Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-1 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-1)

दुर्भावना का फल : उत्तराखंड की लोक-कथा

गंगा नदी गौमुख से निकलकर उत्तरांचल में कुछ दूर तक जाह्नवी के नाम से भी जानी जाती है। उसी जाह्नवी नदी के किनारे एक महर्षि का गुरुकुल था, जहां धर्म और अस्त्र-शस्त्र चलाने की शिक्षा दी जाती थी। वहां अनेक शिष्य आते। गुरुकुल में कड़ा अनुशासन था। गुरु की आज्ञा का पालन करना और आपस में मित्रता का व्यवहार करना वहां का पहला नियम था। गुरुकुल में अपने बच्चों को भेजने के बाद माता-पिता निश्चिंत हो जाते थे। उन्हें गुरु पर विश्वास था कि वे बच्चों को अच्छी शिक्षा और अच्छे संस्कार देंगे।

उसी गुरुकुल में विभूति, दक्षेस, सुवास और नवीन भी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। विभूति और दक्षेस बहुत बुद्धिमान थे। हर विद्या सबसे पहले सीख लेते। बस एक ही कमी थी कि दोनों बहुत ईर्ष्यालु थे। किसी और की प्रशंसा न कर सकते थे, न सुन सकते थे। इसके विपरीत सुवास और नवीन साधारण बुद्धि के थे, पर सबसे मित्रता का व्यवहार करते। सबके गुणों का सम्मान करते। सुवास और नवीन ने अपने साथियों को समझाने का बहुत प्रयास किया, पर सब व्यर्थ। महर्षि को भी बहुत चिंता थी कि उन्हें कैसे सुधारा जाए? वे दोनों बालकों में अहंकार और ईर्ष्या की भावना को ख़त्म करना चाहते थे, पर उचित अवसर नहीं मिल रहा था।

जाह्नवी नदी के दूसरे किनारे पर एक बस्ती थी। वहां एक ज़मींदार थे, जिनकी शिक्षा-दीक्षा इसी गुरुकुल में हुई थी। उन्हीं दिनों वे गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ, जिन्हें उत्तरांचल के चार धाम कहा जाता है, की यात्रा करके लौटे। उन्होंने एक भोज का आयोजन किया। ज़मींदार ने सबसे पहले गुरुकुल में संदेश भेजा, “महर्षिवर, संदेशवाहक के साथ कृपया अपने दो योग्य शिष्य भेज देवें। उन्हें भोजन कराने के बाद ही भोज आरंभ होगा। साथ ही मैं उनकी योग्यता के लिए उन्हें सम्मानित भी करना चाहता हूं।”

गुरु ने कुछ सोचकर विभूति और दक्षेस को बुलाया और कहा, “नदी के उस पार रहने वाले ज़मींदार ने आश्रम के दो योग्य शिष्यों को दावत के लिए बुलाया है। दावत के पश्चात वे उनकी योग्यता के लिए उन्हें सम्मानित करना चाहते हैं। गुरुकुल में तुम्हारी विद्या बुद्धि को देखते हुए मैंने तुम दोनों को चुना है। आज ही वहां जाना है-क्या तुम जाओगे?”

“अवश्य,” दोनों ने एक साथ कहा।

दोनों शिष्य संदेशवाहक के साथ जमींदार के यहां पहुंचे । भोजन की सुगंध वातावरण में फैली थी। ज़मींदार ने उनका स्वागत करते हुए कहा, “भोजन तैयार है, आप दोनों दूर से आए हैं। पास ही कुआं है, वहां जाकर हाथ-पैर धो लें, फिर आसन ग्रहण करें। इसलिए कुएं का चबूतरा छोटा है एक समय में एक ही व्यक्ति खड़ा हो पाएगा, अतः आप में से पहले एक जाए फिर दूसरा।”

विभूति झटपट उठा और कुएं की ओर चला गया। दक्षेस वहीं बैठा रहा। ज़मींदार ने दक्षेस से पूछा, “जो कुएं की ओर गए हैं सुना है वे गुरुकुल के शिष्यों में सबसे श्रेष्ठ हैं और बहुत बड़े विद्वान हैं?”

“विद्वान! किसने कहा आपसे कि वह विद्वान है? अरे वह तो ख़च्चर है… पूरा खच्चर!” दक्षेस क्रोध से बोला।

यह सुनकर ज़मींदार ने कुछ नहीं कहा। थोड़ी देर बाद दोनों शिष्यों को भोजन के लिए बुलवाया गया। जब वे खाने के लिए बैठ तो उनके सामने जानवरों का भोजन भूसा, हरी घास और चने का दाना परोसा गया। उसे देखते ही दोनों क्रोध से उबल पड़े।

“आपने हमें क्या जानवर समझ रखा है, जो खाने के लिए घास-भूसा दिया है…?” चिल्लाते हुए दोनों शिष्य क्रोध से पैर पटकते तेज़ी से वहां से बाहर निकल पड़े। वे लगभग दौड़ते हुए गुरुकुल पहुंचे और सारी घटना महर्षि को बताई। अभी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि पीछे से ज़मींदार का संदेशवाहक हांफता हुआ पहुंचा । उसने महर्षि से क्षमा मांगते हुए कहा, “गुरुवर क्षमा करें, कहीं कुछ समझने में भूल हो गई। ज़मींदार स्वयं आते, पर हवेली मेहमानों से भरी है इसलिए नहीं आ पाए। आप शिष्यों को पुनः भेज दें। मैं उन्हें लेने आया हूं बिना शिष्यों को भोजन कराए अन्य मेहमानों को भोजन नही परोसा जाएगा।”

महर्षि ने इस बार दूसरे दो शिष्यों सुवास और नवीन को संदेशवाहक के साथ भेजा। वे दोनों ज़मींदार के यहां पहुंचे तो ज़मींदार ने उनसे भी बारी-बारी कुएं पर जाकर हाथ-पैर धोने के लिए कहा। पहले नवीन कुएं की ओर गया। सुवास को अकेला देखकर ज़मींदार ने वही बात फिर कही, “सुना है कि वे जो कुएं की ओर गए हैं, गुरुकुल में सबसे श्रेष्ठ और बहुत विद्वान हैं।”

सुवास ने कहा, “आपने ठीक सुना है। गुरुकुल में रहकर गुरुवर से हमें रोज़ अच्छी बातें सीखने को मिलती हैं।”

ज़मींदार ने फिर पूछा, “आपने यह नहीं बताया कि आप दोनों में श्रेष्ठ कौन है?”

“श्रेष्ठ तो नवीन है,” सुवास ने बेहिचक कहा।

“और आप?” ज़मींदार ने पुनः पूछा।

“मैं तो उसके सामने कुछ भी नहीं हूं,” सुवास ने उत्तर दिया।

तभी नवीन लौटा और सुवास कुएं की ओर गया। ज़मींदार ने वही प्रश्न नवीन से किया। नवीन ने उत्तर दिया, “सुवास तो सूर्य है, मैं तो उसकी विद्‌वता के सामने एक दीपक भर हूं।”

ज़मींदार उनके उत्तर से संतुष्ट हुए और दोनों का यथोचित सत्कार किया। दक्षिणा में उन्हें पांच-पांच गायें, पुरस्कार स्वरूप चांदी की खड़ाऊं भेंट कीं। वे दोनों जब गुरुकुल लौटे तो बहुत प्रसन्नर थे।

यह देखकर विभूति और दक्षेस का क्रोध और बढ़ गया। वे महर्षि के पास पहुंचे और कहा, “हम दोनों आपके इन शिष्यों से अधिक बुद्धिमान हैं फिर भी हम अपमानित हुए। आप सब जानकर भी चुप हैं और नवीन एवं सुवास की प्रशंसा कर रहे हैं।”

गुरु महर्षि ने उत्तर दिया, “यह तो ज़मींदार ही बता सकते हैं।”

“तो आप चलकर उनसे पूछते क्यों  नहीं?” दक्षेस ने हठ किया। महर्षि अनमने से चारों शिष्यों को साथ लेकर चल पड़े। ज़मींदार ने दौड़कर गुरु की अगवानी की और चारों शिष्यों को आसन दिया।

महर्षि ने आने का कारण बताते हुए कहा, “वत्स, आपने शिष्यों के साथ भेदभाव क्यों किया? दक्षेस और विभूति का कहना है कि उनका अपमान हुआ है। आपको इसका उचित कारण बताना ही होगा अन्यथा…!”

ज़मींदार ने गंभीर स्वर में कहा, “महर्षि, मैंने आपसे दो सुयोग्य विद्वान भेजने का आग्रह किया था। पर आपने मेरे यहां बैल और ख़च्चर भेज दिए। जब मैंने आपके पहले भेजे हुए शिष्यों से प्रश्न पूछा तो इन्होंने एक-दूसरे का यही परिचय दिया। अत: मैंने दोनों के लिए जानवरों वाले प्रिय भोजन परोसे। मुझसे कोई भूल हो गई हो तो मैँ क्षमा…!”

ज़मींदार की बात ख़त्म होने से पहले विभूति और दक्षेस का सिर शर्म से झुक गया। उन्हें अपनी भूल महसूस हुई, उन्होंने ज़मींदार से क्षमा मांगी।

तब गुरु महर्षि ने कहा, “अहंकार और ईर्ष्या के कारण तुम दोनों में प्रेम नहीं है, पारस्परिक सदभाव नहीं है। इसी कारण तुम दोनों योग्य होकर भी अयोग्य सिद्ध हुए और सभा में अपमानित हुए। वहीं सुवास और नवीन तुम दोनों की अपेक्षा कम योग्य हैं पर वे विनम्र, शिष्ट और एक-दूसरे के प्रति मित्रता का भाव रखते हैं। इसी कारण आज यहां सम्मानित हुए। सबकी भावना की कद्र करना, सबसे प्रेम करना और सबका सम्मान करना ही शिष्य को योग्य बनाता है।”

इसे सुनकर वहां उपस्थित लोगों ने गुरु की प्रशंसा की और गुरु को यह विश्वास हो गया कि अब उनके चारों शिष्य एक समान योग्य होकर घर लौटेंगे।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-2 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-2)

फूलों की घाटी: उत्तराखंड की लोक-कथा

बहुत पुरानी बात है। हिमालय पर्वत की घाटी में एक ऋषि रहते थे। वे गोरे-चिट्टेथे, उनकी श्वेत धवल दाढ़ी था और कंद, मूल, फल खाते थे । अपना अधिक समय वह तपस्या में व्यतीत करते थे। कभी-कभी बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच अकेले वह उदास हो जाते। उदासी तोड़ने के लिए अक्सर वह जोर से बोलने लगते। उन्हीं की आवाज ऊंचे पर्वतों से टकराकर लौट आती। दूर-दूर तक नजर दौड़ाकर वह कुछ खोजने लगते। चारों ओर दूध-सी सफेद बर्फ ही दिखाई देती। उनका मन और उदास हो जाता।

एक दिन उन्होंने ध्यान लगाकर भगवान से कहा, ‘प्रभु कभी-कभी मन नहीं लगता, सूने पहाड़ की उदासी काटने लगती है। कुछ कृपा करो।’

ऋषि अभी ध्यानमग्न ही थे, तभी उन्हें छम-छम करती पायल की झंकार सुनाई दी। उन्होंने आंखे खोलीं। देखा, हिम-सी एक बालिका श्वेत वस्त्रों से सजी सामने खड़ी थी। मंत्रमुग्ध ऋषि ने दौड़कर बच्ची को गोद में उठा लिया। उनका हृदय पुलकित हो उठा। खुशी में आंखों से आंसू बहने लगे।

ऋषि के आंसू बहते देख, बच्ची मीठी वाणी में बोली, ‘बाबा रोते क्यों हो?’

