Categories
Arunanchal Pradesh ki Lok Kathayen Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Arunanchal Pradesh ki Lok Kathayen-3 (अरुणाचल प्रदेश की लोक कथाएँ-3)

नागकन्या: अरुणाचल प्रदेश की लोक-कथा

बहुत पहले भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक गांव था मिसमा। वहां एक अनाथ मछुआरा रहता था ताराओन । एक दिन वह मछली पकड़ने गया । उस दिन मछली के स्थान पर एक नाग उसके जाल में फंस गया । दरअसल, वह नाग, नागलोक का राजा था | अपने पिता को जाल में फंसा देखकर नागकन्या घबराई। उसने सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर लिया । वह ताराओन के पास पहुंचकर बोली-“यदि तुम मेरे पिताजी को छोड़ दोगे तो मैं तुमसे विवाह कर लूंगी ।”

युवक मान गया और उसने नाग को छोड़ दिया। नागकन्या ने उससे विवाह कर लिया।

ताराओन और नागकन्या का विवाह गांव वालों को नहीं भाया । उन्होंने विवाह की खबर राजा को दे दी। राजा ने ताराओन को बुलाकर कहा-“तुमने हमारी परम्पराओं को तोड़ा है, तुम्हें दंड मिलेगा । कल सुबह तुम्हारे और मेरे मुर्गे में लड़ाई होगी, जो हारेगा, उसे गांव छोड़कर जाना होगा।“

युवक डर गया। उसने घर आकर सारी बातें पत्नी को बताई । नागकन्या बोली-“इसमें इतना डरने की क्या बात है ? मैं अभी नागलोक से एक बलवान मुर्गा ले आती हूं।” यह कहकर वह नाग लोक चली गई। कुछ देर बाद वह मुर्गा लेकर आ गई ।

दूसरे दिन राजा और युवक के मुर्गे आपस में भिड़ गए । नागलोक का मुर्गा अधिक बलवान था इसलिए राजा का मुर्गा हार गया, परन्तु वह बोला, “ताराओन ! इससे फैसला नहीं हो पाया है। अतः कल सुबह जो टोकरी नदी को उलटी दिशा में बहा देगा, वही विजयी होगा।”

ताराओन के लिए लोहित नदी के बहाव को उलटी दिशा में मोड़ना असंभव था। उसने यह बात नागकन्या को बताई। उसने पति को ढांढस बंधाया-“डरो नहीं ! मेरे पिताजी तुम्हारी मदद करेंगे।” वह अपने पिताजी के पास गई । नागकन्या ने अपने पति की परेशानी बताई। पिता ने उसे सुंदर टोकरी दी। कहा-“टोकरी को नदी में डालते ही, धारा उलटी दिशा में बहने लगेगी।’ नागकन्या अपने घर पहुँची। उसने ताराओन को सारी बातें बता दीं ।

ताराओन ने टोकरी नदी में डुबो दी| इस पर तुरन्त नदी का बहाव उलटकर राजा के महल तक पहुंच गया । ताराओन खुशी से झूम उठा । वह राजा से बोला-“राजन ! मैं जीत गया हूँ । शर्त के अनुसार आपको यह गांव छोड़कर चले जाना चाहिए।’

राजा कहां हार मानने वाला था ? वह बोला, “इस निर्णय को भी अंतिम नहीं माना जाएगा । अब हमें युद्ध करना चाहिए। इसी युद्ध से निर्णय होगा ।”

ताराओन भागा-भागा अपनी पत्नी के पास पहुँचा और सारी बातें बताईं। राजा के पास बड़ी फौज थी परन्तु ताराओन तो अकेला था । नागकन्या उसकी परेशानी सुनकर फिर नागलोक में पहुंची। वहां से वह सोने का ढोल और उसे बजाने की छड़ी ले आई।

सुबह राजा अपनी फौज के साथ लड़ाई के लिए आया। ताराओन पहले से ही तैयार था । राजा और फौज को देखकर नागकन्या ढोल बजाने लगी ! ढोल की ढम-ढम सुनकर वृक्ष, जानवर, घास-पत्ते आदि नाचने लगे।

