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Chinese Lok Kathayen-9/ चीनी लोक कथाएँ-9

कहानी-शीमन पाओ के ये कांउटी का शासन: चीनी लोक कथा

शीमन पाओ ईसा पूर्व पांचवीं शताब्दी का निवासी था। वह दौर चीन में युद्धरत काल था। शीमन पाओ प्रतिभा और योग्यता के लिए राजा द्वारा ये ती ज़िले का जिलाधीश नियुक्त किया गया।

पद संभालने के तुरंत बाद शीमन पाओ ने कुछ जाने-माने स्थानीय वृद्ध व्यक्तियों को बुलाकर जिले की समस्याएं पूछीं। वृद्धों ने उसे बताया कि जिले की प्रजा इस मुसीबत से बुरी तरह परेशान है कि हर साल नदी के जल देवता को दुल्हन के रूप में एक नव युवती भेंट की जाती है।

असल में बात यह थी कि ये ती जिला पीली नदी के किनारे पर बसा था। स्थानीय प्रथा के अनुसार नदी में जल देवता रहता था, उसे हर साल एक नव युवती दुल्हन के रूप में भेंट की जाती थी, वरना देवता नदी में भयंकर बाढ़ ला देगा, जिससे पूरा जिला पानी में जलमग्न हो जाएगा। लम्बे अरसे से जिले के अधिकारी और भूतनी जल देवता के शादी ब्याह की सेवा में बहुत सक्रिय थे और इसके लिए प्रजा से अतिरिक्त कर वसूल करते आए थे, जो धन दौलत मिलती थी, उसे आपस में बांटा जाता था।

वृद्धों के अनुसार हर साल एक निश्चित समय पर जिले की एक बूढ़ी भूतनी विभिन्न जगहों पर गरीब घर की रूपवती लड़की की तलाश करने निकलती है और उसे जल देवता को भेंट करने के लिए चुनती थी। फिर सरकारी अधिकारी मामले को अपने हाथ में ले कर चुनी गई लड़की को जबरन एकांत जगह में बंद करते थे और उसे अच्छे वस्त्र और भोजन देते थे।

दस दिन के बाद जल देवता की शादी का मुहूर्त आता था, उस लड़की को खूबसूरत संजाया संवारा जाता था। पलंग के रूप में एक चटाई तैयार की जाती थी और लड़की उस पर बिठा कर नदी में छोड़ी जाती थी। शुरू-शुरू में चटाई पर बैठी युवती नदी की जल सतह पर तैरती थी, पर थोड़े ही वक्त के बाद वह नदी में डूब जाती थी। भूतनियां इस घड़ी पर अनुष्ठान कर घोषणा करती थी कि जल देवता की शादी संपन्न हो चुकी है और वह अपनी नई दुल्हन से संतुष्ट है।

ये ती जिले के स्थानीय वृद्धों की बातें सुन कर शीमन पाओ कुछ नहीं बोला। इस तरह वृद्धों ने भी उससे खास आशा नहीं बांधी।

जल देवता की शादी का दिन आ गया। खबर पाकर शीमन पाओ अपने सिपाहियों को लेकर पहले ही नदी के किनारे पर आया। कुछ समय बाद जिले के सरकारी अधिकारी, कुलीन वर्ग के लोग और जल देवता के लिए चुनी गई दुल्हन भी नदी के तट पर आए। उनके साथ जो बूढ़ी भूतनी आई, वह 70 साल से अधिक उम्र वाली थी।

तब जाकर शीमन पाओ ने आगे आ कर कहा:“जल देवता की दुल्हन ले आओ, मैं देखना चाहता हूं कि वह सुन्दर है या नहीं।”

दुल्हन के लिए चुनी गई वह नव युवती शीमन पाओ के सामने ला खड़ी की गई। उस पर एक नज़र दौड़ा कर शीमन पाओ ने उपस्थित लोगों से कहा:“यह लड़की खूबसूरत नहीं है और जल देवता की दुल्हन बनने के काबिल नहीं है। लेकिन आज जल देवता की शादी का दिन है, वह इंतजार में अवश्य है, भूतनी को थोड़ा कष्ट उठाना होगा। तुम देवता को यह सूचना देने जाओ कि हम इस लड़की से सुन्दर लड़की ढूंढ़ निकालेंगे, शादी दूसरे दिन होगी।”

कहते हुए शीमन पाओ ने अपने सिपाहियों को उस बूढ़ी भूतनी को नदी में फेंकने का आदेश दिया। थोड़ी देर बाद, शीमन पाओ फिर बोला:“क्या बात है बहुत देर हो चुकी है भूतनी वापस नहीं आयी। उसकी एक शिष्या को वहां के हालात जानने के लिए भेजा जाय।”

शीमन पाओ के आदेश पर सिपाहियों ने बूढ़ी भूतनी की एक चेली को नदी के पानी में छोड़ दिया। इस तरह एक के बाद एक भूतनी की तीन शिष्याएं पानी में डाल दी गयी।

नदी के तट पर इक्ट्ठे सरकारी अधिकारी, धनी व्यक्ति और भीड़ सबके सब हैरान थे, लेकिन शीमन पाओ सम्मान की मुद्रा में खड़े जल देवता की खबर आने की प्रतीक्षा में था।

थोड़ी देर के बाद शीमन पाओ बोला:“ लगता है जल देवता बहुत मेहमाननवाज है, वह हमारे द्वारा भेजे गए दूतों को लौटने नहीं देते हैं। बेहतर होगा कि खबर लेने के लिए फिर एक व्यक्ति को भेजा जाय।”

कहते हुए शीमन पाओ की नज़र जल देवता की शादी ब्याह के मामले में सक्रिय रहे सरकारी अधिकारियों, धनी और कुलीन लोगों की ओर घूमी। डर के मारे ये लोग तुरंत जमीन पर घुटनों के बल झुक कर शीमन पाओ से क्षमा मांगने लगे। उन्हें डर था कि कहीं शीमन पाओ उन्हें भी जल देवता से मिलने के लिए नदी में तो नहीं फेंक देगा।

इस वक्त शीमन पाओ ने भीड़ को संबोधित करते हुए बुलंद आवाज में कहा:“जल देवता की शादी असल में जिलावासियों से धन दौलत लूटने की चाल है। भविष्य में अगर कोई फिर जल देवता की शादी ब्याह का मामला करेगा, तो उसे नदी में देवता के पास भेज दिया जाएगा।”

इस घटना के बाद ये ती जिले में जल देवता की शादी फिर कभी नहीं हुई और ये ती जिला भी शीमन पाओ के कुशल प्रशासन में सुव्यवस्थित और सुशासित हो गया।

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Chinese Lok Kathayen-8/ चीनी लोक कथाएँ-8

कहानी-पेइ श्वेइ का युद्ध: चीनी लोक कथा

“पेइ श्वेइ का युद्ध”का अर्थ आम तौर पर निकलता है कि नदी को अपने पीछे रखकर शत्रु के साथ जीवन-मरण की लड़ाई लड़ना, मतलब है कि शत्रु को हराने का पूरा प्रयास करना है, वजह है पीछे हटाने का रास्ता नहीं है।

यह युद्ध आज उत्तर चीन के हपेई प्रांत की चिंग शिंग कांउटी में हुआ, तो इसे चिंग शिंग का युद्ध कहा जाता है।

ईसा पूर्व 206 में चीन के प्रथम एकीकृत सामंती राजवंश छिन का पतन हुआ। देश का इतिहास एक नए दौर से गुजरने लगा। राजसत्ता छीनने के लिए तत्काल की दो शक्तिशाली सेनाओं के नेता यानी शी-छु राज्य के राजा श्यांग-यु और हान राज्य के राजा ल्यू पांग के बीच युद्ध छिड़ा।

दोनों के बीच का युद्ध करीब पांच सालों तक चला। इस दौरान ल्यू पांग की सेना यानी हान राज्य की सेना के सेनापति हान शिन ने असाधारण युद्ध कला और सामरिक प्रतिभा का परिचय दिया। चिंग शिंग नाम के स्थान पर हान और चाओ सेनाओं में हुआ। युद्ध हान शिन की सामरिक प्रतिभा की एक मिसाल थी।

ईसा पूर्व 204 के अक्तूबर में हान शिन के कमान में हान सेना की एक नव गठित दस हजार लोगों की टुकड़ी लम्बा सफ़र तय कर उत्तरी चीन के थाई हांग पर्वत से गुज़र कर शी-छु राजा श्यांग-यु के अधीनस्थ चाओ राज्य पर हमला करने गई। चाओ राजा श्ये और उसके सेनापति छन-यु के पास दो लाख सैनिकों की एक विशाल सेना थी, जो थाई हांग पर्वत के एक दर्रे चिंग शिंग नामक स्थान पर तैनात थी और हान शिन की सेना के विरूद्ध निर्णायक युद्ध करने के लिए तैयार थी।

चिंग शिंग हान सेना के लिए चाओ राज्य की सेना पर हमला करने जाने का एकमात्र रास्ता था, जहां भू-स्थिति खतरनाक और जटिल थी। वहां से गुज़रने के लिए मात्र सौ किलोमीटर लम्बा संकरा मार्ग मिलता था। यह स्थिति हमला करने वाली विशाल सेना के लिए अत्यन्त प्रतिकूल थी और प्रतिरक्षा की सेना के हित में थी।

