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Denmark ki Lok Kathayen-1/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-1

कहानी-सबसे अच्छी इच्छा: डेनमार्क की लोक कथा

बहुत समय पहले की बात है, डेनमार्क देश में तीन भाई रहते थे। यह तो पता नहीं कि यह सब कैसे हुआ पर एक बार उन तीनों भाइयों को एक एक वरदान मिला। दोनों बड़े भाइयों ने तो यह वरदान माँगने में ज़रा भी देर नहीं की। उन्होंने तुरन्त ही यह इच्छा प्रगट की कि वे जब भी अपनी जेब में हाथ डालें तो उन्हें उसमें धन मिल जाये, यानी कि जब भी उनको पैसे की जरूरत हो तो उनकी जेब में हमेशा पैसे रहें।

लेकिन सबसे छोटा भाई जिसका नाम बूट्स था, उसने किसी दूसरे प्रकार की ही इच्छा प्रकट की। उसकी इच्छा थी कि जो भी स्त्री उसे देखे वही उसे प्रेम करने लगे। उन सबकी इच्छा पूरी हुई। पर कैसे इसके लिये अब आगे की कहानी सुनो –

इन इच्छाओं के पाने के बाद दोनों बडे, भाइयों ने दुनियाँ देखने का प्रोग्राम बनाया। बूट्स ने उनसे पूछा कि क्या वह भी उनके साथ दुनियाँ घूमने चल सकता था। परन्तु उन्होंने उसकी एक न सुनी और बोले — “हम तो जहाँ भी जायेंगे राजकुमार समझे जायेंगे मगर तुम एक बेवकूफ लड़के समझे जाओगे। तुम्हारे पास तो एक पेनी भी नहीं है और न कभी होगी। फिर तुम्हारी देखभाल भी कौन करेगा”

पर बूट्स ने जिद की “कुछ भी सही, मैं तुम्हारे साथ ही चलूँगा। ”

काफी प्रार्थना के बाद वे दोनों बड़े भाई उसको अपने साथ ले चलने के लिये मान गये पर साथ में उन्होंने एक शर्त लगा दी कि वह उनका नौकर बन कर उनके साथ चलेगा। बूट्स मान गया सो वे तीनों चल पड़े।

एक दो दिन का सफर करने के बाद वे लोग एक सराय में आये।

दोनों बड़े भाइयों के पास तो खूब पैसा था सो उन्होंने बड़े शानदार खाने का आर्डर दिया, जैसे मुर्गा, मछली, गोश्त, ब्रान्डी आदि, मगर बूट्स को किसी ने अन्दर भी नहीं जाने दिया। उसे गाड़ी घोड़े और सामान की देखभाल के लिये सराय के बाहर ही छोड़ दिया गया।

उसने घोड़ों को अस्तबल में बाँधा, गाड़ी को धोया और फिर घोड़ों के खाने के लिये घास ले कर गया। जब वह यह सब कर रहा था तो सराय के मालिक की पत्नी उसे खिड़की से देख रही थी।

उसकी आँखें उस सुन्दर लड़के के चेहरे से ही नहीं हट पा रही थीं हालाँकि वह तो मेहमानों का केवल नौकर ही था। जितनी अधिक देर तक वह उसे देखती रही उसे वह उतना ही अधिक सुन्दर दिखायी दे रहा था।

सराय का मालिक बोला — “अरे, तुम वहाँ खिड़की पर खड़ी खड़ी क्या कर रही हो, ज़रा जा कर देखो कि रसोई में खाना ठीक से बन रहा है कि नहीं। हमारे शाही मेहमान खाने का इन्तजार कर रहे हैं। ”

पत्नी उधर से अपनी आँख हटाये बिना ही बोली — “ओह, अगर उनको खाना पसन्द नहीं भी आया तो न सही, मैं क्या करूँ। मैंने अभी तक इतना सुन्दर लड़का पहले कभी नहीं देखा। क्यों न हम उसको रसोई में बुला कर कुछ अच्छा सा खाना उसको खाने के लिये दे दें। ऐसा लगता है कि बेचारा काफी मेहनत करता है। ”

“क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? रसोई में जाओ और अपना काम देखो। ”

पत्नी ने पति से लड़ना ठीक नहीं समझा पर उसे एक विचार आया और वह एक कीमती चीज़ अपने ऐप्रन में छिपा कर सराय से बाहर आयी। यह कीमती चीज़ थी एक कैंची। यह एक जादुई कैंची थी। इस जादुई कैंची का काम यह था कि इसको हवा में चलाने से जो भी कपड़ा जिस रंग में भी सोचो उसी रंग में कट जाता था।

वह बूट्स के पास आयी और बोली — “यह कैंची तुम रखो क्योंकि तुम बहुत सुन्दर हो। इस कैंची की खासियत यह है कि इसको हवा में चलाने से जो भी कपड़ा जिस रंग में भी सोचो उसी रंग में कट जाता है। ”

बूट्स ने उसे नम्रता से धन्यवाद दिया और उससे वह कैंची ले कर अपनी जेब में रख ली।

बूट्स के भाइयों का जब खाना खत्म हो गया तो वे फिर चलने के लिये तैयार हुए और बूट्स गाड़ी के पीछे नौकर की जगह पर खड़ा हुआ।

फिर वे एक दूसरी सराय में आये। वे दोनों तो सराय के अन्दर चले गये और बूट्स बाहर ही सामान आदि की देखभाल करने के लिये खड़ा रहा।

भाइयों ने बूट्स को बताया कि “अगर कोई तुमसे यह पूछे कि तुम किसके नौकर हो तो तुम कहना कि “मैं दो विदेशी राजकुमारों का नौकर हूँ। ”

“ठीक है। ”

इस बार भी वही हुआ जो पिछली सराय में हुआ था। सराय के मालिक की पत्नी ने जब उसे देखा तो वह तो बस उसे देखती ही रह गयी।

पति ने जब अपनी पत्नी को बाहर झाँकते देखा तो उसने भी उससे कहा — “वहाँ तुम दरवाजे पर क्यों खड़ी हो? जाओ और जा कर अपनी रसोई देखो। हमारी सराय में रोज रोज विदेशी राजकुमार नहीं आया करते। ”

और जब वह अन्दर नहीं गयी तो वह उसको उसकी गरदन पकड़ कर अन्दर ले गया। इस बार सराय के मालिक की पत्नी ने उसको एक जादुई मेजपोश दिया जिसकी खूबी यह थी कि उसे बिछाने पर जो भी खाना सोचो वही खाना उस मेजपोश पर आ जाता था।

तीसरी सराय में भी ऐसा ही हुआ। जैसे ही उस तीसरी सराय के मालिक की पत्नी ने बूट्स को देखा तो वह भी उसकी तरफ आकर्षित हो गयी। उसने उसको लकड़ी की एक टोंटी दी जिसकी खूबी यह थी कि उसे खोलने पर जो भी पीने की चीज़ चाहो वही मिल सकती थी।

बूट्स ने उसको भी नम्रता पूर्वक धन्यवाद दिया और वह टोंटी उससे ले कर अपनी जेब में रख ली। एक बार फिर से वे लोग कड़ी सरदी में अपने सफर पर चल दिये।

अबकी बार वे एक राजा के महल में पहुँचे। दोनों बड़े भाइयों ने अपना परिचय बादशाह के लड़कों के रूप में दिया क्योंकि उनके पास खूब पैसा था और बहुत कीमती कपड़े थे। राजा ने उनका बहुत ज़ोर शोर से स्वागत किया और राजमहल में उन्हें इज़्ज़त से ठहराया गया।

मगर बूट्स बेचारा उन्हीं फटे कपड़ों में था जिनको पहन कर वह घर से निकला था। उस बेचारे की जेब में तो एक पेनी भी नहीं थी।

उसको राजा के नौकरों ने नाव में सवार करा कर एक टापू पर भेज दिया क्योंकि वहाँ का यही नियम था कि जो भी गरीब या भिखारी वहाँ आता उसको उसी टापू पर भेज दिया जाता।

राजा ने यह नियम इसलिये बना रखा था क्योंकि वह अपने स्वादिष्ट और अच्छे खाने और पहनने के बढ़िया कपड़ों को गरीबों की नजर से गन्दा नहीं करना चाहता था।

बचा हुआ खाना जो केवल ज़िन्दा रहने के लिये ही काफी होता था भिखारियों से और गरीबों से भरे उस टापू पर भेज दिया जाता था।

घमंडी भाइयों ने अपने भाई को ऐसी जगह जाते देखा मगर अनदेखा कर दिया, बल्कि वे लोग खुश ही हुए कि अच्छा हुआ उन्हें उससे छुटकारा मिल गया।

जब बूट्स उस टापू पर पहुँचा और उसने वहाँ के लोगों की हालत देखी तो उसे अपनी तीनों कीमती चीज़ों की याद आयी। सबसे पहले उसने कैंची निकाली और उसे हवा में चलाना शुरू कर दिया और हवा में से बढ़िया बढ़िया कपड़े कट कट कर गिरने लगे।

जल्दी ही भिखारियों के पास राजा और उन घमंडी भाइयों से भी अधिक कीमती और सुन्दर कपड़े आ गये। उन कपड़ों को पहन कर वे सब बहुत खुश हुए और नाचने लगे पर वे अब अपनी भूख के लिये क्या करें।

अब बूट्स ने अपना मेजपोश निकाला और उसे बिछा दिया। अब क्या था नाम लेते ही मेजपोश पर तरह तरह के स्वाददार खानों का ढेर लग गया।

भिखारियों ने ऐसा खाना कभी ज़िन्दगी में नहीं देखा था। उन्होंने खूब खाया और खूब खिलाया। ऐसी दावत तो राजा के महल में भी शायद कभी नहीं हुई होगी जैसी उन भिखारियों के टापू पर हो रही थी।

“अब तुम्हें प्यास भी लग रही होगी, सो लो जो चाहो पियो। ” कह कर बूट्स ने अपनी लकड़ी की टोंटी निकाली और उसे खोल दिया। तरह तरह की शराब उसमें से निकलने लगी।

इस प्रकार भिखारियों ने बूट्स की मेहरबानी से वह सब कुछ पाया जो किसी राजा को भी नसीब होना मुश्किल था। क्या तुम सोच सकते हो कि यह सब कुछ देख कर वहाँ क्या खुशियाँ मनायीं जा रही होंगी?

अगली सुबह राजा के नौकर भिखारियों के लिये खाना ले कर आये। वे दलिया आदि की खुरचनें, कुछ पनीर के टुकड़े और डबल रोटी के सूखे टुकड़े लाये थे। लेकिन आज भिखारियों ने उनको छुआ तक नहीं।

यह देख कर राजा के नौकरों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि जिस खाने के ऊपर वे रोज टूट पड़ते थे आज वे उसको छूने भी नहीं आये।

लेकिन इससे भी ज्यादा आश्चर्य उन्हें तब हुआ जब उन्होंने देखा कि सारे भिखारी राजकुमारों जैसे शाही कपड़े पहने हुए हैं। राजा के नौकरों को लगा कि वे शायद किसी गलत टापू पर आ गये हैं। पर नहीं, यह तो वही टापू था जिस पर वे रोज आते थे।

फिर उन्होंने सोचा कि शायद यह कल वाले भिखारी की करामात रही हो। पर यह सब उसने कैसे किया होगा यह उनके दिमाग में नहीं आया। वे महल लौट गये और उन्होंने टापू के बारे में कई सारी बातें राजा को बतायीं।

एक बोला — “उनको इतना घमंड हो गया है कि उन्होंने आज के खाने को छुआ तक नहीं। ”

दूसरा बोला — “उस कल वाले लड़के ने सबको शाही कपड़े पहनने को दे दिये हैं। टापू पर रहने वालों का कहना है कि उस लड़के के पास एक ऐसी कैंची है जो हवा में चलाने से सिल्क और साटन के कपड़े काटती है। ”

तीसरा बोला — “उनके पास बहुत तरह का खाना और शराब पड़ी थी इसलिये उन्होंने यह खाना छुआ तक नहीं। ”

एक और बोला — “और मैंने तो उस नये भिखारी की जेब में एक टोंटी जैसी चीज़ भी देखी थी। ”

राजा के एक बेटी थी। उसके कानों में भी ये बातें पड़ीं तो उसके मन में इस लड़के को देखने की इच्छा हो आयी कि अगर वह कैंची उसे बेच दे तो वह भी सिल्क और साटन के कपड़े पहन पायेगी।

उसने अपने पिता को चैन नहीं लेने दिया और राजा को उस लड़के को बुलाने के लिये एक आदमी उस टापू पर भेजना ही पड़ा।

जब वह लड़का महल में आया तो राजकुमारी ने देखा कि वह किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था। उसने पूछा क्या यह सच है कि उसके पास जादू की कैंची है?

बूट्स बोला कि हाँ यह सच है कि उसके पास जादू की कैंची है। उसने अपनी जेब से जादू की कैचीं निकाली और हवा में चलाने लगा। सिल्क, साटन और मखमल के कपड़ों के ढेर लग गये, पीले, हरे, गुलाबी, नीले।

राजकुमारी ने कहा — “यह कैंची हमें बेच दो। तुम जो चाहोगे हम तुम्हें वही देंगे। ”

बूट्स ने कहा — “नहीं, मैं इसे नहीं बेच सकता क्योंकि ऐसी कैंची मुझे दोबारा नहीं मिल सकती। ”

जब वे लोग आपस में सौदेबाजी कर रहे थे तो राजकुमारी के साथ भी वही हुआ जो उन तीनों स्त्र्यिों यानी सराय के मालिकों की पत्नियों के साथ हुआ था।

उसे लगा कि इतना सुन्दर लड़का तो उसने पहले कभी देखा ही नहीं था। उसे लगा कि उस लड़के के बाल पीली साटन से भी ज़्यादा पीले हैं, उसकी आँखें नीली मखमल से भी ज़्यादा नीली हैं और उसके गाल गुलाबी सिल्क से भी ज़्यादा गुलाबी हैं।

वह उसको जाने नहीं देना चाहती थी सो उसने सौदा छोड़ कर उससे कैंची देने के लिये प्रार्थना करनी शुरू कर दी जो बूट्स उसको किसी तरह भी देने के लिये राजी नहीं था। उसने उस लड़के से पूछा कि आखिर तुम्हें इसके लिये चाहिये क्या।

बूट्स ने कहा — “मैं अगर एक रात तुम्हारे कमरे के दरवाजे पर फर्श पर सो जाऊँ तो यह कैंची मैं तुम्हें ऐसे ही दे दूँगा। मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा लेकिन अगर तुम्हें मुझसे डर लगे तो तुम अपने भरोसे के दो चौकीदार रख सकती हो और रात भर कमरे में रोशनी भी रहने दे सकती हो। ”

राजकुमारी को इसमें कोई परेशानी नहीं थी। सो बूट्स राजकुमारी के कमरे के दरवाजे के पास फर्श पर रात भर सोया, दो चौकीदार वहाँ रात भर रहे और कमरे में रोशनी रही।

पर राजकुमारी को नींद नहीं आयी क्योंकि वह जब भी अपनी आँखें बन्द करती उसके सामने बूट्स की सूरत नाचने लगती और फिर वह अपनी आँखें खोल लेती। रात भर यही चलता रहा। वह उसे उन सब लड़कों से सुन्दर लग रहा था जो अब तक उससे शादी के उम्मीदवार रह चुके थे।

अगले दिन राजकुमारी ने कैंची ले ली और बूट्स को भिखारियों के टापू पर वापस भेज दिया। अब उसे कैंची से कोई काम नहीं था बस उसके मन में तो बूट्स की सुन्दर सूरत बसी हुई थी।

सो अब उसने उस अच्छे खाने के बारे में सोचा जो उस टापू पर बूट्स ने वहाँ के भिखारियों को दिया था। वह उसकी तह तक भी पहुँचना चाहती थी। सो बूट्स को फिर महल में लाया गया।

जब राजकुमारी ने उन बढ़िया खानों के बारे में उससे पूछा तो उसने उसको मेजपोश के बारे में बताया और साथ में यह भी कहा कि वह उसको बेचेगा नहीं, लेकिन अपनी पुरानी शर्त पर उसको ऐसे ही दे सकता हैं।

राजकुमारी राजी हो गयी और बूट्स पहले दिन की तरह से फिर वैसे ही राजकुमारी के कमरे के दरवाजे के पास फर्श पर सोया।

इस रात राजकुमारी को और भी कम नींद आयी। वह रात भर बूट्स का चेहरा अपनी आँखों के सामने देखती रही और फिर भी उसे रात छोटी लगी। अगले दिन बूट्स ने अपना जादू का मेजपोश राजकुमारी को दे दिया।

राजकुमारी ने राजा से बूट्स को महल में रखने की जिद की तो राजा ने कहा — “किसी चीज़ की कोई हद भी तो होती है, हम इस तरीके से उसे यहाँ नहीं रख सकते। उसे टापू पर जाना ही होगा। ”

और अगले दिन राजकुमारी की इच्छा के खिलाफ उसको फिर उसी टापू पर भेज दिया गया। जाते जाते राजकुमारी से उसने कहा कि उसको उन दो राजकुमारों से अच्छा व्यवहार करना चाहिये जो उनके महल में ठहरे हुए हैं।

अबकी बार राजकुमारी को उसकी शराब की याद आयी तो वह फिर अपने पिता के पास गयी और बोली — “पिता जी, उसके पास अभी एक चीज़ और है जो मेरे पास होनी चाहिये इसलिये मेहरबानी करके उसे एक बार और बुला दीजिये। ”

राजा ने अनमने मन से उसको बुलवा दिया। इस बार जब बूट्स आया तो राजा ने भी उनकी बातें सुनी।

राजकुमारी ने पूछा — “क्या तुम्हारे पास कोई जादुई टोंटी भी है?”