राजा और सैनिक भी हथियार फेंककर झूमने लगे।

अब ताराओन और उसकी पत्नी नागकन्या गांव के राजा-रानी बन गए । आज भी अरुणाचल के वंशज ताराओन जनजाति के नाम से जाने जाते हैं।

Categories
Arunanchal Pradesh ki Lok Kathayen Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Arunanchal Pradesh ki Lok Kathayen-2 (अरुणाचल प्रदेश की लोक कथाएँ-2)

कौन है पति ?: अरुणाचल प्रदेश की लोक-कथा

तामांग अरुणाचल की प्रसिद्ध जनजाति अपातानी के मुखिया की बेटी थी। देखने में गोरी-गोरी, हंसती आंखों वाली तामांग के सुनहरे बालों को देखकर जनजाति के लोग उसे सूरज देवता की बेटी मानते थे।

तामांग गायन-नृत्य के साथ-साथ हथकरघे पर वस्त्र बनाने में भी बहुत निपुण थी। इसलिए उसका पिता डोनीगर्थ अपनी इकलौती बेटी का डिंग सिल, आचू आब्यों या ट्यूबो लिओबा जैसे देवपुरुषों में से किसी एक से विवाह करके धन कमाना चाहता था! उनकी जनजाति का यही रिवाज था कि लड़केवाले लड़की के पिता को लड़की ब्याहने के लिए धन देते थे। उस दिन अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों में महिलाओं के लिए हथकरघा के वस्त्र बनाने की प्रतियोगिता हुई, और उसके बाद पुरुषों के लिए तीर-कमान की प्रतियोगिता हुई।

हर वर्ष की तरह तामांग को प्रथम पुरस्कार मिला। इस वर्ष तो तामांग ने कमाल कर दिया था। आकाश से नीले रंग की रेशमी शॉल पर चांद, सूरज और तारे, सफ़ेद, सुनहरे, लाल और गुलाबी रंग में बुने थे। चारों तरफ़ नक्षत्रों की झालर बुनकर शॉल को सजाया था। विश्वास ही नहीं होता था कि यह बुनी हुई शॉल है। लगता था कि कुशल चित्रकार ने सुंदर तस्वीर बनाई हो।

उधर आबूतानी नामक युवक ने तो तीर-कमान के कमाल से उड़ते हुए नक़ली पंछी, तितलियों के ऐसे निशाने साधे कि और कोई उसके आसपास भी नहीं रह पाया। प्रतियोगिता के बाद हुए नृत्य में तामांग और आबूतानी पहली बार मिले, और पहली मुलाक़ात में ही एक-दूसरे को चाहने लगे। उनको नृत्य करते देख लोग भी कह उठे, “क्या सुंदर जोड़ी है!”

बाद में वे चुपके-चुपके मिलते। क्योंकि दोनों को पता था कि तामांग के पिता किसी भी तरह दोनों के विवाह के लिए मंजूरी नहीं देंगे। इसलिए उन दोनों ने चुपके से विवाह कर लिया।

एक दिन तामांग के पिता ने उसे बताया कि तीन देवपुरुष उससे विवाह करना चाहते हैं। तामांग ने बताया कि उसका विवाह हो चुका है। पिता ने कहा कि वह ऐसे विवाह को नहीं मानता, न ही वे तीनों देवपुरुष मानेंगे। वह उनको नाराज़ नहीं कर सकता। इसलिए एक ही उपाय है। “क्या पिताजी?” तामांग ने पूछा। “सबको एकत्रित करके शर्त रखेगा। जो शर्त पूरी करेगा, वही तुम्हारा पति होगा।” तीनों देवपुरुष और आबूतानी को बुलाया गया। पहली शर्त है कि चारों को ज़मीन पर इस तरह नृत्य करना या कूदना होगा कि ज़मीन से संगीत ध्वनि आए।

