Categories
Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Kahani: Credit Card ki Barsi/ हास्य कहानी: क्रेडिटकार्ड की बरसी

नमस्ते! आज बात किसी ऐसे की जिसको साथ होने पर हम कोसते रहते है पर जब पास न हो तो याद ज़रूर आती है| इंसान के जीवन में लगभग हर मोड़ पर ऐसा कोई मिलता ही है, चाहे यार हो या रिश्तेदार| अजी वो छोड़िये अपनी ही औलाद जब हाथ से निकल जाए तो क्या हम कोसते नहीं है? पर अपने तो अपने ही होते हैं, जब छोड़ कर चले जाते हैं तो हर छोटी से छोटी बात याद आती है|
आज इमोशनल होने का कारण और तिथी दोनों ही वाज़िब है, आज हमारे ऐसे ही सुख दुःख के साथी की दूसरी बरसी जो है| मैट ब्लैक फिनिश, उस पर चमकदार रंग से उभरता हमारा नाम साथ ही चमचमाता मास्टर कार्ड का लोगो…..जी हाँ हमारा अपना क्रेडिटकार्ड,….ठीक दो साल पहले आज ही के दिन एक्सपायर हुआ था| ना –ना करते हुए भी तेरह- चौदह साल का साथ तो रहा ही होगा| आज जब दीपावली की सफाई का ड्राई-रन चल रहा था तो अचानक पुराना लिफाफा हाथ में आ गया और वो दिन, वो सारी यादें आँख के सामने आ गई…..लगा मानों कल की ही बात हो……
नौकरी करते करीब तीन-चार साल बीत चुके थे और शुरुआती पड़ाव में ही हम बम्बई की चहल-पहल और लखनऊ की तहजीब देख चुके थे| जैसे ही लखनऊ छोड़ जबलपुर पहुंचे लगा कि गृहस्ती के नाम पर जो कुल जमा दो अटैची लिए फिरते थे अब उसको आगे बढ़ाने का समय आ चुका था| हालाँकि बैचलर थे पर लगा कब तक? आज नहीं तो कल गले मैं माला तो चढ़नी ही है…तो सबसे पहले 2BHK का बड़ा सा घर किराए पर ले लिया| पूरे घर में एक गद्दा, दो अटैची और हम….गलती से भी छींक निकल जाए तो ऐसा लगता था मानो किसी हिल स्टेशन के ईको पॉइंट पर खड़े हो….अपनी ही छींक घूम फिर कर तीन चार बार गूंजती थी| बड़े कॉर्पोरेट की नौकरी थी तो ऑफिस के सहकर्मियों के घर आने से पहले, घर रहने लायक दिखे ऐसा बनाना था….ऐसा नहीं था कि इसके पहले की नौकरियां बुरी थी जो गृहस्ती न जुटा पाए, पर लड़कपन की खुमारी उतरते- उतरते हम बंबई से लखनऊ और लखनऊ से जबलपुर पहुँच चुके थे|
वो उदाहरण तो आप ने सुना ही होगा न कि ‘दो पेपर कप लीजिये और उसके तले में सुराख़ कर दीजिए…एक में एक दो महीन सुराख़ और दुसरे कप में बहुत बड़ा छेद…फिर दोनों कप में पानी डालिए, बारीक सुराग वाले कप में पानी ठहरेगा और धीरे धीरे कर गिरेगा’, यह हुआ उधाहरण उनका जिनकी कमाई और खर्चे में बड़ा अंतर होता है….ठहरने वाला पानी यानी सेविंग| अब अगला उदाहरण हमारे जैसों के लिए….वही बड़े छेद वाला पेपर कप….जितना कमाया सब बाहर बिना किसी देरी के….काहे की सेविंग| माता-पिता तो कह-कह कर थक गए पर हमें तो यही लगता था कि जो आता है वो जाता ही है….एविंग-सेविंग सब मोह माया है|
खैर देर से ही सही सद्बुद्धि आई, लगा कि धीरे-धीरे ही सही पर अब गृहस्ती का सामान जोड़ा जाय| दोस्तों और सहकर्मियों से बात की तो सभी ने अपनी बुद्धि, विवेक और अनुभव के आधार पर अपनी –अपनी राय रख दी….शादी शुदा की राय अलग थी और कुवारों की अलग| न जाने क्यों ऐसी ही किसी राय में क्रेडिटकार्ड का जिक्र चल निकला…नाम तो याद नहीं पर ज़रूर कोई कुंवारा ही होगा, वरना शादी शुदा ऐसी राय दे, कम ही सुना है| हमने खुद शादी के बारह साल में कभी ऐसी सलाह न दी होगी|
तो ज़नाब क्रेडिटकार्ड में दिलचस्पी बढ़ी और थोड़ी रिसर्च के बाद एक नामी बैंक का क्रेडिटकार्ड अप्लाई कर दिया गया..घबराहट तो हो रही थी पर उस ज़माने में क्रेडिटकार्ड अपने आप में स्टेटस सिंबल हुआ करता था, तो एक अलग तरह का एक्साईटमेंट भी था|
सीना तो तब चौड़ा हुआ जब पूरे ऑफिस के सामने ब्लू-डार्ट के कुरियर बॉय ने हमारा नाम पुकारा और एक कड़क शानदार पैकेट हाथ में थमा गया| पूरी जिंदगी खाकी रंग के डाकिये को देखने वाले और बेहद ही इमरजेंसी में मधुर या मारुती कूरियर की सेवा लेने वाले को ब्लू-डार्ट का पैकेट आना वो भी ऑफिस के दसियों लोगों के बीच…..समान की और सामान को रिसीव करने वाले की पर्सीव्ड वैल्यू तो ऐसे ही बढ़ जानी थी|
खैर सारे एक्साईटमेंट और उस ब्लू-डार्ट के पैकेट को हमने डाला दराज़ में और लग गए अपनी दिनचर्या निपटाने| शाम बिना भूले पैकेट अपने बैग में डाला और पहुच गए अपने ईको पॉइंट अर्थात 2BHK फ्लैट पर| एक्साईटमेंट इतना था की खाना पैक कराना ही भूल गए थे, वैसे भी भूख किसे थी| बस फटाफट पैकेट निकला और बिना पलक झपके क्रेडिटकार्ड की अनबॉक्सिंग कर डाली| बीसियों कागज के बीच एक काले रंग का कार्ड….मैट फिनिश और उसपर चमकदार रंग से उभरा हमारा नाम….वाह! लगा मानों देखते ही रहें| कुछ कागजों को उलटने पलटने पर ज्ञात हुआ की निन्यानबे हज़ार की लिमिट थी ….मतलब निन्यानबे हज़ार की खरीददारी….मतलब बहुत सारी| फिर क्या, बाकी कागजों को पलटने की ज़हमत ही नहीं उठाई…वैसे भी इतने बारीक अक्षरों में लिखे थे कि आँख न भी ख़राब हो तो आदमी शक़ में आई-टेस्ट करवा ले|
