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Andhra Pradesh ki Lok Kathayen-1 (आंध्र प्रदेश की लोक कथाएँ-1)

चटोरी भानुमती: आंध्र प्रदेश की लोक कथा

वारंगल के समीप एक छोटे से गांव में रामलिंग नाम का एक किसान रहता था। उसकी पत्नी को मरे हुए दो साल हो गए थे। घर में काम करने वाला कोई न था। अतः उसे भानुमती को नौकरानी रखना पड़ा।

भानु एक अच्छी नौकरानी थी। घर की साफ सफाई पशुओं का भोजन कपड़े बर्तन आदि सँभालने में निपुण थी। समस्या केवल एक ही थी। वह बहुत चटोरी थी।

अक्सर रसोईघर में छिपकर कुछ न कुछ खाती रहती थी। रामलिंग ने उसे एक-दो बार रंगे हाथों पकड़ा पर भानु पर कोई असर नहीं हुआ। वह साफ झूठ बोलकर बच निकलती। अंत में तंग आकर रामलिंग ने उससे कहा, ‘अगर आज के बाद मैंने तुम्हें चोरी से कोई चीज खाते पकड़ लिया तो नौकरी से निकाल दूंगा।

नौकरी जाने के भय से भानु थोड़ा सँभल गई। एक दिन रामलिंग अच्छी नस्ल का ‘जहाँगीर’ आम लाया। उसका दोस्त अनंत आने वाला था। उसने भानुमती को बुलाया-सुनो इस आम का छिलका उतारकर टुकड़ों में काट दो। दोनों दोस्त मजे से खाएँगे।”

भानुमती को आम बेहद पसंद थे। मन को लाख समझाने के बावजूद वह रुक न सकी। आम के टुकड़े चखते-चखते पूरा आम ही खत्म हो गया। तभी रामलिंग की आवाज सुनाई दी, ‘भानुमती, आम काटकर ले आ। अनंत आता ही होगा।’

अब तो भानुमती की आँखों के आगे अँधेरा आ गया। उसे नौकरी जाने की चिंता होने लगी। तभी उसे एक योजना सूझी। उसने रामलिंग से कहा, मालिक चाकू की धार बना दो। आम का छिलका बारीक नहीं उतर रहा।

रामलिंग चाकू की धार बनाने लगा। दरवाजे पर अनंत आ पहुँचा। भानुमती उसे एक कोने में ले जाकर बोली, ‘लगता है मालिक तुमसे नाराज हैं। चाकू की धार बनाते-बनाते बुड़बुड़ा रहे थे कि ‘आज तो अनंत की नाक ही काट दूँगा।’

अनंत ने भीतर से झाँककर देखा। रामलिंग मस्ती में गाना गुनगुनाते हुए चाकू तेज कर रहा था। बस फिर क्या था, अनंत सिर पर पाँव रखकर भागा।

भानुमती ने रामलिंग से कहा, ‘मालिक आपका दोस्त मुझसे आम छीनकर भाग गया।’

रामलिंग चाकू हाथ में लिए, अनंत के पीछे तेजी से भागा। अनंत और भी तेज दौड़ने लगा। रामलिंग चिल्ला रहा था-

‘रुक तो जा भई, कम से कम आधा काट के दे जा।’

अनंत ने सोचा कि रामलिंग आधी कटी नाक माँग रहा है। वह बेचारा दोबारा कभी उस तरफ नहीं आया। रामलिंग भी थक-हारकर लौट आया।

स्वादिष्ट आम हजम कर जाने वाली भानुमती अगली चोरी की तैयारी में जुट गई।

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Andhra Pradesh ki Lok Kathayen-2 (आंध्र प्रदेश की लोक कथाएँ-2)

मलण्णा का बैल: आंध्र प्रदेश की लोक कथा

मलण्णा किसान का बैल खो गया। अब बैल जैसे जीव को खोजा भी कैसे जाए ? बेचारे किसान ने जमीन- आसमान एक कर दिया।

कुछ दिन की तंगी के बाद मलण्णा ने पत्नी से कहा-

‘अरी भाग्यवान ! बैल के बिना हल नहीं चलेगा, हल नहीं चला तो खेती नहीं होगी, खेती नहीं हुई तो अनाज कहाँ से आएगा, अनाज न आया तो पेट कैसे भरेगा ?’