युद्ध से पहले चाओ राज्य की सेना ने चिंग शिंग दर्रे पर कब्जा कर रखा था और ऊंचे पहाड़ पर अपना मजबूत मोर्चा बनाया था। उसकी सैन्य शक्ति भी तगड़ी थी और लम्बा मार्च करने की ज़रूरत भी नहीं थी। युद्ध जीतने की प्राथमिकता चाओ राज्य की सेना के हाथ में थी। चाओ सेना पर हमला करने आई हान शिन की सेना के पास केवल दस हजार सैनिक थे, वे भी लम्बा मार्च कर बहुत थके हुए थे, इसलिए हान शिन की सेना कमजोर और प्रतिकूल स्थिति में थी।

युद्ध से पहले चाओ सेना के सलाहकार ली च्वेच्यु ने सेनापति छन-यु को यह सलाह दी कि दर्रे के सामने आ पहुंची हान शिन की सेना के हमले को रोकने के लिए अपनी मुख्य टुकड़ी तैनात की जाए। साथ ही पीछे के रास्ते से एक छोटी टुकड़ी भेजकर हान शिन की सेना के अनाज आपूर्ति रास्ते को काट दे और दोनों तरफ़ उस पर धावा बोले, इस रणनीति से हान शिन को जिन्दा पकड़ा जा सकता है। लेकिन सेनापति छन-यु युद्ध कला में एक रूढ़िवादी था, उसे अपनी शक्तिशाली सेना पर अंधा विश्वास था और पीछे की ओर दुश्मन पर हमला करने का विरोधी था, इसलिए उसने ली च्वेच्यु के अच्छे सुझाव को ठुकरा दिया।

युद्ध में चतुर हान राज्य की सेना के सेनापति हान शिन को मालूम था कि दोनों सेनाओं की शक्ति काफ़ी फर्क है, यदि सामने से सीधे चाओ राज्य की सेना के मोर्चे पर चढ़ाई की जाय, तो हान राज्य की सेना निश्चय ही परास्त होगी। सो उसने चिंग शिंग दर्रे से बहुत दूर एक जगह पर अपनी सेना तैनात की और वहां की भू-स्थिति और चाओ राज्य की सेना के विन्यास का बारीकी से विश्लेषण किया। हान शिन को जब यह खबर मिली कि चाओ सेना के सेनापति छन-यु हान सेना की शक्ति को बड़ी उपेक्षा की नजर से देखता है और जल्दी से युद्ध जीतने के लिए उतावला है, तो उसने तुरंत अपनी सेना को चिंग शिंग दर्रे से 15 किलोमीटर की दूरी पर तैनात कर दिया।

आधी रात के समय, हान शिन ने दो हजार सैनिकों को हान सेना का एक झंडा लिए रात के अंधेरे की आड़ में पहाड़ी पगडंडी से चाओ राज्य की सेना के शिविर के बगल में भेजकर घात में लगाया। हान शिन की योजना थी कि अगर दूसरे दिन युद्ध छिड़ा, चाओ सेना शिविर से लड़ाई के लिए बाहर आई, तो मौके का लाभ उठा कर ये दो हजार सैनिक चाओ सेना के शिविर में प्रवेश कर चाओ सेना के झंडों की जगह हान सेना के झंडे फहराएंगे। इसके बाद हान शिन ने और 10 हज़ार सैनिकों को नदी के पास भेजा। सैनिकों के पीछे नदी है, अगर युद्ध में हारे, तो पीछे नहीं हटा सकते। चीनी युद्ध कला में नदी के पीछे रहकर लड़ाई करना बहुत खतरनाक बात है, आम तौर पर ऐसी स्थिति में सैनिकों की हार के बाद मौत होती है। छन-यु हान शिन की इस प्रकार की तैनाती के बारे में जानकर ज़ोर से हंसा, उसने कहा कि हान शिन को युद्ध कला मालूम नहीं है, अपनी सेना के लिए हटाने का रास्ता नहीं रखा, वह जरूर खत्म होगा।

दूसरे दिन, हान शिन के कमान में हान राज्य की सेना खुले तौर पर चाओ सेना की ओर बढ़ने लगी, जब चिंग शिंग दर्रे के पास आ पहुंची, तो एकदम सुबह हो गयी। चाओ सेना के सेनापति छन-यु ने अपनी सभी सैन्य शक्ति को एकत्र कर हान शिन की सेना पर हमला बोला। दोनों सेनाओं में घमासान लड़ाई हुई, लेकिन देर तक हार जीत तय नहीं हो पाई।

इसी बीच चाओ सेना के शिविर में बहुत कम संख्या में सैनिक पहरे के लिए छोड़े गए थे, शिविर के बगल में घात लगाकर बैठे हान शिन के दो हजार सैनिकों ने तुरंत चाओ सेना के शिविर में धावा बोला और वहां हान सेना के झंडे फहराए, फिर ढोल बजाते हुए हुंकार करते रहे।

दर्रे के पास घमासान लड़ाई में चाओ सेना ने अचानक देखा कि उसके शिविर में हर जगह हान सेना के झंडे फगराए गए हैं, तो उसमें बड़ी घबराहट मची और मोर्चा भी ध्वस्त हो गया। हान शिन ने मौके पर दुश्मन पर जवाबी हमला बोला और चाओ राज्य की दो लाख सैनिकों वाली विशाल सेना को बुरी तरह पराजित कर दिया, चाओ का सेनापति छन-यु युद्ध में मारा गया और चाओ राजा ज़िंदा पकड़ा गया।

युद्ध की विजय की खुशियां मनाने के समारोह में कुछ सैन्य अफ़सरों ने सेनापति हान शिन से पूछा:“युद्ध कला के ग्रंथों में कहा गया कि पर्वत को पीछे रखकर या नदी को आगे रखकर सैनिकों की तैनाती की जा सकती है, लेकिन आपने नदी को सैनिकों के पीछे रख दिया और कहा था कि विजय पाकर हम खुशियां मनाएंगे। उस समय हमें विश्वास नहीं था। लेकिन अंत में हमें विजय मिली। आपने क्या रणनीति बनायी?”

सेनापति हान शिन ने मुस्कराते हुए कहा:“यह उपाय युद्ध कला के ग्रंथों में लिखा गया है। शायद आप लोगों ने इस पर ध्यान नहीं दिया हो। युद्ध कला ग्रंथों में कहा गया कि सबसे खतरनाक स्थिति में फंस कर भी रास्ता निकल सकता है”नदी के पीछे रहकर हमारे सैनिकों के लिए भागने का कोई रास्ता नहीं था, जीतने के लिए उन्हें पुरज़ोर कोशिश करनी थी।

“पेइ श्वेइ का युद्ध”शीर्षक कहानी चीन में कहावत के रूप में इस्तेमाल की जाती है। इसका इस्तेमाल अधिकतर सैन्य कार्रवाइयों में किया जाता है। इसके साथ ही निर्णायक लड़ाई वाली कार्रवाई में भी प्रयोग किया जाता है। मतलब है कि बचने का कोई रास्ता न होने पर शत्रु के साथ जीवन-मरण की लड़ाई लड़ना। दूसरा अर्थ निकलता है कि गतिरोध से बाहर निकलने के लिए अंतिम प्रयत्न करना।

चिंग शिंग युद्ध में हान शिन ने दस हजार सैनिकों की सेना से चतुर युद्ध कला का इस्तेमाल कर दो लाख वाली दुश्मन सेना को पूरी तरह खत्म कर दिया और चीन के सैन्य इतिहास में एक शानदार मिसाल कायम की।

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Chinese Lok Kathayen-7/ चीनी लोक कथाएँ-7

कहानी-छांग फिंग का युद्ध: चीनी लोक कथा

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी यानी युद्धरत राज्य काल में चीन की भूमि पर कई राज्य अस्तित्व में आए, जो आपस में युद्ध लड़ते थे। इसी दौरान छिन राज्य ने राजनीतिक सुधार कर अपनी शक्ति अत्याधिक बढ़ा दी थी। राजा छिन चाओवांग के शासन काल में छिन प्राचीन चीन की भूमि पर स्थापित सात प्रमुख राज्यों में से सबसे शक्तिशाली और समृद्ध हो गया और उसने देश का एकीकरण करने का अभियान चलाया। इस दौरान कई मशहूर युद्ध हुए, जिनमें छांग फिंग का युद्ध काफ़ी प्रसिद्ध था।

यहां बता दें कि ये सात प्रमुख राज्य छी राज्य, छू राज्य, यान राज्य, हान राज्य, चाओ राज्य, वेइ राज्य और छीन राज्य थे।

छिन राज्य के पड़ोसी राज्य हान, वेइ, यान और चाओ ने छिन राज्य की विस्तार नीति को विफल करने के लिए गठबंधन कायम किया। चारों राज्यों में से चाओ राज्य सबसे सशक्त था और वेइ सबसे कमजोर था।

ईसा पूर्व वर्ष 268 में छिन राज्य ने वेइ राज्य पर हमले के लिए सेना भेजी और उसे अपना अधीनस्थ राज्य बनाया। इसके बाद उसने हान राज्य पर धावा बोलने सेना भेजी। हान राज्य का राजा बहुत भयभीत हो गया और उसने छिन राज्य को अपने देश का शांग तांग शहर भेंट करने का निश्चय किया। लेकिन हान राज्य के शांग तांग शहर का महापौर फ़ंग थिंग अपने शहर को छिन राज्य को भेंट नहीं करना चाहता था। उसने शहर को चाओ राज्य को भेंट कर हान और चाओ के बीच छिन राज्य के आक्रमण का मुकाबला करने का गठबंधन करवाया।

