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Germany ki Lok Kathayen-1/ जर्मनी की लोक कथाएँ-1

ग्रिम ब्रदर्स कहानी-स्नो व्हाइट और सात बौने: जर्मनी की लोक-कथा

ishhoo story

सुदूर प्रदेश में एक राजा और रानी राज्य करते थे। रानी बहुत ही दयालु और प्यारी थी और राज्य के सभी लोग उसका आदर करते थे । लेकिन रानी के जीवन में केवल एक दुविधा थी कि उसको संतान की इच्छा थी लेकिन उसके कोई संतान नहीं थी। एक बार रानी सर्दियों के समय खिड़की के पास बैठकर स्वेटर बुन रही थी और उसी समय एक स्नो व्हाइट चिड़िया खिड़की के पास आकर बैठ गई जिससे रानी का ध्यान भटक गया और उसकी उंगली में सुई चुभ गई।

तभी रानी ने एक इच्छा मांगी कि उसको एक बहुत ही खूबसूरत बेटी हो और उसका चेहरा स्नो जैसा हो । वह बहुत सुंदर और परी की तरह खूबसूरत हो।

काफी समय गुजर जाने के बाद रानी को एक बेटी पैदा हुई वह बहुत खूबसूरत थी जैसा उसने इच्छा मांगी थी । वह बहुत सुंदर थी । रानी ने उसका नाम स्नो व्हाइट रखा। राज्य के सभी लोग बहुत खुश थे।

स्नो व्हाइट की एक सौतेली मां थी। उसकी सौतेली मां स्नो व्हाइट को पसंद नहीं करती थी और उसे अपनी खूबसूरती पर भी घमंड था।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां के पास एक जादुई आईना था । जादुई आईने से वह रोज पूछती थी कि इस दुनिया में सबसे ज्यादा खूबसूरत कौन है । इस पर आईना जवाब देता -आपके अलावा भला कौन हो सकता है । इससे रानी बहुत खुश हो जाती। दूसरी तरफ रानी राज्य के निर्णय भी लेने लगी थी जिससे राज्य को बहुत नुकसान होने लगा। राज्य के नुकसान की भरपाई के लिए राजा को राज्य से बाहर जाना पड़ा और वह राजा के बाहर जाने पर अपनी मनमानी करने लगी।

समय बहुत तेजी से बीत रहा था और अब स्नो व्हाइट एक खूबसूरत युवती हो गई थी। जब एक बार स्नो व्हाइट बाग में बने तालाब के किनारे पानी पी रही थी तभी एक राजकुमार को स्नो व्हाइट की छाया दिखाई दी । वह राजकुमार देखता ही रह गया लेकिन उसे पक्षियों के सिवा उधर कुछ नहीं दिखा।

उधर रोज की तरह रानी आज भी आईने के पास पहुंची और उसने आईने से पूछा कि सबसे खूबसूरत कौन है । थोड़ी देर तो आईना हिचकिचाया लेकिन उसने कहा कि स्नो व्हाइट। अब रानी बहुत परेशान हो गई।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां ने उसे अपने पास बुलाया और उससे कहा कि मुझे लगता है कि तुम महल में पड़ी-पड़ी बोर हो रही हो इसलिए तुम्हें जंगल की सैर पर जाना चाहिए इससे तुम्हारा मन बहल जाएगा । और मैं तुम्हारे साथ अपने सबसे जांबाज सुरक्षाकर्मी को भेज रही हूं। रानी ने अपने सुरक्षाकर्मी को जंगल में भेजा और उससे बोला कि स्नो व्हाइट को मारकर सबूत के तौर पर उसका दिल लेकर आना।

रानी का सुरक्षाकर्मी जब स्नो व्हाइट को मारने लगा तो उसे दया आ गई और उसने स्नो व्हाइट को वहां से जाने के लिए बोला । तब स्नो व्हाइट ने उसे कहा कि वह अपना फर्ज पूरा करे। लेकिन सुरक्षाकर्मी ने उसे वहां से जाने दिया। और सबूत के तौर पर वह किसी जानवर का दिल निकाल कर ले गया । उसने वह दिल रानी के सामने पेश किया जिससे रानी बहुत खुश हो गई।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट जंगल मैं इधर उधर भटक रही थी । उसे बहुत डर लग रहा था उसे लगा जैसे कोई पीछे बात कर रहा है जिससे वह डर गई और वहां तेजी से आगे बढ़ने लगी। थोड़ा दूर चलने पर तितलियां उसके चारों ओर मंडराने लगी। तितलियां स्नो व्हाइट का स्कार्फ खींचने लगी और स्नो व्हाइट को लगा जैसे वह तितलियां कहीं जाने के लिए इशारा कर रही हैं। स्नो व्हाइट उन तितलियों के साथ साथ चलने लगी ।

