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Uttar Pradesh ki Lok Kathayen-1 (उत्तर प्रदेश की लोक कथाएँ-1)

सच्चा मन : उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

एक बाल ग्वाल रोजाना अपनी गायों को जंगल में नदी किनारे चराने के लिए ले जाता था ।

जंगल में वह नित्य – प्रतिदिन एक संत के यौगिक क्रियाकलाप देखता था । संत आंखें और नाक बंद कर कुछ यौगिक क्रियाएं करते थे । ग्वाला संत के क्रियाकलाप बड़े गौर से देखता था । एक दिन उससे रहा नहीं गया । उत्सुकतावश उसने संत से यौगिक क्रियाओं के बारे में पूछ लिया ।

बाल ग्वाल के सवाल पर संत ने जवाब दिया कि वह इस तरह से भगवान से साक्षात्कार करते हैं । संत के प्रस्थान करने के बाद ग्वाला भी यौगिक क्रियाओं को दोहराने लगा और इस बात का संकल्प ले लिया कि आज वह भगवान के दर्शन साक्षात करके ही रहेगा । ग्वाले ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं और नाक को जोर से दबा लिया । श्वास प्रवाह बंद होने से उसके प्राण निकलने की नौबत आ गई उधर कैलाश पर्वत पर महादेव का आसन डोलने लगा ।

शिव ने देखा कि एक बाल ग्वाल उनसे साक्षात्कार करने के लिए कठोर तप कर रहा है । उसके हठ को देखकर शिव प्रगट हुए और बोले, ‘वत्स मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूं और तुमको दर्शन देने आया हूं ।’ ग्वाले ने बंद आंखों से इशारा कर पूछा, ‘आप कौन हो ?’ भोलेनाथ ने कहा ‘मैं वही भगवान हूं, जिसके लिए तुम इतना कठोर तप कर रहे हो ।’ ग्वाले ने आंखें खोलीं और सबसे पहले एक रस्सी लेकर आया । चूंकि उसने कभी भगवान को देखा नहीं था, इसलिए उसके सामने पहचान का संकट खड़ा हो गया । उसने भगवान को पेड़ के साथ रस्सी से बांध दिया और साधु को बुलाने के लिए भागकर गया । संत तुरंत उसकी बातों पर यकीन करते हुए दौड़े हुए आये लेकिन संत को कहीं पर भी भगवान नजर नहीं आए संत ने बाल ग्वाल से कहा – ‘मुझे तो कहीं नहीं दिख रहे ।’

तब ग्वाले ने भगवान से पूछा प्रभु, “आप यदि सही में भगवान हो तो साधु महाराज को दिख क्यों नहीं रहे हो ।” तब भगवान ने कहा -‘जो भक्त छल कपट रहित, सच्चे मन से मुझे याद करता है, मैं उसको दर्शन देने के लिए दौड़ा चला आता हूं । तुमने निश्छल मन से मेरी आराधना की, अपने प्राण दांव पर लगाए और मेरे दर्शन का दृढ़ संकल्प लिया इसलिए मुझे कैलाश से मृत्युलोक में तुमको दर्शन देने के लिए आना ही पड़ा । जबकि साधु के आचरण में इन सभी बातों का अभी अभाव है । वह रोजाना के क्रियाकलाप करते हैं लेकिन उनके मन में अभी भटकाव है । इसलिए मैं तुमको तो दिखाई दे रहा हूं, लेकिन संत को नहीं ।’

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Uttar Pradesh ki Lok Kathayen-2 (उत्तर प्रदेश की लोक कथाएँ-2)

चतुरी चमार: उत्तर प्रदेश/ब्रज की लोक-कथा

दोस्तो, किसी गांव में एक चमार रहता था। वह बड़ा ही चतुर था। इसीलिए सब उसे ‘चतुरी चमार’ कहा करते थे। घर में वह और उसकी स्त्री थी। उनकी गुजर-बसर जैसे-तैसे होती थी, इससे वे लोग हैरान रहते थे। एक दिन चतुरी ने सोचा कि गांव में रहकर तो उनकी हालत सुधरने से रही, तब क्यों न वह कुछ दिन के लिए शहर चला जाय और वहां से थोड़ी कमाई कर लाय ? स्त्री से सलाह की तो उसने भी जाने कीह अनुमति दे दी। वह शहर पहंच गया।

मेहनती तो वह था ही। सूझबूझ भी उसमें खूब थी। कुछ ही दिनों में उसने सौ रुपये कमा लिये। इसके बाद वह गांव को रवाना हो गया। रास्ते में घना जंगल पड़ता था। जंगल में डाकू रहते थे। चतुरी ने मन-ही-मन कहा कि वह रुपये ले जायगा तो डाकू छीन लेंगे। उसने उपाय खोजा। एक घोड़ी खरीदी ओर कुछ रुपये उसकी पूंछ में बांधकर चल दिया। देखते-देखते डाकुओं ने उसे घेरा। बोले, “बड़ी कमाई करके लाया है चतुरिया। ला, निकाल रुपये।”

चतुरी ने कहा, “रुपये मेरे पास कहां हैं, जो थे उससे यह घोड़ी खरीद लाया हूं। इस घोड़ी की बड़ी करामात है। मुझे यह रोज पचास रुपये देती है।” इतना कहकर उसने मारा पूंछ में डंडा कि खन-खन करके पचास रुपये निकल पड़े।

डाकुओं का सरदार बोला, “सुन भाई, यह घोड़ी तुमने कितने में खरीदी है?” चतुरी ने कहा, “क्यों ? उससे तुम्हें क्या ?”

वह बोला, “हमें रुपये नहीं चाहिए। यह घोड़ी दे दो।”

“नहीं,” चतुरी ने गम्भीरता से कहा, “मैं ऐसा नहीं कर सकता, मेरी रोजी की आमदनी बंद हो जायेगी।”

सरदार बोला, “ये ले, घोड़ी के लिए सौ रुपये।”

चतुरी ने और आग्रह करना ठीक नहीं समझा। रुपये लेकर घोड़ी उन्हें दे दी और गांव की ओर चल पड़ा। घर आकर सारा किस्सा अपनी स्त्री को सुना दिया। उसने कहा, “हो-न-हो, दो-चार दिन में डाकू यहां आये बिना नहीं रहेंगे। हमें तैयार रहना चाहिए।”

अगले दिन वह खरगोश के दो एक-से बच्चे ले आया। एक उसने स्त्री को दिया। बोला, “मैं रात को बाहर की कोठरी में बैठ जाया करूंगा। जैसे ही डाकू आयें, इस खरगोश के बच्चे को यह कहकर छोड़ देना कि जा, चतुरी को बुला ला। आगे मैं संभाल लूंगा।”

डाकुओं का सरदार घोड़ी को लेकर अपने घर गया और रात को आंगन में खड़ा करके पूंछ मे डंडा मारा और बोला, “ला, रुपये।” रुपये कहां से आते? उसने कस-कसकर कई डंडे पहले तो पूंछ में मारे, फिर कमर में। घोड़ी ने लीद कर दी, पर रुपये नहीं दिये। सरदार समझ गया कि चतुरी ने बदमाशी की है, पर उसने अपने साथियों से कुछ भी नहीं कहा। घोड़ी दूसरे के यहां गई, तीसरे के यहां गई, उसकी खूब मरम्मत हुई, पर रपये बेचारी कहां से देती? चतुरी ने उन्हें मूर्ख बना दिया, लेकिन इस बात को अपने साथी से कहे तो कैसे? उसकीं हंसाई जो होगी। आखिर पांचवें डाकू के यहां जाकर घोड़ी ने दम तोड़ दिया। तब भेद खुला।

फिर सारे डाकू मिलकर एक रात को चतुरी के घर पहुंच गये। दरवाजा खटखआया। चतुरी की घरवाली नेखोल दिया। सरदार ने पूछा, “कहां है चतुरी का बच्चा?”

स्त्री बोली, “वह खेत पर गये हैं। आप लोग बैठें। मैं अभी बुला देती हूं।”

इतना कहकर उसने खरगोश के बच्चे को हाथ में लेकर दरवाजे के बाहर छोड़ दिया और बोली, “जा रे चतुरी को फौरन बुला ला।”

क्षण भर बाद ही डाकुओं ने देखा कि चतुरी खरगोश के बच्च् को हाथ में लिए चला आ रहा है। आते ही बोला, “आप लोगों ने मझे बलाया है। इसके पहुंचते ही मैं चला आया। वाह रे खरगोश! “

डाकू गुस्से में भरकर आये थे, पर खरगोश को देखते ही उनका गुस्सा काफूर हो गया। सरदार ने अचरज में भरकर पूछा, “यह तुम्हारे पास पहुंचा कैसे ?”