बूट्स ने फिर वही जवाब दिया — “हाँ है। अगर राजा मुझे अपना आधा राज्य भी दे दें तो भी मैं उसे नहीं बेचूँगा पर अगर तुम मुझसे शादी करने को तैयार हो तो मैं तुमको वह ऐसे ही दे सकता हूँ। ”

राजकुमारी मुँह फेर कर हँसी। फिर उसने अपने पिता की ओर देखा। पिता ने भी अपनी बेटी की ओर देखा तो उसको लगा कि उसकी बेटी इस लड़के को प्यार करती थी।

राजा ने बेटी से कहा — “ठीक है, हम तुम्हारी शादी इस लड़के से कर देंगे क्योंकि इसके पास ऐसी चीज़ें हैं जिनकी वजह से वह हमारे जितना ही धनी है। ”

बस फिर क्या था बूट्स और राजकुमारी की शादी हो गयी। राजा ने अपना आधा राज्य उन दोनों को दे दिया। उसके भाइयों को भिखारियों के टापू पर भेज दिया गया। वे वहाँ उस टापू पर धन का क्या करते क्योंकि वहाँ तो खरीदने को कुछ था ही नहीं।

अगर बूट्स ने मेहरबानी करके कोई नाव उन्हें लेने नहीं भेजी होगी तो हमें यकीन है कि वे लोग अभी भी वहीं होंगे। पर हम आशा करते हैं कि बूट्स ने उन्हें जरूर माफ कर दिया होगा।

पर जब तक वहाँ बूट्स का राज्य रहा उसने और उसकी रानी ने फिर किसी और को उस टापू पर नहीं भेजा।

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Denmark ki Lok Kathayen-2/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-2

हैंस क्रिश्चियन एंडर्सन की कहानी-राजकुमारी और मटर का दाना

एक समय की बात है एक राजकुमार था जो शादी करना चाहता था । उसके लिए चाहिए थी एक राजकुमारी । उसकी परियों ने उसे बहुत ही प्यार से पाला था । इसलिए उसकी यह प्रतिज्ञा और आग्रह था कि उसकी होने वाली पत्नी भी उसके लिए सही मायने में राजकुमारी हो।

लेकिन उसके राज्य में ऐसी कोई भी राजकुमारी नहीं थी जो सही मायने में उसके लिए राजकुमारी बन सके । इसलिए राजकुमार अपनी पत्नी की तलाश में सारी दुनिया घूमने लगा । जो कोई भी राजकुमारी मिलती उसमें कोई न कोई खामी होती थी। किसी की नाक ऊंची थी तो किसी का कद छोटा था किसी की चाल में खोट था। तो किसी की आवाज में खोट था। इतनी तलाश के बावजूद भी ऐसी कोई भी । राजकुमारी नहीं मिली जो वह अपनी पत्नी बना सके वह निराश होकर अपनी राज्य लौट आया। उसने सोचा कि शायद उसके जीवन में पत्नी का सुख है ही नहीं।

एक दिन जब वह अपने महल वापस लौटे तो जोर की बारिश होने लगी। आसमान में काले बादल छा गए। और कड़कती बिजली की आवाज ने महल की दीवारों को हिला कर रख दिया । महल के पास सभी लोग इकट्ठा होकर आग जलाकर कुदरत के कहर को देखने लगे। तभी महल की मुख्य द्वार पर किसी की गेट खटखटाने की आवाज आई ।

राजकुमार के पिता ने यानी महाराज ने जब दरवाजा खोला। तो बाहर एक बहुत ही सुंदर राजकुमारी खड़ी हुई थी। उसके लंबे सुनहरे घने बाल बारिश में भीग रहे थे । और उसके रेशम के जूतों से पानी टपक रहा था । उसने कहा कि वह एक राजकुमारी है। उसने कहा कि वह नजदीकी राज्य से अपने राज्य वापस लौट रहे थे । उसकी ऐसी अवस्था को देखकर महाराज को विश्वास नहीं हुआ कि वह एक राजकुमारी है।

महाराज ने सोचा कि क्या वह सच बोल रही है । महाराज उन्हें भीतर ले आया । और सभी से परिचय करवाया महारानी ने कहा । तुम्हारी ऐसी दशा पर भरोसा करना मुश्किल है । मैंने कभी इतनी अस्त-व्यस्त राजकुमारी नहीं देखी ।

चतुर रानी को दाल में कुछ काला नजर आया क्योंकि उन्हें महल की सुरक्षा जो करनी थी । महारानी ने असलियत जानने के लिए एक युक्ति की । उन्होंने घर से एक सूखा मटर का दाना लिया। और मेहमान कक्ष के भीतर उनके बिस्तर के बीचो बीच रख दिया । और फिर उस मटर के ऊपर अच्छे से अच्छे मुलायम गद्दे रख दिए।

इतने आकर्षक मुलायम गद्दे किसी ने नहीं देखे होंगे । इन गद्दों से राजकुमारी की पसंद का अंदाजा लगाया जा सकता था। पहला गद्दा गहरा मुलायम रंग का। दूसरा बैंगनी रंग का। जो अच्छे धागों से बना हुआ था। तीसरा सफेद रंग का पट्टे वाले गद्दे। स्प्रिंग वाले गद्दे । जरी वाले गद्दे बहुत ही अच्छे और मुलायम गद्दे। और सोने की धागों से बनी हुई गद्दे।

जिसके ऊपर अच्छे-अच्छे चित्र बने हुए थे ।डिजाइन बने हुए थे । मटर के दाने के ऊपर यह सारे मुलायम गद्दे रखने के बाद राजकुमारी को उस पर सुलाया गया । मटर के दाने के ऊपर इतने सारे गद्दे रखने की फिजूल की मेहनत के बाद महारानी बोली । -अब चलें देखते हैं कि वह राजकुमारी है या नहीं ।

इतने सारे गद्दों के ऊपर सोने के बाद राजकुमारी सुबह जब नाश्ता करने आई। तो खुद को अस्वस्थ महसूस कर रही थी । महारानी ने राजकुमारी से पूछा क्या अच्छी नींद आई। तो राजकुमारी ने जवाब दिया । नहीं मैं नहीं सो पाई मुझे बिस्तर पर कुछ चुभ रहा था । जो पत्थर से भी ज्यादा सख्त था मुझे लगता है । वह टोपियों में लगाने वाला कोई लोहे का गोला ही था । जो मेरे पूरे शरीर पर घाव के निशान पड़ गए हैं। सभी घर के सदस्य हंसने लगे थे।

क्योंकि वह राजकुमारी असली राजकुमारी थी । और यह सबको पता चल चुका था। क्योंकि इतनी मुलायम और कोमल त्वचा किसी राजकुमारी की ही हो सकती थी । और फिर राजकुमार ने उसके साथ राजकुमारी शादी कर ली । और फिर मटर के दाने को बिस्तर से निकालकर राज्य के संग्रहालय में रख दिया गया । जहां वह मटर आज भी महफूज है।

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Denmark ki Lok Kathayen-3/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-3

कहानी-आश्चर्यजनक बर्तन: डेनमार्क की लोक कथा

एक बार की बात है कि डेनमार्क देश में एक आदमी अपनी पत्नी और बच्चों के साथ एक छोटे से घर में रहता था। वे बहुत मेहनत करते थे और बहुत ही सादा सी ज़िन्दगी गुजारते थे।

उनके खेतों पर उनकी सहायता करने के लिये उनके पास एक घोड़ा था। ताजा अंडों के लिये उनके पास कुछ मुर्गियाँ थीं। और उनके पास एक गाय थी जो उनके बच्चों के पीने के लिये काफी दूध दे देती थी और थोड़ा सा मक्खन भी।

उनके खेत में उनकी जरूरत को लायक गेंहू उग जाता था जिससे वे अपने घर के लिये रोटी बना लेते थे।

इस तरह गरीब होने के बावजूद वे खुश थे। फिर एक दिन वह हो गया जिसने उनकी ज़िन्दगी ही पलट दी।

उनके गाँव में एक बहुत ही अमीर और ताकतवर आदमी आया और उसने सबकी जमीनें ले ली। उसने उनसे उनके अपने ही घर में रहने का किराया लेना शुरू कर दिया। और उनका किराया भी बहुत ज़्यादा था। हालाँकि वह आदमी पहले से ही बहुत अमीर था पर वह और अमीर बनना चाहता था।

अपने घर में से न निकाले जाने के लिये उस आदमी और उसकी पत्नी ने उनके पास जो कुछ भी था करीब करीब सारा कुछ बेच दिया था।

उन्होंने अपनी मुर्गियाँ बेच दी थीं, उन्होंने अपना घोड़ा बेच दिया था। अब उस घर को अपने पास रखने के लिये गाय को बेचने की बारी थी।

सो उस आदमी ने अपनी गाय के गले में एक रस्सी बाँधी और दुखी मन से उसको बेचने के लिये ले चला।

सड़क पर एक अजनबी जा रहा था। उस अजनबी ने उस आदमी से पूछा — “क्या तुम यह गाय बेचने के लिये ले कर जा रहे हो?”

आदमी बोला — “हाँ, तुम इसका कितना दाम दोगे? मुझे यह पैसा अपने घर का किराया और अपने परिवार के लिये खाना खरीदने के लिये चाहिये। ”

वह अजनबी बोला — “मैं अपना यह करामाती बर्तन तुमको इस गाय के बदले में देने को तैयार हूँ। यह बर्तन तुमको हर चीज़ देगा जो भी तुम इससे माँगोगे। यह बहुत ही आश्चर्यजनक बर्तन है। ”

किसान ने उस बर्तन को देखा तो उसकी तीन टाँगें थीं, वह बहुत गन्दा था, और देखने में तो वह कुछ खास आश्चर्यजनक बर्तन भी नहीं लग रहा था।

वह उसको अभी खड़ा खड़ा देख ही रहा था कि वह बर्तन बोला — “खरीद लो मुझे, तुम जो भी चाहोगे वह तुम्हें मिल जायेगा। ”

यह सुनते ही किसान बोला — “अरे यह तो बोलता भी है तब तो यह वाकई आश्चर्यजनक है। ”

उसने खुशी खुशी अपनी गाय उस अजनबी को दे दी और उस गाय के बदले में वह बर्तन खरीद कर उसको अपने घर ले गया।

घर पहुँचते ही उसकी पत्नी ने बर्तन की तरफ देखते हुए पूछा — “कितने पैसे मिले गाय के? क्या इतने पैसे मिल गये कि हम अपने मकान का किराया दे सकें और परिवार के लिये खाना खरीद सकें?”

उसके पति ने कहा — “मैं उस गाय के बदले में यह बर्तन ले आया हूँ। ”

पत्नी बोली — “लगता है तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है। यह बर्तन तो इतना पुराना है कि इसमें तो हम अपना खाना भी नहीं पका सकते। अब हम क्या करेंगे?”

बर्तन बोला — “तुम मुझे साफ करो और आग पर रखो तो तुमको वह सब कुछ मिल जायेगा जो तुम्हें चाहिये। ”

पत्नी तो यह सुन कर बहुत खुश हो गयी। यह बर्तन तो बोलता है तो फिर यह यकीनन आश्चर्यजनक भी होगा। उसने तुरन्त ही बर्तन साफ किया और उसे आग पर रख दिया।

बर्तन बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

पत्नी ने आश्चर्य से पूछा — “अरे तुम भागते कहाँ हो?”

बर्तन बोला — “मैं तुम लोगों के पेट भरने के लिये बाहर भागता हूँ। ”

और इससे पहले कि पत्नी उसको रोक सके वह यह कह कर चूल्हे पर से उतर कर दरवाजे से बाहर भागा और सड़क पर निकल गया। पत्नी तो उसको भागता हुआ देखती की देखती ही रह गयी।

वह अपनी तीन छोटी टाँगों पर भी पत्नी की दो लम्बी टाँगों से भी ज़्यादा तेज़ी से भाग रहा था। वह बर्तन उस अमीर आदमी के घर में घुस गया जिसने गाँव वालों की जमीनें ले ली थीं और उसकी रसोई में चला गया।

अमीर आदमी की पत्नी ने उस बर्तन को देखा तो बोली — “आहा, लगता है कि मेरे पति ने मेरे लिये यह नया बर्तन खरीदा है। मैं इसमें आज एक नयी तरह की खीर बनाऊँगी। मैं अपने अमीर परिवार के लिये बहुत ही बढ़िया स्वादिष्ट खीर बनाऊँगी। ”

उस अमीर आदमी की पत्नी ने खीर बनाने के लिये उस बर्तन में आटा, चीनी, मक्खन, किशमिश और बादाम आदि डाले। वह उनको चला कर आग पर रखने ही वाली थी कि बर्तन बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

यह कहता हुआ वह दरवाजे से बाहर निकला और सड़क पर आ गया। सब आने जाने वालों और गाड़ियों को हटाता हुआ वह भागा चला जा रहा था। अमीर आदमी की पत्नी तो बस उसको देखती ही रह गयी। वह तो उससे यह भी न पूछ सकी कि “तुम कहाँ भाग रहे हो?”

भागता भागता वह बर्तन उस गरीब आदमी के घर आ गया। गरीब परिवार ने जब उस बर्तन को अपने घर के दरवाजे में घुसते हुए देखा तो वह तो बहुत खुश हो गया।

उसने बर्तन में झाँक कर देखा तो वह बर्तन तो बहुत ही बढ़िया स्वादिष्ट खुशबूदार खीर से भरा हुआ था। जब वह बर्तन सीढ़ियाँ चढ़ रहा था तो वे आपस में बोले — “देखो न यह कितना आश्चर्यजनक बर्तन है। ” और वह बर्तन जा कर फिर से चूल्हे पर बैठ गया।

उसमें परिवार के खाने के लिये बहुत सारी खीर थी। उनके अभी के खाने के बाद भी वह खीर उनके हफ्ते भर के लिये और पड़ोसियों को खिलाने के लिये भी बहुत थी।

अगले दिन उस बर्तन ने फिर कहा — “मुझे साफ करो और आग पर रखो। ”

पति पत्नी दोनों ने मिल कर उस बर्तन को फिर से घिस घिस कर चमका कर साफ किया। साफ करके उन्होंने उसे फिर आग पर रखा तो वह फिर बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

पति पत्नी ने पूछा — “अरे तुम कहाँ भागे जाते हो?”

बर्तन बोला — “मैं तुम्हारे अनाज रखने की जगह भरने के लिये भागा जाता हूँ। ”

और यह कह कर वह फिर घर से बाहर सड़क पर भाग गया। वह फिर उसी अमीर आदमी के अनाजघर में गया और जा कर उसके दरवाजे पर बैठ गया।

वहाँ के एक काम करने वाले ने उस बर्तन को देखा तो बोला — “अरे इस चमकते हुए काले लोहे के बर्तन को तो देखो कितना सुन्दर है यह। देखते हैं कि इसमें कितना गेंहू आता है। ”

कह कर उन्होंने उस बर्तन में एक बुशैल गेंहू पलट दिया। इतना गेहूँ पलटने के बाद वे यह सोच रहे थे कि शायद वह भर जायेगा और उसमें से गेंहू बाहर गिर पड़ेगा पर उनके आश्चर्य का तो ठिकाना ही न रहा जब उन्होंने देखा कि उतने गेहूँ ने तो केवल उसकी तली ही छुई थी।

सो वे उसमें गेंहू भरते गये और भरते गये और जल्दी ही अनाजघर खाली हो गया।

बस तभी वह बर्तन बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ” और वह बर्तन तो उन काम करने वालों को भी वहीं छोड़ कर सड़क पर भागा चला गया।

भागा भागा वह फिर से उस गरीब परिवार के घर आ गया और उनके अनाजघर में घुस गया। पति यह देख कर बहुत आश्चर्यचकित हुआ और उसने अपनी पत्नी को बुला कर उसे दिखाया।

दोनों ने मिल कर उस बर्तन का गेंहू अपने अनाजघर में खाली कर लिया। अब तो उनके पास अपने लिये ही साल भर का खाना मौजूद नहीं था बल्कि उसमें से बहुत सारा गेंहू उन्होंने अपने पड़ोसियों को भी बाँट दिया।

कितना अच्छा बर्तन था वह?

अगले दिन उस बर्तन ने फिर कहा — “मुझे साफ करो और आग पर रखो। ”

पति पत्नी दोनों ने मिल कर फिर इस बर्तन को घिस घिस कर चमका कर साफ किया। साफ करके उन्होंने उसे फिर आग पर रखा तो वह फिर बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

पति पत्नी दोनों ने फिर पूछा — “अरे तुम कहाँ भागे जाते हो?”

बर्तन बोला — “मैं तुम्हारे मकान का किराया देने जाता हूँ। ”

अमीर आदमी के पास बहुत पैसा था। उस पैसे को रखने और गिनने के लिये उसके पास एक अलग घर था।

सो वह बर्तन उसके उस पैसे वाले घर तक पहुँच गया जिसमें वह अपना पैसा रखता था। वहाँ वह अमीर आदमी अपने उस घर का दरवाजा खोल कर अपना पैसा गिनने के लिये अन्दर जा रहा था।

बर्तन उसको पीछे छोड़ कर आगे निकल गया और फर्श पर उस आदमी के पास ही बैठ गया जहाँ वह पैसे गिनने वाला था। अमीर आदमी ने सोचा ऐसा लगता है कि मेरी पत्नी ने मेरे पैसे रखने के लिये कोई नया बर्तन खरीदा है। वह बहुत खुश हुआ।

वह उन पैसों को गिनने लगा जो उसने पिछले महीने कमाये थे और उन पैसों को गिन गिन कर वह उस बर्तन में डालने लगा। धीरे धीरे वह बर्तन भर गया। अब वह आदमी वहाँ से बाहर निकला।

बर्तन बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ” कह कर वह बर्तन फिर एक बार उस आदमी से पहले ही भाग कर दरवाजे से बाहर निकल गया।

अपने पैसे को इस तरह जाते देख कर उस अमीर आदमी ने उस बर्तन का पीछा किया पर वह अपनी तीन टाँगों पर इतनी तेज़ भाग रहा था कि वह आदमी उसको पकड़ ही नहीं सका।

बर्तन भागता भागता फिर अपने उस गरीब परिवार के घर आ पहुँचा। वे गरीब लोग बर्तन को वापस आया देख कर फिर से बहुत खुश थे।

इस बार तो वह बर्तन इतने सारे पैसों से भरा हुआ था कि वे उससे सालों तक किराया दे सकते थे। और वे ही नहीं बल्कि उनके पड़ोसी भी।

अगले दिन उस बर्तन ने फिर कहा — “मुझे साफ करो और आग पर रखो। ”

पति पत्नी दोनों ने मिल कर फिर उस बर्तन को घिस घिस कर चमका कर साफ किया। साफ करके उन्होंने उसे आग पर रखा तो वह फिर बोला — “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ”

पति पत्नी ने फिर पूछा — “अब तुम कहाँ जाते हो?”

