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Assam ki Lok Kathayen-9 (असम की लोक कथाएँ-9)

तेजीमाला की वापसी : असमिया लोक-कथा

तेजीमाला की माँ का देहांत हुए बहुत समय बीत गया था। नदी के किनारे बने सुंदर घर में वह अपने पिता बसंत के साथ रहती थी। एक दिन उसके पिता एक गाँव में विवाह की दावत में गए। वहाँ से लौटे तो तेजीमाला की दूसरी माँ मिनती उनके साथ थी।

मिनती ने तेजीमाला को गोद में खींचकर ढेर-सा प्यार दिया। बसंत निश्चिंत हो गए कि मिनती उनकी बेटी का पूरा-पूरा ध्यान रखेगी। बसंत के बाहर जाते ही मिनती ने धम्म से तेजीमाला को गोद से पटक दिया और मुँह बनाकर बोली-

‘दैया रे दैया! इतनी बड़ी होकर भी बाप से लाड़ लड़ाती है।’

तेजीमाला चुपचाप उठकर घर के काम-काज में लग गई। उसने समझ लिया कि मिनती उसे प्यार नहीं करती। फिर भी उसने पिता से कुछ नहीं कहा।

दिन बीतते गए। बसंत के बाहर जाते ही मिनती अपने असली रूप में आ जाती। एक दिन धान की कोठरी के पास काला साँप दिखाई पड़ा। देखते ही देखते साँप ओझल हो गया।

मिनती ने बहाने से तेजीमाला को सारा दिन धान की कोठरी के बाहर बिठाए रखा ताकि साँप निकले और उसे डस ले। परंतु तेजी का भाग्य अच्छा था। वह बच गई।

उसके पिता दूर स्थानों की यात्रा करके व्यवसाय करते थे। कई बार उन्हें महीनों घर से बाहर रहना पड़ता था। उनके सामने मिनती तेजी को बहुत प्यार से पुकारती।

‘तेजी बिटिया, जरा इधर तो आना।’

जब बसंत नहीं होता तो सौतेली माँ अपनी कर्कश आवाज में पुकारती, ‘अरी कलमुँही! कहाँ मर गई?’

तेजीमाला के घर के बाहर रंगीन पत्तियों वाला वृक्ष था। वह वहाँ बैठकर रोती रहती। एक दिन एक सुंदर युवक उनके घर आया। वह उसके पिता के मित्र का इकलौता बेटा था। उसने तेजीमाला के आगे विवाह का प्रस्ताव रखा। मिनती ओट से उनकी बातें सुन रही थी। वह झट से सामने आई और हाथ नचाकर बोली-

‘क्यों री तेजीमाला, मक्खी की तरह क्या  मँडरा रही है। चल करघे पर कपड़ा बुनने बैठ।’

बेचारा युवक अपना-सा मुँह लेकर लौट गया। अब मिनती को एक और चिंता सताने लगी। यदि तेजीमाला का विवाह होगा तो उसे बहुत-सा दहेज देना पड़ेगा।

क्यों न तेजी को जान से मार दिया जाए? न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी।

बस यह विचार आते ही उसने तेजी को मारने की योजना बना ली। अगले दिन उसने तेजीमाला के खाने में जहरीला कीड़ा डाल दिया। तेजी ने खाना खाया परंतु उसे कुछ न हुआ।

सौतेली माता का गुस्सा साँतवें आसमान पर जा पहुँचा। उसने तेजीमाला को ढेंकी में धान डालने को कहा। बेचारी लड़की चुपचाप काम कराने लगी। मिनती ने जोर से मूसल का वार किया तो तेजी का हाथ कुचल गया। वह दर्द के मारे तिलमिला उठी। मिनती हँसकर बोली-

‘इतनी-सी चोट से घबराते नहीं हैं, चल दूसरे हाथ से डाल।’

इस तरह उसने तेजीमाला का दूसरा हाथ भी कुचल दिया। फिर घबराकर कहने लगी, ‘देख, शायद ढेंकी में कुछ चमक रहा है?’

ज्यों ही तेजीमाला सिर झुकाकर देखने लगी। माँ ने उसका सिर भी कुचल दिया। तेजी ने कुछ ही देर में तड़पकर दम तोड़ दिया। मिनती ने उसकी लाश, घर के बगीचे में गाड़ दी। कुछ दिन में वहाँ कड़बी मोटी मिर्च का पौधा उग आया।

एक राहगीर उसे तोड़ने लगा तो पौधे में से आवाज आई-

‘मिनती माँ ने दुश्मनी निभाई, तेजीमाला ने जान गँवाई।’ सौतेली माँ ने यह आवाज सुनी तो उसने वह पौधा ही उखाड़ दिया। जिस जगह पर उसे फेंका था, कुछ दिनों बाद वहाँ कद्दू की बेल लग गई।

वह पौधा भी बोलता था। मिनती ने डर के मारे आधी रात को बेल उखाड़ी और नदी में फेंक दी। वह पौधा नदी में जाकर कमल का फूल बन गया।

संयोगवश तेजी के पिता नाव से लौट रहे थे। कमल का फूल देखा तो सोचा कि तेजी के लिए ले चलें। ज्यों-ही फूल को हाथ लगाया तो उसमें आवाज आई-

‘मिनती माँ ने दुश्मनी निभाई, तेजीमाला ने जान गँवाई।’

बसंत काँप उठे। घर पहुँचते ही पत्नी से पूछा, ‘तेजीमाला कहाँ है?’ मिनती ने झूठ बोला, ‘वह मेरी माँ के घर गई है।’

बसंत ने कमल का फूल हाथ में लेकर कहा-

‘मुझको सारा हाल बता जा

तेजी, असली रूप में आ जा’

पिता की प्यार-भरी आवाज सुनते ही तेजीमाला फूल में से बाहर आ गई। उसकी सारी बातें सुनकर बसंत ने मिनती को धक्के दे-देकर निकाल दिया।

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Assam ki Lok Kathayen-8 (असम की लोक कथाएँ-8)

लालच बुरी बला : असमिया लोक-कथा

आसाम के एक गाँव में तोराली नाम की लड़की रहती थी। गोरा रंग, माथे पर लाल बिंदिया व हाथों में चाँदी की चूडियाँ खनकाती तोराली सबको प्रिय थी। बिहुतली रंगमंच पर उसका नृत्य देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबा लेते।