चतुरी बोला, “यही तो इसकी तारीफ है। मैं सातवें आसमान पर होऊं, तो वहां से भी बुला ला सकता है।”

सरदार ने कहा, “चतुरी, यह खरगोश हमें दे दे। हमलोग इधर-उधर घूमते रहते हैं और हमारी घरवाली परेशान रहती है। वह इसे भेजकर हमें बुलवा लिया करेगी।”

दूसरा डाकू बोला, “तूने हमारे साथ बड़ा धोखा किया है। रुपये ले आया और ऐसी घोड़ी दे आया कि जिसने एक पैसा भी नहीं दिया और मर गई। खैर, जो हुआ सो हुआ। अब यह खरगोश दे।”

चतुरी ने बहुत मना किया तो सरदार ने सौ रुपये निकाले। बोला, “यह ले। ला, दे खरगोश को।”

चतुरी ने रुपये ले लिये और खरगोश दे दिया।

डाकू चले गये। चतुरी ने आगे के लिए फिर एक चाल सोची। उधर डाकुओं के सरदार ने खरगोश को घर ले जाकर अपनी स्त्री को दिया ओर उससे कह दियाकि जब खाना तैयार हो जाय तो इसे भेज देना। और वह बाहर चला गया। दोस्तों के बीच बैठा रहा। राह देखते-देखते आधी रात हो गई, पर खरगोश नहीं आया, तो वह झल्लाकर घर पहुंचा और स्त्री पर उबल पड़ा। स्त्री ने कहा, “तुम नाहक नाराज होते हो। मैंने तो घंटों पहले खरगोश को भेज दिया था।”

सरदार समझ गया कि यह चतुरी की शैतानी है। वे लोग तीसरे दिन रात को फिर चतुरी के घर पहुंच गये।

उन्हें देखते ही चतुरी ने अपनी स्त्री से कहा, “इनके रुपये लाकर दे दे।”

स्त्री बोली, “मैं नहीं देती।”

“नहीं देती ?” चतुरी गरजा और उसने कुल्हाड़ी उठाकर अपनी स्त्री पर वार किया। स्त्री लहुलुहान होकर धरती पर गिर पड़ी और आंखें मुंद गईं। डाकू दंग रह गये। उन्होंने कहा, “अरे चतुरी, तूने यह क्या कर डाला ?”

चतुरी बोला, “तुम लोग चिंता न करो। यह तो हम लोगों की रोज की बात है। मैं इसे अभी जिंदा किये देता हूं।”

इतना कहकर वह अंदर गया और वहां से एक सारंगी उठा लाया। जैसे ही उसे बजाया कि स्त्री उठ खड़ी हुई।

चतुरी ने उसे पहले से ही सिखा रखा था ओर खून दिखाने के लिए वैसा रंग तैयार कर लिया था। नाटक को असली समझकर डाकुओं का सरदार चकित रह गया। उसने कहा, “चतुरी भैया, यह सारंगी तू हमें दे दे।”

चतुरी ने बहुत आना-कानी की तो सरदार ने सौ रुपये निकाल कर दसे और दे दिये और सारंगी लेकर वे चले गये। घर पहुंचते ही सरदार ने स्त्री को फटकारा और स्त्री कुछ तेज हो गई तो उसने आव देखा न ताव, कुल्हाड़ी लेकर गर्दन अलग कर दी। फिर सारंगी लेकर बैठ गया। बजाते-बजाते सारंगी के तार टूट गये, लेकिन स्त्री ने आंखें नहीं खोलीं। सरदार अपनी मूर्खता पर सिर धुनकर रह गया। पर अपनी बेवकूफी की बात उसने किसी को बताई नहीं और एक के बाद एक सारी स्त्रियों के सिर कट गये।

भेद खुला तो डाकुओं का पारा आसमान पर चढ़ गया। वे फौरन चतुरी के घर पहुंचे और उसे पकड़कर एक बोरी में बंद कर नदी में डुबोने ले चले। रात भर चलकर सवेरे वे एक मंदिर पर पहुंचे। थोड़ी दूर पर नदी थी। उन्होंने बोरी को मंदिर पर रख दिया और और सब चले गये।

उनके जाते ही चतुरी चिल्लाया, “मुझे नहीं करनी। मुझे नहीं करनी।” संयोग से उसी समय एक ग्वाला अपी गाय-भैंस लेकर आया। उसने आवाज सुनी तो बोरी के पास गया। बोला “क्या बात है ?” चतुरी ने कहा, “क्या बताऊं। राजा के लोग मेरे पीछे पड़े है। कि राजकुमारी से विवाह कर लू। लेकिन में कैसे करूं, लड़की कानी है। ये लोग मुझे पकड़कर ब्याह करने ले जा रहे हैं।”

ग्वाला बोला, “भैया, ब्याह नहीं होता । मैं इसके लिए तैयार हूं।”

इतना कहकर ग्वाले ने झटपट बोरी को खोलकर चतुरी को बाहर निकाल दिया और स्वयं बंद हो गया। चतुरी उसकी गाय-भैंस लेकर नौ-दी-ग्यारह हो गया।

थोड़ी देर में डाकू आये और बोरी ले जाकर उन्होंने नदी में पटक दी। उन्हें संतोष हो गया कि चतुरी से उनका पीछा छूट गया, लेकिन लौटे तो रास्ते में देखते क्या हैं कि चतुरी सामने है। उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। पास आकर चतुरी से पूछा, “क्या बे, तू यहां कैसे ?”

वह बोला, आप लोगों ने मुझे नदी में उथले पानी में डाला, इसलिए गाय-भैंस ही मेरे हाथ पड़ी, अगर गहरे पानी में डाला होता तो हीरे-जवाहरात मिलते।”

हीरे-जवाहरात का नाम सुनकर सरदार के मुंह में पानी भर आया। बोला, “भैया चतुरी, तू हमें ले चल और हीरे-जवाहरात दिलवा दे।”

चतुरी तो यह चाहता ही था। वह उन्हें लेकर नदी पर गया। बोला, “देखो, जितनी देर पानी में रहोगे, उतना ही लाभ होगा। तुम सब एक-एक भारी पत्थर गले में बांध लो।”

लोभी क्या नहीं कर सकता ! उन्होंने अपने गलों में पत्थर बांध लिये और एक कतार में खड़े हो गये। चतुरी ने एक-एक को धक्का देकर नदी में गिरा दिया।

सारे डाकुओं से हमेशा के लिए छुटकारा पाकर चतुरी चमार गाय-भैंस लेकर खुशी-खुशी घर लौटा और अपनी स्त्री के साथ आनन्द से रहने लगा।

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Uttar Pradesh ki Lok Kathayen-3 (उत्तर प्रदेश की लोक कथाएँ-3)

कलियुगी पति-भक्ति: उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

क्या मथुरा, क्या बरसाना – क्या गोकुल, क्या नंदगांव! मतलब यह कि ब्रजक्षेत्र की इंच – इंच जमीन पर पतिव्रता सुशीला की महिमा गाई जाती थी। लोग कहते कि अगर साक्षात पतिव्रता नारी के दर्शन करना चाहते हो तो देवी सुशीला के दर्शन करो। थी भी यही बात। सुशीला की जिन्दगी का हर पल अपने पति के लिए था। पति के दर्शन किए बिना वह जल न पीती। एक बार वह अपनी एक सहेली के यहाँ गई। सहेली का पति कहीं परदेस गया हुआ था। लेकिन खाने के लिए सहेली ने नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन पकाए थे। सुशीला यह देखकर हक्की – बक्की रह गई। वह तो पति की अनुपस्थिति में एक बूंद तक ग्रहण करने की बात न सोच सकती थी। इसलिए उससे न रहा गया। वह बोली,”बहन, तुम कैसी स्त्री हो! तुम्हारे पति तो परदेस में हैं और तुमने अपने लिए इतनी तरह के व्यंजन पकाए हैं। भला एक पतिव्रता के लिए यह सब शोभा देता है! सच्ची पतिव्रता तो वह है जो पति को देखे बिना जल तक न पिए।”

सुशीला की सहेली बड़े मुंहफट स्वभाव की थी। दिल की भी वह बड़ी साफ थी। बोली,”बहन सुशीला, यह सब ढकोसलेबाजी मुझसे नहीं चलती। अगर मैं अपने पति के बाहर होने पर भी अच्छा खाना खाती हूँ तो इसका मतलब यह तो नहीं होता कि मैं उन्हें नहीं चाहती। मैं तो जैसी खुश उनके सामने रहती हूँ वैसी ही उनके पीछे भी। अगर कोई मुझ पर उंगली उठाने पर ही तुला होगा तो उसे मैं रोक नहीं सकती। बाकी यह तो सिर्फ मैं जानती हूँ या मेरे पति, कि हम एक – दूसरे को कितना चाहते हैं।”सहेली के इस जवाब से सुशीला जल – भुनकर रह गई। उसने मुंह चुनियाकर कहा,”यह तो सब ठीक है, लेकिन तुम पतिव्रता नहीं हो। पतिव्रता स्त्री के लिए शास्त्रों में लिखा है कि पति की गैरहाजिरी में वह जल तक न पिए।”सहेली ने इसका भी करारा जवाब दिया। बोली,”ऐसे शास्त्र मेरे ठेंगे से!”अन्त में बात यहाँ तक बढ़ गई कि सुशीला तुनककर अपने घर लौट आई।