मलण्णा की पत्नी बेहद चतुर थी। पति से बोली, ‘बैल तो खरीद ही लेते हैं परंतु तुम ठहरे बुद्धूराम । मैं भी साथ चलूँगी।’

मलण्णा को क्या आपत्ति हो सकती थी। दोनों बैल खरीदने जा पहुँचे। मेले में घूमते-घूमते मलण्णा की पत्नी ने अपना बैल पहचान लिया। चोर महाशय बैल बेचने आए थे। मलण्णा ने बैल पर अपना दाबा जताया तो अच्छी खासी बहस हो गई। चोर अपनी बात पर अड़ा था। बार-बार यही कहता था-

‘तुम्हारा बैल मेरे बैल का हमशक्ल होगा।’

तभी मलण्णा की पत्नी ने बैल की आँखें ढाँपकर कहा-

‘यदि यह तुम्हारा बैल है तो जल्दी बताओ, यह किस आँख से काना है ?’

चोर ने चतुराई दिखाई और झट से बोला, ‘इसकी बाईं आँख खराब है।’

‘अच्छी तरह सोच लो, पछताओगे।’ मलण्णा की पत्नी बोली। अब तो चोर बौखला गया। बैल तो चुरा लिया था पर उसकी शक्ल अच्छी तरह नहीं देख पाया था। वह तो बुरा फँसा। अनुमान से बोला-

‘नहीं-नहीं, इसकी तो दाईं आँख खराब है।’

मलण्णा ने सारे बाजार को बुला लिया। सबके सामने बैल की आँखों के आगे से हाथ हटाया गया। बैल की दोनों आँखें ठीक-ठाक थीं। चोर रंगे हाथों पकड़ा गया। उसकी जमकर पिटाई हुई। मलण्णा और उसकी पत्नी अपने खोए हुए बैल को लेकर खुशी-खुशी घर लौटे।

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Andhra Pradesh ki Lok Kathayen-3 (आंध्र प्रदेश की लोक कथाएँ-3)

कालहस्ती मंदिर की कथा: आंध्र प्रदेश की लोक कथा

कहते है कि नील और फणेश नाम के दो भील लड़के थे। उन्होंने शिकार खेलते समय वन में एक पहाड़ी पर भगवान शिव की लिंग मूर्ति देखी। नील उस मूर्ति की रक्षा के लिए वही रूक गया और फणीश लौट आया।

नील ने पूरी रात मूर्ति का पहरा इसलिए दिया ताकि कोई जंगली पशु उसे नष्ट न कर दे। सुबह वह वन में चला गया। दोपहर के समय जब वह लौटा तो उसके एक हाथ में धनुष, दूसरें में भुना हुआ मांस, मस्तक के केशो में कुछ फूल तथा मुंह में जल भरा हुआ था। उसके हाथ खाली नहीं थे, इसलिए उसने मुख के जल से कुल्ला करके भगवान को स्नान कराया। पैर से मूर्ति पर चढ़े पुराने फूल व पत्ते हटाए। बालों में छिपाए फूल मूर्ति पर गिराए तथा भुने हुए मांस का टुकडा भोग लगाने के लिए रख दिया।

दूसरे दिन नील जब जंगल गया तो वहां कुछ पुजारी आए। उन्होंने मंदिर को मांस के टूकड़ों से दूषित देखा। उन्होंने मंदिर की साफ सफाई की तथा वहां से चले गए। इसके बाद यह रोज का क्रम बन गया। नील रोज जंगल से यह सब सामग्री लाकर चढ़ाता और पुजारी उसे साफ कर जाते। एक दिन पुजारी एक स्थान पर छिप गए ताकि उस व्यक्ति का पता लगा सके, जो रोज रोज मंदिर को दूषित कर जाता है।

उस दिन नील जब जंगल से लौटा तो उसे मूर्ति में भगवान के नेत्र दिखाई दिए। एक नेत्र से खून बह रहा था। नील ने समझा कि भगवान को किसी ने चोट पहुंचाई है। वह धनुष पर बाण चढ़ाकर उस चोट पहुंचाने वाले व्यक्ति को ढूंढने लगा। जब उसे कोई नही मिला तो वह कई प्रकार की जड़ी बूटियां ले आया तथा वह भगवान की आंख का उपचार करने लगा।