शर्त सुनकर आबूतानी और तामांग परेशान हुए। पर आबूतानी की बहन ने कहा, “चिंता मत करो।” जहां आबूतानी को नृत्य करना था उसने वहां ‘तालो’ यानी पीतल की तश्तरियां मिट्टी के नीचे दबा दीं। नृत्य प्रारंभ हुआ। तीनों देवपुरुषों के नृत्य प्रारंभ हुए। तीनों देवपुरुषों के अनेक बार उछल-कूद करने पर भी कोई आवाज़ नहीं आई। आबूतानी ने जैसे ही नृत्य प्रारंभ किया, हर पदन्यारस के बाद टन-टन की आवाज़ ने तार दिया। आबूतानी जीत गया।

पर पिता और तीनों देवपुरुष नहीं माने। एक और शर्त रखी गई। तीर-कमान से ‘टंलो’ यानी धातु के गोलाकार पर निशाना ऐसे साधना कि तीर वहीं ‘टंलो” पर लगा रहे। इस बार भी आबूतानी की बहन ने उपाय बताया। उसने आबूतानी के तीरों की नोक पर मधुमक्खी के छत्ते से निकाली गई मोम लगाई।

पहले देवपुरुष ने निशाना साधा। उसका तीर ‘टंलो’ पर जाने से पहले ही गिर गया। दूसरे देवपुरुष ने भी तीर कसा, पर निशाना चूका। वह टंलो के पास से गुज़र गया। तीसरे देवपुरुष ने तीर ‘टंलो’ पर सही मारा। टन की आवाज़ भी हुई, पर तीर नीचे गिर गया। आख़िर में आबूतानी ने तीर मारा। वह सीधा ‘टंलो’ के मध्य में लगा और वहीं पर लगा रहा। यह शर्त भी आबूतानी ने जीत ली। “अब आख़री शर्त होगी अगर वह आबूतानी जीता तो वही होगा तुम्हारा पति।” तामांग के पिता और तीनों देवपुरुष बोले।

“यह तो बेईमानी है। हर बार आबूतानी के जीतने पर ‘और एक शर्त! कहकर मुझे और आबूतानी को जुदा करने की कोशिश करते हो।” तामांग क्रोधित होकर बोली। गांव के बाकी लोगों ने तामांग का साथ दिया। लोगों का गुस्सा देखकर तामांग का पिता और देवपुरुष बोले, “अब वाक़ई में यह आख़री शर्त होगी।”

जो कोयले के टुकड़ों तथा मिट्टी के कुलड़े को सबसे दूर फेंकेगा, वही तामांग का पति होगा।

तामांग ने इस बार अपनी बुद्धि से काम लिया। उसने आबूतानी के कुलड़े के अंदर शहद लगा दिया और अपनी पालतू मधुमक्खियों को कोयले के चूरे से लथपथ कर दिया।

एक-एक करके तीनों देवपुरुषों ने कुलड़े फेंके और बाद में कोयले के टुकड़े। अब बारी आई आबूतानी की। उसने पूरे ज़ोर से मिट्टी का कुलड़ा दूर फैका जो तीनों के कुलड़ों से अधिक दूर गिरा। फिर उसने… मधुमक्खियों को मुट्ठी में पकड़कर हवा में फँका। शहद की ख़ुशबू से कुलड़े तक पहुंचीं, जबकि देवपुरुषों के कोयले के टुकड़े उनके कुलड़ों तक भी नहीं गए। लोगों ने आबूतानी की जय-जयकार करी। “कल सुबह इसी जगह तामांग का विवाह मैं आबूतानी से रचाऊंगा। सब लोग निमंत्रित हैं।” तामांग के पिता ने ऐलान किया।

सुबह दुल्हन के वेश में तामांग जब मैदान में पहुंची, तब हैरान हो गई। आबूतानी के रूप में चार जने खड़े थे। यह भी चाल थी।