वहां स्नो व्हाइट को एक घर दिखाई दिया । वह उस घर में चली गई । वहां उसने देखा कि एक मेज बिछी हुई है और उस पर 7 प्लेट लगी हुई हैं । और उन में स्वादिष्ट खाना लगा हुआ है ।और वहीं बगल वाले कमरे में सात बिस्तर लगे हुए हैं। स्नो व्हाइट ने जी भर के उन प्लेटो में से खाना खाया । स्नो व्हाइट बहुत थक गई थी इसलिए वह एक बिस्तर पर वहीं सो गई।

वह घर 7 बौनों का था। वो बौने सोने की खुदाई करते थे । जब शाम को बौने घर लौटे तो बौनों ने देखा कि मेज पर प्लेटो में से किसी ने खाना खाया है । जब सातवें बौने ने अपने बिस्तर की तरफ गौर से देखा तो वहां पर एक लड़की एक बिस्तर पर सोए हुई थी। सभी बौने उसके बिस्तर की तरफ बड़े । तब उन्होंने देखा कि वहां एक सुंदर लड़की सोए हुए हैं । बौनों ने उस लड़की को नहीं जगाया और वह वहीं उस लड़की को घेरते हुए सो गए। जब सुबह स्नो व्हाइट नींद से जगी तो बौनों को देखकर वह डर गई।

बौने बोले- हे लड़की तुम्हें हम से डरने की जरूरत नहीं है। बौने स्नो व्हाइट के बारे में पूछा तब स्नो व्हाइट ने अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई। बौने बोले कि तुम यहां रह सकती हो तुम्हें हमारे लिए खाना बनाना होगा, घर की साफ सफाई करनी होगी और हमारे बिस्तर लगाने होंगे। स्नो व्हाइट मान गई।

बौने जब भी शाम को घर वापस आते तो घर को देखकर और अपने लिए खाना बना देखकर खुश हो जाते ।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट की सौतेली माँ ने जब आईने से पूछा कि सबसे सुंदर कौन है तब आईने ने जवाब दिया रानी माफ करें सबसे सुंदर तुम हो लेकिन तुम से भी सुंदर सात बोनो के साथ पहाड़ों पर रहने वाली स्नो व्हाइट है। तब रानी को महसूस हुआ कि स्नो व्हाइट अभी जिंदा है उसने अब स्नो व्हाइट को जान से मारने का प्लान बनाया ।

उसने जादू से बूढ़ी औरत का रूप धारण कर लिया और ताजे सेव में विष डालकर वह पहाड़ों पर स्थित स्नो व्हाइट के पास पहुंची। बौने उस समय सोने की खोज में जा चुके थे।

स्नो व्हाइट घर पर अकेली थी। जब रानी बूढ़ी औरत के वेश में वहां पहुंची और उसने सेब लेने के लिए उस स्नो व्हाइट को बोला । तब स्नो व्हाइट बोली कि मां जी माफ करें मैं दरवाजा नहीं खोल सकती। तब बूढ़ी औरत बोली कि तुम दरवाजा मत खोलो। तुम मुझे एक रोटी का टुकड़ा दे दो । स्नो व्हाइट ने ऐसा ही किया और सेव ले लिए । जैसे ही उसने सेव खाए वह गिर गई और मर गई ।

जब बौने घर पर लेटे तब उन्होंने वहां स्नो् व्हाइट को जमीन पर गिरे देखा। उन्होंने स्नो व्हाइट को उठाया और उसे जगाने की कोशिश की। लेकिन स्नो व्हाइट अब मर चुकी थी तब बौने ने उसके मरने का मातम मनाया और उसे दफनाने के लिए ले जाने लगे। लेकिन तब उन्होंने महसूस किया कि स्नो व्हाइट का चेहरा अभी भी उतना फ्रेश है उसके गाल अभी भी लाल हैं ।वह मरी हुई नहीं लग रही थी। तब उन्होंने सोचा के स्नो व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद किया जाए जिससे उसका शरीर मरने के बाद भी बेदाग बना रहे। उन्होंने ऐसा ही किया और स्नो् व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद कर दिया।

तभी किसी राज्य का राजकुमार शिकार करते हुए वहां पहुंचा तब उन्होंने देखा कि कुछ बौने एक लड़की को घेरे हुए मातम मना रहे हैं। वह राजकुमार स्नो व्हाइट को देखते ही रह गया और उन बौने से स्नो व्हाइट को अपने साथ ले जाने की इच्छा जाहिर की। लेकिन बौने बोले कि यह तो मर चुकी है तुम इसका क्या करोगे । तब राजकुमार बोला कि मैं इसे अपने राज्य में ले जाकर इसके लिए एक सुंदर सा स्मारक बनाऊंगा। क्योंकि मैं इससे प्रेम करने लगा हूं ।यह बहुत सुंदर है ।

