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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Kahani: Credit Card ki Barsi/ हास्य कहानी: क्रेडिटकार्ड की बरसी

नमस्ते! आज बात किसी ऐसे की जिसको साथ होने पर हम कोसते रहते है पर जब पास न हो तो याद ज़रूर आती है| इंसान के जीवन में लगभग हर मोड़ पर ऐसा कोई मिलता ही है, चाहे यार हो या रिश्तेदार| अजी वो छोड़िये अपनी ही औलाद जब हाथ से निकल जाए तो क्या हम कोसते नहीं है? पर अपने तो अपने ही होते हैं, जब छोड़ कर चले जाते हैं तो हर छोटी से छोटी बात याद आती है|
आज इमोशनल होने का कारण और तिथी दोनों ही वाज़िब है, आज हमारे ऐसे ही सुख दुःख के साथी की दूसरी बरसी जो है| मैट ब्लैक फिनिश, उस पर चमकदार रंग से उभरता हमारा नाम साथ ही चमचमाता मास्टर कार्ड का लोगो…..जी हाँ हमारा अपना क्रेडिटकार्ड,….ठीक दो साल पहले आज ही के दिन एक्सपायर हुआ था| ना –ना करते हुए भी तेरह- चौदह साल का साथ तो रहा ही होगा| आज जब दीपावली की सफाई का ड्राई-रन चल रहा था तो अचानक पुराना लिफाफा हाथ में आ गया और वो दिन, वो सारी यादें आँख के सामने आ गई…..लगा मानों कल की ही बात हो……
नौकरी करते करीब तीन-चार साल बीत चुके थे और शुरुआती पड़ाव में ही हम बम्बई की चहल-पहल और लखनऊ की तहजीब देख चुके थे| जैसे ही लखनऊ छोड़ जबलपुर पहुंचे लगा कि गृहस्ती के नाम पर जो कुल जमा दो अटैची लिए फिरते थे अब उसको आगे बढ़ाने का समय आ चुका था| हालाँकि बैचलर थे पर लगा कब तक? आज नहीं तो कल गले मैं माला तो चढ़नी ही है…तो सबसे पहले 2BHK का बड़ा सा घर किराए पर ले लिया| पूरे घर में एक गद्दा, दो अटैची और हम….गलती से भी छींक निकल जाए तो ऐसा लगता था मानो किसी हिल स्टेशन के ईको पॉइंट पर खड़े हो….अपनी ही छींक घूम फिर कर तीन चार बार गूंजती थी| बड़े कॉर्पोरेट की नौकरी थी तो ऑफिस के सहकर्मियों के घर आने से पहले, घर रहने लायक दिखे ऐसा बनाना था….ऐसा नहीं था कि इसके पहले की नौकरियां बुरी थी जो गृहस्ती न जुटा पाए, पर लड़कपन की खुमारी उतरते- उतरते हम बंबई से लखनऊ और लखनऊ से जबलपुर पहुँच चुके थे|
वो उदाहरण तो आप ने सुना ही होगा न कि ‘दो पेपर कप लीजिये और उसके तले में सुराख़ कर दीजिए…एक में एक दो महीन सुराख़ और दुसरे कप में बहुत बड़ा छेद…फिर दोनों कप में पानी डालिए, बारीक सुराग वाले कप में पानी ठहरेगा और धीरे धीरे कर गिरेगा’, यह हुआ उधाहरण उनका जिनकी कमाई और खर्चे में बड़ा अंतर होता है….ठहरने वाला पानी यानी सेविंग| अब अगला उदाहरण हमारे जैसों के लिए….वही बड़े छेद वाला पेपर कप….जितना कमाया सब बाहर बिना किसी देरी के….काहे की सेविंग| माता-पिता तो कह-कह कर थक गए पर हमें तो यही लगता था कि जो आता है वो जाता ही है….एविंग-सेविंग सब मोह माया है|
खैर देर से ही सही सद्बुद्धि आई, लगा कि धीरे-धीरे ही सही पर अब गृहस्ती का सामान जोड़ा जाय| दोस्तों और सहकर्मियों से बात की तो सभी ने अपनी बुद्धि, विवेक और अनुभव के आधार पर अपनी –अपनी राय रख दी….शादी शुदा की राय अलग थी और कुवारों की अलग| न जाने क्यों ऐसी ही किसी राय में क्रेडिटकार्ड का जिक्र चल निकला…नाम तो याद नहीं पर ज़रूर कोई कुंवारा ही होगा, वरना शादी शुदा ऐसी राय दे, कम ही सुना है| हमने खुद शादी के बारह साल में कभी ऐसी सलाह न दी होगी|
तो ज़नाब क्रेडिटकार्ड में दिलचस्पी बढ़ी और थोड़ी रिसर्च के बाद एक नामी बैंक का क्रेडिटकार्ड अप्लाई कर दिया गया..घबराहट तो हो रही थी पर उस ज़माने में क्रेडिटकार्ड अपने आप में स्टेटस सिंबल हुआ करता था, तो एक अलग तरह का एक्साईटमेंट भी था|
सीना तो तब चौड़ा हुआ जब पूरे ऑफिस के सामने ब्लू-डार्ट के कुरियर बॉय ने हमारा नाम पुकारा और एक कड़क शानदार पैकेट हाथ में थमा गया| पूरी जिंदगी खाकी रंग के डाकिये को देखने वाले और बेहद ही इमरजेंसी में मधुर या मारुती कूरियर की सेवा लेने वाले को ब्लू-डार्ट का पैकेट आना वो भी ऑफिस के दसियों लोगों के बीच…..समान की और सामान को रिसीव करने वाले की पर्सीव्ड वैल्यू तो ऐसे ही बढ़ जानी थी|
खैर सारे एक्साईटमेंट और उस ब्लू-डार्ट के पैकेट को हमने डाला दराज़ में और लग गए अपनी दिनचर्या निपटाने| शाम बिना भूले पैकेट अपने बैग में डाला और पहुच गए अपने ईको पॉइंट अर्थात 2BHK फ्लैट पर| एक्साईटमेंट इतना था की खाना पैक कराना ही भूल गए थे, वैसे भी भूख किसे थी| बस फटाफट पैकेट निकला और बिना पलक झपके क्रेडिटकार्ड की अनबॉक्सिंग कर डाली| बीसियों कागज के बीच एक काले रंग का कार्ड….मैट फिनिश और उसपर चमकदार रंग से उभरा हमारा नाम….वाह! लगा मानों देखते ही रहें| कुछ कागजों को उलटने पलटने पर ज्ञात हुआ की निन्यानबे हज़ार की लिमिट थी ….मतलब निन्यानबे हज़ार की खरीददारी….मतलब बहुत सारी| फिर क्या, बाकी कागजों को पलटने की ज़हमत ही नहीं उठाई…वैसे भी इतने बारीक अक्षरों में लिखे थे कि आँख न भी ख़राब हो तो आदमी शक़ में आई-टेस्ट करवा ले|
वो पहला दिन था जब हम, हमारा क्रेडिटकार्ड और हमारा लेदर का पर्स एक दुसरे के पूरक हुए थे, उसके बाद तो दीवान..घड़ी…जूते…टीवी….म्यूजिक सिस्टम…किचन का सामान…….बस एक बार दुकानदार कह भर दे की ‘जी हाँ क्रेडिटकार्ड एक्सेप्ट करते हैं!’, मजाल है जो हम दुकान से खाली हाथ उतर जाएं| पैंतालिस दिन का रोटेशन सर्किल वाकई मज़े दे रहा था…..शापिंग का सिलसिला यूँ की चलता रहा जब तक कि हमारे 2BHK फ्लैट में प्रतिध्वनि होना बंद न हो गया….| अब क्रेडिट पर लिया था तो चुकाना भी था, शुरू-शुरू में तो 2-3 हज़ार का सामन आता था पर चार-पांच महीने बीतते पेमेंट का सिलसिला किश्तों में तब्दील हो गया| हर महीन सात-आठ हज़ार चुकाना ही था| खैर अकेले थे तो संभव था, बस पेपर कप के नीचे जो बड़ा छेद था उस पर टेप मार कर छेद छोटा करना था, और इकठ्ठा होने वाले पानी से क्रेडिटकार्ड की किश्त चुकानी थी| मजबुरी थी तो किया और चुकाते –चुकाते साल बीत गया| अब हम जबलपुर को टाटा –बॉय बोल कर राजस्थान आ चुके थे| नयी नौकरी, नयी जगह, नए लोग…पहले तो लगता था की सभी बड़ी-बड़ी मूछों वाले और पगड़ी पहनने वाले होंगे पर हकीकत अलग थी..जब जयपुर में उतरे तो पता चला विज्ञापन में दिखने वाला राजस्थान और हमारी कर्मभूमि बनने जा रहा राजस्थान दोनों अलग थे|
बैचलर अभी भी थे पर 2BHK का चस्का लग चुका था, वैसे भी मकान ईको पॉइंट न बने जितना सामान तो अब इकठ्ठा हो चुका था तो ब्रोकर की मदद से एक 2BHK जयपुर शहर में भी ले लिया| शुरुवाती कुछ दिन तो क्रेडिटकार्ड की सेवा को विराम दिया पर जुआ, शराब और क्रेडिटकार्ड की लत एक बार लग जाए तो छुटाए नहीं छूटती….वही हुआ जिसका डर था क्रेडिटकार्ड की घिसाई वापस शुरू|
दिन बीते और देखते ही देखते वो दिन भी आ गया जिसका इंतज़ार हर कुंवारा करता है…जी हाँ हमारी शादी तय हो गई थी, अब शादी तय हुई थी तो शादी से जुड़े खर्चे भी होंगे….मोटे तौर पर दिखने वाले और बड़े खर्चों की जिम्मेदारी माता-पीता ने उठा ली थी पर हमारा भी कुछ फ़र्ज़ बनता था आखिरकार अपने ही घर की शादी थी..वो भी अपनी…, ताल ठोक कर कह दिया की अपने कपड़े और हनीमून का खर्चा हम खुद उठाएँगे| घरवालों को भी लगा कि बेटे को जिम्मेदारी का अहसास है तो सभी ने हामी भर दी|
हाँ तो कर दिया था पर लाते कैसे पेपर कप का छेद अब भी काफी बड़ा था, तो बस….. ‘हारे का सहारा….क्रेडिट कार्ड हमारा’…,लिस्ट बनाई और चल पड़े शॉपिंग करने, सूट-शेरवानी…घड़ी…जूते…बेल्ट सब खरीद डाला, करना क्या था बस काले कार्ड को घिसना था और पिन डालना था …इतना ही नहीं हनीमून का होटल….फ्लाइट का टिकट सब बुक हो गया….भला हो क्रेडिट कार्ड का|
लोग भले ही दिन रात कोसे पर उम्मीदों की उड़ान के लिए जिन पंखों की ज़रुरत होती है वो पंख क्रेडिटकार्ड की लगता है ….भले ही कुछ दिन बाद हवा में ही उखाड़ भी दे और आप औंधे मुह ज़मीन पर आ गिरें| वही हुआ क्रेडिटकार्ड की किश्त अब तनख्वाह का मोटा हिस्सा खाने लगी थी पर वाह रे नशा, मजाल है जो एक भी दुकान पर दाम सुन कर शिकन आई हो|
खैर शादी अभी तय हुई थी…हुई नहीं थी, हम अब भी अकेले थे और किस फ़िज़ूल खर्ची पर मेढ़ बाँध कर रोकना है और उस पैसे की नहर से कैसे क्रेडिट कार्ड की सिचाई करनी है हम मैनेज कर ले रहे थे….वैसे भी हम उस विचारधारा के समर्थक थे जिसमें नहाते समय बनियान को पैरों के नीचे रख देते है ताकी शरीर पर लगने वाला साबुन शरीर से होता हुआ बनियान पर गिरे और कपड़े धोने के साबुन के खर्चों में कटौती हो….साथ खुशबू वो बोनस|
पर आप की विचारधारा तब तक ही कारगर है जब तक आप कुंवारें है…एक बार आपने दाम्पत्य जीवन में प्रवेश किया तो सारी विचारधारा की पुड़िया बना कर आप ही की शेरवानी की जेब में डाल दिया जाता है…और आप की पत्नी की विचारधारा ही आप की विचारधारा बन जाती है| सुनने में अजीब लगेगा पर शादी-शुदा लोग हमारी बात से सहमत होंगे ऐसा हमें द्रढ़ विश्वास है| हमारे साथ भी कुछ वैसा ही हुआ…हमारी विचारधारा बदलने लगी…शॉपिंग का एक्सपीरियंस ही बदल गया….एक समय था जब दूर से ऊँगली दिखा कर ही बोल दिया करते थे कि फलां घड़ी या फलां जूता पैक कर दो, पर एक उस हादसे के बाद से तो हमे कल्चरल शॉक लग गया था…कभी सोचा नहीं था की शॉपिंग का ये प्रारूप भी होता होगा….
हुआ यूँ की शादी के कुछ दिन बाद हमारी श्रीमती जी हमारे साथ जयपुर आ गईं, दांपत्य जीवन सुखमय बीतने लगा…हमारी पहली सालगिरह आने वाली थी तो हमने श्रीमति जी को सोने की चेन दिलाने का वादा कर डाला| दोनों खुश थे, वो इस बात से कि पति को साल गिरह याद थी और हम इस बात से कि श्रीमति जी खुश थीं| सालगिरह का दिन आया, प्लान यह बना की पहले शॉपिंग करेंगे फिर शाम किसी शानदार रेस्टोरेंट में डिनर करेंगे..कॉकटेल के साथ| ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों एक बड़ी ज्वेलरी शॉप में पहुचे और सेल्समेन को अपनी आमद का कारण कह सुनाया| हमें क्या पता था कि सोने की चमक में खोना क्या होता था…एक मिडिल क्लास आदमी की नज़र में सोने की चेन, मतलब …वो पतली वाली…एक या सवा तोले की, पर इनसेंटिव पाने वाले ‘स्टार ऑफ़ द मंथ’ सेल्समैन क्या होते है वो तो हमने उस दिन ही महसूस किया| दिखाते ही दिखाते उसने एक तोले से होते हुए चेन का वज़न और हमारी श्रीमति जी का मानस कब साढ़े तीन तोले तक पंहुचा दिया पता ही न चला| आखिरकार एक चेन को देख हमारी श्रीमति जी की आँखों में चमक आ ही गई, उन्होंने हलके से मुस्कुरा कर हमें देखा और बोलीं, ‘ये वाली कैसी है’| हम क्या बोलते, उड़ता तीर भी तो हमने ही लिया था सो बोल दिया, ‘अच्छी है’| इधर चेन से श्रीमतीजी की आँखें चमक रही थी और उधर वजन का कांटा देख हमारे सर पर सितारे चमक रहे थे| दर्द छुपाते हुए सेल्समेन से बोले, ‘हाँ भाई कितने की है…?’ सेल्समेन की वो कुटिल मुस्कान हम आज तक न भूल पाए| वो तो भला को क्रेडिटकार्ड का जो उस समय हमारा सम्मान बच गया, यह बात अलग है की क्रेडिटकार्ड की किश्ते भरते-भरते हमारा आत्मसम्मान ही हमें धिक्कारने लगा था|
खैर समझदार वही होता है जो अपनी गलतियों से सीखता है, उस हादसे के बाद तो हमने तौबा कर लिया कि आगे से चलकर कभी कोई वादा नहीं करेंगे…सरप्राइज गिफ्ट दे दो वो बात अलग है|
धीरे-धीरे समय बदला तो शॉपिंग का नजरिया भी बदला, अब हमारा एक प्रमुख काम कोचवान की तरह गाड़ी इस दुकान से उस दुकान ले जाना भी था| श्रीमति जी का क्या था एक –एक घंटे दुकान पर पचासों कपड़े निकलवाने के बाद कहा ‘पसंद नहीं आया, कही और चलते हैं’, अच्छा ऐसा भी नहीं था की खुद बोल दें, दुकानदार को नए- नए बहाने सुनाकर वहां से बाहर निकालने की जिम्मेदारी भी हमारी थी| समय के साथ समझ आ ही गया कि लेडीज कपड़ों के व्यापारी सिद्ध बाबाओं से कम नही होते…चेहरा पढ़ लेते हैं| शुरू-शुरू में तो लगता था कि आज पिटे या कल पर कसम से पिछले बारह साल में ऐसा मौका आया ही नहीं…इस धैर्य के लिए हम पूरे लेडीज शॉपिंग से जुड़े व्यापारी वर्ग के कृतज्ञ हैं|
लेडीज शॉपिंग के चलते दुकानदारों की महिमा के साथ साथ एक और बात का दिव्यज्ञान हुआ कि शॉपिंग में हमारी राय कोई खास मायने नहीं रखती हम तो बस सपोर्ट के लिए ले जाये जाते हैं….ताकी कल को कोई ऊँच-नीच हो तो बोल सकें ‘आप भी तो थे!’
खैर बात वापस क्रेडिटकार्ड पर…अब जिम्मेदारी और बढ़ गई थी, एक तो क्रेडिटकार्ड की बढती किश्त ऊपर से लेडीज शॉपिंग के लिए घंटों दुकान पर इंतज़ार करना| इतना ही नहीं, हर वो सामान जो हमने नग के हिसाब से खरीद रखा था अब वो सेट में था और वो भी स्टील, मेलामाइन और बोन-चाइना की वैरायटी में| ढाई लोगों की गृहस्ती में तीन अलग-अलग साइज़ के कूकर और दो अलग-अलग साइज़ की कढ़ाई क्यों चाहिए भला, ये बात न हम शॉपिंग करते समय समझ पाए थे न आज|
क्रेडिटकार्ड की बदौलत देखते ही देखते ढाई लोगों के परिवार में कब 2BHK छोटा पड़ने लगा पता ही न चला और क्रेडिटकार्ड की किश्तों का सिलसिला जबलपुर से होता हुआ, जयपुर, दिल्ली और हैदराबाद पहुच गया| जब भी किसी माल या दुकान के पास से गुज़रते मन की इच्छा उम्मीद की उड़ान भरना चाहती, क्रेडिटकार्ड पर्स से निकलता और उड़ान को पंख लगा जाता…और जाते जाते किश्तों की बेड़ियाँ पैर में डाल जाता|
खैर हर किसी की जिंदगी में वो दिन आता ही है जब उनका कोई ख़ास, कोई अपना उन्हें छोड़ कर चला जाता है..हमारे साथ भी यही होने वाला था..पता तो था पर इस बार हम अपना दिल मज़बूत कर चुके थे|
आखिरकार दो साल पहले आज ही के दिन हमारा क्रेडिटकार्ड एक्सपायर हो गया| आज इस बात को बीते दो साल हो चुके है पर हमने हिम्मत दिखाई और क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख ही लिया|
अगर आप भी क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख चुकें है तो आप बधाई के पात्र हैं और उम्मीद है सुखी होंगे और यदि किसी करणवश आप यह मोह अभी तक नहीं छोड़ पाए है तो हिम्मत जुटाइये और धीरे- धीरे ही सही पर इसको अपनी जीवनशैली से अलग करना शुरू कीजिये….विश्वास दिलाता हूँ इसके बिना जीवन कहीं ज्यादा सुखमय महसूस कीजियेगा|