एक दिन उसके पिता के पास अनंत फुकन आया। वह उसी गाँव में रहता था। उसने तोराली के पिता से कहा, ‘मैं आपकी लड़की से विवाह करना चाहता हूँ।’

फुकन के पास धन-दौलत की कमी न थी। तोराली के पिता ने तुरंत हामी भर दी।

सुबाग धान (मंगल धान) कूटा जाने लगा। तोराली, अनंत की पत्नी बन गई। कुछ समय तो सुखपूर्वक बीता किंतु धीरे-धीरे अनंत को व्यवसाय में घाटा होने लगा। देखते ही देखते फुकन के घर में गरीबी छा गई।

तोराली को भी रोजी-रोटी की तलाश में घर से बाहर निकलना पड़ता था। इस बीच उसने पाँच बेटों को जन्म दिया। एक दिन पेड़ के नीचे दबने से फुकन की आँखें जाती रहीं। तोराली को पाँचों बेटों से बहुत उम्मीद थी। वह दिन-रात मेहनत-मजदूरी करती। गाँववालों के धान कूटती ताकि सबका पेट भर सके।

तोराली भगवान से प्रार्थना करती कि उसके बेटे योग्य बनें किंतु पाँचों बेटे बहुत अधिक आलसी थे।

उन्हें केवल अपना पेट भरना आता था। माता-पिता के कष्टों से उनका कोई लेना-देना नहीं था।

तोराली ने मंदिर में ईश्वर से प्रार्थना की कि उसे एक मेहनती व समझदार पुत्र पैदा हो। परंतु उसने बालक की जगह एक साँप को जन्म दिया। जन्म लेते ही साँप जंगल में चला गया। तोराली अपनी फूटी किस्मत पर रोती रही।

तोराली के पाँचों बेटे उसे ताना देते-

‘तुम माँ हो या नागिन, एक साँप को जन्म दिया।’

फुकन के समझाने पर भी लड़कों के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आया। कोई-कोई दिन ऐसा भी आता जब घर में खाने को कुछ न होता। पाँचों बेटे तो माँग-मूँगकर खा आते। फुकन और तोराली अपने छठे साँप बेटे को याद करके रोते।

एक रात तोराली को सपने में वही साँप दिखाई दिया। उसने कहा, ‘माँ, मेरी पूँछ सोने की है। मैं रोज घर आऊँगा। तुम मेरी पूँछ से एक इंच हिस्सा काट लिया करना। सोने को बेचकर घर का खर्च आराम से चलेगा।’

तोराली ने मुँह पर हाथ रखकर कहा, ‘ना बेटा, अगर मैं तुम्हारी पूँछ काटूँगी तो तुम्हें पीड़ा होगी।’

“नहीं माँ, मुझे कोई दर्द नहीं होगा।’ साँप ने आश्वासन दिया और लौट गया।

वही सपना तोराली को सात रातों तक आता रहा। आठवें दिन सचमुच साँप आ पहुँचा। तोराली ने कमरा भीतर से बंद कर लिया। डरते-डरते उसने चाकू से पूँछ पर वार किया। सचमुच उसके हाथ में सोने का टुकड़ा आ गया। साँप की पूँछ पर कोई घाव भी नहीं हुआ। माँ से दूध भरा कटोरा पीकर साँप लौट गया।

तोराली ने वह सोना बेचा और घर का जरूरी सामान ले आई। शाम को खाने में पीठा व लड्डू देखकर लड़के चौंके। तोराली ने झूठ बोल दिया कि उनके नाना ने पैसा दिया था।

इसी तरह साँप आता रहा और तोराली घर चलाती रही। उसका झूठ ज्यादा दिन चल नहीं सका। बेटों ने जोर डाला तो तोराली को पैसों का राज बताना ही पड़ा। बड़ा लड़का दुत्कारते हुए बोला, ‘मूर्ख माँ, यदि हमारे साँप-भाई की पूरी पूँछ सोने की है तो ज्यादा सोना क्यों  नहीं काटती?’

छोटा बोला, ‘हाँ, इस तरह तो हम कभी अमीर नहीं होंगे। रोज थोड़े-थोड़े सोने से तो घरखर्च ही पूरा पड़ता है।’

तोराली और फुकन चुपचाप बेटों की बातें सुनते रहे। बेटों ने माँ पर दबाव डाला कि वह कम-से-कम तीन इंच सोना अवश्य काटे ताकि बचा हुआ सोना उनके काम आ सके।

तोराली के मना करने पर उन्होंने उसकी जमकर पिटाई की। बेचारा अंधा फुकन चिल्लाता ही रहा। रोते-रोते तोराली ने मान लिया कि वह अगली बार ज्यादा सोना काटेगी। अगले दिन साँप बेटे ने दरवाजे पर हमेशा की तरह आवाज लगाई-

दरवाजा खोलो, मैं हूँ आया

तुम्हारे लिए सोना हूँ लाया

क्या तुमने खाना, भरपेट खाया?

सदा की तरह तोराली ने भीतर से ही उत्तर दिया-

मेरा बेटा जग से न्यारा

माँ के दुख, समझने वाला

क्या हुआ गर इसका है रंग काला

साँप भीतर आया, तोराली ने उसे एक कटोरा दूध पिलाया, बेटों की मार से उसका अंग-अंग दुख रहा था। उसने नजर दौड़ाई, पाँचों बेटे दरारों से भीतर झाँक-झाँककर उसे जल्दी करने को कह रहे थे।

तोराली ने चाकू लिया और पूँछ का तीन इंच लंबा टुकड़ा काट दिया। अचानक चाकू लगते ही पूँछ से खून की धार बह निकली। साँप बेटा तड़पने लगा और कुछ ही देर में दम तोड़ दिया। तोराली, बेटे की मौत का गम मनाती रही और बेटों को अपने लालच का फल मिल गया।

हाँ, वह तीन इंच टुकड़ा भी तीन घंटे बाद माँस का टुकड़ा बन गया।

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Assam ki Lok Kathayen-7 (असम की लोक कथाएँ-7)

एक थी सरुमा : असमिया लोक-कथा

असम के ग्वालपाड़ा जिले में एक नदी के किनारे लक्ष्मीनंदन साहूकार रहता था। घर में पत्नी व एक बच्ची सरुमा के सिवा कोई न था। परंतु भाग्य पर किसका बस चला है?

