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Bulgaria ki Lok Kathayen-1/ बुल्गारिया की लोक कथाएँ-1

मूर्खों की दुनिया: बुल्गारिया की लोक-कथा

एक गांव में करैलची नाम का एक किसान रहता था । उसकी आमदनी इतनी अच्छी थी कि अपनी पत्नी और बेटी का पेट आसानी से पाल सके । करैलची ने अपनी बेटी किराली को बहुत लाड़-प्यार से पाला था । किराली अपने पिता को बहुत प्यार करती थी ।

करैलची की पत्नी प्रतिदिन दोपहर को खाना तैयार करती और किराली भोजन लेकर अपने पिता के पास खेत पर जाती थी । पिता को अपने हाथ से भोजन खिलाकर ही वह घर वापस आती थी ।

एक दिन किराली भोजन लेकर चली तो बहुत तेज धूप थी । रास्ते में एक पेड़ के नीचे बैठकर वह सुस्ताने लगी । तभी उसने देखा कि पेड़ पर एक बंदर बैठा है । बंदर ने अपने बच्चे को अपने सीने से लगा रखा था । किराली सोचने लगी कि एक दिन उसका भी प्यारा-सा बच्चा होगा, वह अपने बच्चे का नाम ललगालनो रखेगी । वह अपने ललगालनो को खूब प्यार करेगी ।

तभी उसके मन में बुरे-बुरे खयाल आने लगे । वह सोचने लगी कि जब वह शैतानियां करेगा तो मुझे उस पर बहुत क्रोध आएगा । वह शैतानी करके इधर-उधर भागता फिरेगा । यदि किसी दिन वह सीढ़ियों में भागने लगेगा तो सीढ़ियों से गिर जाएगा । फिर मेरे ललगालनो को चोट लग जाएगी । अगर चोट ज्यादा लग गई तो वह मर जाएगा । ओह ! मेरे ललगालनो का क्या होगा, यही सोचते-सोचते वह रोने लगी और बार-बार कहने लगी – “मेरा ललगालनो मेरा ललगालनो ।” वह घंटों बैठी रोती रही और अपने पिता का भोजन ले जाना भूल गई ।

जब किराली बहुत देर तक घर वापस नहीं पहुंची तो उसकी मां ने सोचा कि अपने पिता को जाकर बताना चाहिए कि किराली घर वापस नहीं लौटी है । वह खेत की ओर चल दी ।

रास्ते में उसने किराली को एक पेड़ के नीचे बैठकर रोते हुए देखा तो उसने अपनी बेटी के पास जाकर पूछा – “बेटी, तुम रो क्यों रही हो ?”

किराली ‘मेरा ललगालनो’ कहकर रोती रही और अपने रोने का कारण मां को बताया । उसकी मां पूरी बात सुनकर बिना सोचे-समझे ‘मेरा ललगालनो’ कहकर रोने लगी । मां-बेटी दोनों बैठकर आंसू बहाने लगीं ।

करैलची को दोपहर का भोजन नहीं मिला था । इस कारण उसे क्रोध आ रहा था । शाम होते ही वह घर के लिए वापस चल दिया । रास्ते में अपनी पत्नी व बेटी को रोता देखकर उसने सोचा कि जरूर कोई अनहोनी दुर्घटना घटित हो गई है, जिसके कारण दोनों रो रही हैं ।

उसने धड़कते दिल से दोनों से रोने का कारण पूछा । कारण सुनकर वह क्रोध से पागल हो उठा । उसे समझ में नहीं आ रहा था कि अपनी पत्नी और बेटी की मूर्खता पर वह हंसे या क्रोध में अपने बाल नोचे । वह चीखकर बोला – “इस दुनिया में तुम लोगों से बड़ा मुर्ख और पागल कोई और नहीं मिल सकता । मैं जा रहा हूं और तभी घर लौटूंगा जब तुम से भी बड़े मुर्ख से मिल लूं ।”

करैलची की पत्नी और बेटी किराली उसके पीछे-पीछे खुशामद करने दौड़ीं, परंतु करैलची तब तक दूर निकल चूका था । चलते-चलते करैलची पास के एक गांव में पहुंचा । उसने देखा कि एक जगह भीड़ लगी थी । उसने भीतर घुसकर कारण जानने का प्रयास किया तो पता लगा कि लोग एक तालाब के चारों ओर जमा थे । पानी में चांद दिखाई दे रहा था । अनेक व्यक्ति इस बात का दावा कर रहे थे कि वे चांद को पकड़ कर दिखाएंगे ।