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Hasya Lekh: Diwali Ki Jhalar/ हास्य लेख : दिवाली की झालर

नमस्ते! उम्मीद है आप सब अच्छे होंगे, अजी उम्मीद क्या पूरा विश्वास है| वैसे कई दिनों से लिखने की सोच रहा था पर लिख नहीं पा रहा था….वो क्या कहते है…करंट नहीं पहुँच रहा था| अब दिन में तो हजारों काम होते है…और लिखने के लिए चाहिए शांति और सुकून, तो हमारे जैसों के लिए तो रात ही अनुकूल है| कल रात की भी यही सोच थी कि खा–पी कर रात को लिखने की महफ़िल जमाएंगे….बस हम, हमारी डायरी और हमारा पेन| अब बस एक छोटा सा बहाना चाहिए था जिससे श्रीमति जी को अल्पावधि के लिए नाराज़ कर सकें ताकी महफ़िल में कोई बाधा न आए| काम लगता आसान है पर नाराज़गी की श्रेणी में सूत के धागे जितना ही फ़र्क होता है, बात ज़रा इधर से उधर हुई नहीं कि लेने के देने पड़ सकते हैं| खैर साल बीतते –बीतते शादी के ये हुनर अपने आप ही विकसित हो जाते है|

फिर क्या, खाना खाने और रसोई का ताम झाम निपटाने के बाद जैसे ही श्रीमति जी बेडरूम में आईं और डबल बेड पर बैठते ही हाथ पैर पर लगाने के लिए बॉडी लोशन उठाया, हमने छेड़ दिया, “ये सूट छोटा हो गया है क्या…थोड़ी मोटी लग रही हो”, बस फिर क्या उनके जवाब मिलते गए और योजनानुसार हम उन जवाबों में मिर्च मसाला लपेट कर उन्हे वापस सवालों में तब्दील कर श्रीमति जी की तरफ दागते गए….तीन-चार सवालों के बाद तो हम, हमारा तकिया और चादर तीनों कमरे के बाहर थे|

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Hasya Kahani: Karan -Arjun aur Hum/ हास्य कहानी : करन – अर्जुन और हम

यू-ट्यूब पर श्रीमती जी करन-अर्जुन देखने बैठीं तो हमारी करीब पच्चीस साल पुरानी प्रतीज्ञा आज टूट ही गई…जिस बेबाकी से आज कल के बच्चे माँ बाप से बोल देते है कि पापा इस गर्मी की छुट्टी में डिजनी लैंड चलेंगे, उन दिनों शायद इतनी बेबेकी हम किराये पर वीसीआर और फिल्म के कैसेट लाने में ही दिखा पाते थे|

बात सन पिन्चान्बे-छियानबे की होगी…गर्मियों का दिन था और हमारे मोहल्ले के एक परिवार के जेष्ठ पुत्र का विवाह एक दिन पहले ही संपन्न हुआ था| घर में नए सदस्य का आगमन हुआ था तो सभी नात- रिश्तेदार उत्साहित थे….

घर मेहमानों से भरा हुआ था और हम उनके घर में पूरे हक से मेज़बान की भूमिका में थे| सलाद कटवाने, दौड़ –दौड़ कर पूरियां लाने…और बड़ों को खाना खिलवाने के बाद जब बच्चों के खाने की बारी आई तो हम भी पंगत में शामिल थे और जम के गरमा गरम पूरी दबा रहे थे| तभी उड़ती –उड़ती खबर सुनाई पड़ी कि रात में फिल्म का प्रोग्राम है…वीसीआर किराए पर आने वाला है| एक तो इतने सारे लोगों का जमावड़ा ऊपर से वीसीआर पर पिक्चर का कार्यक्रम…उत्साहित होना स्वाभाविक था| हमने फटा-फट खाना ख़त्म किया और हाथ धो कर पहुँच गए उस झुंड के पास जहाँ शाम के कार्यक्रम की तैयारियों की समीक्षा चल रही थी….छत पर कितने गद्दे-तकिये लगने हैं, बड़े कहाँ बैठेंगे….बच्चे कहाँ पसरेंगे| रात में फिल्म देखना हो वो भी खुले आसमान के नीचे, उसका मज़ा ही कुछ और होता था|                  

खैर जब बैठने की व्यवस्था का मंथन समाप्त हुआ तो बात दूसरे ज़रूरी मुद्दे पर आई कि कैसेट कौन से आने है…हर किसी ने अपने विवेक और सूझबूझ से अपनी राय रखी और बहुमत से चित्रहार, कुली नंबर- 1 और करन-अर्जुन का चुनाव हुआ| चित्रहार में हमें कोई ख़ास रूचि न थी…कुली नंबर-1 हमने पहले ही निपटा दी थी, अब बची थी करन-अर्जुन… फिल्म जबरदस्त थी, हर कोई जिसने देख रखी थी तारीफ करते न थकता था…शाहरुख़-सलमान की जुगलबंदी…. “जाती हूँ मैं”….जैसा शानदार गाना और जबरदस्त फाइट….दिल पहले से ही इस पिक्चर पर फ़िदा था पर जब पता चला कि इतने शानदार माहौल में एक और मनपसंद पिक्चर देखने का मौका है तो रहा न गया..अन्दर से ख़ुशी इतनी हो रही थी कि बर्दाश्त  के बाहर थी….जल्द किसी अपने को बताना था|   

हमारे हम उमर मौसेरे भाई करीब ही रहा करते थे, फिर क्या, पहुँच गए मौसी के घर, भाई को इशारा किया और दोनों भाई छत पर| साथ में हमने कई फिल्में निपटाई थी तो समझाना और सहमति हासिल करना कठिन न था…बस घर पर यह बोलना था की आज एक भाई दूसरे भाई के घर पढ़ाई करेगा और रात वहीँ सोएगा|

किला फतह कर हम अपने घर चले आए और रात का इंतज़ार करने लगे, देर शाम कॉपी-किताब ले कर हमारे भाई भी आ गए और दोनों भाई मन लगा कर पढ़ने भी लगे…घर में कुछ ऐसा दिखाना था की लड़के पढ़ाई को ले कर संकल्पित है| शाम रात में बदल गई, सारे होमवर्क, सारे असाइनमेंट बिना किसी नाज़ नखरे ख़तम कर लिए गए, बीच –बीच में अपनी कर्मठता का प्रदर्शन करते दोनों भाई हमारे पिता जी से ना समझ में आने वाले सवालों पर मंत्रणा भी कर आते कि लगे लड़के पढ़ाई को लेकर वाकई गंभीर हैं| इधर दोनों भाई पढ़ाई निपटाने में लगे थे, उधर पिता जी छत पर पानी डाल रहे थे| उन दिनों गरमी में छत तर कर उस पर चटाई और चद्दर डाल कर सोना आम चलन में था |

हमारे घर की छत सूख चुकी थी और खाने की थालियाँ लग चुकी थी| हम दोनों की नज़रों में संतोषजनक पढ़ाई हो चुकी थी, लगा कि बस खाना खाते- खाते पिता जी से बोल देंगे और वीसीआर पर करन-अर्जुन की अनुमति हासिल कर लेंगे|

खाना शुरू हुआ और पिता जी ने पढ़ाई से जुड़ा मुद्दा छेड़ दिया…हमें अपनी बात रखने का मौका ही न मिला| धड़कन बढ़ गई थी|

हर ख़त्म होती चपाती के साथ ही हमारे भाई टेबल के नीचे से हमें ठोकर मार बोलने का इशारा करते पर हम सही मौके की ताक में थे| ऐसा न हो गलत समय पर प्रस्ताव रख दें और मनाही हो जाए| इस चक्कर में एक चपाती ज्यादा खा ली पर सही समय का इंतज़ार ख़त्म ही न हुआ| हरकत ऐसी थी कि भाई से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे सो थाली रखी, हाथ मुंह धोया और चुप-चाप कमरे में आ गए| अभी सोच ही रहे थे कि भाई ने कमरे में आते ही ताना मारना शुरू कर दिया, अभी हम समझा ही रहे थे कि अभी देर नहीं हुई है, तभी पीछे से पिता जी की आवाज़ आई कि चलो छत पर बिस्तर लग गए हैं… इशारा समय पर सोने का था, अगले दिन स्कूल जो जाना था|

अब धड़कन राजधानी एक्सप्रेस सी हो चुकी थी, बस एक ही डर था कहीं मनाही न हो जाए…करन –अर्जुन का सारा जोश, सारा प्लान धरा का धरा रह जाता, ऊपर से पूरी जिंदगी भाई से ताने सुनने मिलता वो अलग|

माता जी तो कूलर में सोने चली गई और हम, हमारे भाई और पिताजी छत पर खुले आसमान के नीचे लेट गए| आसमान साफ़ था, सप्त-ऋषि तारामंडल और ध्रुव तारा साफ़ नज़र आ रहे थे, धीमी- धीमी चलने वाली हवा अब ठंडी होने लगी थी और नींद के लिए माहौल बिलकुल अनुकूल था, लेकिन नींद न हमारी आँखों में थी और न हमारे भाई की, बस दोनों भाई आसमान को देखते मना रहे थे कि काश कोई पुच्छल तारा दिख जाए और हमारी दुआ कबूल हो जाए| अभी सोच ही रहे थे कि भाई ने हमें कोहनी मारते हुए हमारा फ़र्ज़ याद दिलाया| हमने हिम्मत जुटाई, गला साफ़ किया और बोले, “पिता जी, भईया के घर वीसीआर लगा है और नई पिक्चर का कैसेट भी है…हम देखने जा सकते हैं क्या?”