परंतु रक्त धारा बंद न हुई। तभी उसे अपने बुजुर्गों की एक बात याद आई, “मनुष्य के घाव पर मनुष्य का ताजा चमड़ा लगा देने से घाव शीघ्र भर जाता है”। नील ने बिना हिचक बाण की नोक घुसाकर अपनी एक आंख निकाली तथा उसे भगवान के घायल नेत्र पर रख दिया।

मूर्ति के नेत्र से रक्त बहना तत्काल बंद हो गया। छिपे हुए पुजारियों ने जब यह चमत्कार देखा तो वह दंग रह गए। तभी मूर्ति की दूसरी आंख से रक्त धारा बहने लगी। नील ने मूर्ति की उस आंख पर अपने पैर का अंगूठा टिकाया ताकि अंधा होने के बाद वह टटोलकर उस स्थान को ढ़ूंढ़ सके। इसके बाद उसने अपना दूसरा नेत्र निकाला तथा उसे मूर्ति की दूसरी आंख पर लगा दिया।

तभी वह स्थान अलौकिक प्रकाश से भर गया। भगवान शिव प्रकट हो गए, तथा उन्होंने नील का हाथ पकड़ लिया। वे नील को अपने साथ शिवलोक ले गए। नील का नाम उसी समय से कण्णप्प (तमिल में कण्ण नेत्र को कहते है) पड़ गया। पुजारियों ने भी भगवान तथा भोले भक्त के दर्शन किए तथा अपने जीवन को सार्थक किया।

कण्णप्प की प्रशंसा में आदि शंकराचार्य जी ने एक श्लोक में लिखा है—”रास्ते में ठुकराई हुई पादुका ही भगवान शंकर के अंग झाड़ने की कूची बन गई। आममन (कुल्ले) का जल ही भगवान का दिव्याभिषेक जल हो गया और मांस ही नैवेद्य बन गया। अहो! भक्ति क्या नहीं कर सकती? इसके प्रभाव से एक जंगली भील भी भक्तबतंस (भक्त श्रेष्ठ) बन गया”।।

मंदिर में मुख्य स्थान पर भगवान शिव की लिंग रूप मूर्ति है। यही वायुतत्व लिंग है। इसलिए पुजारी भी इसका स्पर्श नहीं करते। मूर्ति के पास स्वर्णपट्ट स्थापित है, उसी पर माला इत्यादि चढ़ाकर पूजा की जाती है। इस मूर्ति में मकड़ी, हाथी तथा सर्प के दांतों के चिन्ह स्पष्ट दिखाई देते है। कहा जाता है कि सबसे पहले मकड़ी, हाथी तथा सर्प ने भगवान शिव की आराधना की थी। उनके नाम पर ही श्री कालहस्तीश्वर नाम पड़ा है। श्री का अर्थ है मकड़ी, काल का अर्थ सर्प तथा हस्ती का अर्थ है हाथी।

घी सड़ गया: आंध्र प्रदेश की लोक कथा

यदि हम आंध्रप्रदेश की बात करते हैं तो हैदराबाद का नाम अवश्य आएगा। यदि हैदराबाद का नाम लिया जाए तो नवाब मीर उस्मान अली खाँ का नाम भी लेना पड़ेगा।

उनके शासन में हैदराबाद ने बहुत अच्छे दिन देखे। उस्मानिया विश्वविद्यालय, हाईकोर्ट, पुस्तकालय आदि अनेक भव्य भवन उन्होंने बनवाए।

हैदराबाद में एक सागर भी बनवाया, जो कि निजाम सागर के नाम से जाना जाता है। निजाम साहब अपने निजी जीवन में बेहद कंजूस थे। कोई भी छोटा-सा खर्च करने से पहले घंटों हिसाब लगाते। उनके वस्त्र जब तक तार-तार न हो जाते, वे रफू करके काम चलाते।

कहते हैं कि वह उस समय संसार के सबसे अधिक पैसे वालों में एक थे। सोना, चाँदी, हीरे-जवाहरात, रुपए-पैसे का अमूल्य भंडार था किंतु कजूसी का भी अंत न था।

अक्सर वह मेहमानों के सामने भी अपने छोटेपन पर उतर आते। किसी की बहुमूल्य और खूबसूरत वस्तु हथिया लेना उन्हें बेहद प्रिय था। किसी भी समारोह में भेंट ले जाने के बजाए, बह भेंट लेकर लौटते।

वह भेंट में प्राप्त उन वस्तुओं को तिजोरी में बंद करवा देते। वह उन महाकंजूसों में एक थे, जिनके लिए कहा गया है कि-