‘मैं रो नहीं रहा हूं। ये खुशी के आंसू हैं मेरी बच्ची। बताओ, तुम कहां से आई हो? तुम्हारा नाम क्या है? तुम किसकी बेटी हो?’ ऋषि ने पूछा।

बच्ची बोली, ‘मैं नीचे की घाटियों से आई हूं। मेरी मां ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है। मेरी मां का नाम प्रकृति है। मेरा नाम है सुषमा।’

‘तुम कब तक मेरे पास रहोगी? मुझे लगता है, अब एक बार तुम्हें पा लिया तो मैं एक क्षण भी तुम्हारे बिना न रह सकूंगा। अब तुम मुझे छोड़कर कभी न जाना।’ कहते हुए वृद्ध ऋषि विभोर हो गए।

‘मैं तुम्हारे पास ही रहूंगी बाबा। मेरी मां ने कहा है, उदास ऋषि के चारों तरफ खुशी बिखेर देना, ताकि कभी किसी को भी भविष्य में हिमालय में उदासी न घेरे। मैं कभी भी तुम्हें छोड़कर न जाऊंगी। आज से तुम मेरे बाबा हो। यह हिमालय मेरा घर है।’ बच्ची ने कहा। ऋषि प्रसन्न थे। वह बच्ची का हाथ थामे, बर्फानी पर्वतों पर घूमते। कभी उसे गोद में लिए मीलों चलते। दोनों प्रसन्न थे। अक्सर ऋषि बालिका को कथा सुनाते।

एक दिन ऋषि ने बालिका को हंसने वाली मनोरंजक कथा सुनाई, तो वह खिलखिला कर हंस दी। जब वह खिलखिल हंस रही थी, तो ऋषि उसी तरफ देख रहे थे। बच्ची की हंसी के साथ रंग-बिरंगे, सुंदर फूल झर रहे थे। वह मंद हवा के साथ दूर-दूर तक फैलते जा रहे थे। थोड़ी देर में बच्ची ने हंसना बंद किया। तब तक दूर-दूर तक फूल ही फूल धरती पर उग आए थे। ऋषि ने दूर तक देखा और मुसकुराकर कहा, ‘यही है फूलों की घाटी। इस धरती का स्वर्ग।’

फूलों के सौंदर्य में डूबे ऋषि बालिका के साथ घूमते रहे। एक दिन उनकी अंगुली पकड़े बालिका ठुमक-ठुमक कर चल रही थी, तभी एकाएक उसका पैर फिसला और उसे चोट आ गई। कोमल तो वह थी ही। ऊं…ऊं… करके रोने लगी। बड़ी-बड़ी आंखों से मोती से आंसू ढुलक-ढुलक कर धरती पर गिरने लगे। ऋषि ने उसे संभाला। चोट को सहलाया। बच्ची चुप हुई, तो ऋषि ने देखा कि जहां-जहां आंसू की बूंदे गिरी थीं, वहां जल धाराएं बह रही हैं। निर्झर झर रहे हैं। ऋषि जैसे तृप्त हो गए, उस दृश्य को देखकर।

सचमुच बच्ची ने ऋषि की उदासी मिटा दी। मुदित मन से ऋषि उसे लिए ऊंची चोटियों पर, यहां से वहां जाते। जहां बच्ची हंसती, वहां फूल बिखर जाते, जहां रोती, वहां झरने बहते, अब सुंदरता हिमालय पर सर्वत्र छा गई। ऋषि की उदासी दूर हो गई। बाबा और बच्ची दोनों मगन थे।

समय बीतने लगा। बहुत-बहुत वर्षों बाद बर्फानी पर्वतों, फूलों की घाटियों और नदी-झरनों के नीचे की घाटियों में रहने वालों को इस अनोखे सौंदर्य की खबर मिली। वे लोग मार्ग खोज-खोज कर ऊपर जाने लगे। कठिन मार्ग में उन्हें थकावट लगती, कष्ट होता, पर ऊपर पहुंचकर सब भूल जाते। धीरे-धीरे अपने मार्ग के कष्ट को दूर करने के लिए उन्होंने अच्छा सुगम मार्ग बनाने का विचार किया। हरी-भरी धरती पर लगे कुदाल चलाने। कभी सह लेती धरती मां, पर कभी गुस्से से गरज पड़ती और पहाड़ टूट जाते। हरियाली पर टूटा पहाड़ मनुष्य की निर्दयता की कहानी कहता।

लोग आने लगे, ऋषि और बालिका ऊंची-ऊंची चोटियों की ओर बढ़ने लगे। वे जहां जाते, सूखे पर्वत सौंदर्य से भर जाते। इस तरह ऋषि ने सुषमा को साथ लगाकर हिमालय को स्वर्ग के समान बना दिया। आज ऋषि नहीं है, मगर हिमालय के झरनों, हरे मैदानों और फूलों की घाटी के रूप में सुषमा चारों ओर जैसे हंसती-मुसकुराती ऋषि की कहानी कहती दीख पड़ती है।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-3 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-3)

बीरा बैण (बहन) उत्तराखंड की लोक-कथा

बहुत पुरानी बात है। उत्तराखंड के जंगल में एक विधवा बुढ़िया रहती थी। उसके सात बेटे थे और एक प्यारी-सी बेटी थी । बेटी का नाम था बीरा। कुछ दिनों बाद जब बुढ़िया की मृत्यु हो गई, तो उसके ये बच्चे अनाथ हो गए। सातों भाई शिकार खेलने के शौकीन थे।

एक दिन वे सातों भाई मिलकर एक साथ शिकार खेलने निकले। उन्होंने चलते-चलते अपनी बहन बीरा से कहा-तुम हमारे लिए भोजन बनाकर रखना, हम जल्दी लौट कर आ जाएंगे।

भाइयों के जाने के बाद झोंपड़ी में बीरा अकेली रह गई। बीरा ने आग जलाकर खीर बनाना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद खीर उबल कर चूल्हे में गिर गई। इससे आग बुझ गई।

बीरा बहुत परेशान हुई। उसके पास माचिस भी नहीं थी, वह आग कैसे जलाती? उसके आस-पास कोई घर भी नहीं था। अब वह आग कहां से मांग कर लाए? वह अपनी झोंपड़ी से निकल कर जंगल में दूर तक निकल गई। देखने लगी कि कोई घर मिले, तो वहां से आग मांग ले।

चलते-चलते उसे एक बड़ा-सा मकान दिखाई दिया। उसने मकान के सामने जाकर उसका दरवाजा खटखटाया। दरवाजा एक औरत ने खोला। औरत ने बीरा को देखकर कहा-‘तुम यहां से चली जाओ। यह राक्षस का घर है। वह अभी आने वाला है। तुम्हें देखेगा, तो तुम्हें खा जाएगा।’

बीरा ने कहा-‘बहन! मुझे थोड़ी-सी आग चाहिए। खाना बनाना है। बड़ी जोर की भूख लगी है।’

वह औरत राक्षस की पत्नी थी, लेकिन जब बीरा ने उसे बहन कहा, तो उसे बीरा पर दया आ गई। उसने बीरा को जल्दी से थोड़ी-सी आग दे दी। उसने उसे चौलाई भी दी और कहा-‘तुम यहां से जल्दी निकल जाओ। ऐसा करना कि रास्ते में इस चौलाई के दानों को गिराती जाना। जहां भी दो रास्ते मिलें, वहां के बाद चौलाई मत गिराना। इससे राक्षस रास्ता भटक जाएगा और तुम्हारे घर तक नहीं पहुंच सकेगा। याद रखना इस चौलाई को अपने घर तक मत ले जाना, नहीं तो राक्षस वहीं पहुंच जाएगा।’

बीरा अपने साथ चौलाई ले गई और उसके दाने रास्ते में गिराती गई। वह जल्दी-जल्दी जा रही थी। वह राक्षस की पत्नी की बात भूल गई। उसने पूरे रास्ते पर चौलाई के दारे गिरा दिए। कुछ दाने अपने घर तक भी ले गई।

जब राक्षस अपने घर लौट कर आया, तो उसे मनुष्य की गंध आने लगी। वह समझ गया कि आज जरूर कोई मनुष्य मेरे घर आया है। उसने अपनी पत्नी से पूछा- ‘आदमी की गंध आ रही है, क्या कोई आदमी हमारे घर आया था?’