जब राजकुमार के सैनिक उसे डोली में उठा कर ले जा रहे थे तभी एक सैनिक को ठोकर लगी और वह गिरने ही वाला था, जिससे स्नो व्हाइट को झटका लगा और उसके मुंह में फंसा हुआ जहरीले सेब का टुकड़ा निकल गया। जिससे स्नो व्हाइट की जान वापस आ गई। स्नो व्हाइट अब जिंदा थी। राजकुमार ने स्नो व्हाइट से शादी करने की इच्छा जाहिर की। लेकिन स्नो व्हाइट बोली कि वह अपने पिता जी का आशीर्वाद पाना चाहती है।

राजकुमार को पता लगा कि रानी जादूगर है और बहुत क्रूर है । तब राजकुमार ने रानी के किले पर हमला करके उसे परास्त कर दिया और रानी राज्य छोड़ कर भाग गई। तब राजकुमार ने स्नो व्हाइट के पिता को गिरफ्त में से बाहर निकाला। राजकुमार और स्नो व्हाइट ने अपने पिताजी का आशीर्वाद लिया और शादी कर ली।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Germany ki Lok Kathayen-2/ जर्मनी की लोक कथाएँ-2

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी-नीली रोशनी: जर्मनी की लोक कथा

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एक सैनिक बहुत साल तक अपने राजा की सेवा करता रहा, पर अन्त में उसे बिना वेतन या इनाम के निकाल दिया गया। अब उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी रोटी कमाने के लिए क्याि करे। वह बड़े उदास मन से घर की तरफ चल दिया। पूरा दिन चलने के बाद शाम को वह एक घने जंगल के पास पहुँचा। अभी कुछ ही दूर गया था कि उसे पेड़ों के बीच से रोशनी चमकती दिखाई दी। उसने अपने थके हुए पैरों को उधर ही बढ़ा दिया। जल्दीक ही उसे एक झोंपड़ी दिखी जिसमें एक बुढ़िया चुड़ैल रहती थी। उस बेचारे ने उसकी खुशामद की कि वह उसे रात को वहाँ ठहर जाने दे और कुछ खाने-पीने के लिए भी दे दे। वह कुछ सुनने को तैयार नहीं थी, पर इस आदमी से पीछा छुड़ाना भी आसान नहीं था। आखिर वह बोली, “चलो, मैं तुम पर दया कर दूँगी, पर बदले में तुम्हें सुबह मेरा पूरा बगीचा खोदना पड़ेगा ।” सैनिक उसकी हर बात मानने को तैयार था, इसलिए उसका मेहमान बन गया।

अगले दिन उसने अपनी बात पूरी की, और बड़ी सफाई से पूरा बगीचा खोद डाला। यह काम करने में उसका पूरा दिन लग गया। शाम को उसे चले जाना था, तब वह बुढ़िया से बोला, “सारा दिन काम करने से मैं बेहद थक गया हूँ, मुझे एक रात और ठहर जाने दो।” पहले तो उसने मना कर दिया, पर फिर इस शर्त पर राजी हुई कि वह अगले दिन एक गाड़ी भरकर लकड़ी काट देगा।

उस दिन भी उसने काम तो पूरा कर दिया, पर करते-करते फिर रात हो गई। इसके अलावा वह इतना थक गया था कि उसने फिर एक रात रुकने की आज्ञा माँगी। अबकी बार बुढ़िया ने उससे यह वचन माँगा कि वह कुएँ में नीचे जलती नीली रोशनी उसे ला देगा।

सुबह होते ही वह उसे कुएँ तक ले गई, उसकी कमर में एक लम्बी रस्सी बाँधी और उसे नीचे उतार दिया । कुएँ में, जैसा कि चुड़ैल ने बताया था, नीली रोशनी थी। उसने रस्सी हिलाकर उसे इशारा दिया कि वह उसे ऊपर खींच ले। पर उसने सैनिक को बस इतना ऊपर खींचा कि वह हाथ बढ़ाकर रोशनी ले सके और बोली, “पहले मुझे रोशनी पकड़ा दो, मैं सँभाल लूँगी।” सैनिक भाँप गया कि इसका इरादा ठीक नहीं है। सच ही वह रोशनी लेकर सैनिक को कुएँ में वापिस धकेलने की सोच रही थी। सैनिक उसके बुरे इरादे को भाँप गया और बोला, “मैं जब तक कुएँ से सही-सलामत बाहर नहीं निकल आऊँगा तब तक तुम्हें रोशनी नहीं दूँगा।” यह सुनते ही वह बहुत नाराज हो गई और उसने उसे रोशनी समेत नीचे फेंक दिया। वह सालों से उस रोशनी को हासिल करना चाहती थी। इधर बेचारा गरीब सैनिक कुछ देर निराश होकर नीचे की गीली मिट्टी पर पड़ा रहा और सोचने लगा कि अब उसका अन्त पास ही है। उसकी जेब में आधा भरा चुरुट था। उसने सोचा “क्यों न इसे पीकर खत्म कर दूँ। दुनिया में अपना आखिरी मजा ले लूँ।” उसने नीली रोशनी से उसे जलाया और पीने लगा।