‘चमडी जाए पर दमड़ी न जाए’

एक दिन दतिया के महाराजा उनसे मिलने आए। निजाम ने बातों ही बातों में जान लिया कि दतिया में शुद्ध घी बहुत अच्छा मिलता है। बस अब क्या था, उसी समय हुक्म हुआ- ‘हमारे लिए शुद्ध घी अवश्य भिजवाएँ।’

दतिया के महाराज भला कैसे इंकार करते? शीघ्र ही घी से भरे कनस्तर निजाम के दरवाजे पर थे। घी को गोदाम में बंद करवा दिया गया। निजाम ने न तो स्वयं खाया और न ही किसी को खाने दिया।

कुछ दिन बीत गए। घी सड़ने लगा। निजाम को खबर दी गई किंतु उसने परवाह नहीं की। जब वह बदबू असहनीय हो गई तो वजीर ने पुन: फरियाद की किंतु निजाम ने जीवन में कभी भी हार नहीं मानी थी। उन्होंने कहा-‘जाओ, उस घी को मंदिरों और बाजारों में बेच दो।’

वजीर की तो आफत ही आ गई। बदबूदार सड़ा घी भला कौन खरीदता? उसने सोचा कि यदि घी न बिका तो निजाम भड़क जाएगा, इसलिए, उसने सारा घी एक नाले में फिंकवा दिया और अपनी ओर से रुपए लेकर निजाम के पास पहुँचा।

‘जी हजूर, यह लीजिए रकम। वह घी तो मंदिर के पुजारियों ने हाथों-हाथ खरीद लिया।’

निजाम की बाँछें खिल गईं। वजीर ने उस काम के एवज में तरक्की पाई।

देखा बच्चो, कंजूसी कितनी बड़ी बला है। हमें ऐसा नहीं बनना चाहिए।

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Andhra Pradesh ki Lok Kathayen-4 (आंध्र प्रदेश की लोक कथाएँ-4)

ईश्वर बड़ा है: आंध्र प्रदेश की लोक कथा

बहुत समय पहले की बात है। किसी नगर में एक भिखारी रहता था। सुबह होते ही अपना चोगा और कमंडल तैयार करता तथा निकल पड़ता। वह हर दरवाजे पर जाकर एक ही आवाज लगाता-

‘देने वाला श्री भगवान, हम सब हैं उसकी संतान।’

भिखारी का नाम था ‘कृपाल’। उसे जो कुछ भी मिल जाता, वह उसी से संतुष्ट हो जाता। उसका एक मित्र जगन्नाथ भी भीख माँगता था। वह दरवाजे पर जाकर हाँक लगाता-

‘देने वाला है महाराज, यही दिलवाएगा भोजन आज।’

कृपाल और जगन्नाथ भीख माँगने के लिए राजा के महल में भी जाते थे। राजा प्राय: दोनों की आवाज सुनता था। वह दोनों को ही भीख देता था किंतु वह आजमाना चाहता था कि दोनों में से किसकी बात सच हैं? इंसान को सब कुछ देना, भगवान के हाथ में है या महाराज के हाथ में है?

एक दिन महाराज ने एक तरकीब निकाली। उन्होंने एक बड़ा-सा पपीता लिया । उसका एक टुकड़ा काटकर उसके भीतर सोने के सिक्के भर दिए। टुकडे को ज्यों का त्यों जोड़ दिया। तभी कृपाल भीख माँगने आ पहुँचा।

राजा ने उसे दाल-चावल दिलवाकर विदा किया। जगन्नाथ खंजड़ी बजाता आया और हाँक लगाई-

‘देने वाला है महाराज, वही दिलवाएगा भोजन आज।’

महाराज ने सिक्कोंम से भरा हुआ वह पपीता उसके हवाले कर दिया। जगन्नाथ ने वह पपीता दो आने में एक सब्जी वाले की दुकान पर बेच दिया। मिले हुए पैसों से उसने भोजन का जुगाड़ कर लिया। भला पपीता उसके किस काम आता?