हर व्यक्ति चांद पकड़ने की फीस देकर आगे आता, फिर पानी में चांद पकड़ने की कोशिश करता था । बाकी लोग दर्शक बनकर तालियां बजा रहा था और चांद पकड़ने की बाजी का मजा ले रहे थे ।

करैलची लोगों की मूर्खता देखकर आगे बढ़ गया । वहां उसने देखा कि एक बूढ़ी औरत का एक टिन के डिब्बे में हाथ फंस गया है । कई लोग उसका हाथ खींचकर निकालने का प्रयास कर रहे हैं ।

बुढ़िया दर्द के मारे चीख रही थी परंतु हाथ बाहर नहीं निकल रहा था । करैलची ने पूछा कि माजरा क्या है ? उसे बताया गया कि डिब्बे में गेहूं भरे हैं और बुढ़िया मुट्ठी में गेहूं भरकर निकालने का प्रयास कर रही थी । तभी उसका हाथ डिब्बे में फंस गया और वह अब निकल नहीं रहा है ।

इतने में एक व्यक्ति बोला – “मुझे हाथ बाहर निकालने की एक आसान तरकीब समझ में आ गई है । इससे बूढ़ी मां को थोड़ा दर्द तो होगा परंतु कम से कम हाथ तो बाहर आ जाएगा ।”

सबने पूछा – “ऐसी कौन-सी तरकीब है ।”

“हम बूढ़ी मां का हाथ काट देंगे । वरना उसे डिब्बे में हाथ फंसाए हुए ही पूरा जीवन बिताना पड़ेगा । मैं सोचता हूं हाथ काटना आसान है, डिब्बे में हाथ डालकर जिन्दगी बिताना कठिन है ।”

इतने में दूसरा व्यक्ति बोला – “तुम तो कमाल करते हो भाई । इससे बेहतर तरकीब यह है कि डिब्बे को नीचे से काट दिया जाए ।”

करैलची ने लोगों की बात सुनकर माथा पीट लिया, वह बोला – “दादी मां, अपनी मुट्ठी को खोलो और गेहूं डिब्बे में छोड़ दो ।”

करैलची का इतना कहना था कि बुढ़िया ने मुट्ठी से गेहूं छोड़ दिए और उसका हाथ बाहर निकल गया । लोग करैलची को धन्यवाद व इनाम देने लगे ।

करैलची बहुत दुखी मन से घर की ओर यह सोचते हुए वापस चल दिया कि शायद इस दुनिया में मूर्खों की कमी नहीं है । जैसे अनेक लोग बड़े अक्लमंद होते हैं, ऐसे ही दुनिया में एक से एक बढ़कर मुर्ख भरे पड़े हैं ।

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Bulgaria ki Lok Kathayen-2/ बुल्गारिया की लोक कथाएँ-2

बाबा मार्ता: बुल्गारिया की लोक-कथा

बहुत पुरानी बात है। तब मार्च के महीने में केवल 28 दिन होते थे और फरवरी में 31 दिन। एक वर्ष फरवरी माह के अंतिम दिन घूप खिली हुई थी। सुहाना दिन था। एक बूढ़ी औरत ने यह निश्चय किया कि वह आज सही समय से पहले ही अपनी बकरियों को चराने पहाड़ों पर जाएगी। बुढ़िया ने खुद से ही कहा: बाबा मार्ता (मार्च वाली दादी) भला क्यूँ बुरा मानेगी? वो भी तो मेरी तरह एक दादी ही है!

बाबा मार्ता ने यह बातचीत सुन ली और बूढ़ी औरत को अपनी बकरियों के साथ पहाड़ों की ओर जाते गुस्से से देखा। बाबा मार्ता तुरंत अपने भाई छोटा-सेश्को (फरवरी) के पास भागकर गई और कहा “ अब समय आ गया कि तुम मुझे मेरी शराब चुराने का हर्जाना दो। अपने 31 दिनों में से तीन दिन मुझे दे दो ताकि मैं उस बुढ़िया को मार पाउँ जो अपनी बकरियों को समय से पहले ही चराने के लिए जा रही है। छोटा सेश्को ने यह याद करते हुए कि किस तरह बाबा मार्ता ने एक बार उसकी दाढ़ी को गंदा करने की धमकी दी थी, अपने तीन दिन उसे दे दिए।