चाओ राज्य का राजा दूरदर्शी नहीं था। उसने एक शहर के लालच में अंतिम परिणाम के बारे में नहीं सोचा और शांग तांग शहर को अपनी सीमा में शामिल किया। उसकी इस हरकत से छिन राज्य बहुत क्रोधित हो उठा। ईसा पूर्व 261 में, छिन राज्य के राजा ने सेनापति वांग ह को सेना के साथ शांग तांग शहर पर चढ़ाई करने भेजा।

शांग तांग में तैनात चाओ राज्य की सेना हार कर छांग फिंग नामक स्थान तक हट गई। छिन राज्य की सेना को रोकने के लिए चाओ राजा ने अपने वृद्ध सेनापति ल्यान फो को छांग फिंग में चाओ सेना का नेतृत्व करने भेजा।

चाओ सेना की मुख्य टुकड़ी ने छांग फिंग पर छिन राज्य की सेना के साथ कई बार युद्ध किये, लेकिन वह विजयी नहीं हुई और काफ़ी नुकसान भी हुआ। वस्तुगत स्थिति पर गौर कर चाओ सेना के सेनापति ल्यान फो ने अपनी अच्छी भू स्थिति के सहारे मजबूत मोर्चा बनाकर छिन राज्य की सेना के हमले को रोकने की प्रतिरक्षा नीति तैयार की। यह रणनीति रंग लायी, छिन राज्य की सेना के हमलों को वहीं रोका गया और दोनों सेनाओं के बीच लम्बे समय तक बराबर की स्थिति बनी रही।

युद्ध के इस प्रकार के गतिरोध को भंग करने के लिए छिन राज्य ने चाओ राज्य के शासक वर्ग में फूट डालने की चाल चली। उसने चाओ राजा के नज़दीकी मंत्री को धन-दौलत से खरीद लिया, जिसने चाओ राजा और सेनापति ल्यान फो के संबंधों को बिगाड़ने की कोशिश में यह अफ़वाह फैलाई कि ल्यान फो छिन राज्य की सेना को आत्मसमर्पण के लिए उस पर हमला नहीं करना चाहता। छिन राज्य की सेना सबसे ज्यादा चाओ राज्य के सेनापति चाओ खुओ से डरती है।

युद्ध की स्थिति से अज्ञात चाओ राजा को लगा कि ल्यान फो डर के मारे दुश्मन पर हमला नहीं करता है, इसलिए उसने उसे पद से हटा कर चाओ खुओ को सेनापति नियुक्त किया ।

वास्तव में चाओ खुओ ने कभी युद्ध में भाग नहीं लिया था। उसे असली युद्ध के बारे में कोई अनुभव भी नहीं था, पर वह युद्ध कला पर खोखली बातें बहुत पसंद करता था। छांग फिंग नाम के स्थल तक पहुंच कर उसने ल्यान फो की प्रतिरक्षा की रणनीति छोड़ कर दुश्मन पर दल बल से धावा बोलने और अंतिम जीत हार तय करने की रणनीति अपनायी।

इस तरह छिन राज्य चाओ राज्य की सेना में फूट का बीज डालने में सफल हुआ। उसने वांग ह की जगह अपने अनुभवी और वीर जनरल पाई छी को सेनापति नियुक्त किया और इस बदलाव को चाओ राज्य की सेना के प्रति गोपनीय भी रखा, ताकि चाओ राज्य की सेना चेत न जाए।

चाओ सेना के सेनापति चाओ खुओ की युद्ध का अनुभव न होने और खुद पर घमंड होने की कमजोरी से लाभ उठाकर छिन राज्य के सेनापति पाई छी ने दुश्मन को भ्रम में डालकर उसे घेरने की नीति लागू की।

ईसा पूर्व वर्ष 260 में चाओ खुओ ने अपनी सेना को छिन राज्य की सेना पर बड़ा हमला बोलने का आदेश दिया। दोनों सेनाओं में कुछ समय युद्ध चलने के बाद छिन सेना हार का बहाना कर पीछे हटने लगी। चाओ खुओ ने स्थिति की असलियत का जायजा न कर तुरंत छिन राज्य की सेना का पीछा करने का निश्चय किया। इस तरह चाओ राज्य की सेना छिन राज्य की सेना द्वारा पूर्व योजना के अनुसार बिछाए गए जाल में फंस गयी। उसे छिन राज्य की सेना की मुख्य टुकड़ी का जमकर मुकाबले का सामना करना पड़ा। इसी बीच बगल में घात लगाकर बैठी छिन राज्य की सेना की टुकड़ियों ने दोनों तरफ़ से चाओ सेना को टुकड़ों में विभाजित कर दिया और एक-एक को घेर लिया।

कड़ी घेराबंदी में फंसे चाओ खुओ ने खुद चाओ राज्य की सेना की मजबूत टुकड़ी का नेतृत्व कर घेराबंदी तोड़ने की अंतिम कोशिश की, किन्तु छिन राज्य की सेना के तीरों की अंधाधुंध वर्षा में वह खुद मारा गया। सेनापति के मरने पर चाओ राज्य की सेना का हौसला पस्त हो गया और सभी ने आत्मसमर्पण किया। इस तरह छिन राज्य की सेना ने छांग फिंग पर हुए घमासान युद्ध में अंतिम विजय पायी।

छांग फिंग का युद्ध चीन के युद्ध इतिहास में दुश्मन को घेराबंदी में डाल कर खत्म करने की एक शानदार प्राचीन मिसाल है।

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Chinese Lok Kathayen-6/ चीनी लोक कथाएँ-6

कहानी-खाली शहर की चाल: चीनी लोक कथा

खाली शहर की चाल: चीनी लोक-कथा

“खाली शहर की चाल” बुद्धिमानी से जुड़ी एक कहानी है। यह मशहूर चीनी ऐतिहासिक व्यक्ति चु क ल्यांग की बुद्धि से जुड़ी कहानी है।

चीन में चु क ल्यांग का नाम सभी जानते हैं। वह असधारण बुद्धिमान और कार्यकुशल शख्स था। उसके बारे में कई रोचक कहानियां प्रचलित हैं, खाली शहर की चाल उनमें से एक है।

ईसवी तीसरी शताब्दी में यानी ईसवी वर्ष 220 से 280 तक के समय में चीन में मुख्यतः तीन राज्य शासन करते थे, वे थे वेई राज्य, शू राज्य और वू राज्य। चीन के इतिहास में यह काल त्रि-राज्य काल कहलाता है। उत्तरी चीन पर वेई राज्य, दक्षिण पश्चिमी चीन पर शू राज्य और दक्षिण चीन पर वू राज्य का नियंत्रण हुआ करता था। इन तीनों राज्यों में वेई राज्य अधिक शक्तिशाली था।

इन तीनों राज्यों में वेई राज्य अधिक शक्तिशाली था। शू राज्य के सैन्य सलाहकार चु क ल्यांग युद्ध कला में पारंगत और अजेय माने जाते थे।

एक बार वेई राज्य को यह सूचना मिली कि शू राज्य के सामरिक स्थल पश्चिमी नगर में तैनात सैन्य बल बहुत कम है, वहां केवल दस हजार सिपाही पहरा दे रहे थे। वेई राज्य के सेनापति स-मा यी ने एक लाख से अधिक सैनिकों वाली सेना लेकर शू राज्य के पश्चिमी शहर पर हमला बोल दिया।

वेई राज्य की विशाल सेना के पश्चिमी शहर की ओर आने की खबर पा कर वहां के सभी लोगों को बड़ी चिंता हो उठी। एक लाख सैनिकों की सेना को रोकने में दस हजार लोगों की शक्ति कुछ भी नहीं थी। शू राज्य के दूसरे स्थानों से कुमक सेना बुलाने के लिए अब समय भी नहीं था। स्थिति बड़े खतरे में पड़ गई। इस नाजुक घड़ी में सभी लोगों ने शहर बचाने की आशा शू सेना के नायक चु क ल्यांग पर बांधी। चु क ल्यांग भी मुश्किल में पड़ गया, इस प्रकार की असाधारण गंभीर स्थिति का सामना करने के लिए एक उचित उपाय सोचना था।

काफी सोच विचार कर चु क ल्यांग को एक साहसिक चाल सूझी। उसने शहर के तमाम आम निवासियों और सिपाहियों को शहर से बाहर सुरक्षित स्थान छिप जाने का आदेश दिया। शहर का दरवाजा पूरा खुलवाया और इस तरह दुश्मन की सेना के आगमन की प्रतीक्षा में बैठ गए।

कुछ समय बाद वेई राज्य की सेना स-मा यी के नेतृत्व में पश्चिमी शहर के पास आ पहुंची और उसने शहर को घेरने का हुक्म जारी किया। लेकिन वह इस बात से हैरान हो गया कि पश्चिमी शहर निर्जन सा है, शहर का दरवाजा खुला का खुला हुआ है, शहर की दीवार पर पहरे के लिए एक भी सैनिक नहीं है और केवल एक बूढ़ा दरवाजे के पास जमीन पर झाड़ू लगा रहा है। जबकि युद्ध की आम स्थिति में इस समय पश्चिमी शहर पर प्रतिरक्षा की कड़ी मुस्तैदी होनी चाहिए था।

