसी में राजकुमार के साथ ही उसके राज्य में गए। वहाँ उन्होंने उन तीन परियों से विवाह किया, जो राजकुमारी की दासियाँ थीं। और वे सब हमेशा खुशी-खुशी रहने लगे।’

‘तो आखिरकार अंत सुखद हुआ।’ अनिल बोला।

अब कमल ने पूछा, ‘उन ईर्ष्यालु भाइयों का क्या हुआ?’

‘जहाँ तक राजकुमार के भाइयों की बात है, जब उनके पिता, राजा को उनके द्वारा की गई शैतानी का पता चला तो वह इतना क्रुद्ध हुआ कि उसने उन्हें उत्तराधिकार से वंचित कर दिया और उन्हें जेल में डाल दिया गया होता, अगर सबसे छोटे राजकुमार ने राजा को उन्हें माफ करने के लिए मनाया नहीं होता। उन्हें माफी दे दी गई और उनके लिए उपयुक्त पेंशन तय कर दी गई। और अब मेरे दोस्तो, अब तुम सबके घर जाने का समय हो गया है।’

(रस्किन बांड की रचना ‘कश्मीरी किस्सागो’ से)

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Lok Kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-12 (कश्मीरी लोक कथाएँ-12)

सात राजकुमारों के लिए सात वधुएँ कश्मीरी लोक-कथा

एक बारात लंढौर बाजार रोड के साथ-साथ अपने रास्ते पर घूम रही थी। सबसे पहले ढोल, तुरही और झाँझ की गूँज के साथ बैंड आया, उसके बाद सड़क पर गाते व नाचते हुए दूल्हे के मित्र और उसके बाद सफेद टट्टू पर बैठा दूल्हा स्वयं आया, जो विवाह की पोशाक में बहुत ही सजीला और सुंदर लग रहा था। वे वधू के घर, जहाँ समारोह होना था और साक्षी निराश थी कि वह वधू को नहों देख सकी, क्योंकि वह जानना चाहती थी कि वह कैसी दिखती थी और उसने क्या पहना था!

शशि, अनिल, मधु और विजय जावेद खान की दुकान की सीढ़ियों पर बैठे हुए बारात का गुजरना देख रहे थे। जल्दी ही कमल भी उनमें शामिल हो गया, जो वैवाहिक अतिथियों के पीछे टहलता हुआ यहाँ आया था।

‘वहाँ बाहर ठंड में क्योंे बैठे हो?’ अपनी मंद रोशनीवाली दुकान के अंदर से जावेद खान ने कहा, ‘अंदर आ जाओ और आग के पास बैठो। मैं तुम्हें एक सबसे असाधारण शादी का एक किस्सा सुनाऊँगा, जो मेरी वादी में कई साल पहले हुई थी।’

बहुत-बहुत पहले एक राजा था, जिसके सात पुत्र थे। वे सबके सब बहादुर, सुंदर और चतुर थे। वृद्ध राजा सब को बराबर प्यार करता था और राजकुमार एक सी पोशाक पहनते थे तथा उन्हें समान भत्ते मिलते थे। जब वे बड़े हुए तो उन्हें अलग-अलग महल दिए गए, लेकिन महल एक जैसे बनाए गए थे और उनकी साज- सज्जा भी एक जैसी की गई थी और अगर तुमने एक महल देख लिया था तो समझो, सारे महल देख लिये थे।

जब राजकुमारों की विवाह योग्य उम्र हुई तो राजा ने एक समान सुंदरता और प्रतिभावाली सात वधुएँ खोजने के लिए सारे देश में अपने राजदूत भेजे। राजा के संदेश वाहकों ने हर जगह की यात्रा की, कई राजकुमारियाँ देखीं; लेकिन सात उपयुक्त वधुएँ नहीं ढूँढ़ सके। जे लौटकर राजा के पास आए और अपनी विफलता के बारे में राजा को बताया।

अब तो राजा इतना निराश और दुःखी हो गया कि उसके मंत्री ने फैसला किया कि इस समस्या को हल करने के लिए कुछ-न-कुछ तो करना ही पड़ेगा। उसने कहा, ‘महाराज, इतने मायूस न हों, निश्चय ही आपके सात पुत्रों जैसी मुकम्मल सात वधुएँ खोजना असंभव है। हमें किस्मत पर भरोसा करना चाहिए और फिर शायद हमें सही वधुएँ मिल जाएँगी।’

मंत्री ने एक योजना के बारे में सोचा था और राजकुमारों को इसके लिए सहमत कर लिया था। उनको किले की सबसे ऊँची बुर्ज पर ले जाया गया, जहाँ से पूरे शहर के साथ ही आस-पास का ग्रामीण क्षेत्र भी दिखाई देता था। राजकुमारों के सामने सात धनुष और सात तीर रखे गए थे और उनसे जिस दिशा में वे चाहें, उस दिशा में तीर छोड़ने के लिए कहा गया। प्रत्येक राजकुमार ने उस लड़की से विवाह करने की सहमति दी थी, जिसके घर पर उसका तीर जाकर गिरेगा–चाहे वह किसी राजकुमार की लड़की हो या किसी किसान की।

राजकुमारों ने धनुष उठाए और अलग-अलग दिशाओं में तीर छोड़े। सबसे छोटे राजकुमार को छोड़कर सभी राजकुमारों के तीर प्रसिद्ध और अत्यंत प्रतिष्ठित परिवारों के घरों पर जाकर गिरे थे। लेकिन सबसे छोटे राजकुमार द्वारा छोड़ा गया तीर शहर की सीमा से बाहर चला गया था और दृष्टि से ओझल हो गया था।

नौकर तीर की तलाश में सभी दिशाओं में दौड़ पड़े और एक लंबी खोज के बाद उसे एक बहुत बड़े बरगद के पेड़ की शाखा में गड़ा हुआ पाया गया, जिसके ऊपर एक बंदरिया बैठी थी।

‘एक बंदरिया!’ बच्चों ने आश्चर्य से कहा।

‘क्या राजकुमार ने बंदरिया से शादी की?’ अनिल ने पूछा।

जावेद खान ने जवाब नहीं दिया, लेकिन हुक्के का एक लंबा ताजगी देनेवाला कश खींचा और अपने श्रोताओं के ध्यान केंद्रण के दबने का इंतजार करने लगा।

(जावेद खान ने किस्सा जारी रखते हुए कहा) राजा को बहुत पछतावा हुआ, जब उसे पता चला कि उसके सबसे छोटे राजकुमार के तीर ने ऐसा दुर्भाग्यशाली निशाना लगाया है। राजा और उसके दरबारी एवं मंत्रियों ने एक त्वरित बैठक की और फैसला किया कि सबसे छोटे राजकुमार को तीर के साथ एक और अवसर दिया जाना चाहिए। लेकिन हर किसी को चकित करते हुए राजकुमार ने दूसरा अवसर लेने से इनकार कर दिया।

‘मैं शिकायत नहीं करता।’ उसने कहा, ‘ मेरे भाइयों को अच्छी और सुंदर पत्नियाँ मिली हैं और यह उनका सौभाग्य है। लेकिन मुझे वह कसम तोड़ने को मत कहो, जो मैंने तीर चलाने से पहले ली थी। मैं जानता हूँ कि मैं बंदरिया से विवाह नहीं कर सकता; लेकिन चूँकि मैं नहीं कर सकता, इसलिए मैं किसी से भी विवाह नहीं करूँगा। इसकी बजाय मैं बंदरिया को घर ले आऊँगा और एक पालतू की तरह से उसकी देखभाल करूँगा।’

और सबसे छोटा राजकुमार शहर से बाहर गया और बंदरिया को घर ले आया।

छह भाग्यशाली राजकुमारों के खूब धूमधाम से विवाह हुए। शहर में प्रकाश और आतिशबाजी से जश्न मनाया और सड़कों पर संगीत एवं नृत्य हुए। लोगों ने अपने घरों को आम और केले के पत्तों से सजाया था। पूरे शहर में खुशी का माहौल था, सिवाय सबसे छोटे राजकुमार के घर के, जो बहुत अकेला और दुःखी था। उसने अपनी बंदरिया के गले में हीरे का एक पट्टा डाला था और उसे मखमल की गद्दीवाली एक कुरसी पर बिठाया था।

