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Andaman Nicobar ki Lok Kathayen-1 (अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ-1)

शार्क का जन्म: अंडमान निकोबार की लोक-कथा

काफी पुरानी बात है। निकोबार में तामलु और फुको नामक दो गाँवों के बीच टोसलो नाम का एक गाँव था। टोसलो के लोग जन्म से ही जंगली और खूँखार थे। दूसरे गाँव के किसी आदमी पर या किसी अन्य अनजान आदमी पर उनकी नजर पड़ जाती तो वे उस पर हमला बोल देते और जब तक उसे मार न गिराते, चैन न लेते।

पड़ोस के दोनों गाँवों के लोग टोसलो वालों से हमेशा डरे रहते थे। वे कभी भी उस गाँव के बीच से गुजरने की हिम्मत नहीं करते थे। उधर से गुजरने का अर्थ था–मौत। अंतत:, दोनों पड़ोसी गाँव वालों ने मिलकर टोसलो पर आक्रमण कर दिया और उनको उनके गाँव से बाहर खदेड़ दिया | खदेड़े जाकर टोसलो वाले चौकबाक नामक जगह पर पहुँच गए। वे वहाँ रहने लगे परन्तु अपना जंगलीपन न छोड़ पाए।

उनका नया गाँव चौकबाक टिपटॉप नामक गाँव से अधिक दूरी पर नहीं था। हुआ यों कि एक दिन टिपटॉप का एक लड़का अपने छोटे भाई को साथ लेकर चौकबाक के समीप से गुजर रहा था। वह अपने आसपास किसी भी तरह के खतरे से अनजान था। उनको देखकर चौकबाक का एक निवासी छुरा हाथ में लेकर चुपचाप उनके पीछे लग गया। उसने एकाएक छोटे भाई पर छुरे से हमला किया।

छोटा भाई चिल्लाया, “’ भैया, बचाओ। पीछे से एक आदमी मुझ पर हमला कर रहा है।”

बड़े भाई ने इस चीख-पुकार को छोटे भाई की शरारत समझा। इसलिए उसने उसकी चीख पर कोई ध्यान नहीं दिया।

कुछ ही पल बाद चौकबाक वाले ने छोटे भाई पर पुनः हमला किया। लड़का बुरी तरह चीखा- चिल्लाया और बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा। उसके गिरते ही चौकबाक वाले ने उसका सिर काट डाला। लड़का मर गया।

जैसे ही बड़े भाई ने मुड़कर देखा। उसे छुरा हाथ में लिए अपना दुश्मन नजर आया। उसे देखकर वह बेतहाशा अपने गाँव की ओर भागा और हाँफता हुआ किसी तरह घर पहुँचा। बाद में सारा किस्सा उसने गाँव वालों को सुनाया। उसे सुनकर सभी ने चौकबाक वालों का खात्मा कर डालने की कसम खाई और उसी दिन उन पर हमला कर दिया।

उनके हमले से बचकर चौकबाक के लोग जान बचाकर भाग खड़े हुए। कुछ मर गए और बाकी समुद्र में जा कूदे। वे फिर कभी वापस नहीं आए।

कहा जाता है कि वे दुष्ट और निर्दयी लोग शार्क बन गए तथा ‘बदमाश मछली’ कहे जाने लगे। आज भी वे पहले जितने ही दुष्ट और निर्दयी हैं। आदमी को समुद्र में देखते ही वे उस पर हमला करते हैं। शायद, पुरानी दुश्मनी का बदला लेने के लिए।

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Andaman Nicobar ki Lok Kathayen-2 (अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ-2)

जब पेड़ चलते थे -अंडमान निकोबार की लोक-कथा

बेशक वे बड़े सुनहरे दिन थे।

उन दिनों आदमी जंगलों में भटकता फिरता था। आदमी की तरह ही पेड़ भी घूमते-फिरते थे। आदमी उनसे जो कुछ भी कहता, वे उसे सुनते-समझते थे। जो कुछ भी करने को कहता, वे उसे करते थे। कोई आदमी जब कहीं जाना चाहता था तो वह पेड़ से उसे वहाँ तक ले चलने को कहता था। पेड उसकी बात मानता और उसे गंतव्य तक ले जाता था। जब भी कोई आदमी पेड़ को पुकारता, पेड़ आता और उसके साथ जाता।