वो पहला दिन था जब हम, हमारा क्रेडिटकार्ड और हमारा लेदर का पर्स एक दुसरे के पूरक हुए थे, उसके बाद तो दीवान..घड़ी…जूते…टीवी….म्यूजिक सिस्टम…किचन का सामान…….बस एक बार दुकानदार कह भर दे की ‘जी हाँ क्रेडिटकार्ड एक्सेप्ट करते हैं!’, मजाल है जो हम दुकान से खाली हाथ उतर जाएं| पैंतालिस दिन का रोटेशन सर्किल वाकई मज़े दे रहा था…..शापिंग का सिलसिला यूँ की चलता रहा जब तक कि हमारे 2BHK फ्लैट में प्रतिध्वनि होना बंद न हो गया….| अब क्रेडिट पर लिया था तो चुकाना भी था, शुरू-शुरू में तो 2-3 हज़ार का सामन आता था पर चार-पांच महीने बीतते पेमेंट का सिलसिला किश्तों में तब्दील हो गया| हर महीन सात-आठ हज़ार चुकाना ही था| खैर अकेले थे तो संभव था, बस पेपर कप के नीचे जो बड़ा छेद था उस पर टेप मार कर छेद छोटा करना था, और इकठ्ठा होने वाले पानी से क्रेडिटकार्ड की किश्त चुकानी थी| मजबुरी थी तो किया और चुकाते –चुकाते साल बीत गया| अब हम जबलपुर को टाटा –बॉय बोल कर राजस्थान आ चुके थे| नयी नौकरी, नयी जगह, नए लोग…पहले तो लगता था की सभी बड़ी-बड़ी मूछों वाले और पगड़ी पहनने वाले होंगे पर हकीकत अलग थी..जब जयपुर में उतरे तो पता चला विज्ञापन में दिखने वाला राजस्थान और हमारी कर्मभूमि बनने जा रहा राजस्थान दोनों अलग थे|
बैचलर अभी भी थे पर 2BHK का चस्का लग चुका था, वैसे भी मकान ईको पॉइंट न बने जितना सामान तो अब इकठ्ठा हो चुका था तो ब्रोकर की मदद से एक 2BHK जयपुर शहर में भी ले लिया| शुरुवाती कुछ दिन तो क्रेडिटकार्ड की सेवा को विराम दिया पर जुआ, शराब और क्रेडिटकार्ड की लत एक बार लग जाए तो छुटाए नहीं छूटती….वही हुआ जिसका डर था क्रेडिटकार्ड की घिसाई वापस शुरू|
दिन बीते और देखते ही देखते वो दिन भी आ गया जिसका इंतज़ार हर कुंवारा करता है…जी हाँ हमारी शादी तय हो गई थी, अब शादी तय हुई थी तो शादी से जुड़े खर्चे भी होंगे….मोटे तौर पर दिखने वाले और बड़े खर्चों की जिम्मेदारी माता-पीता ने उठा ली थी पर हमारा भी कुछ फ़र्ज़ बनता था आखिरकार अपने ही घर की शादी थी..वो भी अपनी…, ताल ठोक कर कह दिया की अपने कपड़े और हनीमून का खर्चा हम खुद उठाएँगे| घरवालों को भी लगा कि बेटे को जिम्मेदारी का अहसास है तो सभी ने हामी भर दी|
हाँ तो कर दिया था पर लाते कैसे पेपर कप का छेद अब भी काफी बड़ा था, तो बस….. ‘हारे का सहारा….क्रेडिट कार्ड हमारा’…,लिस्ट बनाई और चल पड़े शॉपिंग करने, सूट-शेरवानी…घड़ी…जूते…बेल्ट सब खरीद डाला, करना क्या था बस काले कार्ड को घिसना था और पिन डालना था …इतना ही नहीं हनीमून का होटल….फ्लाइट का टिकट सब बुक हो गया….भला हो क्रेडिट कार्ड का|
लोग भले ही दिन रात कोसे पर उम्मीदों की उड़ान के लिए जिन पंखों की ज़रुरत होती है वो पंख क्रेडिटकार्ड की लगता है ….भले ही कुछ दिन बाद हवा में ही उखाड़ भी दे और आप औंधे मुह ज़मीन पर आ गिरें| वही हुआ क्रेडिटकार्ड की किश्त अब तनख्वाह का मोटा हिस्सा खाने लगी थी पर वाह रे नशा, मजाल है जो एक भी दुकान पर दाम सुन कर शिकन आई हो|
खैर शादी अभी तय हुई थी…हुई नहीं थी, हम अब भी अकेले थे और किस फ़िज़ूल खर्ची पर मेढ़ बाँध कर रोकना है और उस पैसे की नहर से कैसे क्रेडिट कार्ड की सिचाई करनी है हम मैनेज कर ले रहे थे….वैसे भी हम उस विचारधारा के समर्थक थे जिसमें नहाते समय बनियान को पैरों के नीचे रख देते है ताकी शरीर पर लगने वाला साबुन शरीर से होता हुआ बनियान पर गिरे और कपड़े धोने के साबुन के खर्चों में कटौती हो….साथ खुशबू वो बोनस|
पर आप की विचारधारा तब तक ही कारगर है जब तक आप कुंवारें है…एक बार आपने दाम्पत्य जीवन में प्रवेश किया तो सारी विचारधारा की पुड़िया बना कर आप ही की शेरवानी की जेब में डाल दिया जाता है…और आप की पत्नी की विचारधारा ही आप की विचारधारा बन जाती है| सुनने में अजीब लगेगा पर शादी-शुदा लोग हमारी बात से सहमत होंगे ऐसा हमें द्रढ़ विश्वास है| हमारे साथ भी कुछ वैसा ही हुआ…हमारी विचारधारा बदलने लगी…शॉपिंग का एक्सपीरियंस ही बदल गया….एक समय था जब दूर से ऊँगली दिखा कर ही बोल दिया करते थे कि फलां घड़ी या फलां जूता पैक कर दो, पर एक उस हादसे के बाद से तो हमे कल्चरल शॉक लग गया था…कभी सोचा नहीं था की शॉपिंग का ये प्रारूप भी होता होगा….