स-मा यी के लिए और बड़ी हैरान की बात यह थी कि शहर की दीवार पर निर्मित दुर्ग के सामने चु क ल्यांग आराम से बैठा दिखाई दे रहा है। चु गल्यांन स-मा यी का पुराना और प्रबल प्रतिद्वंद्वी था। दोनों के बीच कई बार युद्ध हुए थे। स-मा यी ने ऊपर शहर की ऊंची दीवार की ओर नज़र दौड़ाई, तो देखा कि चु क ल्यांग बड़े इतमिनान के साथ खड़ा होकर अपने वस्त्रों को थोड़ा ठीकठाक कर फिर बैठ गया और सामने रखे वाद्य यंत्र पर उंगली फेरने लगा। मधुर संगीत की धुन उसकी उंगलियों से निकल रही थी। शहर की दरवाजे के नीचे खड़े वेई राज्य के सभी सैनिक आश्चर्य में मौन रह गए। उन्होंने सोचा नहीं था कि इतनी विशाल शक्तिशाली दुश्मन की सेना के सामने चु क ल्यांग इस तरह निश्चिंत वाद्य बजाने में मग्न होगा। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मामला क्या हुआ।

खुले दरवाजे और वाद्य यंत्र बजा रहे चु क ल्यांग को देखकर अक्लमंद और चालाकी के लिए मशहूर स-मा यी को कुछ भी नहीं सूझा। वह अच्छी तरह जानता था कि चु क ल्यांग असाधारण रूप से बुद्धिमान और चतुर है और युद्ध में बड़ी सावधानी से काम लेता है । अब उसे शहर का दरवाजा पूरा खोल कर वेई राज्य के एक लाख सैनिकों की अगवानी करने का साहस हुआ, तो निस्संदेह शहर में उसकी तगड़ी सेना छुपी हुई है।

इस वक्त चु क ल्यांग की ओर वाद्य यंत्र की ध्वनि मंद गति से वेग चाल में बदल गई। मानो अपनी सेना को दुश्मन पर धावा बोलने का हुक्म जारी कर रहा हो। स-मा यी ने स्थिति को भांपते हुए महसूस किया कि चु क ल्यांग ने उसे फंसाने के लिए कोई चाल चली है। उसने तुरंत अपनी सेना को वहां से हट जाने का आदेश दिया।

इस तरह वेई राज्य की एक लाख सैनिकों वाली सेना घबराते हुए वहां से हट गई। चु क ल्यांग की बुद्धिमत्ता के बल पर पश्चिमी शहर को खतरे से बचाया गया। और चु क ल्यांग की यह कहानी खाली शहर की चाल के नाम से मशहूर हो गई।

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Chinese Lok Kathayen-5/ चीनी लोक कथाएँ-5

कहानी-होंगमन दावत: चीनी लोक कथा

होंगमन प्राचीन काल में छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग के उपनगर में स्थित है, जो आज के पश्चिमोत्तर चीन के शानशी प्रांत की राजधानी शीआन के अधीन लिनथोंग नगर के शिनफ़ंग कस्बे में होंगमनपु गांव में स्थित है। ईसा पूर्व साल 206 में होंगमन दावत का आयोजन किया गया था, जिसमें तत्कालीन छिन राजवंश की विरोधी दो सेनाओं के सेनापतियों श्यांग यु और ल्यू पांग ने भाग लिया। इस दावत का छिन राजवंश के अंत में हुए किसान युद्ध, श्यांग यु और ल्यू पांग के बीच हुए युद्ध पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इस दावत को अप्रत्यक्ष तौर पर श्यांग यु की हार और ल्यू पांग की विजय और बाद में ल्यू पांग के हान राजवंश की स्थापना का मुख्य कारण माना जाता है।

ईसा पूर्व 221 में चीन के प्रथम एकीकृत सामंती राजवंश छिन राजवंश की स्थापना हुई। लेकिन चीन के एकीकरण के बाद छिन राजवंश के सम्राट छिन श हुआंग बेहद तनाशाही, निरंकुश और अहंकार से भरा निकला। अपने सुखभोग के लिए छिन शहुआंग ने बेशुमार धन दौलत खर्च कर आलीशान राजमहल और मकबरा बनवाया और हूणों के आक्रमण को रोकने के लिए लम्बी दीवार का निर्माण करवाया।

छिन राजवंश के शासक प्रजा का बहुत शोषण और अत्याचार करते थे, जिससे प्रजा में उसके विरूद्ध विद्रोह भड़क उठा। इस तरह अपने साम्राज्य की स्थापना के 15 सालों के बाद ही छिन राजवंश का तख्ता पलट दिया गया और राज्य सत्ता छीनने के लिए उसमें मुख्यतः दो शक्तिशाली सेनाएं रह गईं:एक सेना प्राचीन चीन के मशहूर राजा श्यांग यु की थी और दूसरी सेना उपरांत के हान राजवंश के संस्थापक ल्यू पांग की थी।

दोनों सेनाओं के बीच राज्य सत्ता छीनने के लिए भीषण युद्ध चले। शुरू-शुरू में श्यांग यु की सेना बहुत सशक्त थी। राजा श्यांग यु एक बहादुर योद्धा था, लेकिन वह बहुत घमंडी और तानाशाही भी था। जबकि ल्यु पांग शुरू में एक छोटे पद का अधिकारी था। वह स्वभाव में चालाक था, पर दूसरे लोगों को अपने उद्देश्य के लिए वशीभूत करने में कुशल था। पहले छिन राजवंश का तख्ता पलटने के संघर्ष में दोनों सेनाओं के बीच गठबंधन कायम हुआ था, किन्तु छिन राजवंश के खत्म होने के बाद दोनों एक दूसरे का दुश्मन हो गए। श्यांग यू और ल्यू पांग ने एक दूसरे से वादा किया कि जिसकी सेना ने सबसे पहले छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग पर कब्ज़ा करेगी, श्यान यांग का राजा उसी सेना का होगा।

ईसा पूर्व 207 में श्यांग यु की सेना ने च्यु लू नाम के स्थान पर छिन राजवंश की प्रमुख सेना को परास्त कर दिया, जबकि ल्यू पांग की सेना ने भी तत्कालीन छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग पर कब्जा कर लिया। श्यान यांग पर कब्जा करने के बाद ल्यू पांग ने अपने सलाहकार की सलाह के अनुसार शहर के निकट पा शांग, जो आज के पश्चिमोत्तर चीन के शानशी प्रांत की राजधानी शीआन के पूर्व में स्थित है, पर सेना तैनात की और श्यान यांग शहर में प्रवेश नहीं करने दिया। उसने छिन राजवंश के राजमहल और खजाने को सील करने का आदेश दिया और प्रजा को सांत्वना देने का काम किया, जिससे प्रजा शांत और खुश हो गई और चाहती थी कि ल्यू पांग छिन राज्य का राजा बने।

श्यांग यु को जब पता चला कि ल्यू पांग उससे पहले श्यान यांग शहर में प्रवेश कर चुका है, तो उसे अत्यन्त आक्रोश आया। वह चार लाख सैनिकों की विशाल सेना लेकर श्यान यांग शहर के निकट होंगमन नाम के स्थान पर तैनात हो गया और बल प्रयोग से श्यान यांग शहर को छीनने के लिए तैयार हो गया। श्यांग यु के सैन्य सलाहकार फ़ान जंग ने श्यांग यु को इस मौके पर ल्यू पांग का विनाश करने की सलाह दी। उसने कहा कि ल्यू पांग एक लोभी और विलासी आदमी है, लेकिन इस बार श्यान यांग पर कब्जा करने के बाद उसने वहां से एक भी पैसा नहीं लिया और एक सुन्दरी भी नहीं चाही। इससे जाहिर है कि वे अब बड़ा महत्वाकांक्षी बन चुका है। उसके ज्यादा मजबूत न होने की स्थिति में खत्म करना चाहिए।

खबर ल्यू पांग तक पहुंची। उसके सलाहकार फुंग ल्यांग ने ल्यू पांग को सलाह देते हुए कहा कि अब ल्यू पांग की सेना में सिर्फ़ एक लाख सैनिक हैं, उसकी शक्ति श्यांग यु से बहुत कमज़ोर है, इसलिए उसके लिए श्यांग यु से साधा मोर्चा लेना उचित नहीं है।

फुंग ल्यांग ने अपने मित्र, श्यांग यु के ताऊ श्यांग पो से मदद हुवांग। इसके साथ साथ ल्यू पांग अपने सलाहकार फुंग ल्यांग और अपनी सेना में कुछ जनरलों का नेतृत्व कर होंगमन पहुंचे और श्यांग यू को बताया कि वह खुद श्यान यांग शहर की रक्षा कर रहा है और यहां रहकर श्यांग यू के आने के बाद राजा बनने का इंतज़ार कर रहा है। श्यांग यू को ल्यू पांग की बात पर भरोसा किया और होंगमन पर ल्यू पांग को एक दावत देने का निश्चय किया।

लेकिन वास्तव में श्यांग यू ने दावत में ल्यू पांग को मार डालने की साजिश रची । दावत में ल्यू पांग के साथ उसके सलाहकार फुंग ल्यांग और जनरल फ़ान ख्वाई थे। दावत के दौरान ल्यू पांग ने श्यांग यु को विनम्रता से कहा कि छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग पर कब्जा करने के बाद वह महज शहर पर पहरा दे रहा है और श्यांग यु के छिन का राजा बनने की प्रतीक्षा में है। श्यांग यु ल्यू पांग के धोखे में आ गया और उसके साथ अच्छा बर्ताव करने लगा।