तीन दिन के बुखार में ही सरुमा की माँ के प्राण जाते रहे। लक्ष्मीनंदन ने सरुमा को बहुत समझाया परंतु बच्ची दिन-रात माँ के लिए रोती रहती।

लक्ष्मीनंदन के चाचा ने उपाय सुझाया, ‘क्यों न तुम दूसरा ब्याह कर लो, बच्ची को माँ भी मिल जाएगी। तुम्हारा घर भी सँवर जाएगा।’ साहुकार ने सोच-विचारकर दूसरे विवाह का फैसला कर लिया।

सरुमा की सौतेली माता का स्वभाव अच्छा न था। साहूकार को राजा के काम से कुछ महीने के लिए बाहर जाना पड़ा। उसके घर से निकलते ही माँ ने सरुमा के हाथ में मछली पकड़ने की टोकरी थमाकर कहा,

‘चल अच्छी अच्छी खावाई मछलियां पकड़ कर ला।’

बेचारी छोटी-सी सरुमा को मछलियाँ पकड़नी नहीं आती थीं। वह नदी किनारे बैठकर रोने लगी। तभी पानी में हलचल हुई और एक सुनहरी मछली ने पानी से सिर निकाला।

‘सरुमा बिटिया, मैं तुम्हारी माँ हूँ। तुम रोती क्यों हो?’

उसकी बात सुनकर मछली ने उसे खाने को भोजन दिया और उसकी टोकरी मछलियों से भर दी।

विमाता को पता लगा तो उसने सरुमा का नदी पर जाना बंद करवा दिया। एक दिन चिलचिलाती धूप में उससे बोली, ‘चलो, सारे बाग को पानी दो।’

भूखी-प्यासी सरुमा पेड़ के नीचे बैठी रो रही थी। उसकी मरी हुई माँ एक तोते के रूप में आई। उसने सरुमा को मीठे-मीठे फल खाने को दिए और रोज आने को कहा।

विमाता तो सरुमा को भोजन देती नहीं थी। सरुमा रोज पेड़ के नीचे बैठ जाती और तोता उसे मीठे-मीठे फल खिलाता।

सौतेली माँ ने यह बात सुनी तो वह पेड़ ही कटवा दिया। सरुमा का बाग में जाना भी बंद हो गया।

फिर उसकी माँ एक गाय के रूप में आने लगी। सौतेली माँ ने देखा कि सरुमा तो दिन-रात मोटी हो रही है। उसने पता लगाया कि एक गाय रोज सरुमा को अपना दूध पिलाती है।

सौतेली माँ ने गाय को मारने की कोशिश की परंतु गाय उसे ही सींग मारकर भाग गई।

वह गुस्से से आग-बबूला हो गई। सरुमा पर कड़ी नजर रखी जाने लगी। कुछ दिन बाद उसने देखा कि सरुमा घर के पिछवाड़े खेती में से टमाटर तोड़कर खाती है।

उसने वह पौधा बेरहमी से उखाड़ दिया। सरुमा को एक कमरे में बंद कर दिया। भोली-भाली सरुमा को उसने पीने के लिए पानी तक न दिया। सरुमा की माँ ने एक चूहे का रूप धारण किया। उस अँधेरे कमरे में वह सरुमा के सामने जा पहुँची! आँखों में आँसू भरकर बोली-

सरुमा मत रो, मैं आई हूँ

तेरे लिए भुने कराई (अनाज का मिश्रण) लाई हूँ

सरुमा ने जी भरकर कराई खाया ओर मां द्वारा लाया गया पानी पिया। बंद कमरे में भी सरुमा फल-फूल रही है, यह देखकर सौतेली माँ ने उसे जान से मारने का निश्चय कर लिया। साहूकार के लौटने में चार दिन की देर थी। सरुमा की माँ ने उसे ऐसे वस्त्र दे दिए, जिसे पहनकर वह सुरक्षित हो गई।

उन वस्त्रों पर तलवार के वार का असर नहीं होता था। सौतेली माता का हर वार खाली गया। साहुकार लौटा तो सरुमा के लिए बहुत-सा सामान लाया। वह सरुमा को पुकारने लगा। तभी कमरे में से आवाज आई।

‘अगर सरुमा के प्राण बचाना चाहो तो नई माँ को धक्के देकर निकालो’

लक्ष्मीनंदन ने सरुमा से सारी पिछली बातें सुनीं तो उसे पत्नी पर बड़ा गुस्सा आया। ज्यों-ही वह बाजार से लौटी तो लक्ष्मीनंदन ने उसे घर में घुसने नहीं दिया। वह रोती-कलपती अपनी माँ के घर लौट गई।

सरुमा अपने पिता के साथ सुख से रहने लगी। उस दिन के बाद माँ की आत्मा फिर नहीं आई।

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Assam ki Lok Kathayen-6 (असम की लोक कथाएँ-6)

अनमोल राय : असमिया लोक-कथा

बहुत समय पहले की बात है, सिलचर के समीप एक गाँव में जयंत फुकन रहता था। उसके माता-पिता बहुत अमीर थे। अत: उसे पैसे की कोई कमी न थी।

एक दिन वह चाचा के पोते की शादी में दूर गाँव गया। विवाह के पश्चात्‌ वह वहीं रुक गया। अगले दिन वह हाट में गया। वहाँ की रौनक देखकर उसे बड़ा मजा आया।

शाम होते ही सभी दुकानदार लौटने लगे किंतु एक व्यक्ति चुपचाप दुकान लगाए बैठा था। जयंत ने हैरानी से पूछा, ‘अरे भई, तुम घर नहीं जाओगे?!

वह दुकानदार मायूसी से बोला, ‘मेरी सलाह नहीं बिकी, उसे बेचकर ही जाऊँगा।’

‘कौन-सी सलाह, कैसी सलाह?’