पिता जी इन सब बातों से अनभिज्ञ थे और हल्की नींद में आ चुके थे सो बोले, “ठीक है, कल स्कूल से आ कर चले जाना पर पहले होमवर्क!” उन्हें लगा दिन की बात है, बच्चे पढ़ाई कर दो –तीन घंटे फिल्म देख भी लेंगे तो क्या हर्ज़ है, पर यहाँ तो कार्यक्रम ही रात का था वो भी आज रात का| अभी सोच ही रहे थे कि भाई ने उर्जा का संचार करने के लिए एक बार फिर कोहनी टिका दी….इस बार उनकी कोहनी के वार में फ्रश्टेशन और गुस्सा साफ़ झलक रहा था|

हमने उनको हाथ रोकने का इशारा किया और वापस पिता जी के मुखातिब हुए और बोले, “पिता जी….वो वीसीआर आज रात के लिए आया है…सब लोग इकठ्ठा हैं तो आज रात ही फिल्म देखनी है|”

पिता जी दिन भर के थके थे और सुबह जल्द दफ्तर भी जाना था सो नींद के आगोश में थे, बोले, “रात में नहीं!….सुबह स्कूल है!….”

बस वही हुआ जिसका डर था, सारी प्लानिंग, सारे जुगाड़ धरे के धरे रह गए थे….जिस चक्कर में गणित के एक आध असाइनमेंट ज्यादा कर डाले उसका नतीजा सिफर निकला, करते क्या मन मसोस कर रह गए| दिल और कान दोनों चार घर छोड़ बने मकान की छत पर लगे थे, वहां अब हलचल बढ़ गई थी, फिल्म शुरू होने ही वाली थी| आखें तारे देख रहीं थी पर पुतलियों पर आई नमी से तारे अब धुंधले दिख रहे थे|

करीब साढ़े दस हुए होंगे कि अचानक कुछ धुन कानो में पड़ी…हमें लगा चलो अभी समय है शायद पहले चित्रहार लगा हो..अभी मना ही रहे थे कि वापस एक भारी भरकम आवाज़ कानों में पड़ी, “…ये कहानी विश्वास पर आधारित है…विश्वास जो अनहोनी को होनी कर सकता है”…अभी कुछ समझ पाते कि कौन सी फिल्म है कि तभी एक और आवाज़ आई, “करन सिंह-अर्जुन सिंह मेरा हफ्ता…” अब बस दिल बैठ गया…जो नहीं होना था वही हुआ….बिना हमारी मौजूदगी के करन-अर्जुन शुरू हो चुकी थी| भाई भी गुस्से से भरा हुआ था पर ठोकर और कोहनी मारने के अलावा करता भी क्या|

फिर आया पहला गाना…..“सूरज कब दूर गगन से…..”अभी मुखड़ा पूरा भी नहीं हुआ था कि एक दुलत्ती जोर से हमारी टांगों से टकराई…हम समझ गए कि सिर्फ हम ही नहीं थे जो फिल्म के लिए कलप रहे थे| आसमान साफ था और रात का समय था तो हर डायलाग कान पर साफ़- साफ़ गिर रहा था| अभी 15-20 मिनट बीते होंगे कि अमरीशपुरी की रौबीली आवाज़ कानों में सुनाई पड़ी, रोंगटे खड़े हो गए, हमसे न रहा गया, लगा एक बार और कोशिश कर के देखते हैं…..एक दो बार धीमी आवाज़ में पिता जी को पुकारा भी पर पिता जी अब तक गहरी नींद के आगोश में जा चुके थे, उनकी तरफ से कोई रिस्पांस न मिला| अमरीशपुरी जी की आवाज़ में दमदार डायलाग, घोड़ों की टाप, चीखने चिल्लाने की आवाज़ मानो जैसे आसमान में गूँज रही थी कि तभी मंदिर की घंटियों के बीच किसी औरत के रोने की आवाज़ आई, और जैसे ही वह बोली, “मेरे करन- अर्जुन नहीं मर सकते…तुझे मेरे करन- अर्जुन लौटाने होंगे माँ….” सस्पेंस हम दोनों भाइयों की नस –नस में भर चुका था, अब हमसे रहा न गया, घंटियों की आवाज़ जैसे तेज़ हुई तो हमने भी भगवान का नाम ले कर एक ट्राई और मारने का फैसला किया| पिता जी को हल्के हाथ से हिलाया और जब उन्होंने आश्रय पूछा तो हमने अपनी इच्छा फिर से जाहिर कर दी….|

होना क्या था दिन भर के थके आदमी को शाहरुख-सलमान के लिए कच्ची नींद में जगाओगे तो डांट ही मिलेगी, और हुआ भी वही| इस बार पिता जी का लहज़ा सख्त था, इसके बाद हमारी पूछने की और हमारे भाई की कोहनी मारने की हिम्मत न हुई| दोनो भाई पथराई आँखों से आसमान को देखते रहे…| एक के बाद एक दमदार डायलाग, “जाती हूँ मै” जैसे गाने… पूरी फिल्म हम दोनों भाइयों ने नम आँखों से तारों को देखते हुए सुन डाली|

भाई का तो पता नहीं पर हमने कसम ज़रूर खा ली थी कि आज के बाद करन- अर्जुन या आने वाली किसी भी फिल्म जिसमे शाहरुख-सलमान एक साथ हों कभी नहीं देखेंगे| अब तक ऊपर वाला भी शायद हमें हमारी कसम पूरी कराने में शिद्दत से लगा था, तभी शायद इतने सालों में दोनों की कोई पिक्चर एक साथ न आई|

वो तो श्रीमती जी शाहरुख की सारी फिल्में निपटा चुकी थीं और यू-ट्यूब पर करन- अर्जुन ओरिजिनल  प्रिंट में उपलब्ध थी तो उन्होंने आज हमें उनके संग बैठ कर यह पिक्चर देखने पर मजबूर कर दिया और हमारी कसम तुड़वा ही दी| अब सोचते है एक कसम टूट गई है तो दूसरी भी टूट ही जाए, इसी बहाने दोनों को वापस एक बार सुनहरे परदे पर देखने का मौका तो मिलेगा|

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Bade Babu ka Pyar-2/ बड़े-बाबू का प्यार -2 (कहानी अभी बाकी है……)

अब तक आप ने पढ़ा कैसे हँसमुख स्वभाव का मंदार अपने ऑफिस के ही अधिकारी के साथ उनके जन्मदिन पर भावुक हो जाता है|बेहद नशे में वो उनके प्यार से मिलाने उन्हें ले जाता है|…किस्मत कुछ ऐसा मोड़ लेती है कि मंदार की पत्नी ही दिवाकर उर्फ़ बड़े-बाबू की प्रेमिका निकलती है, अब आगे….

भाग 8:प्यार का पंचनामा (Ch8: Pyar Ka Panchnama)

मुर्दाघर की एक बेंच पर बेसुध सा बैठा मंदार अपनी पूरी कहानी सुना चुका था| सुबह होने को थी और मंदार का नशा पूरी तरह उतर चुका था….बगल में सब इंस्पेक्टर महिपाल चौधरी और सामने खड़ा हवलदार मनोज यादव मंदार की कहानी सुन चुके थे, पूरी रात तफशीश हुई थी|

Ishhoo Crime Story

महिपाल चौधरी मनोज से पूछता है, “बॉडी पोस्टमार्टम के लिए भेज दी क्या?”

मनोज हां में सर हिलाता है और बोलता है, “सर आधा घंटा और लगेगा..रिपोर्ट 3-4 बजे तक मिल जाएगी”

महिपाल सर झटक कर नींद भगाता है और वापस मंदार की ओर मुड़ता है, “हाँ भाई, क़त्ल की जानकारी कैसे हुई..?”

मंदार आँखों में आसूं लिए बोलता है, “सर पाली से जब हम वापस आए तो सभी उदास थे…पूरे रास्ते एक दूसरे से बात तक नहीं हुई थी….अगले दिन हम ऑफिस गए थे पर थोड़ा लेट….कुछ देर ऑफिस में रहे पर लगा वो दीवारें….वो लोग जैसे झंझोड़ रहे हों…कोई 2-3 बजे तक ऑफिस में थे फिर दोस्तों को बोल कर ऑफिस से निकल गए….घर जाना चाहते थे और सारे गिले शिकवे दूर कर लेना चाहता थे, पर  जाने क्यों हिम्मत ही नहीं हुई…सोचा थोड़ी शराब पी कर…..तो बात करना आसान होगा” फिर रुकते हुए बोला “…पर उस बात से उभर ही न पाए…न जाने कब देर रात हो गई और फिर जब लगा अब बस…बहुत हो गई, हम उठ कर घर को चल दिए….घर पहुँच कर दरवाज़ा खटखटाया पर कोई जवाब नहीं मिला….नशे में न जाने क्या क्या बोल गए…अड़ोसी – पड़ोसी भी निकल आए थे…फिर ताला तोड़ा गया और जैसे ही हम अन्दर पहुँचे…डाली खून से लतपथ किचन के पास पड़ी थी….उसके बाद हमें कुछ याद ही नहीं….शायद पड़ोस में किसी ने आप को फ़ोन किया होगा….” मंदार की ऑंखें नम हो गई थी|

“सर एक सिगरेट पी लें….इफ यू डोंट माइंड…”

महिपाल बाहर चलने का इशारा करता है और तीनों साथ साथ बाहर चाय की दुकान पर आ जाते हैं…मंदार जेब से सिगरेट का पैकेट निकालता है…अपने होठों पर एक सिगरेट रखता है और लाइटर से जलाता है…एक लम्बा कश लेने के बाद सिगरेट का पैकेट महिपाल को ऑफर करता है|

महिपाल सिगरेट पीने से मना कर देता है पर पैकेट हाथ में पकड़े घुमाता रहता है, कुछ देर बाद वापस मंदर से बोलता है, “कल जब ऑफिस गए थे तो ….क्या नाम था उसका…..”      

 “दिवाकर!” मनोज पीछे से बोलता है|

“हाँ दिवाकर…..उसका हाव भाव कैसा था…..कोई बात हुई थी ऑफिस में….पर्सनल….आफिशियल….?” महिपाल अपनी बात आगे बढ़ाता है|

मंदार नें एक कश सिगरेट का खींचा फिर बोला, “बड़े- बाबू कल ऑफिस नहीं आए थे..” 

महिपाल को कुछ खटकाता है…फिर घड़ी देखते हुए बोलता है, “ऑफिस कितने बजे खुलता है?”

“साढ़े नौ बजे…लेकिन स्टाफ आते-आते दस बज जाता है…” मंदार बोला|

महिपाल मनोज को इशारा करता है और मनोज मंदार को अन्दर छोड़ कर वापस चाय की दुकान पर आ जाता है|                

महिपाल अपना माथा पकड़े मनोज से बोलता है, “मनोज चाय बोल…साला सर दर्द हो रहा है…|”

“छोटे, दो चाय दे बिना शक्कर….” मनोज चाय का आर्डर दे देता है|

“सर क्या लगता है…कहीं दिवाकर तो नहीं…” मनोज धीरे से पूछता है|

“साहब चाय…” चाय वाले की आवाज़ आती है|

“ये सिगरेट कितने की है…?” महिपाल चाय वाले से पूछता है|

“नौ रुपये की साहब….दूँ!” चाय वाला महिपाल से बोलता है|

“और पैकेट?” महिपाल फिर से चाय वाले से पूछता है|

“साहब पिच्चासी का…. दूँ!”

महिपाल मना करता है और चाय पीने लगता है|

मनोज चाय पीते हुए पूछता है, “आप…. सिगरेट…. कब से सर?”

महिपाल कुछ सोचता रहता है फिर बोलता है, “साला पच्चीस रुपये का पैकेट था…अब पिच्चासी का हो गया…शादी के बाद सिगरेट शराब सब छोड़ दी….” फिर आधी चाय छोड़ कर बोलता है, “चल बाइक निकाल…मैं आता हूँ|” इतना बोल कर महिपाल सरकारी अस्पताल के अन्दर जाता है और मंदार से कुछ बात करता है| फिर बाहर निकल कर आता है, बाइक पर पीछे बैठता है और बोलता है, “आतिश मार्केट पता है?…उधर चलना है…”                       

मनोज बिना कुछ पूछे बाइक स्टार्ट करता है और दोनों चल देते हैं|

आतिश मार्केट की एक रिहायशी कॉलोनी जिसमें डूप्लेक्स मकान बने होते हैं|

महिपाल एक घर का मेन गेट खोल कर बगीचा पार करता हुआ अन्दर जाता है और कई बार घंटी बजाता है पर कोई जवाब नहीं मिलता है….ध्यान से देखता है तो इन्टरलॉक लगा होता है|

“भाग तो नहीं गया सर….” मनोज बोलता है|

महिपाल इधर –उधर नज़र घुमाता है फिर बाहर निकलता है और पड़ोस वाले घर का गेट खटखटाता है|

एक अधेड़ उम्र की औरत निकल कर बाहर आती है|

“नमस्ते!…ये आपके पड़ोस में जो दिवाकर जी रहते हैं कैसे आदमी है?” महिपाल सीधे पूछता है|

“क्या हो गया?…क्यूँ पूछ रहे हो?…”बूढ़ी औरत बोली|

“नहीं बस जानकारी लेनी थी…वो पासपोर्ट के लिए अप्लाई किया था तो रूटीन पूछ-ताछ थी|” महिपाल इधर –उधर देखते हुए पूछता है|

“अच्छा है….ज्यादा किसी से बोलता नहीं है…कभी कभी मेरे लिए भी सब्जी ले आता है….मैं भी अकेले रहती हूँ…बेटा बैंगलोर में है और बेटी ऑस्ट्रेलिया में…” बूढ़ी औरत बोली|

महिपाल मुस्कराता है और बोलता है. “अच्छा….और इनका परिवार?”