हुआ यूँ की शादी के कुछ दिन बाद हमारी श्रीमती जी हमारे साथ जयपुर आ गईं, दांपत्य जीवन सुखमय बीतने लगा…हमारी पहली सालगिरह आने वाली थी तो हमने श्रीमति जी को सोने की चेन दिलाने का वादा कर डाला| दोनों खुश थे, वो इस बात से कि पति को साल गिरह याद थी और हम इस बात से कि श्रीमति जी खुश थीं| सालगिरह का दिन आया, प्लान यह बना की पहले शॉपिंग करेंगे फिर शाम किसी शानदार रेस्टोरेंट में डिनर करेंगे..कॉकटेल के साथ| ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों एक बड़ी ज्वेलरी शॉप में पहुचे और सेल्समेन को अपनी आमद का कारण कह सुनाया| हमें क्या पता था कि सोने की चमक में खोना क्या होता था…एक मिडिल क्लास आदमी की नज़र में सोने की चेन, मतलब …वो पतली वाली…एक या सवा तोले की, पर इनसेंटिव पाने वाले ‘स्टार ऑफ़ द मंथ’ सेल्समैन क्या होते है वो तो हमने उस दिन ही महसूस किया| दिखाते ही दिखाते उसने एक तोले से होते हुए चेन का वज़न और हमारी श्रीमति जी का मानस कब साढ़े तीन तोले तक पंहुचा दिया पता ही न चला| आखिरकार एक चेन को देख हमारी श्रीमति जी की आँखों में चमक आ ही गई, उन्होंने हलके से मुस्कुरा कर हमें देखा और बोलीं, ‘ये वाली कैसी है’| हम क्या बोलते, उड़ता तीर भी तो हमने ही लिया था सो बोल दिया, ‘अच्छी है’| इधर चेन से श्रीमतीजी की आँखें चमक रही थी और उधर वजन का कांटा देख हमारे सर पर सितारे चमक रहे थे| दर्द छुपाते हुए सेल्समेन से बोले, ‘हाँ भाई कितने की है…?’ सेल्समेन की वो कुटिल मुस्कान हम आज तक न भूल पाए| वो तो भला को क्रेडिटकार्ड का जो उस समय हमारा सम्मान बच गया, यह बात अलग है की क्रेडिटकार्ड की किश्ते भरते-भरते हमारा आत्मसम्मान ही हमें धिक्कारने लगा था|
खैर समझदार वही होता है जो अपनी गलतियों से सीखता है, उस हादसे के बाद तो हमने तौबा कर लिया कि आगे से चलकर कभी कोई वादा नहीं करेंगे…सरप्राइज गिफ्ट दे दो वो बात अलग है|
धीरे-धीरे समय बदला तो शॉपिंग का नजरिया भी बदला, अब हमारा एक प्रमुख काम कोचवान की तरह गाड़ी इस दुकान से उस दुकान ले जाना भी था| श्रीमति जी का क्या था एक –एक घंटे दुकान पर पचासों कपड़े निकलवाने के बाद कहा ‘पसंद नहीं आया, कही और चलते हैं’, अच्छा ऐसा भी नहीं था की खुद बोल दें, दुकानदार को नए- नए बहाने सुनाकर वहां से बाहर निकालने की जिम्मेदारी भी हमारी थी| समय के साथ समझ आ ही गया कि लेडीज कपड़ों के व्यापारी सिद्ध बाबाओं से कम नही होते…चेहरा पढ़ लेते हैं| शुरू-शुरू में तो लगता था कि आज पिटे या कल पर कसम से पिछले बारह साल में ऐसा मौका आया ही नहीं…इस धैर्य के लिए हम पूरे लेडीज शॉपिंग से जुड़े व्यापारी वर्ग के कृतज्ञ हैं|
लेडीज शॉपिंग के चलते दुकानदारों की महिमा के साथ साथ एक और बात का दिव्यज्ञान हुआ कि शॉपिंग में हमारी राय कोई खास मायने नहीं रखती हम तो बस सपोर्ट के लिए ले जाये जाते हैं….ताकी कल को कोई ऊँच-नीच हो तो बोल सकें ‘आप भी तो थे!’
खैर बात वापस क्रेडिटकार्ड पर…अब जिम्मेदारी और बढ़ गई थी, एक तो क्रेडिटकार्ड की बढती किश्त ऊपर से लेडीज शॉपिंग के लिए घंटों दुकान पर इंतज़ार करना| इतना ही नहीं, हर वो सामान जो हमने नग के हिसाब से खरीद रखा था अब वो सेट में था और वो भी स्टील, मेलामाइन और बोन-चाइना की वैरायटी में| ढाई लोगों की गृहस्ती में तीन अलग-अलग साइज़ के कूकर और दो अलग-अलग साइज़ की कढ़ाई क्यों चाहिए भला, ये बात न हम शॉपिंग करते समय समझ पाए थे न आज|
क्रेडिटकार्ड की बदौलत देखते ही देखते ढाई लोगों के परिवार में कब 2BHK छोटा पड़ने लगा पता ही न चला और क्रेडिटकार्ड की किश्तों का सिलसिला जबलपुर से होता हुआ, जयपुर, दिल्ली और हैदराबाद पहुच गया| जब भी किसी माल या दुकान के पास से गुज़रते मन की इच्छा उम्मीद की उड़ान भरना चाहती, क्रेडिटकार्ड पर्स से निकलता और उड़ान को पंख लगा जाता…और जाते जाते किश्तों की बेड़ियाँ पैर में डाल जाता|
खैर हर किसी की जिंदगी में वो दिन आता ही है जब उनका कोई ख़ास, कोई अपना उन्हें छोड़ कर चला जाता है..हमारे साथ भी यही होने वाला था..पता तो था पर इस बार हम अपना दिल मज़बूत कर चुके थे|
आखिरकार दो साल पहले आज ही के दिन हमारा क्रेडिटकार्ड एक्सपायर हो गया| आज इस बात को बीते दो साल हो चुके है पर हमने हिम्मत दिखाई और क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख ही लिया|
अगर आप भी क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख चुकें है तो आप बधाई के पात्र हैं और उम्मीद है सुखी होंगे और यदि किसी करणवश आप यह मोह अभी तक नहीं छोड़ पाए है तो हिम्मत जुटाइये और धीरे- धीरे ही सही पर इसको अपनी जीवनशैली से अलग करना शुरू कीजिये….विश्वास दिलाता हूँ इसके बिना जीवन कहीं ज्यादा सुखमय महसूस कीजियेगा|