“पहचानो कौन है पति, और उसे माला पहनाओ,” तामांग के पिता ने कहा।

तामांग ने थोड़ी देर आंखें मीची। फिर बोली, “मैं सबसे पहले हाथ मिलाऊंगी और फिर ही माला पहनाऊंगी।”

“बहुत खूब,” तीनों देवपुरुष खुश होकर बोले। पर तामांग ने देखा, असली आबूतानी चुप खड़ा था। पहले देवपुरुष से जब तामांग ने हाथ मिलाया तो उसने ज़ोर से दबाया और आंख मारी। तामांग ने गुस्से से हाथ छुड़ाया। दूसरे देवपुरुष के पास पहुंचकर तामांग ने मिलाने के लिए हाथ बढ़ाया तो वह इतना पगला गया कि बांहें पसारकर आगे बढ़ने लगा। तामांग खिसककर निकल गई। तभी तीसरे देवपुरुष ने उतावला होकर हाथ आगे बढ़ाया और तामांग का हाथ पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से हिलाने लगा। बड़ी मुश्किल से तामांग ने अपना हाथ छुड़ाया। अब वह चौथे यानी असली आबूतानी के पास पहुंची। उसने आबूतानी से हाथ मिलाया। उसके परिचित स्पर्श तथा उसकी आंखों से छलकते प्यार से वह निश्चित हुई। उसे पूरा विश्वास हुआ और उसने आबूतानी को वरमाला पहनाई। तामांग के पिता और तीनों देवपुरुष शर्म से गर्दन झुकाए लोगों की झिड़कियां सुनते रहे। लोगों ने ख़ुशी से पुष्पवर्षा करके विवाह की रस्म पूरी कर दी।

Categories
Arunanchal Pradesh ki Lok Kathayen Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story

Arunanchal Pradesh ki Lok Kathayen-1 (अरुणाचल प्रदेश की लोक कथाएँ-1)

आर्किड के फूल: अरुणाचल प्रदेश की लोक-कथा

आर्किड और आर्किड जैसे सुन्दर फूलों के सम्बन्ध में लोगों में अनेक प्रकार के विश्वास और किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं।

कहते हैं कि किसी समय एक बड़ा नेक और ईमानदार राजा राज्य करता था। उसके राज्य में ऊँचे-ऊँचे पहाड़, घने जंगल, हरे-भरे बगीचे, कल-कल करती नदियाँ और सुन्दर-सुन्दर पशु-पक्षी थे। राजा अपनी प्रजा का बहुत ध्यान रखता था। अतः उसकी प्रजा बहुत सुखी थी। उसके राज्य में किसी चीज की कमी नहीं थी।

राजा का परिवार बहुत छोटा था-एक रानी और एक राजकुमारी | राजा के कोई बेटा नहीं था। अतः रानी और राज्य के महामन्त्री, सेनापति, राजगुरु आदि ने राजा को सुझाव दिया कि वह दूसरा विवाह कर ले, किन्तु राजा ने उनकी बात नहीं मानी। राजा रानी को बहुत प्यार करता था और किसी भी कीमत पर दूसरा विवाह करना नहीं चाहता था।

धीरे-धीरे कई वर्ष बीत गए।

राजा का जीवन बहुत सुखी था। उसकी बेटी अब बड़ी हो गई थी। राजकुमारी भी अपनी माँ के समान सहृदय, कोमल और अद्वितीय सुन्दरी थी। उसके रूप और सौन्दर्य की चर्चा आसपास के राज्यों में होने लगी थी। राजा के पास आसपास के राजाओं ने अपने राजकुमारों के विवाह प्रस्ताव भेजने आरम्भ कर दिए थे। लेकिन राजकुमारी अभी विवाह की इच्छुक नहीं थी, अतः राजा ने किसी भी विवाह प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया था।