उसकी पत्नी ने कहा-‘नहीं तो। यहां तो कोई नहीं आया।’

राक्षस ने अपनी पत्नी को पहले तो खूब डांटा। फिर मारना-पीटना शुरू कर दिया। डर के मारे उसकी पत्नी ने राक्षस को बीरा के आने की बात बता दी। सुनते ही वह राक्षस बीरा की तलाश में निकल पड़ा। वह चौलाई के बीज देखता हुआ बीरा की झोंपड़ी तक पहुंच गया। झोंपड़ी में बीरा अकेली थी। तब तक उसके भाई नहीं लौटे थे। उसने अपने भाइयों के लिए खाना बनाकर सात थालियों में परोस कर रखा हुआ था। राक्षस को देखकर वह डर गई और पानी के पीपे में छिपकर बैठ गई। राक्षस ने सारा खाना खा लिया। खाने के बाद वह पानी के पीपे की ओर गया। सारा पानी पीने के बाद उसने खाली पीपे में बैठी बीरा को पकड़ लिया। वह बीरा को जीवित निगल गया।

खा-पीकर राक्षस झोंपड़ी के दरवाजे पर सो गया, क्योंकि उसे बहुत जोर की नींद आ रही थी। जब बीरा के भाई लौटकर आए, तो उन्होंने राक्षस को दरवाजे पर सोते हुए पाया। उन्होंने देखा बीरा घर में नहीं है। वे समझ गए कि जरूर इस राक्षस ने हमारी बीरा बहन को खा लिया है। उन्होंने तुरंत राक्षस के हाथ-पैर काट डाले। फिर उसका पेट फाड़ दिया। राक्षस मर गया और उसके पेट से बीरा भी निकल आई।

इसके बाद वे भाई-बहन सुख पूर्वक रहने लगे। जब भी वे कभी बाहर जाते, तो कोई न कोई भाई बीरा के पास जरूर रह जाता था।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-4 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-4)

अजुआ बफौल उत्तराखंड की लोक-कथा

बहुत पुरानी बात है, हिमालय के पर्वतों में पंच देवता यात्रा पर निकले थे। एक जगह विश्राम करते करते वे मंनोरंजन हेतु क्रीड़ा करने लगें। उन्होने चार गोले बनाये और चार दिशाओं में फेंके। उन गोलों से चार मल्लों ( विशालकाय बलशाली व्यक्ति) का जन्म हुआ। उन्होने पंचदेवताओं से अपनी उत्पत्ति का कारण पूछा। पंचदेवताओं ने कहा – हम तो मंनोरंजन कर रहे थे उसी में तुम्हारी उत्पत्ति हुई है। मल्लों ने कहा कि हमें कोई कार्य सौपा जाए। पंचदेवताओं ने कहा कि जाओं दुनिया का भ्रमण करों अपने जैसे बलशाली मल्लों से युद्ध करों और अपनी ताकत का परीक्षण करों।

चारों मल्लों ने नामचीन मल्लों को चुनौती दी और उन्हे परास्त कर दिया। वे सारे जग में अपनी ताकत का परीक्षण कर वापस पंचदेवताओं के पास लौटे और अपने विगत सारे अनुभव उन्हे बताए। उन्होने कहा कि अब वे चारों थक चुके है। कहीं भी उन्हे पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है। अब पंचदेवता ही उनके भोजन की व्यवस्था करें । पंच देवता परेशान हो गये कि इन मल्लों की भोजन पूर्ति कैसे की जाये। उन्हे मल्लों से कहा- हम तो जोगी है, भिक्षा मांगकर जीवन व्यतीत करते है। कभी भिक्षा मिल जाती है कभी नहीं मिलती तो ऐसे ही दिन काटना पड़ता है। तुम ऐसा करो चंपावत के पास राजा कालीचन्द्र का साम्राज्य है , उसके पास तुम्हारे जैसे ही मल्ल है जिनके खाने पीने की वह उचित व्यवस्था करता है। उसे और मल्लों की आवश्यकता है। तुम उनके दरबार में चले जाओ।

कालीचन्द्र के दरबार में 22 बफौल भाई रहते थे। वे काफी बलशाली थे। उनकी एक पत्नी थी, जिसका नाम दूधकेला था। वे अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते थे। पुरे राज्य में उनके प्रेम काफी मशहूर था। राजा कालीचन्द्र की रानी को उनका प्रेम रास नहीं आता था। यह भी कहा जाता है कि रानी की दृष्टि बफौल भाइयों पर थीं । वह चाहती थी कि सारे बफौल भाई राजा को मारकर स्वयं वहां के राजा बन जाये और वो उनकी रानी बनकर रहे। परन्तु बफौल भाइयों ने ऐसा करने से मना कर दिया था। रानी को भय था कि वे इस बात को राजा को न बता दे , रानी ने एक चाल चली। उसने राजा कालीचन्द्र से यह कहा कि बफौल रानी पर कुदृष्टि रखते हैं। जिससे दरबार में असहज महसूस करती है।

राजा कालीचन्द्र रानी के प्रति ऐसा व्यवहार कैसे सहन करता। उसने बफौलों को मृत्युदण्ड का आदेश पारित कर दिया। उसी वक्त वहां चारों मल्ल दरबार पर राजा से रखने की विनति कर रहे थे। राजा ने आदेश दिया कि अगर वे चारों उन 22 बफौल भाइयों का सर काटकर लायेंगें तो वे उन्हे दरबार में रखेगा। सभी जानते थे कि बफौल भाई गलत विचार वाले व्यक्ति नहीं थे। वे तो सिर्फ अपनी पत्नी से प्रेम करते थे। पर राजा ने किसी की नहीं सुनी और चारों मल्लों को आदेश दे दिया। चारों मल्लों ने बारी बारी से युद्ध करके बाइसों बफौलों को मौत के घाट उतार दिया।

अपने पतियों की मृत्यु से दुखी दूधकेला सती होने के लिये तैयारी कर रही थी कि उसके गर्भ से आवाज आई कि मां, तुम अपने आप को क्यूं सती कर रही हो। तुम्हारे साथ मेरी भी मृत्यु हो जायेगी। ऐसे तो बफौल वंश खत्म हो जायेगा। अपने गर्भ में पल रहे सात माह के बच्चे की यह बात सुन कर उसने सती होने का विचार बदल दिया, उसे अपने जीने की एक उम्मीद उस बच्चे में नजर आई।

दूधकेला ने बच्चे को जन्म दिया और उसे अजुआ बफौल नाम दिया। धीरे धीरे वक्त बीतते गया। अजू बफौल बड़ा होने लगा उसकी ताकत की चारों तरफ चर्चा होने लगी। उधर चारों मल्लों की खानापूर्ति सभी गांव वाले परेशान हो गये थे। हद से ज्यादा खाना, दूध , दही चारों मल्ल अपने लिये ले जाते थे। उनसे कोई कुछ नहीं कह पाता था। अजू बफौल तक जब यह बात पहुंची तब उसने मां से उन चारों मल्लों के बारे में पूछा , तब दूधकेला ने बताया कि इन्ही चारों ने तुम्हारे पिता की हत्या की थी। यह बात सुन के अजू बफौल का खून खौल गया। उसने चारों मल्लों को युद्ध के लिये ललकारा। उनके बीच काफी भयंकर युद्ध चला और बारी बारी से अजू बफौल ने चारों मल्लों को मौत के घाट उतार दिया। उनको मारने के बाद ही अजू बफौल का गुस्सा शांत हुआ। इस तरह गांव वालों ने भी चैन की सांस ली। अजू बफौल ने राजा को भी उसके रानी के गलत आरोपों का बखान किया। और बिना कोई जांच किये और बाइसों बफौलों की बात सुने बिना उन्हे मारने का दण्ड हेतु खरीकोटी सुनाई। राजा ने रानी से बल पूर्वक पूछने के बाद रानी ने भी सच बोल दिया और रानी को दासी बना दिया।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-5 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-5)

भिटोली-नरिया और देबुली उत्तराखंड की लोक-कथा

भिटोली का अर्थ होता है – भेंट करना अर्थात मुलाकात करना। भिटोली एक परम्परा है जिसमें विवाहित बेटी या बहन को उसके मायके से शुभकामनाओं, आर्शीवाद के रूप में भेंट दी जाती है। भेंट में मिठाई, फल, सै, वस्त्र, घर में बने पकवान आदि दी जाती है। भिटोली, चैत्र मास के दिनों में मनाई जाती है। चैत्र के महिने में हर विवाहिता बेटी को अपने मायके से भिटोली आने का इंतजार रहता है। पहाड़ हो या कि तराई भाबर या कोई भी शहर विवाहिता को भिटोली का बेसब्री से इंतजार रहता है। यह सिर्फ वस्तुए नहीं होती अपितु मायके से आया प्यार होता है। औरते भिटोली को पूरे गांव या शहर में अपने आस पड़ोस में भी बांटती है। शहर में अधिकतर आज के जीवनशैली में समय की कमी के कारण भिटोली मनीआर्डर या उपहार भेजकर मना लिया जाता है। किन्तु पहाड़ी गांवों में अभी भी बेटी या बहन के घर जाकर भिटोली दी जाती है।

भिटोली के पीछे कई लोक कथायें भी है। एक जनश्रुति के अनुसार किसी गांव में देबुली और नरिया नाम के बहन और भाई रहते थे। देबुली के लिये अपना भाई बहुत दुलारा था। नरिया भी अपनी दीदी से बहुत प्यार करता था। वे दोनों एक साथ ही रहते, खेलते, खाते-पीते थे। जैसे-जैसे दिन बीतते गये, देबुली और नरिया बड़े होते गये। एक दिन ऐसा भी आया देबुली की शादी घर वालों ने तय कर दी। कहानी के अनुसार देबुली का ब्याह उसके गांव से बहुत दूर किया गया। अब नरिया अपनी दीदी के वियोग में दुखी रहने लगा। ससुराल और मायका में काफी दूरी होने के कारण देबुली का मायका आना कम हो गया। नरिया देखता कि गांव में अन्य विवाहिता त्यौहारों में अपने घर आती। इस बात पर नरिया अपनी दीदी को ज्यादा याद करने लगा और दुखी रहने लगा।

नरिया को देखके उसकी ईजा को फिकर होने लगी। ईजा ने नरिया से कहा बहुत दिन हो गये तू अपनी दीदी से मिल आ। कल तू अपनी दीदी से मिल आना और खाली हाथ मत जाना मैं कुछ चीजें दे दूंगी तू देबुली को दे आना । उसे भी मायके की याद आती होगी। ईजा ने प्रसाद, पूरी, रायता, पुए, सिंगल, फल, साड़ी, बिंदी आदि एक बड़ी टोकरी में रखकर नरिया को दे दी। और कहा कि जा ये भेंट स्वरूप ले जा और अपनी दीदी को देना। नरिया खुशी-खुशी देबुली के ससुराल को चल दिया। उसे वहां पहुंचने में दो चार दिन लग गये। जब नरिया देबुली के घर पहुंचा तो देखा दीदी सोई हुई है। नरिया ने कुछ घंटे इंतजार किया लेकिन देबुली नहीं उठी। काम करके थक गई होगी इस विचार से नरिया ने भी उसे उठाना उचित नहीं समझा। दूसरे दिन शनिवार होने के कारण नरिया ने आज ही वापसी करने का सोचा क्योंकि पहाडों में शनिवार को थोडा काम काज या कहीं सफर में जाने के लिये उचित नहीं माना जाता। और नरिया भेंट वहां रखकर चल दिया। बाद में जब देबुली की आंख खुली तो उसने सामान देखा तो नरिया को देखने लगी। वो बहुत दूर तक गयी लेकिन तब तक नरिया जा चुका था। देबुली को पश्चाताप होने लगा कि मेरा भाई इतना लम्बा सफर तय करके आया, भूखा भी होगा और मैं सोती रही। वो रोने लगी और ‘‘भै भूखों-मैं सिती‘‘ अर्थात भाई भूखा रहा और मैं सोती रही की रट लगाने लगी। पश्चाताप में देबुली का मन इस प्रकार आघात हुआ कि भै भूखों-मैं सिती की रट लगाते लगाते देबुली के प्राण निकल गये। माना जाता है कि अगले जन्म में देबुली घुघुति नाम की पक्षी बनी जो चैत्र मास में “भै भूखों-मैं सिती” की आवाज लगाती है।

