Categories
Bed time Stories British Lok Kathayen Lok Kathayen Story

British Lok Kathayen-1/ ब्रिटिश लोक कथाएँ-1

मेहनती लड़की: ब्रिटिश लोक-कथा

इंग्लैंड के एक गांव में मार्शल नामक फलों का व्यापारी रहता था । उसका व्यापार बहुत अच्छा था । मार्शल का बेटा थामस पढ़-लिख कर अपने पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाने लगा था । वह खूब मेहनती और होशियार था । पिता को अपने पुत्र की काबिलियत पर गर्व था ।

मार्शल की इच्छा थी कि उसके बेटे के लिए एक ऐसी लड़की मिले जो खूब मेहनती हो और उसे काम करने में आलस्य न आता हो ।

मार्शल का मानना था कि ऐसी लड़की उसके बेटे और घर का ध्यान बहुत अच्छी तरह रख सकेगी । परंतु समस्या यह थी कि ऐसी लड़की को कहां से ढ़ूंढ़ कर लाया जाए । वह किसी दूसरे के बताने का यकीन भी नहीं करना चाहता था ।

मार्शल ने मन ही मन एक योजना बनाई । उसने एक रेहड़ी पर ढेर सारे फल रखे और उसे लेकर स्वयं एक मोहल्ले में चला गया ।

वहां जाकर मार्शल ने आवाज लगाई “ले लो, ले लो धूल-मिट्टी के बदले संतरे, सेब, केले ले लो । ले लो, बिना पैसों के फल लो ।”

वह जिधर से निकलता, वहीँ स्त्रियां घरों से बाहर निकलकर देखने लगतीं कि कौन मुर्ख है जो बिना पैसों के फल बेच रहा है । अनेक स्त्रियां आपस में खुसर-फुसर करने लगीं कि शायद यह लोगों को बेवकूफ बना रहा है । हो सकता है कि इसका कोई और मकसद हो ।

उन स्त्रियों ने आपस में तय किया कि उनमें से एक को जाकर फल वाले को आजमाना चाहिए । एक स्त्री ने फल वाले के पास जाकर पूछा – “भाई यह धूल-मिट्टी का क्या चक्कर है ? कितनी धूल-मिट्टी में कितने फल दोगे ?”

मार्शल बोला – “तुम जितनी ज्यादा धूल-मिट्टी लाओगी, उतने ही ज्यादा फल ले सकती हो ।”

स्त्री को यकीन नहीं हुआ । वह फल वाले को रुकने को कहकर कर अपने घर में चली गई । उसने जल्दी-जल्दी घर में झाड़ू लगाई, कोनों में से मिट्टी निकाली और फल वाले के पास पहुंच गई । फल वाले ने उसे ढेर सारे फल दे दिए ।

अन्य स्त्रियों ने देखा तो उनमें फल लेने की होड़ मच गई । सभी स्त्रियां अपने-अपने घरों में झाड़ू लगाने लगीं । खूब धूल-मिट्टी उड़ने लगी ।

कोई थैला भर मिट्टी लेकर पहुंची तो कोई बोरा भर । सभी स्त्रियां व लड़कियां खुश थीं कि कोई बेवकूफ उन्हें धूल के बदले मुफ्त में फल दे रहा था ।

तभी एक लड़की फल वाले के पास पहुंची । फल वाले ने देखा कि वह खाली हाथ आई है तो उसने पूछा – “क्या तुम्हें फल नहीं चाहिए ।”

उस लड़की ने सकुचाते हुए अपने हाथ में से एक रूमाल निकाला जिसमें मुश्किल से दो चुटकी धूल थी । वह बोली – “श्रीमान जी, क्या इतनी धूल में भी आप कोई फल दे सकते हैं ?”

मार्शल बोला – “हां हां, क्यों नहीं, तुम जो फल चाहे ले सकती हो । पर यह बताओ कि क्या तुम्हारे घर में सिर्फ इतनी ही धूल निकली ?”