अचानक धुएँ का बादल उठा और उसके बीच से एक काला बौना आता दिखाई दिया। वह बोला, “सैनिक तुम्हें क्या चाहिए?” उसने जवाब दिया “कुछ नहीं ।” तब बौने ने कहा, “तुम नीली रोशनी के मालिक हो, इसलिए मुझे तुम्हारी हर बात माननी होगी।” उसने कहा, “सबसे पहले मुझे इस कुएँ से बाहर निकालो ।” उसके कहने की देर थी कि बौना उसका हाथ पकड़कर उसे नीली रोशनी समेत ऊपर ले आया। सैनिक फिर बोला, “अब एक दया और करो, उस बुढ़िया को मेरी जगह कुएँ में डाल दो ।” बौने ने यह भी कर दिया। अब उन्होंने उसका खजाना ढूँढ़ना शुरू कर दिया। सैनिक जितना सोना-चाँदी ले जा सकता था, उतना उठाने लगा। फिर बौने ने कहा, “अगर कभी मेरी जरूरत पड़े तो तुम सिर्फ नीली रोशनी से अपना पाइप जलाना और मैं फौरन तुम्हारे पास पहुँच जाऊँगा।”

सैनिक अपनी खुशकिस्मती से बहुत खुश था | वह पहले शहर की सबसे महँगी सराय में गया। उसने कुछ बढ़िया कपड़े बनवाये और अपने लिए एक अच्छा-सा कमरा तैयार करने को कहा। यह सब हो जाने पर उसने बौने को बुलाया और बोला, “राजा ने मुझे एक पैसा भी न देकर भूख-प्यास से मरने को छोड़ दिया था। अब मैं उसे दिखाना चाहता हूँ कि अब मैं मालिक हूँ। आज शाम को राजा की बेटी को यहाँ लाओ, उसे मेरी सेवा करनी होगी ।” बौना बोला, “यह खतरनाक काम है।” पर चला गया। फिर गहरी नींद में सोती राजकुमारी को सैनिक के पास ले आया।

अगले दिन बहुत सुबह वह उसे वापिस छोड़ आया। राजकुमारी अपने पिता को देखते ही कहने लगी, “मैंने पिछली रात एक अजीब-सा सपना देखा; मुझे लगा कि मुझे हवा में उड़ाकर एक सैनिक के घर ले जाया गया। वहाँ मैंने नौकरानी की तरह उसकी सेवा की ।” राजा इस अजीब कहानी के बारे में सोचता रहा। फिर उसने अपनी बेटी से कहा कि वह अपनी जेब में छेद करके मटर भर ले। जो वह कह रही है वह अगर सपना नहीं, सच हुआ तो गली में मटर के दानों के गिरने से यह पता चल जाएगा कि वह किधर गई थी। उसने वैसा ही किया पर बौने ने भी यह बात सुन ली थी। शाम होने पर सैनिक ने फिर से राजकुमारी को लाने के लिए कहा। बौने ने दूसरी गलियों में भी मटर के दाने बिखेर दिए। अब यह जानना मुश्किल हो गया कि कौन-से राजकुमारी की जेब से गिरे । इधर लोग-बाग सारा दिन मटर के दाने बटोरते रहे और साथ ही यह भी सोचते रहे कि इतने सारे दाने कहाँ से आए।