‘पहले कीमत तो चुकाओ।’ दुकानदार ने हाथ नचाते हुए कहा।

‘कितने पैसे लगेंगे?’ जयंत ने लापरवाही से पूछा।

‘एक सलाह का एक हजार रुपया लगेगा, मेरे पास दो ही हैं।’

दुकानदार ने व्यस्तभाव से कहा।

उसकी बात सुनकर जयंत को हँसी आ गई। भला सलाह भी खरीदी जाती है? परंतु जाने जयंत के मन में क्या आया, उसने दो हजार रुपए गिनकर उसके सामने रख दिए।

दुकानदार हिल-हिलकर बोला-

काँटेदार बाड़ न लगाना

घरवाली को राज न बताना

नहीं तो पीछे पड़ेगा पछताना।

जयंत ने उसकी सलाह याद कर ली! घर पहुँचा तो पत्नी दरवाजे पर खड़ी मिली। बाग का माली भी वहीं था। वह माली से दरवाजे के ऊपर बाड़ लगवा रही थी। जयंत को नई-नई सलाह याद थी। उसने पत्नी को वह बाड़ लगाने से मना किया। दो हजार रुपए वाली बात भी बताई। उसकी पत्नी खिलखिलाकर हँस दी।

‘मान गए आपको, कोई भी घड़ी-भर में मूर्ख बना जाता है। अरे, इतने रुपए पानी में बहा आए। मेरे लिए जेवर बनवा देते।’ जयंत चुपचाप भीतर आ गया। उसे अपनी गलती पर क्रोध आ रहा था। ठीक ही तो कहा पत्नी ने, दो हजार रुपए गँवा दिए।

उस रात जयंत को सोते-सोते विचार आया, ‘क्यों न, इन सलाहों को आजमाया जाए।’

उसने एक सूअर के बच्चे का सिर काटकर जंगल में छिपा दिया। फिर खून से सना चाकू, पत्नी को दिखाकर बोला, ‘अरी, मुझसे एक आदमी का खून हो गया है, तू किसी से कहना मत, वरना आफत आ जाएगी।’

जयंत की पत्नी के पेट में बात पचना आसान न था। वह मटका लेकर पनघट पर जा पहुँची। वहाँ वह अपने पति की बहादुरी की डींगें हाँकने लगी। एक सखी ने ताना दिया, ‘अरी सोनपाही, बहुत बड़ाइयाँ कर रही है। ऐसा कौनसा बड़ा काम कर दिया तेरे पति ने?’

जयंत की पत्नी सोनपाही ने पीछे हटना नहीं सीखा था। बात में नमक-मिर्च लगाकर, उसने शान से सबको बताया कि जयंत ने एक आदमी का खून करके उसकी लाश जंगल में छिपा दी है।

शाम होते-होते पूरे गाँव में यह खबर फैल गई। जयंत खेत से लौट रहा था। लोग उसे देखते और हाय राम! जान बचाओ। कहकर भाग खड़े होते।

जयंत कुछ समझ नहीं पाया। अगले दिन राजा का बुलावा आ पहुँचा। हड़बड़ाहट में जयंत घर से निकला। दरवाजे की कंटीली बाड़ में उसके सिर की पगड़ी गिर गई। जयंत उसे बिना पहने ही चल दिया।

राजा के दरबार में नंगे सिर जाने की सख्त मनाही थी। जयंत को देख, राजा गुस्से से भर उठा। तब जयंत को याद आई वह सलाह- ‘काँटेदार बाड़ न लगाना!’

फिर राजा ने उससे गरजकर पूछा, ‘तुमने एक आदमी का खून किया है?’

जयंत ने हकलाते हुए उत्तर दिया, ‘जी मैं … नहीं … ।’

‘क्या मैं … मैं लगा रखी है। स्वयं तुम्हारी पत्नी, उस खून की गवाह है।’

जयंत के कानों में गूँजने लगा।

“घरवाली को राज न बताना।

नहीं तो पीछे पड़ेगा पछताना।’

वह खिलखिलाकर हँस दिया। उसने धीरे-धीरे राजा को समझाया कि किस तरह उसने सलाहों की परीक्षा लेनी चाही। राजा से आज्ञा लेकर वह जंगल में से सूअर का कटा हुआ सिर ले आया। राजा ने सारी बात सुनी तो वह भी हँसते-हँसते लोटपोट हो गया।

जयंत को ढेरों ईनाम देकर विदा किया गया। सोनपाही कुछ नहीं जान पाई, परंतु जयंत ने उन सलाहों को सारी उम्र अमल में लाने का निश्चय कर लिया।

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Assam ki Lok Kathayen-5 (असम की लोक कथाएँ-5)

शिवजी का वाहन : असमिया लोक-कथा

यह उस समय की बात है, जब भगवान शिव के पास कोई वाहन न था। उन्हें। पैदल ही जंगल-पर्वत की यात्रा करनी पड़ती थी। एक दिन माँ पार्वती उनसे बोलीं, ‘आप तो संसार के स्वामी हैं। क्या आपको पैदल यात्रा करना शोभा देता है?’

शिव जी हँसकर बोले-

‘देवी, हम तो रमते जोगी हैं। हमें वाहन से क्या लेना-देना? भला साधु भी कभी सवारी करते हैं?’

पर्वती ने आँखों में आँसू भरकर कहा, ‘जब आप शरीर पर भस्म लगाकर, बालों की जटा बनाकर, नंगे-पाँव, काँटों-भरे पथ पर चलते हैं तो मुझे बहुत दुख होता है।’

शिव जी ने उन्हें बार-बार समझाया परंतु वह जिद पर अड़ी रहीं। बिना किसी सुविधा के जंगल में रहना पार्वती को स्वीकार था परंतु वह शिवजी के लिए सवारी चाहती थीं।

अब भोले भंडारी चिंतित हुए। भला वाहन किसे बनाएँ? उन्होंने देवताओं को बुलवा भेजा। नारद मुनि ने सभी देवों तक उनका संदेश पहुँचाया।

सभी देवता घबरा गए। कहीं हमारे वाहन न ले लें। सभी कोई-न-कोई बहाना बनाकर अपने-अपने महलों में बैठे रहे। पार्वती उदास थीं। शिवजी ने देखा कि कोई देवता नहीं पहुँचा। उन्होंने एक हुंकार लगाई तो जंगल के सभी जंगली जानवर आ पहुँचे।

शिवजी ने उनसे कहा- ‘तुम्हारी माँ पार्वती चाहती है कि मेरे पास कोई वाहन होना चाहिए। बोलो कौन बनेगा मेरा वाहन?’

सभी जानवर खुशी से झूम उठे। छोटा-सा खरगोश फुदककर आगे बढ़ा-

‘भगवन्‌, मुझे अपना वाहन बना लें, मैं बहुत मुलायम हूँ।’

सभी खिलखिलाकर हँस पड़े।

शेर गरजकर बोला-

‘मूर्ख खरगोश, मेरे होते, तेरी जुर्रत कैसे हुई, सामने आकर बोलने की?’