राजकुमार ने कहा, ‘ऐ बंदरिया, आज इस खुशी के दिन तुम भी उतनी ही अकेली हो, जितना मैं हूँ। लेकिन मैं यहाँ तुम्हारे ठहराव को खुशियों से भर दूँगा! क्याी तुम्हें भूख लगी है? ‘ और उसने स्वादिष्ट आमों का एक कटोरा उसके सामने रख दिया तथा उसे उन्हें खाने के लिए राजी कर लिया। वह बंदरिया से बातें करने लगा और अधिकतर समय उसके साथ बिताने लगा। कुछ लोगों ने उसे मूर्ख या जिदूदी कहा; दूसरे सोचते थे कि वह थोड़ा सा पागल है।

राजा ने अपने मंत्रियों और बेटों के साथ स्थिति पर चर्चा की और राजकुमार को फिर से होश में लाने और किसी उपयुक्त परिवार में उसका विवाह करने के लिए कोई-न-कोई रास्ता निकालने का निर्णय किया। लेकिन सबसे छोटे राजकुमार ने अपने पिता, भाइयों और मित्रों की सलाह व मनुहारों को सुनने से इनकार कर दिया।

‘मैंने वचन दिया था,’ उसने उत्तर दिया,’ और मेरा वचन पहाड़ की तरह अटल है।’

महीनों गुजर गए, पर राजकुमार ने अपना मन नहीं बदला। इसके बजाय ऐसा लगने लगा कि उसका बंदरिया के प्रति लगाव अधिक बढ़ गया था और उसे अकसर महल के बागों में बंदरिया के साथ टहलते हुए देखा जाता था।

अंत में राजा ने सातों राजकुमारों की एक बैठक बुलाई और कहा, ‘मेरे बेटो, मैंने तुम्हें जीवन में खुशी-खुशी व्यवस्थित होते देखा है। यहाँ तक कि तुम भी, मेरे सबसे छोटे बेटे, अपनी अजीब साथी के साथ खुश दिखाई देते हो। एक पिता की खुशी अपने बेटे-बेटियों की खुशी में होती है। इसलिए मैं अपनी बहुओं से मिलना चाहता हूँ और उनको उपहार देना चाहता हूँ।’

सबसे बड़े बेटे ने तुरंत अपने पिता को अपने घर भोजन पर निमंत्रित कर दिया और दूसरों ने भी निमंत्रण को दुहरा दिया। राजा ने सबसे छोटे बेटे के निमंत्रण सहित सबके निमंत्रणों को स्वीकार कर लिया। स्वागत बहुत भव्य हुए और राजा ने अपनी बधुओं को कीमती जवाहरात एवं महँगी पोशारके उपहार में दीं। अंत में राजा का स्वागत करने की सबसे छोटे बेटे की बारी आई।

सबसे छोटा राजकुमार बहुत परेशान हुआ। वह उस घर में अपने पिता को कैसे आमंत्रित कर सकता था, जिसमें वह एक बंदरिया के साथ रहता था? वह जानता था कि उसकी बंदरिया इलाके की अनेक बड़ी-बड़ी महिलाओं से अधिक सौम्य और प्रिय है और वह इस बात पर दृढ़ था कि वह उसे छुपाएगा नहीं, जैसे वह कोई शरमिंदा होने वाली चीज हो।

बाग में उसके साथ टहलते हुए उसने कहा, ‘मुझे अब क्या करना चाहिए, मेरी दोस्त? काश, परेशानी की घड़ी में मुझे आराम, राहत देने के लिए तुम्हारे पास जुबान होती। मेरे सभी भाइयों ने मेरे पिता को अपने घर और अपनी पत्नियाँ दिखाई हैं। मैं जब तुम्हें उनके सामने प्रस्तुत करूँगा तो सब मेरा मजाक उड़ाएँगे।’

जब भी राजकुमार ने उससे कुछ कहा था, बंदरिया हमेशा एक मूक और सहानुभूतिपूर्ण श्रोता रही थी; लेकिन अब उसने देखा कि वह अपने पंजों से उसके लिए कोई संकेत कर रही थी। उस पर झुकते हुए राजकुमार ने देखा कि उसके एक हाथ में मिट्टी के बरतन का एक टुकड़ा था और वह उससे उसे लेने के लिए कह रही थी। राजकुमार ने उससे वह टूटा हुआ टुकड़ा ले लिया। उस पर सुंदर जनाना हस्तलेख में ये शब्द लिखे हुए थे–

‘चिंता न करें, राजकुमार। उस स्थान पर जाएँ, जहाँ आपने मुझे पाया था। मिट्टी के बरतन के इस टुकड़े को बरगद के पेड़ के खोखले तने में फेंक देना और किसी जवाब की प्रतीक्षा करना।’

राजकुमार पहले तो झिझका, लेकिन बाद में सोचा कि अपनी बंदरिया की बात मानने से उसकी समस्या और ज्यादा तो बिगड़ने वाली नहीं है। इसलिए, मिट्टी के बरतन का टूटा हुआ टुकड़ा लेकर वह शहर के बाहर गया और उस बरगद के पेड़ के पास पहुँचा।

वह एक बहुत पुराना, सैकड़ों साल पुराना बरगद का पेड़ था। उसकी शाखाएँ और जड़ें एक विस्तृत गोल घेरे में फैली हुई थीं और उसके पत्ते छोटे-छोटे कुंजों का निर्माण कर रहे थे। उसका तना हालाँकि अंदर से खोखला था, लेकिन बहुत बड़ा और मोटा था। उसके पास जाकर राजकुमार ने मिट्टी के बरतन का वह टुकड़ा पेड़ के खोखले तने में फेंक दिया और यह देखने के लिए इंतजार करने लगा कि क्या होता है!

उसे ज्यादा देर तक इंतजार नहीं करना पड़ा। कुछ ही पलों के बाद हरे रंग की पोशाक पहने एक सुंदर लड़की तने से निकलकर बाहर आई और राजकुमार से अपने पीछे आने के लिए कहा। उसने राजकुमार को बताया कि उसकी राजकुमारी, परियों की रानी, उससे व्यक्तिगत रूप में मिलना चाहती थी।

राजकुमार पेड़ पर चढ़ा और खोखले तने में प्रवेश कर गया और थोड़ी देर अँधेरे में टटोलकर चलने के बाद अचानक वह आँखें चौंधिया देनेवाले आश्चर्यजनक बाग में पहुँचा, जिसके अंत में एक आकर्षक महल खड़ा हुआ था। ऊँचे-ऊँचे सूरजमुखी के फूलों से बाग की सीमा बनी हुई थी। फूलों के बीच में एक मधुर सुगंधवाली जलधारा वह रही थी और जलधारा के तले में कंकरों की जगह माणिक, हीरे व नीलम थे। यहाँ तक कि इस दुनिया में फैला प्रकाश भी उसकी अपनी दुनिया से ज्यादा गरम और मृदु था। उसे सोने की सीढ़ियों से चाँदी के एक फव्वारे के पीछे और इंद्रधनुषी सीपियों से बने महल के दूवारों में से ले जाया गया। लेकिन जिस कमरे में उसे ले जाया गया था, उस कमरे का वैभव परियों की उस राजकुमारी के अतुल्य सौंदर्य के आगे फीका पड़ गया था, जो उसके सामने खड़ी थी।

‘हाँ, राजकुमार, आपका संदेश मैं जानती हूँ।’ उसने कहा, ‘चिंतित न हों, लेकिन घर जाएँ और कल शाम को अपने पिता महाराज तथा अन्य शाही मेहमानों के स्वागत की तैयारी करें। मेरे सेवक सबकुछ सँभाल लेंगे।’

अगली सुबह जब राजकुमार अपने महल में जागा तो एक अद्भुत नजारा उसकी आँखों के सामने था। उसका महल जैसे एक नए जीवन से भर गया था। उसके बाग आम, पपीता, अनार और आड़ू के फलदार पेड़ों से भरे हुए थे। पेड़ों की छाया में स्टॉलें लगी थीं, जिन पर फल, मिठाइयाँ, इत्र और शरबत उपलब्ध थे। बच्चे लॉन में खेल रहे थे और पुरुष व स्त्रियाँ संगीत सुन रहे थे।

