Categories
Bed time Stories Czechoslovakia ki lok kathayen Lok Kathayen Story

Czechoslovakia Lok Kathayen-1 चेकोस्लोवाकिया लोक कथाएँ-1

बारह महीने: चेकोस्लोवाकिया लोक-कथा

ishhoo blog image3

एक जंगल के पास के गाँव में एक बूढ़ी महिला रहती थी। उसके दो बेटियां थीं। एक का नाम था कतिंका और दूसरी का डोरबंका। कतिंका  बूढ़ी महिला की अपनी पुत्री थी, किंतु डोरबंका उसकी सौतेली पुत्री थी। इस कारण घर के सारे काम-काज का भार डोरबंका के ही कंधों पर आ पड़ा । डोरबंका देखने में भली तो थी ही, भोली और मृदु-स्वभाव की भी थी। कभी कोई शिकायत नहीं करती और बिना किसी आना कानी के बूढ़ी महिला और सौतेली बहन की फटकार-भरी आज्ञाओं का पालन किया करती।
डोरबंका सौतेली मां और अपनी बहन की बातों का कभी बुरा नहीं मानती और उनके बताए हर काम को पूरा करने के लिए तत्पर रहती, पर कतिंका और उसकी मां के लिए फिर भी वह बोझ बनती गई।
दोनों उस पर तरह-तरह के ताने कसतीं और दुत्कारा करतीं। “देखो, कितना खाना खाती है!” बुढ़िया चिल्लाती, “हम लोगों के पास इतना पैसा कहां है कि हम इसका ढोल-जैसा पेट रोज़ भर सकें!”
“हां, मां!” कतिंका झट जवाब देती; “और तो और अपने को मुझसे भी अधिक सुंदर समझती है। इसके क्या नखरे हैं?” उसकी तीखी बातों से मानो बुढ़िया को राहत मिल जाती।