राजकुमारी ने फिर पिता को बताया कि उसके साथ दुबारा वैसा ही हुआ, तब राजा ने कहा, “तुम अपने साथ अपना एक जूता ले जाना और वहाँ छिपा देना जहाँ तुम्हें ले जाया जाएगा।” बौने ने यह भी सुन लिया। जब सैनिक ने फिर से राजकुमारी को लाने को कहा तब बौना बोला, “इस बार मैं तुम्हें नहीं बचा सकता। मुझे लगता है कि इस बार तुम जरूर पकड़े जाओगे, और यह दुर्भाग्य होगा ।” पर सैनिक नहीं माना। तब बौने ने समझाया कि “ध्यान रखना, सुबह जल्दी शहर के दरवाजे से बाहर निकल जाना।” राजकुमारी ने पिता के कहे के अनुसार सैनिक के कमरे में एक जूता छिपा दिया। उसके वापिस पहुँचने के बाद राजा ने पूरे शहर में जूता ढूँढ़ने का आदेश दिया। जूता जहाँ छिपाया गया था, वहाँ मिल गया। सैनिक भागा तो सही पर जल्दी न करने की वजह से पकड़ा गया और जंजीरों से बाँधकर जेल में डाल दिया गया। सबसे बुरी बात यह हुई कि शहर छोड़ने की जल्दी में वह नीली रोशनी, सोना-चाँदी सब अपने कमरे में ही छोड़ गया। अब उसकी जेब में सिर्फ एक अशर्फी थी।

वह उदास खड़ा जेल की जाली के बाहर देख रहा था, तभी उसे अपना एक दोस्त जाता दिखा। उसने उसे पुकारकर कहा, “मेरा एक बण्डल सराय में छूट गया है, अगर तुम ला दोगे तो मैं तुम्हें एक अशर्फी दूँगा।” उसके दोस्त को लगा, इतने से काम के बदले में एक अशर्फी तो काफी है। वह गया और लाकर सैनिक को दे दिया। सैनिक ने फौरन पाइप जलाया, धुआँ उठने के साथ उसका दोस्त वह बौना आ गया। वह बोला, “मालिक डरना मत। बस जब आपकी पेशी होगी तब नीली रोशनी को साथ ले जाना मत भूलना। बाकी हिम्मत रखना, सब कुछ अपनी गति से चलने देना ।” जल्दी ही पेशी हुई, मामले की पूरी छानबीन हुई, कैदी को दोषी पाया गया। जब फैसला सुनाया गया तो उसे फाँसी की सज़ा दी गई।

उसे ले जाया जा रहा था, तब उसने राजा से एक बात की अनुमति माँगी। राजा ने पूछा “क्या चाहिए?” वह बोला, “मुझे रास्ते में एक पाइप पी लेने दो ।” राजा ने कहा, “एक नहीं दो पियो ।” तब उसने नीली रोशनी से अपना पाइप जलाया, पल-भर में बौना उसके सामने खड़ा था। सैनिक ने हुक्म दिया, “इस सारी भीड़ को या तो भगा दो या मार दो। रही राजा की बात, तो उसे तीन टुकड़ों में काट दो।” बौने ने सब काम करना शुरू कर दिया, जल्दी ही भीड़ हटा दी; पर राजा ने दया की भीख माँगी। अपनी जान के बदले में वह सैनिक को अपनी बेटी देने के लिए तैयार हो गया। उसने यह भी मान लिया कि उसके बाद पूरे राजपाट का मालिक वह सैनिक ही होगा।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Germany ki Lok Kathayen-3/ जर्मनी की लोक कथाएँ-3

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी- सुनहरा हंस: जर्मनी की लोक-कथा

एक आदमी के तीन बेटे थे। सबसे छोटे को वे डमलिंग पुकारते थे। पूरा परिवार हर वक्ती उससे चिढ़ता था और उसके साथ दुर्व्यवहार करता था। एक दिन बड़े बेटे के दिमाग में आया कि वह जंगल जाकर ईंधन के लिए लकड़ी काट लाये। उसकी माँ ने उसके लिए बढ़िया ख़ाना और शराब की एक बोतल साथ में दी जिससे वह काम के बीच ताजा हो सके। जब वह जंगल पहुँचा तो एक बूढ़े आदमी ने उसे सुप्रभात कहा, फिर बोला, “मुझे बहुत भूख और प्यास लगी है, क्या तुम अपने खाने में से थोड़ा-सा मुझे दोगे?” उस होशियार युवक ने कहा, “तुम्हें अपना खाना और शराब दूँ? जी नहीं, यह मेरे लिए भी पूरा नहीं होगा ।” और चला गया। उसने पेड़ काटना शुरू किया पर अभी ज्यादा देर काम किया भी नहीं था कि उसका वार चूक गया और उसने खुद को घायल कर लिया। उसे घर लौटना पड़ा ताकि घाव की मरहम-पट्टी करवा सके। ये गड़बड़ी उस बूढ़े आदमी की शैतानी से हुई थी।

अगली बार दूसरा बेटा- काम के लिए निकला, माँ ने उसके साथ भी खाना पानी दिया; उसे भी वह बूढ़ा मिला । फिर उसने खाने-पीने को माँगा । यह लड़का भी अपने को समझदार मानता था, इसलिए बोला, “जो तुम्हें दूँगा वह कम नहीं हो जाएगा? तुम अपने रास्ते जाओ।” छोटे आदमी ने यह ध्यान रखा कि उसे उसका इनाम मिले। लड़के ने अगला वार जो पेड़ पर किया वह उसकी टाँग पर लगा, उसे भी घर लौटना पड़ा।