राजकुमार ने जो देखा, उससे वह हक्का-बक्का रह गया था और तब तो वह और भी ज्यादा अचंभित हुआ, जब उसने अपने महल में प्रवेश किया और वहाँ भरपूर शोर व गतिविधियाँ पाईं। स्वादिष्ट भोजनों से मेजें लदी हुई थीं। छतों से बड़े-बड़े झाड़-फानूस लटक रहे थे। फूलों के बंदनवारों की सुगंध ने पूरे महल को महका रखा था।

तभी एक सेवक दौड़ता हुआ आया और घोषणा की कि राजा अपने दरबारियों के साथ पधार रहे हैं। राजकुमार उनकी अगवानी के लिए लपका। वह उन्हें स्वागत कक्ष में लेकर आया, जिसे सुंदर ढंग से सजाया गया था। वहाँ भोजन परोसा गया। उसके बाद हर किसी ने राजकुमार द्वारा चुनी गई साथी को देखने पर जोर दिया। हर किसी ने यह सोचा था कि इतने शानदार भोज के बाद बंदरिया को देखना एक मजेदार मनोरंजन होगा।

राजकुमार उनके अनुरोध को टाल नहीं सका और उदास मन से बंदरिया की तलाश में अपने कमरे में गया। उसे उस उपहास से डर लग रहा था, जिसका उसे सामना करना था। वह जानता था कि यह उसकी अपनी कसम को न तोड़ने की जिद का इलाज करने के प्रयासों का एक तरीका है।

राजकुमार ने अपने कमरे का दरवाजा खोला और प्रकाश की चौंध से लगभग अंधा ही हो गया था। कमरे के बीचोबीच सिंहासन पर वही राजकुमारी बैठी थी, जिससे वह बरगद के पेड़ के अंदर मिला था।

‘हाँ, आइए राजकुमार।’ राजकुमारी ने कहा, ‘क्योंकि मैंने आपको पिछली बार अपने महल में देखा था, तब से मैं आपके सिवाय कुछ भी नहीं सोच सकी हूँ। मैंने बंदरिया को दूर भेज दिया है और आपको अपने हाथ की पेशकश करने के लिए आई हूँ।’

यह सुनकर कि उसकी पालतू बंदरिया चली गई है, उसके आँसू फूट पड़े और उसने गुस्से में कहा, ‘यह तुमने क्याि कर दिया है? तुम्हारी सुंदरता मेरी मित्र की क्षतिपूर्ति नहीं कर पाएगी।’

तब राजकुमारी ने मुसकराते हुए कहा, ‘अगर मेरा सौंदर्य आपको प्रभावित नहीं करता है तो मेरे आभार के कारण मेरा हाथ थाम लीजिए। देखिए, मैंने आपके पिताजी और भाइयों के लिए इस दावत को तैयार करने में कितना परिश्रम किया है! मेरे पति बन जाइए। दुनिया की सारी दौलत और खुशियाँ आपके कदमों में होंगी।’

राजकुमार क्रोधित था, ‘मैंने इस सबके लिए तुमसे कभी नहीं कहा था और न ही मैं यह जानता हूँ कि मुझे मेरी बंदरिया से महरूम करने के पीछे क्या चाल है! उसे मेरे पास वापस लाओ, मैं तुम्हारा दास बन जाऊँगा।’

फिर राजकुमारी ने सिंहासन छोड़ दिया और राजकुमार का हाथ पकड़कर बड़े प्रेम और सम्मान के साथ उससे बोली, ‘ आप मुझ में अपनी मित्र और साथी को देखिए, मैंने आपके विश्वास और निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए ही बंदरिया का रूप रखा था। देखिए, मेरी बंदरिया की खाल उस कोने में पड़ी है।’

राजकुमार ने देखा कि कमरे के एक कोने में बंदरिया की खाल पड़ी हुई थी।

वह और राजकुमारी दोनों सिंहासन पर बैठे और जब राजकुमारी ने कहा, ‘उठो, उठो, उठो।’ तभी सिंहासन हवा में ऊपर उठा और तैरता हुआ उस हॉल में पहुँचा, जहाँ अतिथि एकत्र हुए थे। राजकुमार ने राजकुमारी को अपने पिता के सामने प्रस्तुत किया। तुम राजा और अतिथियों के आश्चर्य का अनुमान लगा सकते हो, जो वहाँ मेजबान के रूप में एक बंदरिया को देखने के लिए आए थे। राजा ने अपनी नई पुत्रबधू को अनेक उपहार दिए और जल्दी ही पूरे इलाके में लोग राजकुमार और उसकी सुंदर रानी की प्रशंसा करने लगे।

लेकिन ऐसे शानदार लोगों की खुशी का वर्णन करनेवाला मैं कौन होता हूँ?

(रस्किन बांड की रचना ‘कश्मीरी किस्सागो’ से)

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Lok Kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-11 (कश्मीरी लोक कथाएँ-11)

माँ वैष्णोदेवी: कश्मीरी लोक-कथा

आपने जम्मू की वैष्णो माता का नाम अवश्य सुना होगा। आज हम आपको इन्हीं की कहानी सुना रहे हैं, जो बरसों से जम्मू-कश्मीर में सुनी व सुनाई जाती है।

कटरा के करीब हन्साली ग्राम में माता के परम भक्त श्रीधर रहते थे। उनके यहाँ कोई संतान न थी। वे इस कारण बहुत दुखी रहते थे।

एक दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में भी उन्हीं के बीच आ बैठीं। अन्य कन्याएँ तो चली गईं किंतु माँ वैष्णों नहीं गईं। बह श्रीधर से बोलीं-

‘सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ।’

श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस-पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहूँचा दिया। लौटते समय गोरखनाथ व भैरवनाथ जी को भी उनके चेलों सहित न्यौता दे दिया।

सभी अतिथि हैरान थे कि आखिर कौन-सी कन्या है, जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है?

श्रीधर की कुटिया में बहुत-से लोग बैठ गए। दिव्य कन्या ने एक विचित्र पात्र से भोजन परोसना आरंभ किया।

जब कन्या भैरवनाथ के पास पहुँची तो वह बोले, ‘मुझे तो मांस व मदिरा चाहिए।’

‘ब्राह्मण के भंडारे में यह सब नहीं मिलता।’ कन्या ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया।

भैरवनाथ ने जिद पकड़ ली किंतु माता उसकी चाल भाँप गई थीं। वह पवन का रूप धारण कर त्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चलीं।

भैरव ने उनका पीछा किया। माता के साथ उनका वीर लंगूर भी था। एक गुफा में माँ शक्ति ने नौ माह तक तप किया। भैरव भी उनकी खोज में वहाँ आ पहुँचा। एक साधु ने उससे कहा, ‘जिसे तू साधारण नारी समझता है, वह तो महाशक्ति हैं।’

भैरव ने साधु की बात अनसुनी कर दी। माता गुफा की दुसरी ओर से मार्ग बनाकर बाहर निकल गईं। वह गुफा आज भी गर्भ जून के नाम से जानी जाती है।

देवी ने भैरव को लौटने की चेतावनी भी दी किंतु वह नहीं माना। माँ गुफा के भीतर चली गईं। द्वार पर वीर लंगूर था। उसने भैरव से युद्ध किया। जब वीर लंगूर निढाल होने लगा तो माता वैष्णो ने चंडी का रूप धारण किया और भैरव का वध कर दिया।

भैरव का सिर भैरों घाटी में जा गिरा। तब माँ ने उसे वरदान दिया कि जो भी मेरे दर्शनों के पश्चात भैरों के दर्शन करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएँ पूरी होंगी।

आज भी प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु माता वैष्णो के दर्शन करने आते हैं। गुफा में माता पिंडी रूप में विराजमान हैं।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Lok Kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-11 (कश्मीरी लोक कथाएँ-11)

पंजाबी भोजन: कश्मीरी लोक-कथा

एक था मिलखासिंह। वह पंजाब का रहने वाला था। उसका एक मित्र कश्मीर की वादी में रहता था। मित्र का नाम था आफताब।

एक बार मिलखासिंह को आफताब के यहाँ जाने का मौका मिला। दोनों मित्र लपककर एक-दूसरे के गले से लग गए।

आफताब ने रसोईघर में जाकर स्वादिष्ट पकवान तैयार करने को कहा और मिलखासिंह के पास बैठ गया। कुछ ही देर में खाने की बुलाहट हुई।

मिलखासिंह ने भरपेट भोजन किया। आफताब ने पूछा, ‘यार, खाना कैसा लगा?’