Categories
Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Lekh: Diwali Ki Jhalar/ हास्य लेख : दिवाली की झालर

नमस्ते! उम्मीद है आप सब अच्छे होंगे, अजी उम्मीद क्या पूरा विश्वास है| वैसे कई दिनों से लिखने की सोच रहा था पर लिख नहीं पा रहा था….वो क्या कहते है…करंट नहीं पहुँच रहा था| अब दिन में तो हजारों काम होते है…और लिखने के लिए चाहिए शांति और सुकून, तो हमारे जैसों के लिए तो रात ही अनुकूल है| कल रात की भी यही सोच थी कि खा–पी कर रात को लिखने की महफ़िल जमाएंगे….बस हम, हमारी डायरी और हमारा पेन| अब बस एक छोटा सा बहाना चाहिए था जिससे श्रीमति जी को अल्पावधि के लिए नाराज़ कर सकें ताकी महफ़िल में कोई बाधा न आए| काम लगता आसान है पर नाराज़गी की श्रेणी में सूत के धागे जितना ही फ़र्क होता है, बात ज़रा इधर से उधर हुई नहीं कि लेने के देने पड़ सकते हैं| खैर साल बीतते –बीतते शादी के ये हुनर अपने आप ही विकसित हो जाते है|

फिर क्या, खाना खाने और रसोई का ताम झाम निपटाने के बाद जैसे ही श्रीमति जी बेडरूम में आईं और डबल बेड पर बैठते ही हाथ पैर पर लगाने के लिए बॉडी लोशन उठाया, हमने छेड़ दिया, “ये सूट छोटा हो गया है क्या…थोड़ी मोटी लग रही हो”, बस फिर क्या उनके जवाब मिलते गए और योजनानुसार हम उन जवाबों में मिर्च मसाला लपेट कर उन्हे वापस सवालों में तब्दील कर श्रीमति जी की तरफ दागते गए….तीन-चार सवालों के बाद तो हम, हमारा तकिया और चादर तीनों कमरे के बाहर थे|

Categories
Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Kahani: Karan -Arjun aur Hum/ हास्य कहानी : करन – अर्जुन और हम

यू-ट्यूब पर श्रीमती जी करन-अर्जुन देखने बैठीं तो हमारी करीब पच्चीस साल पुरानी प्रतीज्ञा आज टूट ही गई…जिस बेबाकी से आज कल के बच्चे माँ बाप से बोल देते है कि पापा इस गर्मी की छुट्टी में डिजनी लैंड चलेंगे, उन दिनों शायद इतनी बेबेकी हम किराये पर वीसीआर और फिल्म के कैसेट लाने में ही दिखा पाते थे|

बात सन पिन्चान्बे-छियानबे की होगी…गर्मियों का दिन था और हमारे मोहल्ले के एक परिवार के जेष्ठ पुत्र का विवाह एक दिन पहले ही संपन्न हुआ था| घर में नए सदस्य का आगमन हुआ था तो सभी नात- रिश्तेदार उत्साहित थे….

घर मेहमानों से भरा हुआ था और हम उनके घर में पूरे हक से मेज़बान की भूमिका में थे| सलाद कटवाने, दौड़ –दौड़ कर पूरियां लाने…और बड़ों को खाना खिलवाने के बाद जब बच्चों के खाने की बारी आई तो हम भी पंगत में शामिल थे और जम के गरमा गरम पूरी दबा रहे थे| तभी उड़ती –उड़ती खबर सुनाई पड़ी कि रात में फिल्म का प्रोग्राम है…वीसीआर किराए पर आने वाला है| एक तो इतने सारे लोगों का जमावड़ा ऊपर से वीसीआर पर पिक्चर का कार्यक्रम…उत्साहित होना स्वाभाविक था| हमने फटा-फट खाना ख़त्म किया और हाथ धो कर पहुँच गए उस झुंड के पास जहाँ शाम के कार्यक्रम की तैयारियों की समीक्षा चल रही थी….छत पर कितने गद्दे-तकिये लगने हैं, बड़े कहाँ बैठेंगे….बच्चे कहाँ पसरेंगे| रात में फिल्म देखना हो वो भी खुले आसमान के नीचे, उसका मज़ा ही कुछ और होता था|                  

खैर जब बैठने की व्यवस्था का मंथन समाप्त हुआ तो बात दूसरे ज़रूरी मुद्दे पर आई कि कैसेट कौन से आने है…हर किसी ने अपने विवेक और सूझबूझ से अपनी राय रखी और बहुमत से चित्रहार, कुली नंबर- 1 और करन-अर्जुन का चुनाव हुआ| चित्रहार में हमें कोई ख़ास रूचि न थी…कुली नंबर-1 हमने पहले ही निपटा दी थी, अब बची थी करन-अर्जुन… फिल्म जबरदस्त थी, हर कोई जिसने देख रखी थी तारीफ करते न थकता था…शाहरुख़-सलमान की जुगलबंदी…. “जाती हूँ मैं”….जैसा शानदार गाना और जबरदस्त फाइट….दिल पहले से ही इस पिक्चर पर फ़िदा था पर जब पता चला कि इतने शानदार माहौल में एक और मनपसंद पिक्चर देखने का मौका है तो रहा न गया..अन्दर से ख़ुशी इतनी हो रही थी कि बर्दाश्त  के बाहर थी….जल्द किसी अपने को बताना था|   

हमारे हम उमर मौसेरे भाई करीब ही रहा करते थे, फिर क्या, पहुँच गए मौसी के घर, भाई को इशारा किया और दोनों भाई छत पर| साथ में हमने कई फिल्में निपटाई थी तो समझाना और सहमति हासिल करना कठिन न था…बस घर पर यह बोलना था की आज एक भाई दूसरे भाई के घर पढ़ाई करेगा और रात वहीँ सोएगा|

किला फतह कर हम अपने घर चले आए और रात का इंतज़ार करने लगे, देर शाम कॉपी-किताब ले कर हमारे भाई भी आ गए और दोनों भाई मन लगा कर पढ़ने भी लगे…घर में कुछ ऐसा दिखाना था की लड़के पढ़ाई को ले कर संकल्पित है| शाम रात में बदल गई, सारे होमवर्क, सारे असाइनमेंट बिना किसी नाज़ नखरे ख़तम कर लिए गए, बीच –बीच में अपनी कर्मठता का प्रदर्शन करते दोनों भाई हमारे पिता जी से ना समझ में आने वाले सवालों पर मंत्रणा भी कर आते कि लगे लड़के पढ़ाई को लेकर वाकई गंभीर हैं| इधर दोनों भाई पढ़ाई निपटाने में लगे थे, उधर पिता जी छत पर पानी डाल रहे थे| उन दिनों गरमी में छत तर कर उस पर चटाई और चद्दर डाल कर सोना आम चलन में था |

हमारे घर की छत सूख चुकी थी और खाने की थालियाँ लग चुकी थी| हम दोनों की नज़रों में संतोषजनक पढ़ाई हो चुकी थी, लगा कि बस खाना खाते- खाते पिता जी से बोल देंगे और वीसीआर पर करन-अर्जुन की अनुमति हासिल कर लेंगे|

खाना शुरू हुआ और पिता जी ने पढ़ाई से जुड़ा मुद्दा छेड़ दिया…हमें अपनी बात रखने का मौका ही न मिला| धड़कन बढ़ गई थी|

हर ख़त्म होती चपाती के साथ ही हमारे भाई टेबल के नीचे से हमें ठोकर मार बोलने का इशारा करते पर हम सही मौके की ताक में थे| ऐसा न हो गलत समय पर प्रस्ताव रख दें और मनाही हो जाए| इस चक्कर में एक चपाती ज्यादा खा ली पर सही समय का इंतज़ार ख़त्म ही न हुआ| हरकत ऐसी थी कि भाई से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे सो थाली रखी, हाथ मुंह धोया और चुप-चाप कमरे में आ गए| अभी सोच ही रहे थे कि भाई ने कमरे में आते ही ताना मारना शुरू कर दिया, अभी हम समझा ही रहे थे कि अभी देर नहीं हुई है, तभी पीछे से पिता जी की आवाज़ आई कि चलो छत पर बिस्तर लग गए हैं… इशारा समय पर सोने का था, अगले दिन स्कूल जो जाना था|

अब धड़कन राजधानी एक्सप्रेस सी हो चुकी थी, बस एक ही डर था कहीं मनाही न हो जाए…करन –अर्जुन का सारा जोश, सारा प्लान धरा का धरा रह जाता, ऊपर से पूरी जिंदगी भाई से ताने सुनने मिलता वो अलग|

माता जी तो कूलर में सोने चली गई और हम, हमारे भाई और पिताजी छत पर खुले आसमान के नीचे लेट गए| आसमान साफ़ था, सप्त-ऋषि तारामंडल और ध्रुव तारा साफ़ नज़र आ रहे थे, धीमी- धीमी चलने वाली हवा अब ठंडी होने लगी थी और नींद के लिए माहौल बिलकुल अनुकूल था, लेकिन नींद न हमारी आँखों में थी और न हमारे भाई की, बस दोनों भाई आसमान को देखते मना रहे थे कि काश कोई पुच्छल तारा दिख जाए और हमारी दुआ कबूल हो जाए| अभी सोच ही रहे थे कि भाई ने हमें कोहनी मारते हुए हमारा फ़र्ज़ याद दिलाया| हमने हिम्मत जुटाई, गला साफ़ किया और बोले, “पिता जी, भईया के घर वीसीआर लगा है और नई पिक्चर का कैसेट भी है…हम देखने जा सकते हैं क्या?”