भिटौली उत्तराखण्ड की विशेष और एक भावनात्मक परम्परा है। विवाहिता महिला चाहे जिस उम्र की हो उसे भिटौली का बेसब्री से इंतजार रहता है। भिटौली को यहां के जनमानस ने लोक गीतों में भी पिरों कर रखा है भिटोली से सम्बन्धित एक काफी पुराना लोक गीत है –

ओहो, रितु एैगे हेरिफेरि रितु रणमणी, हेरि ऐंछ फेरि रितु पलटी ऐंछ।

ऊंचा डाना-कानान में कफुवा बासलो, गैला मैला पातलों में नेवलि बासलि।।

ओ, तु बासै कफुवा, म्यार मैति का देसा, इजु की नराई लागिया चेली, वासा।

छाजा बैठि धना आंसू वे ढबकाली, नालि नालि नेतर ढावि आंचल भिजाली।

इजू, दयोराणि जेठानी का भै आला भिटोई, मैं निरोली को इजू को आलो भिटोई।।

कहीं कहीं इसे ऐसे भी गाते हैं-

रितु ऐगे रणा मणि, रितु ऐ गे रैणा।

डाली में कफुवा बासो, खेत फुलि दैणा।

कावा जो कणाण आजि रत्तै ब्याण, खुट को तल मेरो आज जो खजाण।

इजु मेरि भाई भेजलि, भिटौली दीणा, रितु ऐगे रणा मणि ………….

वीको बाटो मैं चैंरूलो, दिन भरी देलि में भैं रूलो।

बेली रात देखछ मैले स्वीणा, आंगन बटी कुनै उणौ छियो

कां हुनेली हो मेरी बैणा ? रितु ऐगे रणा मणि ………………

गाय, बछड़ा और बाघ (कुमाऊं) उत्तराखंड की लोक-कथा

किसी गांव में एक गाय और उसका बछड़ा रहता था। गाय रोज हरी घास चरने जंगल जाया करती थी ताकि उसके बछड़े को दूध मिलता रहे।

बछड़े को अधिक दूध पिलाने की इच्छा गाय को दूर दूर तक जंगल में घास चरने जाने के लिए प्रेरित करती। घास चरते चरते गाय एक दिन बहुत दूर तक निकल गयी। चरते चरते गास एक बाघ के इलाके तक पहुंच गयी। बाघ की नजर जैसे ही गाय पर पड़ी वह उसकी तरफ आगे बढ़ा। गाय बाघ को आता देख भयभीत होने लगी, वह बाघ से बोली- दाज्यू, मुझे जाने दो, घर पर मेरा बछड़ा मेरा इंतजार कर रहा है। वह भूखा होगा। मुझे आज जाने दो मैं वादा करती हूं उसे दूध पिलाकर वापस यहां आ जाऊंगी तब तुम मुझे खा लेना।

गाय की बात सुनकर बाघ हंसने लगा। और बोला – मैं बेवकूफ लगता हूं क्या? तुम एक बार गयी तो वापस नहीं आओगी, यह बातें तुम सिर्फ अपनी जान बचाने के लिए कह रही हो। मुझे भूख लगी है, मैं तुम्हे खाकर रहूंगा।

गाय ने बहुत मिन्नतें की, बछड़े की दुहाई दी। पर बाघ नहीं माना। लेकिन गाय निरन्तर मिन्नत करने लगी। आखिर बाघ का मन पसीज गया और उसने गाय को जाने की इजाजत दे दी। और कहा कि अगर तू कल वापस नहीं आयी तो तेरे वहां आकर तुझे और तेरे बछड़े दोनों को खा जाऊँगा।

गाय ने उस समय तो राहत की सांस ली परन्तु जैसे जैसे वह घर की तरफ बड़ती जा रही थी उसे अपने दिये वचन का ख्याल आते ही उदास हुये जा रही थी। आखिराकर गाय घर पहंची, बछड़ा गाय को देखकर खुश हुआ और दूध पीने लगा। गाय उसे प्यार करती, पुचकारती। मां को उदास देखकर बछड़े ने उदासी का कारण पूछा। गाय ने सारी बात बता दी।

बछड़े ने पूरी बात ध्यान से सुनी और कुछ देर सोचने के बाद बोला- मां इसमें उदास क्यूं होना हुआ, कल मुझे भी लेके चलना मैं बाघ मामा को समझा दूंगा।

गाय ने समझाया कि बाघ एक जंगली जानवर है और उनमें दया भाव नहीं होता, पर बछड़ा नहीं माना। गाय के लाख मना करने के बाद भी जब बछड़ा नहीं माना तो गाय ने साथ आने की इजाजत दे दी।

दूसरे दिन गाय और बछड़ा जंगल की तरफ चल दिये। थोड़ी देर में वह बाघ के सामने पहुंच गये। अब गाय को अपने बछड़े के मारे जाने का भय अधिक सताने लगा। वह विवश थी। गाय बोली- बाघ दाज्यू मैं अपने कहे वचन के मुताबिक आ गई। मुझे खालो और मेरे बछड़े को जाने दो।

इतने में बछड़ा बोला – नहीं बाघ जी आप पहले मुझे खालो।

गाय, बछड़े को चुप कराते हुये बोली- नहीं, नहीं आप मुझे खालो। बछड़े को जाने दो।

नहीं नहीं कहते बछड़ा बाघ के सामने चला गया।

इतने में बाघ हंसते हुये बोला कि न मैं तुझे खाऊँगा न ही तेरी मां को। जो अपने वचन पर अपनी जान की परवाह न करते हुये यहां तक आगयी उसको मैं क्या हरा पाउगां। और दूसरी तरफ तू है जो अपनी मां के बदले अपनी जान देने के लिये तैयार है। मुझे खाना होता तो मैं गाय को कल ही खा लेता । मैं तो बस यह देखना चाह रहा था कि गाय अपना वचन निभाती है कि नही।

बाघ ने बछड़े को बहुत प्यार किया। और उन दोनों को घर तक छोड़ने भी गया।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-6 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-6)

देवदार और उमा उत्तराखंड की लोक-कथा

चमोली में एक छोटा सा गाँव है- ‘देवरण डोरा’। कई साल पहले इसी गाँव में भवानीदत्त नामक एक पुरोहित रहते थे। वे गाँव के शिव मंदिर के पुजारी थे। उनकी एक बेटी थी- उमा। वह अपने पिता के समान ही धार्मिक स्वभाव वाली थी। वह रोज अपने पिता के साथ मंदिर जाती। मंदिर की साफ-सफाई के बाद वह शिव की पूजा करती। प्रतिदिन शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाती थी। शिवलिंग पर मंदार के फूल भी चढ़ाती। इन फूलों को लाने वह नित्य जंगल जाती थी। मंदार के फूल तोड़ने वह जब अपने पंजों के बल उचकती तो पेड़ की डालियाँ अपने आप झुक जाती थीं। उमा को जंगल बहुत भाता था। सघन देवदारों के पेड़ों की छाँव में बैठना उसे बहुत अच्छा लगता था। जंगल में चीड़ के पेड़ों से बहुत लगाव था। उमा ने अपने घर के आँगन में भी देवदार का पेड़ लगाया था। वह उसमें नियम से प्रतिदिन पानी डालती। पौधे को बढ़ते देख उसे खुब खुशी होती।

‌नित्य की भाँति एक दिन उमा अपने पिता के साथ मंदिर जा रही थी। तभी सामने से जंगली हाथियों का झुण्ड आता दिखाई दिया। उमा डरकर उपने पिता से चिपट गयी। पिता ने प्यार से उसे समझाया, “बेटा डरो नहीं, ये हाथियों का झुँड जंगल में घूमने आया है। लगता है, इन हाथियों को भी हमारी तरह जंगल के देवदार पसंद हैं। थोड़ी देर में ये चले जाएंगे।”

मंदिर में पूजा करने के बाद उमा रोज की तरह जंगल की ओर चली गयी। लेकिन काफी देर तक वह नहीं लौटी तो भवानीदत्त को चिंता होने लगी। बेटी की तलाश में वे भी जंगल गए। थोड़ी दूर जाने के बाद उन्होंने देखा कि उमा देवदार के एक पेड़ के नीचे खड़ी होकर रो रही है। बेटी को रोती देख भवानीदत्त जी ने घबराकर पूछा, “उमा बिटिया, क्या हुआ?” उमा देवदार का तना दिखाते हुए बोली, “बाबू एक जंगली हाथी ने अपनी पीठ खुजलाते हुए इस पेड़ की छाल उतार दी है। इस कितना दर्द हो रहा होगा।” देवदार के प्रति बेटी का स्नेह देखकर भवानीदत्त का हृदय भी करुणा से भर उठा। वे सोचने लगे कि मेरी नन्हीं-सी बेटी का हृदय कितना विशाल है जो पेड़ों के प्रति भी इतना ममतामय है।

कहा जाता है कि नन्हीं उमा ही अगले जन्म में हिमालय की पुत्री उमा बनीं। शिव जी का जब उमा से विवाह हुआ तो उन्होंने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर हिमालय में उगने वाले इन देवदार वृक्षों को अपने दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार किया। कहते हैं कि शिव-पार्वती इन देवदार वृक्षों से पुत्रवत् स्नेह करते थे। उनकी ममतामयी दृष्टि आज भी देवदार वृक्षों पर बनी हुई है। हिमालय के जंगलों में वनदेवी स्वयं सिरीसृप (रेंगनेवाले जीव-जंतुओं) और वनाग्नि (पेड़ों की रगड़ से जगंल में लगने वाली आग) से देवदार वृक्षों की रक्षा करती हैं।

ऊँची हिमाला की शाना यो,

यो देवदारा झुमर्याली देवदारा।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-7 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-7)

फ्योंली रौतेली (कुमाऊं) उत्तराखंड की लोक-कथा

एक बार की बात है, सोरीकोट नाम के एक गाँव में एक बहुत ही सुंदर लड़की ‘फ्योंली रौतेली’ रहा करती थी। वह अपने पिता नागू सौरियाल की एकमात्र संतान होने के कारण बड़े प्रेम से पाली गई थी।