तब मार्ता ने ठंडी हवा बहानी शुरू कर दी, बर्फ गिरने लगी और मौसम बेहद ठंडा हो गया। यह सब तीन दिन और तीन रात तक चलता रहा। पहाड़ों पर गई बूढ़ी औरत ठंड से काँपने लगी, उसका खून जम गया, और अंत में वह ठंड से पत्थर बन गई।

आखिरकार तीन दिन बाद बाबा मार्ता का गुस्सा ठंडा हुआ और सूरज निकल आया। मौसम फिर से सुहाना हो गया।

मौसम साफ होने के बाद गाँव के लोगों को बूढ़ी औरत की याद आई, और उन्होंने उसे पहाड़ों पर खोजना शुरू किया। काफी खोजने के बाद उन्हें बुढ़िया पत्थर बनी दिखाई पड़ी। उसके शरीर के पिछले हिस्से से एक छोटा पानी का झरना बह रहा था। पहाड़ो पर चढ़ने के बाद लोगों को बहुत प्यास लगी थी लेकिन उन्होंने हँसी और शर्म के मारे उस झरने से पानी नहीं पीया। तो इस तरह से बाबा मार्ता के पास 31 दिन और छोटा सेश्को के पास 28 दिन आए।

बल्गारिया में मार्च की पहली तारीख से वसंत ऋतु की शुरूवात मानी जाती है। मार्च के महीने को बाबा मार्ता (मार्च की दादी) से जोड़कर देखा जाता है। बाबा मार्ता एक गुस्सैल बुढ़ी औरत है जिसकी कमर झुकी हुई है। बल्गारिया में बाबा मार्ता के बदलते दिमाग को मार्च के महीने के बदलते मौसम के समान माना जाता है। उसका भाई छोटा सेश्को (फरवरी) शराब पीने का शौकीन है।

हर साल पहली मार्च को पूरे बल्गारिया में लोग एक दूसरे को लाल और सफेद रंग के धागे या उनसे बनी छोटी गुड़िया जिसे मार्तेनित्सा कहते हैं, बांधकर अच्छे स्वास्थ और खुशी की शुभकामनाएँ देते हैं। कुछ दिन बाद इसे किसी फलदार या फूलदार पेड़ से बांध दिया जाता है या किसी पत्थर की नीचे रख दिया जाता है।

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Bulgaria ki Lok Kathayen-3/ बुल्गारिया की लोक कथाएँ-3

एक तरकीब: बुल्गारिया की लोक-कथा

सर्दियों के दिन थे. कडाके की सर्दी पड़ रही थी। एक दिन एक व्यापारी को किसी काम से अचानक शहर जाना पड़ा। वह अपने घोड़े पर सवार होकर चल दिया. सर्दी के मारे घोड़ा भी बहुत धीमी चाल से आगे बढ़ रहा था। इस तरह व्यापारी को शहर पहुँचते-पहुँचते शाम हो गई। सर्दी से उसका और घोड़ें का बुरा हाल था. व्यापारी ने सोचा। पहले कही आग से तापकर सर्दी दूर की जाए। तभी उसने देखा कि पास में ही एक ढाबे में आग जल रही है और कुछ लोग उसके चारो और बैठे ताप रहे है। व्यापारी भी उसी ढाबे में चला गया. वहाँ अलाव के कारण काफी गरमाहट थी। उसे बहुत राहत महसूस हुई। उसने सोचा कि वह भी आग के पास बैठ जाए। परन्तु वहाँ कही जगह नहीं थी। उसने सभी लोगो से हाथ मिलाया. सभी ने उससे हाथ मिलाया परन्तु वे उसी जगह जमे रहे और अपनी बातों में व्यस्त रहे. कोई भी अपनी जगह छोड़ना नहीं चाहता था ।