राजकुमारी का महल बहुत शानदार था। उसके महल के पीछे एक हरा-भरा बगीचा था। इस बगीचे में बहुत सुन्दर-सुन्दर वृक्ष थे, जिन पर बड़े स्वादिष्ट फल लगते थे। राजकुमारी प्रतिदिन प्रातःकाल अपनी सखियों के साथ महल के पीछे बगीचे में आ जाती थी और तेज धूप निकलने के पहले तक यहीं रहती थी। तेज धूप होते ही वह महल में आ जाती थी। बगीचे में टहलना राजकुमारी का सबसे प्रिय शौक था।

राजकुमारी के महल के बगीचे में एक बावड़ी थी। इसका पानी बहुत साफ और स्वादिष्ट था। महल के लोग इसी बावड़ी का पानी पीते थे। बगीचे में टहलते-टहलते जब राजकुमारी थक जाती थी तो इसी बावड़ी की मुँडेर पर बैठकर आराम करती थी।

एक दिन प्रातःकाल का समय था। राजकुमारी हमेशा की तरह महल के पीछे के बगीचे में टहल रही थी। उसके साथ उसकी दो सखियाँ भी थीं। अचानक राजकुमारी को लगा कि कहीं आसपास बहुत दुर्गन्ध  है। उसने अपनी सखियों से दुर्गन्धी आने की बात कही और बावड़ी की मुँडेर पर आकर बैठ गई। मुँडेर पर बैठते ही राजकुमारी की तबियत और खराब हो गई और वह अचेत हो गई।

राजकुमारी के अचेत होते ही दोनों सखियाँ घबरा गईं। उन्होंने किसी तरह राजकुमारी को सँभाला और उसे उठाकर महल के भीतर ले आईं।

राजकुमारी की एक सेविका ने राजकुमारी के अचेत होने की ख़बर राजा को दी। राजा उस समय दरबार में था। उसे जैसे ही राजकुमारी के अचेत होने का समाचार मिला तो वह राजवैद्य को लेकर राजकुमारी के महल में आ गया।

राजवैद्य ने राजकुमारी का परीक्षण किया। उसकी समझ में बस इतना आया कि राजकुमारी की बेहोशी का कारण कोई दुर्गन्ध  है। राजकुमारी की सखियों ने भी राजा के सामने राजवैद्य को बताया कि राजकुमारी ने अचेत होने से पहले दुर्गन्धर की शिकायत की थी।

राजा ने यह बात मालूम होते ही अपने कई सैनिकों को बुलाया और उन्हें दुर्गन्धन का कारण मालूम करने के लिए राजकुमारी के बगीचे में भेजा।

सैनिकों ने बगीचे का चप्पा-चप्पा छान मारा, लेकिन उन्हें कुछ भी नहीं मिला। अचानक एक सैनिक की दृष्टि मरे हुए एक मोटे-तगड़े अधखाए चूहे पर पड़ी। इस चूहे से हल्की-हल्की दुर्गन्ध भी आ रही थी। सम्भवतः रात को बिल्ली अथवा कोई पक्षी चूहा ले आया होगा और आधा खाकर राजकुमारी के बगीचे में छोड़ गया होगा।

सेवकों ने तुरन्त जाकर राजा को खबर दी।

राजा ने शहर के बाहर चूहे को जलाकर जमीन में गाड़ने का हुक्म दिया और राजकुमारी के सिर पर स्नेह से हाथ फेरने लगे। दोपहर हो चुकी थी और राजकुमारी अभी तक अचेत थी।

धीरे-धीरे एक सप्ताह हो गया।

राजकुमारी को अभी तक होश नहीं आया था। राजवैद्य उसे तरह-तरह की औषधियाँ दे रहे थे, लेकिन उस पर किसी भी औषधि का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। राजा-रानी और राज्य के सभी लोग बहुत दुखी थे और राजकुमारी के शीघ्र होश में आने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे।