प्रातः काल में, उसके पिता अपने कुल देवता की आराधना में मग्न थे और फ्योंली अपने सपनों के राजकुमार के स्वप्न मे। शंख बजता और फ्योंली की आँखैं खुलतीं। खिड़की से आती हुई धूप फ्योंली की सुंदरता को और बढ़ा रही थी। उसके बुरांश जैसे लाल होंठ ढलते हुए सूर्य की लालिमा को मात देते थे। उसके पहाड़ी नयन नक्श उसे और भी सुंदर बनाते थे।

फ्योंली उठी और अपने काले-लंबे बाल बनाकर, अपनी सोने की गगरी लेकर घर से बाहर निकली। उसकी सहेलियाँ भी उसके साथ पानी भरने आईं। सबने जल भरा और वापस अपने-अपने घर चली गईं लेकिन फ्योंली हर बार की तरह नहाने के लिए वहीं रुक गई। वह पानी भर ही रही थी कि उसने पानी में किसी और की भी परछाई देखी। वह पीछे मुड़ी लेकिन वहाँ कोई भी नहीं था। ऊपर की ओर देखने पर उसने पाया कि एक आकर्षक युवक पेड़ की डाल पर बैठकर फूलों की माला बना रहा है।

उन दोनों ने एक दूसरे को देखा, फ्योंली के नेत्र झुके और गालों की लालिमा बढ़ गई। वह युवक पेड़ से उतरा और फ्योंली के पास जाकर बैठ गया। युवक ने अपना परिचय देते हुए कहा- “मेरा नाम भूपु राऊत है, क्या तुम मुझे जानती हो”? इसपर फ्योंली ने उत्तर दिया- “हाँ, तुम्हारे पिता की नज़र हमारे गाँव पर है। तुम यहाँ क्यों आए हो”? भूपु ने प्रेम और मित्रता की आस को उसके वहाँ होने का कारण बताया। उसने अपनी बाँसुरी निकाली और फ्योंली का मन मोहने के लिए बाँसुरी बजाने लगा। फ्योंली मंत्रमुग्ध होकर उसे निहारने लगी, फिर भूपु ने उसे अपने हाथों से बनाया फूलों का हार पहना दिया। फ्योंली के बालों को फूलों से सजाते हुए भूपु ने आँखों ही आँखों में फ्योंली का जन्मों तक साथ देने की कसमें खा लीं।

सूर्य ढलने पर फ्योंली को आभास हुआ कि पूरा दिन निकल चुका है। वह घर की ओर भागी, जहाँ उसके पिता गुस्से से लाल उसकी प्रतिक्षा कर रहे थे। फ्योंली के बालों में फूल और गले में फूलों की माला देख उनका पारा और चढ़ गया। उन्होंने उससे देर होने का कारण पूछा तो फ्योंली ने उन्हें भूपु के बारे में बताया। फ्योंली के पिता ने गुस्से से आग बबूला होकर फ्योंली को भूपु से न मिलने के लिए कहा। फ्योंली बोली कि वह अपने प्राण त्याग देगी लेकिन भूपु से ही विवाह करेगी। यह सुनते ही उसके पिता ने उसे बहुत ज़ोर से धक्का दिया और फ्योंली चोट खाते हुए ज़मीन पर गिर पड़ी। फ्योंली अपने प्राण त्याग चुकी थी; उसे मरा हुआ पाकर उसके पिता को बहुत दुख हुआ। यहाँ उसके पिता आँसू बहा रहे थे, वहाँ फ्योंली इंद्रलोक पहुंच चुकी थी। सारे देवताओं को उसके लिए बुरा लगा। इसलिए इंद्र ने उसे वरदान दिया कि धरती पर उसे कोई नहीं भूलेगा, चैत्र मास में उसकी पूजा होगी और सब उसके गीत गाएंगे और कुल देवता की पूजा के समय उसे द्वारा पर रखा जाएगा।

धरती पर फ्योंली के नाम से एक पीला फूल उगा जो कि आज भी इस नाम से उत्तराखंड में प्रसिद्ध है।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-8 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-8)

हाँ दीदी हाँ : उत्तराखंड की लोक-कथा

किसी पहाड़ी गांव में एक निर्धन किसान का परिवार रहता था। किसान की एक बेटी और एक बेटा था। किसान की पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। अपने दोनों बच्चों का लालन पोषण वह स्वयं करता था। समय के साथ साथ बच्चे बड़े हो गये। बेटी बड़ी थी सो किसान को उसके विवाह की चिंता सताने लगी। उसने पाई पाई जोड़कर जैसे तैसे उसका विवाह कर दिया।

एक दो साल बाद किसान बिमार रहने लगा। और एक दिन उसकी मृत्यु हो गई । अब उसका बेटा अनाथ हो गया, उसकी दीदी को अब भाई की चिंता सताने लगी। क्योंकि उसका ससुराल भी ज्यादा सम्पन्न नहीं था तो वह अपने सास ससुर व पति से इस बारे में बात करने में संकोच होने लगा। परन्तु भाई की चिंता में उसने हिम्मत बांध के भाई को अपने ससुराल में ही रखने की बात ससुरालियों से की। ससुराल वाले बहू की बात मान तो ली परन्तु कुछ शर्तों के साथ। ये शर्तें थी –

(1) उसके भाई को भोजन में भूसे की रोटी और बिच्छू का साग (बिच्छू एक प्रकार की पहाड़ी घास होती है जो सब्जी बनाने के काम भी आती है)।

(2) उसे चक्की की ओट में सोना होगा,

(3) मवेशियों को चराने की जिम्मेदारी उसकी होगी।

बहन को ये बातें बिल्कुल भी उचित नहीं लगी परन्तु भाई प्रेम और उसकी अकेले रहने की चिंता में उसने यह शर्तें मान ली। भाई ने भी परिस्थिति के अनुसार मन पसीज के यह शर्तें मान ली। अब भाई अपनी बहन के ससुराल में रहने लगा।

धीरे धीरे भाई अब उस परिवेश में घुल मिल गया। वह दिन में मवेशियों को चराने जंगल जाता और रात को भोजन में मिली भूसे की रोटी और बिच्छू की सब्जी खाकर वहीं चक्की की ओट पर टाट बोरी बिछा के सो जाता। ऐसे ही वक्त बीतता गया।

एक दिन मवेशियों को जंगल में चराते चराते उसे एक अंजान व्यक्ति मिला। उस व्यक्ति ने उसे उसके साथ चलने को कहा। पहले तो उसने साथ आने से मना किया परन्तु जब उस अजनबी ने उसे अच्छा काम और अच्छे भविष्य का लोभ दिखाया तो वह सोचने लगा कि बहन के घर में बोझ बनने से अच्छा कहीं और काम करके धन कमाया जाये। उसने साथ चलने की हामी भर दी।

शाम को जब भाई नहीं लौटा तो बहन को चिंता होने लगी। गांव में भी बात फैल गई। उसकी खोजबीन की गई जब वह नहीं मिला तो सबने उसे मृत समझ लिया। बहन बहुत दुखी रहने लगी। उसे यकीन नहीं हुआ कि उसका भाई मर चुका है। खैर दिन महिने साल निकलते रहे। धीरे धीरे वह अपने भाई को भुलाती रही लेकिन तीज त्यौहारों में जब आस पड़ोस की औरतें अपने भाई से मिलने जाती या उनके भाई उनसे मिलने आते तो वह अपने भाई को याद करके आंसू बहाती। ऐसी समय निकलता रहा और एक दिन उसे उसके भाई का संदेश मिला, वह फूली नहीं समाई। जिसे वह मरा समझ चुकी थी वह जिंदा था। वह भाई से मिलने अपने मायके गई।

घर पहुंच कर उसे भाई की संपन्नता देखकर कर आश्चर्य हुआ। भाई ने उसे भूतकाल में जो भी हुआ सब बताया। दोनों एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश हुये। भाई ने उपहार स्वरूप बहन को बहुत धन दिया लेकिन उसकी बहन ने यह कहकर मना कर दिया कि उसे उसका भाई मिल गया उसे अब कुछ नहीं चाहिये। जब उसने धन लेने से मना किया तो भाई ने उसे दो गायें और एक भैंस देनी चाही। तो बहन ने वह रख ली। भाई खुश हुआ कि बहन ने उसकी एक उपहार स्वीकार कर लिया। उसने गाय के गले में घंटी बांध दी और बहन के साथ भेज दिया।

बहन उन गायें और भैंस के साथ ससुराल को चल दी। सुनसान रास्ते में गाय के गले में बंधी घंटी का स्वर बहन को अच्छा लग रहा था। उसे लगा जैसे घंटी से आवाज आ रही हो-

भूसे की रोटी, सिंसूण की साग खाएगा – हाँ दीदी

चक्की की ओट में सोएगा – हाँ दीदी

झाड़ू की मार सहेगा – हाँ दीदी हाँ ।

घंटी मानो यहीं बाते बोल रही हो यह सोचकर वह जोर जोर से हंस पड़ी।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-9 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-9)

रामि बौराणी (पतिव्रता नारी की कहानी) उत्तराखंड की लोक-कथा

रामि बौराणी एक पतिव्रता नारी की कहानी है। सालों साल पति से दूर रहकर भी पति के लिये उसका प्रेम और निष्ठा बिल्कुल भी कम न हुई। ऐसा कहा जाता है कि रामि की पतिव्रता सीता और सावि़त्री से कम नहीं थी। रामि बौराणी में बौराणी शब्दह बहु या बहूरानी शब्द का पहाड़ी प्रयाय हो सकता है।

एक गांव में रामि नाम की विवाहिता अपनी सास के साथ रहती थी। कम उम्र में ही रामि की शादी हो गई थी। शादी के बाद ही रामि का पति दिल्लीर हुमायु की फौजी में भर्ती होने चला गया। सास और बहू में काफी प्रेम था। वे दोनों मां बेटी की तरह रहती थी। सास घर के काम करती और रामि बाहर गाय, बकरी को चराने और खेती बाड़ी का काम संभालती थी। रामि अपने पति से बहुत प्रेम करती थी। उसकी याद में रामि काफी उदास रहती। वही हाल रामि की सास का भी था, बुढ़ापे में बेटे के दूर रहने की चिंता उसे खाये जा रही थी। वे दोनों ऐसे ही अपने दिन काट रहे थे। देखते-देखते 11-12 साल बीत गये और रामि का पति ना लौटा ना उसने अपनी खबर भेजी। रामि को यकीन था कि उसका पति एक दिन जरूर वापस आयेगा।

एक दिन रामि तपती गर्मी में खेतों पर काम करते करते थक गई। उसने आस पास के खेतों में नजर दौड़ाई, बाकि औरते घर जा चुकी थी। काम में मग्न रामि को खबर ही नहीं लगी कि सब औरते कब चली गई। काम और गर्मी से वो काफी थक चुकी थी प्यास से उसका गला सूखने लगा। रामि ने सोचा थोड़ा ही काम बचा है पूरा कर के ही जाती हूँ, वो काम में लगी ही थी कि पीछे से उसे कोई आवाज आती सुनाई दी। उसने देखा कि एक साधु अलख निरंजन, अलख निरंजन अलापता हुआ उसी की तरफ आ रहा है। साधु रामि को देख उसके समीप आ रामि से उसका परिचय पूछता है –

रामि कहती है – मैं रावतों के खांदान से हुँ, और मैं बहुत बड़े सेठ की बेटी हुँ। मैं इस गांव में अपनी सास के साथ रहती हुँ, मेरे ससुर का देहांत हो चुका है।

साधु – और तेरा पति कहाँ है?