थोड़ी देर बाद कृपाल सब्जी वाले की दुकान के आगे से निकला। उसने मीठी आवाज में अपनी बात दोहराई। सब्जी वाले ने वह पपीता उसे दे दिया। कृपाल उसे दुआएँ देता हुआ घर लौट आया।

घर आकर उसने पपीता काटा तो सिक्के देखकर वह आश्चर्यचकित हो उठा। उसने तुरंत सिक्के उठाए और सब्जी वाले के पास पहुँच गया। उसके सिक्केश देकर कहा, ‘भाई, यह तुम्हारे पपीते में से निकले हैं। इन पैसों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है।’

सब्जी वाला भी ईमानदार था। वह बोला, ‘यह पपीता तो मुझे जगन्नाथ बेच गया था। तब तो यह सिक्केव भी उसी के हैं।’

जगन्नाथ ने सिक्के देखकर कहा, ‘ये तो महाराज के हैं। वह पपीता मुझे भीख में वहीं से मिला था।’

महाराज तीनों व्यक्तियों और सिक्कों को देखकर हैरान हो गए। सारी कहानी सुनकर उन्हें विश्वास हो गया कि इंसान को ईश्वर पर ही विश्वास करना चाहिए। वही सबको देने वाला है। राजा ने तीनों को यथायोग्य उपहार देकर विदा किया। हाँ, उसी दिन से कृपाल के साथ-साथ जगन्नाथ भी कहने लगा-

‘देने वाला श्री भगवान, हम सब उसकी हैं संतान’

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Andhra Pradesh ki Lok Kathayen-6 (आंध्र प्रदेश की लोक कथाएँ-6)

जिंदा भूत: आंध्र प्रदेश की लोक कथा

एक दिन राजू के मन में आया कि लोगों को भूत बनकर डराया जाए। वह सांस रोकर बैठ गया । उसकी पत्नी ने उसको हिलाया-डुलाया लेकिन राजू चुपचाप आंख बंद किए बैठा रहा। “हे भगवान! लगता है ये सचमुच मर गए।” वह रोती हुई बाहर निकली और पास-पड़ोस वालों को बुला लाई। राजू उसी तरह बिना सांस लिए, बिना हिले-डुले बैठा था। पड़ोसियों ने भी समझा कि राजू मर गया है। “अब इसका दाह संस्कार करना चाहिए,” वे बोले।

वे राजू को लेकर नदी किनारे आए। उसे लकड़ियों के ढेर पर लेटा दिया। फिर उसके ऊपर और लकड़ियां रख दीं। राजू ने जब देखा कि पड़ोसी चिता में आग लगाने जा रहे हैं तो वह लकड़ियां फेंककर उठ खड़ा हुआ। जब पड़ोसियों ने राजू को इस तरह उठकर खड़ा होते देखा तो, भूत… भूत…” चिल्लाते हुए गांव की तरफ़ भागे। राजू उनके पीछे रुको… रुको…” कहते हुआ भागा। गांव पहुंचकर वे बोले, “राजू मरकर भूत बन गया है और गांव की तरफ़ आ रहा है।” इतना सुनना था कि सारे गांववाले अपने घरों में घुस गए और दरवाज़े बंद कर लिए। जब राजू गांव में पहुंचा तो वहां सन्नाकटा छाया था। राजू अपने घर की तरफ़ चल दिया। राजू की पत्नी नागम्मा ने भी सुन लिया था कि उसका पति भूत बन गया है। उसने भी जल्दी से घर का दरवाज़ा बंद करके कुंडा लगा लिया। घर पहुंचकर राजू बोला, “नागम्मा दरवाज़ा खोलो, मैं राजू हूं।”

“तुम राजू नहीं राजू के भूत हो। कृपा करके यहां से चले जाओ। मैं तुम्हारा बहुत अच्छी तरह से श्राद्ध कर दूंगी और ब्राह्मणों को भोजन भी करवाऊंगी। बस, तुम यहां से चले जाओ।” राजू दरवाज़ा खटखटाता रहा पर नागम्मा ने दरवाज़ा नहीं खोला।

‘अप्पा। अब मैं क्या करूं। मेरी पत्नी भी मेरा विश्वास नहीं कर रही कि मैं भूत नहीं हूं।’ राजू ने सारे दिन से कुछ नहीं खाया था। अब उसे बहुत ज़ोर की भूख लगी थी। ‘मुझे कौन भोजन देगा? जब मेरी पत्नी भी मुझे भूत समझ रही है।’ वह चलते-चलते गांव के मंदिर पहुंचा। ‘चलो रात यहीं काट लेता हूं। सुबह जब पुजारी प्रसाद चढ़ाने आएगा तो उससे प्रसाद लेकर खा लूंगा।’ राजू मूर्ति के पीछे छिपकर बैठ गया और पुजारी की प्रतीक्षा करने लगा।