पेड़ उन दिनों चल ही नहीं सकते थे बल्कि आदमी की तरह दौड़ भी सकते थे। असलियत में, वे वो सारे काम कर सकते थे जो आदमी कर सकता है।

उन दिनों ‘इलपमन’ नाम की एक जगह थी। वास्तव में वह मनोरंजन की जगह थी। पेड़ और आदमी वहाँ नाचते थे, गाते थे, खुब आनन्द करते थे। वहाँ वे भाइयों की तरह हँसते-खेलते थे।

लेकिन समय बदला। इस बदलते समय में आदमी के भीतर शैतान ने प्रवेश किया। उसके भीतर । बुराइयाँ पनप उठीं।

एक दिन कुछ लोगों ने पेड़ों पर लादकर कुछ सामान ले जाना चाहा। परन्तु उन पर उन्होंने इतना अधिक बोझ लाद दिया कि पेड़ मुश्किल से ही कदम बढ़ा सके। वे बड़ी मुश्किल से डगमगाते हुए चल पा रहे थे।

पेड़ों की उस हालत पर उन लोगों ने उनकी कोई मदद नहीं की। वे उल्टे उनका मजाक उड़ाने लगे।

पेड़ों को बहुत बुरा लगा। वे मनुष्य के ऐसे मित्रताविहीन रवैये से खिन्न हो उठे। वे सोचने लगे कि मनुष्य के हित की इतनी चिन्ता करने और ऐसी सेवा करने का नतीजा उन्हें इस अपमान के रूप में मिल रहा है।

उसी दिन से पेड़ स्थिर हो गए। उन्होंने आदमी की तरह इधर-उधर घूमना और दौड़ना बन्द कर दिया।

अब आदमी को अपनी गलती का अहसास हुआ। वह पेड़ के पास गया और उससे पहले की तरह ही दोस्त बन जाने की प्रार्थना की। लेकिन पेड़ नहीं माने। वे अचल बने रहे।

इस तरह आदमी के भद्दे और अपमानजनक रवैये ने उससे उसका सबसे अच्छा मित्र और मददगार छीन लिया।

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Andaman Nicobar ki Lok Kathayen-3 (अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ-3)

सूरज की ओर: अंडमान निकोबार की लोक-कथा

बहुत पहले की बात है। एक आदमी ने सूरज की ओर जाना शुरू किया। उसे रास्ता नहीं पता था। रास्ते में उसे अनेक कठिनाइयाँ आईं, लेकिन वह चलता रहा। जब सूरज डूब गया, वह वहीं रुक गया।

घना जंगल उसके चारों ओर था। जंगल में उसने थोड़ी जगह साफ की और एक झोंपड़ी बना ली। उसके चारों ओर उसने केला, पपीता, सुपारी, नारियल आदि फलों के पौधे रौंप दिए। इनसे उसे पर्याप्त भोजन मिलने लगा।

इस तरह समय बीतता रहा।

एक दिन मलक्का गाँव के लोगों ने एक पक्षी को चोंच में मछली दबाकर पश्चिम की तरफ उड़ते देखा। उन लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ। वापसी में वे उसका पीछा करने लगे। कुछ समय बाद वह पक्षी एक झरने में जा उतरा। पानी वहाँ चाँदी की तरह चमक रहा था। लोगों ने सोचा कि पक्षी ने यहीं कहीं से मछली पकड़ी होगी। उन्हें उस जगह का नाम नहीं पता था। लेकिन वे खुश थे कि उन्होंने एक झरने को खोज लिया है। इधर-उधर देखने पर उन्हें वहाँ एक झोंपड़ी दिखाई दी। उसके चारों ओर फलों का बगीचा था। उन्हें आश्चर्य हुआ कि ऐसे घने और सुनसान जंगल में कौन अकेला रह रहा है ! वे धीरे-धीरे झोंपड़ी तक गए और उसका दरवाजा खटखटाया।

आदमी बाहर आया।

“आप कौन हैं ?” उसने उनसे पूछा।

“हम मलक्का के निवासी हैं।” वे बोले, “हम पूरब की ओर उड़ते एक पक्षी का पीछा करते हुए यहाँ पहुँचे हैं। आप कौन हैं और यहाँ अकेले क्यों रहते हैं ?”