रामि – मेरे पति कई सालों से परदेश में है और मैं अपने दिन उनकी याद में काट रही हुँ।

साधु – क्यों उस निरमोही के बारे में सोच कर दुखी हो रही है जिसने इतने सालों से तेरी खोज खबर नहीं ली और तो और ना उसे अपनी मां याद आई।

रामि को साधु की बात पसंद नहीं आई उसने उसे अनसुना किया और अपना काम करने लगी। साधु ने फिर उसे टोकते हुये कहा – क्यों अपनी ये अमूल्य जवानी उस निरमोही के याद में बरबाद कर रही है चल बौराणी छांव में बैठ कर अपना मन हल्काअ करते है और रामि को छुने की कोशिश करने लगा।

रामि दूर हट के साधु से कहा – क्या तुझे मेरे सिर का ये सिंदूर और नाख की नथ नही दिखती एक औरत से किस तरह की बात कर रहा है

रामि ने फिर धमकाते हुये कहा – तू जोगी है या ढोंगी जोगी है तू जा यहां से, आगे से यहां दिखा भी तो देख लेना।

साधु मुस्कुराते हुये – अरे! तू तो नाराज हो गई। बौराणी क्या गाली देना रावतों को सोभा देता है। तू काम करते-करते थक गई है चल छांव में बैठ आराम मिलेगा। मेरे साथ अपना सुख दुख भी बांट लेगी।

रामि का पारा चढ़ गया, वो बोली – निर्लज्ज शर्म नहीं आती इस तरह की बात करते हुये, सुख दुख बाटने का इतना ही मन है तो जा अपनी मां बहन के साथ बांट, रामि की बात सुनकर साधु हंसने लगा।

रामि – चुपचाप यहां से चले जा ये देख राहा है ना कुदाली यही तेरे सर में दे दुंगी।

रामि का गुस्सा देख साधु वहां से चला गया। वो उसके गांव पहुंचा, वहां रामि के घर पहुंच कर उसकी सास से भिक्षा मांगने लगा।

माता जोगी को भिक्षा दे दे तेरा भला होगा और १२ साल से खोया हुआ तेरा लड़का घर लौट आयेगा। यहाँ सुन रामि की सास साधु के चरणों में गिर गई और साधु को अपने घर के अंदर ले गई।

रामि की सास ने साधु को आसन में बिठाते हुए कहा साधु बाबा आप बाहर क्या कह रहे कि तेरा लड़का १२ साल बाद घर लौट आयेगा।

साधु हसते हुए – पर मॉं भूके पेट भजन ना होत, सुबह से भूखा हूँ पहले भोजन फीर और बाते।

रामि की सास – साधु बाबा आप बेठो मैं जलदी से भोजन चूल्हे पर चढ़ा देती हुँ।

इतने में रामि भी खेत का काम कर के आ गई, अपने आंगन में उसी साधु को बैठा देख रामि को फिर गुस्सा आ गया। उसने साधु से कहा – अरे कपटी, तू मेरे घर तक पहुंच गया। बहु की आवाज सुनकर सास बाहर आई उसने पूछा बहू क्या हुआ ? बहु ने बताया – मां ये कोई साधु नहीं कपटी है। सास ने बहु से कहा कि एक साधु के बारे में ऐसे नहीं बोलते, तू अंदर जा और भोजन परोस मैं आती हूँ। रामि ने भोजन परोसा, सास को बुलाया, सास भोजन लेकर साधु को देने लगी। साधु ने देखा कि भोजन पत्तों में परोसा है, साधु बोला- ये क्या, अब मैं पत्तों में भोजन करूंगा, मुझे उसी थाली में भोजन दे जिस पर रामि का पति भोजन करता था।

साधु का इतना कहना ही था कि रामि का पारा अब हद से ज्यादा चढ़ गया था, वो गुस्से में पूरी लाल हो गई थी। वो बोली- तूने अब अपनी नीचता की हद पार कर दी है। तेरी हिम्मत कैसे हुई ये कहने की। रामि के गुस्से का यह रूप देख कर साधु भौचक्का रह गया। उसने साधु का चोला उतारा और मां के पैरों में गिर गया और बोला – मां, पहचानों मुझे मैं तुम्हारा बेटा हूँ, ‘बीरू‘। और रामि मुझे माफ कर दो मैंनें तुम्हारे प्रेम और इंतजार की परीक्षा लीं। तुम्हारे पतिव्रत, प्रेम और निष्ठा को दुनिया हमेशा याद रखेगी।

Categories
Bed time Stories Bharatiya Lok Kathayen Lok Kathayen Story Uttarakhand ki Lok Kathayen

Uttarakhand ki Lok Kathayen-10 (उत्तराखंड की लोक कथाएँ-10)

ब्रह्मकमल: लोक-कथा (उत्तराखंड)

हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में ब्रह्मकमल को एक अत्यन्त पवित्र फूल माना जाता है। यहाँ के लोगों का विश्वास है कि ब्रह्मकमल के दर्शन मात्र से ही जीवन के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। इस फूल के सम्बन्ध में अनेक रोचक किंवदन्तियाँ और मिथ कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें कहीं इसे देवलोक का फूल बताया गया है तो कहीं इसे एक अभिशप्त साधु कहा गया है। एक प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार ब्रह्मकमल परी लोक की एक अभिशप्त परी है।

बहुत समय पहले की बात है। कहते हैं कि उस समय परी लोक की परियाँ धरती पर आती थीं। यहाँ दिनभर विचरण करती थीं और रात का अँधेरा होने के पहले वापस चली जाती थीं। परियों को धरती की स्वच्छ-साफ पानी की नदियाँ, झरने, बड़े-बड़े तालाब और ऊँचे-ऊँचे पर्वत बहुत अच्छे लगते थे। परियाँ हमेशा जंगलों में ऐसे स्थान पर आती थीं जहाँ दूर-दूर तक कोई आदमी न हो। परियाँ आदमी से बहुत डरती थीं और यदि उन्हें कोई आदमी दिखाई पड़ जाता था तो वे उसके पास आने के पहले उड़ जाती थीं और वह स्थान छोड़ देती थीं। इसके बाद वह किसी नए स्थान की खोज करती थीं और फिर वहाँ आना आरम्भ कर देती थीं। परियों को धरती पर अनेक बार कई मुसीबतों का सामना भी करना पड़ा, लेकिन उन्हें धरती इतनी अच्छी लगती थी कि वे धरती पर आने का मोह छोड़ नहीं पाती थीं और जब भी उन्हें अवसर मिलता, वे धरती पर अवश्य आ जाती थीं।

परी लोक की परियाँ तो धरती पर प्रायः आती रहती थीं, किन्तु परियों की रानी धरती पर कभी नहीं आई। उसने अपनी बेटी को भी धरती पर कभी नहीं आने दिया। रानी परी ने अपनी माँ से सुन रखा था कि धरती बहुत सुन्दर है किन्तु धरती पर खतरे भी कम नहीं हैं। अतः उसने यह निश्चय कर लिया था कि वह धरती पर कभी नहीं जाएगी।

परियों की राजकुमारी अर्थात्‌ रानी परी की बेटी छोटी थी। वह अपने साथ की बड़ी परियों से हमेशा धरती की सुन्दरता और धरती के लोगों के किस्से-कहानियाँ सुना करती थी। उसे उसके साथ की परियाँ प्रायः बताती रहती थीं कि वे धरती की नदियों, झीलों, तालाबों में खूब नहातीं और तरह-तरह की जल-क्रीड़ाएँ करती हैं। धरती पर बड़े-बड़े सुन्दर वृक्ष हैं, जिन पर तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं और मीठे-मीठे फल लगते हैं। परियाँ बताती थीं कि वे फूल तोड़कर उनकी मालाएँ बनाती हैं और फल खाती हैं। एक बार उन्होंने फूलों की मालाएँ बनाकर अपनी राजकुमारी को भी दीं।

परियों की राजकुमारी जैसे-जैसे बड़ी होती गई, उसकी, धरती पर जाने की इच्छा बढ़ती गई । वह धरती पर आकर यहाँ के पहाड़, नदियाँ, झीलें, तालाब, झरने, पेड़-पौधे, फल-फूल, जंगली जीव-जन्तु, पशु-पक्षी आदि देखना चाहती थी और अन्य परियों के समान इनका आनन्द लेना चाहती थी।

रानी परी को अपनी बेटी की इस इच्छा के बारे में जब मालूम हुआ तो वह बहुत नाराज हुई और उसने धरती पर जानेवाली परियों का अपनी बेटी से मिलना पूरी तरह बन्द करा दिया।

धीरे-धीरे काफी समय बीत गया। परियों की राजकुमारी अब अपनी माँ रानी परी जैसी दिखाई देने लगी थी। वह बहुत सुन्दर थी। उसका गोरा रंग और सुनहरे बाल साफ बताते थे कि वह परियों की राजकुमारी है।

परियों की राजकुमारी कुछ समय तक तो रानी परी की कैद में अकेली रही, लेकिन जब उससे यह सहन नहीं हुआ तो उसने चुपचाप महल के बाहर निकलना और धरती पर जानेवाली परियों से मिलना आरम्भ कर दिया। परियों की राजकुमारी अन्य परियों से इस तरह मिलती थी कि रानी परी को पता नहीं चलता था।

एक बार परियों की राजकुमारी ने अपने साथ की परियों से धरती पर उसे ले चलने का आग्रह किया। सभी परियाँ रानी के क्रोध से बहुत डरती थीं। अतः उन्होंने परियों की राजकुमारी को साथ ले चलने से मना कर दिया।