मिलखा बोला, ‘खाना तो अच्छा था पर ‘साडे पंजाब दीयाँ केहड़ीआं रीसाँ।’ (हमारे पंजाब का मुकाबला नहीं कर सकता)।

आफताब को बात लग गई। रात के भोजन की तैयारी जोर-शोर से की जाने लगी। घर में खुशबू की लपटें उठ रही थीं। रात को खाने की मेज पर गुच्छी की सब्जी से लेकर मांस की कई किसमें भी परोसी गईं।

मिलखासिंह ने खा-पीकर डकार ली तो आफताब ने बेसब्री से पूछा- ‘खाना कैसा लगा, दोस्त?’

‘साडे पंजाब दीयाँ केहड़ीआं रीसाँ।’ मिलखासिंह ने फिर वही जवाब दिया।

आफताब के लिए तो बहुत परेशानी हो गई। वह अपने मित्र के मुँह से कहलवाना चाहता था कि कश्मीरी खाना बहुत लज्जतदार होता है।

वादी के होशियार रसोइए बुलवाए गए। घर में ऐसा हंगामा मच गया मानो किसी बड़ी दावत की तैयारी हो। अगले दिन दोपहर के भोजन में एक-से-एक महँगे और स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए। रोगनजोड़ा, कबाब, करम का साग, केसरिया चावल, खीर आदि पकवानों में से खुशबू की लपटें उठ रही थीं।

काँच के सुंदर प्यालों में कई किस्म के फल रखे गए थे। मिलखासिंह ने भोजन किया और आफताब के पूछने से पहले ही बोला,

‘अरे, ऐसा लगता है, किसी धन्नासेठ की दावत है।’

आफताब के मन को फिर भी तसल्ली न हुई। मिलखासिंह जी पंजाब लौट गए।

कुछ समय बाद आफताब को पंजाब जाने का अवसर मिला। उसने सोचा-

‘मिलखासिंह के घर जरूर जाऊँगा। देखूँ तो सही, वह क्या खाते हैं?’

मिलखासिंह ने कश्मीरी मित्र का स्वागत किया। थोड़ी ही देर में भोजन का समय हो गया। दोनों मित्र खाना खाने बैठे। मिलखा की पत्नी दो प्लेटों में सरसों का साग और मक्की  की रोटी ले आई। दो गिलासों में मलाईदार लस्सी भी थी।

आफताब अन्य व्यंजनों की प्रतीक्षा करने लगा। मिलखासिंह बोला, ‘खाओ भई, खाना ठंडा हो रहा है।’

आफताब ने सोचा कि शायद अगले दिन पंजाब के कुछ खास व्यंजन परोसे जाएँगे।

अगले दिन भी वही रोटी और साग परोसे गए। आफताब ने हैरानी से पूछा, ‘मिलखासिंह, तुम तो कहते थे कि “पंजाब दीयाँ केडियाँ रीसाँ। यह तो बिलकुल साधारण भोजन है।’

मिलखासिंह ने हँसकर उत्तर दिया, ‘आफताब भाई, तुम्हारे भोजन के स्वाद में कोई कमी न थी, किंतु वह इतना महँगा था कि आम आदमी की पहुँच से बाहर था। हम गाँववाले सादा भोजन करते हैं, जो कि पौष्टिक भी है और सस्ता भी। यही हमारी सेहत का राज है।’

आफताब जान गया कि मिलखासिंह सही कह रहा था। सादा भोजन ही अच्छे स्वास्थ्य का राज है।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Lok Kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-10 (कश्मीरी लोक कथाएँ-10)

बदल गई राजो: कश्मीरी लोक-कथा

एक गाँव में रहती थी राजो बुढ़िया। वह घर में अकेली थी। पति की मृत्यु हो गई थी और बाल-बच्चे भी न थे।

राजो के आँगन में सेब और अखरोट के बहुत-से पेड़ थे। राजो दिनभर भगवान शिव की पूजा करती थी। सेब और अखरोट बेचकर अच्छी गुजर-बसर हो जाती थी।

राजो को बच्चों से बहुत नफरत थी। बच्चों को देखते ही वह डंडा लेकर मारने दौड़ती। बच्चे भी उसे बहुत चिढ़ाते थे। एक दिन राजो ने बहुत-सारे पत्थर इकट्ठे कर लिए और मन-ही-मन सोचा-

‘ज्यों-ही कोई बच्चा अखरोट तोड़ने आएगा, मैं उसे पत्थर मार दूँगी।’

सुबह से दोपहर, दोपहर से शाम हो गई पर कोई बच्चा नहीं आया। बुढ़िया ने हारकर पत्थर सँभाल दिए। तभी अँधेरे में एक परछाईं दिखाई दी। राजो ने पत्थर खींचकर दे मारा। पत्थर ठीक निशाने पर लगा। वह बच्चा अखरोट चुराने आया था।

माथे से बहते लहू को पोंछकर वह वापिस चला गया। राजो को बहुत खुशी हुई कि चलो एक दुश्मन तो कम हुआ।

उसी रात सपने में उसने देखा कि भगवान शंकर दिव्य रूप में विराजमान हैं और उनके माथे से खून बह रहा है। माता पार्वती खून बहने का कारण पूछती हैं तो वे कहते हैं, मेरी एक भक्तिन ने बच्चे को चोट पहुँचाई। वही दर्द मुझे हो रहा है। वह मूर्ख यह नहीं जानती कि बच्चों में ही ईश्वर का निवास होता है। वे ही भगवान के रूप हैं।

यह सपना देखते ही राजो की आँखें खुल गईं। उसे बहुत पश्चात्ताप हुआ। मारे दुख के वह बीमार पड़ गई।

अगली सुबह गली के बच्चों ने देखा कि राजो बुढ़िया चुप है। गालियों की आवाज भी नहीं आ रही है। वे सब राजो से बहुत प्यार करते थे।

एक बच्चा डरते-डरते भीतर गया। बुढ़िया बुखार में तप रही थी। वह भागकर वैद्यजी को बुला लाया। कोई अपने घर से खिचड़ी बनाकर लाया तो किसी ने घर की सफाई कर दी।

राजो चुपचाप बिस्तर पर पड़ी आँसू बहाती रही। वह जान गई थी कि सच्चा सुख मिलकर जीने में ही आता है। वे बच्चे, जो कल तक उसे चिढ़ाते थे, आज जी-जान से सेवा कर रहे थे।

कुछ ही दिनों में राजो भली-चंगी हो गई। हाँ, अब वह राजो बुढ़िया नहीं रही थी। सभी बच्चे प्यार से राजो अम्मा कहने लगे थे।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Lok Kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-9 (कश्मीरी लोक कथाएँ-9)

बिलाल की जिद: कश्मीरी लोक-कथा

बिलाल ने फिर जिद पकड़ ली कि वह तब तक रोटी नहीं खाएगा, जब तक उसका नाम नहीं बदला जाएगा। माँ ने लाख समझाया पर वह टस-से-मस नहीं हुआ। बिलाल के दोस्तों ने उसके मन में वहम डाल दिया था कि उसका नाम सुंदर नहीं है।

तंग आकर उसकी माँ ने कहा, ‘जा बेटा, जो नाम तुझे पसंद हो वही छाँट ला। मैं तेरा नाम बदलवा दूँगी।’

बिलाल जी नए नाम को खोज में निकले। एक आदमी की शवयात्रा जा रही थी। बिलाल ने लोगों से पूछा-

‘यह जो मर गया, इसका नाम क्या  था?’

लोगों ने उत्तर दिया, ‘अमरनाथ।’

“हैं, नाम अमरनाथ है, फिर भी मर गया!’ बिलाल हैरान हो गया।

आगे बाजार में एक बुढिया माई सब्जी बेच रही थी। उसकी सड़ी हुई सब्जी कोई नहीं खरीद रहा था। बिलाल ने उसी से पूछा, “माई, तुम्हारा नाम क्या है?!