“मैं भी कभी मलक्का में ही रहता था।” उसने उत्तर दिया, “एक दिन मैंने सूरज की तरफ चलना शुरू किया। सूर्यास्त तक मैं यहाँ पहुँचा और तब से यहीं रहने लगा।”

यह सुनकर मलक्कावासियों ने अपने गाँव से आए उस पहले आदमी को गले लगाया और पुनः मिलने का वादा करके वापस अपने गाँव को लौट गए।

एक दिन ‘पहले आदमी ‘ को पता चला कि घर में नमक का एक कण भी नहीं है। वह नमक की खोज में झोंपड़ी से बाहर निकला। कुछ दूर चलने पर उसने एक अन्य आदमी को देखा।

“नमस्ते भाई, आप कौन हैं और कहाँ से आए हैं ?” पहले आदमी ने पूछा।

“मैं फोबोई गाँव का रहने वाला हूँ और लम्बे समय से यहाँ रह रहा हूँ।” वह बोला।

दोनों आदमी गहरे दोस्त बन गए। कुछ समय तक बातें करने के बाद दोबारा मिलने का वादा करके वे अपने-अपने रास्ते पर चले गए।

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Andaman Nicobar ki Lok Kathayen-4 (अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ-4)

नारियल का जन्म: अंडमान निकोबार की लोक-कथा

पुराने समय में कार-निकोबार के एल्कामेरो में दो मित्र रहते थे। एक का नाम असोंगी और दूसरे का एनालो था। दोनों एक दूसरे को बहुत प्यार करते थे। वे साथ-साथ काम करते, जो कुछ वे कमाते उससे साथ-साथ खाते और दुःख-सुख में साथ रहते। दोनों पूरे दिन काम में लगे रहते थे।

कार-निकोबार में एक बार सूखा पड़ा। हालांकि निकोबार चारों ओर समुद्र से घिरा था लेकिन पूरे साल पानी की एक बूँद भी नहीं बरसी थी। सारे कुएँ सूख गए थे। मनुष्य, जानवर, पक्षी बिना पानी के मर रहे थे।

असोंगी एक अच्छा जादूगर था। उसके गाँव वाले ही नहीं दूर-दूर से दूसरे लोग भी उसका जादू देखने को आते थे। एक दिन दोनों दोस्त घास काटने को गए। असोंगी को अपनी छुरी तेज करनी थी, लेकिन आसपास कहीं पानी नजर नहीं आ रहा था। ऐसे में असोंगी जंगल में घुस गया और जादू के बल पर जमीन से पानी निकाल लिया। उसे लेकर वह अपने मित्र एनालो के पास आया। एनालो को बड़ा आश्चर्य हुआ।

“यह पानी तुम कहाँ से ले आए?” उसने असोंगी से पूछा।

“जंगल के भीतर से ।” असोंगी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।

“देखो, मैं तुम्हारा सबसे गहरा दोस्त हूँ।” एनालो लालचपूर्वक बोला, ”मुझे भी यह जादू सिखाओ न!”

“एनालो, मेरे दोस्त, मुझे तुम्हारी दोस्ती पर कोई शक नहीं।” असोंगी ने सपाट आवाज में बोलना शुरू किया, “लेकिन, मेरे गुरुजी का कहना था कि हर विद्या हर आदमी को नहीं सिखाई जा सकती। इसलिए… ।”

“अच्छा! तो मैं जादू सीखने के योग्य नहीं हूँ ?” उसकी बात सुनकर एनालो क्रोधपूर्वक चीखा। इस नाराजगी में उसने अपने मित्र का सिर धड़ से उड़ा दिया। असोंगी के धड़ को उसने वहीं दफन कर दिया और सिर को लेकर घर आ गया। घर पर उसने असोंगी के सिर को एक खम्भे पर लटका दिया।

रात में वह सिर एनालो से बहुत-सी बातें किया करता था। इससे डरकर एनालो गाँव छोड़कर भाग गया। वह दूसरे गाँव में जा पहुँचा। वहाँ उसने शादी की और आराम से रहने लगा। कुछ समय बाद उसके घर एक पुत्री का जन्म हुआ। वह एक खूबसूरत लड़की थी। सभी उसे प्यार करते थे।