परियों की राजकुमारी बहुत जिद्दी थी। वह वापस अपने महल के बगीचे में आ गई और एक स्थान पर छिप गई।

प्रातःकाल का समय था। धरती पर आनेवाली परियों ने अपने-अपने पंख लगाए और धरती की ओर उड़ चलीं। इसी समय परियों की राजकुमारी बाहर निकली और वह भी अपने पंख लगाकर परियों के पीछे-पीछे चल पड़ी। धरती पर जानेवाली परियों को इसका पता नहीं चला।

परियाँ आगे-आगे उड़ती रहीं और परियों की राजकुमारी चुपचाप उनका पीछा करती रही। परियों ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि परियों की राजकुमारी उनके पीछे-पीछे आ रही है।

वे अब धरती के बहुत पास आ गई थीं।

अचानक परियों की राजकुमारी को छींक आ गई। परियों ने पीछे मुड़कर देखा तो घबरा गईं। उन्होंने तुरन्त आपस में कुछ बातें की और यह निर्णय लिया कि वे धरती पर नहीं जाएँगी और वापस परी लोक चली जाएँगी। उन्होंने अपना निर्णय परियों की राजकुमारी को भी बता दिया।

परियों की राजकुमारी बहुत जिद्दी थी। उसने पहले तो सभी परियों से अनुरोध किया कि वे उसे धरती पर अपने साथ ले चलें, लेकिन जब परियाँ तैयार नहीं हुईं तो उसने परी लोक लौटने से इनकार कर दिया और उन्हें यह भी बता दिया कि वह अकेली ही धरती पर जाएगी।

सभी परियाँ असमंजस में पड़ गईं। वे जानती थीं कि परियों की राजकुमारी बहुत जिद्दी है और वह बिना धरती पर पहुँचे वापस परी लोक नहीं जाएगी। परियाँ रानी परी से भी बहुत डरती थीं। अतः परियों की राजकुमारी को छोड़कर वे परीलोक नहीं लौट सकती थीं। अन्त में सभी ने मिलकर यह निर्णय लिया कि वे परियों की राजकुमारी को धरती पर ले जाएँगी और कुछ समय रुककर जल्दी ही परी लोक वापस लौट जाएँगी।

परियों की राजकुमारी खुश हो गई।

धरती पास ही थी। अतः कुछ ही समय में सभी परियाँ धरती पर आ गईं। वे एक सुनसान जंगल में बड़े से तालाब के किनारे उतरी थीं। यह स्थान बहुत सुरक्षित था। यहाँ परी लोक की सभी परियाँ प्रायः आती रहती थीं।

परियों की राजकुमारी को यह स्थान बहुत अच्छा लगा। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि धरती इतनी सुन्दर होगी। सभी परियों ने अपनी राजकुमारी के साथ तालाब में स्नान किया, कुछ देर जल-क्रीड़ा की और परी लोक वापस लौटने के लिए अपने-अपने पंख लगाकर तैयार हो गईं। किन्तु परियों की राजकुमारी अभी धरती पर रुकना चाहती थी और कुछ नए स्थान देखना चाहती थी।

परियों ने अपनी राजकुमारी को बहुत समझाया, लेकिन जिद्दी राजकुमारी नहीं मानी । परियाँ अकेले वापस नहीं लौट सकती थीं। अतः उन्हें राजकुमारी की बात माननी पड़ी।

परियों ने अपनी राजकुमारी को बहुत से जंगल, जंगली जीव-जन्तु, पशु-पक्षी आदि दिखाए और अन्त में हिमालय के बर्फीले पहाड़ों पर आ गईं।

परियों की राजकुमारी को बर्फ से ढँके ऊँचे-ऊँचे पहाड़ बहुत अच्छे लगे। उसका मन हो रहा था कि वह परी लोक न लौटे और यहीं धरती पर रह जाए।

परियों की राजकुमारी ने अपने मन की बात अपने साथ आई परियों से कही तो कुछ परियाँ नाराज हो गईं और कुछ उसे समझाने लगीं। परियाँ अपनी राजकुमारी को यह समझाने का प्रयास कर रही थीं कि यह धरती उतनी सुन्दर नहीं है, जितनी सुन्दर वह समझ रही है। इस धरती पर बाघ, शेर, चीता, तेंदुआ जैसे हिंसक जीव, बड़े-बड़े राक्षस और देव-दानव भी रहते हैं, जो बड़े खूँख्वार और खतरनाक होते हैं। अतः उसे वापस परी लोक लौट चलना चाहिए।

परियाँ अपनी राजकुमारी को यह सब समझा रही थीं, तभी अचानक न जाने कहाँ से एक दानव प्रकट हो गया और अट्टहास करने लगा।

दानव को देखते ही परियों के होश उड़ गए। वे अपनी-अपनी जान बचाकर भागीं और जिसे जहाँ जगह मिली, वहाँ छिप गई।

परियों की राजकुमारी ने एक विशालकाय दानव को देखा तो उसे भी डर लगा, लेकिन वह भागी नहीं।

दानव ने परियों की राजकुमारी को देखा तो उसके रूप पर मोहित हो गया। उसने आगे बढ़कर परियों की राजकुमारी को उठाया, अपने कंधे पर लादा और पहाड़ के पीछे जाकर गायब हो गया।

पहाड़ी जंगल में वृक्षों और पत्थरों की आड़ में छिपी परियाँ अपनी राजकुमारी को ले जाते हुए दानव को देखती रहीं। वे दानव की शक्ति से परिचित थीं, अतः वे न बाहर निकलीं और न चीखी चिल्लाई।

परी लोक से धरती पर आनेवाली परियाँ परेशान हो उठीं। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें और क्यार न करें। वे रानी परी के डर से अपनी राजकुमारी को धरती पर छोड़कर परी लोक नहीं लौट सकती थीं और धरती पर लम्बे समय तक रहना उनके लिए भी खतरे से खाली नहीं था।

परियों ने आपस में एक-दूसरे के साथ विचार-विमर्श किया। एक परी ने कहा कि धरती पर राक्षसों और देव दानवों के साथ ही वीर, साहसी और नेक इंसान भी रहते हैं। दूसरी परी ने सुझाव दिया कि सभी परियों को ऐसे इंसान की प्रतीक्षा करनी चाहिए और उसके सहयोग से अपनी राजकुमारी को मुक्त कराना चाहिए। एक अन्य परी ने सुझाव दिया कि प्रतीक्षा करने में बहुत समय लगेगा। ऐसा इंसान न जाने कब आए? अतः सभी को मिलकर ऐसे इंसान को ढूँढ़ना चाहिए और राजकुमारी को मुक्त कराने का अनुरोध करना चाहिए।

सभी परियों को अन्तिम परी का सुझाव अच्छा लगा और उन्होंने यह तय किया कि वे साधारण स्त्रियों के रूप में अगले दिन से ही एक वीर, साहसी और नेक इंसान की खोज आरम्भ कर देंगी और जल्दी से जल्दी अपनी राजकुमारी को दानव से मुक्त कराने का प्रयास करेंगी।

परियों ने किसी तरह एक प्राकृतिक गुफा में रात बिताई और सवेरा होते ही अपना अभियान आरम्भ कर दिया। वे इधर-उधर फैल गईं और जंगल से गुजरनेवालों पर नजर रखने लगीं। परियों को शाम हो गई, किन्तु वीर, साहसी और नेक इंसान तो दूर की बात, उन्हें कोई साधारण इंसान भी नहीं दिखाई दिया । सम्भवतः दानव के भय के कारण लोगों ने उधर से गुजरना छोड़ दिया था।

धीरे-धीरे तीन दिन हो गए, लेकिन परियों को कोई सफलता नहीं मिली।

अचानक एक दिन दोपहर के समय उस पहाड़ी जंगल से, घोड़े पर सवार एक हट्टा-कट्टा सुन्दर युवक गुजरा। उसे वहीं पास ही, एक वृक्ष की आड़ में खड़ी परी ने देखा और सहायता के लिए गुहार लगाने लगी।

परी की आवाज सुनकर घोड़े पर सवार युवक रुक गया और उसने अपनी दृष्टि इधर-उधर दौड़ाई।

युवक से कुछ दूरी पर एक सुन्दर स्त्री खड़ी थी और सहायता के लिए उसे पुकार रही थी।

युवक घोड़े से नीचे उतरा और पैदल चलता हुआ परी के पास पहुँचा । इसी समय अन्य परियाँ भी आ गईं। सभी ने उस युवक को यह बता दिया कि वे परी लोक की परियाँ हैं और इसके साथ ही अपनी राजकुमारी के अपहरण की पूरी कहानी भी उसे बता दी।

युवक वास्तव में वीर, साहसी और नेक इंसान था। उसने परियों को बताया कि वह इस राज्य का राजकुमार है और उनकी सहायता अवश्य करेगा।

परियों को थोड़ी-बहुत राहत मिली।

राजकुमार अपने राज्य के सभी क्षेत्रों से अच्छी तरह परिचित था। उसे दानव की पूरी जानकारी थी और यह भी मालूम था कि दानव कहाँ रहता है? राजकुमार ने परियों को आश्वासन दिया कि वह उनकी राजकुमारी को दानव से मुक्त कराने का पूरा प्रयास करेगा। इसके बाद वह अपने घोड़े पर सवार हुआ और एक ओर बढ़ गया।

राजकुमार ऊची-ऊची असमतल पहाड़ी चट्टानों पर बड़ी तेजी से अपना घोड़ा दौड़ाता रहा और कुछ समय बाद एक बड़ी नदी के पास आ पहुँचा। इस नदी के किनारे अनेक बड़ी-बड़ी गुफाएँ थीं।

राजकुमार ने अपनी तलवार निकाली और एक गुफा के सामने आकर खड़ा हो गया। यह दानव की गुफा थी। गुफा के द्वार पर एक भारी पत्थर अड़ा हुआ था। इससे यह साफ था कि दानव अपनी गुफा में नहीं है।

राजकुमार ने अपनी तलवार पास की एक चट्टान पर रखी और पत्थर हटाने का प्रयास करने लगा। पत्थर बहुत भारी था और टस से मस नहीं हो रहा था। राजकुमार बहुत देर तक पत्थर हटाने का प्रयास करता रहा। अन्त में उसे सफलता मिली और पत्थर इतना खिसक गया कि गुफा के द्वार पर एक व्यक्ति के निकल जाने योग्य जगह बन गई।