बर्तन बोला — “अब मैं तुम लोगों के लिये न्याय माँगने जाता हूँ ताकि तुम्हारी यह परेशानी हमेशा के लिये दूर हो जाये। ” यह कह कर वह बर्तन फिर भाग गया और फिर से उस अमीर आदमी के घर पहुँचा।

अमीर आदमी ने देखा कि एक बर्तन सड़क पर भागा जा रहा है। वह बर्तन तो उसी के मकान की तरफ ही आ रहा था। उसने उस बर्तन को पहचान लिया।

वह गुस्से से बोला — “तो तुम ही वह बर्तन हो जो मेरा दलिया ले कर भागे थे। तुम ही वह बर्तन हो जो मेरे अनाजघर से गेंहू ले कर भागे थे जो मैंने हर एक के खेत से इकठ्ठा किया था।

और तुम ही वही बर्तन हो जो मेरे कमरे से वह पैसे ले कर भी भागे थे जो मैंने हर एक का घर ले कर इकठ्ठा किया था। अब तुम यहाँ आओ तो। मैं देखता हूँ तुमको। ”

कह कर वह आदमी उस बर्तन पर कूद पड़ा और उसको कस कर पकड़ लिया। वह उसे छोड़ ही नहीं रहा था।

पर “मैं भागता हूँ, मैं भागता हूँ। ” कहता हुआ वह बर्तन वहाँ से फिर भाग लिया।

आदमी चिल्लाया — “अब तुम जहाँ चाहो वहाँ जाओ चाहे उत्तरी ध्रुव जाओ और चाहे दक्षिणी ध्रुव, पर अबकी बार मैं तुमको नहीं छोड़ने वाला। ” कह कर उसने उस बर्तन को और कस कर पकड़ लिया। सो वह बर्तन उस आदमी को लिये हुए ही भागता रहा।

गरीब लोगों ने उसको अपने घर के दरवाजे के सामने से गुजरते देखा पर वह वहाँ रुका नहीं और चिल्ला कर बोला — “मैं तुम्हारी मुसीबत को साथ लिये जा रहा हूँ। ”

उनको नहीं मालूम कि वह कहाँ तक दौड़ा। यह भी हो सकता है कि वह उत्तरी ध्रुव तक दौड़ गया हो या फिर दक्षिणी ध्रुव ही चला गया हो क्योंकि उसके बाद उन दोनों को फिर किसी ने कभी नहीं देखा।

वह गरीब परिवार अब गरीब नहीं रह गया था। उनको अपनी जमीन वापस मिल गयी थी। उनके पास अब कपड़ों के लिये पैसे थे सो उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजना शुरू कर दिया। गाँव में सब लोग अब खुशी से रहने लगे थे।

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Denmark ki Lok Kathayen-4/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-4

कहानी-खिलौने की बतख: डेनमार्क की लोक कथा

एक बार की बात है कि एक मक्खा, एक टिड्डा और एक खिलौना बतख में यह बात हुई कि देखें उनमें से कौन सबसे ऊँचा कूदता है।

सो उन्होंने यह तमाशा देखने के लिये सारी दुनियाँ को बुलावा भेजा। पर जब तीनों एक कमरे में मिले तो तीनों को लगा कि वे तो तीनों ही सबसे ज़्यादा ऊँचा कूदने वाले हैं।

जब राजा को इस मुकाबले का बुलावा आया तो उसने सोचा कि यह मुकाबला बेकार नहीं जाना चाहिये सो उसने यह घोषणा करा दी कि वह अपनी बेटी की शादी उसी से करेगा जो उस मुकाबले में सबसे ऊँचा कूदेगा क्योंकि वह यह मुकाबला बेकार नहीं जाने देना चाहता था।

सबसे पहले मक्खा आगे आया। वह बहुत ही अच्छे तौर तरीके वाला था क्योंकि उसकी नसों में कुलीन परिवार का खून दौड़ रहा था। वह आदमियों के साथ रहता था जो अपने आपमें दूसरे जानवरों के लिये एक बहुत बड़ी बात थी। उसने चारों तरफ झुक कर लोगों को नमस्ते की।

उसके बाद टिड्डा आया। वह साइज में मक्खे से कहीं ज़्यादा बड़ा था पर बड़ी शान से चल रहा था। वह अपने वही हरे रंग के कपड़े पहने था जिनको पहन कर वह पैदा हुआ था। उसने बताया कि वह मिश्र के किसी बड़े पुराने परिवार से आता था और यहाँ भी उसकी बहुत इज़्ज़त थी।

सच्चाई तो यह थी कि जब वह खेतों से बाहर लाया गया था तो उसको रहने के लिये एक तीन मंजिल का एक बहुत बड़ा मकान दिया गया।

उसका यह मकान ताश का बना हुआ था और ताश के पत्तों की तस्वीर वाली साइड अन्दर की तरफ थी। उसके दरवाजे और खिड़कियाँ पान की बेगम की कमर में कटे हुए थे।

वह बोला — “मैं इतना अच्छा गाता हूँ कि यहाँ के 16 मकड़ों को जो जबसे पैदा हुए हैं तभी से गाते हैं उनको भी अभी तक रहने के लिये ताश के पत्तों घर नहीं दिया गया। जबसे उन्होंने मेरे गाने के बारे सुना है वे दुबले होते जा रहे हैं। ”

इस तरह मक्खे और टिड्डे ने अपने अपने बारे में वहाँ बैठे लोगों को बताया और उनको लगा कि वे राजकुमारी से शादी करने के लायक क्यों नहीं हो सकते थे।

खिलौना बतख कुछ नहीं बोला। लोगों ने सोचा शायद वह इस लिये नहीं बोला क्योंकि वह बहुत ज़्यादा जानता था। घर के कुत्ते ने उसको अपनी नाक से सूँघा और उनको विश्वास दिलाया कि खिलौना बतख भी एक अच्छे कुलीन परिवार से आता था।

एक बूढ़े सलाहकार को खिलौना बतख के बारे में चुप रहने के लिये तीन बार कहा जा चुका था कि खिलौना बतख के बारे में कुछ न बोले क्योंकि खिलौना बतख तो एक धर्मदूत था।

क्योंकि कोई आदमी भी क्या मौसम का हाल लिखेगा जो उस खिलौना बतख की पीठ पर लिखा रहता था और जिसे कोई भी पढ़ सकता था कि इस साल जाड़ा हल्का होगा या ज़ोर का।

राजा बोला — “इस बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि मेरी अपनी राय है। ”

मुकाबला शुरू होने वाला था सो मक्खा बहुत ज़ोर से कूदा। वह इतनी ज़ोर से कूदा कि लोगों को यही दिखायी नहीं दिया कि वह कहाँ तक ऊँचा गया। इसलिये लोगों ने कहा कि वह तो कूदा ही नहीं। हालाँकि यह बात उसके लिये बहुत शर्मनाक थी पर वह क्या करता उसकी कूद ही इतनी ऊँची ही थी।

उसके बाद टिड्डा कूदा। वह मक्खे से केवल आधा ऊँचा ही कूद पाया पर वह जा कर राजा के मुँह पर गिरा जो राजा को बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा।

खिलौना बतख बहुत देर तक खड़ा रहा और सोचता रहा। उस को खड़े खड़े और सोचते सोचते इतनी देर हो गयी कि लोगों ने सोचा कि शायद वह तो कूदेगा ही नहीं।

घर के कुत्ते ने सोचा कहीं ऐसा न हो कि यह खिलौना बतख बेचारा बीमार हो गया हो। इतने में ही वह खिलौना बतख कूदा और राजकुमारी की गोद में जा कर गिर गया जो एक सोने के स्टूल पर राजा के पास ही बैठी थी।

राजा बोला — “मेरे लिये मेरी बेटी से बढ़ कर कोई नहीं है इसलिये खिलौना बतख ने ही सबसे ऊँची कूद लगायी है। इस सबको करने के लिये अच्छा दिमाग चाहिये और खिलौना बतख ने यह साबित कर दिया है कि उसके पास अच्छा दिमाग है और वह उसका अपना है। ”

और इस तरह उसने राजकुमारी को जीत लिया।

मक्खा बोला — “मेरे लिये सब बराबर है। राजकुमारी जी वह खिलौना बतख अपने पास रख सकती हैं। मुझे मालूम है कि मैं ही सबसे ऊँचा कूदा था पर आजकल की दुनिया में लोग अच्छी सूरत ही ज़्यादा पसन्द करते हैं काम नहीं। ”

उसके बाद मक्खा वह देश छोड़ कर विदेश चला गया और बेचारा वहीं विदेश में ही मारा गया।

टिड्डा एक हरी जगह चला गया और दुनियाँ की बातों के बारे में सोचने लगा — “अच्छी सूरत ही इस दुनिया में सबसे बड़ी चीज़ है। लोग इसी को सबसे ऊँची चीज़ समझते हैं काम कोई नहीं देखता। ”

फिर उसने एक दुखी गाना गाना शुरू कर दिया जो वह आज तक गा रहा है। और यह कहानी भी उसके उसी गीत से ली गयी है।

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Denmark ki Lok Kathayen-5/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-5

कहानी-क्रिसमस का सन्तरा: डेनमार्क की लोक कथा

एक बार एक बहुत ही छोटी लड़की डेनमार्क के एक अनाथालय में रहने के लिये आयी।

जैसे जैसे क्रिसमस का समय पास आया तो दूसरे बच्चों ने उस लड़की से क्रिसमस के उस सुन्दर पेड़ के बारे में बात करनी शुरू की जो क्रिसमस की सुबह को नीचे बड़े कमरे में लगने वाला था।

अपने रोज के मामूली से नाश्ते के बाद हर बच्चे को उस दिन एक और केवल एक ही क्रिसमस भेंट मिलने वाली थी और वह था एक सन्तरा।

उस अनाथालय का हेडमास्टर बड़े जिद्दी किस्म का आदमी था और वह क्रिसमस को एक मुसीबत समझता था। वह क्रिसमस की सुबह तक किसी बच्चे को क्रिसमस का पेड़ देखने के लिये नीचे भी नहीं आने देता था।

सो क्रिसमस के पहले दिन की शाम को जब उसने उस छोटी लड़की को क्रिसमस के पेड़ को देखने के लिये चोरी से सीढ़ियों से नीचे जाते देखा तो उसने यह घोषणा कर दी कि उसको उसकी क्रिसमस की भेंट का सन्तरा नहीं मिलेगा क्योंकि वह उस पेड़ को देखने के लिये इतनी उत्सुक थी कि उसने अनाथालय के नियमों को तोड़ा था।

वह छोटी लड़की बेचारी रोती हुई अपने कमरे में भाग गयी। उसका दिल टूट गया था और वह अपनी बदकिस्मती पर रो रही थी कि मैं नीचे उस पेड़ को देखने गयी ही क्यों।

अगली सुबह जब बड़े बच्चे नाश्ते के लिये नीचे जा रहे थे तो वह छोटी लड़की नीचे नाश्ते के लिये नहीं गयी और अपने बिस्तर में ही पड़ी रही। वह यह सहन नहीं कर सकती थी कि दूसरी लड़कियों को तो क्रिसमस की भेंट मिले और वह खड़ी उनका मुँह देखती रहे।

बाद में जब सब बच्चे अपना अपना नाश्ता करके ऊपर आये तो एक बच्चे ने उसको एक रूमाल दिया।

उस लड़की को वह रूमाल देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने सावधानी से उस रूमाल को खोला तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि उसमें एक छिला हुआ और फाँकें किया गया सन्तरा रखा था।

उसने पूछा — “यह कैसे हुआ?”

बच्चे ने जवाब दिया — “यह ऐसे हुआ कि हर बच्चे ने अपने छिले हुए और फाँकें किये गये सन्तरे में से एक एक फाँक निकाल कर तुम्हारे लिये रख दी थी ताकि तुमको भी तुम्हारी क्रिसमस की भेंट का सन्तरा मिल सके। ”

यह देख कर उस लड़की की आँखों में आँसू आ गये।

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Denmark ki Lok Kathayen-6/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-6

कहानी- हरा नाइट: डेनमार्क की लोक कथा

एक बार की बात है कि डेनमार्क में एक राजा और रानी अपनी बेटी के साथ रहते थे। उनकी बेटी अभी छोटी ही थी कि रानी बहुत बीमार पड़ गयी और उसी बीमारी में वह चल बसी।

*जब रानी को यह पता चला कि अब वह ज़्यादा दिन ज़िन्दा नहीं रहने वाली तो उसने राजा को बुलाया और उससे कहा — “प्रिये, ताकि मैं शान्ति से मर सकूँ इसके लिये तुम मुझसे एक वायदा करो। कि मेरी बेटी जो कुछ भी माँगेगी अगर वह तुम उसको दे सकते होगे तो वह चीज़ उसको जरूर दोगे। किसी चीज़ के लिये मना नहीं करोगे। ”

इस वायदे के लेने के कुछ समय बाद ही रानी चल बसी। रानी के जाने के बाद राजा का दिल टूट गया क्योंकि वह अपनी रानी को बहुत प्यार करता था। वह अपनी बेटी को भी बहुत प्यार करता था सो वह केवल अपनी बेटी को देख कर ही ज़िन्दा था।

राजकुमारी अपनी माँ के लिये हुए वायदे के साथ बड़ी होने लगी। राजा के लिये बेटी की माँ के साथ किये हुए वायदे को निभाना कोई मुश्किल काम नहीं था।

पर इस वायदे को निभाने ने उसकी बेटी को थोड़ा बिगाड़ दिया था नहीं तो वह एक बहुत अच्छी बच्ची थी जिसको एक माँ की जरूरत थी जो उसको प्यार कर सके। इस प्यार की कमी की वजह से वह कभी कभी उदास हो जाती और कभी बेकार में ही गुस्सा भी हो जाती।

उसको दूसरे बच्चों की तरह से खेलना अच्छा नहीं लगता बल्कि वह अकेली बागीचों और जंगलों में घूमती रहती। उसको फूलों और चिड़ियों से बहुत प्यार था और उसको कहानियाँ और कविताएँ पढ़ने का भी बहुत शौक था।

महल के पास ही एक काउन्ट की पत्नी रहती थी। काउन्ट तो मर गया था पर उसके एक बेटी थी जो राजकुमारी से थोड़ी सी बड़ी थी। वह अब उसी के साथ रहती थी।

काउन्टैस की वह नौजवान बेटी कोई बहुत अच्छी लड़की नहीं थी। वह एक बहुत ही बेकार, स्वार्थी और बहुत ही पत्थर दिल लड़की थी। पर अपनी माँ की तरह वह चतुर बहुत थी और जब भी वह देखती कि कहीं उसका कोई काम बनने वाला है तो वह अपने विचारों को छिपा भी लेती थी।

बड़ी काउन्टैस ने ऐसे ऐसे तरीके निकाल रखे थे जिससे कि उसकी अपनी बेटी राजकुमारी के साथ ही रहे इसलिये माँ और बेटी दोनों ही राजकुमारी को खुश रखने में लगी रहतीं।

उन दोनों के बस में जो कुछ भी होता वे उसको खुश रखने के लिये उसके लिये किसी भी तकलीफ को उठा कर करतीं। उसकी परेशानी को दूर करने के लिये उन दोनों में से जल्दी ही उसके पास कोई न कोई पहुँच जाता।

बड़ी काउन्टैस तो यही चाहती थी और इसके लिये वह मेहनत भी बहुत कर रही थी ताकि समय आने पर वह अपनी बात पर आ सके।

सो जब वह समय आ गया तो एक दिन बड़ी काउन्टैस ने अपनी बेटी से राजकुमारी से रोते हुए यह कहने के लिये कहा कि अब वे दोनों अलग हो जायेंगी क्योंकि वह अपनी माँ के साथ किसी दूसरे देश जा रही है।

यह सुनते ही छोटी राजकुमारी बड़ी काउन्टैस के पास भागी गयी और बोली कि उसको अपनी बेटी को साथ ले कर वहाँ से नहीं जाना चाहिये।

छोटी राजकुमारी की बात सुन कर काउन्टैस ने उसके साथ बहुत सहानुभूति का बहाना किया और उससे कहा कि उसके वहाँ उस देश में रुकने का अब केवल एक ही तरीका है और वह यह कि राजा उससे शादी कर ले। उसके बाद दोनों माँ बेटी उसके पास हमेशा के लिये रह सकती थीं।

फिर उन्होंने उसको सब्ज़ बाग दिखाये कि जब वे वहाँ रहेंगी तो वे उसी की हो कर रहेंगी।

यह सुन कर राजकुमारी अपने पिता के पास गयी और उनसे उसने बड़ी काउन्टैस से शादी करने की प्रार्थना की। क्योंकि अगर उसने उससे शादी नहीं की तो वह अपनी बेटी के साथ चली जायेगी और उसकी अपनी बेटी की अकेली दोस्त भी चली जायेगी और उस दोस्त के बिना वह तो मर ही जायेगी।