एक बार अचानक लड़की बीमार पड़ गई। एनालो ने उसका बहुत इलाज कराया लेकिन किसी भी दवा से उसे आराम नहीं हुआ।

दुःखी और थका-हारा एनालो एक रात जल्दी सो गया। गहरी नींद में उसने एक स्वप्न देखा। सपने में उसके दोस्त असोंगी के कटे हुए सिर ने उससे यह कहा :

“इस सिर को जमीन में दबा दो। उससे एक पेड़ उगेगा। जब उस पर फल आ जाएँ तब उस फल को तोड़ना। उस फल को काटने पर उसके भीतर पानी निकलेगा। वह पानी अपनी बेटी की पिलाओ। वह ठीक हो जाएगी।” एनालो की नींद टूट गई। वह मूँह-अँधेरे ही उठ बैठा और दौड़ता हुआ अपने पुराने गाँव में पहुँचा। घर में खम्भे पर लटके असोंगी के सिर को उसने उसके बताए अनुसार जमीन में दबा दिया।

कुछ समय बाद उस सिर से एक पेड़ पैदा हुआ। उस पर फल लगे। एनालो ने फलों को बीच से काटा और पानी निकालकर बेटी को पिलाया। कुछ ही दिनों में लड़की बिल्कुल चंगी हो गई। एनालो उसे स्वस्थ देखकर बहुत खुश हुआ। उसे दुःख हुआ कि उसने असोंगी जैसे भला चाहने वाले मित्र के साथ घात किया।

निकोबार के लोग आज भी नारियल को असोंगी के सिर से पैदा हुआ फल मानते हैं।

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Andaman Nicobar ki Lok Kathayen-6 (अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ-6)

गिरि और शोआन: अंडमान निकोबार की लोक-कथा

बहुत समय पहले निकोबार में अरंग नाम का एक आदमी था। उसकी एक पत्नी थी। उन दोनों के तीन बेटे और तीन बेटियाँ थीं। अरंग काफी धनवान था। उसने परिवार के लिए एक आलीशान मकान बनाया।

एक दिन बह अपने बड़े बेटे शोआन के साथ समुद्र से मछली पकड़ने को गया। अचानक तेज आँधी आई। समुद्र में ज्वार आने लगा। उनकी डोंगी उलट गई। बाप और बेटा दोनों समुद्र में डूब गए। जब पिता डूब रहा था तो लड़का डोंगी के ऊपर सरक आया और चिल्लाया, “मेरे पिता मर गए हैं। हाय, मैं क्या करूँ? मैं घर कैसे जाऊँगा ?”

तभी एक व्हेल उसके सामने आई।

“मेरी पीठ पर बैठो। मैंने रास्ता देखा है।” व्हेल ने कहा।

व्हेल बहुत बड़ी मछली होती है। उसे सागर की रानी कहा जाता है। यद्यपि शोआन को उससे कुछ डर लगा लेकिन वह हिम्मत करके उसकी पीठ पर बैठ गया।

व्हेल उसको मंजिल की ओर ले चली। उसे देखकर समुद्र के सभी जीव डर कर भागने लगे। उड़ने वाली मछलियाँ इधर-उधर उड़ गईं। शार्क गहरे सागर में उतर गई। समुद्री साँप तलहटी की रेत में जा छिपे। डॉल्फिनें तेजी के साथ दूर तैर गईं।

तैरते-तैरते वे व्हेल के देश में जा पहुँचे। वह कीमती पत्थर की एक बड़ी गुम्बदनुमा हवेली में रहती थी। उसकी दीवारें लाल मूँगे से बनी थीं। घर के अन्दर व्हेल की बेटी ‘गिरि’ बैठी थी।

शोआन वहाँ खूबसूरत गिरि की सेवा में रहने लगा।

“तुम्हें क्या-क्या काम आता है ?” गिरि ने पूछा।

“मैं जंगल से नारियल इकट्ठे कर सकता हूँ।” शोआन बोला।

“इससे क्या? नारियल यहाँ होता ही नहीं है।” गिरि ने कहा।

“मैं नाव बना सकता हूँ।’

“नाव की हमें क्या जरूरत है ? कुछ और बताओ।”

“मैं बरछी से मछलियाँ मार सकता हूँ।”

“तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे ।” गिरि तेज स्वर में बोली, “हम मछलियों को प्यार करते हैं। मेरे पिता मछलियों के राजा हैं। अब तुम मेरे बालों में कंघी करो।” गिरि ने शोआन को आदेश दिया।

शोआन उसके बालों में कंघी करने लगा। वह वहाँ रहता रहा। दोनों आपस में खूब हँसी-मजाक करते। कुछ समय बाद दोनों में प्रेम हो गया और उन्होंने परस्पर विवाह कर लिया। गिरि के पास दर्पण नहीं था। उसने शोआन से एक दर्पण लाने को कहा।

“मेरे घर में एक दर्पण है।’” शोआन बोला, ”लेकिन मैं वहाँ जाऊँगा कैसे ?”

“इसमें क्यां है। मैं तुम्हें वहाँ पहुँचा दूँगी। तुम मेरी पीठ पर बैठो, मैं तुम्हें किनारे पर छोड़ देती हूँ।” गिरि ने कहा।

गिरि शोआन को लेकर किनारे पर आ गई। वह समुद्र में एक बड़े पत्थर के पीछे रुक गई। शोआन जल्दी लौटने का वादा करके अपने गाँव को चला गया। शीघ्र ही वह अपने घर जा पहुँचा।

शोआन को देखकर उसकी माँ को विश्वास ही नहीं हुआ कि वह जिंदा है! उसके जीवित लौट आने की खबर सुनकर गाँव के सारे लोग उसे देखने को उमड़ पड़े ।

उसने सबको व्हेल वाली घटना सुनाई और गिरि के साथ अपने विवाह की बात बताई। लोग उसकी बातों पर हँसने लगे। उसकी सारी बातें उन्हें गप लगीं। शोआन को उनके रवैये से बड़ा दुख हुआ। उसने दर्पण उठाया और घर से भाग खड़ा हुआ।

गाँव के लोग अनपढ़ और अंधविश्वासी थे। समुद्र में डूबने के वर्षों बाद वापस लौटे शोआन को वे उसका भूत समझ रहे थे। जब वह दर्पण उठाकर भागने लगा तो उनका संदेह विश्वास में बदल गया। उन्होंने उसका पीछा किया और बरछियों से उस पर वार किया।

बरछियों ने भागते हुए शोआन के पूरे शरीर को बींध डाला। वह मर गया।

उधर, सागर में मूँगे की पहाड़ी के पीछे रुकी गिरि उसकी प्रतीक्षा करती रही। लेकिन वह गिरि के पास तक नहीं पहुँच पाया।

अक्सर ही चाँदनी रातों में मछुआरे सागर में दर्दभरी आवाजें सुनते हैं। उन्हें लगता है जैसे कोई स्त्री लम्बे समय से अपने पति के इन्तजार में सिसक रही हो।

वे लोग, जिन्हें गिरि की कहानी नहीं पता, इन आवाजों पर आश्चर्य करते हैं। गिरि शोआन के बिना अकेली अपने घर नहीं लौट सकती। इसलिए वह दर्दीली आवाज में उसे पुकारती है—

लौट आओ शोआन, लौट आओ… लौट आओ… !

आधी रात को समुद्र में अब भी यह आवाज गूँजती है।

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Andaman Nicobar ki Lok Kathayen-7 (अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ-7)

चोरी हुआ टापू: अंडमान निकोबार की लोक-कथा

बहुत समय पहले काकना गाँव के पास एक छोटा-सा टापू था। छोटा होने पर भी वह एक दर्शनीय टापू था। उस पर कोई रहता नहीं था। लोग उस पर सिर्फ घूमने और शिकार करने के लिए जाते थे।

टापू पर ‘साका’ नाम का एक पक्षी भी आता-जाता था। पूरी दूनिया में वह एक ही पक्षी था। वह छोटा परन्तु बहुत चतुर-चालाक था।

वर्षों तक साका टापू में उड़ान भरता रहा । उसको टापू इतना अधिक भाया कि उसने उसे अपने साथ ले जाने की योजना बनाई ताकि उसके रहने की जगह हमेशा खूबसूरत बनी रहे । उसके सिवा कोई और वहाँ न हो ।