बूढ़ी औरत बोलती है, “फैमिली शायद कोटा में है..अभी तो दो –तीन दिन से दिखा भी नहीं…शायद घर गया होगा|”

“जी बहुत अच्छा…वो आए तो बोलिए श्याम नगर थाने में एक बार मिल ले….” महिपाल बोलता है फिर मनोज को दिवाकर के घर का दरवाज़ा बंद करने का इशारा करता है|

बूढ़ी औरत हाँ में सर हिलती है और गेट बंद कर लेती है|

“और हाँ माता जी….हर किसी को मत बोला करो अकेली रहती हो..जमाना ठीक नहीं है…” मनोज चलने से पहले उस औरत को सलाह देता है|

महिपाल घड़ी देखता है फिर मनोज से बोलता है, “इसका ऑफिस खुलने में अभी एक घंटा है…. एक घंटे में राजा पार्क चौराहे पर मिलते हैं..”

“चलिए में आपको छोड़ देता हूँ..” मनोज बोलता है

“नहीं- नहीं मैं चला जाऊंगा…बाहर मार्केट से ऑटो पकड़ लूँगा….तुम पहुँचो…देर मत करना” महिपाल बोलता है|

“ओके सर!” मनोज बाइक स्टार्ट करता है और चला जाता है|

महिपाल भी टहलता हुआ गली पार कर जाता है|

भाग 9: सुराग (Ch 9: Suraag)

नहाया धोया मनोज तय समय पर राजा पार्क चौराहे पर एक चाय की दुकान पर चाय पी रहा होता है| थोड़ी देर में ऑटो वाले को पैसा देता महिपाल नज़र आता है| तेज़ी से चलता महिपाल मनोज के पास आता है और बोलता है, “सॉरी यार लेट हो गया…चल अन्दर चलते हैं”

इन्श्योरेन्स ऑफिस का रिसेप्शन, रिसेप्शन पर अधेड़ उम्र का सिक्यूरिटी गार्ड बैठा रजिस्टर में कुछ लिख रहा होता है| ऑफिस स्टाफ आते जाते है, फिंगर सेंसर पर पंच करते है फिर रजिस्टर में कुछ लिखते रहते है| उधर किनारे लॉबी में कुछ लड़के – लड़कियां सिगरेट पी रहे होते हैं|

“जी सर बताइए क्या काम है?” सिक्यूरिटी गार्ड पूछता है|

“ये है सब इंस्पेक्टर महिपाल चौधरी और मैं मनोज…मनोज यादव… कांस्टेबल श्याम नगर थाने से..आप के ऑफिस में दिवाकर जी काम करते हैं, उन्ही से काम है|” मनोज बोलता है

महिपाल इधर उधर देखता रहता है|

“बड़े-बाबू तो अभी आए नहीं है..पांच –दस मिनट इंतज़ार कर लीजिए आते ही होंगे..” सिक्यूरिटी गार्ड बताता है|

दोनों पास ही रखे सोफे पर बैठ जाते है| महिपाल एक मैगज़ीन उठा कर देखने लगता है और मनोज आते जाते स्टाफ, खास कर लेडीज स्टाफ को देखता रहता है|

थोड़ी देर में महिपाल सिक्यूरिटी गार्ड से पूछता है, “कल कितने बजे गए थे दिवाकर जी ऑफिस से?”

सिक्यूरिटी गार्ड बोलता है, “बड़े-बाबू तो कल नहीं आए थे…वैसे डेली साढ़े छह बजे दफ्तर से निकल जाते है| समय पर आते है… और समय पर जाते है…..सर चाय कॉफ़ी बोले आपके लिए|”

“हाँ चाय चलेगी…बिना शक्कर” मनोज फ़ौरन बोलता है, फिर महिपाल को देखता है….महिपाल का भाव शायद ना बोलने का था पर अब तो मनोज बोल चुका था|

इंतज़ार करते आधा घंटा और बीत जाता है|

मनोज थोड़ा गुस्से में बोलता है, “आप फ़ोन कीजिए दिवाकर जी को ….पूछिए ऑफिस आ रहे हैं या नहीं…पूरा दिन यहीं थोड़े बैठना है|”

सिक्यूरिटी गार्ड रजिस्टर के पीछे से नम्बर देख कर लैंडलाइन से फ़ोन करता है|

“बड़े-बाबू फ़ोन नहीं उठा रहे…” सिक्यूरिटी गार्ड धीरे से बोलता है

“घंटी जा रही है ?” महिपाल पूछता है

“हाँ सर दो बार पूरी-पूरी घंटी गई पर नहीं उठा रहे है….शायद गाड़ी चला रहे होंगे|” सिक्यूरिटी गार्ड असमर्थता दिखाते हुए बोलता है 

महिपाल मनोज को उठने का इशारा करता है…. सिक्यूरिटी गार्ड के पास आता है फिर अपनी पॉकेट डायरी में कुछ लिखता है| इसके बाद दोनों वहां से निकल जाते हैं…

दिवाकर के घर का बाहरी हिस्सा, महिपाल चारो तरफ देखते हुए गेट खोलता है| पड़ोस की बूढ़ी औरत छत पर कपड़े सुखा रही होती है| फिर छत से ही महिपाल और मनोज को अन्दर आते देखती है|

“दिवाकर बाबू आए क्या?” महिपाल जोर से पूछता है|

बूढ़ी औरत हाथ के इशारे से मना करती है

दिवाकर और मनोज अन्दर के दरवाज़े के पास आते है, दिवाकर बोलता है, “वीडियो बना..दरवाज़ा तोड़ना पड़ेगा…ऐसा न हो दूर भाग जाए…अन्दर देखते हैं, शायद कुछ सुराग मिल जाए”

मनोज मोबाइल निकालता है और वीडियो बनाना शुरू करता है|

महिपाल इधर –उधर देखता है, उसे बगल के घर के पोर्च में एक लोहे की राड पड़ी दिखती है|

“माता जी ये रॉड लेनी है…अभी वापस करता हूँ” बिना बूढ़ी औरत के ज़वाब का इंतज़ार किए महिपाल बगल के घर में जाता है, रॉड उठाता है और वापस दिवाकर के घर आ जाता है|

“मनोज वीडियो स्टार्ट कर….”

“सर स्टार्ट है|” मनोज जवाब देता है

महिपाल इन्टरलॉक में रॉड फसा कर लॉक उठा देता है और दरवाज़ा खोल देता है| महिपाल रॉड पकड़े सधे क़दमों से अन्दर जाता है, मनोज पीछे- पीछे वीडियो शूट करता चलता है|

“सर! दिवाकर!…” मनोज बेडरूम की ओर देखता हुआ बोलता है|

महिपाल अन्दर देखता है तो दिवाकर बेड पर बेसुध पड़ा होता है| कमरे के अन्दर जा कर महिपाल चेक करता है तो पता चलता है वह मर चुका होता है|

महिपाल मनोज को वीडियो बंद करने को बोलता है, फिर सरसरी निगाह से पूरे कमरे का मुआयना करता है|

कुछ कागजों को पलटता हुआ महिपाल बोलता है, “थाने फ़ोन कर दो…टीम बुला लो…सुसाइड लगता है…फारेंसिक वालों को भी बोल दो|”

फिर थोड़ा रुक कर बोलता है, “एक काम करो…मैं थाने में फ़ोन कर देता हूँ..तुम आस- पास पता करो किसी के पास इसके घरवालों का नंबर है क्या? नहीं तो ऑफिस से ले कर इसके घर खबर भिजवा दो….और हाँ मंदार को बोलो थाने में पहुँचे….तुम पंचनामा करा कर सीधे थाने मिलो”

मनोज उसके ही साथ साथ घर से बहार निकलता है….अड़ोस पड़ोस में हलचल और ताका-झाँकी शुरू हो गई होती है|

मनोज धीरे से बोलता है, “साला प्यार करते ही क्यों हो जब निभा नहीं सकते…खुद तो मरा- मरा एक और को ले गया|”

भाग 10: जनरल इंक्वारी(Ch 10: General Inquiry)

करीब दो-तीन घंटे बाद महिपाल और मनोज थाने के बाहर चाय की दुकान पर खड़े चाय पी रहे होते हैं, तभी मंदार आता दिखता है|

“मंदार! इधर!” मनोज जोर से आवाज़ देता है|

मंदार सधे क़दमों से चाय की दुकान तक आता है|

“चाय पिओगे, मंदार?” मनोज पूछता है

मंदार मना कर देता है और जेब से सिगरेट निकाल कर जलाता है|

“तुम्हारे बड़े- बाबू ने खुदखुशी कर ली है..” मनोज मंदार से बोलता है|

मंदार चौंक कर मनोज को देखता है, “तो… इसका मतलब….”

“इसका मतलब उन दोनों की मौत के जिम्मेदार तुम हो!” महिपाल सधे शब्दों में मंदार से बोलता है| फिर मंदार की जलती सिगरेट हाथ में लेता है थोड़ी देर देखता है फिर उसमें से एक लम्बा कश लेता है|

“क्या बोल रहे है सर…मैं कैसे…मैं तो ….आप तो सब जानते है…” मंदार अपनी बात रखता है|

महिपाल उसकी सिगरेट उसे वापस पकड़ाता है फिर चाय पीते हुए बोलता है, “….न तुम दिवाकर के घर जाते…न प्यार का जिक्र होता…..न उसकी खोई महबूबा…जो तुम्हारी पत्नी थी…मिलती ..न उसे ये सब करना पड़ता|”

मनोज बोलता है “अपने प्यार को दुबारा देख कर पागल हो गया होगा…और जब लगा नहीं मिल पाएगी तो उसको मार कर खुद भी मर गया….और तुम्हे रंडवा कर गया|”

महिपाल मनोज को घूरता है, मानों गलत शब्दों के प्रयोग के लिए रोकना चाहता हो|

“सॉरी सर” मनोज अपने शब्दों के लिए अफ़सोस करता है|

महिपाल चाय का ग्लास रखता है और सौ का नोट चाय वाले की तरफ बढ़ाता है| बिना फुटकर का इंतज़ार किए थाने की ओर बढ़ जाता है और बोलता है, “मनोज जल्दी अन्दर आ जा और फुटकर वापस ले लेना…फटा फट पेपर तैयार करना है..”

“यस सर!” मनोज जल्द चाय पीते हुए बोलता है…

थाने के अन्दर महिपाल अपने डेस्क पर बैठा होता है, मंदार उसके सामने बैठा महिपाल को देख रहा होता है, तभी मनोज एक रजिस्टर ले कर आता है|

“यहाँ साइन कर दो” मनोज मंदार से बोलता है|

मंदार महिपाल को देखता है, मानों जानना चाह रहा हो की ये क्या है….

“साइन कर दो, NOC है….इस पेपर के बिना बॉडी नहीं मिलेगी” महिपाल समझाता है|

मंदार चुपचाप साइन करता है, एक पेपर लेता है और चला जाता है|

तीन दिन बीत जाते है| दोनों ही घर में क्रियाकर्म हो चुका होता है| और थाने में एक सामान्य दिन होता है| मनोज महिपाल के सामने बैठा सही तरीके से कपालभाती करने का तरीका बयां कर रहा होता है, महिपाल वहां होते हुए भी कुछ अलग सोच रहा होता है फिर अचानक बोलता है, “यार मनोज कुछ तो अटपटा है….जब पिछले दस साल में कुछ नहीं किया तो अचानक खून और फिर खुदखुशी…कुछ तो गड़बड़ है|”

मनोज तीन दिन बाद अचानक आए इस सवाल से थोड़ा चौंकता है फिर बोलता है, “सर क्या सोच रहे हैं…सिंपल रिवेंज केस था….इतने साल बाद अपनी महबूबा को देख अरमान जागे होंगे और जब मिलने गया होगा और वो नहीं मानी होगी तो मार दिया….फिर अपराध बोध में खुद को मार लिया| मोबाइल मैसेज और नेटवर्क लोकेशन भी तो यही बताती है कि उस रोज़ दिवाकर मंदार के घर गया था|”

“चल बाइक निकल…रजिस्टर में एंट्री कर ….दिवाकर के घर हो कर आते है….मैं सर को बोल कर आता हूँ” महिपाल उठते हुए बोलता है|

“यस सर!” मनोज भी उठ जाता है| फिर चलते हुए भुनभुनाता है… “क्यों गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हो…”

थोड़ी देर बाद दिवाकर के घर पर….

दिवाकर के माता पिता सोफे पर बैठे होते है, बहन पानी ले कर आती है| सामने सोफे पर महिपाल और मनोज बैठे होते है| महिपाल पानी पीता है और पूछता है, “कभी किसी से दुश्मनी…कोई रंजिश?”

दिवाकर के माता पिता थोड़ा चौकते है फिर दिवाकर के पिता बोलते है, “नहीं बहुत सीधा था हमारा बेटा..बचपन से कभी कोई शिकायत नहीं थी…सिर्फ काम से काम…”

तभी दिवाकर की माँ बोलती है, “रोज़ बात करता था घर पर…दिन भर की पूरी बात बताता था….आज तक उसने कोई बात नहीं छिपाई..”