दावत के दौरान श्यांग यु के सैन्य सलाहकार फ़ान जंग ने कई बार श्यांग यु को इशारा दे देकर उसे ल्यू पांग को मार डालने का गोपनीय संकेत दिया, लेकिन श्यांग यु ने न देख पाने का स्वांग किया। लाचार होकर फ़ान जंग ने श्यांग यु के एक जनरल श्यांग च्वांग को दावत में बुलाकर तलवार की कला दिखाने की आड़ में ल्यू पांग को मार डालने का प्रबंध किया। इस नाजुक घड़ी में श्यांग यु के ताऊ, यानी ल्यू पांग के सैन्य सलाहकार फुंग ल्यांग के मित्र श्यांग पो ने भी आगे आकर तलवार की कला दिखाने के बहाने अपने शरीर से श्यांग च्वांग के वार को रोकने की कोशिश की, जिससे श्यांग च्वांग को ल्यू पांग को मारने का मौका हाथ नहीं लगा। खतरनाक स्थिति में फुंग ल्यांग ने तुरंत ल्यू पांग के जनरल फ़ान ख्वाई को मदद के लिए बुलाया। फ़ान ने तलवार और ढाल उठाकर दावत में घुस कर बड़े गुस्से में श्यांग यु की आलोचना करते हुए कहा:“ल्यू पांग ने श्यान यांग शहर पर कब्जा कर लिया है, पर उसने खुद को छिन राज्य का राजा घोषित नहीं किया और महाराज आपके आने की राह देखता रहा, इस प्रकार के योगदान के लिए आपने उसे इनाम तो नहीं दिया, फिर दुष्टों की बातों में आकर उसे मार डालने की सोची। यह कैसा न्याय है।”

फ़ान ख्वाई की बातों पर श्यांग यु को बड़ी शर्म आयी। इस मौके का लाभ उठाकर ल्यू पांग शौचालय जाने का बहाना बनाकर वहां से भाग गया और दावत में भागीदार अन्य जनरल के साथ पा शांग स्थित अपनी सेना के शिविर में वापस लौटा।

उधर श्यांग यु के सलाहकार फ़ान जंग ने जब देखा कि श्यांग यु ने इतने दयालु और नरम दिल का परिचय देकर ल्यू पांग को भागने का मौका दिया, तो बड़े गुस्से में कहा:“श्यांग यु कोई महत्वाकांक्षी व्यक्ति नहीं है। इंतजार करो ल्यू पांग जरूर पूरे देश पर कब्जा करेगा।”

होंगमन स्थान पर हुई दावत की यह कहानी चीन के इतिहास में बहुत मशहूर है। श्यांग यु ने अपनी सेना के शक्तिशाली होने के घमंड में ल्यू पांग पर विश्वास किया और उसे जिन्दा भागने दिया। इसके बाद श्यांग यु ने खुद को पश्चिमी छु यानी शी छू का राजा घोषित किया, जिसका स्थान सम्राट के बराबर था। उसने ल्यू पांग को सुदूर क्षेत्र में“हान राजा”नियुक्त किया, जो स्थानीय राजा के तुल्य था। अपनी शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए ल्यू पांग ने श्यांग यु को शासक मान लिया। लेकिन गुप्त रूप में वह विभिन्न प्रतिभाशाली लोगों को अपने पक्ष में लाने और अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। अंत में ल्यू पांग की सैन्य शक्ति श्यांग यु से भी मजबूत हो गयी। एक बार श्यांग यू अपनी सेना का नेतृत्व कर दूसरे छोटे राज्य पर आक्रमण करने बाहर निकला, तो ल्यू पांग इस मौके का लाभ उठाकर श्यांग यू के शी छू राज्य की राजधानी श्यान यांग पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लिया। इस तरह श्यांग यू और ल्यू पांग दोनों के बीच चार साल तक युद्ध चला। इसे चीनी इतिहास में“छू हान का युद्ध”कहा जाता है। छू राज्य की सेना ने अधिक शक्तिशाली होने की वजह से कई बार हान राज्य की सेना को हराया। लेकिन श्यांग यू का स्वभाव क्रूर था और इसके नेतृत्व वाली सेना किसी जगह पर कब्जा करने के बाद हत्या और आगजनी करती थी, इस तरह श्यांग यू की सेना का जनता समर्थन नहीं करती थी। धीरे-धीरे श्यांग यू के शी छू राज्य की सेना शक्तिशाली से कमज़ोर हो गयी। उधर ल्यू पांग जनता का समर्थन हासिल करने के लिए प्रयासरत था। वह सुयोग्य व्यक्तियों का इस्तेमाल करने में निपुण था। ल्यू पांग की शक्ति शक्तिशाली होने लगी और अंत में उसने श्यांग यू को हरा दिया।

ईसा पूर्व 202 में ल्यू पांग की सेना ने काइ श्या, यानी आज के पूर्वी चीन के आनहुइ प्रांत की लिंगपी कांउटी के दक्षिण में स्थित जगह, पर श्यांग यु की सेना को घेरकर खत्म कर दिया। वहां श्यांग यु ने आत्महत्या कर ली। अंत में ल्यू पांग ने चीन के हान राजवंश की स्थापना कर खुद को सम्राट घोषित किया। हान राजवंश चीन के इतिहास में दूसरा एकीकृत सामंती राजवंश था।

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Chinese Lok Kathayen-4/ चीनी लोक कथाएँ-4

कहानी-सफेद नागिन: चीनी लोक कथा

पूर्वी चीन के हानचाओ शहर में स्थित पश्चिमी झील अपने असाधारण प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्वविख्यात है। देश विदेश के अनेक कवियों ने इस पर कविताएँ लिखी हैं और अनेक लोककथाओं में इसका वर्णन है। ऐसी ही लोक कथाओं में से एक है सफेद नागिन की कहानी। कहानी इस प्रकार है-

एक सफेद नागिन ने हजार साल तक कड़ी तपस्या कर अंत में मानव का रूप धारण किया| वह एक सुन्दर युवती में बदल गई और उसका नाम हुआ पाईल्यांगची। एक नीली नागिन ने पाँच सौ साल तपस्या की और एक छोटी लड़की के रूप में बदल गयी, नाम पड़ा श्योछिंग। पाईल्यांगची और श्योछिंग दोनों सहेलियों के रूप में पश्चिमी झील की सैर पर आईं, जब दोनों टूटे पुल के पास पहुँचीं तो श्योछिंग ने अलोकिक शक्ति से वर्षा बुलाई, वर्षा में श्युस्यान नाम का एक सुन्दर युवा छाता उठाए झील के किनारे पर आया। वर्षा के समय पाईल्यांगची और श्योछिंग के पास छाता नहीं था, वे काफी बुरी तरह पानी से भीग रही थीं, उन की मदद के लिए श्युस्यान ने अपना छाता उन दोनों को दे दिया और  स्वयं पानी में भीगता खड़ा रहा। ऐसे अच्छे चरित्र वाला युवा पाईल्यांगची को बहुत पसंद आया और श्युस्यान को भी सुंदर युवती पाईल्यांगची के प्रति प्रेम का अनुभव हुआ। श्योछिंग की मदद से दोनों की शादी हुई और उन्होंने झील के किनारे दवा की एक दुकान खोली। श्युस्यान बीमारियों की चिकित्सा जानता था, दोनों पति पत्नी निस्वार्थ रूप से मरीजों का इलाज करते थे और स्थानीय लोगों में वे बहुत लोकप्रिय हो गए।

शहर के पास स्थित चिनशान मठ के धर्माचार्य फाहाई को पाईल्यांगची के पिछले जन्मों का रहस्य मालूम था। उसने गुप्त रूप से श्य़ुस्यान को उसकी पत्नी का रहस्य बताया कि पिछले जन्म में वह सफेद नागिन थी। उसने श्युस्यान को यह भी बताया कि वह पाईल्यांगची का असली रूप कैसे देख सकता है। श्युस्यान को फाहाई की बातों से आशंका हुई।

इसी बीच त्वानवू पर्व आ गया। चीन का यह पर्व प्राचीन काल से ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव पर लोग चावल से बनायी गई मदिरा पीते हैं, वे मानते हैं कि इससे सब विपत्तियों से रक्षा होती है। इस उत्सव के दिन श्युस्यान ने फाहाई द्वारा बताए तरीके से अपनी पत्नी पाईल्यांगची को मदिरा पिलाई। पाईल्यांगची गर्भवर्ती थी, मदिरा उस के लिए हानिकारक थी, लेकिन पति के बार-बार कहने पर उसने मदिरा पी ली। मदिरा पीने के बाद वह सफेद नागिन के रूप में वापस बदल गई, जिससे भय खा कर श्य़ुस्यान की मौत हो गई।

अपने पति को जीवित करने के लिए गर्भवती पाईल्यांगची हजारों मील दूर तीर्थ खुनलुन पर्वत में रामबाण औषधि गलोदर्म की चोरी करने गयी। गलोदर्म की चोरी के समय उस ने जान हथेली पर रख कर वहाँ के रक्षकों से घमासान युद्ध लड़ा, पाईल्यांगची के सच्चे प्रेम से प्रभावित हो कर रक्षकों ने उसे रामबाण औषधि भेंट की। पाईल्य़ांगची ने अपने पति को फिर से जीवित कर दिया, श्युस्यान भी अपनी पत्नी के सच्चे प्यार के वशीभूत हो गया, दोनों में प्रेम पहले से भी ज्यादा गाढ़ा हो गया।