अब डमलिंग ने पिता से कहा, “पिताजी, मैं भी लकड़ी काटने जाना चाहता हूँ।” उन्होंने जवाब दिया “तुम्हारे भाई तो लँगड़े होकर आ गए, बेहतर होगा कि तुम घर पर रहो क्योंकि तुम इस बारे में कुछ भी नहीं जानते ।” पर वह जिद करता रहा तो पिता ने कहा, “जाओ, चोट खाओगे तो अक्ल आ जाएगी ।” उसकी माँ ने उसे सूखी डबलरोटी और एक खट्टी बीयर दी। तब वह जंगल में गया तो उसे भी बूढ़ा आदमी मिला जिसने इससे खाना-पानी माँगा। डमलिंग बोला, “मेरे पास तो सिर्फ सूखी डबलरोटी और खट्टी बीयर है। अगर यह तुम्हें ठीक लगे तो हम मिलकर खा लेंगे। वे बैठे, जब लड़के ने खाना निकाला तो सूखी डबलरोटी की जगह बढ़िया खाना और खट्टी बीयर की जगह बढ़िया शराब थी। उन्होंने पेट-भर कर खाया। जब ये निकट गए तो बूढ़े ने कहा, “तुम बड़े दयालु हो। तुमने मेरे साथ सब कुछ बाँटा, मैं तुम्हें वरदान देता हूँ। वहाँ एक पुराना पेड़ है। उसे काटो, उसकी जड़ में तुम्हें कुछ मिलेगा ।” फिर उसने लड़के से विदा ली और चला गया।

डमलिंग काम में लग गया। उसने पेड़ काटा, जब पेड़ गिरा तो जड़ के नीचे की खोखली जगह में शुद्ध सोने के पंखों वाला एक हंस मिला। लड़के ने उसे उठा लिया। वह रात बिताने के लिए एक सराय में ठहर गया। सराय के मालिक की तीन बेटियाँ थीं। उन्होंने जब हंस को देखा तो उसे अच्छी तरह देखने जाने को बेचैन हो उठीं। वे उसका एक पंख उखाड़ना चाहती थीं। सबसे बड़ी बोली, “मैं उखाड़ती हूँ।” वह उसके घूमने का इन्तजार करती रही, फिर हंस को उसके पंखों से पकड़ लिया, पर जब हाथ हटाने की कोशिश करने लगी तो ताज्जुब में पड़ गई क्योंकि वह तो जैसे पंखों से चिपक ही गई। तभी दूसरी बहिन आई, वह भी एक पंख लेना चाहती थी, पर जैसे ही उसने अपनी बहिन को छुआ वह उससे चिपक गई। तीसरी आई वह भी पंख लेना चाहती थी, पर दोनों बहनें चिल्लाई, “दूर रहो, भगवान के लिए दूर रहो।” उसकी समझ में ही नहीं आया कि वे दोनों क्या कहना चाह रही हैं। उसने सोचा, “अगर ये दोनों यहाँ हैं तो मैं भी यहीं जाती हूँ और वह उधर ही चली गई, पर बहिनों को छूने की देर थी कि वह भी हंस के साथ वैसे ही चिपक गई जैसे उसकी बहिनें चिपकी थीं। वे सारी रात हंस के साथ रहीं।

अगली सुबह डमलिंग ने हंस को बगल में दबाया और चल दिया। वे तीनों बहिनें हंस के साथ चिपकी थीं पर उसने ध्यान ही नहीं दिया, वह जहाँ जाता, जितनी तेज जाता, उन्हें भी जाना पड़ता था चाहे वे चाहें या नहीं क्योंकि वे चिपकी थीं।

जाते-जाते उन्हें खेत के बीच एक पादरी मिला। उसने जब यह कतार जाती देखी तो लड़कियों से बोला, “तुम्हें मैदान के बीच से एक युवक के पीछे इस तरह भागते हुए शरम नहीं आती? क्या यह ठीक है?” और उसने सबसे छोटी लड़की का हाथ पकड़ा ताकि उसे खींचकर रोक ले, पर वह तो खुद भी चिपक गया। अब कतार में लड़कियों के बाद पादरी भी जुड़ गया। उधर से पादरी का मुंशी निकल रहा था। उसने जब अपने मालिक को तीन लड़कियों के पीछे भागते देखा तो वह ताज्जुब में पड़ गया और चिल्लाकर पूछने लगा, “मालिक, इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं? आज तो किसी के घर नामकरण करने जाना है।” जवाब न मिलने पर उसने दौड़कर पादरी का चोगा पकड़ लिया जिससे उसे रोक ले, पर वह भी चिपक गया। अब ये पाँचों एक-दूसरे से चिपके हुए भागे जा रहे थे। तभी इन्हें काम से लौटते हुए दो मजदूर दिखे जो फावड़े लिये हुए थे। पादरी चिल्लाया, “मुझे छुड़ा दो ।” पर छूने की देर थी कि वे दोनों भी चिपक गए। अब ये सातों डमलिंग और उसके हंस के पीछे दौड़ रहे थे।