महिपाल गौर से उनकी हर बात सुनता है फिर बोलता है, “और दोस्त…दोस्त कौन कौन थे…वो लड़का जिसकी बीवी का कत्ल हुआ बता रहा था दिवाकर के दो-तीन ख़ास दोस्त थे…पुराने|

“हाँ युसूफ, दिलीप और बंटी,….युसूफ तो बचपन का दोस्त था…घर भी आता जाता था,…दिलीप और बंटी जयपुर में ही मिले थे…ग्रेजुएशन में…एक दो बार कोटा भी आए थे…अच्छे लड़के थे..पर उस लड़की के चक्कर में सब दोस्तों से अलग हो गया था मेरा बेटा|” यह बोलते दिवाकर की माँ के आसूं निकल आते हैं|

“वैसे ये सब आप अब क्यूँ पूछ रहे है ….कोई ख़ास बात?” दिवाकर के पिता महिपाल से पूछते है|

“नहीं, वैसे ही, जनरल इंक्वारी….वो केस क्लोज़र रिपोर्ट बनानी है उसकी फॉर्मेलिटी है” महिपाल बात टालता है|

दिवाकर की माँ, दिवाकर के पिता के कान में कुछ कहती है…फिर दिवाकर के पिता बात को टालने का भाव लाते है, तभी महिपाल बात बताने के लिए जोर डालता है|   

 “इंस्पेक्टर साहब एक बात थी सोचा बता दूँ…वो लड़का दिलीप….एक बार उस लड़की को लेकर दिलीप और दिवाकर में झगड़ा हो गया था” दिवाकर की माँ कहती है|

“अरे वो तो बहुत पहले की बात थी….ज़रा सी गलत फहमी थी…बाद में सब ठीक हो गया था…” दिवाकर के पिता बात ख़त्म करने की लिहाज़ से बोलते हैं|

महिपाल और मनोज अब कुछ ज्यादा सतर्क हो जाते है, महिपाल बोलता है, “थोड़ा डिटेल में बताएँगे…”

भाग 11: वज़ह (Ch 11: Wazah)

दिवाकर के पिता बोलते है, “अरे वो कुछ नहीं….एक बार वो लड़की…क्या नाम था…हाँ डॉली….हाँ उसको ले कर दिवाकर और दिलीप में झगड़ा हो गया था…दिलीप भी डॉली को पसंद करता था लेकिन उसने बोला किसी को नहीं था….वो तो एक बार पता नहीं कैसे दिवाकर को पता चल गया और बात बढ़ गई थी….हालांकि बाद में सब ठीक हो गया था…छोटी सी बात थी|”

महिपाल और मनोज ऐसे सुन रहे थे मानों उन्हें कुछ खटक रहा हो|

तभी दिवाकर की माँ बोली, “और एक बात…लेकिन दिलीप और दिवाकर में अभी हाल ही में बात भी हुई थी….इतने सालों बाद…दिवाकर बता रहा था|”

महिपाल हामी में सर हिलाता है…वो यह बात जानता था|

“वो आने वाला था…दिवाकर से मिलने…” दिवाकर की माँ खोए –खोए बोलती है|

“कब?….कब की बात है?” महिपाल चौकते हुए पूछता है|

दिवाकर की माँ बोलती है “उसी दिन..जिस दिन ये सब हुआ….दिवाकर का फ़ोन आया था….बोल रहा था इतने साल बाद दिलीप आ रहा है…खुश था बहुत|”

महिपाल को कुछ खटकता है, कुछ सोचते हुए बोलता है, “नंबर है किसी का दिलीप, यूसुफ…बंटी|”

दिवाकर के पिता एक पॉकेट डायरी निकाल कर देखते है फिर बोलते हैं, “दिलीप….9823…”

मनोज अपने मोबाइल पर डायल करता है|

दिवाकर के पिता आगे बोलते हैं, “यूसुफ का नंबर…9836…”

“दिलीप का नंबर स्विच ऑफ आ रहा है” मनोज बोलता है| “एक बार यूसुफ का नंबर फिर से दीजिए..”

दिवाकर के पिता फिर से डायरी खोलते हैं, और बताते है, “9836…”

तभी महिपाल मनोज को अपने नजदीक बुलाता है और कान में कुछ कहता है| मनोज नंबर लगा कर बाहर चला जाता है और बात करने लगता है|

महिपाल दिवाकर की बहन की तरफ देखता है और पूछता है, “ये कौन?”

“हमारी बेटी है, मंज़री” दिवाकर के पिता बोलते है|

“क्या करती हो?” महिपाल मंजरी से पूछता है

“जी मैं C.A कर रही हूँ…फाइनल इयर”

“गुड!…दिवाकर की कोई बात जो तुम्हे पता हो और बताना चाहो….कुछ भी…” महिपाल आगे बोलता है

“नहीं, मेरे भईया बहुत अच्छे थे….कोई बुरी आदत नहीं थी….डॉली के चक्कर में इतना बड़ा कदम….” मंजरी बोली|

“अस्थमा था तुम्हारे भाई को….सिगरेट की आदत तो थी|” महिपाल मंजरी की तरफ आते हुए बोलता है| फिर बेहद नज़दीक आ कर मंजरी के कान में धीरे से बोलता है, “और ये आदत तुम्हे भी है…”

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मंज़री घबरा जाती है, लिकिन इस बात का जवाब नहीं देती है, फिर बात घुमाते हुए बोलती है, “हाँ भईया पहले पीते थे..सबको पता था…पर अस्थमा का अटैक आने के बाद छोड़ दी थी”

महिपाल हामी में सर हिलाता है फिर बोलता है, “मैंने भी छोड़ दी है…काफी साल हो गए…पर टेंशन ज्यादा होती है तो छुप छुपा कर पी लेता हूँ ..एक या दो…,पत्नी को पता नहीं चलता” महिपाल मुस्करा कर कहता है और दिवाकर के माँ बाप को देखता है|

तभी मनोज बाहर से अन्दर आता है और महिपाल के कान में कुछ कहता है…सुनते सुनते ही महिपाल के चेहरे के भाव बदल जाते हैं|

महिपाल थोड़ा सख्त लहजे में बोलता है, “क्या- क्या छुपाया है?…और क्यों?…पुलिस से किसको बचा रहे हो…अपने बेटे के कातिल को…”

“क्या बात कर रहे हैं इंस्पेक्टर साहब?” दिवाकर के पिता चौंक कर पूछते है|

मंज़री और दिवाकर की माँ का चेहरा घबराया हुआ रहता है|

“दिवाकर और प्रदीप के झगड़े की वज़ह डॉली नहीं…. आपकी बेटी थी…मंजरी” महिपाल पूरे रौब से बोलता है|

दिवाकर के माँ बाप और मंज़री तीनो चौंक जाते है| थोड़ी देर सन्नाटा रहता है फिर दिवाकर के पिता बोलते है, “अरे नहीं इंस्पेक्टर साहब ….वो तो छोटी सी बात थी…बच्चों की नादानी…वैसे भी उस बात को बहुत अरसा हो गया इंस्पेक्टर साहब| अब तो….”

“मैंने पहले ही बोला था, कानून से कुछ भी नहीं छुपाना..बताइए पूरी बात बताइए…और याद रखिए हम पुलिस वाले है…खबर सूंघना और सूंघ कर निकालना हमारे खून में होता है….तो फिर…” महिपाल सख्त लहजे में ताना मारते हुए बोलता है|

“असल में एक बार गर्मियों में दिलीप, दिवाकर के साथ आया था और हमारे घर ही रुका था…मंज़री तब दसवीं में थी..पता नहीं कैसे दोनों करीब हो गए..दिवाकर को जब पता चला तो बात बढ़ गई थी….लेकिन उसके बाद ऐसा कुछ भी नहीं हुआ….भगवान् कसम…आप पूछ लीजिए..” दिवाकर के पिता रुहसे हो कर बोलते है|

महिपाल मंज़री को देखता है, पर मंज़री कुछ भी नहीं बोलती|

“साहब हम लोग मिडिल क्लास शरीफ लोग है…छोटी सी बात थी…बात फ़ैल जाती और समाज में उठना बैठना दूभर हो जाता….देखिए लड़की सयानी हो गई है…शादी की बात चल रही है|” दिवाकर के पिता हाथ जोड़ कर, आँख में आसूं रखते हुए कहते है|

“छोटी सी बात….अरे ऐसा भी हो सकता है, दिलीप यहाँ आया हो और उसने ही दिवाकर को….”

दिवाकर के घरवाले अचंभित हो उठते हैं|

“कुछ भी हो सकता है…पुलिस की थ्योरी है….कानून का काम है मुजरिम को पकड़ना और पीड़ितों को न्याय दिलाना…आप की छोटी सी बात से हो सकता है अपराधी बाहर घूम रहा हो” महिपाल तल्ख़ अंदाज़ में कहता है|

फिर मनोज की ओर देखते हुए पूछता है, “बात हुई…. दिलीप से?”

“नहीं सर, फ़ोन अभी भी बंद आ रहा है….” मनोज बोलता है|

“आप लोगों को दिलीप का एड्रेस पता है …या कोई और नंबर?” महिपाल दिवाकर के पिता की ओर देख कर पूछता है|

“सर युसूफ से पूछता हूँ….शायद उसे पता हो…” मनोज बोलता है

“जोधपुर का है…पर एड्रेस नहीं पता…” दिवाकर के पिता बोलते है

मनोज यूसुफ़ को फिर से फ़ोन करता है और बात करते हुए पॉकेट डायरी में कुछ लिखता है

थोड़ी देर बाद मनोज उत्साहित हो कर बताता है, “सर एड्रेस मिल गया है…”

“ठीक है…नजदीकी थाने से संपर्क करो और बोलो दरियाफ्त कर के खबर करें….बोलना अर्जेंट है|” महिपाल मनोज को बोलता है

मनोज बात करने बाहर निकल जाता है

“आप लोग हो सके तो जयपुर ही रुकिए..ज़रुरत पड़ी तो एक दो बार मिलना पड़ सकता है| महिपाल बोलता है और उठ कर जाने लगता है|

“तो क्या दिवाकर को किसी ने…?” दिवाकर की माँ पूछती है

“हो सकता है….अभी कुछ भी नहीं कह सकते..” महिपाल बोल कर बाहर चल देता है

भाग 12: मेवाती लॉज (Ch12: Mewaati Lodge)

थोड़ी देर बाद महिपाल और मनोज एक साधारण से रेस्टोरेंट में बैठे खाना खा रहे होते है| तभी महिपाल का फ़ोन बजता है|

“जी सर!…ओके सर!…मानसरोवर मेट्रो स्टेशन….मेवाती लॉज…ओके सर…बस अभी निकल रहे है सर….जी सर….जय हिन्द!” महिपाल अपने अधिकारी से फ़ोन पर बात करते हुए कहता है|

मनोज खाना खाते हुए पूछता है, “क्या हुआ सर….कोई नया कलेश….”

महिपाल बोलता है, “अरे अपनी जिंदगी में सुकून कहाँ…चल फटा फट ख़तम कर…सुसाइड केस है..तफ्तीश करनी है….” थोड़ा रुक कर बोलता है, “एक काम कर टीम वही बुला ले…फोरंसिक को भी बोल दे..एड्रेस व्हाट्सएप कर रहा हूँ.” महिपाल मेसेज टाइप करते हुए बोलता है|

अरे सर दो मिनट रुक जाओ सुकून से खाना तो खा लो…लाश को कहाँ जाना है….सब फ़ोन कर देता हूँ…आप खाना खाओ” मनोज बोलता है|    

तभी मनोज का फ़ोन बजता है…खाना खाते खाते फ़ोन पर बात करता है फिर फ़ोन काट देता है|

“एड्रेस सही है….चार दिन पहले जयपुर आया था तब से घर नहीं आया…एफ.आई.आर. भी कराई है उसकी बीवी ने…वो जोधपुर थाने से फ़ोन था” मनोज महिपाल को बताता है|

महिपाल हाथ धोते- धोते कुछ सोचता रहता है और फिर मनोज को उठने का इशारा करता है|

थोड़ी देर बाद मानसरोवर मेट्रो स्टेशन के पास वाली गली में दोनों रुकते है, पुराना बाजार है यो चहल पहल काफी थी| महिपाल पीछे से उतरता है और पूरे एरिया पर एक सरसरी निगाह दौड़ता है…एक पान वाले से एड्रेस पूछता है, फिर बताए हुए एड्रेस पर चल पड़ता है|

एक छोटी सी बेहद ही साधारण लॉज के रिसेप्शन पर मनोज और महिपाल पहुचते है|

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“फ़ोन आया था…कौन सा कमरा?” महिपाल रिसेप्शन पर खड़े एक आदमी से पूछता है

“हां सर मैंने ही फ़ोन किया था…आइए ….इधर फर्स्ट फ्लोर…आइये सर” वह आदमी उन्हें कमरे की तरफ ले जाता है|

गैलरी में एक कमरे के सामने 8-10 लोग जमा होते है और दरवाज़ा आधा खुला होता है..सभी नाक पर हाथ रखे खड़े होते है| महिपाल पहले उनको अलग करवाता है फिर धीरे से दरवाज़ा धकेलता है..अन्दर एक हलकी गंध महसूस होती है तो नाक पर रुमाल रखते हुए महिपाल और मनोज कमरे में दाखिल होते है|

“अन्दर कौन- कौन घुसा था?” महिपाल सख्त आवाज़ में पूछता है

“सर ये कमरा कोई तीन दिन से नहीं खुला था…न खाने का आर्डर न पानी का..आज सफाई के लिए खटखटाया तो भी कोई आवाज़ नहीं आई…अन्दर से बदबू भी आ रही थी तो लड़के ने मास्टर की से खोल लिया….तो ये…” रिसेप्शन वाला आदमी बोला|

“दरवाज़ा किसने खोला था?” महिपाल पूछता है

“”सर मुकेश ने…यहीं काम करता है….वो रहा”

मनोज मुकेश की तरफ देखता है, एक 17-18 साल का लड़का घबराया हुआ खड़ा था|

“सर मै तो….मेरे को बोला तो मैंने खोला था…” मुकेश बोलता है

“और कौन कौन अन्दर गया था?” महिपाल पूछता है

“सब गए थे सर…हम सब अन्दर गए थे..” मुकेश फ़ौरन बोलता है

महिपाल सावधानी से कमरे का मुआयना करता है, फिर मनोज से पूछता है, “फॉरेंसिक वालों को बोल दिया था?”

मनोज हां में सर हिलाता है

“टीम आ जाए तो पोस्टमार्टम के लिए भेज देना|” महिपाल बोलता हुआ कमरे से बाहर निकलता है

बाहर रिसेप्शन वाले आदमी से पूछता है, “नाम?”