धर्माचार्य फाहाई का मन दुष्टता से फिर भी न भरा। उसने श्युस्यान को धोखा दे कर चिनशान मठ में बंद कर दिया और उसे भिक्षु बनने पर मजबूर किया। इस पर पाईल्यांगची और श्योछिंग को अत्यन्त क्रोध आया, दोनों ने जल जगत के सिपाहियों को ले कर चिनशान मठ पर हमला बोला और श्युस्यान को बचाना चाहा। उन्होंने बाढ़ बुला कर मठ पर धावा करने की कोशिश की लेकिन धर्माचार्य फाहाई ने भी दिव्य शक्ति दिखा कर हमले का मुकाबला किया। क्योंकि पाईल्यांगची गर्भवती थी और बच्चे को जन्म देने वाली थी, इसलिए वह फाहाई से हार गयी और श्योछिंग की सहायता से पीछे हट कर चली गई। वो दोनों फिर पश्चिमी झील के टूटे पुल के पास आईं, इसी वक्त मठ में नजरबंद श्युश्यान मठ के बाहर चली युद्ध की गड़बड़ी से मौका पाकर भाग निकला, वह भी टूटे पुल के पास आ पहुँचा। संकट से बच कर दोनों पति-पत्नी ने चैन की साँस ली। इसी बीच पाईल्यांगची ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन बेरहम फाहाई ने पीछा करके पाईल्यांगची को पकड़ा और उसे पश्चिमी झील के किनारे पर खड़े लेफङ पगोडे के तले दबा दिया और यह शाप दिया कि जब तक पश्चिमी झील का पानी नहीं सूख जाता और लेफङ पगोड़ा नहीं गिरता, तब तक पाईल्यांगची बाहर निकल कर जग में नहीं लौट सकती।

वर्षों की कड़ी तपस्या के बाद श्योछिंग को भी सिद्धि प्राप्त हुई, उसकी शक्ति असाधारण बढ़ी, उसने पश्चिमी झील लौट कर धर्माचार्य फाहाई को परास्त कर दिया, पश्चिमी झील का पानी सोख लिया और लेफङ पगोडा गिरा दिया एवं सफेद नागिन, पाईल्यांगची को बचाया। यह लोककथा पश्चिमी झील के कारण सदियों से चीनियों में अमर रही और पश्चिमी झील का सौंदर्य इस सुन्दर कहानी के कारण और प्रसिद्ध हो गया।

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Chinese Lok Kathayen-3/ चीनी लोक कथाएँ-3

कहानी-आग के बीज: चीन की लोक कथा

पुराने ज़माने में इंसान आग से अनभिज्ञ था, वो नहीं जानता था कि आग क्या चीज है| वह अपने जीवन में आग का उपयोग नहीं जानता था। उस जमाने में जब रात होती, तो हर तरफ अंधेरा छाया रहता था। जंगली जानवरों की आवाजें सुनाई देती थी। लोग सिमटकर ठिठुरते हुए सोते थे। रोशनी न होने से रात बहुत ठंडी और डरावनी होती थी। उस समय आग नहीं होने के कारण मानव कच्चा खाना खाता था। वह अधिक बीमार पड़ता था और उसकी औसत आयु भी बहुत कम होती थी।

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स्वर्ग लोक में फुशि नाम का देवता रहता था। जब उसने धरती पर रहने वाले मानव का दूभर जीवन देखा, तो उसे बड़ा दुख हुआ और दया आई। उसने सोचा कि मानव को आग से परिचित करवाया जाए। उसे एक उपाय सुझा। उसने अपनी दिव्य शक्ति से जंगल में भारी वर्षा के साथ बिजली गिरायी। एक भारी गर्जन के साथ जंगल के पेड़ों पर बिजली गिरी और पेड़ आग से जल उठे। देखते ही देखते आग की लपटें चारों तरफ तेज़ी से फैल गईं। लोग बिजली की भंयकर गर्जन और धधकती हुई आग से भयभित हो कर दूर भाग गए। कुछ समय के बाद वर्षा थम गई और बिजली का गर्जन शांत हुआ। रात हुई तो वर्षा के पानी से ज़मीन बहुत नम और ठंडी हो गई। दूर भाग चुके लोग फिर इकट्ठे हुए, वे डरते-डरते पेड़ों पर जल रही आग देखने लगे। तभी एक नौजवान ने पाया कि पहले जब रात होती थी तो जंगली जानवर हुंकार करते सुनाई देते थे लेकिन अब ऐसा नहीं हुआ। क्या जंगली जानवर पेड़ों पर जलती हुई इस सुनहरी चमकीली चीज़ से डरते हैं? नौजवान मन ही मन इस पर विचार करता रहा। वह हिम्मत बटोरकर आग के निकट गया तो उसे महसूस हुआ कि उसका शरीर गर्म हो उठा है। आश्चर्यचकित होकर उसने लोगों को आवाज दी – “आओ, देखो, यह जलती हुई चीज खतरनाक नहीं है, यह हमें रोशनी और गर्मी देती है। इसके पश्चात मानव ने यह भी पाया कि उनके आसपास जो जानवर आग से जल कर मरे, उनका मांस बहुत महकदार था। चखा, तो स्वाद बहुत अच्छा लगा। सभी लोग आग के पास जम आए, आग से जले जानवरों का मांस खाया। उन्होंने इससे पहले कभी पके हुए मांस का स्वाद नहीं लिया था। मानव को समझ आ गई कि आग सचमुच उपयोगी है। अब तो वे पेड़ों की टहनियाँ और शाखाएं एकत्रित करके जलाने लगे और आग को सुरक्षित कर रखने लगे। लोग रोज बारी बारी से आग के पास रहते हुए उसे बुझने से बचाते रहे। एक रात आग की रक्षा करने वाले व्यक्ति को नींद आ गई और वह सो गया। लकड़ियां पूरी तरह जल जाने के कारण आग बुझ गई। इस एक व्यक्ति की नींद के कारण मानव जाति पुनः अंधेरे और ठंड से जूझने लगी। जीवन दुबारा बहुत दूभर हो गया।

देवता फुशी ने ऊपर में यह जाना, तो उस ने उस नौजवान मानव को सपना दिखाया, जिस में उस ने युवा को बताया कि दूर दराज पश्चिम में स्वी मिन नाम का एक राज्य है , वहां आज के बीज मिलते है , तुम वहां जा कर आग के बीज वापल लाओ । सपने से जाग कर नौजवान ने सोचा , सपने में देवता ने जो बात कही थी, मैं उस का पालन करूंगा, तब वह आग के बीज तलाशने हेतु रवाना हो गया।

ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों, गहरी नदियों और घने जंगलों को पार कर, लाखों कठिनाइयों को सहते हुए वह अंत में स्वी मिन राज्य पहुंचा। लेकिन यहां भी न कोई रोशनी, न आग मिलती थी, हर जगह अंधेरा ही अंधेरा थी। नौजवान को बड़ी निराश हुई, तो स्वी मु नाम के एक किस्म के पेड़ के पास बैठा और विश्राम करने लगा। सहसा, नौजवान की आंखों के सामने चमक चौंधी, फिर चली, फिर एक चमक चौंधी, फिर चली गई, जिस से चारों ओर हल्की हल्की रोशनी से जगमगा उठा। नौजवान तुरंत उठ खड़ा हुआ और चारों ओर नजर दौड़ते हुए रोशनी की जगह ढूंढ़ने लगा। उसे पता चला था कि ‘स्वी मू’ नाम के पेड़ पर कई पक्षी अपने कड़े चोंच को पेड़ पर मार मार कर उस में पड़े कीट निकाल रही हैं, जब एक बार वे पेड़ पर चोंच मारती, तो पेड़ में से तेज चिंगारी चौंध उठी। यह देख कर नौजवान के दिमाग में यह विचार आया कि कहीं आग के बीज इस पकार के पेड़ में छिपे हुए तो नहीं? उस ने तुरंत ‘स्वी मू’ के पेड़ पर से एक टहनी तोड़ी और उसे पेड़ पर रगड़ने की कोशिश की, सचमुछ पेड़ की शाखा से चिंगारी निकली, पर आग नहीं जल पायी। नौजवान ने हार नहीं मानी, उस ने विभिन्न रूपों के पेड़ की शाखाएं ढूंढ़ कर धीरज के साथ पेड़ पर रगड़ते हुए आजमाइश की, अंत में उसकी कोशिश रंग लायी। पेड़ की शाखा से धुआँ निकला, फिर आग जल उठी, इस सफलता की खुशी में नौजवान की आंखों में आंसू भर आए।

नौजवान अपने गाँव वापस लौटा। वह लोगों के लिए आग के ऐसी बीज लाया था, जो कभी खत्म नहीं होने वाले थे। आग के बीज थे – लकड़ी को रगड़ने से आग निकालने का तरीका। तभी से संसार के मानव को आग का लाभ प्राप्त हुआ। अब उन्हें सर्दी से कोई भय न था। इस एक नौजवान की बुद्धिमता और बहादुरी का सम्मान करते हुए लोगों ने उसे अपना मुखिया चुना और उसे ‘स्वी रन’ यानी आग लाने वाला पुरूष कहते हुए सम्मानित किया।

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Chinese Lok Kathayen-2/ चीनी लोक कथाएँ-2

कहानी-चितकबरे जूते: चीन की लोक कथा

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फुंग ची बहुत रईस आदमी था । उसने अपने लिए अपार दौलत जमा कर रखी थी । उसकी पत्नी उसे लाख समझाती थी कि इतनी कंजूसी अच्छी बात नहीं, परंतु वह मानता ही नहीं था ।

फुंग ची इतना कंजूस था कि कपड़े फट जाने पर उन्हीं पर पैबंद लगवा कर पहनता रहता था । यही हाल उसके जूतों का था । उसने वर्षों से अपने लिए जूते नहीं खरीदे थे । उनमें जगह-जगह छेद होकर पैबंद लग चुके थे । सर्दियों में वह गर्मी पाने के लिए गोबर की भांप से सेंकता था ।