माई ने खाँसते-खाँसते जवाब दिया-

“मुझे रानी कहते हैं।”

बिलाल ने अचरज से उसके चेहरे की ओर देखा और आगे बढ़ गया। एक मैदान में दंगल हो रहा था। दोनों दलों के व्यक्ति अपने-अपने पहलवानों की प्रशंसा में लगे थे। बिलाल ने एक हट्टे-कट्टे पहलवान का नाम जानना चाहा तो लोगों ने कहा-

‘अरे बेटा, उसे नहीं जानते वह तो मशहूर चींटी दादा है।’

बेचारा बिलाल परेशानी में पड़ गया-

अमरनाथ तो स्वर्ग सिधार गया।

सब्जी बेचे रानी।

आया नया जमाना

चींटी दादा करे पहलवानी।

शाम को थक-हारकर बिलाल घर पहुँचा तो माँ ने पूछा, ‘मेरे लाल को क्या नाम पसंद आया?’

बिलाल ने माँ के गले में बाँहें डाल दीं और लाड से बोला-

‘माँ, नाम में क्या रखा है! इंसान अपने कर्मों से महान बनता है। मेरे नाम में कोई कमी नहीं है। मैं बिलाल ही ठीक हूँ।’

माँ ने चैन की साँस ली। उसके बेटे ने बहुत सच्ची बात कही थी।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-8 (कश्मीरी लोक कथाएँ-8)

भोलानाथ की चालाकी: कश्मीरी लोक-कथा

कश्मीर में एक गाँव था। चिनार के लंबे-लंबे वृक्षों और मनमोहक झरनों के कारण उसकी खूबसूरती और भी बढ़ गई थी। उसी गाँव में रहता था ‘भोलानाथ’। नाम तो भोलानाथ था किंतु वह था बड़ा चतुर।

वह दिन-रात गाँववालों को ठगने की योजनाएँ बनाता रहता था। गाँववालों ने मिलकर एक सभा बुलाई। कई बुजुर्ग अपनी-अपनी काँगडियाँ लिए पहुँच गए। समावार (केतलीनुमा बर्तन जिसमें कोयले सुलगाकर चाय बनती है।) में गरम-गरम चाय तैयार थी। मुखिया ने सबको चेतावनी दी कि वे गलती से भी भोलानाथ की चिकनी-चुपड़ी बातों में न आएँ।

गाँववालों ने प्यालों में चाय सुड़की और लौट गए। इधर भोलानाथ के मन में नई खुराफात तैयार थी। वह सूफिया के घर जाकर बोला-

‘बहन, मेरी रिश्ते की आपा आई हैं पर सर्दी के मारे उनका बुरा हाल है। यदि एतराज न हो तो अपना फिरन दे दो। जल्दी ही लौटा दूँगा।’

सूफिया ने एक-दो पल सोचा और फिरन दे दिया। भोलानाथ ने इसी तरह बहाने से दो-तीन घरों से फिरन माँग लिया। चार-पाँच दिन बाद वह सूफिया के घर पहुँचा और एक की बजाए दो फिरन लौटाए। सूफिया बोली, “भाई भोलानाथ, यह छोटा फिरन तो मेरा नहीं है।’

‘बहन तुम्हारे फिरन ने रात ही इसे पैदा किया है। यह इसका बच्चा है तुम रख लो।’

सोफिया भला क्यों  मना करती? उसने दोनों फिरन रख लिए। इसी तरह भोलानाथ ने जिस-जिस से फिरन माँगे थे। सबको दो-दो लौटाए। सबने सोचा कि भोलानाथ का दिमाग फिर गया। फिर भी मुफ्त का माल क्यों  लौटाया जाए!

थोड़े दिनों बाद भोलानाथ ने एक और चाल चली। वह गाँववालों से जाकर बोला-

“कुछ विदेशी पर्यटकों को पश्मीने की शालों के नमूने दिखाने हैं। अपनी सभी शालें दे दो।’

गाँववालों ने सोचा कि यह दोबारा दो-दो शालें वापिस करेगा। सबने हँसकर पश्मीने की कीमती शालें उसे सौंप दीं।

कई महीने बीत गए। भोलानाथ ने शाल नहीं लौटाईं। गाँववाले एकत्र हुए और भोलानाथ के घर जा पहुँचे। वह जमीन पर गिरकर रोने लगा। सबने पुचकारकर अपने सामान के बारे में पूछा तो वह बोला- ‘क्या बताऊँ जी, सबकी शालों ने इस बार दो-दो छोटी शालें पैदा की थीं।’

सुनते ही गाँववाले मन-ही-मन खुश हो गए। भोलानाथ ने बात आगे बढ़ाई- ‘पर क्याक बताऊँ, वे सब शालें कल रात अपने बच्चों को लेकर भाग गईं।’

“क्या ….?’ गाँववालों के मुँह खुले के खुले रह गए।

‘जी हाँ, मैं सच कहता हूँ।’ भोला ने आँसू पोंछते हुए कहा,

‘मामला गाँव के बुजुर्गों तक जा पहुँचा। उन्होंने भोला को बुलाकर पूछा तो वह शरारती स्वर में बोला-

‘शालें तो घर छोड़कर भाग गईं।’

भला शालें भी कभी चलती हैं, बुजुर्गों ने पूछा, “जी हाँ, बेशक चलती हैं। यदि वह बच्चे पैदा कर सकती हैं तो चल भी सकती हैं।”

सूफिया ने गुस्से से कहा, ‘भला शाल के भी बच्चे पैदा होते हैं?’

‘हाँ होते हैं, जैसे फिरन के पैदा हुए थे। तुमने ही तो रखे थे।’

भोलानाथ के जवाब ने सबको निरुत्तर कर दिया। उसने एक बार फिर सबको ठग लिया था।

बच्चो, चतुर अवश्य बनना पर भोलानाथ जैसा नहीं।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Lok Kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-7 (कश्मीरी लोक कथाएँ-7)

सनकी अजूबामल: कश्मीरी लोक-कथा

बात उन दिनों की है, जब कश्मीर में छोटे-छोटे शासकों का राज्य था। उन सबके राज्यों की अपनी-अपनी सीमाएँ थीं। सभी राजाओं के अपने नियम व कानून थे।

एक था राजा ‘अजूबामल’। उसके नगर के चारों ओर घनी पहाडियाँ थीं। उसके यहाँ सभी चीजों का दाम एक टका था। केसर हो या नमक, सब्जी हो या लकड़ी, कोयला हो या सोना, सब एक ही दाम में तुलते थे।

अजूबामल बहुत मनमानी करता था। उसने कुछ चापलूस मंत्री नियुक्त कर रखे थे। वह उन्हीं की सलाह से सभी काम करता। बेचारी प्रजा डर के मारे कुछ नहीं कहती थी। उस नगर में शिकायत करने वाले को ही जेल हो जाती थी।

एक बार नगर में तीन मित्र आए। वहाँ की दशा देखकर पहले दो मित्रों ने कहा, भैया, इस नगर में रहना खतरे से खाली नहीं है। राजा की सनक का क्या भरोसा? कब किसे दबोच ले?’

तीसरा मित्र सभी चीजों के इतने कम दामों से खुश था। वह बोला, ‘मैं तो यहां मजे से जीवन गुजारूँगा। कितनी अच्छी बात है कि मनचाही चीजें मिलेंगी।’

पहले दो मित्रों ने उसे बहुत समझाया कि वह लौट चले किंतु तीसरा मित्र टस-से-मस न हुआ। हारकर पहले दो मित्रों ने अपना पता देकर कहा, ‘यदि हमारी जरूरत पड़े तो बुलवा लेना। हम शीघ्र ही मदद को आ जाएँगे।’

तीसरे मित्र ने बे-मन से उनका पता संभाला और मकान की खोज में चल पड़ा। पहले दो मित्रों ने घोड़े को एड़ लगाई और रातों-रात नगर से बाहर निकल गए।

तीसरा मित्र सुबह सोकर उठा। मुँह-हाथ धोकर बाजार की ओर चल पड़ा। वहाँ उसने एक टका देकर स्वादिष्ट मिठाई खरीदी। दोने में से पहला टुकड़ा उठाया ही था कि राजा के सिपाहियों ने उसे चारों ओर से घेर लिया।

हुआ यूँ कि पिछली रात राजा के महल में चोरी हो गई थी। राजा ने आदेश दिया, ‘जो भी अजनबी नगर द्वार से भीतर आया है, बेशक वही चोर होगा। उसे फाँसी पर लटका दो।’

अब तो तीसरे मित्र की जान पर बन आई। उसने राजा से अनुनय-विनय की किंतु राजा ने अनसुना कर दिया।

अंत में उसने दोनों मित्रों को सारा हाल लिखकर संदेश भिजवा दिया।

अगले ही दिन फाँसी का समय तय हुआ। बाजार के बीचों-बीच चौक पर फाँसी दी जानी थी।

सारा शहर अजनबी चोर को देखने उमड़ पडा। राजा भी पालकी पर सवार होकर पहुँच गया।

तभी तीसरे मित्र के पास एक खत पहुँचा। वह दोनों मित्रों ने लिखा था। तीसरे ने खत पढ़ा और फाड़कर चबा गया। कुछ ही देर में दोनों मित्र भी आ पहुँचे।

ज्यों ही जल्लाद आगे बढ़ा। पहला मित्र राजा के चरणों में गिरकर बोला, ‘महाराज, मेरे मित्र को छोड़ दें। इसके बाल-बच्चे बहुत छोटे हैं।’

तीसरा मित्र वहीं से चिल्लाया, ‘नहीं महाराज, मुझे मरने दें। भला मरने से कैसा डरना?’