“सर…मदन…मदन मीणा” रिसेप्शन वाला लड़का बोलाता है  

“रजिस्टर दिखाओ….” बोलते हुए महिपाल उसके साथ रिसेप्शन पर आता है

रिसेप्शन पर वह रजिस्टर महिपाल के सामने रख देता है| महिपाल रिसेप्शन रूम को ध्यान से देखता है फिर पूछता है, “कैमरा नहीं है…. CCTV?”

“वो सर…लॉज है…” रिसेप्शन वाला लड़का शर्मिंदगी में बोलता है

“इसमें तो नाम दिलीप लिखा है….तू तो मदन बता रहा था..” महिपाल नाराज़ होते हुए बोलता है

“नहीं सर.. मदन मेरा नाम है….इसका नाम तो …..मुझे लगा आप मेरा….”

महिपाल अजीब सी नज़रों से उसे देखता है फिर लॉज के बाहर निकल जाता है|

महिपाल बाहर चाय की दुकान पर खड़ा मनोज को फ़ोन करता है और नीचे बुलाता है, फिर मार्केट के चारो ओर नज़र घुमाता है| थोड़ी देर में मनोज बाहर निकल कर आता है|

मनोज महिपाल के पास आता है और बोलता है, “सर क्या लगता है सुसाइड या मर्डर?”

महिपाल कोई ज़वाब नहीं देता बस सोचता रहता है फिर बोलता है, “कोई मोबाइल मिला?”

“नहीं सर मोबाइल तो नहीं मिला….पर एड्रेस वही है ..जोधपुर का|” मनोज बोलता है

“टीम कब तक आ रही है?” महिपाल चाय ख़त्म करते हुए बोलता है

“सर ऑन द वे है.. आधे घंटे में पहुँच जाएंगे” मनोज बोलता है

तभी महिपाल के सीनियर का फ़ोन आता है और वह सिचुएशन का अपडेट देता है…साथ ही मनोज को बिल चुकाने का इशारा भी करता है|

अगले दिन थाने में सुबह- सुबह का वक़्त…

महिपाल अपनी कुर्सी पर बैठा मोबाइल पर गेम खेल रहा होता है, तभी मनोज बाहर से अन्दर आता है और बोलता है, “रिपोर्ट आ गई है…..सुसाइड लगता है….नींद की गोली का हैवी डोज़” फिर कुछ रुक कर पूछता है, “आप का क्या सोचना है…”

“देख मेरी थ्योरी से एक साथ दो पुराने यार सुसाइड करें पॉसिबल नहीं है…शायद दिवाकर ने पहले उस लड़की को मारा होगा फिर दिलीप को….रीज़न  भी है..पर पैटर्न बिलकुल अलग है” महिपाल मोबाइल पर गेम खेलते खेलते बोलता है|                    

“ऐसा भी हो सकता है दिलीप और दिवाकर मिले हों फिर उसकी बहन वाली बात पर…” मनोज अपनी बात रखता है|

“कॉल डिटेल्स और नेटवर्क लोकेशन रिपोर्ट आ गई?” महिपाल पूछता है

“हाँ सर वो कंप्यूटर रूम में है….चलिए..” मनोज बताता है

दोनों उठ कर कंप्यूटर रूम में चले जाते है|

थोड़ी देर बाद महिपाल और मनोज थाने के बाहर चाय की दुकान पर खड़े चाय पी रहे होते है|

“सर अब तो सब साफ़ है…दिलीप जोधपुर से दिवाकर के घर आता है…वहां उसको मारता है फिर शराब खरीद कर लॉज आता है…अपराध बोध और ज्यादा नशे में खुदखुशी कर लेता है” मनोज पूरे कॉन्फिडेंस से बोलता है|

“और वो लड़की?” महिपाल धीरे से बोलता है

‘वो तो पहले से क्लियर है….दिवाकर डॉली के घर जाता है उससे झगड़ा होता है दिवाकर उसे मार कर घर लौटता है…दिलीप उसके घर आता है..शराब के नशे में दिवाकर उसे बता देता है..दोनों में बहस होती है और दिलीप उसे नशे की गोली देकर मार देता है…फिर अपराध बोध में खुद भी….वैसे भी मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव था..नशे की गोली कौन सी बड़ी बात थी|

महिपाल चाय के पैसे देता है और मनोज को बाइक निकालने को बोलता है|

भाग 13: बरसात की वो शाम (Ch13: Barsaat ki wo Shaam)

महिपाल और मनोज की बाइक सरकारी अस्पताल के अन्दर जाती है और दोनों सरकारी अस्पताल के मुर्दा घर के पास पहुचते है, बाइक लगाने के बाद मनोज कोई फ़ोन करता है फिर हाथ हिला कर इशारा करता है दूर दिलीप की पत्नी बॉडी के लिए वहां इन्तेजार कर रही होती है|

महिपाल मनोज को इशारा करता है, मनोज जाता है और दिलीप की पत्नी को भीड़ से दूर महिपाल के पास ले आता है| महिपाल पहले सांत्वना देता है फिर बोलता है, “आप दिवाकर को जानती थी?”

जी सुना तो था पर कभी मिली नहीं थी…हफ्ते भर पहले देर रात फ़ोन आया तो पता चला| ….उन्ही से मिलने जयपुर आए थे…” इतना बोलते बोलते दिलीप की बीवी रोने लगती है|

“दिवाकर का भी….आई एम श्योर…आप को पता चला होगा” महिपाल बोलता है|

“जी… सुना मैंने…लेकिन अचानक कैसे….इनकी तो कई साल से कोई बात चीत भी नहीं थी..अचानक एक दिन फ़ोन आता है और सब बदल जाता है….” दिलीप की पत्नी रुहाँसे मन से बोलती है|

“कोई ख़ास बात …कोई वाकया…जो आप बताना चाहें….” महिपाल पूछता है

दिलीप की पत्नी सोचने की कोशिश करती है फिर बोलती है, “ऐसा तो कुछ खास नहीं….वो बहुत खुश थे…सालों बाद मिलने जा रहे थे….फ़ोन पर बताया भी था कि दिवाकर जी के घर पहुँचने वाला हूँ|”

“एक बार समय देख कर बता सकती हैं कितने बजे फ़ोन पर बात हुई थी?” महिपाल पूछता है

फिर दिलीप की पत्नी फ़ोन देखती है और बोलती है, “उस रोज़ दो-तीन बार बात हुई थी…ये वाली कॉल शाम 6:23 की थी….इसके बाद मैंने फ़ोन किया था करीब साढ़े सात बजे….हाँ 7:36 लेकिन बात साफ़ नहीं हो पाई…यहाँ ज़ोरों की बारिश हो रही थी…बोल रहे थे नेटवर्क प्रॉब्लम है|”

महिपाल मनोज को देखता है |

“ठीक है आप इंतज़ार कीजिए…और कुछ भी याद आए तो मुझे फ़ोन कीजिए…ये मेरा नंबर है…और एक बात आप बॉडी जोधपुर ले जाएँगी या जयपुर में ही?…” महिपाल पूछता है

“यहाँ तो मेरा कोई है भी नहीं….मेरा भाई आ रहा है, फिर हम जोधपुर ही जाएंगे” इतना बोल कर दिलीप की पत्नी रोने लगती है|

“देखिए आप परेशान मत होइए..आपको कोई भी हेल्प चाहिए फ़ोन कर दीजिएगा…हम लोग पूरी मदद करेंगे” महिपाल सांत्वना देता है|

महिपाल और मनोज हाथ जोड़ कर जाने लगते है तभी दिलीप की पत्नी पीछे से बोलती है, “इंस्पेक्टर साहब एक बात और..उस रात मैंने टाटा स्काई रिचार्ज कराने के लिए भी फ़ोन किया था….वो टीवी बंद हो गया था और बच्चे ज़िद कर रहे थे…पर उधर से फ़ोन किसी लड़की ने उठाया था…फिर तुरंत फ़ोन कट गया| मुझे लगा मौसम खराब है इस लिए क्रॉस कनेक्शन लग गया होगा…फिर दोबारा लगाया तो बात हुई पर  क्लियर नहीं थी, तेज़ बारिश के कारण बात साफ़ समझ नहीं आ रही थी|”

महिपाल वापस बाइक से उतरता है और नज़दीक आता है फिर पूछता है, “रिचार्ज हुआ था?”

“हाँ रिचार्ज तो दस मिनट के बाद हो गया था” दिलीप की पत्नी बोली

“कौन सा कनेक्शन है?” महिपाल पूछता है

“टाटा स्काई!” दिलीप की पत्नी जवाब देती है

“कनेक्शन ID मिल सकती है क्या?” महिपाल पूछता है

“जी वो तो घर पर होगी…जब जाउंगी तो दे पाउंगी..” दिलीप की पत्नी बोलती है

महिपाल सर हिला कर वापस बाइक की तरफ बढ़ता है|

“इंस्पेक्टर साहब…रुकिए.. ID है….वो जब रिचार्ज के लिए बोला था तो उनको ID व्हाट्सएप किया था…ये देखिए” दिलीप की पत्नी मोबाइल दिखाते हुए बोलती है

महिपाल ID अपनी पॉकेट डायरी में नोट करता है फिर मोबाइल पर कुछ सर्च कर फ़ोन करता है…..फ़ोन कान पर लगे लगे ही बाइक पर बैठता है और मनोज को चलने का इशारा करता है| फिर चलती बाइक पर फ़ोन कान से दूर करता है और मनोज से कहता है, “मानसरोवर”

मनोज बिना कुछ पूछे बाइक मानसरोवर की ओर मोड़ देता है

महिपाल इशारा करता जाता है और मनोज बाइक चलाता जाता है, दोनों एक मोबाइल शॉप पर रुकते है महिपाल बाइक से उतरता है और चारो तरफ नज़र दौड़ता है, फिर दोनों मोबाइल शॉप के अन्दर चले जाते हैं और दुकान के मालिक के बारे में पूछते है|

“दुकान मालिक से बात करनी है” महिपाल आराम से बोलता है

“जी कहिए” दुकानदार बोलता है

“आप की दुकान में CCTV नहीं है?” महिपाल पूछता है

“सर मोबाइल की दूकान है …आप एक काम कीजिए वो तीसरी गली में गर्वित इलेक्ट्रॉनिक्स है उनके पास मिलेगा CCTV, कंप्यूटर….” दूकानदार समझाता है|

“जी नहीं मेरा मतलब CCTV लगा नहीं है..” महिपाल अपनी बात समझाता है

“कौन है आप?…क्या काम है?..इनकम टैक्स वाले हो क्या?” दूकानदार ताना मारते हुए बोलता है

“ए तमीज से…SI हैं….अभी हंसी अन्दर डाल देंगे” मनोज गुस्से में बोलता है

महिपाल मनोज को समझाता है फिर दुकानदार से बोलता है, “आप टाटास्काई रिचार्ज करते है?”

“जी”

ज़रा देख कर बताइए 24 नवम्बर की शाम एक रिचार्ज किया था इस ID पर….” महिपाल एक कागज़ दिखता है|

“सर एक मिनट…..,बदरी….वो रिचार्ज वाला रजिस्टर लाइयो….एक मिनट सर” दुकानदार बोलता है

दुकान पर काम करने वाला लड़का, बदरी रजिस्टर ला कर दुकानदार को दे देता है और वहीं पास खड़ा हो जाता है।

दुकानदार रजिस्टर चेक करता है और बोलता है, “जी एक रिचार्ज है पांच सौ का”

“एक लड़की ने कराया था” बदरी मुस्कराते हुए बोलता है।

“ओ हो…तुझे बड़ा याद है” मनोज बदरी से बोलता है

“वो साहब शाम को आई थी, और सिगरेट पी रही थी…इसीलिए…” बदरी शरमाते हुए बोलता है

“फोटो खींची…फोटो…” मनोज बदरी से मज़ाक में कहता है

बदरी शर्मा जाता है और सर हिला कर मना कर देता है|

महिपाल मनोज को इशारा करता है, दोनों दुकान से बाहर निकल जाते है| इस बार महिपाल बोलता है, “क्या लगता है कौन हो सकती है? किसी औरत का चक्कर..?”

“हाँ सर था तो एक नंबर का रसिया…डॉली और दिवाकर की बहन दोनों के चक्कर में था..सर कहीं दिवाकर की बहन तो नहीं…”

महिपाल कुछ सोचता है जैसे मानो कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो। फिर बिना कुछ बोले मनोज को बाइक स्टार्ट करने का इशारा करता है| बाइक पर बैठे–बैठे महिपाल फ़ोन पर किसी से बात करता है फिर चालू फ़ोन पर मनोज को रास्ता बताता जाता है|

भाग 14: शह और मात (Ch 14: Shah aur Maat)

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एक साधारण सी तीन मंजिला बिल्डिंग के बाहर बाइक रुकती है, दोनों बिल्डिंग को देखते है फिर महिपाल गेट पर चौकीदार से बात करता है। महिपाल को बाइक लगा कर अंदर आने का इशारा करता है फिर दोनों सीढ़ी चढ़ने लगते हैं| सीढ़ी चढ़ते- चढ़ते मनोज महिपाल से पूछता है, “सर कुछ बोलोगे? कहाँ ले कर आए हो…किसका घर है?”

अब तक दोनों पहली मंजिल के एक दरवाज़े पर होते हैं, महिपाल घंटी बजाता है और मुस्कराते हुए मनोज से बोलता है, “कातिल के घर!”

मनोज चौक जाता है|

दरवाज़ा खुलता है और अन्दर से एक लड़की निकलती है, “यस”

महिपाल बोलता है, “हेल्लो दिव्या!” फिर दरवाज़ा धकेलता है और अन्दर पहुँचता है और मुस्कराते हुए बोलता है, “और कहानीकार कैसे हो?”

अन्दर सोफे पर शराब का ग्लास पकड़े मंदार बैठा होता है| 

मनोज पिस्टल हाथ में लिए गेट पर पोजीशन ले लेता है|

दिव्या और मंदार दोनों की हवाइयां उड़ चुकी होती है, फिर भी मंदार संभलते हुए बोलता है, “सर आप? यहाँ कैसे….?”