घर आकर सारा किस्सा उसने अपने पति को बताया। पति भी सुशीला को बहुत चाहता था और उसकी निष्काम पति – भक्ति से बहुत प्रभावित था। फिर भी कभी – कभी उसे यह जरूर लगता था कि यह सब ढोंग है। अगर पति एक महीना तक घर पर न रहे तो क्या कोई स्त्री बिना अन्न – पानी के एक महीना तक रह सकती है! और उसे लगा कि यह बिलकुल असंभव है। अगर कोई जिद्दी स्त्री इस बात पर अड़ ही जाए तो जीवित नहीं बच सकती। यह सोचकर पति ने सुशीला की परीक्षा लेने का विचार बनाया। कई दिनों तक वह तरह – तरह से सुशीला को कसौटी पर कसता रहा, लेकिन सुशीला हर बार खरी उतरती। कभी वह स्नान देर से करता, तो कभी खेत से दोपहर ढले लौटता। कभी – कभी तो ऐसा होता कि परोसी थाली तक सामने होने पर वह बहाना बनाकर बाहर निकल जाता और दिन ढले लौटता। लेकिन सुशीला ने कभी भी पति के खाने से पहले पानी तक न पिया। एक दिन सुशीला के पति ने कहा,”आज मेरा मन खीर और पुआ खाने का हो रहा है। इसलिए खूब इलायची गरी डालकर पुए और चिरौंजी, किशमिश, केसर डालकर खीर बना बनाओ।”ये दोनों चीजें सुशीला को भी बड़ी प्रिय थीं। इसलिए खूब मन लगाकर उसने ये चीजें बनाई। केसर और इलायची और देसी घी की सुगन्ध से बनाते समय ही सुशीला के मुंह में पानी आने लगा। चीजें बना चुकने के बाद सुशीला ने अपने पति से झटपट स्नान कर लेने को कहा।

लेकिन पति को तो उस दिन धैर्य की परीक्षा लेनी थी। इसलिए काफी देर तक वह ढील डाले रहा और टालता रहा। सुशीला के बार – बार कहने पर, आखिर में हारकर, वह बाल्टी – लोटा और रस्सी लेकर नहाने गया। नहाने में भी उसने काफी देर लगा दी। इधर सुशीला की आतें मारे भूख के कुलबुलाने लगी थी। लेकिन जैसे ही देहरी के बाहर उसे पति के खड़ाऊं की आवाज सुनाई दी, उसे दिलासा बंधी कि अब तो खाने का समय आ ही गया। लेकिन जैसे ही पति ने देहरी दे अंदर पैर रखे, दायें पैर की खड़ाऊं से पैर ऐसा फिसला कि वह चारों खाने चित फैल गया। बाल्टी – लोटा हाथ से छूटकर दूर जा गिरे और आँखें फैली की फैली रह गई। यह देखा तो सुशीला जिस हालत में थी वैसी ही दौड़ी पास जाकर सिर हिलाया, आवाजें दीं, लेकिन सब बेकार। पति अगर जिंदा होता तब तो बोलता ही, लेकिन उसके तो प्राण पखेरू उड़ चुके थे, इसलिए भला वह कैसे बोलता।

सुशीला की आंखें डबडबा आई और गला भर आया। उसका मन हुआ कि धाड़ मारकर रो पड़े। लेकिन तभी उसे खीर और पुए का ध्यान हो आया। उसने सोचा कि पति अब मर ही गए हैं। रोने से जी तो पाएंगे नही। हां, आस – पड़ोस के लोग जरूर जुड़ जाएंगे। और तब खीर – पुए खाने का मौका तो मिलने से रहा। इसलिए बेहतर यह होगा कि पहले मैं खीर – पुए खा लूं, तब रोना – धोना शुरू करूं। यह सोचकर वह चुपचाप गई और जल्दी – जल्दी खीर उड़ाने लगी। पुए अगले दिन के लिए रख लिए, क्योंकि उनके खराब होने का डर न था। असलियत यह थी कि पति मरा नहीं था, बल्कि मरने का नाटक किए पड़ा था। इसलिए अपनी पत्नी की यह सारी हरकतें वह देखता रहा। जब सुशीला खीर खूब जी भरकर खा चुकी तो झटपट मुंह धोया और लम्बा – सा घूंघट निकालकर पति के पास गई और सीने से चिपटकर रोने लगी। रोने के साथ – साथ वह यह भी कहती जाती थी – –

“तुम तो चले परमधाम कूं, हम हूँ सूं कुछ बक्खौं (कहो)।”

उसका पति कुछ देर तक तो उसके नकली प्रेम और दुख को सहन करता रहा। लेकिन अन्त में उससे न रहा गया। और जैसे ही सुशीला ने अपना जुमला `तुम तो चले परधाम कूं हम हूँ सूं कुछ बक् खौ’ खत्म किया, वैसे ही उसके पति ने उसीसे मिलता – जुलता एक जुमला जड़ दिया। पति का जुमला इस प्रकार था – –

खीर सड़ोपा करि तौ पुअनूं कूं तौ चक् खौ।”

अब तो सुशीला की ऐसी हालत हो गई कि काटो तो खून तक न निकले। उसे क्या पता था कि उसका पति नाटक किए पड़ा है और उसकी परीक्षा ले रहा है! मन ही मन वह रह – रहकर अपने आपको कोसती रही कि यह क्या किया। क्यों न जबान पर काबू रखकर बुद्धि से काम लिया! और उसके बाद फिर कभी किसी ने सुशीला के मुंह से अपने पतिव्रत धर्म की तारीफ नहीं सुनी। पहले जैसी डींगे हांकना अब सुशीला ने बन्द कर दिया था।

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Uttar Pradesh ki Lok Kathayen-4 (उत्तर प्रदेश की लोक कथाएँ-4)

शेखचिल्ली और कुएं की परियां: उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

एक गांव में एक सुस्त और कामचोर आदमी रहता था। काम – धाम तो वह कोई करता न था, हां बातें बनाने में बड़ा माहिर था। इसलिए लोग उसे शेखचिल्ली कहकर पुकारते थे। शेखचिल्ली के घर की हालत इतनी खराब थी कि महीने में बीस दिन चूल्हा नहीं जल पाता था। शेखचिल्ली की बेवकूफी और सुस्ती की सजा उसकी बीवी को भी भुगतनी पड़ती और भूखे रहना पड़ता। एक दिन शेखचिल्ली की बीवी को बड़ा गुस्सा आया। वह बहुत बिगड़ी और कहा,”अब मैं तुम्हारी कोई भी बात नहीं सुनना चाहती। चाहे जो कुछ करो, लेकिन मुझे तो पैसा चाहिए। जब तक तुम कोई कमाई करके नहीं लाओगे, मैं घर में नहीं, घुसने दूंगी।”यह कहकर बीवी ने शेखचिल्ली को नौकरी की खोज में जाने को मजबूर कर दिया। साथ में, रास्ते के लिए चार रूखी – सूखी रोटियां भी बांध दीं। साग – सालन कोई था ही नहीं, देती कहाँ से? इस प्रकार शेखचिल्ली को न चाहते हुए भी नौकरी की खोज में निकलना पड़ा।

शेखचिल्ली सबसे पहले अपने गांव के साहूकार के यहाँ गए। सोचा कि शायद साहूकार कोई छोटी – मोटी नौकरी दे दे। लेकिन निराश होना पड़ा। साहूकार के कारिन्दों ने ड्योढ़ी पर से ही डांट – डपटकर भगा दिया। अब शेखचिल्ली के सामने कोई रास्ता नहीं था। फिर भी एक गांव से दूसरे गांव तक दिन भर भटकते रहे। घर लौट नहीं सकते थे, क्योंकि बीवी ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि जब तक नौकरी न मिल जाए, घर में पैर न रखना। दिन भर चलते – चलते जब शेखचिल्ली थककर चूर हो गए तो सोचा कि कुछ देर सुस्ता लिया जाए। भूख भी जोरों की लगी थी, इसलिए खाना खाने की बात भी उनके मन में थी। तभी कुछ दूर पर एक कुआं दिखाई दिया। शेखचिल्ली को हिम्मत बंधी और उसी की ओर बढ़ चले। कुएं के चबूतरे पर बैठकर शेखचिल्ली ने बीवी की दी हुई रोटियों की पोटली खोली। उसमें चार रूखी – सूखी रोटियां थीं। भूख तो इतनी जोर की लगी थी कि उन चारों से भी पूरी तरह न बुझ पाती। लेकिन समस्या यह भी थी कि अगर चारों रोटियों आज ही खा डालीं तो कल – परसों या उससे अगले दिन क्या करूंगा, क्योंकि नौकरी खोजे बिना घर घुसना नामुमकिन था। इसी सोच-विचार में शेखचिल्ली बार – बार रोटियां गिनते और बारबार रख देते। समझ में नहीं आता कि क्या किया जाए। जब शेखचिल्ली से अपने आप कोई फैसला न हो पाया तो कुएं के देव की मदद लेनी चाही। वह हाथ जोड़कर खड़े हो गए और बोले,”हे बाबा, अब तुम्हीं हमें आगे रास्ता दिखाओ। दिन भर कुछ भी नहीं खाया है। भूख तो इतनी लगी है कि चारों को खा जाने के बाद भी शायद ही मिट पाए। लेकिन अगर चारों को खा लेता हूँ तो आगे क्या करूंगा? मुझे अभी कई दिनों यहीं आसपास भटकना है। इसलिए हे कुआं बाबा, अब तुम्हीं बताओ कि मैं क्या करूं! एक खाऊं, दो खाऊं, तीन खाऊं चारों खा जाऊं?”लेकिन कुएं की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। वह बोल तो सकता नहीं था, इसलिए कैसे जवाब देता!