पिता जी इन सब बातों से अनभिज्ञ थे और हल्की नींद में आ चुके थे सो बोले, “ठीक है, कल स्कूल से आ कर चले जाना पर पहले होमवर्क!” उन्हें लगा दिन की बात है, बच्चे पढ़ाई कर दो –तीन घंटे फिल्म देख भी लेंगे तो क्या हर्ज़ है, पर यहाँ तो कार्यक्रम ही रात का था वो भी आज रात का| अभी सोच ही रहे थे कि भाई ने उर्जा का संचार करने के लिए एक बार फिर कोहनी टिका दी….इस बार उनकी कोहनी के वार में फ्रश्टेशन और गुस्सा साफ़ झलक रहा था|

हमने उनको हाथ रोकने का इशारा किया और वापस पिता जी के मुखातिब हुए और बोले, “पिता जी….वो वीसीआर आज रात के लिए आया है…सब लोग इकठ्ठा हैं तो आज रात ही फिल्म देखनी है|”

पिता जी दिन भर के थके थे और सुबह जल्द दफ्तर भी जाना था सो नींद के आगोश में थे, बोले, “रात में नहीं!….सुबह स्कूल है!….”

बस वही हुआ जिसका डर था, सारी प्लानिंग, सारे जुगाड़ धरे के धरे रह गए थे….जिस चक्कर में गणित के एक आध असाइनमेंट ज्यादा कर डाले उसका नतीजा सिफर निकला, करते क्या मन मसोस कर रह गए| दिल और कान दोनों चार घर छोड़ बने मकान की छत पर लगे थे, वहां अब हलचल बढ़ गई थी, फिल्म शुरू होने ही वाली थी| आखें तारे देख रहीं थी पर पुतलियों पर आई नमी से तारे अब धुंधले दिख रहे थे|

करीब साढ़े दस हुए होंगे कि अचानक कुछ धुन कानो में पड़ी…हमें लगा चलो अभी समय है शायद पहले चित्रहार लगा हो..अभी मना ही रहे थे कि वापस एक भारी भरकम आवाज़ कानों में पड़ी, “…ये कहानी विश्वास पर आधारित है…विश्वास जो अनहोनी को होनी कर सकता है”…अभी कुछ समझ पाते कि कौन सी फिल्म है कि तभी एक और आवाज़ आई, “करन सिंह-अर्जुन सिंह मेरा हफ्ता…” अब बस दिल बैठ गया…जो नहीं होना था वही हुआ….बिना हमारी मौजूदगी के करन-अर्जुन शुरू हो चुकी थी| भाई भी गुस्से से भरा हुआ था पर ठोकर और कोहनी मारने के अलावा करता भी क्या|

फिर आया पहला गाना…..“सूरज कब दूर गगन से…..”अभी मुखड़ा पूरा भी नहीं हुआ था कि एक दुलत्ती जोर से हमारी टांगों से टकराई…हम समझ गए कि सिर्फ हम ही नहीं थे जो फिल्म के लिए कलप रहे थे| आसमान साफ था और रात का समय था तो हर डायलाग कान पर साफ़- साफ़ गिर रहा था| अभी 15-20 मिनट बीते होंगे कि अमरीशपुरी की रौबीली आवाज़ कानों में सुनाई पड़ी, रोंगटे खड़े हो गए, हमसे न रहा गया, लगा एक बार और कोशिश कर के देखते हैं…..एक दो बार धीमी आवाज़ में पिता जी को पुकारा भी पर पिता जी अब तक गहरी नींद के आगोश में जा चुके थे, उनकी तरफ से कोई रिस्पांस न मिला| अमरीशपुरी जी की आवाज़ में दमदार डायलाग, घोड़ों की टाप, चीखने चिल्लाने की आवाज़ मानो जैसे आसमान में गूँज रही थी कि तभी मंदिर की घंटियों के बीच किसी औरत के रोने की आवाज़ आई, और जैसे ही वह बोली, “मेरे करन- अर्जुन नहीं मर सकते…तुझे मेरे करन- अर्जुन लौटाने होंगे माँ….” सस्पेंस हम दोनों भाइयों की नस –नस में भर चुका था, अब हमसे रहा न गया, घंटियों की आवाज़ जैसे तेज़ हुई तो हमने भी भगवान का नाम ले कर एक ट्राई और मारने का फैसला किया| पिता जी को हल्के हाथ से हिलाया और जब उन्होंने आश्रय पूछा तो हमने अपनी इच्छा फिर से जाहिर कर दी….|

होना क्या था दिन भर के थके आदमी को शाहरुख-सलमान के लिए कच्ची नींद में जगाओगे तो डांट ही मिलेगी, और हुआ भी वही| इस बार पिता जी का लहज़ा सख्त था, इसके बाद हमारी पूछने की और हमारे भाई की कोहनी मारने की हिम्मत न हुई| दोनो भाई पथराई आँखों से आसमान को देखते रहे…| एक के बाद एक दमदार डायलाग, “जाती हूँ मै” जैसे गाने… पूरी फिल्म हम दोनों भाइयों ने नम आँखों से तारों को देखते हुए सुन डाली|

भाई का तो पता नहीं पर हमने कसम ज़रूर खा ली थी कि आज के बाद करन- अर्जुन या आने वाली किसी भी फिल्म जिसमे शाहरुख-सलमान एक साथ हों कभी नहीं देखेंगे| अब तक ऊपर वाला भी शायद हमें हमारी कसम पूरी कराने में शिद्दत से लगा था, तभी शायद इतने सालों में दोनों की कोई पिक्चर एक साथ न आई|

वो तो श्रीमती जी शाहरुख की सारी फिल्में निपटा चुकी थीं और यू-ट्यूब पर करन- अर्जुन ओरिजिनल  प्रिंट में उपलब्ध थी तो उन्होंने आज हमें उनके संग बैठ कर यह पिक्चर देखने पर मजबूर कर दिया और हमारी कसम तुड़वा ही दी| अब सोचते है एक कसम टूट गई है तो दूसरी भी टूट ही जाए, इसी बहाने दोनों को वापस एक बार सुनहरे परदे पर देखने का मौका तो मिलेगा|