इसी तरह एक सप्ताह और बीत गया। लेकिन राजकुमारी को होश नहीं आया। इस मध्य राजवैद्य ने अपने राज्य के अन्य वैद्यों तथा पड़ोसी राज्यों के वैद्यों को भी बुलाकर उनसे परामर्श किया और राजकुमारी को बहुत प्रभावशाली औषधियाँ दीं, लेकिन सभी औषधियाँ बेअसर रहीं। राजा और रानी दो सप्ताह से राजकुमारी के पास ही बैठे हुए थे। उनसे राजकुमारी की हालत देखी नहीं जा रही थी। राजकुमारी बिना कुछ खाए पिए दो सप्ताह से अचेत पड़ी थी। राजवैद्य और उसके साथी वैद्यों की औषधियों को बेअसर होता देखकर राजा-रानी की चिन्ता बढ़ती जा रही थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें और क्या न करें।

इसी तरह एक महीना बीत गया। राजकुमारी अभी भी अचेत थी। उसका सुन्दर गुलाबी चेहरा पीला पड़ गया था एवं आँखों के चारों ओर कालिमा-सी छा गई थी। राजा-रानी, राजवैद्य और उसके साथी वैद्य सभी हिम्मत हार चुके थे। अब सभी को केवल ईश्वर का सहारा रह गया था।

एक विशाल कक्ष के मध्य पड़े पलंग पर राजकुमारी निर्जीव-सी पड़ी थी। उसके पास रानी और राजा बैठे थे। राजकुमारी से कुछ दूरी पर खड़े राजवैद्य, महामन्त्री, सेनापति, राजपुरोहित आदि आपस में राजकुमारी की बीमारी के सम्बन्ध में विचार-विमर्श कर रहे थे। अचानक महामन्त्री के मस्तिष्क में एक विचार आया।

महामन्त्री तुरन्त अपने स्थान से उठा और राजा के पास पहुँचकर हाथ बाँधकर खड़ा हो गया। महामन्त्री ने राजा को सुझाव दिया कि वह अपने राज्य में और आसपास के राज्यों में यह डुग्गी पिटवा दें कि जो व्यक्ति राजकुमारी को ठीक कर देगा उसे सोने की एक लाख मोहरें पुरस्कार में दी जाएँगी।

राजा को महामन्त्री का यह सुझाव अच्छा लगा। उसने इस सुझाव को और भी आकर्षक बनाते हुए महामन्त्री से कहा कि वह यह डुग्गी पिटवा दे कि जो व्यक्ति राजकुमारी को ठीक कर देगा उसे आधा राज्य पुरस्कार में दिया जाएगा।

महामन्त्री ने राजा की आज्ञा पाकर अपने राज्य में और आसपास के राज्यों में यह डुग्गी पिटवा दी और पुरस्कार में आधे राज्य की घोषणा कर दी।

अगले दिन से ही एक से एक बढ़कर अनुभवी वैद्य आने लगे। वे आधे राज्य के लालच में अच्छी से अच्छी औषधि राजकुमारी को देते, किन्तु कोई लाभ नहीं होता। अन्त में वे वापस लौट जाते।

यह क्रम पन्द्रह दिन तक चलता रहा । एक लम्बा समय बीत चुका था। राजकुमारी अभी भी अचेत थी। उसकी स्थिति में अंशमात्र भी सुधार नहीं हुआ था। राजा-रानी, महामन्त्री, सेनापति, राजवैद्य, राजपुरोहित सभी निराश हो चुके थे। अब राजकुमारी के ठीक होने की कोई आशा नहीं रह गई थी।

प्रात:काल का समय था।

अचानक एक सेवक ने राजकुमारी के महल में प्रवेश किया और बताया कि एक परदेशी युवक आया है। उसका दावा है कि वह राजकुमारी को ठीक कर देगा।

राजा को आशा की एक किरण दिखाई दी। उसने सैनिक को आदेश दिया कि वह पूरे सम्मान के साथ नवयुवक को ले आए। सैनिक ने राजा की आज्ञा का पालन किया और नवयुवक को महल के भीतर ले आया।