राजा उसको समझाते हुए बोला — “अगर मैंने ऐसा किया तो बेटी यह करके तुम बहुत पछताओगी। और साथ में मैं भी। क्योंकि मेरी शादी करने की कोई इच्छा नहीं है और मुझे उस धोखेबाज काउन्टैस और उसकी धोखेबाज बेटी का कोई भरोसा भी नहीं है। ”

पर राजकुमारी का रोना नहीं रुका। वह उससे जिद करती ही रही जब तक कि वह काउन्टैस से शादी करने पर राजी नहीं हो गया और उसने राजकुमारी की इच्छा पूरी नहीं की।

राजा ने काउन्टैस से शादी करने के लिये पूछा तो काउन्टैस तो पहले से ही तैयार बैठी थी वह तुरन्त ही राजी हो गयी। जल्दी ही उन दोनों की शादी हो गयी। अब काउन्टैस रानी बन गयी और छोटी राजकुमारी की सौतेली माँ बन गयी।

पर जैसे ही काउन्टैस रानी बन कर महल में आयी सब कुछ बदल गया। रानी ने अपनी सौतेली बेटी यानी राजकुमारी को बजाय प्यार से रखने के उसको चिढ़ाना और तंग करना शुरू कर दिया। उसकी ज़िन्दगी दूभर करने के लिये वह जो कुछ कर सकती थी अब वह उसने सब करना शुरू कर दिया था।

राजा ने भी यह सब देखा। वह इस सबसे बहुत दुखी हुआ क्योंकि वह अपनी बेटी को बहुत प्यार करता था।

एक दिन उसने अपनी बेटी से कहा — “ओह मेरी प्यारी बेटी, तुम्हारी ज़िन्दगी तो बहुत ही खराब हो गयी। तुम भी यह सोच कर पछताती तो होगी कि तुमने मुझसे क्या माँगा। देखो जैसा मैंने तुमसे पहले कहा था वैसा ही हुआ। पर अब तो हम दोनों की बदकिस्मती से बहुत देर हो चुकी है।

मुझे लगता है कि तुमको अब हमको कुछ दिनों के लिये छोड़ देना चाहिये। तुम ऐसा करो कि टापू पर बने मेरे गरमी वाले महल में चली जाओ। वहाँ तुम कम से कम शान्ति से तो रह सकोगी। ”

हालाँकि उन दोनों के लिये अलग होना बहुत मुश्किल था फिर भी राजकुमारी पिता की बात मान गयी।

यह बहुत जरूरी भी था क्योंकि वह अपनी नीच सौतेली माँ और अपनी नीच सौतेली बहिन के बुरे व्यवहार को और ज़्यादा नहीं सह सकती थी।

उसने अपने साथ अपनी दो दासियाँ लीं और अपने पिता के गरमी वाले महल में टापू पर रहने चली गयी। उसका पिता कभी कभी उससे मिलने के लिये वहाँ आ जाता था।

वहाँ आ कर वह देखता कि उसकी बेटी सौतेली माँ के साथ घर में रहने की बजाय इस महल में रह कर ज़्यादा खुश थी।

इस तरह से वह एक बहुत सुन्दर, दयावान, भोलीभाली और दूसरों के बारे में सोचने वाली लड़की की तरह बड़ी होती रही। वह आदमियों और जानवरों सब पर दया करती।

पर वह सचमुच में खुश नहीं थी। वह हमेशा ही उदास रहती। उसके दिल में हमेशा ही यह इच्छा रहती कि उसके पास जो कुछ भी इस समय है उसको इससे कुछ ज़्यादा अच्छा मिल सकता है।

एक दिन उसका पिता उससे विदा लेने के लिये आया क्योंकि उसको किसी लम्बी यात्र पर जाना था।

वहाँ उसको राजाओं और कुलीन लोगों की एक मीटिंग में हिस्सा लेना था जो कई देशों से आने वाले थे और वह मीटिंग काफी दिनों तक चलने वाली थी सो वह काफी दिनों तक लौटने वाला नहीं था।

राजा अपनी बेटी को खुश करने के लिये बोला कि वहाँ वह उसके लिये अगर कोई अच्छा राजकुमार मिलेगा तो ढूँढेगा जिससे वह उसकी शादी कर सके।

तो राजकुमारी ने जवाब दिया — “पिता जी, इसके लिये बहुत बहुत धन्यवाद। पर अगर आपको कहीं हरा नाइट मिल जाये तो उसको मेरी तरफ से नमस्ते कहियेगा और उससे कहियेगा कि मैं उसको बहुत चाहती हूँ और उसका इन्तजार कर रही हूँ। क्योंकि केवल वही मुझे मेरे इस दुख से छुटकारा दिला सकता है और दूसरा कोई नहीं। ”

जब राजकुमारी ने यह कहा तो वह चर्च के हरे आँगन के बारे में सोच रही थी जिसमें बहुत सारे हरे हरे मिट्टी के ढेर खड़े हुए थे क्योंकि उस समय वह मौत के बारे में सोच रही थी।

पर राजा यह बात नहीं समझ सका। उसको अपनी बेटी का इस अजीब से नाइट के लिये अजीब सा सन्देश सुन कर बड़ा ताज्जुब हुआ क्योंकि उसने तो ऐसे नाइट का नाम पहले कभी नहीं सुना था।

पर क्योंकि वह अपनी बेटी की हर इच्छा पूरी करने का आदी था इसलिये उसने अपनी बेटी से कहा कि अगर उसको हरा नाइट कहीं मिल गया तो वह उसका सन्देश उसको जरूर दे देगा।

फिर उसने अपनी बेटी को विदा कहा और राजाओं की मीटिंग मे हिस्सा लेने के लिये अपनी यात्र पर चल दिया।

उस मीटिंग में उसको बहुत सारे राजकुमार मिले, नौजवान कुलीन लोग और नाइट मिले पर हरा नाइट उसे कहीं नहीं मिला। इसलिये राजा अपनी बेटी का सन्देश भी उसको नहीं दे सका।

मीटिंग खत्म हो गयी थी सो राजा घर लौटने लगा। उसको ऊँचे ऊँचे पहाड़ पार करने थे, चौड़ी चौड़ी नदियाँ पार करनी थीं और घने जंगल पार करने थे।

एक दिन जब राजा अपने लोगों के साथ एक घने जंगल से गुजर रहा था तो वे सब एक बड़ी सी खुली जगह में आ गये जहाँ हजारों सूअर चर रहे थे। ये सूअर जंगली नहीं थे बल्कि पालतू थे। उनके साथ उनका चराने वाला भी था।

वह सूअर चराने वाला एक शिकारी की पोशाक पहने अपने कुत्तों से घिरा हुआ एक छोटे से टीले पर बैठा हुआ था। उसके हाथ में एक पाइप था जिसको वह बजा रहा था। सारे जानवर उसके संगीत को सुन रहे थे और उसका कहना मान रहे थे।

राजा को पालतू सूअरों के इस झुंड पर बड़ा आश्चर्य हुआ तो उसने अपना एक आदमी उस सूअरों के रखवाले के पास यह जानने के लिये भेजा कि वे सारे सूअर किसके थे।

उस रखवाले ने जवाब दिया कि वे सारे सूअर हरे नाइट के थे। यह सुन कर राजा को अपनी बेटी की बात याद आ गयी सो वह खुद उस आदमी के पास गया और उससे पूछा कि क्या वह हरा नाइट कहीं पास में ही रहता था।

उस सूअर चराने वाले ने जवाब दिया “नहीं, वह पास में तो नहीं रहता। वह तो वहाँ से बहुत दूर पूर्व की तरफ रहता था। ”

अगर राजा उस दिशा की तरफ चला जाये तो उसको जानवरों के दूसरे झुंड चराने वाले मिलेंगे वे उसको उस हरे नाइट के किले का रास्ता बता देंगे।

राजा यह सुन कर अपने आदमियों के साथ पूर्व की तरफ चल दिया। वह उधर की तरफ जंगल में हो कर तीन दिन तक चलता रहा। वह फिर से एक मैदान में आ निकला जिसके चारों तरफ जंगल ही जंगल था।

वहाँ मूज़ और जंगली बैलों के बहुत बड़े बड़े झुंड चर रहे थे। यहाँ भी उन जानवरों को चराने वाला शिकारी की पोशाक पहने था और उसके साथ भी कुत्ते थे।

राजा अपने घोड़े पर सवार उस रखवाले के पास गया और उससे पूछा कि वे जानवर किसके थे। उसने जवाब दिया कि वे हरे नाइट के थे जो पूर्व की तरफ और आगे की तरफ रहता था।

राजा फिर से पूर्व की तरफ तीन दिनों तक चला और फिर से एक मैदान में निकल आया जहाँ उसको बहुत सारे नर और मादा बारहसिंगा चरते नजर आये। उनका रखवाला भी उनके साथ था।

जब राजा ने उससे पूछा कि वे जानवर किसके हैं तो उसने भी यही कहा कि वे जानवर हरे नाइट के हैं।

राजा ने पूछा कि हरे नाइट का किला कहाँ है तो उसने बताया कि वह वहाँ से पूर्व की तरफ ही एक दिन की दूरी पर है।

राजा वहाँ से हरे हरे जंगलों में से हो कर जा रहे हरे हरे रास्तों पर फिर पूर्व की तरफ चला तो एक दिन में ही एक बड़े से किले तक आ पहुँचा। वह किला भी हरा था क्योंकि वह सारा किला बहुत सारी बेलों से ढका हुआ था।

जब राजा और उसके आदमी सब उस किले के पास तक पहुँचे तो उस किले में से बहुत सारे आदमी शिकारियों की हरे रंग की पोशाक पहने बाहर आये और उनको किले के अन्दर ले गये। अन्दर जा कर उन्होंने घोषणा की कि फलाँ फलाँ राज्य के राजा आये हैं और वह वहाँ के राजा से मिलना चाहते हैं।

यह सुन कर उस किले का मालिक बाहर आया – एक लम्बा सुन्दर नौजवान हरे कपड़े पहने हुए। उसने अपने मेहमान का स्वागत किया औैर उसकी शाही तरीके से आवभगत की।

राजा बोला — “आप बहुत दूर रहते हैं और आपका राज्य भी बहुत बड़ा है। मुझको अपनी बेटी की इच्छा पूरी करने के लिये बहुत दूर तक चलना पड़ा।

जब मैं राजाओं की मीटिंग में हिस्सा लेने के लिये चला था तो मेरी बेटी ने मुझसे कहा था कि मैं उसकी तरफ से हरे नाइट को नमस्ते करूँ।

और यह भी कहा था कि मैं उसको कहूँ कि वह उसको कितना चाहती है और वह उसका इन्तजार कर रही है क्योंकि केवल वही एक उसको उसके दुखों से छुटकारा दिला सकता है।

मैं अपनी बेटी का यह एक बहुत ही अजीब सा काम ले कर चला था, क्योंकि मुझे तो यह काम कम से कम अजीब सा ही लगा पर मेरी बेटी जानती है कि वह क्या कह रही थी।

इसके अलावा जब उसकी माँ मर रही थी तब मैंने उसकी माँ से यह वायदा किया था कि मैं उसकी बेटी की हर इच्छा पूरी करूँगा। इसलिये भी मैं अपनी रानी से किया गया अपना वायदा निभाने के लिये और उसका सन्देश देने के लिये यहाँ आया हूँ। ”

यह सुन कर हरा नाइट बोला — “आपकी बेटी ने जब आपसे यह सब कहा तब वह बहुत दुखी थी और यह मैं निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि जिस समय उसने आपको यह सन्देश दिया वह मेरे बारे में नहीं सोच रही थी। क्योंकि मेरे बारे में तो वह सोच ही नहीं सकती थी।

शायद वह चर्च के आँगन में जो मिट्टी के हरे ढेर बने रहते हैं उनके बारे में सोच रही थी जहाँ वह खुद अकेले आराम करना चाहती थी। पर शायद मैं उसको उसके दुख को कम करने के लिये उसके लिये आपको कुछ दे सकता हूँ।

आप यह छोटी सी किताब ले जाइये और जा कर राजकुमारी को दे दीजियेगा। और उससे कहियेगा कि जब भी वह दुखी हो या उसका दिल भारी हो तो वह अपनी पूर्व की तरफ की खिड़की खोले और यह किताब पढ़े। मुझे यकीन है कि इस किताब को पढ़ कर उसका दिल जरूर खुश होगा। ”

यह कह कर उस हरे नाइट ने राजा को एक छोटी सी हरी किताब थमा दी। राजा ने उस किताब को खोल कर देखा तो वह उसको पढ़ नहीं सका क्योंकि वह उसमें इस्तेमाल किये गये अक्षरों को ही नहीं पहचान सका जिसमें उसमें लिखे शब्द लिखे गये थे।

फिर भी उसने हरे नाइट से वह किताब ले ली और उसको उसके स्वागत और उसकी आवभगत के लिये धन्यवाद दिया। उसने नाइट को विश्वास दिलाया कि उसको वाकई बहुत अफसोस था कि उसने इस तरह आ कर उसको परेशान किया। राजकुमारी का ऐसी कोई इरादा नहीं था। ”

हरे नाइट ने राजा से किले में रात भर ठहरने के लिये प्रार्थना की कि वह सुबह होते ही अपने राज्य चला जाये। असल में तो वह राजा को और ज़्यादा समय के लिये भी रखना चाहता था पर राजा ने उससे कहा कि वह और ज़्यादा नहीं रुक सकता था क्योंकि अगले दिन तो उसको जाना ही था।

सो अगले दिन सुबह राजा ने अपने मेज़बान को विदा कहा और उसी रास्ते से वापस चल दिया जिससे वह आया था। वह वहाँ तक आ गया जहाँ उसने सबसे पहले सूअर देखे था फिर वहाँ से वह सीधे अपने घर आ गया।

घर आ कर सबसे पहले वह उस टापू पर गया जिस पर उसकी बेटी रहती थी। वह वहाँ गया और जा कर राजकुमारी को वह हरी किताब दी।

जब राजा ने राजकुमारी को हरे नाइट के बारे में बताया और उसकी नमस्ते और हरी किताब दी तो उसका मुँह तो आश्चर्य से खुला का खुला रह गया क्योंकि उसने तो कभी यह सोचा ही नहीं था कि हरा नाइट नाम का कोई आदमी भी होगा। और आदमी होना तो दूर वह इस धरती पर भी कहीं होगा।

उसी शाम जब उसके पिता चले गये तो उसने पूर्व की तरफ की खिड़की खोली और वह किताब पढ़नी शुरू की हालाँकि वह किताब उसकी अपनी भाषा में नहीं लिखी थी। उस किताब में बहुत सारी कविताएँ थीं और उनकी भाषा बहुत सुन्दर थी। सबसे पहले जो उसने पढ़ा वह यह था —

समुद्र पर हवा चल निकली है,

वह खेतों पर और मैदानों पर बहती है,

और जब धरती पर शान्त रात छाती है,

नाइट के साथ कौन उसका विश्वास बाँधेगा?

जब वह इस पहली कविता की पहली लाइन पढ़ रही थी तो उसको साफ साफ लगा कि समुद्र पर हवा चलने लगी थी। जब उसने उस कविता की दूसरी लाइन पढ़ी तो उसने पेड़ों की पत्तियों के हिलने की आवाज सुनी।

जब उसने उस कविता की तीसरी लाइन पढ़ी तो उसकी जो दासियाँ थीं और जो भी किले के आस पास थे सब गहरी नींद में सो गये। और जब उसने कविता की चौथी लाइन पढ़ी तो वह हरा नाइट खुद चिड़िया का रूप रख कर खिड़की में से अन्दर आ गया।

अन्दर आ कर वह आदमी के रूप में आ गया और राजकुमारी को बहुत ही नम्रता से नमस्ते की। उसने राजकुमारी से कहा कि वह डरे नहीं।

उसने उससे यह भी कहा कि वह वही हरा नाइट था जिसके पास उसके पिता मिलने के लिये आये थे और जिसकी दी हुई किताब वह पढ़ रही थी।

उस कविता को पढ़ कर उसने उसको खुद ही वहाँ बुलाया था। बह उससे बेहिचक बात कर सकती थी। उससे बात करने से उसका दुख कुछ कम होगा।

यह सुन कर राजकुमारी को हरे नाइट के ऊपर कुछ विश्वास पैदा हुआ तो उसने उस हरे नाइट से अपने मन की सब बातें कह दीं।

उधर उस हरे नाइट ने भी उसके साथ इतनी सहानुभूति और प्यार से बातें कीं कि वह उसकी बातें सुन कर बहुत खुश हो गयी। इससे पहले वह इतनी खुश कभी नहीं थी।

बाद में हरा नाइट बोला कि जब भी वह किताब खोलेगी और वह पहली कविता पढ़ेगी तो वैसा ही होगा जैसा कि आज शाम को हुआ है।

राजकुमारी के सिवा टापू पर सारे लोग सो जायेंगे और वह वहाँ तुरन्त ही आ जायेगा जबकि वह वहाँ से बहुत दूर रहता था। राजकुमार ने कहा कि अगर वह उससे वाकई मिलना चाहेगी वह उसके पास खुशी से आयेगा। अब वह उस किताब को बन्द करके रख दे और जा कर आराम करे।

उसी समय राजकुमारी ने किताब बन्द कर दी। किताब बन्द करते ही वह हरा नाइट भी वहाँ से गायब हो गया और टापू वाले सारे लोग जो सो गये थे वे सभी जाग गये। फिर राजकुमारी भी सोने चली गयी।

रात को सपने में भी वह हरे नाइट को ही देखती रही और जो कुछ उसने उससे कहा था वही उसके सपने में भी आता रहा। जब वह सुबह को उठी तो उसका दिल बहुत हल्का था और वह बहुत खुश थी। इतनी खुश वह पहले कभी नहीं हुई थी।