उस कुएं के अन्दर चार परियां रहती थीं। उन्होंने जब शेखचिल्ली की बात सुनी तो सोचा कि कोई दानव आया है जो उन्हीं चारों को खाने की बात सोच रहा है। इसलिए तय किया कि चारों को कुएं से बाहर निकालकर उस दानव की विनती करनी चाहिए, ताकि वह उन्हें न खाए। यह सोचकर चारों परियां कुएं से बाहर निकल आई। हाथ जोड़कर वे शेखचिल्ली से बोलीं,”हे दानवराज, आप तो बड़े बलशाली हैं! आप व्यर्थ ही हम चारों को खाने की बात सोच रहे हैं। अगर आप हमें छोड़ दें तो हम कुछ ऐसी चीजें आपको दे सकती हैं जो आपके बड़े काम आएंगी।”परियों को देखकर व उनकी बातें सुनकर शेखचिल्ली हक्के – बक्के रह गए। समझ में न आया कि क्या जवाब दे। लेकिन परियों ने इस चुप्पी का यह मतलब निकाला कि उनकी बात मान ली गई। इसलिए उन्होंने एक कठपुतला व एक कटोरा शेखचिल्ली को देते हुए कहा,”हे दानवराज, आप ने हमारी बात मान ली, इसलिए हम सब आपका बहुत – बहुत उपकार मानती हैं। साथ ही अपनी यह दो तुच्छ भेंटें आपको दे रही हैं। यह कठपुतला हर समय आपकी नौकरी बजाएगा। आप जो कुछ कहेंगे, करेगा। और यह कटोरा वह हर एक खाने की चीज आपके सामने पेश करेगा, जो आप इससे मांगेंगे।”इसके बाद परियां फिर कुएं के अन्दर चली गई।

इस सबसे शेखचिल्ली की खुशी की सीमा न रही। उसने सोचा कि अब घर लौट चलना चाहिए। क्योंकि बीवी जब इन दोनों चीजों के करतब देखेगी तो फूली न समाएगी। लेकिन सूरज डूब चुका था और रात घिर आई थी, इसलिए शेखचिल्ली पास के एक गांव में चले गए और एक आदमी से रात भर के लिए अपने यहाँ ठहरा लेने को कहा। यह भी वादा किया कि इसके बदले में वह घर के सारे लोगों को अच्छे – अच्छे पकवान व मिठाइयां खिलाएंगे। वह आदमी तैयार हो गया और शेखचिल्ली को अपनी बैठक में ठहरा लिया। शेखचिल्ली ने भी अपने कटोरे को निकाला और उसने अपने करतब दिखाने को कहा। बात की बात में खाने की अच्छी – अच्छी चीजों के ढेर लग गए। जब सारे लोग खा – पी चुके तो उस आदमी की घरवाली जूठे बरतनों को लेकर नाली की ओर चली। यह देखकर शेखचिल्ली ने उसे रोक दिया और कहा कि मेरा कठपुतला बर्तन साफ कर देगा। शेखचिल्ली के कहने भर की देर थी कि कठपुतले ने सारे के सारे बर्तन पल भर में निपटा डाले। शेखचिल्ली के कठपुतले और कटोरे के यह अजीबोगरीब करतब देखकर गांव के उस आदमी और उसकी बीवी के मन में लालच आ गया शेखचिल्ली जब सो गए तो वह दोनों चुपके से उठे और शेखचिल्ली के कटोरे व कठपुतले को चुराकर उनकी जगह एक नकली कठपुतला और नकली ही कटोरा रख दिया। शेखचिल्ली को यह बात पता न चली। सबेरे उठकर उन्होंने हाथ – मुंह धोया और दोनों नकली चीजें लेकर घर की ओर चल दिए।

घर पहुंचकर उन्होंने बड़ी डींगें हांकी और बीवी से कहा,”भागवान, अब तुझे कभी किसी बात के लिए झींकना नहीं पड़ेगा। न घर में खाने को किसी चीज की कमी रहेगी और न ही कोई काम हमें – तुम्हें करना पड़ेगा। तुम जो चीज खाना चाहोगी, मेरा यह कटोरा तुम्हें खिलाएगा और जो काम करवाना चाहोगी मेरा यह कठपुतला कर डालेगा।”लेकिन शेखचिल्ली की बीवी को इन बातों पर विश्वास न हुआ। उसने कहा,”तुम तो ऐसी डींगे रोज ही मारा करते हो। कुछ करके दिखाओ तो जानूं।”हां, क्यों नहीं?”शेखचिल्ली ने तपाक से जबाव दिया और कटोरा व कठपुतलें में अपने – अपने करतब दिखाने को कहा। लेकिन वह दोनों चीजें तो नकली थीं, अत: शेखचिल्ली की बात झूठी निकली। नतीजा यह हुआ कि उनकी बीवी पहले से ज्यादा नाराज हो उठी। कहा,”तुम मुझे इस तरह धोखा देने की कोशिश करते हो। जब से तुम घर से गए हो, घर में चूल्हा नहीं जला है। कहीं जाकर मन लगाकर काम करो तो कुछ तनखा मिले और हम दोनों को दो जून खाना नसीब हो। इन जादुई चीजों से कुछ नहीं होने का।”

बेबस शेखचिल्ली खिसियाए हुए – से फिर चल दिए। वह फिर उसी कुएं के चबूतरे पर जाकर बैठ गए। समझ में नहीं आ रहा था कि अब क्या किया जाए। जब सोचते – सोचते वह हार गए और कुछ भी समझ में न आया तो उनकी आंखें छलछला आई और रोने लगे। यह देखकर कुएं की चारों परियां फिर बाहर आयी और शेखचिल्ली से उनके रोने का कारण पूछा। शेखचिल्ली ने सारी आपबीती कह सुनाई। परियों को हंसी आ गई। वे बोलीं,”हमने तो तुमको कोई भयानक दानव समझा था। और इसलिए खुश करने के लिए वे चीजें दी थीं। लेकिन तुम तो बड़े ही भोले – भाले और सीधे आदमी निकले। खैर, घबराने की जरूरत नहीं। हम तुम्हारी मदद करेंगी। तुम्हारा कठपुतला और कटोरा उन्हीं लोगों ने चुराया है, जिनके यहाँ रात को तुम रुके थे। इस बार तुम्हें एक रस्सी व डंडा दे रही हैं। इनकी मदद से तुम उन दोनों को बांध व मारकर अपनी दोनों चीजें वापस पा सकते हो।”इसके बाद परियां फिर कुएं में चली गयीं।

जादुई रस्सी – डंडा लेकर शेखचिल्ली फिर उसी आदमी के यहाँ पहुंचे और कहा,”इस बार मैं तुम्हें कुछ और नये करतब दिखाऊंगा।”वह आदमी भी लालच का मारा था। उसने समझा कि इस बार कुछ और जादुई चीजें हाथ लगेंगी। इसलिए उसमें खुशीखुशी शेखचिल्ली को अपने यहाँ टिका लिया। लेकिन इस बार उल्टा ही हुआ। शेखचिल्ली ने जैसे ही हुक्म दिया वैसे ही उस घरवाले व उसकी बीवी को जादुई रस्सी ने कस कर बांध लिया और जादुई डंडा दनादन पिटाई करने लगा। अब तो वे दोनों चीखने – चिल्लाने और माफी मांगने लगे। शेखचिल्ली ने कहा,”तुम दोनों ने मुझे धोखा दिया है। मैंने तो यह सोचा था कि तुमने मुझे रहने को जगह दी है, इसलिए मैं भी तुम्हारे साथ कोई भलाई कर दूं। लेकिन तुमने मेरे साथ उल्टा बर्ताव किया! मेरे कठपुतले और कटोरे को ही चुरा लिया। अब जब वे दोनों चीजें तुम मुझे वापस कर दोगे, तभी मैं अपनी रस्सी व डंडे को रुकने का हुक्म दूंगा।”उन दोनों ने झटपट दोनों चुराई हुई चीजें शेखचिल्ली को वापस कर दीं। यह देखकर शेखचिल्ली ने भी अपनी रस्सी व डंडे को रुक जाने का हुक्म दे दिया।

अब अपनी चारों जादुई चीजें लेकर शेखचिल्ली प्रसन्न मन से घर को वापस लौट पड़े। जब बीवी ने फिर देखा कि शेखचिल्ली वापस आ गए हैं तो उसे बड़ा गुस्सा आया। उसे तो कई दिनों से खाने को कुछ मिला नहीं था, इसलिए वह भी झुंझलाई हुई थी। दूर से ही देखकर वह चीखी,”कामचोर तुम फिर लौट आए! खबरदार, घर के अंदर पैर न रखना! वरना तुम्हारे लिए बेलन रखा है।”यह सुनकर शेखचिल्ली दरवाजे पर ही रुक गए! मन ही मन उन्होंने रस्सी व डंडे को हुक्म दिया कि वे उसे काबू में करें। रस्सी और डंडे ने अपना काम शुरू कर दिया। रस्सी ने कसकर बांध लिया और डंडे ने पिटाई शुरू कर दी। यह जादुई करतब देखकर बीवी ने भी अपने सारे हथियार डाल दिए और कभी वैसा बुरा बर्ताव न करने का वादा किया। तभी उसे भी रस्सी व डंडे से छुटकारा मिला। अब शेखचिल्ली ने अपने कठपुतले व कटोरे को हुक्म देना शुरू किया। बस, फिर क्या था! कठपुतला बर्तन – भाड़े व जिन – जिन चीजों की कमी थी झटपट ले आया और कटोरे ने बात की बात में नाना प्रकार के व्यंजन तैयार कर दिए।