राजा ने नवयवुक को देखा तो देखता ही रह गया। नवयुवक बीस-बाईस वर्ष की आयु का था। वह राजकुमारों के समान सौम्य और सुन्दर था। नवयुवक के चेहरे पर अजीब-सा आकर्षण और आत्मविश्वास था। राजा के साथ ही राजा के आसपास के लोग भी नवयुवक को बड़े ध्यान से देख रहे थे।

नवयुवक ने सर्वप्रथम राजा और रानी का अभिवादन किया और इसके बाद उनसे पूरी बात बताने को कहा। राजा के स्थान पर राजकुमारी की सहेली ने नवयुवक को राजकुमारी के महल के बगीचे में घूमने और दुर्गन्धन आने से लेकर अचेत होने तक की कहानी सुना दी।

नवयुवक पूरी बात ध्यान से सुनता रहा। इसके बाद उसने राजकुमारी को बगीचे में ले चलने के लिए कहा।

राजा ने नवयुवक से कुछ नहीं कहा। उसने राजकुमारी की सेविकाओं को आदेश दिया कि बगीचे में राजकुमारी के लिए आरामदायक बिस्तर लगाया जाए और फिर राजकुमारी को बगीचे में पहुँचाया जाए।

राजा की आज्ञा का तुरन्त पालन हुआ और बगीचे में शानदार बिस्तर लगा दिया गया। इसके बाद चार सेविकाओं ने राजकुमारी को उठाकर बगीचे में पहुँचा दिया।

नवयुवक ने राजकुमारी का बिस्तर एक वृक्ष के नीचे लगवाया था।

बसन्तक के दिन थे। प्रातःकाल की हल्की-हल्की धूप बहुत अच्छी लग रही थी। राजकुमारी एक वृक्ष के नीचे लगे बिस्तर पर अचेत पड़ी थी। उसके चारों ओर राजा-रानी और राज्य के अन्य लोग खड़े थे। सभी की दृष्टि नवयुवक पर थी।

अचानक नवयुवक ने दोनों आँखें बन्द करके अपने हाथ आसमान की ओर उठाए और कुछ बुदबुदाने लगा। सम्भवतः वह ईश्वर की प्रार्थना कर रहा था। इसके बाद उसने अपने कपड़ों के भीतर से एक बाँसुरी निकाली और बजाने लगा।

बाँसुरी की आवाज में दैवीय आनन्द था । उसकी आवाज में ऐसा जादू था कि सभी खो गए।

अचानक एक चमत्कार हुआ । राजकुमारी जिस वृक्ष के नीचे लेटी थी वह सुगन्धित फूलों से भर उठा और उसके फूल राजकुमारी पर गिरने लगे।

अब नवयुवक बगीचे में घूम-घूमकर बाँसुरी बजाने लगा। वह बाँसुरी बजाते हुए जिस वृक्ष के नीचे से गुजरता वह वृक्ष फूलों से लद जाता।

इसी समय राजकुमारी को होश आ गया। वह उठकर बैठ गई और बगीचे में चारों ओर फैले हुए फूलों को आश्चर्य से देखने लगी। इसके पहले राजकुमारी अथवा किसी ने भी ऐसे फूल नहीं देखे थे।

राजा-रानी और राज्य के सभी लोग खुश हो गए। वे राजकुमारी के हालचाल पूछने लगे और नवयुवक को कुछ देर के लिए भूल से गए। जब उन्हें नवयुवक की याद आई तो वह जा चुका था। राजा और उसके सेवकों ने नवयुवक को ढूँढ़ने का बहुत प्रयास किया, किन्तु वह नहीं मिला।

अगले दिन सभी ने देखा। राज्य के सारे वृक्षों पर रंग-बिरंगे फूल खिले थे और उनकी सुगन्ध से पूरा वातावरण महक रहा था।

कहते हैं कि यह नवयुवक प्रतिवर्ष बसन्त में बाँसुरी बजाता हुआ निकलता है, उसकी बाँसुरी की आवाज से सभी वृक्ष फूलों से लद जाते हैं और चारों ओर मोहक सुगन्ध फैल जाती है।