बेचारा खरगोश चुपचाप कोने में बैठकर गाजर खाने लगा।

शेर हाथ जोड़कर बोला,

‘प्रभु, मैं जंगल का राजा हूँ, शक्ति में मेरा कोई सामना नहीं कर सकता। मुझे अपनी सवारी बना लें।’

उसकी बात समाप्त होने से पहले ही हाथी बीच में बोल पड़ा-

‘मेरे अलावा और कोई इस काम के लिए ठीक नहीं है। मैं गर्मी के मौसम में अपनी सूँड में पानी भरकर महादेव को नहलाऊंगा।’

जंगली सुअर कौन-सा कम था? अपनी थूथन हिलाते हुए कहने लगा-

‘शिवजी, मुझे सवारी बना लो, मैं साफ-सुथरा रहने की कोशिश करूँगा।’ कहकर वह अपने शरीर की कीचड़ चाटने लगा।

कस्तूरी हिरन ने नाक पर हाथ रखा और बोला-

‘छि:, कितनी गंदी बदबू आ रही है, चल भाग यहाँ से। मेरी पीठ पर शिवजी सवारी करेंगे।’

उसी तरह सभी जानवर अपना-अपना दावा जताने लगे। शिवजी ने सबको शांत कराया और बोले, ‘कुछ ही दिनों बाद मैं सब जानवरों से एक चीज माँगूँगा, जो मुझे वह ला देगा, वही मेरा वाहन होगा।’

नंदी बैल भी वहीं खड़ा था। उस दिन के बाद से वह छिप-छिपकर शिव-पार्वती की बातें सुनने लगा।

घंटों भूख-प्यास की परवाह किए बिना वह छिपा रहता। एक दिन उसे पता चल गया कि शिवजी बरसात के मौसम में सूखी लकड़ियाँ माँगेंगे। उसने पहले ही सारी तैयारी कर ली।

बरसात का मौसम आया। सारा जंगल पानी से भर गया। ऐसे में शिवजी ने सूखी लकड़ियों की माँग की तो सभी जानवर एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। बैल गया और बहुत सी लकड़ियों के गट्ठर ले आया।

भगवान शिव बहुत प्रसन्ना हुए। मन-ही-मन वे जानते थे कि बैल ने उनकी बातें सुनी हैं। फिर भी उन्होंने नंदी बैल को अपना वाहन चुन लिया। सारे जानवर उनकी और माँ पार्वती की जय-जयकार करते लौट गए।

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Assam ki Lok Kathayen-4 (असम की लोक कथाएँ-4)

निन्यानवे का चक्कर : असमिया लोक-कथा

प्राचीनकाल की बात है । असम के ग्रामीण इलाके में तीरथ नाम का कुम्हार रहता था । वह जितना कमाता था, उससे उसका घर खर्च आसानी से चल जाता था । उसे अधिक धन की चाह नहीं थी । वह सोचता था कि उसे अधिक कमा कर क्या करना है । दोनों वक्त वह पेट भर खाता था, उसी से संतुष्ट था ।

वह दिन भर में ढेरों में बर्तन बनाता, जिन पर उसकी लागत सात-आठ रुपये आती थी । अगले दिन वह उन बर्तनों को बाजार में बेच आता था । जिस पर उसे डेढ़ या दो रुपये बचते थे । इतनी कमाई से ही उसकी रोटी का गुजारा हो जाता था, इस कारण वह मस्त रहता था ।

रोज शाम को तीरथ अपनी बांसुरी लेकर बैठ जाता और घंटों से बजाता रहता । इसी तरह दिन बीतते जा रहे थे । धीरे-धीरे एक दिन आया कि उसका विवाह भी हो गया । उसकी पत्नी का नाम कल्याणी था ।

कल्याणी एक अत्यंत सुघड़ और सुशील लड़की थी । वह पति के साथ पति के काम में खूब हाथ बंटाने लगी । वह घर का काम भी खूब मन लगाकर करती थी । अब तीरथ की कमाई पहले से बढ़ गई । इस कारण दो लोगों का खर्च आसानी से चल जाता था ।

तीरथ और कल्याणी के पड़ोसी यह देखकर जलते थे कि वे दोनों इतने खुश रहते थे । दोनों दिन भर मिलकर काम करते थे । तीरथ पहले की तरह शाम को बांसुरी बजाता रहता था । कल्याणी घर के भीतर बैठी कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी ।

एक दिन कल्याणी तीरथ से बोली कि तुम जितना भी कमाते हो वह रोज खर्च हो जाता है । हमें अपनी कमाई से कुछ न कुछ बचाना अवश्य है ।

इस पर तीरथ बोला – “हमें ज्यादा कमा कर क्या करना है ? ईश्वर ने हमें इतना कुछ दिया है, मैं इसी से संतुष्ट हूं । चाहे छोटी ही सही, हमारा अपना घर है । दोनों वक्त हम पेट भर कर खाते हैं, और हमें क्या चाहिए ?”

इस पर कल्याणी बोली – “मैं जानती हूं कि ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है और मैं इसमें खूब खुश भी हूं । परन्तु आड़े वक्त के लिए भी हमें कुछ न कुछ बचाकर रखना चाहिए ।”

तीरथ को कल्याणी की बात ठीक लगी और दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगे । कल्याणी सुबह 4 बजे उठकर काम में लग जाती । तीरथ भी रात देर तक काम करता रहता । लेकिन फिर भी दोनों अधिक बचत न कर पाते । अत: दोनों ने फैसला किया कि इस तरह अपना सुख-चैन खोना उचित नहीं है और वे पहले की तरह मस्त रहने लगे ।

एक दिन तीरथ बर्तन बेचकर बाजार से घर लौट रहा था । शाम ढल चुकी थी । वह थके पैरों खेतों से गुजर रहा था कि अचानक उसकी निगाह एक लाल मखमली थैली पर गई । उसने उसे उठाकर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । थैली में चांदी के सिक्के भरे थे ।

तीरथ ने सोचा कि यह थैली जरूर किसी की गिर गई है, जिसकी थैली हो उसी को दे देनी चाहिए । उसने चारों तरफ निगाह दौड़ाई । दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दिया । उसने ईश्वर का दिया इनाम समझकर उस थैली को उठा लिया और घर ले आया ।