अब वह पहले से ज़्यादा तन्दुरुस्त रहने लगी थी। उसके गालों का रंग गुलाबी हो गया था और अब वह बात बात पर हँसती और मजाक करती थी।

उसमें यह बदलाव देख कर उसके आस पास के लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ कि राजकुमारी को यह क्या हो गया है। राजा ने कहा कि शाम की हवा और उस छोटी सी हरी किताब ने उसकी ज़िन्दगी में यह बदलाव ला दिया है। राजकुमारी ने कहा कि वह ठीक कह रहा है।

पर यह बात कोई नहीं जानता था कि हर शाम राजकुमारी वह छोटी हरी किताब पढ़ती और हर शाम वह हरा नाइट उसके पास आता और फिर वे दोनों बहुत देर तक बातें करते रहते और यही उसकी खुशी का भेद था।

तीसरे दिन हरे नाइट ने उसको एक सोने की अँगूठी दी और उन दोनों ने अपनी शादी पक्की कर ली पर तीन महीने से पहले वह उसका हाथ माँगने के लिये उसके पिता के पास नहीं जा सका। उसके बाद ही वह अपनी प्रिय पत्नी को अपने घर ले जा सकता था।

इस बीच राजकुमारी की सौतेली माँ को पता चला कि राजकुमारी की तन्दुरुस्ती तो बहुत अच्छी हो रही है और वह बहुत सुन्दर भी होती जा रही है। वह पहले से कहीं ज़्यादा खुश है।

रानी को इस बात पर बड़ा आश्चर्य हुआ और वह उदास हो गयी क्योंकि वह तो हमेशा से ही यह उम्मीद करती थी कि वह धीरे धीरे दुबली हो जायेगी और फिर मर जायेगी। उसके बाद उसकी अपनी बेटी राजकुमारी बन जायेगी और राज्य की वारिस बन जायेगी।

सो एक दिन उसने अपने दरबार की एक दासी को उस टापू पर राजकुमारी के पास भेजा और उसको कहा कि वह राजकुमारी की इस तन्दुरुस्ती और खुश रहने का भेद पता लगा कर लाये।

अगले दिन वह दासी लौट आयी और उसने आ कर रानी को बताया कि यह सब इसलिये हो रहा था कि राजकुमारी रोज शाम को अपनी खिड़की खोल कर बैठ जाती थी और एक किताब पढ़ती थी जो उसको किसी अजीब से राजकुमार ने दी थी।

फिर शाम की हवा ने उसको गहरी नींद में सुला दिया और यह हर शाम उसके दरबार की सब स्त्रियों के साथ होता था कि वे सब शाम को इसी तरीके से सो जाती थीं।

उन्होंने उससे यह शिकायत भी की कि यह सब हालात उनको बीमार बना रहे थे जबकि वे ही हालात राजकुमारी की हालत अच्छी कर रहे थे।

अगले दिन रानी ने अपनी बेटी को राजकुमारी के ऊपर जासूसी करने के लिये भेजा और उसको कहा कि वह उसकी सारी हरकतों पर नजर रखे और आ कर उसे बताये।

उसने यह भी कहा कि “इस खिड़की में ही शायद कोई भेद छिपा है। शायद कोई आदमी इसमें से आता है। सो उस खिड़की पर ध्यान रखना। ”

उसकी बेटी भी अगले दिन लौट आयी पर वह भी रानी को उससे ज़्यादा कुछ नहीं बता सकी जो उसकी दासी ने उसको बताया था। क्योंकि जैसे ही राजकुमारी ने अपनी खिड़की खोली और अपनी वह छोटी किताब पढ़नी शुरू की तो वह सो गयी।

यह सुन कर तीसरे दिन रानी खुद उससे मिलने के लिये गयी। वह राजकुमारी से बहुत ही मीठा व्यवहार कर रही थी। उसने उसको दिखाया कि वह उसकी तन्दुरुस्ती अच्छी देख कर कितनी खुश थी।

रानी ने उससे उतने सवाल पूछे जितने वह उससे पूछने की हिम्मत कर सकती थी। पर वह भी जितना उसको मालूम था उससे ज़्यादा और कुछ मालूम नहीं कर सकी।

उसके बाद वह उसकी पूर्व की खिड़की के पास गयी जहाँ वह राजकुमारी हर शाम बैठती थी और अपनी किताब पढ़ती थी। उस खिड़की की अच्छी तरह से जाँच की पर वहाँ भी उसको कोई ऐसी खास चीज़ नहीं मिली जिससे उसकी गुत्थी कुछ सुलझती।

वह खिड़की जमीन से काफी ऊपर थी और उसके आस पास बहुत सारी बेलें लगी हुई थीं जिससे उस पर किसी भी आदमी का चढ़ना नामुमकिन था।

सो रानी ने एक कैंची ली, उसकी नोकों में जहर लगाया और उसको उसकी नोकों को ऊपर करके खिड़की में अटका दिया पर उसने उसको ऐसे अटकाया कि वह वहाँ किसी को दिखायी न दे।

जब शाम हुई तो रोज की तरह से राजकुमारी अपने हाथ में वह हरी किताब ले कर उस खिड़की के पास बैठी तो रानी ने सोचा कि वह ध्यान रखेगी कि वह किसी तरह भी सोने न पाये जैसा कि पहले दूसरे लोग कर चुके थे पर जब राजकुमारी ने वह किताब पढ़नी शुरू की तो उसके इरादे ने उसकी कोई सहायता नहीं की।

जैसे ही राजकुमारी ने वह किताब पढ़ना शुरू किया तो रानी की पलकें अपने आप ही झुकने लगीं और सबके साथ साथ वह भी गहरी नींद सो गयी।

उसी समय हरा नाइट एक चिड़िया के रूप में वहाँ आया। उस के आने का किसी को पता नहीं चला सिवाय राजकुमारी के। फिर दोनों ने इस बारे में खूब बातें कीं कि बस अब हरे नाइट के राजा के पास जाने का केवल एक हफ्ता ही बचा था।

फिर वह नाइट राजा के दरबार में जा कर उससे राजकुमारी से शादी के लिये उसका हाथ माँग लेगा। शादी करके वह उसे अपने घर ले जायेगा और फिर वह उसके हरे किले में हमेशा उसके पास रहेगी।

उसका यह हरा किला भी हरे हरे जंगलों के बीच में बना हुआ था जहाँ से उसका सारा राज्य दिखायी देता था और जिसके बारे में उसने राजकुमारी से कई बार बात की है। बात करने के बाद में हरे नाइट ने उस विदा ली, चिड़िया बना और खिड़की के बाहर उड़ गया।

पर उस समय वह इत्तफाक से उस खिड़की के ऊपर से इतना नीचे उड़ा कि रानी ने जो कैंची खिड़की में लगायी थी उसकी नोक से उससे उसकी एक टाँग में खरोंच आ गयी। उसके मुँह से एक चीख निकली पर फिर वह जल्दी ही वहाँ से उड़ गया।

राजकुमारी ने जब हरे नाइट की चीख सुनी तो वह कूद कर वहाँ गयी। इस कूदने में उसके हाथ से वह किताब नीचे फर्श पर गिर गयी और बन्द हो गयी। उसके मुँह से भी एक चीख निकली और रानी और सबकी आँख खुल गयी।

राजकुमारी की चीख की आवाज सुन कर सब राजकुमारी की तरफ दौड़े गये कि उसको क्या हुआ। उसने उनको बताया कि उसको कुछ नहीं हुआ था और वह ठीक थी। बस उसकी जरा सी आँख लग गयी थी तो उसी में उसने एक बुरा सपना देख लिया।

पर उसी समय से हरे नाइट को बुखार आ गया और उसको बिस्तर पर लिटा दिया गया।

इसी बीच रानी खिड़की में से अपनी कैंची निकालने के लिये खिड़की तरफ खिसक गयी। वहाँ जा कर उसने देखा कि उसकी कैंची की नोक पर तो खून लगा है। उसने उसको तुरन्त ही वहाँ से निकाल कर अपने कपड़ों में छिपा लिया और अपने घर ले गयी।

उधर राजकुमारी सारी रात सो नहीं पायी और दूसरे दिन भी बहुत परेशान रही। फिर भी वह कुछ ताजा हवा लेने के लिये खिड़की के पास जा बैठी।

उसने अपनी पूर्व वाली खिड़की खोली अपनी किताब खोली और रोज की तरह से उसमें से पढ़ने लगी।

समुद्र पर हवा चल निकली है,

वह खेतों पर और मैदानों पर बहती है,

और जब धरती पर शान्त रात छाती है,

नाइट के साथ कौन उसका विश्वास बाँधेगा?

और हवा पेड़ों के बीच से बह निकली, पेड़ों की पत्तियाँ की सरसराहट भी सुनायी दी, राजकुमारी के सिवा उस टापू के सभी लोग सो गये पर हरा नाइट नहीं आया।

इस तरह कई दिन निकल गये। राजकुमारी रोज उस खिड़की को खोल कर बैठती, रोज अपनी किताब पढ़ती, रोज हवा की आवाज सुनती, रोज हवा से होती पत्तों की सरसराहट सुनती पर हरा नाइट नहीं आता।

उसके लाल गाल फिर से पीले पड़ने लगे और उसका दिल फिर से दुखी और नाखुश हो गया। वह फिर से दुबली होने लगी। उसके पिता को यह देख कर बहुत चिन्ता हो गयी कि उसकी हँसती खेलती बेटी को क्या हो गया पर उसकी सौतेली माँ को इस बात से बहुत खुशी हुई।

एक दिन राजकुमारी अपने टापू के किले के बागीचे में उदास घूम रही थी। घूमते घूमते वह थक गयी सो थक कर वह एक बहुत ऊँचे पेड़ के नीचे पड़ी बैन्च पर बैठ गयी।

वहाँ वह बैठी बैठी बहुत देर तक अपने उदास विचारों में खोयी रही कि वहाँ दो रैवन आये और उसके सिर के ऊपर की एक शाख पर आ कर बैठ गये और आपस में बात करने लगे।

एक बोला — “यह कितने दुख की बात है कि हमारी राजकुमारी अपने प्रेमी के दुख में जान देने को भी तैयार है। ”

दूसरा रैवन बोला — “और जबकि केवल वह ही उसका वह घाव ठीक कर सकती है जो हरे नाइट को रानी की जहरीली कैंची से हुआ है। ”

पहले रैवन ने पूछा — “वह कैसे?”

दूसरे रैवन ने जवाब दिया — “एक सी चीज़ें एक दूसरे को ठीक करती हैं। राजकुमारी के पिता राजा के आँगन में, उसकी घुड़साल के पश्चिम की तरफ एक पत्थर के नीचे एक छेद में एक ज़हरीली साँपिन अपने नौ बच्चों के साथ रहती है।

अगर राजकुमारी को उसके ये नौ बच्चे मिल जायें तो वह उनको पका ले और उसके तीन बच्चे रोज राजकुमार को खिलाये तो वह ठीक हो जायेगा नहीं तो उसका कोई और इलाज नहीं है। ”

इतना कह कर वे वहाँ से उड़ गये। जैसे ही रात हुई तो राजकुमारी अपने किले से छिप कर निकल ली और समुद्र के किनारे जा पहुँची। वहाँ उसको एक नाव मिल गयी। उस नाव को खे कर वह अपने पिता के महल जा पहुँची।

वहाँ वह सीधी महल के आँगन में पत्थर के पास पहुँची। वह पत्थर बहुत भारी था फिर भी उसने उसको हटाया। वहाँ उसको नौ साँप के बच्चे मिल गये।

उसने उन बच्चों को अपने ऐप्रन में बाँध लिया और उसी रास्ते पर चल दी जो उसके पिता ने जब वह राजाओं की मीटिंग में गया था लिया था।

सो वह महीनों तक पैदल चलती हुई ऊँचे पहाड़ों पर और घने जंगलों में होती हुई वहीं आ गयी जहाँ उसके पिता को सूअरों को झुंड मिला था।

उसने राजकुमारी को जंगलों में से हो कर उस तरफ जाने के लिये इशारा कर दिया जिधर दूसरा चराने वाला था। दूसरे चराने वाले के पास पहुँचने पर उस दूसरे चराने वाले ने उसको तीसरे चराने वाले के पास भेज दिया।

आखिर वह हरे नाइट के महल तक आ पहुँची। वहाँ हरा नाइट जहर से बीमार और बुखार में पड़ा हुआ था। वह इतना बीमार था कि वह किसी को पहचान भी नहीं रहा था। उसको उस घाव की वजह से इतना दर्द था कि वह बिस्तर में भी बहुत बेचैन था।

दुनिया के कोने कोने से डाक्टर बुलाये गये थे पर किसी भी डाक्टर का कोई इलाज उसको ज़रा सा भी आराम नहीं दे पाया था।

राजकुमारी हरे नाइट के रसोईघर में गयी और वहाँ रसोइये से पूछा अगर वह उसको शाही रसोई में कुछ काम दे सकता। वह बरतन धो सकती थी या फिर कुछ और जो काम भी वह उसको देना चाहता हो। बस उसको रहने की जगह चाहिये थी। रसोइये ने उसको वहाँ रहने की इजाज़त दे दी।

क्योंकि वह बहुत साफ रहती थी, काम बहुत जल्दी करती थी और कोई भी काम करने के लिये तैयार रहती थी रसोइये को वह राजकुमारी बहुत अच्छी लगी। उसने उसको वहाँ का काम करने में उसको काफी आजादी दे दी।

रसोइये का यह विश्वास जीतने के बाद राजकुमारी ने रसोइये से कहा — “आज मुझे राजा के लिये सूप तैयार करने दो। मुझे अच्छी तरह से मालूम है कि उनके लिये सूप कैसे तैयार करना है। मैं उस सूप को अकेले ही तैयार करना चाहती हूँ। कोई भी मेरे बरतन में झाँके नहीं। ”

रसोइया मान गया सो उसने नाइट के लिये उन नौ साँपों के बच्चों में से तीन साँप के बच्चों का सूप बना दिया। वह उस सूप को लेकर हरे नाइट के पास ले गयी और वह सूप उसको पिला दिया।

सूप पी कर उसका बुखार इतना उतर गया कि वह अब अपने होश में आ गया, अपने चारों तरफ के सब लोगों को पहचानने लगा और ठीक से बातें करने लगा।

उसने अपने रसोइये को बुलाया और उससे पूछा — “यह सूप क्या तुमने पकाया था जिसने मुझे इतना फायदा किया?”

रसोइये ने जवाब दिया — “जी हाँ मैंने ही बनाया था क्योंकि कोई और दूसरा तो आपके लिये सूप बना ही नहीं सकता था। ” तब हरे नाइट ने उसको अगले दिन वैसा ही सूप और बनाने के लिये कहा।

अब रसोइये की बारी थी राजकुमारी के पास जाने की और उससे कहने की कि वह नाइट के लिये कल जैसा ही सूप बना दे।

सो उसने उस दिन भी तीन साँप के बच्चे लिये, उनका सूप बनाया और उनका सूप बना कर हरे नाइट के पास ले गयी और उसको पिलाया। अबकी बार उस सूप को पी कर हरे नाइट को इतना अच्छा लगा कि वह बिस्तर से उठ कर खड़ा हो गया।

यह देख कर तो डाक्टर लोग हैरान रह गये। वे समझ ही नहीं सके कि यह सब कैसे हो गया। पर उनको यकीन था कि अब तक वे जो दवाएँ हरे नाइट को दे रहे थे वे सब उस पर अब असर कर रही थीं।

तीसरे दिन रसोईघर की नौकरानी को फिर से वह सूप तैयार करना पड़ा। इस सूप में उसने वे आखिरी तीन साँप के बच्चे डाल दिये और वह सूप फिर हरे नाइट के पास ले कर गयी। उस सूप को पीने के बाद तो हरा नाइट बिल्कुल ही ठीक हो गया।

वह कूदा और रसोईघर में रसोइये को खुद धन्यवाद देने के लिये गया क्योंकि वही तो उसका असली डाक्टर था जिसने उसको ठीक किया था।

अब हुआ क्या कि जैसे ही वह रसोईघर में पहुँचा तो वहाँ तो एक नौकरानी के अलावा और कोई था ही नहीं और वह नौकरानी भी उस समय बरतन पोंछ रही थी।

जैसे ही उसने उसको देखा तो वह उसको पहचान गया। तुरन्त ही उसको लगा कि उस लड़की ने उसके लिये क्या किया है। उसने उस लड़की को अपनी बाँहों में ले लिया और बोला —

“ओह तो वह तुम हो जिसने मेरा इलाज किया है। मेरी जान बचायी है। और मेरे शरीर के अन्दर जो जहर घुस गया था उससे छुटकारा दिलाया है। यह जहर मेरे शरीर में तब घुसा था जब मेरे खिड़की में रखी कैंची की खरोंच लगी जो रानी ने वहाँ रखी थी। ”

राजकुमारी इस बात से मना नहीं कर सकी। वह बहुत खुश थी और साथ में हरा नाइट भी।

दोनों की शादी उस हरे किले में ही हो गयी और फिर दोनों ने वहाँ के हरे जंगलों में रहने वालों पर बहुत सालों तक राज किया। और शायद अभी भी वहाँ राज कर रहे होंगे।

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Denmark ki Lok Kathayen-7/ डेनमार्क की लोक कथाएँ-7

कहानी-जंगली हंस: डेनमार्क की लोक कथा

बहुत दूर एक देश में जहाँ ठंड में चिड़ियें उड़ती हैं, यानी डेनमार्क देश में, एक राजा रहता था। उसके 11 बेटे थे और एक बेटी थी जिसका नाम था ऐलीसा । इन बच्चों की माँ नहीं थी।

राजा के 11 बेटे अपनी कमर में तलवार लटका कर और अपनी छाती पर एक तारा लगा कर स्कूल जाते थे। वे हीरे की कलम से सोने की स्लेट पर लिखते थे। उनको अपने पाठ ऐसे जबानी याद थे जैसे वे उसको किताब से पढ़ रहे हों। तुम उनको देख कर ही यह कह सकते थे कि वे कितने राजकुमार जैसे लगते थे।