रात बीती, सुबह हुई । गांववालों ने धीरे से दरवाज़े खोले और बाहर झांका। राजू का भूत कहीं दिखाई नहीं दिया। सब लोग घरों से बाहर आ गए और अपने काम-धंधों में लग गए। पुजारी भी प्रसाद बनाने लगा। प्रसाद बनाया, बड़े बनाए, लड्डू बनाए। फिर सारा प्रसाद एक थाली में सजाकर मंदिर की तरफ़ चल दिया। मंदिर में पहुंचकर उसने प्रसाद की थाली एक ओर रख दी, फिर कुएं से बाल्टी निकाली और मंदिर धोने लगा। तभी राजू मूर्ति के पीछे से निकला और बोला,“स्वामी आज आपने बड़ी देर कर दी। मैं कब से आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूं।” इतना सुनना था कि पुजारी बाल्टी पटककर गांव की तरफ़ भागा। उसके पीछे-पीछे राजू, “स्वामी… स्वामी…” कहता हुआ। गांववालों ने जब राजू को पुजारी के पीछे आते देखा तो फिर से घरों में घुस गए और दरवाज़े बंद कर लिए। राजू एक बार फिर अपने घर गया लेकिन नागम्मा ने दरवाज़ा नहीं खोला।

राजू मंदिर में लौट आया और पुजारी जो प्रसाद लाया था, उसे खाकर अपनी भूख मिटाई। पेट भर जाने के बाद राजू ने अपनी तरफ़ देखा। उसकी वेष्टि फट गई थी, शरीर धूल-मिट्टी से सना था, बाल बिखरे थे। “लोग ठीक ही मुझे भूत समझते हैं, मेरी हालत तो देखो!” वह बोला। ‘सबसे पहले रमैया धोबी से साफ़ कपड़े मांगकर पहनना होगा।’ ऐसा सोचकर राजू नदी किनारे पहुंचा। रमैया धोबी अभी आया नहीं था। राजू कपड़े धोने की भट्टी में छिपकर बैठ गया।

उस दिन राजा का कोतवाल घोड़े पर बैठकर गांव का निरीक्षण करने आया था। उसने देखा कि गांववाले बजाय अपना काम-धंधा करने के, घरों में बैठे हैं। उसने दरवाज़ा खटखटाकर गांववालों को बाहर बुलाया और पूछा, “काम-धंघे के समय तुम लोग घरों में क्यों बैठे हो?”

“राजू चरवाहा मरकर भूत बन गया है और गांव में घूम रहा है। उसके डर से हम घरों में बैठे हैं।” गांववालों ने उत्तर दिया।

“कोई भूत-वूत नहीं होता। चलो सब लोग अपना-अपना काम शुरू करो,” कोतवाल ने डांटा। सब लोग एक बार फिर घरों से निकलकर अपने-अपने काम पर लग गए। रमैया धोबी भी घाट की तरफ़ चल दिया। कोतवाल को अपने कपड़े धुलवाने थे इसलिए वह भी घोड़े पर सवार नदी की तरफ़ चल दिया। जैसे ही दोनों घाट पर पहुंचे, राजू भट्टी में उठकर खड़ा हो गया और बोला, “अरे रमैया अप्पा, कहां थे अब तक? मैं कब से भट्टी में बैठा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हूं।” इतना सुनना था कि रमैया सिर पर पैर रखकर गांव की ओर भागा। कोतवाल भी सरपट घोड़ा दौड़ाता गांव से दूसरी तरफ भागा। गांववाले फिर घरों में घुस गए।

राजू ने धोबी के कपड़ों में से एक साफ़ वेष्टि और एक क़मीज़ निकाली। फिर नदी में जाकर नहाया, साफ़ कपड़े पहने और अपने घर की तरफ़ चल दिया।

घर पहुंचकर उसने दरवाज़ा खटखटाया और बोला, “नागम्मा दरवाज़ा खोलो। मैं भूत नहीं हूं। अरे जब मैं मरा ही नहीं तो भूत कैसे बन सकता हूं?”