आखिर वे एक ऐसे शहर में पहुँचे जहाँ के राजा की केवल एक बेटी थी और वह भी बिल्कुल उदास हो गई थी। कोई उसे हँसा नहीं पा रहा था। यहाँ तक कि राजा ने सब तरफ यह एलान करवा दिया कि जो उसे हँसा पाएगा, उससे उसकी शादी कर दी जाएगी। यह बात सुनकर वह युवक अपने हंस और उसकी कतार के साथ उसके सामने गया। जैसे ही राजकुमारी ने सातों को एक दूसरे से चिपके हुए और एक-दूसरे के पीछे भागते हुए देखा तो वह ऊँची आवाज में हँस पड़ी और देर तक हँसती रही। राजा के वचन के अनुसार डमलिंग और राजकुमारी की शादी हो गई, वह राजा का वारिस बना और बहुत साल तक अपनी पत्नी के साथ खुशी की जिन्दगी जीया।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Germany ki Lok Kathayen-4/ जर्मनी की लोक कथाएँ-4

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी-बौने और मोची: जर्मनी की लोक कथा

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एक शहर में एक मोची अपने परिवार के साथ रहता था। उसके घर के पास ही उसकी एक छोटी सी दुकान थी, जहाँ वह जूते बनाने और बेचने का काम किया करता था। जूते बेचकर उसे जो पैसे मिलते, उससे उसका और उसके परिवार का गुजारा चलता था।

वह अपने काम में निपुण था और मेहनती भी। इसके बावजूद भी एक समय ऐसा आया कि जब उसके बनाये जूते बिकने कम हो गए। जो बिकते, वे भी बहुत कम दाम पर।

उचित दाम न मिल पाने के कारण उसका धंधा मंदा चलने लगा। उसकी दुकान पर आने वाले ग्राहकों की संख्या कम हो गई। नतीजतन उसकी जमा-पूंजी समाप्त होने लगी। स्थिति ये आ गई कि घर चलाने के लिए उसे पत्नी के गहनें गिरवी रखने पड़े, घर का सामान बेचना पड़ा।

यह बुरा दौर उसकी चिंता का कारण बन गया। वह हर समय चिंता में डूबा रहता। उसे चिंतित देख उसकी पत्नी हमेशा ढाढस बंधाती, “देखिये, ऊपर वाला सब देख रहा है। उस पर भरोसा रखिये। यकीन मानिये सब ठीक हो जायेगा।” पत्नी की बात पर वह मुस्कुरा देता। लेकिन अंदर ही अंदर चिंता में घुलता रहता।

उसकी दुकान में जूते बनाने का सामान भी ख़त्म हो चला था। तैयार जूतों में बस एक जोड़ी जूते बचे थे, जिसे ख़रीदने दुकान पर कोई ग्राहक नहीं आ रहा था। एक दिन वह अपने बनाये आखिरी जूते बेचने बाजार चला गया। जूते बिक गए। जो पैसे मिले, उससे उसने घर की ज़रूरत का कुछ सामान ख़रीदा और घर वापस आने लगा। रास्ते में उसे एक गरीब बूढ़ी औरत दिखाई दी। उसने कुछ पैसे देकर उसकी मदद की और घर चला आया।

शाम को जब वह अपनी दुकान में गया, तो देखा कि वहाँ चमड़े का बस एक छोटा टुकड़ा बचा हुआ है। उस टुकड़े से सिर्फ़ एक जूता बन सकता था। उसने जूते बनाने के लिए चमड़ा तो काट लिया, लेकिन रात हो जाने के कारण जूते नहीं बना पाया। अगले दिन जूते बनाने का सोच वह घर आकर सो गया।

अगली सुबह वह जब अपनी दुकान पर गया, तो चकित रह गया। जहाँ वह चमड़ा काटकर रख गया था, वहाँ बहुत ही सुंदर जूते रखे हुए थे। इतने सुंदर जूते उसने कभी देखे ही नहीं थे। उन्हें बेचने जब वह बाज़ार गया, तो उसे उसके बहुत अच्छे दाम मिले।