राजकुमार ने अपनी तलवार चट्टान से उठाई और पूरी सावधानी के साथ गुफा के भीतर आ गया।

शाम होने में अभी कुछ समय बाकी था। गुफा के भीतर इतना प्रकाश आ रहा था कि भीतर की सभी चीजें घुँधली-धुँधली दिखाई दे रही थीं।

राजकुमार ने आँखें फाड़-फाड़कर गुफा के भीतर नजरें दौड़ाईं। वहाँ जीव-जन्तुओं के अस्थि पंजरों के अलावा कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। राजकुमार को लगा कि दानव परियों की राजकुमारी को मार कर खा गया है।

अचानक राजकुमार के कानों में किसी स्त्री के सिसकने की आवाज टकराई। राजकुमार सावधान हो गया और धीरे-धीरे आवाज की ओर बढ़ा। गुफा के एक अँधेरे कोने में एक स्त्री खड़ी सिसक रही थी।

राजकुमार ने अनुमान लगाया कि यही परियों की राजकुमारी है। उसने जल्दी-जल्दी अपना परिचय दिया और उसका हाथ पकड़कर बाहर आ गया।

दानव के अत्याचारों के कारण परियों की राजकुमारी का रंग पीला पड़ गया था और वह मुरझा गई थी। किन्तु इससे उसकी सुन्दरता में कोई कमी नहीं आई थी।

राजकुमार ने परियों की राजकुमारी को देखा तो उस पर मोहित हो गया। परियों की राजकुमारी बहुत घबराई हुई थी। इस समय उसे राजकुमार एक देवदूत जैसा लग रहा था।

राजकुमार जानता था कि यह स्थान सुरक्षित नहीं है। दानव कभी भी वापस आ सकता था और उन दोनों के लिए मुसीबतें खड़ी कर सकता था। अतः राजकुमार ने परियों की राजकुमारी को घोड़े पर बैठाया और स्वयं भी घोड़े पर सवार हो गया।

राजकुमार का घोड़ा अभी दो-चार कदम भी आगे नहीं बढ़ा था कि न जाने कहाँ से दानव प्रकट हो गया और घोड़े के सामने खड़ा हो गया।

परियों की राजकुमारी ने दानव को देखा तो वह भय से अचेत हो गई।

राजकुमार ने भी दानव को देखा । वह घोड़े के सामने सीना ताने उसका रास्ता रोके खड़ा था।

राजकुमार वीर और साहसी था। वह घोड़े से नीचे उतरा, परियों की राजकुमारी को सहारा देकर नीचे उतारा, उसे एक स्थान पर लिटाया और तलवार लेकर दानव के सामने आ गया।

दानव ने राजकुमार को इस रूप में देखा तो जोर से हँसा। उसने राजकुमार को ऊँची आवाज में चेतावनी दी कि यदि वह उससे युद्ध करेगा तो बिना मौत मारा जाएगा। उसने राजकुमार को यह भी समझाया कि वह असीम शक्तिशाली दानव है। कोई उससे जीत नहीं सकता।

राजकुमार ने दानव की बात का कोई उत्तर नहीं दिया और मुस्कराता रहा।

राजकुमार की मुस्कराहट ने दानव का क्रोध बढ़ा दिया। उसने अपना दाहिना हाथ बढ़ाकर राजकुमार को पकड़ने की कोशिश की।

राजकुमार सावधान था। उसने नीचे झुककर तलवार से दानव के हाथ पर वार कर दिया। उसका निशाना अचूक था। अगले ही क्षण दानव का दाहिना हाथ जमीन पर पड़ा था।

हाथ कटते ही दानव का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने चीखते हुए बायाँ हाथ राजकुमार को पकड़ने के लिए बढ़ाया।

राजकुमार ने अपनी तलवार से दानव का बायाँ हाथ भी काट डाला। इसी समय एक चमत्कार हुआ। दानव का दाहिना हाथ हवा में लहराया और उसके शरीर से जुड़ गया। हाथ जुड़ते ही दानव ने जोरदार ठहाका लगाया।

राजकुमार परेशान हो उठा। उसे लगा कि इस मायावी दानव से निपटना इतना आसान नहीं है, जितना वह समझ रहा था। फिर भी उसने हिम्मत से काम लिया और दानव के आगे बढ़नेवाले हाथ को काटता रहा।

परियों की राजकुमारी जमीन पर कुछ देर तो अचेत पड़ी रही, किन्तु उसे शीघ्र ही होश आ गया। उसने अपने सामने जो कुछ भी देखा तो घबरा गई। वह जानती थी कि दानव को इस प्रकार कोई नहीं मार सकता। उसने चीखकर राजकुमार को बताया कि दानव की जान गुफा के भीतर पिंजड़े में बन्द एक तोते में है। उसे मार दो तो दानव अपने आप मर जाएगा।

दानव ने यह सुना तो राजकुमार को छोड़कर परियों की राजकुमारी पर झपटा।

राजकुमार ने देखा तो वह परियों की राजकुमारी को बचाने के लिए आगे बढ़ा। तभी परियों की राजकुमारी ने उसे पुनः सावधान किया और बताया कि वह उसकी चिन्ता न करके तोते के पास पहुँचे।

राजकुमार की समझ में बात आ गई। उसने दोनों को छोड़ा और गुफा की ओर भागा।

दानव ने भी परियों की राजकुमारी को छोड़ा और राजकुमार के पीछे-पीछे वह भी गुफा की ओर भागा । लेकिन इससे पहले कि दानव राजकुमार को पकड़ पाता, राजकुमार ने पिंजड़ा खोलकर तोते की गर्दन मरोड़ दी।

तोते के मरते ही दानव जमीन पर गिरकर तड़पने लगा और कुछ ही क्षणों में मर गया।

इसी मध्य परियों की राजकुमारी भी गुफा के भीतर आ गई थी। राजकुमार ने परियों की राजकुमारी का हाथ पकड़कर उसे घोड़े पर बैठाया और फिर स्वयं घोड़े पर सवार होकर एक ओर चल पड़ा।

रात का अँधेरा धीरे-धीरे बढ़ रहा था। राजकुमार परियों की राजकुमारी को घोड़े पर आगे बैठाए प्रतीक्षा करती हुई परियों की ओर तेजी से बढ़ रहा था।

राजकुमार जिस समय परियों के मिलनेवाले स्थान पर पहुँचा तो आधी रात हो चुकी थी। उसने इधर-उधर देखा, लेकिन उसे कहीं भी कोई परी नहीं दिखाई दी। राजकुमार को बड़ा आश्चर्य हुआ।

अचानक उसके कानों में घोड़े के हिनहिनाने की आवाज पड़ी। इसी समय कुछ घुड़सवार सैनिक उसके सामने आए, अपने-अपने घोड़े से नीचे उतरे और सिर झुकाकर खड़े हो गए।

ये सभी राजकुमार के सैनिक थे, जो राजकुमार के महल में वापस न लौटने के कारण उसकी खोज में निकले थे। परियों को इन सैनिकों ने बन्दी बना लिया था।

राजकुमार की आज्ञा से सैनिकों ने सभी परियों को मुक्त किया। एक-एक परी को एक-एक सैनिक ने अपने घोड़े पर बैठाया और महल आ गए । राजकुमार के साथ परियों की राजकुमारी भी थी।

राजकुमार ने परियों की राजकुमारी सहित सभी परियों को अपने महल में राजसी ठाट-बाट से रखा और उन्हें अपने राज्य की सुन्दर-सुन्दर झीलों, नदियों और वनों की सैर कराई। वास्तव में वह परियों की राजकुमारी को हृदय से चाहने लगा था और चाहता था कि वह उसके साथ विवाह कर ले।

परियों की राजकुमारी भी राजकुमार की वीरता, साहस और सद्व्यवहार पर मोहित थी और उसे चाहने लगी थी। उसके साथ की परियों ने भी एक-एक सैनिक को पसन्द कर लिया था और उनके साथ रंगरेलियाँ मना रही थीं।

इधर परियों और अपनी बेटी के न लौटने के कारण परी लोक की रानी बहुत चिन्तित थी। उसने कुछ समय तक तो प्रतीक्षा की और उसके बाद अपना चमत्कारी तारास्त्र लेकर धरती की ओर चल पड़ी।

रानी परी का तारास्त्र बड़ा चमत्कारी था। उसने अपने तारास्त्र के द्वारा यह मालूम कर लिया था कि उसकी बेटी और अन्य परियाँ धरती पर कहाँ हैं? और कया कर रही हैं? उसे यह जानकर बहुत क्रोध आया कि उसकी बेटी अन्य परियों के साथ धरती के मानवों के साथ रंगरेलियाँ मना रही है।

रानी परी सीधी राजकुमार के महल के बगीचे में पहुँची।

परियों की राजकुमारी इस समय राजकुमार का सिर अपनी गोद में लिए हुए किसी मधुर विषय पर बातें कर रही थी। उसने अपने सामने रानी परी को देखा तो उसके होश उड़ गए। रानी परी बहुत क्रोध में थी ।

परियों की राजकुमारी ने राजकुमार का सिर अपनी गोद से हटाया और उठकर खड़ी हो गई। इसी समय परी लोक की अन्य परियाँ भी अपने-अपने साथी सैनिकों के साथ आ गईं।

रानी परी ने सभी परियों को जलती हुई आँखों से देखा और उन्हें परी लोक वापस चलने का आदेश दिया, लेकिन परियों ने अपने-अपने सिर नीचे कर लिए और अपने-अपने साथी का हाथ पकड़ लिया।

रानी परी की समझ में आ गया कि बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। उसने अपने क्रोध पर नियन्त्रण किया और अपनी बेटी सहित सभी परियों को धरती के मानव और उनकी बुराइयों के विषय में बताकर परी लोक लौटने के लिए समझाने लगी।

रानी परी ने सभी को बहुत समझाया। लेकिन उसकी बेटी सहित सभी परियों ने परी लोक लौटने से साफ इनकार कर दिया।

रानी परी ने सभी को बहुत समझाया, लेकिन जब उसकी बात किसी ने नहीं मानी तो उसे क्रोध आ गया और उसने अपने तारास्त्र की चमत्कारी शक्ति से अपनी बेटी को ब्रह्मकमल बना दिया और उसके साथी राजकुमार को पानी का कमल बना दिया। इसके साथ ही उसने अन्य परियों और उनके साथी सैनिकों को भी तरह-तरह के फूलों में बदल दिया और दुखी हृदय से परी लोक लौट आई।

(डॉ. परशुराम शुक्ल की पुस्तक ‘भारत का राष्ट्रीय पुष्प और राज्यों के राज्य पुष्प’ से साभार)