महिपाल मुस्कराता है और मनोज से कहता है, “मनोज कहानी सुनोगे?…एक कहानी सुनाता हूँ”

मनोज अभी भी असमंजस में होता है|

महिपाल बोलना शुरू करता है, “एक कहानीकार होता है…जो अपने शब्दों के जाल में किसी को भी फंसा लेता है, एक बार उसे पता चलता है कि उसकी पत्नी का प्रेम प्रसंग किसी और के साथ रह चुका होता है….कहानीकार ये बात पचा नहीं पाता है और अपनी प्रेमिका के साथ मिल कर पहले एक कहानी गढ़ता है फिर उस कहानी को अमल में लाता है और उसके बाद पहले अपनी  पत्नी को मारता है फिर उसके पुराने प्रेमी को….क्यों ठीक कहा न…मिस्टर कहानीकार”

   अब तक मंदार के चेहरे के भाव बदल चुके होते हैं…लगा मानों आत्मसमर्पण कर चुका हो, फिर हँसते हुए बोलता है, “क्या बात है इंस्पेक्टर साहब…यहाँ तक पहुचे कैसे?”

अब महिपाल के तेवर बदल चुके थे, वो गुस्से में बोलता है, “साले, तुमने क्या कानून को उपन्यास समझ रखा है…जैसा चाहोगे घुमा दोगे..अरे कानून के हाथ तुम्हारी कलम से कहीं ज्यादा लम्बे हैं…जहाँ तुम्हारी सोच ख़तम होती है, वहां से तो हम सोचना शुरू करते है….’साले चरसी’….तुझे क्या लगा, ये जो सिगरेट में गांजा मिला कर पीता है…पकड़ा नहीं जाएगा…” फिर आगे बोलता है, “अरे तुझ पर तो शक मुझे तभी हो गया था जब तू उस दिन थाने के बाहर मिला था…तेरी सिगरेट की गंध बाकी सिगरेट से थोड़ी अलग थी….और ठीक वैसी ही सिगरेट की गंध मुझे दिवाकर के घर पर मिली थी|

मंदार हँसते हुए बोला, “लेकिन वैसी सिगरेट तो कोई भी पी सकता है, और हम दोनों तो वहां मौजूद भी नहीं थे…आपने मेरे कॉल रिकॉर्ड देखा था”

महिपाल हंस कर बोलता है, “लेकिन मैंने तो दोनों की बात ही नहीं की…”

अब मंदार झेप जाता है, उसे लगा वो अपने ही शब्दों में फंस गया था|

“अब आगे की कहानी तुम बताओगे या हमसे सुनोगे” महिपाल बोला

मंदार शराब का एक घूँट लगाता है फिर बोलना शुरू करता है, “साला… राजपूत की बीवी….किसी और का इश्क…मज़ाक है क्या?….डाली के प्यार की खबर तो हमको पहले ही लग चुकी थी….लेकिन शादी कर चुके थे तो चुप थे…खैर.. डॉली मायके गई तो दिव्या से हमारी नजदीकी बढ़ गई और बातों- बातों में हमने दिव्या को सब बता दिया….फिर हम दोनों ने ही मिल कर उसे रास्ते से हटाने का फैसला किया….सब कुछ प्लान के मुताबिक था…हम बड़े- बाबू के घर गए, उन्हें शराब पिलाई फिर शराब के नशे में पाली ले गए…वहां दोनों को आमने सामने किया फिर वापस आ गए| अगले दिन मौका देख डॉली को ख़तम कर दिया, फिर दिव्या को बुलाया और डॉली के फोन से बड़े-बाबू को फ़ोन करवाया कि उससे मिलना चाहती है, वो भी अर्जेंट”

“बस यहीं तुम्हारी कहानी कमज़ोर पड़ गई कहानीकार तुमने एक नहीं दो –दो गलतियाँ कर दी…” महिपाल ताना मारते हुआ बोला| “डॉली के क़त्ल का टाइम और डॉली के फ़ोन से दिवाकर को किये गए फ़ोन के टाइम में फर्क था…रिपोर्ट के मुताबिक डॉली का कत्ल 4 से 5 के बीच हुआ था और और जो कॉल हुई थी वो 4 बज कर 46 मिनट पर की गई थी …..10-15 मिनट में तुम्हारे घर पहुंचना, फिर बात करना और उसके बाद क़त्ल करना पॉसिबल नहीं है| दूसरा तुम्हारे घर पर जो सिगरेट के बड मिले थे उसमे एक बड पर लिपस्टिक का निशान था….जो दिव्या मैडम का था….इनको सिगरेट पीते हमने तुम्हारे ऑफिस में ही देख लिया था….अब छोटे शहर में ये नज़ारा आम थोड़े होता है|”

मनोज महिपाल का तर्क सुन कर चौंक जाता है फिर मुस्कराता है|

“अब आगे सुनाओ…” महिपाल मंदार को इशारा करता है

मंदार सिगरेट जलाता है और बोलता है, “प्लान के मुताबिक हम दोनों दरवाज़ा लॉक कर बाहर आ जाते है, फिर दिव्या हमारा फ़ोन लेकर रॉयल बार के पास चली जाती है और हमारा इंतज़ार करती है… हम वहां से बड़े-बाबू के घर के पास आ कर उसके लौटने का इंतज़ार करते है| बड़े-बाबू डॉली से मिलने आते है पर दरवाज़ा नहीं खुलता..फिर वह लौट कर वापस घर आ जाते है….थोड़ी देर बाद हम उनके घर जाते है और उनको पुरानी बातें भूलने को बोलते है…फिर हम दोनों शराब पीते है….मौका पा कर हम बड़े-बाबू की शराब में नशे की गोली मिला देते है और फिर तीसरे पेग में गोलियों का ओवरडोज़ दे देते हैं|”

“दिलीप को क्यों मारा उस बेचारे की क्या गलती थी…” इस बार मनोज पूछता है

मंदार हंसा फिर एक घूँट शराब पीते हुए बोला, “वो बेचारा तो बिना बात फंस गया…जब हम बड़े-बाबू के घर से निकले तो वो गेट पर ही मिल गया..पहले तो हम घबरा गए…फिर हमने उसे बहकाते हुए कहा कि बड़े-बाबू घर पर नहीं हैं और अपने साथ ब्लू हैवन बार ले गया….थोड़ी देर बाद हमने कहानी बनाई कि हमारा फ़ोन बड़े- बाबू के लॉन में छूट गया है और फिर दिलीप का फ़ोन ले कर हम बड़े बाबू के घर के पास आ गए…वहां PCO से दिव्या को फ़ोन किया और उसे पास बुलाया|

“बस उसी समय दिलीप की पत्नी का फ़ोन आ जाता है और तुम अपना फ़ोन समझ कर कॉल उठा लेते हो” महिपाल बीच में मंदार को रोकते हुए बोलता है|

मंदार चौक जाता है…मनोज भी आश्चर्यचकित होता है|

महिपाल मनोज से बोलता है, “याद है दिलीप की बीवी ने क्या कहा था….कि कॉल के समय नेटवर्क प्राब्लम थी और बारिश हो रही थी”

मनोज सहमती में सर हिलाता है|

“लेकिन जयपुर में पिछले 20 दिन से बारिश ही नहीं हुई” महिपाल मनोज को देखते हुए बोलता है

मनोज कुछ सोचता है फिर मुस्कुरा देता है

“और एक बात….,दिव्या दिवाकर के घर के पास भी सिगरेट पीती है…चरस वाली सिगरेट के बड पर लिपस्टिक के निशान मिले थे झाड़ी में…दिवाकर के घर के पास|” महिपाल आगे बोलता है

“हाँ कहानीकार…आगे सुनाइए…” महिपाल ताना मारते हुए मंदार से बोलता है

“वहां से हम और दिव्या दिलीप को पिक करते हैं और एक लॉज दिलाने ले जाते हैं…वहां शराब पिलाते हुए दिलीप को नींद की गोलियों का ओवर डोज़ दे देते हैं|

“ये वही लॉज है ना, जहाँ तुम और दिव्या अक्सर जाया करते थे…” महिपाल उसे रोकते हुए बोलता है…फिर आगे बोलता है, “और वहीँ दिलीप की बीवी का फ़ोन फिर से आ जाता है…लेकिन इस बार फ़ोन गलती से उठाती है….दिव्या! पर मंदार के इशारे पर  फ़ौरन ही फ़ोन काट देती है| वापस फ़ोन आने पर मंदार बात करता है और बोलता है की मौसम ख़राब होने के कारण बात नहीं हो पा रही है…फिर दिव्या DTH का ID लेकर नीचे रिचार्ज कराने जाती है…”

दिव्या चौंक जाती है और  मंदार को देखने लगती है|

“जी मैडम छोटे शहरों में लड़कियां अगर खुले आम सिगरेट पिएं तो उनपर कई निगाहें होती है…ठीक वैसी ही एक निगाह रिचार्ज शॉप पर काम करने वाले लड़के की भी थी…वैसे भी उसने तुम्हे पहले भी देखा था…इसी लॉज में|”

रही बात शक के यकीन में बदलने की तो कहानीकार तुम्हारी कहानी में दिवाकर तुम्हारे साथ सिगरेट पीता है…जबकि उसकी मेडिकल हिस्ट्री में उसे अस्थमा था और सिगरेट पीना सख्त  मना था…उसके घर वालों ने भी यही बताया है…|”

महिपाल दिव्या की तरफ मुड़ता है और बोलता है,  “और रही बात यहाँ तक पहुंचने की तो आप की सिगरेट और आपकी नज़र पर मेरी नज़र तब से थी जब मैं तुम्हारे ऑफिस आया था…वही छोटे शहरों में लड़कियों का सिगरेट पीना….और चोर निगाह से पुलिस वाले को देखना….बस दोनों कड़ियों को जोड़ा…ऑफिस से आपका एड्रेस लिया और आ गए आप लोगों को ले जाने|

“तीन-तीन क़त्ल के जुर्म में,यू बोथ आर अंडर अरेस्ट” महिपाल मंदार का कॉलर पकड़ कर उसे उठाते हुए बोलता है। फिर मनोज से बोलता है, “मनोज! थाने फ़ोन कर के टीम बुला लो और एक महिला कांस्टेबल भी बोल देना|”    

समाप्त।।

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Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Kahani : Lal Dant Manjan (हास्य कहानी: लाल दंत मंजन)

यादों के पुराने पन्नों से…

बात उन दिनों की है, जब मास्क की तरह लाल दंत मंजन भी हर घर का एक अभिन्न हिस्सा हुआ करता था| टूथपेस्ट कोई भी आए, दंत मंजन तो लाल ही आना था वो भी डाबर का| युवावस्था की दहलीज़ पर खड़े कईयों ने कई बार घर में इसके विरुद्ध हरे –सफ़ेद –काले दंत मंजन लाने का प्रयास किया पर एक आध महीने में ही अपनी गलती का अहसास अपने आप ही हो गया| वो स्वाद….वो नशा…वो सुबह –सुबह की किक जो लाल दंत मंजन दिया करता था वो सफ़ेद- हरे पाउडर में कहाँ|

खैर लाल दंत मंजन ऐसे ही घर –घर में आम न था, एक वही तो था तो मंजन के ख़त्म होने पर भी अपने बहुउद्देशीय प्रतिभा के चलते अपनी छाप हर दिमाग में रखता था| चाहे स्कूल प्रोजेक्ट के लिए ढक्कनों से चौपहिया गाड़ी के पहिए बनाने हों, डिब्बे से गुल्लक बनानी हो या कम्युनिकेशन डिवाइस| उम्मीद है काग़ज पर गाने लिख कर खाली कैसेट भरवाने वाली पीढ़ी का हर शख्स लाल दंत मंजन से जुड़ी कोई न कोई याद ज़रूर संजोएँ होंगा|

आज लाल दन्त मंजन से जुड़ी एक दास्तान यादों के पुराने पन्नों से…

बात उन दिनों की है जब हम तरुणावस्था के दरमियानी पड़ाव पर थे, फिल्में देखना पसंद था पर परिवार के अलावा दोस्तों के साथ फिल्में देखना नया- नया शुरू हुआ था| दोस्तों के साथ सिनेमा हाल में बैठ कर समोसे चटकाना, जोर- जोर से ठहाके मारना और सीटी बजाना सब नया था और बेहद रोमांचक भी|

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बड़ो की कहानी/Badon ki Kahani

कहानी-झगड़े की जड़ (Jhagde ki Jad)

“बिल्लू की मम्मी, बाहर आओ…….अरे क्या नालायक बच्चे की माँ है….बाहर आओ….” पिंकू की माँ गुस्से में चीखती हुई बोली।

अगले घर से बिल्लू की माँ गरजी, “क्या हो गया क्यों चीख रही हो….”

पिंकू की माँ भड़कते हुए बोली, “अरे तेरा लौंडा है या जानवर…कोई तहज़ीब सिखाई है या नहीं….”

“ए…. आवाज़ नीची कर….क्या भौक रही है….सास से डांट खा कर आई है क्या?” बिल्लू की माँ पलट कर बोली।

पिंकू की माँ गुस्से में तमतमाई हुई बोली, “ए तू देख अपने को, और अपना घर….जानवर जैसी औलाद पैदा की है….देख कितनी ज़ोर से मारा है मेरे पिंकू को…”

बिल्लू की माँ ने बिल्लू को देखा, पूरी तरह धूल में सना खड़ा था, वो बोली, “बिल्लू…बिल्लू… हाय राम, क्या हो गया तुझे….ये कमीज़ कैसे फट गई….चुड़ैल देख अपनी औलाद को….क्या हाल कर दिया रे मेरे बच्चे का।”

पिंकू की माँ गरजी, “ए…. जबान संभाल…. तू चुड़ैल… तू डायन….अरे संभाल तेरे जानवर को…”

बिल्लू की माँ ने बराबर की टक्कर देते हुए कहा “जबान संभाल कर बात कर….तेरी गज़ भर लंबी जबान काट कर चूल्हे में डाल दूंगी। देख रही हो बहन,…इसी जबान के चलते रोज़ घर पर लात खाती है….न पति सेठता है न सास…..अरे दो बार तो घर से निकाल भगाया था” 

अब तो पिंकू की माँ और भी भड़क गई थी, बोली, “जा जा कमीनी….तू देख अपना घर….पति घर पर पड़ा रहता है और खुद दिन भर बाहर घूमती फिरती है…”

बिल्लू की माँ बोली, “चुड़ैल, इलजाम लगाती है…तू देख अपना घर…अरे सुनते हो जी! देखो तो बिल्लू का मार- मार कर क्या हाल कर दिया है….बाहर आओ।”

पिंकू की माँ भी अपने पति को बुलाते हुए बोली, “अरे जा-जा….बुला तेरे मरद को …देखती हूँ उसे भी….सुनो! बाहर आओ जी! ये चुड़ैल अपनी औकात दिखा रही है।”

बिल्लू के पापा बाहर आते हुए बोले, “अरे क्या हो गया बिल्लू की माँ, क्यों चीख रही हो?”