एक रात, जब सारी दुनिया सोई हुई थी, साका ने सोचा– अच्छा मौका है। ऐसे में मुझे इस टापू को ले उड़ना चाहिए।

साका कल्पना में खो गया। उसे लगा कि पूरा टापू उसके घर में है और वह आराम से टापू में उड़ान भर रहा है। वहाँ उसका एक प्यारा घोंसला है। तरह-तरह के दूसरे पक्षी आसपास चहक रहे हैं। सभी उस टापू की प्रशंसा कर रहे हैं और वहाँ रुक जाना चाहते है। अचानक उसकी तन्द्रा टूटी और वह उस छोटे टापू को पीठ पर लादकर अपने निवास की ओर उड़ चला।

साका छोटा था। वह बड़ी सावधानी के साथ उस भारी-भरकम टापू को लेकर उड़ रहा था। दिन निकलने से पहले वह अपने निवास पर पहुँच जाना चाहता था। लेकिन समय उसकी उड़ान की तुलना में तेजी से गुजर रहा था।

जैसा कि उसको डर था, रात समाप्त हो गई।

दिन निकल आया।

लोग जाग उठे। उन्होंने साका को टापू लेकर जाते हुए देख लिया।

पूरब की ओर से आती सूरज की पहली किरण पड़ते ही साका ने टापू को नीचे फेंक दिया और तेजी से अपने निवास की ओर उड़ गया।

टापू उलटकर समुद्र में जा गिरा।

लोगों का मानना है कि चौरा के रास्ते में सागर के बीच झाँकता ‘छोटा टापू’ ही वह चोरी हुआ टापू है।

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Andaman Nicobar ki Lok Kathayen-8 (अंडमान निकोबार की लोक कथाएँ-8)

बौनों का देश: अंडमान निकोबार की लोक-कथा

हजारों साल पहले मलक्का के लोग घूमते-घामते एक ऐसी जगह जा पहुँचे जहाँ एक गुफा-सी थी। उसमें इतना अंधेरा था कि वे चाहकर भी उसके भीतर जाने का साहस न कर सके। तब उन्होंने नारियल की कुछ सूखी पत्तियों को इकट्ठा करके उन्हें जलाया। उस प्रकाश में वे उसके भीतर गए। अन्दर उन्हें एक संकरा रास्ता दिखाई पड़ा। उस रास्ते को पार करके वे एक शानदार जगह पर जा पहुँचे।

वास्तव में यह पाताल में बौनों का शहर था। उन्होंने वहाँ ढेर सारी हरी घास और अंडों का अम्बार देखा। ये अंडे बौने चोरों ने पक्षियों के घोंसलों से चुराए थे।

मलक्कावासियों ने उन अंडों को वहाँ से चुराया और अपने घर ले आए। इसके बाद वे जब भी मौका पाते, उस पाताल-गुफा में घुस जाते, अंडों को चुराते और मलक्का लौट आते।

लेकिन एक दिन अंडे चुराते हुए उन्हें बौनों ने पकड़ा लिया।

“तुम लोग कौन हो? और हमारे अंडे क्योंल चुरा रहे हो?” बौनों ने पूछा।

“हम पृथ्वीवासी हैं। लेकिन आप कौन हैं ? आपके पूर्वज कौन थे ?” मलक्का वालों ने पूछा।

“हम भी अपने पूर्वजों के वंशज हैं। लेकिन आप आगे से हमारे अंडे नहीं चुरा सकते ।” बौनों ने कहा।

“इसके लिए तुम लोगों को हमारे साथ नृत्य करना होगा।” मलक्कावासी बोले, “अगर हम जीते तो अंडे ले जाएँगे और अगर आप जीते तो हम आगे कभी यहाँ नहीं आएँगे।”

बौने सहमत हो गए।

नृत्य-प्रतियोगिता शुरू हो गई। दोनों जाति के लोग कई दिनों तक लगातार नाचते रहे।

अंत में, मलक्कार वाले हार गए। अतः वे अपने गाँव को लौट आए।

बौनों ने तब गुफा के आगे सुपारी का एक पेड़ उगा दिया और उसका मुँह पत्थरों से बंद कर दिया।

तब से मलक्का के लोग पाताल में उतरने का रास्ता भूल गए और कभी वहाँ नहीं जा पाए।