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Uttar Pradesh ki Lok Kathayen-5 (उत्तर प्रदेश की लोक कथाएँ-5)

सिंहल द्वीप की पद्मिनी: उत्तर प्रदेश/ब्रज की लोक-कथा

किसी जंगल में एक सुन्दर बगीचा था। उसमें बहुत-सी परियां रहती थीं। एक रात को वे उड़नखटोले में बैठकर सैर के लिए निकलीं। उड़ते-उड़ते वे एक राजा के महल की छत से होकर गुजरीं। गरमी के दिन थे, चांदनी रात थी। राजकुमार अपनी छत पर गहरी नींद में सो रहा था। परियों की रानी की निगाह इस राजकुमार पर पड़ी तो उसका दिल डोल गया। उसके जी में आया कि राजकुमार को चुपचाप उठाकर उड़ा ले जाय, परंतु उसे पृथ्वी लोक का कोई अनुभव नहीं था, इसलिए उसने ऐसा नहीं किया। वह राजकुमार को बड़ी देर तक निहारती रही। उसक साथवाली परियों ने अपनी रानी की यह हालत भांप ली। वे मजाक करती हुई बोलीं, “रानी जी, आदमियों की दुनिया से मोह नहीं करना चाहिए। चलो, अब लौट चलें। अगर जी नहीं भरा तो कल हम आपको यही ले आयंगी।”

परी रानी मुस्करा उठी। बोली, “अच्छा, चलो। मैंने कब मना किया ? लगता है, जिसने मेरे मन को मोह लिया है, उसने तुम पर भी जादू कर दिया है।”

परियां यह सुनकर खिलखिलाकर हंस पड़ीं और राजकुमार की प्रशंसा करती हुईं अपने देश को लौट गईं।

सवेरे जब राजकुमार सोकर उठा तो उसके शरीर में बड़ी ताजगी थी। वह सोचता कि हिमालय की चोटी पर पहुंच जाऊं या एक छलांग में समुन्दर को लांघ जाऊं। तभ वजीर ने आकर उसे खबर दी कि राजा की हालत बड़ी खराब है और वह आखिरी सांस ले रहे हैं। राजकुमार की खुशी काफूर हो गयी। वह तुरंत वहां पहुंच गया। राजा ने आंखें खोलीं और राजकुमार के सिर पर हाथ रखता हुआ बोला, “बेआ, वजीर साहब तुम्हारे पिता के ही समान हैं। तुम सदा उनकी बात का ख्याल रखना।”

इतना कहते-कहते राजा की आंखें सदा के लिए मुंद गयीं। राजकुमार फूट-फूटकर रोने लगा। राजा की मृत्यु पर सारे नगर ने शोक मनाया। कहने को तो राजकुमार अब राजा हो गया था, पर अपने पिता की आज्ञानुसार वह कोई भी काम वजीर की राय के बिना नहीं करता था।

एक दिन वजीर राजकुमार को महल के कमरे दिखाने ले गया। उसने सब कमरे खोल-खोलकर दिखा दिये, लेकिन एक कमरा नहीं दिखाया। राजकुमार ने बहुत जिद की, पर वजीर कैसे भी राजी न हुआ। वजीर का लड़का भी उस समय साथ था। वह राजकुमार का बड़ा गरा मित्र था। उसने वजीर से कहा, ‘पिताजी, राजपाट, महल और बाग-बगीचे सब इन्हीं के तो हैं आप इन्हें रोकते क्यों हैं ?”

वजीर ने कहा, “बेटा, तुम ठीक कहते हो। सब कुछ इन्हीं का है, लेकिन मंहाराज ने मरते समय मुझे हुक्म दिया था कि इस कमरे में राजकुमार को मत ले जाना। अगर मैं ऐसा करूंगा तो राज को बड़ा बुरा लगेगा।”

वजीर का लड़का थोड़ी देर तक सोचता रहा। फिर बोला, “लेकिन पिताजी, अब तो राजकुमार ही हमारे महाराज है। उनकी बात मानना हम सबके लिए जरूरी है। अगर आप राजा के दु:ख का इतना ध्यान रखते हैं तो हमारे इन राजा के दु:ख का भी तो ध्यान रखिये ओर दरवाजा खोल दीजिये। राजकुमार को दुखी देखकर हमारे राजा को भी शांति नहीं मिलेगी।”

वजीर ने ज्यादा हठ करना ठीक न समझ और चाबी अपने बेटे के हाथपर रख दी। ताला खोलकर तीनों अंदर पहुंचे। कमरा बड़ा संदर था। छत पर तरह-तरह के कीमती झाड़-फानूस लटक रहे थे और फर्श पर मखमल के गलीचे बिछे हुए थे। दीवार पर सुंदर-सुंदर स्त्रियों की तस्वीरें लगी थीं। यकायक राजकुमार की निगाह एक बड़ी सुंदर युवती की तस्वीर पर पड़ी। उसने वजीर से पूछा कि यह किसकी है? वजीर को जिसका डर था, वही हुआ। उसे बताना ही पड़ा कि वह सिंहलद्वीप की पद्मिनी की है। राजकुमार उसकी सुन्दरता पर ऐसा मोहित हुआ कि उसी दिन उसने वजीर से कहा, “मैं पद्मिनी से ही ब्याह करूंगा। जबतक पद्मिनी मुझे नहीं मिलेग, मैं राज के काम में हाथ नहीं लगाऊंगा।”

वजीर हैरान होकर बोला, “राजकुमार, सिहंलद्वीप पहुंचना आसान काम नहीं है। वह सात समुन्दर पार है। वहां भी जाओ तो शादी करना तो दूर, उससे भेंट करन भी असम्भव है। उसकी तलाश में जो भी गया, लौटकर नहीं आया। फिर ऐसे अनहोने काम में हाथ डालने की सलाह मैं आपको कैसे दे सकता हूं?”

पर राजकुमार अपनी बात पर अड़ा रहा। वजीर का लड़का उसका साथ देने को तैयार हो गया। वे दोनों घोड़े पर सवार होकर चल दिये। चलते-चलते दिन डूब गया। वे एक बाग में पहुंचे और अपने-अपने घोड़े खोल दिये। हाथ-मुंह धोकर कुछ खाया-पिया। वे थके हुए तो थे ही, चादर बिछाकर लेट गये। कुछ देर के बाद ही गहरी नींद में सो गये। आंख खुली और चलने को हुए तो देखते कया हैं कि बाग का फाटक बंद हो गया है और वहां कोई खोलने वाल नहीं है।

बगीचे के बीचों-बीच संगमरमर का एक चबूतरा था। आधी रात पर वहां कालीन बिछाये गये, फूलों और इत्र की सुगंधि चारों ओर फैलने लगी। फिर चबूतरे पर एक सोने का सिंहासन रख दिया गया। कुछ ही देर में घर-घर करता हुआ एक उड़नखटोला वहां उतरा। उसके चारों पायों को एक-एक परी पकड़े हुए थी और उस पर उनकी रानी विराजमान थीं। चारों परियों ने अपनी रानी को सहारा देकर नीचे उतारा और रत्नजड़ित सोने के सिंहासन पर बिठा दिया। परीरानी ने इधर-उधर देखा और अपनी सखियों से कहा, “वह देखो, पेड़ के नीचे चादर बिछाये दो आदमी सो रहे हैं। उनमें से एक वही राजकुमार है। उसे तुरंत मेरे सामने लाओ।”

हुक्म करने की देर थी कि परियां सोते हुए राजकुमार को अपनी रानी के सामने ले आईं। राजकुमार की आंख खुल गई और वह परियों की जगमगाहट से चकाचौंध हो गया। परियों को अपने आगे-पीछे देखकर उसे बड़ा डर लगा और हाथ जोड़कर बोला, “मुझे जाने दीजिये।”

परी रानी ने मुस्कराते हुए कहा, “राजकुमार, अब तुम कहीं नहीं जा सकते। तुम्हें मुझसे विवाह करना होगा।”

राजकुमार बड़ी मुसीबत में पड़ गया। बाला, “परी रानी, मैं क्षमा चाहता हूं। मैं सिंहलद्वीप की पद्मिनी की तलाश में निकला हूं। इस समय मै। विवाह नहीं कर सकता।”

परी ने कहा, “भोले राजकुमार, सिंहलद्वीप की पद्मिनी तक आदमी की पहुंच सम्भव नहीं है। वह दैवी शक्ति के बिना कभी नहीं मिल सकती। अगर तुम मुझसे विवाह कर लोगे तो मैं तुम्हें ऐसी चीज दूंगी, जिससे सिंहलद्वीप की पद्मिनी तुम्हें आसानी से मिल जायेगी।”

राजकुमार यह सुनकर बड़ा खुश हुआ और बोला, “परी रानी, मैं तुमसे जरूर शादी करूंगा, पर तुम्हें मेरी एक बात माननी होगी। मैं जब पद्मिनी को लेकर लौटूंगा तभी तुम्हें अपने साथ ले जा सकूंगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि मेरी इस बात में कोई हेर-फेर नहीं होगी।”