उसकी बात काटकर दूसरा मित्र बोला, ‘तुम दोनों सौ साल जीओ। महाराज तो मुझे ही फाँसी चढ़ाएँगे।’

बस फिर क्या था! एक नौटंकी शुरू हो गई। तीनों मित्र एक-दूसरे से पहले मरना चाहते थे।

राजा अजूबामल चक्कर खा गया। वह कभी एक मित्र की ओर देखता तो कभी दूसरे की ओर।

नगरवासी इस तमाशे को देखकर हैरान थे। अजूबामल ने तीनों मित्र को अपने पास बुलाकर पूछा, ‘मुझे सच-सच बता दो कि तुम मरने के लिए इतने उत्सुक क्योंब हो? वरना मैं सबको जेल में डाल दूँगा।’

तीसरे मित्र ने योजना के मुताबिक हिचकिचाते हुए उत्तर दिया, ‘महाराज, आज मरने की बहुत शुभ घड़ी है। इस घड़ी में मरने वाला सीधा स्वर्गलोक जाएगा, इसलिए हम लड़ रहे हैं?’

यह सुनते ही अजूबामल का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।

कड़क कर बोला, ‘प्यारे मंत्रियो, शुभ घड़ी में मरने का सबसे पहला हक राजा को मिलना चाहिए। भला मेरे होते कोई और स्वर्ग में क्योंत जाएगा? मुझे शीघ्र ही फाँसी पर चढ़ा दो।’

मंत्रियों ने सोचा कि राजा के मरते ही हम राज्य पर कब्जा कर लेंगे।

उन्होंने एक क्षण भी विलंब नहीं किया और अजूबामल को फाँसी पर चढ़ा दिया। प्रजा मंत्रियों की चाल भाँप गई थी। उसने पत्थर मार-मारकर मंत्रियों को अधमरा कर दिया। जानते हो नया राजा कौन बना? पहले मित्र को राजा बनाया गया, क्योंकि उसकी बुद्धिमानी से ही अजूबामल का अंत हुआ था। बाकी दो मित्र मंत्री बने। नगर में उचित कायदे-कानून बने और सभी सुख से रहने लगे।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Lok Kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-6 (कश्मीरी लोक कथाएँ-6)

अकनंदुन कश्मीरी लोक-कथा

प्राचीन काल में कश्मीर के एक भाग पर जिसका नाम नाम संघिपत नगर था एक राजा राज करता था। यह जगह अब जलमग्न हो गई है और उसकी जगह अब झील वुलर है। राजा के कोई पुत्र न था। अत: राजा और उसकी रानी, जिसका नाम रत्नमाला था, पुत्र पाने की इच्छा से, साधु संतों की बड़ी सेवा किया करते। एक दिन उनके महल में एक जोगी आया। उन्होंने इस जोगी की बड़ी आव-भगत की और अपनी मनोकामना उसके सामने प्रकट की।

जोगी ने उत्तर दिया-राजन् आपको पुत्र प्राप्त होगा, मगर एक शर्त पर।

राजा-रानी एक साथ बोले-कहिए वह कौन सी शर्त है, हम भी तो सुनें?

यह उत्तर पाकर जोगी बोला-शर्त कठिन है। संभवत: आप स्वीकार न करें। वह यह है कि यदि मेरी कोशिश से आपके पुत्र जन्मेगा तो वह केवल ग्यारह वर्ष तक आपका होगा, और उसके बाद आपको उसे मुझे सौंपना होगा। कहिए, क्या आपको यह शर्त स्वीकार है?

राजा और रानी कुछ समय तक एक-दूसरे का मुंह ताकते रहे और फिर बाद में बोले-जोगी महाराज! हमें पुत्र चाहिए, चाहे वह ग्यारह वर्षों तक ही हमारे पास रहे। हमें आपकी शर्त मंजूर है।

सुन कर जोगी ने उत्तर दिया-अच्छा, तो आज से नौ मास के बाद आपके यहां पुत्र होगा। कह कर वह उन्हें आशीर्वाद देकर चला गया।

रानी ने सचमुच ही यथा समय एक सुन्दर बालक को जन्म दिया। उसका नाम अकनंदुन रखा गया। अकनंदुन बड़ा होकर पाठशाला में पढ़ने लगा तो वहां वह अपनी कक्षा के छात्रों में सबसे बुद्धिमान गिना जाने लगा। दिन बीतते गए और उसका ग्यारहवां जन्म दिन आया। उस दिन वही जोगी न मालूम कहां से फिर आ पहुंचा और राजा-रानी से बोला-अब आप अपनी शर्त पूरी कीजिए और अकनंदुन को मेरे हवाले कीजिए।

भारी मन से राजा-रानी ने अकनंदुन को पाठशाला से बुलवाया और जोगी से कहा-जोगी महाराज, यह है आपकी अमानत।

उसे देखते ही जोगी गंभीर होकर बोला- तो फिर देर क्या है? मैं भूखा हूं, इसका वध करके, इसके मांस को पकाइए और मुझे खिलाइए। जल्दी कीजिए मुझे भूख सता रही है।

राजा-रानी ने रो-रो कर जोगी को इस घृणित और क्रूर कार्य से रोकने का प्रयत्न किया, पर वह एक न माना और क्रोधित होकर बोला-इसके सिवा मुझे और कुछ स्वीकार नहीं। हां एक और बात, इसका वध तुम दोनों के हाथों ही होना भी जरूरी है।

खैर रोते-धोते और मन में इस दुष्ट जोगी को बुरा-भला कहते हुए उन्होंने अकनंदुन को मार डाला। उसका मांस रसोईघर में जब पक कर तैयार हुआ तो जोगी बोला-अब देर क्या है? इसे चार थालियों में परोसो। एक मेरे लिए, दो तुम दोनों के लिए और चौथी स्वयं अकनंदुन के लिए।

अकनंदुन की थाली का नाम सुनकर वहां उपस्थित लोग क्रोध से लाल-पीले और हैरान हो उठे। पर जोगी की आज्ञा का पालन करके चार थाल परोसे गए। सभी अपने-अपने आसन पर बैठे। राजा-रानी के नेत्रों से निरंतर अश्रुधारा बह रही थी। इतने में ही जोगी बोला-रानी रत्ना! उठो और खिड़की में से वैसे ही अपने पुत्र को बुलाओ जैसे रोज बुलाती हो। जल्दी करो खाना ठण्डा हो रहा है।

रानी रत्नमाला भारी हृदय से उठकर खिड़की की ओर गई और रोते-विलाप करते हुए उसने अकनंदुन का नाम पुकारा। उसके पुकारने की देर थी कि सीढ़ियों पर से दिन प्रतिदिन की तरह ‘आया माताजी’ कहता हुआ अकनंदुन वहां पहुंच गया। रत्नमासला और राजा से लपक कर गले लगा। पर यह क्या? जब उन्होंने थालियों और जोगी की ओर देखा तो वहां न तो जोगी ही था और न वे परोसे गए थाल ही। जोगी की हर जगह तलाश की गई पर वह कहीं न मिला। वह कहां से आया था और कहां गया, इसका भी किसी को पता न चला।

राजा-रानी अकनंदुन को पुन: पाकर अत्यंत हर्षित हुए।

(इस लोककथा को रमजान भट नामकएक कवि ने गाथा-गीत के रूप में कविताबद्ध किया है। यह गाथा-गीत कश्मीरियों का एक लोकप्रिय गीत है।)