घर आकर तीरथ ने सारा किस्सा कल्याणी को कह सुनाया । कल्याणी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया ।

तीरथ बोला – “तुम कहती थीं कि हमें आड़े समय के लिए कुछ बचाकर रखना चाहिए । सो ईश्वर ने ऐसे आड़े समय के लिए हमें उपहार दिया है ।”

“ऐसा ही लगता है ।” कल्याणी बोली – “हमें गिनकर देखना चाहिए कि ये चांदी के रुपये कितने हैं ।”

दोनों बैठकर रुपये गिनने लगे । पूरे निन्यानवे रुपये थे । दोनों खुश होकर विचार-विमर्श करने लगे । कल्याणी बोली – “इन्हें हमें आड़े समय के लिए उठा कर रख देना चाहिए, फिर कल को हमारा परिवार बढ़ेगा तो खर्चे भी बढ़ेंगे ।”

तीरथ बोला – “पर निन्यानवे की गिनती गलत है, हमें सौ पूरा करना होगा, फिर हम इन्हें बचा कर रखेंगे ।”

कल्याणी ने हां में हां मिलाई । दोनों जानते थे कि चांदी के निन्यानवे रुपये को सौ रुपये करना बहुत कठिन काम है, परंतु फिर भी दोनों ने दृढ़ निश्चय किया कि इसे पूरा करके ही रहेंगे । अब तीरथ और कल्याणी ने दुगुनी-चौगुनी मेहनत से काम करना शुरू कर दिया । तीरथ भी बर्तन बेचने सुबह ही निकल जाता, फिर देर रात तक घर लौटता ।

इस तरह दोनों लोग थक कर चूर हो जाते थे । अब तीरथ थका होने के कारण बांसुरी नहीं बजाता था, न ही कल्याणी खुशी के गीत गाती गुनगुनाती थी । उसे गुनगुनाने की फुरसत ही नहीं थी। न ही वह अड़ोस-पड़ोस या मोहल्ले में कहीं जा पाती थी ।

दिन-रात एक करके दोनों लोग एक-एक पैसा जोड़ रहे थे । इसके लिए उन्होंने दो वक्त के स्थान पर एक भक्त भोजन करना शुरू कर दिया, लेकिन चांदी के सौ रुपये पूरे नहीं हो रहे थे ।

यूं ही तीन महीने बीत गए । तीरथ के पड़ोसी खुसर-फुसर करने लगे कि इनके यहां जरूर कोई परेशानी है, जिसकी वजह से ये दिन-रात काम करते हैं और थके-थके रहते हैं ।

किसी तरह छ: महीने बीतने पर उन्होंने सौ रुपये पूरे कर लिए । अब तक तीरथ और कल्याणी को पैसे जोड़ने का लालच पड़ चुका था । दोनों सोचने लगे कि एक सौ से क्या भला होगा । हमें सौ और जोड़ने चाहिए । अगर सौ रुपये और जुड़ गए तो हम कोई व्यापार शुरू कर देंगे और फिर हमारे दिन सुख से बीतेंगे ।

उन्होंने आगे भी उसी तरह मेहनत जारी रखी । इधर, पड़ोसियों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी । एक दिन पड़ोस की रम्मो ने फैसला किया कि वह कल्याणी की परेशानी का कारण जानकर ही रहेगी । वह दोपहर को कल्याणी के घर जा पहुंची । कल्याणी बर्तन बनाने में व्यस्त थी ।

रम्मो ने इधर-उधर की बातें करने के पश्चात् कल्याणी से पूछ ही लिया – “बहन ! पहले जो तुम रोज शाम को मधुर गीत गुनगुनाती थीं, आजकल तुम्हारा गीत सुनाई नहीं देता ।”

कल्याणी ने ‘यूं ही’ कहकर बात टालने की कोशिश की और अपने काम में लगी रही । परंतु रम्मो कब मानने वाली थी । वह बात को घुमाकर बोली – “आजकल बहुत थक जाती हो न ? कहो तो मैं तुम्हारी मदद कर दूं ।”

कल्याणी थकी तो थी ही, प्यार भरे शब्द सुनकर पिघल गई और बोली – “हां बहन, मैं सचमुच बहुत थक जाती हूं, पर क्या करूं हम बड़ी मुश्किल से सौ पूरे कर पाए हैं ।”

“क्या मतलब ?” रम्मो बोली तो कल्याणी ने पूरा किस्सा कह सुनाया । रम्मो बोली – “बहन, तुम दोनों तो गजब के चक्कर में पड़ गए हो, तुम्हें इस चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए था । यह चक्कर आदमी को कहीं का नहीं छोड़ता ।”

कल्याणी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा – “तुम किस चक्कर की बात कर रही हो ? मैं कुछ समझी नहीं ।”

“अरी बहन, निन्यानवे का चक्कर ।” रम्मो का जवाब था ।

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Assam ki Lok Kathayen-3 (असम की लोक कथाएँ-3)

पोल खुल गई : असमिया लोक-कथा

एक बार किसी मौलवी को उसके मुरीद ने खाने पर बुलाया। मेजबान के घर पहुँचकर उसकी दहलीज को पार करने के दौरान मौलवी अचानक चिल्लाने लगा-ऐ हट, हट, हट। इस पर घबराए मेजबान ने सहमते हुए मौलवी से पूछा- जनाब, क्या हुआ। आप इस तरह क्यों चिल्ला रहे हैं। मौलवी गंभीरता से बोला- अरे नहीं-नहीं, कुछ नहीं।

मैं मक्का के पाक काबा में घुसते दिखाई दे रहे एक कुत्ते को भगा रहा था। यह सुनकर मेजबान दंग रह गया। वह सोचने लगा कि मौलवी साहब कितने रूहानी ताकत वाले हैं कि वे हजारों मील दूर मक्का तक साफ देख सकते हैं। लेकिन मेजबान की बीवी को यह बात हजम नहीं हुई।