घर में यूं तो नौकर-चाकर भी थे, परंतु वे भी उसकी कंजूसी से परेशान होकर जल्दी ही भाग जाते थे ।

एक दिन फुंग ची एक गली से गुजर रहा था । वहां बच्चे गली में खेल रहे थे । फुंग ची जब उधर से निकला तो उसका एक पैर नाली में चला गया । उसने पैर निकाला तो देखा कि उसका जूता फट गया था । पंजे के पास से तला अलग होकर उसका पैर दिखाई दे रहा था । बच्चों ने फुंग ची को उसके घर पहुंचने में सहायता की और वह अपने घर पहुंच गया ।

अगले दिन फुंग ची मोची के पास जूते ठीक करवाने पहुंचा तो मोची ने बताया – “सेठ जी, ये जूते बहुत पुराने हो चुके हैं अत: इन्हें जोड़ने का कोई लाभ नहीं है ।”

परंतु फुंग ची ने जिद करके उन्हीं जूतों को ठीक करवा लिया । एक सप्ताह बाद वह फिर उसी गली से गुजरा, जहां बच्चे खेल रहे थे । एक बच्चे की निगाह फुंग ची के जूतों पर पड़ी । वह एक बच्चे के कान में फुसफुसाया – “जरा इसके जूते तो देख ।”

सभी बच्चे हंसकर फुंग ची के जूते देखने लगे । फुंग ची चिढ़ गया और जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने लगा । बच्चों को इसमें बहुत आनन्द आया । शुई बड़ी नटखट लड़की थी वह चिल्लाकर बोली – “वाह, क्या चितकबरे जूते हैं ।”

सारे बच्चे एक स्वर में बोले – “क्या चितकबरे जूते हैं ?”

फुंग ची सुन कर चिढ़ते हुए आगे बढ़ गया । इसके बाद जब भी फुंग ची उधर से गुजरता बच्चे चिल्लाकर कहते – “चितकबरे जूते ।”

धीरे-धीरे “चितकबरे जूते” फुंग ची की चिढ़ बन गई। वह जहां कहीं भी जाता, कोई न कोई जरूर आवाज लगा कर कहता – “चितकबरे जूते ।” और फुंग ची चिढ़ जाता ।

घर पर उसकी पत्नी ने बहुत समझाया कि अब इन जूतों को फेंककर नए जूते खरीद लो, परंतु फुंग ची ने उसकी बात नहीं मानी, लेकिन जब धीरे-धीरे बात पूरे शहर में फैल गई तो वह अपने जूतों से सचमुच परेशान हो गया । उसने निश्चय किया, वह इन जूतों को किसी भिखारी को दान में दे देगा । अत: वह सुबह उठकर सैर को गया और लौटते वक्त एक भिखारी को अपने जूते दे आया ।

भिखारी जूते पाकर बहुत खुश हुआ क्योंकि सर्दी का मौसम था । परंतु सेठ के जाने के बाद जब उसने जूतों को देखा तो उन पर बहुत सारे पैबंद देखकर उन्हें हैरानी से देखने लगा । फिर सड़क के किनारे बैठकर वह उन जूतों को पहनने का प्रयास करने लगा ।।

उसी समय उधर से पुलिस का एक सिपाही निकला । उसने भिखारी को जूतों को उलटते-पलटते देखा तो उसे शक हुआ कि भिखारी कहीं से जूते चुरा कर लाया है । उसने भिखारी को अपने पास बुलाया तो जूतों को देखते ही पहचान गया कि ये जूते फुंग ची के हैं । वह भिखारी से बोला – “तूने जूते चोरी किए हैं, अत: तुझे थाने चलना पड़ेगा ।”

भिखारी बोला – “साहब, मैं यह जूते चुरा कर नहीं लाया । एक सेठ जी मुझे अभी देकर गए हैं ।”

परंतु सिपाही बोला – “जिस सेठ के यह जूते हैं, वह कंजूस सेठ तुझे जूते दे ही नहीं सकता । उसे ये जूते बहुत प्रिय हैं । तू झूठ बोलता है । मैं थाने में चल कर ही तय करूंगा कि तुझे क्या सजा दी जाए ।”

सिपाही भिखारी को लेकर थाने में चला गया और फुंग ची को बुलवा भेजा । फुंग जी थाने के बुलावे को सुनकर भौचक्का रह गया और सोचने लगा कि मेरा वहां क्या काम हो सकता है ? फुंग ची थाने पहुंच गया तो अपने पुराने जूतों को वहां रखे देखकर उसे बहुत हैरानी हुई । भिखारी को जेल में डाल दिया गया था ।

फुंग ची ने यह कहने की कोशिश की कि भिखारी ने चोरी नहीं की है परंतु सिपाहियों ने बिना सुने सेठ को उसके चितकबरे जूते वापस दे दिए । फुंग ची बहुत दुखी मन से जूते वापस ले लाया और उनसे छुटकारा पाने का उपाय सोचने लगा ।

उसकी पत्नी ने कहा – “मेरी बात मानो तो जूतों को कूड़ेदान में फेंक दो ।”

फुंग ची को यह विचार जंच गया और उसने अपने घर के कूड़े के साथ जूते कूड़ेदान में फेंक दिए । दो दिन तक जब जूतों की कोई खबर नहीं मिली तो फुंग ची जूतों की तरफ से निश्चिंत हो गया ।

परंतु तीसरे दिन सुबह घर की घंटी बजी । दरवाजे पर एक सफाई कर्मचारी खड़ा था, वह बोला – “सेठ जी, मैं आपसे इनाम लेने आया हूं ।”

सेठ ने खुश होकर कहा – “किस बात का इनाम मांग रहे हो, पहले यह तो बताओ ?”

सफाई कर्मचारी ने पीछे से जूते निकालते हुए कहा – “किसी नौकर या चोर ने आपके चितकबरे जूते कूड़ेदान में छिपा दिए थे । आज मैंने सफाई की तो सोचा आपके जूते आपको वापस कर दूं तो मुझे इनाम मिलेगा, इसलिए आपके घर चला आया ।”

फुंग ची की इच्छा हुई कि वह बहुत जोर से चीखे और क्रोध से डांट कर भगा दे । परंतु वह बड़ा सेठ होने के नाते ऐसा न कर सका । चुपचाप जूते रखकर कर्मचारी को वहां से भगा दिया ।

अब फुंग ची का किसी काम में मन नहीं लगता था । वह हरदम उन जूतों से पीछा छुड़ाने का उपाय सोचता रहता था । एक दिन उसके मन में विचार आया कि क्यों न मैं इन जूतों को नदी में फेंक दूं, पानी के बहाव के साथ ये जूते कहीं दूर चले जाएंगे, फिर उसने एक पुल पर खड़े होकर उन जूतों को नदी में फेंक दिया और चुपचाप घर की ओर चल दिया ।

थोड़ी ही देर में कुछ बच्चे उसके पास भागते हुए आए और बोले – “अंकल आपके चितकबरे जूते किसी ने नदी में फेंक दिए । हम नदी में नहा रहे थे तभी हमने इन जूतों को किसी को ऊपर से फेंकते देखा । हमने पानी में तुरंत आपके चितकबरे जूते पहचान लिए । यह लीजिए अपने जूते ।”

अब फुंग ची क्रोध से पागल हुआ जा रहा था । उसे जूतों से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था । वह सारा दिन घर में ही बिताने लगा । उसका व्यापार में मन नहीं लगता था । इस कारण उसका व्यापार मंदा होता जा रहा था ।

एक दिन सबुह वह नगर की सीमा पर पहुंच गया और नगर से बाहर जाने वाले एक यात्री से प्रार्थना की – “भाई, यह जूते चाहें तो आप ले लें । अन्यथा आप नगर से बाहर जा रहे हैं तो इन्हें अपने साथ ले जाएं, वहां किसी जरूरतमंद को दे दें ।”

अजनबी व्यक्ति सेठ की तरफ हैरानी से देख रहा था कि कोई व्यक्ति अपने जूते शहर से बाहर क्यों भेजना चाहता है । फिर उसने सेठ की परेशानी समझकर जूतों को एक थैले में डाल लिया ।

सेठ वापस आ गया, परंतु अगले दिन नगर के राजा ने फुंग ची को बुलाने भेजा तो फुंग ची बहुत हैरान-परेशान हो गया । वह वहां पहुंचा तो उसे बताया गया कि एक परदेशी उसके चितकबरे जूते चुराकर नगर की सीमा के बाहर ले जा रहा था, अत: उसे गिरफ्तार कर लिया गया है ।

फुंग ची रोने और गिड़गिड़ाने लगा । राजा को कुछ समझ में न आया कि जूते मिल जाने पर वह रो क्यों रहा है । राजा ने पूछा – “फुंग ची, तुम इतने धनी सेठ हो और तुम्हारे ये प्रसिद्ध चितकबरे जूते तुम्हें मिल गए फिर भी तुम रो क्यों रहे हो ?”