रस्सीये जकड़, डण्डे मार कश्मीरी लोक-कथा

एक गांव में एक दर्जी रहता था। उसने एक बकरी पाली हुई थी। वह बकरी बातें करती थी। उस दर्जी के तीन बेटे थे। वे दर्जी-पुत्र जब बड़े हुए तो दर्जी ने उन्हें बकरी चराने का काम सौंपा। वह बकरी दिन भर चरती और भर पेट खाती। पर जब दर्जी शाम को उस पर हाथ फेर कर उससे हाल पूछता, तो वह कहती-आपके बेटे मुझे मैदान में एक खूंटे से बांध कर रखते हैं। वह स्वयं खेलते रहते हैं और मैं भूखी रहती हूं।

दर्जी बहुत दिनों तक बात टालता रहा। फिर एक दिन उसने बेटों को डांट-डपट कर कहा-निकल जाओ घर से, तुम सब निकम्मे हो।

बेकसूर लड़के भी एक दम घर से निकल गए। उनके जाने के बाद दर्जी को बकरी की धूर्तता का पता चला। वह अब अपनी गलती पर पछताने लगा और बेटों के घर लौट आने की राह देखता रहा।

दर्जी के तीनों पुत्रों को घर से दूर एक-दूसरे से अलग-अलग नौकरी मिल गई। उनके मालिक उनके काम से खुश हुए। सबसे बड़ा लड़का लड़की का साज-सामान बनाने वाले के पास नौकर हो गया। दूसरा उसी नगर में एक पनचक्की पर नौकर हो गया और तीसरा एक दुकानदार के यहां।

दोनों बड़े भाइयों को पिता की याद सता रही थी। उन्होंने फैसला किया कि वह घर लौट जाएंगे। उनके मालिक भी इस बात को मान गए। बड़े भाई को उसके मालिक ने एक छोटी सी मेज देकर कहा-बेटा, इस मेज से जिस तरह का भोजन मांगोगे, वह तुम्हें इस पर तैयार मिलेगा।

दूसरे भाई को चक्कीवाले ने एक गधा देते हुए कहा-जाओ खुश रहो। इस गधे को भी ले जाओ। जयों ही तुम इससे कहोगे-मुझे मुहरें दो, त्यों ही यह मुंह से मुहरें उगलने लगेगा। जब तक तुम ‘बस करो’ न कहोगे यह मुहरें उगलता रहेगा।

दोनों भाई अपने-अपने उपहार लेकर घर की ओर चल दिए। वे सायंकाल के समय एक गांव में पहुंचे। वे रात भर आराम करने के लिए एक सराय में ठहरे। सरायवाला दुष्ट था। उसने उन्हें रात भर रहने की जगह दी पर बात ही बात में उनके उपहारों की विशेषता के बारे में भी जानकारी प्राप्त कर ली। जब उसे मेज और गधे के गुणों का पता लगा तो उसने उन्हें हथियाने की बात सोची। वे दोनों भाई जब सोकर खर्राटे भर रहे थे तब उस दुष्ट ने मेज के बदले हू-ब-हू वैसी ही मेज रख दी और गधा भी उसी शक्ल का खूंटे से बांध दिया। सुबह वे दोनों भाई इन नकली चीजों को लेकर चल दिए।

घर पहुंचे तो उनका पिता बहुत खुश हो गया। उसने गधे और मेज की करामात सुनी तो और भी प्रसन्न हो गया। परंतु जब दोनों भाइयों ने अपने-अपने उपहार की परख और प्रदर्शन करना चाहा, तो हैरान हो गए। उनका बाप यह देख बड़ा नाराज हो गया। वह समझा कि बेटे मुझसे धोखा कर रहे हैं। बहुत कुछ समझाने पर भी उसकी शंकर दूर न हुई। अत: उन्होंने अपने छोटे भाई को आपबीती लिखकर भेजी और उसे सराय वाले से सतर्क रहने को कहा। इसी के साथ उसे यह भी बताया कि अगर संभव हो तो वह उससे चुराई हुई चीजें भी प्राप्त करने की कोशिश करें।

पत्र पाकर तीसरे भाई ने भी स्वामी से घर लौट जाने की स्वीकृति ली, तो उसे उपहार में एक थैला देते हुए मालिक ने कहा-यह थैला लो। इसका गुण यह है कि जब कभी तुमको सहायता की जरूरत पड़े तो इसे यों कहो-रस्सीये जकड़, और डंडे मार। तुम्हारे कहने के साथ ही इसमें से एक रस्सी निकलेगी और तुम्हारे शत्रु को जकड़ लेगी। साथ ही इसमें से एक डंडा निकल आएगा जो उसकी खोपड़ी पर चोट करने लगेगा।

खैर, यह दर्जी पुत्र भी घर की ओर चल दिया। वह रात को उसी सराय में रुका। जब वह सोने लगा तो उस थैले को अपने तकिये के नीचे यों रखा, जिससे सराय वाले को शंका हुई कि इसमें माल भरा है। आधी रात को सरायवाला थैले का धन चुराने के इरादे से आया। दर्जी पुत्र इसी ताक में आंखें बंद किए हुए लेटा हुआ था। ज्यों ही उसने सिरहाने के नीचे से थैला निकाला त्यों ही वह बोला-रस्सीये जकड़, और डंडे मार।

कहने की देर थी कि थैले में से सचमुच ही एक रस्सी निकली, जिसने सराय वाले को जकड़ लिया। साथ ही एक डंडा भी उछल-उछल कर उसकी खोपड़ी पर पटाख-पटाख करता हुआ बरसने लगा। सरायवाला रोने-धोने और चिलाने लगा-भाई माफ करो, माफ करो। हाय मरा! मरा!!

जब उस डंडे ने सरायवाले की खोपड़ी पर अच्छी मार बरसाई तो दर्जीपुत्र बोला-बदमाश कहीं का, ये चीजें तभी थैले में लौट जाएंगी जब तू मेरे भाइयों से हथियाया हुआ माल लौटाने का वायदा करेगा।

लहूलुहान सरायवाले ने उससे वायदा किया तो उसने इन दोनों चीजों को वापस बुलाया। इसके बाद सरायवाले से मेज और असली गधा प्राप्त करने के बाद वह घर लौटा।

जब वह घर पहुंचा तो तीनों भाइयों ने पिता सहित खूब दावत उड़ाई। पिता अपने पुत्रों की सफलता पर बड़ा खुश हुआ। वह धूर्त बकरी रात के समय ही घर से भाग गई। अब बाप बेटे उन तीनों करामती चीजों के कारण बड़े सुख से रहने लगे।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Kashmiri lok kathayen Lok Kathayen Story

Kashmir ki Lok Kathayen-5 (कश्मीरी लोक कथाएँ-5)

झुकी हुई कमरवाला भिखारी कश्मीरी लोक-कथा

जावेद खान ने कहना शुरू किया, ‘लगभग 30 साल पहले झुकी कमरवाला भिखारी, जिसका नाम गणपत है, बिल्कुल सीधा और खड़ा था। उस समय वह एक नौजवान था, उसकी शादी हुई ही थी। हालाँकि उसके पास कई एकड़ जमीन थी, वह अमीर नहीं था और गरीब भी नहीं था। जब वह अपनी फसल 5 मील दूर बाजार में ले जाता था, वह बैलगाड़ी का उपयोग करता और गाँव की धूल भरी सड़क पर चलकर जाता था। उसका गाँव हमारे नीचे फैली घाटी में स्थित था।’

हर रात को घर लौटते समय गणपत को पीपल के एक पेड़ के पास से गुजरना होता था, जिस पर किसी भूत का वास बताया जाता था। उसे कभी पेड़ पर भूत नहीं मिला था और वह इसमें विश्वास भी नहीं करता था; लेकिन भूत का नाम, जो उसे बताया गया था, बिपिन था, जो कि बहुत पहले एक डाकू था और उसे उसी पेड़ पर फाँसी दी गई थी। तब से ही बिपिन का भूत उस पेड़ पर रहता था और अकसर उन लोगों पर झपट पड़ता था, जिन्हें वह पसंद नहीं करता था। कभी-कभी उनकी पिटाई करता था तो कभी उनके गले पर कूदकर उनकी पाचन-क्रिया गड़बड़ कर देता था। शायद गणपत के बार-बार उस पेड़ के नीचे से आने-जाने के कारण बिपिन उससे नाराज हो गया था, क्योंकि एक रात को उसने गणपत पर हमला करने का फैसला कर लिया। उसने पेड़ से छलाँग लगाई और रास्ता रोककर सड़क के बीचोबीच खड़ा हो गया। वह चिल्लाया, ‘तुम अपनी बैलगाड़ी से नीचे उतरो, मैं तुम्हें मारने जा रहा हूँ।’

गणपत, जाहिर है, सकते में आ गया; लेकिन उसे इसका कोई कारण नजर नहीं आया कि उसे भूत की आज्ञा क्यों चाहिए?