लड़की शरमाते हुए बोली – “दरअसल, मेरे घर में तो बिल्कुल भी धूल नहीं थी । पड़ोस की आंटी ने मुझसे अपने घर की धूल इकट्ठी करने को कहा था ताकि मैं उनके लिए यदि कोई फल मिल सके तो ले लूं । आप इतनी धूल के बदले जो फल दे सकें, वह दे दीजिए ।”

मार्शल ने उस लड़की से कहा – “यह सारे फल तुम ले जा सकती हो । मैं तुम्हारे पिता से मिलकर तुम्हारा हाथ मांगना चाहता हूं । मैं तुम्हें अपनी बहू बनाना चाहता हूं ।”

लड़की ने अपने घर की ओर इशारा किया और शरमाती हुई घर में घुस गई । मार्शल ने उस लड़की को अपनी बहू, स्वीकार कर लिया । इतने बड़े व्यापारी के घर में रिश्ता तय करके लड़की का पिता बहुत खुश थे । इधर, मार्शल बहुत खुश था कि उसे इतनी मेहनती और होशियार लड़की बहू के रूप में मिल रही थी जिसके घर में एक चुटकी धूल भी नहीं मिल सकी ।

Categories
Bed time Stories British Lok Kathayen Lok Kathayen Story

British Lok Kathayen-2/ ब्रिटिश लोक कथाएँ-2

यदि ऐसा होता: इंग्लैंड की लोक-कथा

किसी जंगल में तीन सखियां-एक हंसिनी, एक मुर्गी और एक बत्तख़ रहती थीं। तीनों अपने को बहुत अधिक बुद्धिमान समझती थीं। उन्हें अपनी दशा पर तनिक भी सन््तोरष नहीं था।

बत्तख़ कहती-“अरी, क्या बताऊं, मुझे तो विधाता के अनाड़ीपन पर बेहद गुस्सा आता है। भला बता तो, मेरा शरीर तो इतना सुन्दर बना दिया पर पैरों का नाश पीट दिया। तेजी से दौड़ भी नहीं सकती। चिपटे झिल्लीदार पंजे। ऊंह! यह भी कोई पैर-में-पैर हैं। जान पड़ता है, उनका सांचा ही बिगड़ गया था। लेकिन बगुले जी के पैर…अहा, उनके लम्बे-लम्बे पतले पैर कितने सुन्दर लगते हैं। अगर मेरे पैर भी वैसे ही होते तो कितना अच्छा होता!”

मुर्गी कहती-“अरी, जी में तो ऐसा आता है कि यदि मुझे विधाता मिल जाएं तो खूब आड़े हाथों लूं। रूप-रंग तो दे दिया ऐसा लुभावना, पर बोली दी गंवारों जैसी-कुकड़ं-कूं, कुकडं-कूं। अकेले रूप को क्या चाटूं! सच कहती हूं, जब कोई गाने के लिए कहता है तो शरम के मारे धरती में गड़ जाती हूं। भला इस फटे बांस की-सी आवाज़ से कैसे गाऊं? अहा! सितार की बोली कितनी प्यारी होती है, कितनी मीठी! अगर मेरी बोली भी सितार की-सी होती तो कितना अच्छा होता!”

अन्त में हंसिनी कहती, “बहनो, तुमने तो अपना-अपना दुखड़ा रो लिया, अब मेरी भी तो सुनो। मेरे साथ तो विधाता ने बहुत ही जुल्म किया है। देखो तो, विधाता ने मेरी देह पर कितने रोएं लाद दिये हैं। मैं पूछती हूं, क्या लाभ है इनका? मेरे लिए तो ये बोझ हैं। इसके सिवाय इनसे मुझे तकलीफ भी होती है। जो भी मनुष्य मुझे देखता है, पकड़कर मेरे शरीर में से बहुत से रोएं नोच लेता है। उफ! उस समय मुझे कितना कप्ट होता है, मैं क्या कहूं! मैं तो विधाता को खूब कोसा करती हूं। अगर ये रोएं मेरे शरीर पर नहीं रहते तो कितना अच्छा होता ।”

तीनों सखियां प्रतिदिन इसी तरह विधाता को कोसती रहतीं।

एक बार विधाता दुनिया की सैर के लिए निकले। जब उन्होंने तीनों सखियों की बातें सुनीं तो हँसकर बोले, “तुम तीनों कल सवेरे सूरज निकलने से पहले पूरब की ओर मुंह करके खड़ी हो जाना और आंखें मूंदकर जो इच्छा हो कह देना। तुम जैसा चाहेगी, वैसा ही हो जाएगा।”