फुंग ची ने रोते-रोते राजा को जूतों और कंजूसी की सारी कहानी सुना दी । साथ ही यह भी बता दिया कि लोगों ने उसकी चिढ़ ‘चितकबरे जूते’ बना दी है ।

राजा ने कहा – “ठीक है, हम इन चितकबरे जूतों को शाही संग्रहालय में रख देते हैं ताकि जब लोग तुम्हारे जूते देखें तो तुम्हारी कंजूसी को याद करें । तुम्हें इन चितकबरे जूतों से मुक्ति मिल चुकी है, तुम यहां से खुशी से जा सकते हो ।”

फुंग ची को इतनी राहत तो अवश्य मिल गई कि अब वे चितकबरे जूते उसके पास वापस नहीं आएंगे । परंतु अब वह यह सोचकर परेशान था कि शाही संग्रहालय में जूतों को रखने से लोग उन जूतों को कभी नहीं भूल सकेंगे ।

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Chinese Lok Kathayen-1/ चीनी लोक कथाएँ-1

कहानी-दो भाई चांग और हुवांग: चीन की लोक कथा

एक गांव में दो भाई रहते थे, उनका नाम था चांग और हुवांग। कहने को तो दोनों सगे भाई थे परंतु उनकी आदत एक दूसरे के विपरीत थी ।

चांग बहुत उदार और नेकदिल था । वह अपने बड़ों का आदर और छोटों से प्यार करता था । उसने खूब मेहनत करके अपार धन कमाया था । उसके यहां अनेक नौकर-चाकर थे और वह अपने नौकरों के प्रति बहुत दयावान था । उनकी परेशानी में उनकी सहायता करता था । इस कारण उसके नौकर उसे दिल से प्यार करते थे ।

इसके ठीक विपरीत हुवांग क्रूर स्वभाव का था । उसमें दया और प्रेम की भावना बिलकुल भी नहीं थी । वह अकड़ू और कठोर इंसान था । परंतु व्यापार के मामले में किस्मत ने उसका साथ दिया था । इस कारण उसका व्यापार खूब फल-फूल रहा था । उसके यहां नौकर तो बहुत थे, परंतु कोई अंदर से खुश नहीं था ।

हुवांग अपने नौकरों से सुबह से शाम तक काम करवाता, परंतु तनख्वाह बहुत कम देता था । बीमार होने पर भी उन्हें छुट्टी नहीं देता था । यदि किसी नौकर के परिवार में कोई बीमार हो अथवा कोई परेशानी हो, हुवांग उसकी कोई भी सहायता करने से इन्कार कर देता था ।

कई बार दुखी होकर कुछ नौकर हुवांग का काम छोड़ने की सोचते थे, परंतु अपने मालिक के साथ नमक हरामी करना पसंद नहीं करते थे । वह कहते थे कि हम जब तक जिंदा रहेंगे, मालिक की सेवा करते रहेंगे । मालिक चाहे जैसा भी हो, वह हमारा अन्नदाता होता है । उसकी सेवा करना हमारा फर्ज है । इसी कारण कोई भी नौकर उसके यहां दुख सहते हुए भी नौकरी छोड़कर नहीं जाता था ।

चांग यह देखकर मन ही मन बहुत दुखी होता था कि हुवांग के सारे नौकर इतना कष्ट सह रहे हैं । चांग ने अपने भाई को कई बार समझाने की कोशिश की, परंतु वह कुछ समझता ही नहीं था ।

धीरे-धीरे हुवांग का व्यापार चौपट होने लगा। उसके बुरे व्यवहार व रूखी भाषा के कारण सभी लोग उससे व्यापार करने में कतराने लगे थे । एक दिन चांग ने हुवांग से कहा – “भाई, ईश्वर का दिया हम लोगों के पास सब कुछ है । फिर भी तुम अपने नौकरों से इतना बुरा व्यवहार क्यों करते हो ?”

हुवांग थोड़ा क्रोधित होते हुए बोला – “मैं तो किसी से दुर्व्यवहार नहीं करता, तुम यूं ही मुझ पर आरोप लगा रहे हो ।”

चांग ने कहा – “मैं जानता हूं कि तुम्हारे नौकर बहुत दुखी हैं, यदि तुम अपने नौकरों को ठीक तनख्वाह देकर मीठा व्यवहार नहीं कर सकते तो तुम किसी और शहर में जाकर अपना व्यापार शुरू कर दो । मुझसे अपनी आंखों के सामने ऐसा व्यवहार देखा नहीं जाता । तुम्हारे जाने के बाद मैं तुम्हारे नौकरों को अपने पास रख लूंगा ।”

यह सुनकर हुवांग ने अपने भाई को बहुत भला-बुरा कहा और चांग चुपचाप वहां से चला गया ।

चांग अपने भाई को सुधारने के लिए कोई उपाय सोचने लगा । एक दिन वह विचारों में खोया था । तभी उसका पुराना नौकर उसके पास आया और बोला – “मालिक, मैं जानता हूं कि आप क्यों परेशान हैं ? आप कहें तो मैं आपकी सहायता कर सकता हूं ।”

नौकर की बात सुनकर चांग का ध्यान भंग हो गया । वह बोला – “तुम मेरे लिए क्या कर सकते हो ?”

नौकर ने कहा – “मैं चाहे जो करूं, पर उससे हुवांग साहब जरूर सुधर जाएंगे या फिर शहर छोड़कर चले जाएंगे ।”

चांग बोला – “क्या तुम जानते हो कि यह कितनी मुसीबत का काम है ?”

नौकर ने जवाब दिया – “हां मालिक, मैं अच्छी तरह जानता हूं । पर आपके लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं । बस, आप मुझे आज्ञा दीजिए ।”

इसके पश्चात् बूढ़े नौकर ने अपनी योजनानुसार रात्रि में हुवांग के घर में प्रवेश किया और जब हुवांग चैन से गहरी नींद सो गया तो उसने धीरे से हुवांग का कम्बल उतारा और खिड़की के रास्ते भाग गया ।

सुबह को हुवांग उठा तो उसे बहुत तेज सर्दी लग रही थी । उसने ढूंढ़ा परंतु उसका कम्बल कहीं नहीं मिला । उसे क्रोध आ गया । फिर जब वह दिन में अपने व्यापार पर गया तो वहां एक पैकेट पड़ा पाया । हुवांग ने पैकेट खोला तो उसका कम्बल वहां रखा था, उस पर एक पर्ची लगी थी जिस पर लिखा था – “अपने लोगों से व्यवहार सुधार ले, वरना छोड़ूंगा नहीं ।”

हुवांग को लगा कि जरूर यह उसके नौकरों की चाल है । अगले दिन वह अपने कमरे के भीतर सोया । परंतु जब सुबह उठा तो यह देखकर हैरान रह गया कि उसका तकिया गायब है । उसे बड़ा क्रोध आने लगा । उसने नौकरों को अच्छी-खासी डांट पिलाई । परंतु नौकर शिष्टाचार पूर्वक माफी मांगते रहे और कुछ न बोले ।

वह व्यापार को जाने के लिए तैयार हो रहा था कि तभी कोई उसके दरवाजे पर एक बड़ा पैकेट छोड़ गया । उसने देखा कि उसके सारे नौकर उसके ही सामने खड़े थे । उसने धड़कते दिल से पैकेट खोला तो देखा कि उसमें उसका तकिया रखा था जिस पर एक पर्ची लगी थी । पर्ची पर लिखा था – “अपना व्यवहार बदल लो वरना… ।”

हुवांग डर गया । अगले दिन वह रात्रि होने पर बहुत देर तक जागता रहा ताकि वह तकिया कम्बल ले जाने वाले को पकड़ सके । परंतु आधी रात तक कोई नहीं आया । वह बैठा इंतजार करता रहा कि न जाने कब उसे नींद आ गई ।

हुवांग सुबह को उठा तो उसने देखा कि उसका बिस्तर सही सलामत है। वह बहुत खुश हुआ । तभी उसको देखकर उसका एक नौकर हंसने लगा । उसे बड़ा क्रोध आया । उसके बाद जो भी उसे मिलता उसे देखकर हंसने लगता । हुवांग को कुछ भी समझ में न आया । कुछ देर बाद जब वह शीशे के सामने गया तो उसे हकीकत मालूम हुई ।

हुवांग डर के मारे थर-थर कांपने लगा । कोई उसकी एक मूंछ व सिर के आधे बाल काट कर ले गया था । हुवांग को समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे ? उसे लगने लगा कि यदि कोई उसकी मूंछ काट सकता है तो कल उसकी गरदन भी काट सकता है । उसने तुरंत नौकरों को आदेश दिया – “मेरा सारा सामान बांध दो । मैं दूसरे शहर में जाकर व्यापार करना चाहता हूं ।”

नौकर कुछ समझ ही न सके । हुवांग सिर पर टोपी लगाकर व दूसरी मूंछ पूरी तरह साफ करके अपने व्यापार के लिए चल दिया ताकि अपना व्यापार बंद करके कहीं और जाने का इंतजाम कर दे ।

रास्ते में उसे चांग मिला । वह चांग से नजरें चुराने लगा । बिना मूंछों के उसकी शक्ल पहचानी नहीं जा रही थी । चांग ने उसे रोक लिया और पूछा – “तुम इतने घबराए हुए कहां जा रहे हो ?”

हुवांग बोला – “भाई तुम ठीक कहते थे । मैंने भी अब निर्णय कर लिया है कि मैं अपना व्यापार दूसरे शहर में जाकर करूंगा ।”

चांग ने बहुत पूछा, तब उसने सारी घटना बता दी । हुवांग को अपने बुरे व्यवहार के लिए भी पश्चाताप था । चांग ने कहा – “यदि तुम्हें विश्वास है कि अब तुम अपने नौकरों व अन्य लोगों से दुर्व्यवहार नहीं करोगे तो मेरी प्रार्थना है कि तुम यहीं रहो ।”

हुवांग अपने भाई की बात मान कर वहीं रहने लगा । अब चांग-हुवांग व उनके सभी नौकर बहुत खुश थे ।