Categories
Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Kahani : Lal Dant Manjan (हास्य कहानी: लाल दंत मंजन)

यादों के पुराने पन्नों से…

बात उन दिनों की है, जब मास्क की तरह लाल दंत मंजन भी हर घर का एक अभिन्न हिस्सा हुआ करता था| टूथपेस्ट कोई भी आए, दंत मंजन तो लाल ही आना था वो भी डाबर का| युवावस्था की दहलीज़ पर खड़े कईयों ने कई बार घर में इसके विरुद्ध हरे –सफ़ेद –काले दंत मंजन लाने का प्रयास किया पर एक आध महीने में ही अपनी गलती का अहसास अपने आप ही हो गया| वो स्वाद….वो नशा…वो सुबह –सुबह की किक जो लाल दंत मंजन दिया करता था वो सफ़ेद- हरे पाउडर में कहाँ|

खैर लाल दंत मंजन ऐसे ही घर –घर में आम न था, एक वही तो था तो मंजन के ख़त्म होने पर भी अपने बहुउद्देशीय प्रतिभा के चलते अपनी छाप हर दिमाग में रखता था| चाहे स्कूल प्रोजेक्ट के लिए ढक्कनों से चौपहिया गाड़ी के पहिए बनाने हों, डिब्बे से गुल्लक बनानी हो या कम्युनिकेशन डिवाइस| उम्मीद है काग़ज पर गाने लिख कर खाली कैसेट भरवाने वाली पीढ़ी का हर शख्स लाल दंत मंजन से जुड़ी कोई न कोई याद ज़रूर संजोएँ होंगा|

आज लाल दन्त मंजन से जुड़ी एक दास्तान यादों के पुराने पन्नों से…

बात उन दिनों की है जब हम तरुणावस्था के दरमियानी पड़ाव पर थे, फिल्में देखना पसंद था पर परिवार के अलावा दोस्तों के साथ फिल्में देखना नया- नया शुरू हुआ था| दोस्तों के साथ सिनेमा हाल में बैठ कर समोसे चटकाना, जोर- जोर से ठहाके मारना और सीटी बजाना सब नया था और बेहद रोमांचक भी|

Categories
Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

बड़ो की कहानी/Badon ki Kahani

कहानी-झगड़े की जड़ (Jhagde ki Jad)

“बिल्लू की मम्मी, बाहर आओ…….अरे क्या नालायक बच्चे की माँ है….बाहर आओ….” पिंकू की माँ गुस्से में चीखती हुई बोली।

अगले घर से बिल्लू की माँ गरजी, “क्या हो गया क्यों चीख रही हो….”

पिंकू की माँ भड़कते हुए बोली, “अरे तेरा लौंडा है या जानवर…कोई तहज़ीब सिखाई है या नहीं….”

“ए…. आवाज़ नीची कर….क्या भौक रही है….सास से डांट खा कर आई है क्या?” बिल्लू की माँ पलट कर बोली।

पिंकू की माँ गुस्से में तमतमाई हुई बोली, “ए तू देख अपने को, और अपना घर….जानवर जैसी औलाद पैदा की है….देख कितनी ज़ोर से मारा है मेरे पिंकू को…”

बिल्लू की माँ ने बिल्लू को देखा, पूरी तरह धूल में सना खड़ा था, वो बोली, “बिल्लू…बिल्लू… हाय राम, क्या हो गया तुझे….ये कमीज़ कैसे फट गई….चुड़ैल देख अपनी औलाद को….क्या हाल कर दिया रे मेरे बच्चे का।”

पिंकू की माँ गरजी, “ए…. जबान संभाल…. तू चुड़ैल… तू डायन….अरे संभाल तेरे जानवर को…”

बिल्लू की माँ ने बराबर की टक्कर देते हुए कहा “जबान संभाल कर बात कर….तेरी गज़ भर लंबी जबान काट कर चूल्हे में डाल दूंगी। देख रही हो बहन,…इसी जबान के चलते रोज़ घर पर लात खाती है….न पति सेठता है न सास…..अरे दो बार तो घर से निकाल भगाया था” 

अब तो पिंकू की माँ और भी भड़क गई थी, बोली, “जा जा कमीनी….तू देख अपना घर….पति घर पर पड़ा रहता है और खुद दिन भर बाहर घूमती फिरती है…”

बिल्लू की माँ बोली, “चुड़ैल, इलजाम लगाती है…तू देख अपना घर…अरे सुनते हो जी! देखो तो बिल्लू का मार- मार कर क्या हाल कर दिया है….बाहर आओ।”

पिंकू की माँ भी अपने पति को बुलाते हुए बोली, “अरे जा-जा….बुला तेरे मरद को …देखती हूँ उसे भी….सुनो! बाहर आओ जी! ये चुड़ैल अपनी औकात दिखा रही है।”

बिल्लू के पापा बाहर आते हुए बोले, “अरे क्या हो गया बिल्लू की माँ, क्यों चीख रही हो?”

“देखो जी, बिल्लू की क्या हालत कर दी है, दरिंदे की तरह नोच डाला है, पूरी कमीज का सत्यानाश कर दिया।” बिल्लू की माँ बोली

बिल्लू के पापा, पिंकू की माँ की ओर मुखातिब हुए और बोले, “पिंकू की मम्मी, समझाओ अपने पिंकू को, क्या है यह सब?”

उधर पिंकू के पापा कमीज पहनते हुए बाहर आए और गरजे, ” ए… इधर देख कर बात कर…औरत से क्या बात कर रहा है….साले अपनी औलाद को देख….हमें क्या बोलता है।”

अब बारी बिल्लू के पापा की थी, बोले, ” तमीज़ से बात कर बे….दो मिनट में औकात दिखा दूंगा…”

“@#$%%^, *&^#@@, साले मुझे औकात दिखाएगा, साले मुंह खोला तो तेरा सर खोल दूंगा” पिंकू के पापा बोले।

भड़कते हुए बिल्लू के पापा बोले, ” साले @@$%%^, *&^#@@, साले डरपोक, दम है तो हाथ लगा कर दिखा…तेरी तो..@##$%%।”

“….आ साले, ले आ गया….तेरी तो….@###$$%$, (*/#/@/@…ये ले…” पिंकू के पापा बिल्लू के पापा का कॉलर पकड़ते हुए बोले।


फिर क्या धूम-धड़ाम, ढिशूम-ढिशूम, पटका-पटकी, सर फुड़उवल……


उधर दूर पान की दूकान पर खड़ा संतोष सब तमाशा देख रहा था, बोला, “का भईया चौरसिया, क्या हो गया?”

“अरे का बताई, पहले मनोहर और परकास की मेहरारू लड़ीं, फिर ओके बाद उ दोनों।” चौरसिया पान पर कत्था मलते हुए बोला।

“अबे पर लड़े काहे….जमीन, जायजाद या औरत…झगड़ा कौन बात का है।” संतोष ने उचक कर तमाशा देखते हुए पूछा।

“अरे नहीं…. दोनों के लौंडे लड़ लिए, उसी बात पर टंटा सुरु…पहले गाली- गलौज फिर सर फुड़उवल।” चौरसिया पान पकड़ाते हुए बोला।

संतोष ने पान मुंह में डालते हुए पूछा, “अच्छा…लौंडे कहाँ है?….ठीक तो है?….ज्यादा मार लगी है क्या?” 