खाना परोसते समय उसने मौलवी की थाली में सालन को चावलों के नीचे छिपा दिया। अगल-बगल में बैठे दूसरे लोगों की थाली में चावल और सालन तथा अपनी थाली में सिर्फ चावल देखकर मौलवी इधर-उधर देखने लगा। बीवी बोली- जनाब, आपको कुछ चाहिए? मौलवी बोला- जी, शायद आप मुझे सालन परोसना भूल गई हैं। वह बोली- अरे, आप तो कोसों दूर मक्का तक देख सकते हैं, ध्यान से देखिए, सालन आपकी थाली में ही चावलों के नीचे है।

इस तरह चतुराई से मेजबान की बीवी ने मौलवी की पोल खोल दी।

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Assam ki Lok Kathayen-2 (असम की लोक कथाएँ-2)

ईर्ष्यालु चाचा : असमिया लोक-कथा

आसाम के डुमडुमा गाँव में होमेन नामक युवक रहता था। उसके पिता मर चुके थे। माँ ने ही उसे पाल-पोसकर बड़ा किया था।

होमेन के चार चाचा थे। वे उससे बहुत जलते थे। एक दिन उन्होंने होमेन के घर से उसका प्यारा बछड़ा चुराया और उसे मार दिया। होमेन को पता चला तो वह बहत दुखी हुआ। फिर न जाने उसे क्या सूझी। बछड़े का सिर काटकर शेष शरीर को दफना दिया। पास के गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। बछड़े का कटा सिर उसके आँगन में छिपाकर होमेन ने बाह्मण से कहा-

‘आपके घर से तो गौमांस की बदबू आ रही है।’

“ब्राह्मण गरजकर बोला-

‘असंभव, यदि ऐसा है तो मुझे गाय का मांस ढूँढ़कर दिखा।’

होमेन ने बछड़े का सिर उसके आगे ला रखा। ब्राह्मण के तो हाथों के तोते उड़ गए।

उसने होमेने को बहुत-सा धन दिया ताकि वह गाँववालों को उस बात के बारे में न बताए।

होमेन ने थैली भर धन लिया और अपने चाचाओं को दिखाकर बोला, ‘पास के गाँव वालों ने मुँहमाँगे दामों पर गौ माँस खरीद लिया। वे लोग तो और भी माँग रहे थे। मैंने कहा, कल लाऊँगा।’

चाचा बहुत खुश हुए। उन सबने भी अपने-अपनी गाय बछड़े मारे और उनका मांस पड़ोसवाले गाँव में ले गए। बस, गाँववालों ने उन्हें गाय का मांस लिए देखा तो जमकर पिटाई की।

बौखलाए हुए चाचाओं ने होमेन की झोंपड़ी में आग लगा दी। होमेन और उसकी माँ बेघर हो गए। बेचारी माँ के आँसू देखकर होमेन तिलमिला उठा। उसने राख इकट्ठी की और एक दूसरे गाँव में जा पहुँचा-

‘ले लो, आँख का सुरमा ले लो, इसे लगाकर गड़ा धन मिल जाता है। जिसका ब्याह न होता हो, जल्दी ब्याह हो जाता है।’

हाथ की हाथ एक थैली सुरमा बिक गया। शेष राख होमेन ने छिपा दी। अपने चाचा के पास जाकर बोला, ‘मेरी तो झोपड़ी की सारी राख बिक गई।’

चाचा ने हैरानी से पूछा, ‘राख बिक गई?’

‘हाँ, इसमें क्या शक है?’ कहकर उसने पैसे दिखाए। फिर होमेन ने उन्हें उकसाया कि वे भी अपनी झोंपड़ी जलाकर उस गाँव में राख बेच आएँ। बड़ी झोंपड़ी की तो राख भी ज्यादा होगी।’

उसके सारे चाचा बातों में आ गए। चारों ने अपने-अपने घर फूँक दिए और राख ले जाने की तैयारी करने लगे। होमेन ने कहा, ‘गाँववालों से कह देना कि हमें सुरमे वाले ने भेजा है।’ ज्यों-ही चारों गाँव में पहुँचे और सुरमेवाले का नाम लिया तो सारा गाँव उनके पास पहुँच गया। देखते ही देखते बाँस की लाठियाँ उन पर पड़ने लगीं। बेचारे पिटते-पिटते घर लौटे।

चारों ने गुस्से के मारे होमेन को मारने की योजना बना ली।

उन्होंने होमेन को नदी किनारे रस्सी से बाँधा और खुद भात खाने घर चले गए। उनके जाते ही वहाँ से एक सौदागर गुजरा। उसने होमेन से पूछा, ‘क्यों भई, तुम्हें यहाँ क्यों बाँधा हुआ है?’

होमेन ने बात बनाई, ‘जी, मेरे चाचा मेरी शादी एक खूबसूरत लड़की से करना चाहते हैं। मेरे मना करने पर मुझे बाँध दिया।’

सौदागर बोला, ‘मैं शादी कर लेता हूँ उस लड़की से, क्या ऐसा हो सकता है?’

होमेन ने झट से उसे बाँधा और उसका घोड़ा लेकर रफूचक्कर हो गया। चारों चाचा खा-पीकर लेट गए। आलस के मारे उठा न गया। पिटाई के कारण पोर-पोर दुख रहा था। नौकर से बोले, ‘जा तू होमेन को नदी में फेंक आ, हमसे तो उठा नहीं जाता।’

नौकर भी कम नहीं था। उसने अपने रिश्तेदार को यह काम सौंप दिया। रिश्तेदार ने सौदागर को ही होमेन समझकर नदी में फेंक दिया।

बेचारा सौदागर चिल्लाता ही रह गया। नौकर ने चाचा को सूचना दी, जी, काम हो गया।

चारों मिलकर होमेन की मौत की खुशी मनाने लगे। होमेन ने पेड़ के पीछे छिपकर सब देखा और घोड़ा लेकर चाचाओं के पास जा पहुँचा सबको प्रणाम कर बोला, ‘नौकर ने गहरा धक्का नहीं दिया इसलिए केवल घोड़ा मिला। यदि गहरा डूबता तो शायद बैल, गाय व हाथी भी लाता। चारों चाचा फिर उसकी बातों में आ गए।

होमेन को पुचकारकर पूछा- ‘क्याद सचमुच नदी में पशु मिल रहे हैं?’