उनकी बहिन ऐलीसा एक साफ सुथरे शीशे के नीचे स्टूल पर बैठती थी। उसके पास तस्वीरों की एक किताब थी जिसकी कीमत राजा के आधे राज्य के बराबर थी।

सब बच्चे बहुत खुशी खुशी रह रहे थे पर उनकी यह खुशी बहुत दिनों तक नहीं रही।

कुछ दिन बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली। उनकी नयी माँ एक बहुत ही बुरी स्त्री थी। वह राजा के बच्चों को ठीक से नहीं रखती थी। बच्चों ने यह बात पहले दिन से ही जान ली थी।

एक दिन सारे महल में खूब खाना पीना चल रहा था। बच्चे भी मेहमानों के स्वागत में लगे हुए थे। पर उनको केक और बेक किये गये सेब के मिलने की बजाय जो ऐसी दावतों में उनको अक्सर मिला करता था उनकी नयी सौतेली माँ ने उनको प्याले में रेत भर कर दे दिया। और उनसे कहा कि वे उसको खास खाना समझ कर खायें। बच्चों को यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा।

अगले हफ्ते रानी ने ऐलीसा को एक गाँव में कुछ किसानों के साथ रहने के लिये भेज दिया। और इस बीच उसने राजा को बच्चों के बारे में कुछ झूठी बातें कह कर उसका मन ऐसा कर दिया कि राजा का मन अपने बच्चों से फिर गया।

एक दिन रानी ने राजकुमारों से कहा — “जाओ, तुम लोग बड़ी चिड़िया बन कर उड़ जाओ जिसकी आवाज नहीं होती और जा कर अपनी रोजी रोटी अपने आप कमाओ। ”

पर वह राजकुमारों को इतना नुकसान नहीं पहुँचा सकी जितना कि वह चाहती थी। क्योंकि उसके यह कहते ही वे बहुत ही खूबसूरत 11 सफेद हंसों में बदल गये और एक अजीब सी आवाज के साथ महल की खिड़की से बाहर बागीचे के पार जंगल में उड़ गये।

अभी सुबह होने में देर थी और ऐलीसा अभी सो ही रही थी कि वे हंस उसकी झोंपड़ी के ऊपर से उड़े जहाँ वह रह रही थी। वे उसकी झोंपड़ी की छत पर उतर गये।

वहाँ उन्होंने अपनी लम्बी गरदन को इधर उधर घुमाया, अपनी चोंचों से उस झोंपड़ी की छत को खुरचा, अपने पंख फड़फड़ाये पर न तो उनको किसी ने देखा और न ही उनको किसी ने सुना।

सो वे बेचारे फिर आसमान में ऊपर बादलों में उड़ गये और दुनिया में दूर चले गये। उड़ते उड़ते वे एक बड़े से घने जंगल में आ गये जो समुद्र तक फैला चला गया था।

ऐलीसा बेचारी वहीं किसान की झोंपड़ी में रहती और एक हरी पत्ती से पीकेबू खेलती रहती क्योंकि उसके पास खेलने के लिये और कोई चीज़ ही नहीं थी।

वह पत्ते में एक छेद बना लेती और उस छेद में से सूरज को देखती। उस छेद में से सूरज को देख कर उसको ऐसा लगता जैसे वह अपने भाइयों की चमकीली आँखें देख रही हो।

और जब भी सूरज की गरम किरणें उसके गालों को छूतीं तो उसको लगता जैसे उसके भाई उसको प्यार कर रहे हों।

एक दिन हवा चली और उसने उस झोंपड़ी के चारों तरफ लगी गुलाब के पौधों की दीवार पर लगे गुलाबों को हिला दिया और उनके कान में फुसफुसायी — “तुमसे ज़्यादा सुन्दर और कौन हो सकता है?”

फूल अपना सिर ना में हिला कर बोले “हम नहीं, ऐलीसा। ”

इतवार को जब उस किसान की पत्नी दरवाजे में बैठी साम्स की किताब पढ़ रही थी तो हवा ने उसकी किताब के पन्ने उड़ाये और उससे पूछा — “तुमसे बड़ा संत और कौन हो सकता है?”

वह किताब भी बोली “मैं नहीं, ऐलीसा। ”

गुलाबों ने भी कहा कि यह किताब बिल्कुल सच कह रही है।

ऐलीसा को जब वह 15 साल की हो जाती तब घर वापस जाना था पर रानी ने देखा कि वह तो बहुत ही सुन्दर राजकुमारी होती जा रही थी तो उसके मन में राजकुमारी के लिये और ज़्यादा नफरत पैदा हो गयी।

उसको उस बच्ची को भी हंस में बदलने में कोई हिचक नहीं हुई जैसे कि उसने उसके भाइयों को बदला था। पर वह यह काम उसी समय नहीं कर सकती थी क्योंकि राजा अपनी बेटी को देखना चाहता था।

सो सुबह सवेरे ही रानी अपने संगमरमर के बने कमरे में नहाने के लिये गयी जिसमें बहुत कीमती कालीन बिछा हुआ था और गद्दियाँ पड़ी हुईं थीं। व

हाँ वह अपने साथ तीन मेंढक ले गयी और उनको चूम कर उनमें से एक मेंढक से बोली — “जब ऐलीसा नहाये तो तुम उसके सिर पर बैठ जाना जिससे वह तुम्हारे जैसी आलसी हो जाये। ”

फिर वह दूसरे मेंढक से बोली — “तुम ऐलीसा के माथे पर बैठ जाना ताकि वह उतनी ही बदसूरत हो जाये जितने तुम खुद हो। ”

फिर वह तीसरे मेंढक से बोली — “तुम उसके दिल के ऊपर बैठ जाना ताकि उसके मन में हमेशा बुरी बुरी इच्छाएँ उठती रहें। ”

उसके बाद रानी ने वे तीनों मेंढक साफ पानी में छोड़ दिये। पानी में पड़ते ही वे मेंढक हरे रंग के हो गये। फिर उसने ऐलीसा को बुलाया और उसको कपड़े उतार कर नहाने के लिये जाने के लिये कहा।

जब ऐलीसा पानी में घुसी तो एक मेंढक उसके बालों से चिपक गया, दूसरा मेंढक उसके माथे से चिपक गया और तीसरा मेंढक उसके दिल पर बैठ गया। पर ऐलीसा को इसका पता ही नहीं चला।

जब वह नहा कर खड़ी हुई तो तीन लाल रंग के पौपी के फूल पानी में तैर गये। अगर वे मेंढक जहरीले न हुए होते और उस जादूगरनी ने न चूमे होते तो वे लाल गुलाब बन गये होते। पर वे उसका माथा और दिल छू कर कम से कम फूलों में तो बदल गये।

ऐलीसा इतनी ज़्यादा भोली थी कि रानी की जादूगरी भी उसके ऊपर असर नहीं कर पायी।

जब रानी ने यह महसूस किया कि उसकी जादूगरी बेकार गयी तो उसने ऐलीसा के शरीर पर अखरोट का रंग मल दिया जिससे उसका शरीर गहरे कत्थई रंग का हो गया।

उसके चेहरे पर एक गन्दी सी क्रीम का लेप कर दिया और उस के बाल बिगाड़ दिये। अब सुन्दर ऐलीसा को कोई नहीं पहचान सकता था।

फिर वह उसको राजा के पास ले गयी तो राजा तो उसको देख कर दंग रह गया। राजा ने उसको देखते ही कहा कि यह मेरी बेटी नहीं हो सकती।

उसको पहरा देने वाले कुत्ते और चिड़ियों के अलावा और कोई नहीं जानता था। और वे सब बहुत ही नम्र थे सो वे कुछ कह नहीं सकते थे।

यह सब देख कर बेचारी ऐलीसा रो पड़ी और अपने भाइयों को याद करने लगी जो अब सब बहुत दूर थे। भारी दिल से वह महल से बाहर निकल आयी और सारा दिन वह खेतों और मैदानों में घूमती रही।

घूमते घूमते वह एक बड़े जंगल में आ निकली। वह नहीं जानती थी कि अब वह कहाँ जाये। वह बहुत दुखी थी और बस उसकी यही इच्छा थी कि काश उसके भाई उसके पास होते।

उसको लगा कि लगता है वे भी उसी की तरह से महल से बाहर निकाल दिये गये होंगे सो उसने तय किया कि वह उनको ढूँढ कर ही रहेगी।

वह अभी कुछ ही देर जंगल में ठहरी थी कि रात होने लगी। उसको लगा कि वह रास्ता भूल गयी थी। सो उसने अपनी रात की प्रार्थना की और एक जगह मुलायम सी घास देख कर उस पर लेट गयी। उसने एक पेड़ की लकड़ी का तकिया बना लिया था।

सब कुछ शान्त था। हवा बहुत ही धीरे बह रही थी। बहुत सारे पटबीजने इधर उधर घास में चमक रहे थे। वह जल्दी ही सो गयी। सारी रात वह अपने भाइयों के ही सपने देखती रही।

सपने में उसने देखा कि जैसे वे सब फिर से बच्चे बन गये हैं। आपस में खेल रहे हैं। अपनी हीरों की कलम से सोने की स्लेटों पर लिख रहे हैं। और वह अपनी तस्वीरों की किताब देख रही है। उसमें छपी हुई हर तस्वीर उसको जानदार दिखायी दे रही थी।

जब वह सुबह उठी तो सूरज बहुत देर का निकल आया था। पहले तो उसको साफ साफ दिखायी नहीं दिया क्योंकि पेड़ की शाखों का साया उसकी आँखों पर पड़ रहा था। पर फिर बाद में ठीक हो गया। चिड़ियें भी उसके पास आ कर उसके कन्धे पर बैठ गयीं।

तभी उसको पानी में छपाकों की आवाज आयी। वह आवाज वहाँ के एक तालाब में से आ रही थी जिसमें कई झरनों से पानी गिर रहा था। उसकी तली में बहुत सुन्दर रेत पड़ी हुई थी।

हालाँकि उस तालाब के चारों तरफ घनी झाड़ियाँ लगी हुई थीं फिर भी किसी हिरन ने पानी के पास तक जाने के लिये एक छोटा सा रास्ता बना लिया था। ऐलीसा उस रास्ते से हो कर पानी तक जा सकती थी।

उस तालाब का पानी इतना साफ था कि अगर हवा से पानी न हिल रहा हो तो उसमें पड़े पेड़ों के साये ऐसे लग रहे थे जैसे तालाब की तली में किसी ने कोई तस्वीर बना दी हो। उसमें पेड़ों की हर पत्ती का साया बहुत साफ था।

वह उस रास्ते से हो कर तालाब तक गयी और पानी में अपना चेहरा देखा तो वह तो उसे देख कर बहुत डर गयी – कितना कत्थई और कितना बदसूरत।

पर जैसे ही उसने अपना पतला सा हाथ पानी में डाल कर उस पानी से अपनी भौंहें और आँखें साफ कीं तो उसका गोरा रंग फिर से वापस आ गया। यह देख कर उसने कपड़े उतारे और उस साफ पानी में कूद गयी।

सारी दुनिया में राजा की बेटी ऐलीसा जैसी सुन्दर और कोई लड़की नहीं थी। नहा धो कर वह पानी से बाहर आयी। उसने अपने कपड़े पहने। फिर अपने लम्बे बालों की चोटी बनायी। वहाँ से वह एक झरने पर गयी और दोनों हाथों से ले कर ठंडा पानी पिया।

वह फिर जंगल में इधर उधर बिना मतलब के घूमती रही। वह बस अपने भाइयों और भगवान के बारे में ही सोचती रही कि भगवान उसको ऐसे ही नहीं छोड़ देगा। वही तो है जो भूखों के लिये खट्टे सेब उगाता है।

फिर वह एक पेड़ की तरफ चली गयी जिसकी डालियाँ फलों से लदी नीचे को झुकी जा रही थीं। वहाँ से फल खा कर वह फिर जंगल की तरफ चल दी।

आगे चल कर वह एक बड़ी शान्त जगह पहुँच गयी। वहाँ एक चिड़िया भी नहीं थी। सूरज की एक किरन भी जंगल के पेड़ों की घनी डालियों मे से हो कर जमीन तक नहीं आ रही थी।

बहुत जल्दी ही वहाँ रात हो गयी और वह भी बहुत अँधेरी रात। रात को सो कर वह सुबह को फिर चल दी।

आगे जा कर राजकुमारी को एक बुढ़िया मिली जिसके पास बैरीज़ की एक टोकरी थी। उसने उसको कुछ बैरीज़ दीं तो उसने उस बुढ़िया से पूछा कि क्या उसने 11 राजकुमारों को जंगल से जाते हुए देखा है।

बुढ़िया बोली — “मैंने 11 राजकुमारों को तो नहीं देखा पर हाँ 11 सफेद हंसों को जरूर देखा है जो सुनहरे ताज पहने हुए थे। वे एक नदी में तैर रहे थे। वह नदी यहाँ से पास में ही है। ”

कह कर वह बुढ़िया ऐलीसा को एक छोटी सी पहाड़ी की चोटी पर ले गयी। वहाँ से फिर वे दोनों नीचे उतर गये। नीचे उतरते ही नदी थी और नदी के दोनों तरफ पेड़ लगे हुए थे।

वहाँ ऐलीसा ने बुढ़िया को गुड बाई कहा और वह नदी के नीचे की तरफ चल दी जिधर वह समुद्र की तरफ जा रही थी। ऐलीसा ने देखा कि उसके सामने बहुत बड़ा समुद्र पड़ा हुआ था पर उसमें एक भी नाव या जहाज़ नहीं था। तो वह उसको कैसे पार करे।

किनारे पर अनगिनत पत्थर और लोहे के छोटे छोटे टुकड़े पड़े थे जिनको समुद्र का पानी किनारे पर डाल गया था। उसने सोचा कि एक दिन यह समुद्र का पानी जैसे वे पत्थर यहाँ डाल गया है उसी तरह से वह उसको भी उसके भाइयों के पास ले जायेगा।

वहाँ समुद्री घास भी उगी हुई थी। वहाँ उसको सफेद हंसों के कुछ पंख मिल गये तो वह उसने इकठ्ठे कर लिये। उन पर अभी भी पानी की बूँदें थीं पर वे बूँदें पानी की थीं या फिर आँसू की यह नहीं कहा जा सकता। ऐलीसा वहीं बैठ गयी और बहुत देर तक समुद्र को देखती रही।

शाम को उसको 11 सफेद हंस दिखायी दिये जिनके सिर पर सुनहरे ताज रखे हुए थे। वे उड़तेे हुए किनारे की तरफ ही आ रहे थे। जब वे एक के पीछे एक उड़ रहे थे तो वे ऐसे लग रहे थे जैसे आसमान में कोई सफेद रिबन उड़ा चला आ रहा हो।

ऐलीसा वहाँ से उठ कर एक झाड़ी के पीछेे छिप गयी। हंस वहीं तक आ गये जहाँ ऐलीसा छिपी हुई थी।

जब सूरज समुद्र के नीचे जा रहा था तो उन हंसों ने अपने अपने पंख उतार दिये और अब वहाँ 11 सुन्दर राजकुमार खड़े थे। वे उसके भाई थे। हालाँकि उनकी शक्लें काफी बदल गयी थीं पर फिर भी उसको पूरा विश्वास था कि वह उनको पहचानने में गलती नहीं कर सकती।

उनको देख कर वह रोती हुई अपनी जगह से निकली और अपने सारे भाइयों का अलग अलग नाम लेते हुए उनकी बाँहों में जा कर गिर गयी। वे अपनी छोटी बहिन को देख कर बहुत खुश हुए। वे भी अपनी बहिन को पहचान गये थे हालाँकि वह भी अब लम्बी और सुन्दर हो गयी थी।

वे रो रहे थे, वे हँस रहे थे। उनको तुरन्त ही पता चल गया कि उनकी सौतेली माँ ने उन सबके साथ बहुत बेरहमी का बरताव किया है।

बड़े भाई ने अपनी बहिन को बताया — “हम सब जब तक सूरज आसमान में है तब तक जंगली हंस के रूप में उड़ने के लिये मजबूर किये गये। और जब सूरज डूब जाता है तब हम आदमी के रूप में आ सकते हैं।

इसलिये जब सूरज डूबने वाला होता है तो हमको यह देखना पड़ता है कि हम किसी ऐसी जगह के आस पास हो जहाँ हम खड़े हो सकें। क्योंकि अगर उस समय हम आसमान में हुए तो हमारे नीचे गिर जाने का डर है।

हम लोग यहाँ इस किनारे पर नहीं रहते। इस समुद्र के उस पार एक और जमीन है जो इतनी ही अच्छी है वहाँ रहते हैं और वहाँ पहुँचने के लिये हमें इस समुद्र को पार करना पड़ता है।

हमारे इस रास्ते पर कोई ऐसा टापू नहीं है जहाँ हम रात बिता सकें। बस एक छोटी सी चट्टान है जो समुद्र के बीच में उठी हुई है। वह चट्टान भी इतनी बड़ी नहीं है जो हम सबको जगह दे सके।

हाँ अगर हम बहुत ही पास पास खड़े हों तब हम उसके ऊपर आराम कर सकते हैं। पर अगर समुद्र में तूफान आने लगे तब वहाँ बहुत मुश्किल हो जाती है पर फिर भी वह हमारे लिये एक सहारा तो है ही।

जब हम अपनी आदमी की शक्ल में होते हैं तब हम वहाँ आराम करते हैं। बिना उस चट्टान के हम अपने घर कभी नहीं आ सकते हैं क्योंकि हमको यहाँ आने के लिये साल के दो सबसे ज़्यादा लम्बे दिन लगते हैं।

हमको यहाँ अपनी जमीन पर साल में केवल एक बार आने की और केवल 11 दिन रहने की ही इजाज़त है।

जब हम इस जंगल के ऊपर से उड़ते हैं तो अपना महल देख लेते है जहाँ हमारे पिता रहते हैं और जहाँ हम पैदा हुए थे। यहाँ से हम अपने उस चर्च की ऊँची मीनार भी देख सकते हैं जहाँ हमारी माँ सोयी हुई है।

यह बहुत अच्छा हुआ कि हमने तुमको यहाँ देख लिया। हम यहाँ दो दिन ज़्यादा रह सकते हैं पर उसके बाद हमको अपनी जमीन पर चले जाना चाहिये जो हमारी तो नहीं है पर ठीक है।

पर हम तुमको अपने साथ कैसे ले जायें क्योंकि न तो हमारे पास कोई जहाज़ है और न ही कोई नाव। ”

ऐलीसा बोली — “पर मैं तुमको इस जादू से कैसे आजाद कराऊँ?”