चौरसिया मुस्कुराया और बोला, “काहे की मार, वो देखो, दोनों पारक में खेल रहे हैं।”

Categories
Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang

Choti Hasya kahani-Budiya ke Baal (छोटी हास्य कहानी- बुढ़िया के बाल)

अति लघु हास्य कथा..बुढ़िया के बाल

ishhoo blog image27
Photo by Ryanniel Masucol on Pexels.com
रामखिलावन का परिवार आज बहुत खुश था। माँ सावित्री देवी, बीवी सुमन और तीन साल की बेटी पुष्पा दशहरा देखने जो आए थे।
आज रावण दहन था…घर पर सभी पकवान तैयार थे । सबने बोला कि पहले मेला घूमेंगे फिर पेट पूजा करेंगे।
चारो सजे- धजे मेले की रौनक में खोए थे। राम खिलावन बिटिया को बता रहा था, “दशहरा मतलब बुराई पर अच्छाई की विजय” तभी पुष्पा की माँ बोली, ” पुष्पा, ‘बुढ़िया के बाल’ खाओगी ?”
पुष्पा उचक कर बोली , “अच्छा, पर बुढ़िया कहाँ है जिसे रोज़ कोसती हो फ़ोन पर कि बुढ़िया दिमाग खा गई….”

बस रामायण ख़तम, महाभारत शुरू।

कहानी समाप्त।।

Categories
Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Kahani: Pocket Radio /हास्य कहानी : पॉकेट रेडियो -छोटी उम्र की खुराफात का एक नमूना

पिछले पंद्रह मिनट से हम तीन फिट की दीवार पर कान पकड़े खड़े थे और माता जी गुस्से से हाथ में हमारा ही प्लास्टिक का बैट लिए इंतजार कर रहीं थी कि ज़रा हिले तो दो चार लगा दें| हमें तो समझ ही नहीं आ रहा था कि ऐसा भला क्या हो गया जो इतनी ज़बरदस्त सजा दे दी गई थी, पर माता जी का पारा गरम था, एक तो उनके आदेश का उल्लंघन ऊपर से एक बड़ा कांड…..

बात उन दिनों की है जब हम शर्ट और हाफ पैंट पहना करते थे, वैसे हाफ पैंट तो अब भी पहनते है पर शौखिया, उस समय वो हमारा ऑफिशियल ड्रेसकोड हुआ करता था| जी हाँ उमर होगी कोई आठ या नौ साल| इलाहाबाद में हम अपने माता पिता और छोटी बहन के साथ किराये के मकान में रहा करते थे| पिता जी टेलीफोन डिपार्टमेंट में टेक्निकल इंजिनियर थे और माता जी ने घर परिवार का बीड़ा उठा रखा था|

ज़िन्दगी सुकून भरी थी, घर से स्कूल और स्कूल से घर, न मोबाइल था न केबल टीवी| लकड़ी के शटर वाले ब्लैक एंड वाइट टीवी पर दूरदर्शन और लगभग उतने ही बड़े रेडियो में बिनाका गीतमाला| घूमने के लिए गर्मियों की छुट्टीयों में कानपुर अपनी दादी – नानी का घर|

सितम्बर या अक्टूबर की बात होगी, मौसम ने करवट लेना शुरू ही किया था कि एक रोज़ कानपुर से हमारे बड़े पापा के ज्येष्ठ पुत्र और हम सब में सबसे बड़े, भाई साहब अपने घनिष्ट मित्र के साथ इलाहाबाद आए| एस.एस.सी. का इम्तहान था और सेंटर इलाहाबाद पड़ा था| घर में मेहमान आए तो कौन खुश नहीं होता, न खेलने जाने की रोक-टोक, न डांट का डर और पूड़ी-पकवान अलग से| हमारा भी हाल वही था, इन बातों से एक अलग ही ख़ुशी थी मन में|          

Categories
Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

हास्य कहानी- रील कट गई…. Hasya Kahani

नमस्ते! कभी इंटरनेट के महासागर से निकले गूगल रूपी यक्ष से पूछियेगा ‘Hangover meaning in Hindi’, जवाब मिलेगा ‘अत्यधिक नशा’…..अगर आप सोच रहे हो कि आज लेखनी का श्रम, ‘हैंगओवर में क्या करें? हैंगओवर के बचाव, या हैंगओवर क्या होता है? जैसे विषयों पर है तो आप निराश होंगे…आज जो स्याही घिसी है, वह हॉस्टल लाइफ या नौकरी के शुरुआती पड़ाव पर हैंगओवर के अलग रूप का वर्णन करती है, जिसे हम आंग्लभाषा में ब्लैकआउट (Blackout) और आम भाषा में ‘रील कटना’ कहते है| जो अनुभवी हैं, वो मन ही मन मुस्करा रहें होंगे और जो अनभिज्ञ हैं, उनका ज्ञानवर्धन इस कहानी के दरमियान हो ही जायेगा…..   

हास्य कहानी- रील कट गई….

दूर कहीं जानी पहचानी धुन बज रही थी, लगा की सुनी सुनाई सी है, कान के पट थोड़े और खोले तो जान पड़ा कि अपने ही मोबाइल की रिंगटोन थी, छह….पूरी नीद टूट गयी| भारी पलकों से आँख खोली तो ऑटोमोड में हाथ मोबाइल ढूँढने लगा, ज़ोर लगा कर देखने पर भी आँखें धुंधली तस्वीर ही उतार  पा रहीं थीं, लगा की कुछ मिस्ड-काल जैसा लिखा है| मरी-थकी उँगलियों से जब गौर करवाया तो देखा आठ मिस्ड-काल थे, उसमें से तीन तो बॉस के, तब कहीं जा कर मुकुंद के शरीर में उर्जा का संचार हुआ| अब दिमाग तो इशारा कर रहा था कि उठ जाओ पर शरीर था कि अलग ही सुर पकड़े बैठा था| सर दर्द, बदन दर्द, गले में खराश, पेट में भारीपन, पूरा शरीर जैसे टूट रहा था| खैर मुकुंद को समझते देर न लगी की वह अत्यधिक नशे यानी हैंगओवर का शिकार हुआ था| उठ कर बैठा तो एक और अचम्भा, अरे, यह तो अपना ही बिस्तर है, यानी अपने ही घर| रजाई से पैर बाहर निकाला तो बाकायदा, टी-शर्ट और पायजामा पहन रखा था|

Categories
Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang

21 डेज टु क्विट अ हैबिट/ 21 days to quit a habit

लॉकडाउन में सिगरेट, शराब और पानमसाला के नशेबाजों पर एक व्यंग. (A satire on smokers and drinkers during lockdown)