“देखो जी, बिल्लू की क्या हालत कर दी है, दरिंदे की तरह नोच डाला है, पूरी कमीज का सत्यानाश कर दिया।” बिल्लू की माँ बोली

बिल्लू के पापा, पिंकू की माँ की ओर मुखातिब हुए और बोले, “पिंकू की मम्मी, समझाओ अपने पिंकू को, क्या है यह सब?”

उधर पिंकू के पापा कमीज पहनते हुए बाहर आए और गरजे, ” ए… इधर देख कर बात कर…औरत से क्या बात कर रहा है….साले अपनी औलाद को देख….हमें क्या बोलता है।”

अब बारी बिल्लू के पापा की थी, बोले, ” तमीज़ से बात कर बे….दो मिनट में औकात दिखा दूंगा…”

“@#$%%^, *&^#@@, साले मुझे औकात दिखाएगा, साले मुंह खोला तो तेरा सर खोल दूंगा” पिंकू के पापा बोले।

भड़कते हुए बिल्लू के पापा बोले, ” साले @@$%%^, *&^#@@, साले डरपोक, दम है तो हाथ लगा कर दिखा…तेरी तो..@##$%%।”

“….आ साले, ले आ गया….तेरी तो….@###$$%$, (*/#/@/@…ये ले…” पिंकू के पापा बिल्लू के पापा का कॉलर पकड़ते हुए बोले।


फिर क्या धूम-धड़ाम, ढिशूम-ढिशूम, पटका-पटकी, सर फुड़उवल……


उधर दूर पान की दूकान पर खड़ा संतोष सब तमाशा देख रहा था, बोला, “का भईया चौरसिया, क्या हो गया?”

“अरे का बताई, पहले मनोहर और परकास की मेहरारू लड़ीं, फिर ओके बाद उ दोनों।” चौरसिया पान पर कत्था मलते हुए बोला।

“अबे पर लड़े काहे….जमीन, जायजाद या औरत…झगड़ा कौन बात का है।” संतोष ने उचक कर तमाशा देखते हुए पूछा।

“अरे नहीं…. दोनों के लौंडे लड़ लिए, उसी बात पर टंटा सुरु…पहले गाली- गलौज फिर सर फुड़उवल।” चौरसिया पान पकड़ाते हुए बोला।

संतोष ने पान मुंह में डालते हुए पूछा, “अच्छा…लौंडे कहाँ है?….ठीक तो है?….ज्यादा मार लगी है क्या?” 


चौरसिया मुस्कुराया और बोला, “काहे की मार, वो देखो, दोनों पारक में खेल रहे हैं।”

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Indonesia ka Ma’nene Festival (मा’नेने फेस्टिवल – लाशों की साज़-सज्ज़ा का त्योहार)

मा’नेने फेस्टिवल – लाशों की साज़-सज्ज़ा का त्योहार-इंडोनेशिया की लोक कथा

Toraja Cemetery 1
तोराजा कब्रिस्तान (Toraja Cemetery) 1

तरह-तरह की विचित्रताओं से भरी इस दुनिया में मनाये जानेवाले कई त्योहार भी बड़े विचित्र हैं। ऐसा ही एक त्योहार है इंडोनेशिया के दक्षिण सुलेवासी प्रांत के तोराजा समुदाय द्वारा मनाया जानेवाला मा’नेने फेस्टिवल।

मा’नेने फेस्टिवल का संबंध जीवित नहीं मृत लोगो से है। इस त्योहार को ‘लाशों की सफाई का त्योहार’ के नाम से भी जानते हैं। परंपरा के अनुसार इस त्योहार के दिन, लोग अपने प्रियजनों के शवों को कब्र से बाहर निकाल कर नहलाते-धुलाते हैं। उन्हें अच्छे और नये कपड़े पहनाते हैं, खास कर वैसे कपड़े, जो वे अपने जीवन अवस्था में पहनना चाहते थे। फिर उन्हें सजाते-संवारते हैं और उसके बाद उन्हें पकड़ कर पूरे गांव में टहलाते हैं। अंत में वापस उन्हें उन्हीं नये कपड़ों से साथ कब्र में दफन कर देते हैं।

यह त्योहार हर तीन साल बाद मनाया जाता है। उस दिन पूरे गांव में काफी धूम-धाम और रौनक रहती है। उस दिन मृतक के सारे सगे-संबंधी एक जगह इकट्ठा होते हैं। इसके अतिरिक्त वहां यह भी रिवाज़ है कि कोई भी व्यक्ति अपने जीवनसाथी की मृत्यु के बाद दूसरा विवाह तभी कर सकता है, जब वह अपने मृत जीवनसाथी का कम-से-कम एक बार मा’नेने कर चुका हो।

Toraja Cemetery 2
तोराजा कब्रिस्तान (Toraja Cemetery) 2

इस त्योहार को मनाये जाने के पीछे एक लोककथा प्रसिद्ध है। इसके अनुसार करीब सौ वर्षों पूर्व बारूप्पू नामक एक गांव का एक युवक जंगल में शिकार खेलने गया था। उसका नाम पोंग रूमसेक था, वहां उसे एक पेड़ के नीचे एक लाश क्षत-विक्षत हालत में दिखी। वह पूरी तरह से गल चुकी थी, मात्र हड्डियों का ढांचा ही नज़र आ रहा था।पोंग रूमसेक ने अपने कपड़े उतार कर उस मृत शरीर को पहना दिये। फिर श्रद्धा के साथ उसे कब्र में दफन कर दिया। उस दिन से उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होने लगे। उसे धन, उन्नति, वैभव आदि सब मिला। उसके अनुसार इसका श्रेय उस अनजान शव को दिये गये सम्मान को जाता था इस घटना के बाद से अपने पूर्वजों को सम्मान देने की यह परंपरा शुरू हो गयी. इस त्योहार को मनाने के पीछे की मूल भावना अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करना है।

समुदाय के लोगों को मानना है कि मृत्यु के बाद भी लोगों की आत्मा अपने परिजनों के आस-पास भटकती रहती है। अगर उनकी कोई इच्छा अपूर्ण रह गई हो, तो वे उसके लिए तड़पती रहती है। इसी कारण प्रत्येक तीन साल पर इस त्योहार को मनाया जाता है, समुदाय का मानना है कि ऐसा करने से उनके पूर्वज प्रसन्न होते हैं और उन्हें सुखी-समृद्ध जीवन का आशीर्वाद देते हैं।

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Azadi Ka Parv(आज़ादी का पर्व)

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आज़ादी का पर्व:

आओ चलो एकबार पुनः हम तिरंगा लहराते हैं।
आया है पर्व महान पुनः हम तिरंगा लहराते हैं।।
मत भूलो उन वीरों को जिसने हैं प्रान गवाया।
याद करो उन बलिदानो को जिसने है देश बनाया।
आज़ादी के उन मतवालों पर हम अपना शीश नवाते है,
आओ चलो एकबार पुनः हम तिरंगा लहराते है।
आया है पर्व महान पुनः हम तिरंगा लहराते हैं।।

स्वरचित कविता
स्वप्निल श्रीवास्तव(ईशू)

सभी पाठकों को आज़ादी के इस पर्व की हार्दिक शुभकामना।
जय हिंद।

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Bade Babu ka Pyar (बड़े-बाबू का प्यार)

भाग 1: हैप्पी बर्थ डे वन्स अगेन…..( Ch 1: Happy Birthday Once Again..)

 “बड़े-बाबू…..ओ बड़े-बाबू…..दरवाज़ा खोलिए, कब से घंटी बजा रहे हैं”, मंदार दरवाज़ा पिटते हुए बोला|थोड़ी देर में दरवाज़ा खुला और दिवाकर झांकते हुए बोले, “अरे मंदार, तुम यहाँ, इतनी रात…..?”

मंदार दरवाज़ा धकेल कर अन्दर आते हुए बोला, “अरे हटिए बड़े-बाबू, सारा सवाल दरवाज़े पर ही कीजिएगा क्या….कब से दरवाज़ा पीट रहे हैं| वैसे जनमदिन की फिर से शुभ-कामना, हैप्पी बर्थ डे वन्स अगेन…..”        

दिवाकर ने सिटकनी चढ़ाई और अपना हाथ तौलिये में पोछते हुए बोले, “अरे वो कपड़े धो रहा था तो घंटी की आवाज़ सुनाई नहीं पड़ी….आओ बैठो|”

दिवाकर न्यू इंडिया इन्श्योरेन्स में ब्रांच ऑफिसर थे और स्वभाव से बेहद ही इन्ट्रोवर्ट| ऑफिस में काम से काम और फिर घर| पिछले छह साल से ट्रांसफर हो कर कोटा से जयपुर आए थे पर मजाल है जो एक आदमी भी जानता हो दिवाकर कहाँ से हैं और उनका परिवार क्या है|

बस कुर्सी का लिहाज़ था जो सभी बड़े-बाबू कहते थे, बाकि न चाय न गपशप, खाना भी तब खाते थे जब सब खा कर उठ जाते| शुरू – शुरू में तो लोगों ने कोशिश की पर जब अगले ने ही कोई इंट्रेस्ट न दिखाया तो लोगों ने पूछना भी बंद कर दिया| अब तो बस सुबह गुड-मॉर्निंग और शाम गुड-नाईट का नाता था|

“अरे क्या बड़े-बाबू, आज जनमदिन है आपका और आप कपड़े धो रहे हैं, पार्टी-वार्टी कीजिए, कहीं घूमने जाइए| क्या बड़े-बाबू…..?” मंदार ताना मारते हुए बोला|

मंदार भी दिवाकर के साथ ही इन्श्योरेन्स ऑफिस में था, छह महीने पहले ही जोधपुर से ट्रांसफर हो कर आया था और अब जयपुर में असिस्टेंट ब्रांच ऑफिसर था| रहने वाला रांची का और व्यवहार में दिवाकर का बिलकुल उलट, छह महीने में पूरा ऑफिस मंदार को अन्दर और बाहर से जानने लगा था और मंदार पूरे ऑफिस को| क्या महिला कर्मचारी, क्या कैशिअर और क्या चपरासी हर कोई मंदार का फैन था| कोई भी विषय उठा लो मंदार घंटों बातें कर सकता था| जितना व्यवहारी था उतना ही कार्यकुशल| ऐसा नहीं था की दिवाकर से बात बढ़ाने की कोशिश न की हो पर जब हर सवाल का जवाब हाँ या ना में आए तो बात बढ़े भी तो कैसे? बस पूरे ऑफिस में शर्त लगी थी कि मंदार बड़े-बाबू को शीशी में न उतार पाएगा, और मंदार ने शर्त मंज़ूर कर ली थी, कहता था हारना पसंद नहीं है उसे| इसी सिलसिले में सीधे दिवाकर के घर आ धमका था|

“अब कहाँ घूमने जाएं, अपने लिए तो अपना घर ही सही है, इतना काम रहता है, इसी में समय कट जाता है|” दिवाकर चेहरे पर नकली मुस्कान लाते हुए बोले|

“छह साल हो गए आपको जयपुर में बड़े-बाबू, सब बता रहे थे……अच्छा बताइए तो कितना जान पाए हैं जयपुर को, क्या- क्या घूमें हैं…?” मंदार ताना मारते हुए बोला|

दिवाकर थोड़ा गंभीर हुए और बोले, “ऐसी बात नहीं है, हवामहल और चाँदपोल गए थे जब माँ और बाऊ जी आए थे| और वो क्या….हाँ, जलमहल भी गए थे|”

“अरे क्या बड़े बाबू, हम स्रवनकुमार वाले दर्शन की बात नहीं कर रहे हैं, इतने मॉल हैं, शापिंग कॉम्प्लेक्स हैं, सिनेमा हाल हैं……ये बताइए कितना उमर हो गया आपका|” मंदार बोला

“ऐसी बात नहीं है….वैसे उम्र से क्या मतलब है तुम्हारा…., तुमसे एक या दो साल बड़े होंगे या बराबर|” दिवाकर जोर देते हुए बोले|

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Choti Hasya kahani-Budiya ke Baal (छोटी हास्य कहानी- बुढ़िया के बाल)

अति लघु हास्य कथा..बुढ़िया के बाल

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रामखिलावन का परिवार आज बहुत खुश था। माँ सावित्री देवी, बीवी सुमन और तीन साल की बेटी पुष्पा दशहरा देखने जो आए थे।
आज रावण दहन था…घर पर सभी पकवान तैयार थे । सबने बोला कि पहले मेला घूमेंगे फिर पेट पूजा करेंगे।
चारो सजे- धजे मेले की रौनक में खोए थे। राम खिलावन बिटिया को बता रहा था, “दशहरा मतलब बुराई पर अच्छाई की विजय” तभी पुष्पा की माँ बोली, ” पुष्पा, ‘बुढ़िया के बाल’ खाओगी ?”
पुष्पा उचक कर बोली , “अच्छा, पर बुढ़िया कहाँ है जिसे रोज़ कोसती हो फ़ोन पर कि बुढ़िया दिमाग खा गई….”

बस रामायण ख़तम, महाभारत शुरू।

कहानी समाप्त।।