वे लोग बस कुछ ही देर सोये होंगे वरना तो उनकी सारी रात यही सब बात करते करते बीत गयी।

सुबह को ऐलीसा की आँख हंसों के पंख के फड़फड़ाने से खुली। उसके सब भाई सुबह होते ही हंस बन चुके थे और वे सब ऊपर आसमान में उड़ रहे थे। उसके बाकी सब भाई तो चले गये पर उसका सबसे छोटा भाई उसी के पास रह गया।

वह उसकी गोद में सिर रख कर लेटा हुआ था और वह उसके पंख सहला रही थी। उन दोनों ने सारा दिन साथ साथ बिताया। शाम को उसके दूसरे भाई भी वापस आ गये। जब सूरज डूब गया तो उसके सभी भाई फिर से आदमी बन गये।

उसका एक भाई बोला — “कल हम लोग चले जायेंगे और फिर एक साल तक नहीं आयेंगे। पर हम तुमको यहाँ ऐसे भी नहीं छोड़ सकते। क्या तुम हमारे साथ चलने की हिम्मत रखती हो?

जब मेरी बाँहें इतनी मजबूत हैं कि वह तुमको जंगल के उस पार तक ले जा सकती हैं तो हमारे पंख भी इतने मजबूत होने चाहिये जो हम तुमको समुद्र पार ले जा सकें। ”

ऐलीसा बोली — “हाँ हाँ क्यों नहीं। तुम मुझे अपने साथ ले चलो। मैं तुम्हारे साथ चलने के लिये तैयार हूँ। ”

वह सारी रात उन सबने एक जाल बनाने में गुजार दी। उन्होंने वह जाल काफी बड़ा और मजबूत बनाया। ऐलीसा उस जाल में लेट गयी और जब सुबह हो गयी तो उसके भाई फिर से हंस बन गये।

उन्होंने अपनी चोंचों में उस जाल को उठाया और अपनी बहिन को ले कर आसमान में उड़ चले ऐलीसा अभी भी सो रही थी। जब सूरज की रोशनी उसकी आँखों पर पड़ी तो एक हंस उसके ऊपर ऐेसे उड़ा जिससे उसकी आँखों पर सूरज की रोशनी न पड़े।

वे अभी किनारे से बहुत दूर ही थे कि ऐलीसा की आँख खुल गयी। उसको लगा कि जैसे वह सपना देख रही है – समुद्र के ऊपर आसमान में उड़ना। उसके बराबर में ही उसके खाने के लिये पकी हुई बैरीज़ की एक शाख और कुछ मीठी जड़ें रखी हुई थी।

उसके सबसे छोटे भाई ने उसके लिये उनको इकठ्ठा किया था और उनको उसके लिये वहाँ रख दिया था। उसको यह भी पता चल गया था कि वही उसकी आँखों को सूरज की धूप से बचाने के लिये उसके सिर के ऊपर उड़ रहा था।

वे लोग हवा में सारा दिन तीर की तरह से उड़ते रहे। पर क्योंकि वे अपनी बहिन को ले जा रहे थे इसलिये वे पहले के मुकाबले में बहुत धीरे उड़ पा रहे थे। रात होने वाली थी और तूफान आने वाला था।

ऐलीसा सूरज डूबता देख कर डर गयी क्योंकि वह समुद्र के बीच की चट्टान जिसका उसके भाइयों ने जिक्र किया था उसको कहीं दिखायी ही नहीं दे रही थी।

उसको ऐसा लगा कि हंसों के पंख और बहुत ज़ोर ज़ोर से चलने लगे हैं। उसको इस बात का भी बहुत अफसोस हुआ कि उसकी वजह से वे जल्दी नहीं उड़ पा रहे हैं।

सूरज जल्दी ही डूब जायेगा और वे हंस से फिर आदमी बन जायेंगे। और आदमी बन जायेंगे तो वे समुद्र में गिर जायेंगे और डूब जायेंगे।

उसने दिल से भगवान की प्रार्थना करनी शुरू कर दी पर फिर भी कोई भी चट्टान उसको कहीं भी नजर नहीं आ रही थी।

काले काले बादल घिरते चले आ रहे थे और चलती हुई तेज़ हवाएँ बता रहीं थीं कि जल्दी ही तूफान भी आने वाला है। बादल बहुत तेज़ी से इधर उधर दौड़ रहे थे। बिजली भी चमकना शुरू हो गयी थी। तभी सूरज समुद्र के किनारे को छूने वाला था।

उसी समय हंसों ने नीचे की तरफ बहुत ज़ोर से उड़ान भरी। ऐलीसा को लगा कि वे हंस नीचे गिर रहे हैं सो उसका दिल बहुत ज़ोर से धड़का। पर वे बीच में ही रुक गये।

सूरज समुद्र में आधा डूब गया था कि तभी ऐलीसा को समुद्र में वह चट्टान दिखायी दी। ऊपर से वह चट्टान पानी में से बाहर निकलते हुए एक सील मछली के सिर जितनी बड़ी दिखायी दे रही थी।

सूरज बहुत तेज़ी से नीचे जा रहा था। वह अब एक सितारे जितना बड़ा दिखायी दे रहा था कि उसके पैरों ने जमीन छुई। उसने देखा कि उसके भाई भी हाथ में हाथ डाले उसके पास खड़े हुए थे। उन लोगों के लिये बस वह ठीक जगह थी।

समुद्र की लहरें उस चट्टान से टकरा टकरा कर उनके ऊपर पानी डाल रही थीं। बार बार बिजली चमक जाती थी। तब भाई बहिन ने मिल कर एक साम्स गाया जिसने उनको तसल्ली और हिम्मत दी।

अगले दिन सुबह हवा शान्त थी। जैसे ही सूरज निकला ऐलीसा के भाई फिर से हंस बन गये थे सो वे ऐलीसा को ले कर फिर उड़ चले। नीचे समुद्र में अभी भी ऊँची ऊँची लहरें उठ रही थीं और उन पर बहुत सारे हंस तैर रहे थे।

जब सूरज थोड़ा और ऊपर उठा तो ऐलीसा को एक पहाड़ी जगह दिखायी दी जिसकी चोटियाँ उसको हवा में तैरती नजर आ रही थीं। वे चोटियाँ बरफ से ढकी हुई थीं और उनके बीच में एक किला था जो करीब करीब एक मील लम्बा था।

नीचे बहुत सारे पाम के पेड़ लगे हुए थे और किसी चक्की के पाट जितने बड़े बहुत सारे रंगों के बहुत सारे फूल खिले हुए थे। ऐलीसा ने अपने भाइयों से पूछा कि क्या यही वह जगह थी जहाँ उनको आना था। उन्होंने कहा “नहीं। ”

वास्तव में उसने जो देखा वह फ़ैटा मौरगैना का हमेशा जगह बदलता हुआ महल था। उसमें धरती का कोई भी आदमी जाने की हिम्मत नहीं कर सकता था।

ऐलीसा ने जब दोबारा उस तरफ देखा तो वह किला, पाम के पेड़, फूल सभी कुछ उसको गायब होता नजर आया। उसकी जगह अब वहाँ 20 शानदार चर्च खड़े थे – सब एक से और सबकी खिड़कियाँ नुकीली।

जब वह उनके और पास आयी तो वे जहाज़ी बेड़ा बन गये और जब उसने उनकी तरफ दोबारा देखा तो वहाँ कोहरे के अलावा और कुछ भी नहीं था।

इस तरह से नयी नयी चीज़ें देखते हुए आखिर में वे उस जमीन पर आ गये जहाँ उनको आना था। वहाँ नीले नीले सुन्दर पहाड़ खड़े हुए थे जिन पर सीडर के पेड़ लगे हुए थे और वहाँ कई सारे शहर ओैर महल थे।

वे लोग वहाँ शाम होने से बहुत पहले ही पहुँच गये थे और एक पहाड़ के पास एक गुफा में बैठ गये थे जिसमें बड़ी बड़ी बेलें इतनी घनी फैली हुई थीं कि लगता था जैसे उस गुफा में हरा हरा कालीन बिछा हो।

ऐलीसा के सबसे छोटे भाई ने उसको उसके सोने की जगह दिखायी और बोला — “अब देखते है कि यहाँ तुम क्या सपने देखती हो। ”

वह तुरन्त बोली — “काश मैं सपने में यह देख सकूँ कि मैं तुम सबको कैसे आजाद कराऊँ। ” इस बारे में वह इतना ज़्यादा सोचती रही और भगवान से प्रार्थना करती रही कि वह यह सब सपने में भी करती रही।

जब वह वहाँ सो गयी तो उसको लगा कि वह अकेली ही फ़ैटा मौरगैना के बादलों के महल के ऊपर उड़ रही है।

वहाँ उसको एक परी मिली जो बहुत गोरी और सुन्दर थी। फिर भी उसकी शक्ल उस बुढ़िया से मिलती थी जो उसको जंगल में मिली थी और जिसने उसको बैरीज़ दी थीं और उन हंसों के बारे में बताया था जो सोने का ताज पहने थे।

परी बोली — “तुम्हारे भाई आजाद हो सकते हैं पर उसके लिये क्या तुम्हारे पास हिम्मत है? यह सच है कि वह समुद्र का पानी जो पत्थरों की शक्ल बदल सकता है तुम्हारे हाथों से ज़्यादा मुलायम है पर तुम्हारे हाथ जो दर्द महसूस कर सकते हैं वह दर्द वह पानी महसूस नहीं कर सकता। क्योंकि उसके तो दिल ही नहीं है जो वह गुस्सा या दिल में दर्द महसूस कर सके जो तुम कर सकती हो।

तुम मेरे हाथ में यह काटने वाला नैटिल देख रही हो? ऐसे बहुत सारे नैटिल के पौधे उस गुफा के आस पास उगे हुए हैं जहाँ तुम सोती हो।

पर याद रखना कि तुमको केवल वही पौधे इस्तेमाल करने हैं जो चर्च के कम्पाउंड में कब्रों के ऊपर उगे हुए हैं। सो तुम उन्हीं को इकठ्ठा करो। हालाँकि उससे तुम्हारे हाथ जलने लगेंगे और उनमें छाले पड़ जायेंगे।

उन नैटिल के पौधों को अपने पैरों से कुचलना तो उसमें से रुई जैसी चीज़ निकलेगी। उस रुई को तुम कातना और उसके धागे से लम्बी बाँह वाली 11 शाही कमीजें बनाना।

एक बार जब तुमने ये 11 कमीजें बना कर अपने भाइयों के ऊपर फेंक दीं तो उनके ऊपर किया हुआ जादू टूट जायेगा।

एक बात तुम और ध्यान में रखना कि तुमको इस काम में चाहे कई साल लग जायें पर जब से भी तुम इस काम को शुरू करो और जब तक खत्म करो तुम बोलना नहीं।

जैसे ही तुम एक शब्द बोली तो वह तुम्हारे भाइयों के दिल में चाकू की तरह से लगेगा। इस तरह उनकी ज़िन्दगी तुम्हारी जबान में है। जो भी मैंने तुमसे कहा है वह सब तुम याद रखना। ”

फिर परी ने ऐलीसा के हाथ से नैटिल छुआयी तो उसने ऐलीसा के हाथ में जलन पैदा कर दी जिससे वह जाग गयी।

दिन निकले काफी देर हो चुकी थी। उसने देखा कि जैसे नैटिल के पौधे उसने सपने में देखे थे वैसे ही पौधे उसके चारों तरफ बहुतायत से लगे हुए थे जहाँ वह सो रही थी। उसने घुटने के बल बैठ कर भगवान को धन्यवाद दिया और वहाँ से उठ कर अपना काम शुरू करने चल दी।

उसने अपने कोमल हाथों से उन नैटिल के पौधों से वह काँटों वाली नैटिल चुनी जो चर्च के कम्पाउंड में कब्रों के ऊपर उगे हुए हैं।

नैटिल चुनते समय उसने उसके हाथों पर बड़े बड़े छाले डाल दिये पर उसने वह सब इस आशा में सह लिया कि वह अपनी प्यारे भाइयों को अपनी सौतेली माँ के जादू से आजाद करा सकेगी।

उसने नैटिल के हर पौधे को अपने नंगे पैरों से कुचला और उससे निकली हुई हरी रुई को काता।

जब उसके भाई शाम को घर लौटे तो वे यह देख कर चिन्ता में पड़ गये कि उनकी बहिन तो बोल ही नहीं रही थी। उनको लगा कि यह कहीं उनकी सौतेली माँ का डाला हुआ कोई नया जादू तो नहीं है।

पर जब उन्होंने उसके हाथ देखे तो वे समझ गये कि वह उनको आजाद करने के लिये ही यह सब कर रही थी। सबसे छोटा भाई तो बहिन के हाथों को देख कर रो ही पड़ा।

पर आश्चर्य की बात ऐलीसा के शरीर पर जहाँ जहाँ उसके आँसू गिरे वहाँ वहाँ से उसका दर्द भी खत्म हो गया और उसके छाले भी ठीक हो गये।

वह रात भर करवटें बदलती रही क्योंकि उसको चैन ही नहीं था जब तक वह अपने भाइयों को उस जादू से आजाद नहीं करा लेती।

अगले दिन जब उसके भाई वहाँ से चले गये तो वह सारा दिन अकेली बैठी रही पर समय इससे पहले कभी इतनी जल्दी नहीं भागा था।

उसकी एक कमीज बन गयी थी और अब वह दूसरी कमीज बनाने बैठी। तभी उसने पहाड़ पर शिकारी बिगुल बजने की आवाज सुनी।

वह आवाज सुन कर वह डर गयी क्योंकि वह आवाज तो उसके पास ही आती जा रही थी और फिर उसने शिकारी कुत्तों के भौकने की आवाज सुनी। डर कर वह अपना सामान ले कर गुफा के अन्दर भागी और जा कर उस गठरी पर बैठ गयी जिसमें नैटिल रखी हुई थी।

तभी पास की एक झाड़ी में से एक बड़ा सा शिकारी कुत्ता भागता हुआ आया। उसके पीछे एक और कुत्ता था और उसके पीछे एक और कुत्ता था। उन कुत्तों के पीछे पीछे भागते भागते कुछ ही देर में शिकारी भी वहीं आ कर इकठ्ठे हो गये।

इन शिकारियों में से सबसे सुन्दर शिकारी था वहाँ का राजा। वह ऐलीसा के पास आया। राजा ने इतनी सुन्दर लड़की पहले कभी नहीं देखी थी। उसने ऐलीसा से पूछा — “बच्ची, तुम यहाँ कैसे आयीं?”