परी ने प्रसन्न होकर अपनी अंगूठी उतारी और राजकुमार की उंगली में पहनाती हुई बोली, “यह अंगूठी जब तक तुम्हारे पास रहेगी कोई भी विपत्ति तुम्हारे ऊपर असर न करेगी। इसके पास रहने से तुम्हारे ऊपर किसी का जादू-टोना नहीं चल सकेगा।”

अंगूठी देकर परी रानी आकाश में उड़ गई। राजकुमार वजीर के लड़के के पा आकर सो गया। सवेरे उन दोनों ने देखा कि बगीचे का फाटक खुला हुआ है। वे दोनों घोड़ों पर सवार होकर चल दिये। पद्मिनी से मिलने की राजकुमार को ऐसी उतावली थी कि वह इतना तेज चला कि वजीर का लड़का उससे बिछुड़ गया। चलते-चलते राजकुमार एक ऐसे शहर में पहुंचा, जहां हर दरवाजे पर तलवारें-ही-तलवारें टंगी हुई थीं। एक दरवाजे पर उसने एक बुढ़िया को बैठे हुए देखा। उसे बड़े जोर की प्यास लगी थी। पानी पीने के लिए वह बुढ़िया के पास पहुंच गया। बुढ़िया झूठ-मूठ का लाड़ दिखाती हुई बोली, “हाय बेटा ! तू बड़े दिनों के बाद दिखाई दिया है। तू तो मुझे पहचान भी नहीं रहा। भूल गया अपनी बुआ को ?”

यह कहते-कहते उसने राजकुमार को ह्रदय से लगा लिया और चुपचाप उसकी अंगूठी उतार ली। इसके बाद उसने राजकुमार को मक्खी बनाकर दीवार से चिपका दिया।

उधर वजीर के लड़के को राजकुमारी की तलाश में भटकते-भटकते बहुत दिन निकल गये। अंत में उसे एक उपाय सूझा। वह परी रानी के बगीचे में पहुंचा और रात को एक पेड़ पर चढ़ गया। आधी-रात को परी रानी उसी चबूतरे पर उतरी। वह वजीर के लड़के की विपदा को समझ गई। उसने उसे सामने बुलाकर कहा, “यहां से सौ योजन की दूरी पर एक जंगल है, उसमें तरह-तरह के हिंसक पशु रहते हैं। वहां ताड़ के पेड़ पर एक पिंजड़ा टंगा हुआ है। उसमें एक तोता बैठा है। उस तोते में उस जादूगरनी का सारा जान छिपा है, जिसने तुम्हारे राजकुमार को मक्खी बनाकर अपने घर में दीवार से चिपका रखा है।

वजीर के लड़के ने पूछा, “इतनी दूर मैं कैसे पहुंच सकता हूं?”

परी रानी ने वजीर के लड़के को अपने कान की बाली उतारकर दी और कहा कि इसको पास रखने से तुम सौ योजन एक घंटे में तय कर लोगे। इसमें एक खूबी यह भी है कि तुम सबको देख सकोगे और तुम्हें कोई नहीं देख पायेगा। इस प्रकार तोते के पिंजड़े तक पहुंचने में तुम्हें कोई कठिनाई नहीं होगी और तोते को मारना तुम्हारे बांये हाथ का खेल होगा।

वजीर का लड़का बाली लेकर खुशी-खुशी जंगल की ओर चल दिया। पेड़ के पास पहुंचकर उसने पिंजड़ा उतारा ओर तोते की गर्दन मरोड़ डाली। इधर तोते का मरना था कि जादूगरनी का भी अंत हो गया। वजीर का लड़का वहां से जादूगरनी के घर पहुंचा। जरदूगरनी की उंगली से जैसे ही उसने अंगूठी खींची कि राजकुमार मक्खी से फिर आदमी बन गया। वजीर के लड़के से मिलकर राजकुमार खुशी के मारे उछल पड़ा। वजीर के लड़के ने राजकुमार को सारा किस्सा कह सुनाया।

अब दोनों साथ-साथ पद्मिनी से मिलने चल दिये। चलते-चलते वे बहुत थक गये थे। रात भर के लिए वे एक सराय में रुक गये। राजकुमार सो रहा था। उधर से विमान में बैठकर महादेव-पार्वती निकले। दोनों बातचीत करते चले जा रहे थे। यकायक महादेवजी ने कहा, “पार्वती, इस नगर की राजकुमारी बहुत सुंदर और गुणवती है। राजा उसकी शादी एक काने राजकुमार के साथ कर रहा है। अगर ब्याह हो गया तो जनम भर राजकुमारी को काने के साथ रहना पड़ेगा। मैं इसी सोच में हूं कि इस सुन्दरी को काने से कैसे छुटकारा दिलाऊं ?”

पार्वतीजी ने नीचे सोये हुए राजकुमार की ओर इशारा करते हुए कहा, “देखिये जरा नीचे की ओर, कितना संदर राजकुमार है! विमान उतारिये और राजकुमार को लेकर वर की जगह पहुंचा दीजिये।”

महादेवजी को यह युक्ति जंच गई। उन्होंने ऐसा ही किया। राजकुमार की शादी उस राजकुमारी से हो गयी। विदा के समय राजकुमार बड़े चक्कर में पड़ा। विवाह करने के बाद लौटते समय मैं तुम्हें साथ ले जाऊंगा। इस समय तो तुम मुझे जाने दो।”

राजकुमारी को राजकुमार पर विश्वास होगया। उसने उसे दो बाल दिये। एक सफेद ओर एक काला। राजकुमारी ने कहा कि काला बाल जलाओगे तो काला हो जायेगा और सारी इच्छाएं पूरी कर देगा।

राजकुमार बाल पाकर बड़ा खुश हुआ और राजकुमारी को लौटने का भरोसा देकर सिंहलद्वीप की ओर चल पड़ा। पहले उसने काला बाल जलाया। बाल के जलाने की देर थी कि काला दैत्य राजकुमार के आगे आ खड़ा हुआ। राजकुमार पहले तो बहुत डरा, पर वह जानता था कि वह दैत्य उसका सेवक है। उसने हुक्म दिया, “जाओ, वजीर के लड़के को मेरे पास ले आओ।”

काला दैत्य उसी क्षण वजीर के लड़के को राजकुमार के पास ले आया। फिर बोला, “और कोई आज्ञा ?”

राजकुमार ने कहा, “हम दोनों को पद्मिनी के महल में पहुंचा दो।”

कहने की देर थी कि वे पद्मिनी के महल के फाटक पर आ गये। वहां एक ह्रष्ट-पुष्ट संतरी पहरा दे रहा था। उसने अंदर नहीं जाने दिया। राजकुमार ने फिर काला बाल जलाया। दैत्य हाजिर हो गया। राजकुमार के हुक्म देते ही काले दैत्यों की पलटन आ गई। उन्होंने रानी पद्मिनी के सिपाहियों को बात-की-बात में मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद दैत्य गायग हो गये।

राजकुमार और वजीर का लड़का महल में घुसे। राजकुमार ने सफेद बाल जलाया। सफेद देव आ गया। राजकुमार ने उससे कहा, “मैं पद्मिनी से विवाह करना चाहता हूं। बारात सजाकर लाओ।”

जरा-सी देर में देव अपने साथ एक बड़ी शानदार बारात सजा कर ले आया। पद्मिनी के पिता ने जब देखा कि कोई राजकुमार पद्मिनी को शान-शौकत से ब्याहने आया है और इतना शक्तिशाली है कि उसने उसकी सारी सेना नष्ट कर डाली है तो उसने चूं तक न की। राजकुमार का ब्याह पद्मिनी से हो गया।

अब राजकुमार पद्मिनी को लेकर अपने घर की ओर रवाना हो गया। रास्ते में से उसने उस राजकुमारी को अपने साथ लिया, जिसने उसे बाल दिये थे। इसके बाद परी रानी के बगीचे में आया। रात को सब वहीं ठहरे। आधी-रात को परी रानी आई। राजकुमार उसे देखकर बड़ा प्रसन्न हुआ और बोला, “यह तुम्हारी ही कृपा का फल है, जो मैं पद्मिनी को लेकर यहां अच्छी तरह लौट आया। यह दूसरी राजकुमारी भी तुम्हारी तरह मुसीबत में मेरी सहायक हुई है। तुम इसे छोटी बहन समझकर खूब प्यार से रखना।”

परीरानी गदगद कंठ से बाली, “राजकुमार, तुम्हारी खुशी में मेरी खुशी है। पद्मिनी के कारण ही हम दोनों को तुम्हारे जैसा सुंदर राजकुमार मिला है। पद्मिनी आज से पटरानी हुई और हम दोनों उसकी छोटी बहनें।”

वे सब उड़नखटोले में बैठकर राजकुमार के देश में आ गयीं। नगर भर में खूब आनन्द मनाया गया और धूमधाम के साथ राजकुमार की तीनों रानियों के साथ सवारी निकाली गई।

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Uttar Pradesh ki Lok Kathayen-6 (उत्तर प्रदेश की लोक कथाएँ-6)

टेसू और झेंझी का प्रेम विवाह: उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