‘मेरा मरने का कोई इरादा नहीं है।’ उसने जवाब दिया।

‘तुम खुद गाड़ी पर चढ़ जाओ!’

‘बोला न! किसी आदमी की तरह! ‘ बिपिन चिललाया और उछलकर बैलगाड़ी पर गणपत के पास पहुँच गया, ‘लेकिन मुझे इसका कोई एक अच्छा सा कारण बताओ कि मैं क्यों तुम्हारी जान न लूँ?”

‘अगर तुमने मुझे मार दिया तो बाद में बहुत पछताओगे। मैं एक गरीब आदमी हूँ और मेरी एक पत्नी है, जिसका मैं ही सहारा हूँ।’

‘तुम्हारे गरीब होने से इसका कोई संबंध नहीं है।’ बिपिन ने कहा।

‘ठीक है, तो मुझे अमीर बना दो, अगर तुम बना सकते हो।’

‘तो तुम समझते हो कि मेरे पास तुम्हें अमीर बनाने की शक्ति नहीं है? ‘

‘मैं तुम्हें मुझे अमीर बनाने की चुनौती देता हूँ।’ गणपत ने कहा।

‘तो चलते रहो,’ बिपिन चिल्लाया, ‘मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे घर चल रहा हूँ।’

गणपत ने बैलगाड़ी गाँव की तरफ बढ़ा दी। बिपिन पीछे बैठा हुआ था।

‘मैंने ऐसी व्यवस्था की है।’ बिपिन ने कहा, ‘अन्य कोई नहीं, केवल तुम मुझे देख सकोगे। और दूसरी बात, मुझे हर रात तुम्हारे पास सोना होगा और किसी को इसका पता नहीं लगना चाहिए। अगर तुमने मेरे बारे में किसी को बताया तो मैं निश्चित रूप से तुम्हें मार डालूँगा।’

‘चिंता मत करो,’ गणपत ने कहा, ‘मैं किसी को भी नहीं बताऊँगा।’

‘अच्छा है!’ बिपिन ने कहा, ‘मैं तुम्हारे साथ रहने का इंतजार कर रहा हूँ। वहाँ पेड़ पर रहते हुए मैं अकेलापन महसूस कर रहा था।’

तो, बिपिन गणपत के साथ रहने आ गया और वे हर रात एक-दूसरे के साथ सोने लगे और उनमें बहुत अच्छी पट रही थी। बिपिन उतना ही अच्छा था, जितने उसके शब्द थे और ‘कल्पनीय व अकल्पनीय स्रोतों से पैसा बरसने लगा, जब तक गणपत इस स्थिति में नहीं पहुँच गया कि और जमीन तथा मवेशी खरीद सके। किसी को भी उसके बिपिन के साथ सहयोग के बारे में पता नहीं था। हालाँकि स्वाभाविक है, उसके मित्र और रिश्तेदार जरूर आश्चर्य करते थे कि इतना धन आ कहाँ से रहा था! इसी समय के दौरान गणपत की पत्नी रात को लगातार उसकी अनुपस्थिति से चिंतित थी। पहले तो उसने अपनी पत्नी को बताया था कि उसकी तबीयत ठीक नहीं थी, इसलिए वह बरामदे में सोएगा। फिर उसने कह दिया कि रात को कोई उसकी गाय चुराने की कोशिश कर रहा था, इसलिए उसे उनकी रखवाली करनी होगी। इसके बाद बिपिन और वह गायों के बाड़े में सोए।

गणपत की पत्नी रात को अकसर उसकी जासूसी करती थी; लेकिन उसने उसे हमेशा गायों के बीच में सोते हुए ही पाया। उसके अजीब व्यवहार को समझ पाने में असमर्थ रहने पर उसने यह बात अपने माता-पिता को बताई। वे गणपत के पास आए और उससे पूछताछ की।

गणपत के खुद के रिश्तेदार भी उसकी आय में वृद्धि का स्रोत बताने पर जोर दे रहे थे। एक दिन चाचा-चाचियाँ और दूर के चचेरे भाई, सब यह जानने के लिए उसके घर आ धमके कि यह सब पैसा आ कहाँ से रहा था?

‘क्या आप लोग चाहते हो कि मैं मर जाऊँ?” अपना धैर्य खोते हुए गणपत ने कहा। ‘अगर मैं अपनी दौलत का कारण आपको बताता हूँ तो मैं सबकुछ खो दूँगा।’

लेकिन उन्होंने इसे एक चालाकी भरा बहाना मानते हुए उसका मजाक उड़ाया, क्योंकि उन्हें शक था कि वह इस सारे पैसे को अपने पास ही रखना चाहता था। अंत में, वह सब लोगों की माँगों से इतना तंग आ चुका था कि उसने सारी सच्चाई उगल दी। उन्होंने इस सच्चाई पर भी विश्वास नहीं किया (लोग कम ही करते हैं); लेकिन इससे उन्हें बातें करने का एक विषय मिल गया था और वे कुछ समय के लिए चले गए।

लेकिन उस रात को बिपिन गायों के बाड़े में सोने नहीं आया। गणपत गायों के साथ अकेला सोया। उसे डर लग रहा था कि अगर वह सो गया तो जब वह सोया हुआ होगा, बिपिन उसे मारने का फैसला कर सकता है। लेकिन ऐसा लगता था कि भूत की भावनाएँ इतनी आहत हुई थीं कि वह वहाँ से चला गया था और गणपत को उसके हाल पर छोड़ गया था। गणपत को पूरा यकीन था कि उसके अच्छे भाग्य का अब अंत आ चुका था।

अगले दिन जब वह बाजार से अपने गाँव के लिए बैलगाड़ी से लौट रहा था तो पीपल के पेड़ से बिपिन ने छलाँग लगाई।

‘झूठा दोस्त!’ बैलगाड़ी को रोकते हुए वह चिल्लाया, ‘मैंने तुम्हें वह सबकुछ दिया, जो तुम चाहते थे, फिर भी तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया! ‘

‘मुझे बहुत खेद है।’ गणपत ने कहा, ‘तुम चाहो तो मेरी जान ले सकते हो।’

‘नहीं, मैं यह नहीं कर सकता।’ बिपिन ने कहा, ‘हम लंबे समय तक दोस्त रहे हैं; लेकिन मुझे तुम्हें दंड तो देना ही होगा।’

पीपल के पेड़ से एक डाली तोड़कर उसने उससे गणपत की पीठ पर इतनी बार मारा, जब तक कि उसकी कमर पूरी तरह से झुक नहीं गई।

‘उसके बाद,’ कहानी समाप्त करते हुए जावेद खान ने कहा, ‘वह फिर से सीधा नहीं हो सका और बीस साल से अधिक समय से वह इस विकृत रूप में रह रहा है। उसकी पत्नी उसे छोड़कर अपने परिवार में चली गई और वह अब खेत में काम करने लायक नहीं रहा था।

इसलिए उसने गाँव छोड़ दिया और जीने के लिए भीख माँगता हुआ एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकने लगा। इसी तरह से वह लंढौर आ पहुँचा और उसने यहीं रहने का फैसला किया।

यहाँ के लोग अन्य स्थानों की बजाय अधिक दयालु लगते हैं, कम-से-कम गणपत ऐसा सोचता है। और इतनी ऊँचाई पर यहाँ कोई पीपल का पेड़ नहीं है।’

‘लेकिन उस धन का क्या हुआ, जो उसने बिपिन से प्राप्त किया था?’ कमल ने पूछा।

‘वह गायब हो गया।’ जावेद खान ने कहा, ‘जैसे इस प्रकार की सभी चीजों को होना चाहिए। उस धन का क्या महत्त्व है, जिसके लिए तुमने खुद कोई मेहनत नहीं की है?’

(रस्किन बांड की रचना ‘कश्मीरी किस्सागो’ से)