ऐलीसा ने ना में अपना सिर हिला दिया क्योंकि वह बोल नहीं सकती थी। क्योंकि उसके भाइयों की आजादी और ज़िन्दगी इसी बात पर आधारित थी कि वह न बोले। उसने अपने हाथ भी अपने ऐप्रन के पीछे छिपा लिये ताकि राजा यह न देख ले कि वह कितने कष्ट में थी।

राजा को उसको इस तरह वहाँ अकेले बैठे देख कर उसके ऊपर तरस आ गया। वह बोला — “चलो, तुम मेरे साथ चलो। मैं तुमको यहाँ इस तरह से अकेले नहीं छोड़ सकता। तुम यहाँ इस तरीके से नहीं रह सकतीं।

अगर तुम इतनी ही अच्छी हो जितनी तुम सुन्दर हो तो मैं तुमको रेशम और मखमल के कपड़े पहनाऊँगा, तुम्हारे सिर पर सोने का ताज रखूँगा और तुमको अपने सबसे अच्छे महल में रखूँगा। ”

इतना कह कर राजा ने उसको उठा कर अपने घोड़े पर बिठा लिया। यह सब देख कर ऐलीसा रो पड़ी और अपने हाथ मलने लगी तो राजा बोला — “मेरी तो बस यही इच्छा है कि तुम खुश रहो। देखना, एक दिन तुम इस सबके लिये मुझे धन्यवाद दोगी। ”

और वह उस लड़की को अपने घोड़े पर अपने आगे बिठा कर घोड़े को पहाड़ों में से हो कर दौड़ाता हुआ चला गया। उसके शिकारी लोग उसके पीछे आ रहे थे। शाम तक वह अपने महल पहुँच गया।

राजा उसको अपने महल में ले गया जहाँ संगमरमर के ऊँचे ऊँचे कमरों में बहुत सुन्दर शानदार फव्वारे चल रहे थे। और जहाँ छतें और दीवारें दोनों ही तस्वीरों से सजी हुई थी। पर राजकुमारी ने इनमें से किसी की तरफ नहीं देखा। वह तो बस रोती रही और दुखी होती रही।

महल में पहुँच कर स्त्र्यिों ने उसको शाही कपड़े पहनाये, उसके बालों में मोती गूँथे और उसके छालों भरे हाथों में बहुत ही मुलायम दस्ताने पहनाये। ये सब पहन कर वह इतनी सुन्दर लग रही थी कि राजा का सारा दरबार उसके सामने बहुत नीचे तक झुक रहा था।

फिर राजा ने उससे शादी करने का विचार किया हालाँकि पादरी ने राजा से कहा भी कि जंगल में पायी जाने वाली यह लड़की जादूगरनी भी हो सकती है जिसने राजा की आँखों पर परदा डाल दिया हो और पलक झपकते ही उसका दिल चुरा लिया हो।

पर राजा ने उसकी एक न सुनी और हुकुम दिया कि संगीत बजाया जाये, बढ़िया बढ़िया खाने लगाये जायें और सुन्दर सुन्दर लड़कियाँ वहाँ नाच करें।

लड़की को खुश करने के लिये उसको खुशबूदार बागीचों में घुमाने के लिये ले जाया गया, शानदार कमरे दिखाये गये पर कोई भी चीज़ उसके होठों पर मुस्कुराहट और आँखों में चमक न ला सकी। भाइयों के दुख ने उसकी हर खुशी पर ताला लगा रखा था।

अन्त में राजा ने उसके सोने वाले कमरे के साथ लगा एक छोटे से कमरे का दरवाजा खोला। वह कमरा उसकी गुफा की तरह से हरे रंग की कढ़ाई के काम से भरा हुआ था और बिल्कुल वैसा ही लग रहा था जैसी कि उसकी वह गुफा थी जहाँ से वह उसको ले कर आया था।

उस कमरे के फर्श पर नैटिल की रुई की एक गठरी पड़ी हुई थी जिससे वह उसका सूत कात रही थी। और उस कमरे की छत से वह कमीज लटक रही थी जो उसने खत्म कर ली थी। उसका एक शिकारी उत्सुकतावश उसकी वे चीजें, वहाँ से उठा लाया था।

राजा बोला — “यहाँ बैठ कर तुमको लगेगा कि तुम अपनी पुरानी जगह बैठी हुई हो। यह वह तुम्हारा काम है जो तुम वहाँ कर रही थीं। इन सबके बीच में तुमको वहीं बैठे रहने का आनन्द मिलेगा। ”

जब ऐलीसा ने वह सब चीज़ें देखीं जो उसके लिये बहुत कीमती थीं तो एक मुस्कुराहट उसके होठों पर दौड़ गयी। उसके चेहरे की लाली लौट आयी।

उसकी यह आशा वापस आ गयी कि अब वह अपने भाइयों को उस जादू से आजाद करा सकेगी जो उसकी सौतेली माँ ने उसके भाइयों के ऊपर डाला था और इस खुशी में उसने राजा के हाथ चूम लिये।

राजा ने भी उसको अपने सीने से लगा लिया और यह घोषणा करने का हुकुम दिया कि उनकी शादी की तैयारी की जाये। सो जंगल से लायी गयी देश की एक गूँगी लड़की देश की रानी बनने वाली हो गयी।

चर्च के पादरी ने राजा के कान में फिर से उसकी कुछ बुराई की लेकिन राजा ने फिर से उसको अनसुना कर दिया और अब तो उन दोनों की शादी होने वाली थी। पादरी को खुद अपने हाथ से उसके सिर पर ताज रखना था।

पर क्योंकि राजा ने पादरी की बात नहीं सुनी थी इसलिये गुस्से के मारे उसने ताज का गोला ऐलीसा के सिर पर थोड़ा नीचे की तरफ रख दिया जिससे उसके सिर को बड़ी तकलीफ हुई।

पर उससे भी ज़्यादा उसके दिल को तकलीफ हुई क्योंकि वह अपनी इस तकलीफ को बोल कर अपने भाइयों को दुख नहीं पहुँचाना चाहती थी इसलिये वह उस शरीर की तकलीफ को सह गयी।

वह कुछ नहीं कह सकती थी क्योंकि अगर वह एक शब्द भी बोलती तो उसके भाइयों को अपनी ज़िन्दगी से हाथ धोना पड़ता।

पर इस दयावान और सुन्दर राजा के लिये उसके मन में सच्चा प्यार था क्योंकि वह उसको खुश रखने के लिये अपने तरीके से पूरी कोशिश कर रहा था। हर दिन वह उसको ज़्यादा और ज़्यादा चाहने लगी थी।

काश वह उसमें अपने लिये विश्वास पैदा कर सकती और उसे यह बता सकती कि वह क्यों दुखी थी। पर उसको तो चुप ही रहना है और अपना काम खत्म करना है।

सो वह रात को समय निकाल कर अपने उस गुफा जैसे कमरे में जाती और वहाँ जा कर एक के बाद एक कमीज बनाती। जब वह सातवीं कमीज बना रही थी तो उसकी रुई खत्म हो गयी।

उसको मालूम था कि उसको चर्च के कम्पाउंड में कब्रों के ऊपर उगे हुई नैटिल के पौधे ही लेने चाहिये। और वह उसको अपने आप ही इकठ्ठे करने होंगे पर वह वहाँ जाये कैसे?

“मेरे दिल के दर्द के सामने मेरी उँगलियों का दर्द क्या है? मुझे यह खतरा तो लेना ही पड़ेगा। मुझे पूरा विश्वास है कि भगवान मेरा जरूर ख्याल रखेंगे। ”

यह सोच कर जैसे कोई बुरा काम करता है और उसमें उसको डर लगता है उसी तरह से डरती हुई वह दबे पाँव उठ कर लम्बे लम्बे गलियारों में से होती हुई चाँदनी में नहाये बागीचे को पार करती हुई सूनी सड़काें से होती हुई चर्च के कम्पाउंड में पहुँच गयी।

वहाँ पहुँच कर उसने देखा कि कुछ चुड़ैलें कब्र के एक बड़े से पत्थर पर बैठी थीं। उन्होंने अपने फटे कपड़े उतारे हुए थे जैसे कि वे अभी नहाने जाने वाली हों। अपनी पतली पतली उँगलियों से वे नयी बनी कब्रें खोद खोद कर खोल रहीं थीं और उनमें रखे मरे हुए शरीरों का माँस खा रही थीं।

ऐलीसा को उनके पास से गुजरना था और वे उसको देख रही थीं। सो उसने पहले एक प्रार्थना की, फिर अपने नैटिल के पौधे उखाड़े और महल वापस आ गयी।

ऐसा करते हुए उसको केवल एक आदमी ने देखा और वह था चर्च का पादरी क्योंकि जब सब लोग सो रहे थे वह जाग रहा था। जो कुछ भी उसने उस लड़की के बारे में कहा था अब उसके पास उस बात का सबूत था।

उसने सोचा रानी के साथ कुछ गड़बड़ तो थी। वह जरूर ही कोई जादूगरनी थी और इसी वजह से वह राजा और उसके लोगों को धोखा देने में सफल हो गयी थी।

अगले दिन पादरी ने राजा को चर्च में बुलाया और उसको वह सब बताया जो कुछ उसने पिछली रात देखा था और जिसका उसे डर था।

जैसे ही उसके मुँह से रानी के बारे में कड़वे शब्द निकलने शुरू हुए तो वहाँ लगी संतों की मूर्तियों ने ना में अपना सिर हिलाया जैसे वे कह रही हो कि यह आदमी झूठ बोल रहा है और ऐलीसा बिल्कुल बेकुसूर है।

पर पादरी के पास इसकी दूसरी सफाई थी। उसने कहा कि संत भी यही बात कह रहे हैं जो वह कह रहा है और वे उस लड़की की नीचता पर अपना सिर हिला रहे हैं।

यह सुन कर राजा की आखों से दो बड़े आँसू निकल कर उसके गालों पर ढुलक गये और वह भी उस लड़की पर शक करता हुआ अपने महल को चला गया।

उस रात उसने सोने का बहाना किया पर उसकी आँखों में नींद कहाँ। रात को उसने देखा कि ऐलीसा उठी।

हर रात वह ऐलीसा को उठते देखता रहा। हर बार वह चुपचाप उसका पीछा करता रहा और हर बार उसने उसको उस छोटे कमरे में गायब हो जाते हुए देखा। रोज ब रोज यह सब देख कर उसका गुस्सा बढ़ता ही गया।

ऐलीसा ने भी यह देखा कि राजा गुस्सा है पर उसकी समझ में उसकी कोई वजह नहीं आयी बल्कि उसने उसको और ज़्यादा चिन्ता में डाल दिया। इस तरह एक और चिन्ता उसकी अपने भाइयों की चिन्ता में जुड़ गयी।

यह सोच कर वह रो पड़ी और उसके आँसू उसकी शाही जामुनी पोशाक पर गिर पड़े। गिरते ही वे वहाँ हीरों की तरह चमकने लगे। और जिसने भी यह तमाशा देखा वह यही इच्छा करने लगा कि काश वह रानी होता।

इस बीच उसका काम करीब करीब खत्म हो गया था। बस एक कमीज रह गयी थी। पर फिर से उसकी वह रुई कम पड़ गयी थी सो उसको फिर से नैटिल का पौधा लेने के लिये चर्च के कम्पाउंड में जाना था।

अब उसके पास नैटिल का एक भी पौधा नहीं था। एक बार फिर से, शायद आखिरी बार, उसको चर्च के कम्पाउंड में जाना होगा और थोड़े से पौधे और लाने होंगे।

अबकी बार वह अकेले जाते में और उन चुड़ैलों से डर रही थी। पर उसकी इच्छा शक्ति और भगवान में विश्वास बहुत मजबूत थे सो वह अपना काम करने चल दी। उधर राजा और पादरी भी उसके पीछे पीछे चल दिये।

उन्होंने देखा कि वह चर्च के कम्पाउंड के लोहे के दरवाजे के अन्दर जा कर गायब हो गयी। वे भी हिम्मत करके उसके पीछे पीछे चर्च के कम्पाउंड में दाखिल हो गये तो उन्होंने देखा कि एक कब्र के एक बड़े से पत्थर पर कुछ चुड़ैलें बैठीं हैं। जैसे ऐलीसा ने उनको तब वहाँ देखा था जब वह पहली बार यहाँ आयी थी।

राजा वहाँ से वापस लौट आया क्योंकि राजा ने सोचा कि ऐलीसा भी उन्हीं में से एक होगी – वही ऐलीसा जो उस शाम उसके इतने पास बैठी हुई थी।

उसका मन उसको सजा देने का हुआ पर फिर उसने सोचा कि जनता को ही इस बात का फैसला करने दो। सो उसने जनता के सामने अपना मामला रखा तो जनता ने अपना फैसला सुनाया कि रानी को जला कर मार देना चाहिये।

इस तरह रानी को उसके शाही महल से हटा कर एक अँधेरे और सीलन भरे तहखाने में बन्द कर दिया गया। उस तहखाने में उसकी खिड़की की सलाखों में से आती हवा सीटी बजाती थी।

रेशम और मखमल का तकिया देने की बजाय उसके सिर के नीचे लगाने के लिये उसको नैटिल की एक पोटली दे दी गयी जो उसने कमीज बनाने के लिये इकठ्ठी करके रखी थी। ओढ़ने के लिये उसको नैटिल की वे कमीजें दे दी गयीं जो उसने पूरी कर ली थीं।

वह फिर से अपने काम में लग गयी और प्रार्थना करती रही। पर उसको तसल्ली देने के लिये कोई भी नहीं आया।

शाम को उसने अपनी खिड़की के पास हंसों के पंखों की फड़फड़ाहट सुनी। उसके सबसे छोटे भाई ने आखिर उसे ढूँढ ही लिया था।

वह खुशी से रो पड़ी। हालाँकि उसको पता था कि यहाँ उसकी यह आखिरी रात है क्योंकि अब उसका काम खत्म हो चुका था और उसके भाई भी यहाँ थे।

पादरी उसके आखिरी समय में उसके पास ठहरने के लिये आना चाहता था क्योंकि राजा से उसने इस बात का वायदा किया था कि कम से कम वह उसके लिये यह काम तो कर ही सकता था।

पर ऐलीसा ने ना में सिर हिला कर और इशारों से उसको मना कर दिया था कि वह उसको अपने पास नहीं आने देना चाहती थी। यह उसकी वहाँ आखिरी रात थी और आज उसको अपना काम हर हाल में खत्म करना था नहीं तो उसकी मेहनत और तकलीफ, उसके आँसू, उसकी रातों का जागना जो कुछ भी तकलीफें उसने उठायी थीं सब बेकार जातीं।

सो पादरी ऐलीसा को बुरा भला कह कर वहाँ से चला गया। पर ऐलीसा को मालूम था कि वह बेकुसूर है सो वह अपने काम में लगी रही।

कुछ छोटी छोटी चुहियें फर्श पर इधर उधर दौड़ रही थीं और उसकी सहायता कर रही थीं। वे उसको नैटिल ला ला कर दे रही थीं। एक चिड़ा भी उसकी खिड़की पर आ कर बैठ गया था और उसके लिये सारी रात गाना गाता रहा ताकि उसका अपने काम में मन लगा रहे।

अभी पौ ही फटी थी और सूरज निकलने में अभी एक घंटा बाकी था कि उसके 11 भाई महल के दरवाजे पर पहुँच गये और उन्होंने राजा से मिलने की इच्छा प्रगट की।

पर वहाँ के चौकीदारों ने उनको कहा कि यह नामुमकिन है क्योंकि अभी तो रात ही थी और राजा सो रहा था और उसको अभी जगाया नहीं जा सकता था।

उन्होंने उन चौकीदारों से प्रार्थना भी की पर जब उन्होंने उनकी प्रार्थना नहीं सुनी तो उन्होंने उनको इतनी ज़ोर से चिल्ला कर धमकी दी कि वे डर गये और राजा यह जानने के लिये बाहर निकल आया कि मामला क्या है।

पर उसी समय सूरज निकल आया और उसके भाई फिर से हंस बन कर महल के ऊपर उड़ गये।

उधर सारे शहर वाले वहाँ इकठ्ठा हो रहे थे ताकि वे रानी को जलते हुए देख सकें। ऐलीसा को एक गाड़ी में बिठा कर ले जाया जा रहा था जिसे एक बूढ़ा घोड़ा खींच रहा था।

उसको बहुत ही खुरदरे कपड़े पहनाये गये थे। उसके बाल उसके चेहरे के चारों तरफ बिखरे हुए थे। उसके चेहरे का रंग पीला पड़ा हुआ था। उसके होठ चुपचाप से प्रार्थना कर रहे थे और उसकी उँगलियाँ हरी रुई के सूत से कुछ बुन रही थीं।

उसने अपना अधूरा काम नहीं छोड़ा था वह उसको अपने साथ ही ले आयी थी। मरने के लिये जाते समय भी वह काम कर रही थी। 10 कमीजें उसके पैरों में पड़ी हुई थीं और ग्यारहवीं कमीज पर वह काम कर रही थी।

देखने वाले लोग कह रहे थे — “देखो यह क्या बुड़बुड़ा रही है। इसके पास तो साम्स की किताब भी नहीं है। लगता है कि यह वहाँ बैठी बैठी अपना कुछ जादू कर रही है। उसका वह जादू छीन लो और उसे तोड़ कर फेंक दो। ”

वे आगे बढ़ कर यह सब करने ही वाले थे कि 11 हंस आसमान से नीचे उतरे और उसकी गाड़ी के चारों तरफ गोला बना कर उड़ने लगे। भीड़ डर गयी और डर के मारे पीछे हट गयी।

बहुत से लोग फुसफुसाये — “यह तो अच्छी निशानी है। लगता है कि यह बेकुसूर है। ” पर यह बात किसी की खुल कर कहने की हिम्मत नहीं हुई। ऐलीसा की गाड़ी वहाँ पहुँच चुकी थी जहाँ उसको सजा मिलने वाली थी। सजा देने वाले ने उसका हाथ पकड़ कर उसको गाड़ी से नीचे उतारा तो जल्दी से उसने वे 11 कमीजें उन 11 हंसों के उपर फेंक दीं। वे 11 हंस तुरन्त ही 11 सुन्दर राजकुमार बन गये पर सबसे छोटे भाई की एक बाँह अभी भी हंस का पंख रह गयी थी क्योंकि उसकी कमीज की एक बाँह नहीं लग पायी थी। ऐलीसा उसको खत्म ही नहीं कर पायी थी।

उन हंसों को राजकुमारों में बदलते देख कर वह खुशी से चिल्लायी — “अब मैं बोल सकती हूँ कि मैं बिल्कुल बेकुसूर हूँ। ”

जब सब लोगों ने देखा कि वहाँ क्या हो रहा था तो सबने उसके सामने ऐसे सिर झुकाया जैसे कि वे किसी संत के आगे सिर झुकाते।

पर इतने समय में जो दुख, दर्द और गुस्सा उसने सहा था वह इतना ज़्यादा था कि अब उससे वह और नहीं सहा जा रहा था सो वह बेजान सी अपने भाइयों की बाँहों में गिर पड़ी।

उसके सबसे बड़े भाई ने कहा — “यह बेचारी तो बिल्कुल बेकुसूर है। ”

और तब उसने बताया कि क्या सब कैसे हुआ था। जब वह यह कहानी सुना रहा था तो लाखों गुलाबों की खुशबू से वहाँ की सारी हवा महक गयी।

क्योंकि जितनी लकड़ी उसको जलाने के लिये वहाँ इकठ्ठी की गयी थी सब में गुलाब के फूलों के पेड़ की जड़ें निकल आयी थीं और उनमें से शाखें निकल निकल कर उनमें लाखों लाल गुलाब के खुशबूदार फूल खिल गये थे।

उनमें सबसे ऊपर एक सफेद गुलाब सितारे की तरह चमक रहा था। राजा ने वह फूल तोड़ कर ऐलीसा के सामने की तरफ लगा दिया।

चर्च की सारी घँटिया अपने आप बजने लगीं और चारों तरफ चिड़ियें ही चिड़ियें दिखायी देने लगीं। अब तो दुलहिन महल की तरफ अपने जुलूस के साथ ऐसे जा रही थी जैसे किसी राजा ने किसी भी दुलहिन को इस तरह से जाते हुए इससे पहले कभी नहीं देखा था।