यह तो किसी को नहीं मालूम कि टेसू और झेंझीं के विवाह की लोक परंपरा कब से पड़ी पर यह अनोखी, लोकरंजक और अद्भुद है परंपरा बृजभूमि को अलग पहचान दिलाती है,जो बृजभूमि से सारे उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड तक गांव गांव तक पहुंच गई थी जो अब आधुनिकता के चक्कर में और बड़े होने के भ्रम में भुला दी गई है।इतिहास के पन्नों पर नजर डालें तो पता चलता है कि यह परंपरा महाभारत के बीत जाने के बाद प्रारम्भ हुई होगी।क्योंकि यह लोकजीवन में प्रेम कहानी के रूप में प्रचारित हुई थी इसलिए यह इस समाज की सरलता और महानता प्रदर्शित करती है। एक ऐसी प्रेम कहानी जो युद्ध के दुखद पृष्ठभूमि में परवान चढ़ने से पहले ही मिटा दी गई।यह महा पराक्रमी भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की कहानी है जो टेसू के रूप में मनाई जाती है ।नाक, कान व मुंह कौड़ी के बनाए जाते हैं।

जिन्हें लड़कियां रोज सुबह पानी से उसे जगाने का प्रयास करती हैं। विवाह के बाद टेसू का सिर उखाड़ने के बाद लोग इन कौड़ियों को अपने पास रख लेते हैं। कहते हैं कि इन सिद्ध कौड़ियों से मन की मुरादें पूरी हो जाती हैं।

विजयादशमी के दिन से शुरू होकर यह शादी का उत्सव यद्यपि केवल पांच दिन ही चलता है और कार्तिक पूर्णिमा को शादी सम्पन्न हो जाने के साथ ही समाप्त हो जाता है किंतु हैम उम्र बच्चे इसकी तैयारी पूरी साल करते हैं।कानपुर से लेकर झांसी तक और कानपुर से उरई होते हुए इटावा तक और बृजभूमि से राजस्थान के कुछ गांवों में होती हुई मुरैना में यह प्रथा घुसती है और भिण्ड होते हुए दोनों ओर से बुंदेली धरती पर परंपरागत रूप से टेसू गीत गूंजने लगता थे। अपने कटे सिर से महाभारत को देखने वाले बर्बरीक की अधूरी प्रेम कहानी को पूरा कराकर भविष्य के नव जोड़ों के लिए राह प्रशस्त करने की ब्रज क्षेत्र में प्रचलित टेसू झांझी की परंपरा को मध्य उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड की धरती सहेज रही है। कहीं बाकायदा कार्ड छपवाकर लोगों को नेह निमंत्रण दिया जाता है तो कहीं आज भी बैंड बाजा के साथ बरात पहुंचती है और टेसू का द्वारचार के साथ स्वागत किया जाता है। कहीं झांझी, कहीं झेंझी तो कहीं झिंझिया या झूंझिया, अलग-अलग नाम से जानी जाने वाली इस परंपरा का भाव समान है। टेसू-झांझी के विवाह के बाद ही इस क्षेत्र में शहनाई बजने की शुरुआत होती है।

ब्रज के घर-घर में टेसू झांझी के विवाह की मनाई जाने वाली परंपरा का उल्लास औरैया के दिबियापुर में भी पालन होता है। यहां टेसू झांझी के विवाह में सारी रस्में निभाई जाती हैं। लोग मिलकर टेसू और झांझी तैयार करते हैं। बाकायदा कार्ड छपवाया जाता है। जनाती होते हैं, बराती होते हैं। बैंड बाजा लेकर टेसू की बारात इलाके में घूमती है और बाराती नाचते हुए झांझी के घर पहुंचते हैं। टेसू का द्वारचार से स्वागत होता है। विवाह की रस्म की जाती है। झांझी की पैर पुजाई होती है। इसके बाद कन्यादान किया जाता है। झांझी की ओर से आए लोग व्यवहार लिखाते हैं। प्रीतिभोज भी दिया जाता है।

एक दौर था जब गांव में छोटे छोटे बच्चे – बच्चियां टेसू-झांझी लेकर घर-घर से निकलते थे और गाना गाकर चंदा मांगते थे। इसके लिए टेसू झांझी समिति बनाई। हर साल कोई एक परिवार झांझी के लिए जनाती बनता और एक परिवार टेसू की तरफ से बराती। कुछ इलाकों में शरद पूर्णिमा के दिन बृहद स्तर पर आयोजन होते । गांव-कस्बा, हर जगह आयोजन होता है। ट्रैक्टरों से बारात निकलती है। शहर में रथ व कारों के काफिले की बारात होती है। लोग यह भी मानते हैं कि अगर किसी लड़के की शादी में अड़चन आ रही है तो तीन साल झांझी का विवाह कराए, लड़की की शादी में दिक्कत आ रही है तो टेसू का विवाह कराने का संकल्प लेते हैं। कुंभकार ही टेसू झांझी बनाते हैं और लोग उनसे ले जाते हैं। इसके बाद शरद पूर्णिमा को झांझी की शोभायात्रा निकाली जाती है। दशहरा पर रावण के पुतले का दहन होते ही, बच्चे टेसू लेकर निकल पड़ते हैं और द्वार-द्वार टेसू के गीतों के साथ नेग मांगते हैं, वहां लड़कियों की टोली घर के आसपास झांझी के साथ नेग मांगने निकलती थे।

अब समय के साथ बदलाव आया है। अब कम लोग ही इस पुरानी परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। कानपुर देहात के ग्रामीण इलाके हों या फिर शहरी, यहां सामूहिक आयोजन भले न हो लेकिन घर-घर में टेसू झांझी का विवाह होता था। मान्यता थी कि इस विवाह के बाद अन्य वैवाहिक कार्यक्रमों में कोई अड़चन नहीं आती। शरद पूर्णिमा की रात में मनाए जाने वाले इस विवाह समारोह में महिलाएं मंगलगीत गाती थीं। किवदंती हैं कि भीम के पुत्र घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक को महाभारत का युद्ध देखने आते समय झांझी से प्रेम हो गया। उन्होंने युद्ध से लौटकर झांझी से विवाह करने का वचन दिया, लेकिन अपनी मां को दिए वचन, कि हारने वाले पक्ष की तरफ से वह युद्ध करेंगे के चलते वह कौरवों की तरफ से युद्ध करने आ गए और श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काट दिया। वरदान के चलते सिर कटने के बाद भी वह जीवित रहे। युद्ध के बाद मां ने विवाह के लिए मना कर दिया। इस पर बर्बरीक ने जल समाधि ले ली। झांझी उसी नदी किनारे टेर लगाती रही लेकिन वह लौट कर नहीं आए।

इधर “टेसू अटर करें, टेसू मटर करें, टेसू लई के टरें… यह गाना गाते हुए लड़कों की टोली उधर झांझी के विवाह की तैयारियों में जुटे किशोरियाँ भी झेंझीं गीत गातीं प्रयास किये जाते कि शादी से पहले झेंझी के एक झलक किसी भी प्रकार से टेसू को मिल जाएं।पर मजाल क्या की लड़कियां यह सब होने देतीं। दशहरा मेला में लड़कियां झांझी और लड़के टेसू के नाम की मटकी खरीदकर लाते थे। झांझी कन्या के रूप में टेसू को राजा के रूप में रंग कर टेसू वाली मटकी में अनाज भर कर एक दीया जलाते थे और घर घर जाकर अनाज और धन इकट्ठा करते थे। लोग बच्चों को इस आयोजन में खुले दिल से सहयोग करते और विवाह की रात पूरा साथ देते थे। सामाजिक सद्भाव नक यह परवे था। हर घर का अनाज और पैसा एक साथ मिलकर एक हो जाता है। न कोई ऊंचा न कोई नीचा। लड़कियों में अजब उल्लास रहता था तो लड़कों में भी। लड़कियों को भी उतना ही सहयोग दिया जाता था, जितना लड़कों को। गांव के बड़े लोग शामिल होते थे। कुछ लोग बराती बनते थे, कुछ लोग जनाती। फिर दशहरा से लेकर चतुर्दशी तक तैयारी चलती थी। रात में स्त्रियां और बच्चे इकट्ठा होते थे। नाच गाना होता था। बरात आती थी। खील, बताशे, रेवड़ी बांटी जाती थी।आतिशबाजी होती और फिर अंगले वर्ष के लिए यह समारोह चला जाता।

अड़ता रहा टेसू, नाचती रही झेंझी : – ‘टेसू गया टेसन से पानी पिया बेसन से…’, ‘नाच मेरी झिंझरिया…’ आदि गीतों को गाकर उछलती-कूदती बच्चों की टोली आपने जरूर देखी होगी। हाथों में पुतला और तेल का दीपक लिए यह टोली घर-घर जाकर चंदे के लिए पैसे मांगती है। कोई इन्हें अपने द्वार से खाली हाथ ही लौटा देता है, तो कहीं ये गाने गाकर लोगों का मनोरंजन करते हैं।

ऐसे होता है विवाह :- टेसू-झेंझी नामक यह खेल बच्चों द्वारा नवमी से पूर्णमासी तक खेला जाता है। इससे पहले 16 दिन तक बालिकाएं गोबर से चांद-तरैयां व सांझी माता बनाकर सांझी खेलती हैं। वहीं नवमी को सुअटा की प्रतिमा बनाकर टेसू-झेंझी के विवाह की तैयारियों में लग जाती हैं। पूर्णमासी की रात को टेसू-झेंझी का विवाह पूरे उत्साह के साथ बच्चों द्वारा किया जाता है। वहीं मोहल्ले की महिलाएं व बड़े-बुजुर्ग भी इस उत्सव में भाग लेते थे। प्रेम के प्रतीक इस विवाह में प्रेमी जोड़े के विरह को बड़ी ही खूबसूरती से दिखाया जाता है।

हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार लड़के थाली-चम्मच बजाकर टेसू की बारात निकालते हैं। वहीं लड़कियां भी शरमाती-सकुचाती झिंझिया रानी को भी विवाह मंडप में ले आती हैं। फिर शुरू होता है ढोलक की थाप पर मंगल गीतों के साथ टेसू-झेंझी का विवाह। सात फेरे पूरे भी नहीं हो पाते और लड़के टेसू का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। वहीं झेंझी भी अंत में पति वियोग में सती हो जाती है।

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Uttar Pradesh ki Lok Kathayen-7 (उत्तर प्रदेश की लोक कथाएँ-7)

टिपटिपवा: उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

एक थी बुढ़िया। उसका एक पोता था। पोता रोज़ रात में सोने से पहले दादी से कहानी सुनता। दादी रोज़ उसे तरह-तरह की कहानियाँ सुनाती।

एक दिन मूसलाधार बारिश हुई। ऐसी बारिश पहले कभी नहीं हुई थी। सारा गाँव बारिश से परेशान था। बुढ़िया की झोंपड़ी में पानी जगह-जगह से टपक रहा था—- टिपटिप टिपटिप । इस बात से बेखबर पोता दादी की गोद में लेटा कहानी सुनने के लिए मचल रहा था। बुढ़िया खीझकर बोली—“अरे बचवा, का कहानी सुनाएँ? ई टिपटिपवा से जान बचे तब न !

पोता उठकर बैठ गया। उसने पूछा- दादी, ये टिपटिपवा कौन है? टिपटिपवा क्या शेर-बाघ से भी बड़ा होता है?

दादी छत से टपकते पानी की तरफ़ देखकर बोली—हाँ बचवा, न शेरवा के डर, न बघवा के डर, डर त डर टिपटिपवा के डर।

संयोग से मुसीबत का मारा एक बाघ बारिश से बचने के लिए झोंपड़ी के पीछे बैठा था। बेचारा बाघ बारिश से घबराया हुआ था। बुढ़िया की बात सुनते ही वह और डर गया।

अब यह टिपटिपवा कौन-सी बला है? ज़रूर यह कोई बड़ा जानवर है। तभी तो बुढ़िया शेर-बाघ से ज्यादा टिपटिपवा से डरती है। इससे पहले कि बाहर आकर वह मुझपर हमला करे, मुझे ही यहाँ से भाग जाना चाहिये।

बाघ ने ऐसा सोचा और झटपट वहाँ से दुम दबाकर भाग चला।

उसी गाँव में एक धोबी रहता था। वह भी बारिश से परेशान था। आज सुबह से उसका गधा गायब था। सारा दिन वह बारिश में भीगता रहा और जगह-जगह गधे को ढूंढता रहा, लेकिन वह कहीं नहीं मिला।

धोबी की पत्नी बोली – जाकर गाँव के पंडित जी से क्यों नहीं पूछते? वे बड़े ज्ञानी हैं। आगे-पीछे सबके हाल की उन्हें खबर रहती है।

पत्नी की बात धोबी को जँच गई। अपना मोटा लट्ठ उठाकर वह पंडित जी के घर की तरफ़ चल पड़ा। उसने देखा कि पंडित जी घर में जमा बारिश का पानी उलीच-उलीचकर फेंक रहे थे।

धोबी ने बेसब्री से पूछा – महाराज, मेरा गधा सुबह से नहीं मिल रहा है। जरा पोथी बाँचकर बताइये तो वह कहाँ है?

सुबह से पानी उलीचते-उलीचते पंडित जी थक गए थे। धोबी की बात सुनी तो झुंझला पड़े और बोले—मेरी पोथी में तेरे गधे का पता-ठिकाना लिखा है क्या, जो आ गया पूछने? अरे, जाकर ढूंढ उसे किसी गढ़ई-पोखर में।

और पंडित जी लगे फिर पानी उलीचने। धोबी वहां से चल दिया। चलते-चलते वह एक तालाब के पास पहुँचा। तालाब के किनारे ऊँची-ऊँची घास उग रही थी। धोबी घास में गधे को ढूँढने लगा। किस्मत का मारा बेचारा बाघ टिपटिपवा के डर से वहीँ घास में छिपा बैठा था। धोबी को लगा कि बाघ ही उसका गधा है। उसने आव देखा न ताव और लगा बाघ पर मोटा लट्ठ बरसाने। बेचारा बाघ इस अचानक हमले से एकदम घबरा गया।

बाघ ने मन ही मन सोचा – लगता है यही टिपटिपवा है। आखिर इसने मुझे ढूंढ ही लिया। अब अपनी जान बचानी है तो जो यह कहता है, वही करना होगा।

आज तूने मुझे बहुत परेशान किया है । मार मारकर मैं तेरा कचूमर निकाल दूँगा। ऐसा कहकर धोबी ने बाघ का कान पकड़ा और उसे खींचता हुआ घर की तरफ़ चल दिया। बाघ बिना चूं चपड़ किये भीगी बिल्ली बना धोबी के साथ चल दिया। घर पहुँच कर धोबी ने बाघ को खूंटे से बांधा और सोने चला गया।

सुबह जब गाँव वालों ने धोबी के घर के बाहर खूंटे से बंधे बाघ को देखा हैरानी से उनकी आँखें खुली रह गईं।

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Uttar Pradesh ki Lok Kathayen-8 (उत्तर प्रदेश की लोक कथाएँ-8)

धान की कहानी: उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

एक बार ब्राह्मण टोला के निवासियों को किसी दूर गांव से भोजन के लिए निमंत्रण आया। वहां के लोग बहुत प्रसन्न हुए और जल्दी-जल्दी दौड़-भागकर उस गांव में पहुंच गए। वहां सबने जमकर भोजन का आनन्द उठाया। खूब छककर खाया।

भोजन करने के बाद सब लोग अपने घर की ओर चल दिये। पैदल ही चले क्योंकि सवारी तो थी नहीं। रास्ते में चावल के खेत लहलहा रहे थे। यह देखकर उनमें से किसी से रहा नहीं गया।

सबने आव देखा ना ताव और टूट पडे चावल पर। हाथ से चावल के बाल अलग करते, और मुंह में डाल लेते। उसी रास्ते से शिव व पार्वती भी जा रहे थे। इस तरीके से उन लोगों को खाते देख पार्वती ने शिवजी से कहा- ‘देखिए, ये लोग भोज खाकर आ रहे हैं, फिर भी कच्चे चावल चबा रहे हैं।’

शिवजी ने पार्वती की बात अनसुनी कर दी । पार्वती ने सोचा, मैं ही कुछ करती हूं। सोच-विचार के बाद उन्होंने शाप दिया कि चावल के ऊपर छिलका हो जाए। तभी से खेतों में चावल नहीं धान उगने लगे।

सोने का भिक्षापात्र: उत्तर प्रदेश की लोक-कथा

अयोध्या में चूड़ामणि नाम का एक व्यक्ति रहता था। धन पाने की इच्छा से उसने बहुत दिनों तक भगवान की तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर एक रात धन देवता कुबेर ने उसे सपने में दर्शन दिए।

उन्होंने कहा- “सूर्योदय के समय तुम हाथ में लाठी लेकर घर के दरवाजे पर खड़े हो जाना। कुछ देर बाद तुम्हारे पास एक भिक्षुक आएगा। उसके हाथ में एक भिक्षापात्र होगा। जैसे ही तुम उस भिक्षा पात्र में अपनी लाठी अड़ाओगे वह सोने में परिवर्तित हो जाएगा। उसे तुम अपने पास रख लेना। ऐसा दस दिन करने से तुम्हारे पास दस सोने के पात्र हो जाएंगे। जिससे तुम्हारी जीवनभर की दरिद्रता दूर हो जाएगी।’

रोज सुबह उठकर चूड़ामणि वैसा ही करने लगा, जैसा कुबेर ने सपने में बताया था। एक दिन उसे ऐसा करते हुए लालची पड़ोसी ने देख लिया। बस उसी दिन से चूड़ामणि का पड़ोसी नित्य प्रति किसी भिक्षुक की प्रतीक्षा में अपने घर के दरवाजे पर लाठी लिए खड़ा रहता।

बहुत दिन बाद अंतत: एक भिक्षुक उसके दरवाजे पर भिक्षा मांगने आया। पड़ोसी ने भिक्षापात्र पर डंडा छुआया पर वह सोने में नहीं बदला। अंत में उसे गुस्सा आया और उसने आव देखा न ताव भिक्षुक पर प्रहार करना शुरू कर दिया। थोड़ी देर में भिक्षुक के प्राण-पखेरू उड़ गए। उसके इस कर्म की सूचना राजा तक पहुंची। राजकर्मचारी उसे गिरफ्तार कर राजा के सामने ले गए अभियोग सिद्ध किया गया।

लालच ने पड़ोसी को मौत के मुंह तक पहुंचा दिया।