नमस्ते! सिगरेट, शराब, पान-मसाला खाने वालों की ज़मात में अक्सर यह नसीहत आम सुनाई देती है कि, आप इक्कीस दिन किसी बुरी आदत से तौबा कीजिये, बाईसवें दिन से आप उस आदत से निजात पा चुके होंगे| सुना तो लगभग सभी ने होता है पर इतना टाइम है किसके पास? एक दो दिन बिना रोटी के तो रह सकते है पर मज़ाल है जो नशे पत्ती का जुगाड़ भूल जायें|

आज नशेबाजों का पक्ष इतनी मजबूती से रख पाने का राज़ यह है कि, हम स्वयं उस दौर से गुज़ार चुके हैं| आदत भी ऐसी की आँख खुलने से पहले तकिया के नीचे टटोल लिया करते थे…अगर सिगरेट है तो ठीक, वर्ना एक दो का तो दिन ख़राब होना ही था| पता ही नहीं था की हम सिगरेट को पी रहे है या सिगरेट हमें| शादी से पहले तक तो बचे हुए टोटों से तंबाखू इकठ्ठा कर आधी सिगरेट जितना जुगाड़ कर लिया करते थे, अब आधी रात कहाँ जाएँ सिगरेट ढूँढने, आलस भी किसी नशे से कम थोड़े ही होता है| शादी हुई तो ऐश-ट्रे से अधजली सिगरेट बटोरने की, और बच्चे के बाद पूरी सिगरेट की आदत छूट ही गयी| खैर मेरी कहानी फिर कभी, आज इतनी बड़ी भूमिका बांधने का उद्देश्य इक्कीस दिन वाली नसीहत पर गौर करना है| तो चलिए शुरू करते हैं…….

Categories
Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang

चटोरों की व्यथा/Chatoron ki vyatha

लॉकडाउन में स्ट्रीट फूड को तरसता एक वर्ग।(Lockdown mein Street food ko tarasta ek varg)

नमस्कार! आज आपका ध्यान उन कुछ मुद्दों पर जो समाज़ ने नकार रखा है….न तो मीडिया में कवरेज मिलेगी न सोशल मीडिया में। घरों को पलायन करते कामगार मज़दूर हो, बिगड़ती अर्थव्यवस्था हो, चाइना हो या पेट्रोल के दाम, हर मुद्दे पर बात करने के लिए दसियों बुद्धिजीवी बैठे है टीवी चैनलों पर।
पर आज बात एक ऐसे मुद्दे की जो भले ही इतना ज्वलंत न लगें पर समाज़ के एक वर्ग के लिए काफी मायने रखता है । खैर किसी न किसी को तो पक्ष रखना ही था , मीडिया न सही हमारी कलम सही । उम्मीद करता हूँ, उस वर्ग के दर्द को आप तक पहुंचा पाऊंगा।
आज बात उस वर्ग की जो बिना किसी स्वार्थ या हीनभावना के समाज में स्वाद की परिभाषा का विस्तारीकरण करता रहा है। जी हां बात जंक-फूड , स्ट्रीट-फूड के उन निष्ठावान उपभोक्ताओं की जिन्हें हम आम बोल चाल की भाषा में “चटोरे” बोलते आये हैं।
वैश्विक महामारी क्या आई बेचारे स्वाद ही भूल गए ….क्या बच्चे, क्या आदमी और क्या औरतें, चटोरों की बिरादरी पर ऐसी गाज़ गिरी कि दर्द भी बयां न कर सके। सरकार ने तो खानापूर्ति कर दी, बोल दिया कि टेक-अवे चालू हैं। अब सरकार को भला कौन समझाए कि पानीपुरी की दुकान पर सी-सी करते बोलना कि “भईया, एक सूखी पापड़ी देना मीठी चटनी के साथ”, ये वाली फीलिंग कौन से टेक-अवे में आती है।
कहां रोज़ शाम ऑफिस से लौटते समय ट्रांस्पेरेंट थैली में अखबार के लिफ़ाफ़े में रखे समोसे…..लिफ़ाफ़े पर उभरने वाले तेल के निशान बता दिया करते थे कि समोसे गरम हैं। गेट की आवाज़ सुनते ही बीवियां चाय चढ़ा दिया करतीं थी। अब तो वर्क फ्रॉम होम है। अच्छा, ऐसा नहीं है कि कोशिश न की हो पर समझ ही न आया कि समोसा खा रहे है या आलू भरी पूरी। अब कहाँ प्रोफेशनल हलवाई और कहाँ यू-ट्यूब के नौसीखिये। अरमान दिल के दिल में ही रह गये।
ऐसी ही हालत कुछ लाल , नीली , पीली मोटरसाइकिल पर उसी रंग के हेलमेट में आने वाले दूतों का इंतज़ार करने वालों की है। अब तो ऐसा लगता है जैसे आंखे पत्थर हो गयी हो। एक समय था कि सोसाइटी में विज़िटर के नाम पर सिर्फ डिलेवरी बॉय ही दिखते थे। हालत ये थी कि सोसाइटी का वॉच मैन मोटरसाइकिल का रंग देख कर बता देता था कि किस फ्लैट का आर्डर है….। क्या पिज़्ज़ा, क्या बर्गर, क्या हक्का नूड्ल्स सारे स्वाद छिन गए। अब कहां बाज़ार का स्वाद और कहां घर का, लगता ही नहीं वही डिश खा रहे हों।


एक और दर्द इसी वर्ग की महिला शाखा का जिनकी सारी सहूलियत ही छीन ली इस लॉकडाउन ने। कहां हर चौथे दिन स्पीड डायल पर पती को फ़ोन किया और बोला, “सुनो! आज कुछ बाहर से आर्डर कर लेते है….।” पती भी बेचारा, कौन दिमाग खपाए, अभी मना कर दो तो दो दिन ख़राब। ऐसे पीड़ित पतियों को तो जैसे बदले का मौका मिल गया हो। टेक-अवे तो था पर करोना -करोना बोल कर सारा हिसाब पूरा कर लिया। ऊपर से रोज़ नया वीडियो पकड़ा देते हैैं कि, “जानू! आज ये वाली डिश ट्राई करते हैं।” यू-टयूबर्स का क्या है सब्सक्राइबर बढ़ाने के लिए बोल दिया बाज़ार जैसा कबाब घर पर बनाएं , कभी ट्राई किजिए और बोलिये क्या है वही स्वाद? अजी कितनों ने तो मन्नत मांग ली है कि, करोना ख़तम हो और ये वर्क फ्रॉम होम की बला टले।
अब समाज़ को कौन समझाये कि, एक भोलेनाथ थे जिन्होंने पृथ्वी बचाने के लिए हलाहल पी लिया था, और एक ये चटोरे है जो जंक फ़ूड खा खा कर न सिर्फ अपना पेट भरते है बल्कि लोकल से ले कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कितने ही कर्मचारियों का पेट पालते हैं।
एक जिम्मेदार लेखक कि तरह मैंने तो चटोरों की व्यथा आप तक पहुंचा दी। अब दुआ कीजिए कि जल्द करोना खत्म हो और बाज़ारों में वापस वही रौनक लौटे।