यह सुनकर तीनों सखियां खुशी के मारे फूली न समायीं। जैसे-तैसे करके उन्होंने दिन बिताया और ज्योंही दूसरे दिन सुबह हुई, तो आंखें मूंदकर पूरब की ओर मुंह करके खड़ी हो गयीं।

और जब उन्होंने आंखें खोलीं तो देखा कि उनकी इच्छाएं पूरी हो गयी हैं।

हंसिनी अपने शरीर पर के सारे रोएं गायब देख ख़ुशी से कूदने लगी, मुर्गी ख़ुशी के मारे चीख उठी और बत्तख़ अपने लम्बे पतले पैरों को देखकर खुशी से फूली न समायी।

हंसिनी जब तक छाया में खड़ी रही तब तक उसे ठंड लगती रही, लेकिन जब वह धूप में चली गयी तो गरमी के मारे उसका बुरा हाल हो गया। उसके शरीर पर अब रोएं तो थे नहीं, जिससे वह ठंड या गरमी सहन कर सकती | अब तो हंसिनी बहुत परेशान हुई | उसे अब पता चला कि रोएं उसके लिए कितने ज़रूरी थे।

इधर नाश्ते के समय मुर्गी अपने बच्चों को बुलाने गयी। उसके बच्चे कहीं दूर खेल रहे थे। मुर्गी ज़ोर से चिल्लायी, “ट्रि ट्रि टुं टुं-टननन नीं।”

बच्चों के लिए यह आवाज़ एकदम नयी और डरावनी थी। वे यह सुनकर मुर्गी के पास आने के बजाय और दूर भाग गये। अब तो मुर्गी बहुत परेशान हुई। वह ज्यों-ज्यों उन्हें बुलाती त्यों-त्यों वे दूर भागते । अन्त में मुर्गी रुआंसी-सी होकर एक तरफ खड़ी हो गयी।

इधर जब बत्तख़ कूदती-फुदकती हुई तालाब में नहाने के लिए चली तो पानी में कूदते ही उसे जैसे काठ मार गया। यह क्या? वह तो बिलकुल तैर नहीं सकती। अब क्या होगा? वह समझ गयी कि अपने चिपटे झिल्लीदार पंजों के कारण ही वह तेज़ी से तैर सकती थी। अब तो वे रहे नहीं।

शाम को तीनों सखियां फिर एक जगह इकट्ठी हुईं। तीनों बड़ी दुखी और खोयी-खोयी-सी मालूम पड़ती थीं।

हंसिनी परेशान होते हुए बोली, “मेरे शरीर पर से रोएं क्या गायब हुए, मेरी तो जान पर बन आयी। मैं या तो किसी दिन ठंड से ठिठुरकर मर जाऊंगी या गरमी में झुलस जाऊंगी। उफ! मेरे रोएं अब कैसे वापस मिलेंगे?”

मुर्गी ने रोकर कहा, “सितार की-सी आवाज़ मांगकर तो मैं भी पछता रही हूं। बच्चे मेरी बोली सुनकर दूर भाग जाते हैं, मेरे पास आने में कतराते हैं। हाय, अब मैं अपनी बोली कैसे वापस लाऊं?”

बत्तख़ उदास स्वर में बोली, “मेरा तो और भी बुरा हाल है। मेरे नये पैर तो तैरने में कतई साथ नहीं देते। इनसे तो मेरे पुराने पैर कहीं अच्छे थे। हाय, मैं उन पैरों को फिर कैसे पाऊं?”

अगले दिन सुबह फिर तीनों सखियां आंखें मूंद पूरब की ओर मुंह करके खड़ी हो गयीं।

और भाग्य से तोनों की इच्छाएं फिर से पूरी हो गयीं। हंसिनी अपने रोएंदार शरीर को देख खुशी से नाच उठी। मुर्गी ‘कुकड़ं-कूं, कुकडं-कूं’ चिल्लाती अपने बच्चों को ढूंढने चली गयी और बत्तख़ झिल्लीदार पंजेवाले पैर देख खुशी के मारे तालाब में कूद पड़ी।