‘हाँ, हाँ, आप लोग भी ले आओ।’ होमेन ने कहा।

चारों चाचा आलस छोड़कर नदी की तरफ लपके। नौकर को भी साथ ले लिया। तट पर पहुँचकर नौकर को आदेश दिया, ‘हम चारों को जोर से पानी में धकेल दो।’

नौकर ने आज्ञा का पालन किया। होमेन को सदा के लिए ईर्ष्यालु और दुष्ट चाचाओं से मुक्ति मिल गई।

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Assam ki Lok Kathayen-1 (असम की लोक कथाएँ-1)

बारिश हुई मोर बना : असमिया लोक-कथा

गेनरु आसाम की गारो जनजाति का मुखिया था। वह सबसे धनी था। जनजाति के लोग उसे बहुत मानते थे। उसकी सलाह से ही काम करते थे। गेनरु के एक ही लड़की थी-जयमाला। जितनी सुंदर, उतनी ही गुणी। नृत्य में तो उससे कोई मुक़ाबला ही नहीं कर सकता था। कई युवक उससे विवाह करना चाहते थे। पर जयमाला ने अपने प्रेमी से ही विवाह किया। दोनों नृत्य के मुक़ाबले में मिले थे, और तभी विवाह करने का निश्चय किया।

गारो जनजाति की रीतिनुसार लड़की ही माता-पिता के परिवार का वारिस होती है, और विवाह के बाद लड़की का पति लड़की के घर आकर उसके परिवार के साथ रहता है।

जयमाला का पति भी जयमाल्रा के घर में आकर रहने लगा।

माता-पिता अब बूढ़े होने लगे थे। एक दिन गेनरु ने जयमाला को बुलाकर अपनी सारी संपत्ति, घर, खेती, धन सब कुछ उसे सौंप दिया।

जयमाला की मां ने बक्से में से एक से एक सुंदर वस्त्र निकालकर जयमाला को दिए। अंत में कुछ मंत्र सा बोलकर एक रेशम और ज़री के तारों से बुनी तथा नीले और हरे जवाहरात से जड़ी उत्तरीय या ओढ़नी निकाली।

“ओ मां! कितनी सुंदर है यह ओढ़नी।” जयमाला उसे ओढ़ने के लिए आगे बढ़ी।

“रुको, हाथ मत लगाना। यह जादू की ओढ़नी है, जो देवी ने मेरी नानी की नानी को दी थी। तब से यह हमारे परिवार में है। इसे संभालकर रखना, और कभी भी मंत्र का उच्चारण किए बिना इसे हाथ मत लगाना, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा,” और मां ने जयमाला को मंत्र सिखाया। मंत्र सीखकर जयमाला ने ओढ़नी ओढी। जयमाला पहले से भी सुंदर लगने लगी।

कुछ दिन बाद जयमाला के माता-पिता का निधन हो गया।

जयमाला उदास हो गई। उसका पति उसे खुश रखने का प्रयत्न करता। हर समय उसके साथ रहता। दोनों मिलकर हर कार्य करते। वह गांव के मेलों, उत्सवों में जयमाला को लेकर जाता और उसका मन बहलाता।

जयमाला और उसके पति ने खेती-बाड़ी अच्छी तरह से संभाली। जयमाला मां की दी हुई जादू की ओढ़नी बहुत संभालकर रखती। मंत्र पढ़कर उसे केवल ख़ास मौक़ों पर पहनती, और धूप दिखाकर फिर बक्से में रखती।

उस वर्ष सावन और भादों में मूसलाधार वर्षा हुई । कई दिन तक लगातार वर्षा होती रही। एक दिन अच्छी धूप निकली। जयमाला ने घर के कपड़े धूप में सुखाने के लिए डाले। उसमें उसने अपनी बहुमूल्य जादू की ओढ़नी भी धूप में डाली।

“क्यों न आज मछली ले आऊं। बहुत दिन हुए मछली खाए,” सोचकर जयमाला टोकरी और जाल लेकर झींगा मछली पकड़ने नदी पर गई।

जाने से पहले उसने पति को बताया, “चाहे कितनी भी गीली हो जाए, ओढ़नी को हाथ मत लगाना।” पर यह बताना भूल गई कि वह ओढ़नी जादू की है। ना ही उसने पति को आवश्यक मंत्र सिखाया। उसने सोचा कड़ी धूप है। वह जल्दी से थोड़ी सी मछलियां लेकर लौट आएगी और ओढ़नी तथा अन्य कपड़े उठा लेगी।

अभी जयमाला ने कुछ ही मछलियां पकड़ी थीं कि देखते-देखते आकाश काले बादलों से ढक गया। बादल की गड़गड़ाहट और बिजली की कड़कड़ाहट में पानी बरसने लगा।

जयमाला के पति ने देखा कपड़े गीले हो रहे हैं। उसने जयमाला को आवाज़ें दीं। पर बादलों और बिजलियों के शोर में जयमाला को कैसे सुनाई देता!

इधर जयमाला जल्दी-जल्दी वापस आ रही थी। परंतु इससे पहले कि वह पहुंचती जयमाला के पति ने सोचा कि इतनी सुंदर ओढ़नी जो जयमाला को बहुत प्यारी है, भीग रही है, खराब हो जाएगी। उसने उसे उठाने के लिए जैसे ही हाथ लगाया, ओढ़नी उसके बदन से चिपक गई। आहिस्ते-आहिस्ते उसका शरीर बदलने लगा। अब उसका शरीर पक्षी के शरीर में बदलने लगा। उसके रंग-बिरंगे पंख निकलने लगे थे।

जयमाला वहां पहुंची । पति के शरीर को पक्षी के शरीर में बदलते देख वह रोने लगी। अपने दुख में वह मंत्र बोलना भूल गई। उसने पति के शरीर से लिपटी ओढ़नी खींचनी चाही। ओढ़नी को हाथ लगाते ही उसका शरीर भी बदलने लगा, पर उसके पक्षी शरीर में पंख कम निकले क्योंकि ओढ़नी का सारा रेशम तथा नीले-हरे जवाहरात पक्षी का शरीर बने पति के पंखों में बदल गए थे। जयमाला के हिस्से में कम या ना के बराबर पंख आए। जो आए वे पति के पंखों जैसे सुंदर और चमकीले नहीं थे।

हरे-नीले चमकीले पंखों वाला उसका पति बना मोर और जयमाला बनी कम पंखों वाली मोरनी। आज भी जब कभी आकाश में काले बादल छा जाते हैं और बारिश की रिमझिम होने लगती है तो मोर नाचते हुए अपनी मोरनी को आने के लिए आवाज़ देता है।