व्यापारी को मन ही मन क्रोध आया, परन्तु वह कर ही क्या सकता था. उसने एक तरकीब सोची और होटल के मेनेजर को बुलाकर पूछा खाने के लिए गर्म क्या – क्या मिलेगा? मेनेजर ने कहा सूप है, राजमा है, ब्रैंड है आलू है, आप क्या खाना पसंद करेंगे? इस पर व्यापारी ने कहा कि पहले मेरे घोड़े को खिलाओ, उसे जोर की भूख लगी है। उसके लिए एक सूप भेज दो. सभी लोग हैरत से व्यापारी की और देखने लगे। एक व्यक्ति बोला श्रीमान क्या आपका घोड़ा सूप पी लेता है? हाँ, क्यों नहीं। बस सूप खूब गर्म होना चाहिए। मेनेजर ने वेटर को बुलाया और कहा यह सूप साहब के घोड़े को पिला दो। ज्यों ही वेटर आग के पास से उठ कर गया, बाकी सारे लोग भी उठ कर यह देखने चले गए कि देखे, घोड़ा सूप कैसे पीता है? व्यापारी जल्दी से अलाव के पास बैठ गया। कुछ ही देर में वेटर ने आकर कहा, साहब आपने घोड़े को सूप देने को कहा था, परन्तु आपका घोड़ा सूप नहीं पी रहा है। क्या आप बता सकते है कि वह सूप क्यों नहीं पी रहा है? व्यापारी ने कहा लगता है उसका सूप पीने का मन नहीं है, आप उसके लिए सूखे चने और ब्रेड भेज दीजिये और यह सूप मुझे दे दीजिये। सारे लोग बापस आ गए और व्यापारी बड़े मजे से अलाव के पास बैठकर गर्म सूप का आनंद लेने लगा ।

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Bulgaria ki Lok Kathayen-4/ बुल्गारिया की लोक कथाएँ-4

ईर्ष्या: बुल्गारिया की लोक-कथा

बहुत पहले की बात है । एक गरीब किसान एक गांव में रहता था । उसके पास एक बहुत छोटा सा खेत था जिसमें कुछ सब्जियां उगा कर वह अपना व अपने परिवार का पेट पालता था ।

गरीबी के कारण उसके पास धन की हमेशा कमी रहती थी । वह बहुत ईर्ष्यालु स्वभाव का था । इस कारण उसकी अपने अड़ोसी-पड़ोसी व रिश्तेदारों से बिल्कुल नहीं निभती थी ।

किसान की उम्र ढलने लगी थी, अत: उसे खेत पर काम करने में काफी मुश्किल आती थी । खेत जोतने के लिए उसके पास बैल नहीं थे । सिंचाई के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता था । खेत में या आस-पास कोई कुआं भी नहीं था, जिससे वह अपने खेतों की सिंचाई कर सके ।

एक दिन वह अपने खेत से थका-हारा लौट रहा था । उसे रास्ते में सफेद कपड़ों में सफेद दाढ़ी वाला एक बूढ़ा मिला । बूढ़ा बोला – “क्या बात है भाई, बहुत दुखी जान पड़ते हो ?”

किसान बोला – “क्या बताऊं बाबा, मेरे पास धन की बहुत कमी है । मेरे पास एक बैल होता तो मैं खेत की जुताई, बुआई और सिंचाई का सारा काम आराम से कर लेता ।”

बूढ़ा बोला – “अगर तुम्हें एक बैल मिल जाए तो तुम क्या करोगे ?”

“तब मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा । मेरी खेती का सारा काम बहुत आसान हो जाएगा पर बैल मुझे मिलेगा कहां से ?” किसान बोला ।

“मैं आज ही तुम्हें एक बैल दिए देता हूं, यह बैल घर ले जाओ और घर जाकर अपने पड़ोसी को मेरे पास भेज देना ।” बूढ़े ने कहा ।

किसान बोला – “आप मुझे बैल दे देंगे, यह जानकर मुझे बहुत खुशी हुई । परंतु आप मेरे पड़ोसी से क्यों मिलना चाहते हैं ?”

बूढ़ा बोला – “अपने पड़ोसी से कहना कि वह मेरे पास आकर दो बैल ले जाए ।”

बूढ़े की बात सुनकर किसान को भीतर ही भीतर क्रोध आने लगा । वह ईर्ष्या के कारण जल-भुन कर रह गया । वह बोला – “आप नहीं जानते कि मेरे पड़ोसी के पास सब कुछ है । यदि आप मेरे पड़ोसी को दो बैल देना चाहते हैं तो मुझे एक बैल भी नहीं चाहिए ।”

बूढ़े ने बैल को अपनी ओर खींच लिया और कहा – “क्या तुम जानते हो कि तुम्हारी समस्या क्या है ? तुम्हारी समस्या गरीबी नहीं ईर्ष्या है । तुम्हें जो कुछ मिल रहा है, यदि तुम उसी को देखकर संतुष्ट हो जाते और पड़ोसियों व रिश्तेदारों की सुख-सुविधा से ईर्ष्या ने करते तो शायद संसार में सबसे ज्यादा सुखी इंसान बन जाते ।”

इतना कहकर बूढ़ा जंगल में ओझल हो गया । किसान मनुष्य की ईर्ष्यालु प्रवृत्ति के बारे में सोचने लगा ।