“हमने तुम्हें मरा हुआ देखा था,” नागम्मा अंदर से बोली। “न तुम सांस ले रहे थे, न हिल-डुल रहे थे।”

“मैं समझा था कि मैं मर रहा हूं इसलिए मैं सांस रोककर बिना हिले- डुले लेट गया था।” राजू ने कहा। “असल में एक यात्री ने मुझे एक सूत का धागा दिया था और कहा था जिस दिन यह धागा खो जाएगा, उस समय, मैं मरने वाला हूं। तुम दरवाज़ा खोलकर देखो तो। मैं मरा नहीं हूं, जीवित हूं।”

नागम्मा ने धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला। सामने राजू नहाया-धोया, साफ़ वेष्टि और क़मीज़ पहने खड़ा था। ‘यह भूत नहीं लग रहा,’ नागम्मा ने सोचा। फिर उसने हाथ बढ़ाकर राजू को छुआ और ज़ोर से चिकोटी काटी। “अप्पा!” राजू चिल्ला।या। नागम्मा समझ गई कि राजू भूत नहीं है। उसने जल्दी से दरवाज़ा खोलकर उसे अंदर कर लिया। उसे भरपेट खाना खिलाया। राजू खा-पीकर सो गया। नागम्मा गांव की तरफ़ चल दी सबको बताने के लिए कि राजू भूत नहीं है।

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Andhra Pradesh ki Lok Kathayen-5 (आंध्र प्रदेश की लोक कथाएँ-5)

नागपंचमी और नाग: आंध्र प्रदेश की लोक कथा

श्रावण मास में पंचमी के दिन नाग पंचमी का त्यौहार आता है। इस दिन नागों की पूजा की जाती है। उसे गरुड़ पंचमी भी कहते हैं। इस त्यौहार वाले दिन खेतों में हल चलाना, सब्जी काटना आदि कार्य नहीं किए जाते, इसके पीछे एक कथा है।

कहते हैं कि बहुत वर्षों पूर्व किसी गाँव में एक किसान रहता था। नागपंचमी के दिन वह खेत में हल जोतने गया। कुछ देर काम करने के पश्चात वह आराम करने बैठ गया। उसका आठ वर्षीय पुत्र भी वहीं आ पहुँचा। दोनों पिता-पुत्र बातें करने लगे।

किसान ने हल उठाया और काम करने लगा। पुत्र की मीठी और तोतली बातों में वह इस कदर खो गया कि उसे साँप की बाँबी भी दिखाई नहीं दी।

उसकी लापरवाही के कारण साँप के छोटे-छोटे बच्चे हल की नोक से कुचले गए। थोड़ी देर बाद साँप वापस आया तो वह अपने मरे हुए बच्चों को देख फुफकारने लगा। पास ही हल पड़ा था। हल की नोक पर लगे खून के कारण उसने हत्यारे को पहचान लिया। किसान और उसका पुत्र साँप के काटने से मारे गए। साँप का क्रोध तब भी शांत न हुआ।

वह किसान के घर जा पहुँचा। किसान की पत्नी नागदेवता की पूजा में मग्न थी। साँप ने सोचा कि पूजा समाप्त होने पर ही वह उसे काटेगा।

पास ही पूजा की भोग सामग्री पड़ी थी। भूखे साँप ने वह सारा दूध पी लिया। किसान की पत्नी ने पूजा के बाद आँखें खोलीं तो साक्षात्‌ साँप को सामने देखकर प्रणाम किया।

अब साँप उसे कैसे काटता? उसने साफ शब्दों में बता दिया कि वह क्रोध में अंधा होकर उसके पति और बच्चे को जान से मार आया है।

किसान की पत्नी रो-रोकर क्षमा-याचना करने लगी। साँप ने मन-ही-मन सोचा- मेरे बच्चे तो किसान द्वारा गलती से मारे गए हैं। किंतु मैं तो जान-बूझकर उन दोनों को मारने का पाप कर आया हूँ।

उसने किसान की पत्नी से कहा- ‘शीघ्र चलो, मैं तुम्हारे पति और पुत्र का सारा विष चूसकर उन्हें जीवित कर देता हूँ।’

किसान की पत्नी उसके साथ खेत की ओर भागी। साँप ने दोनों मृत शरीरों से सारा विष चूस लिया। कुछ ही देर में किसान और उसका पुत्र आँखें मलते हुए उठ बैठे। सबने मिलकर साँप को नमस्कार किया और साँप ओझल हो गया। बस तभी से वह प्रथा चली आ रही है।

बच्चो, यह लोककथा हमें संदेश देती है कि जो भी काम करो, पूरा ध्यान लगाकर करो। जरा-सी लापरवाही भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है।