वापसी में घर के लिए कुछ सामान के साथ ही उसने जूते बनाने का सामान भी खरीदा। कुछ पैसे उसने ज़रूरतमंदों को दान में भी दिए।

उस रात उसने दो जूते बनाने के लिए चमड़ा काटकर रखा। अगली सुबह दुकान में उसे दो जोड़ी सुंदर जूते मिले। वह हैरान था। जब उसने यह बात अपनी पत्नी को बताई, तो पत्नी बोली, “देखा मैंने कहा था न कि ऊपरवाला सब देख रहा है। उसका ही आशीर्वाद है कि कोई नेकदिल इंसान हमारी मदद कर रहा है।”

मोची के चमड़े काटकर छोड़ने और फिर अगले दिन बने-बनाए जूते मिलने का सिलसिला जारी रहा। एक से दो, दो से तीन और फिर रोज़ उसे कई जोड़ी जूते मिलने लगे। वे जूते ग्राहकों को बहुत पसंद आने लगे। बाज़ार में उसका नाम हो गया और उसकी दुकान में ग्राहकों की भीड़ लगने लगी। अच्छे दाम में जूते बिकने से मोची ने अच्छा-ख़ासा पैसा कमा लिया। उसकी आर्थिक स्थिति सुधर गई।

वह और उसकी पत्नी सदा मन ही मन उन नेकदिल लोगों का धन्यवाद करते थे, जो रोज़ रात उनकी दुकान पर आकर जूते बना जाते थे। एक दिन मोची की पत्नी बोली, “इतने समय से कोई हमारी इतनी मदद कर रहा है और हमें उनके बारे में कुछ भी पता नहीं। क्यों ना आज रात जागकर हम दुकान की रखवाली करें और देंखे कि कौन रोज़ हमारी मदद के लिए आता है?”

मोची को पत्नी की बात जंच गई। उस रात दोनों सोये नहीं, बल्कि दुकान में जाकर छुप गए। कुछ घंटे इंतज़ार करने के बाद उन्होंने देखा कि खिड़की के रास्ते तीन बौने दुकान के भीतर आये और गीत गुनगुनाते हुए कटे हुए चमड़ों से जूते बनाने लगे। मोची और उसकी पत्नी उन्हें छुपकर देखते रहे। रात भर मेहनत कर जूते बनाने के बाद तीनों बौने खिड़की के रास्ते ही वापस चले गए।

उनके जाने के बाद मोची और उसकी पत्नी आपस में बात करने लगे। मोची की पत्नी बोली, “उन तीन बौनों ने हमारी बहुत मदद की है। हमें उन्हें उपहार देकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।”

“तुम ही बताओ, हमें उन्हें उपहार में क्या देना चाहिए? मोची ने पूछा।

“तुमने ध्यान दिया, उनके कपड़े और जूते पुराने हो चुके थे। मैं उनके लिए नए कपड़े सिल देती हूँ और तुम उनके लिए नए जूते बना देना।”

मोची मान गया। बाज़ार से सामान लाकर वे बौनों के लिए कपड़े और जूते बनाने लगे। कुछ दिनों में कपड़े और जूते तैयार हो गये। कपड़े बहुत ही सुंदर बने थे और जूते शानदार थे। उस रात चमड़े के स्थान पर उन्होंने बौनों के लिए तैयार किये कपड़े और जूते रख दिए।

रात जब तीनों बौने दुकान के भीतर आये, तो चमड़े के स्थान पर अपने नाप के कपड़े और जूते देखकर बड़े ख़ुश हुए। कपड़े और जूते पहनकर वे नाचने-गाने लगे। उन्हें नाचता-गाता देख मोची और उसकी पत्नी बहुत ख़ुश हुए। वे समझ गए कि बौनों को उनका उपहार पसंद आ गया है।

उस रात के बाद कुछ रोज़ तक मोची ने देखा कि उसके काटे गए चमड़े दुकान में जस-के-तस पड़े हुए हैं। बौनों ने वहाँ आना बंद कर दिया था। मोची समझ गया कि बौने अब कभी नहीं आयेंगे।

बौनों को मोची की जितनी मदद करनी थी, वे कर चुके थे। अब मोची ने अपनी मेहनत से जूते बनाने का निश्चय किया। इतने दिनों में उसे ग्राहकों की पसंद-नापसंद का अंदाज़ा लग चुका था और हुनर की उसमें कोई कमी नहीं थी। मेहनत से वह जूते बनाने की अपनी कला को और निखारने लगा। अब उसके बनाये जूते भी बौनों द्वारा बनाये गए जूतों जैसे सुंदर थे। ग्राहकों को उसके बनाये जूते भी पसंद आने लगे। वे उसकी दुकान में आते रहे और उसकी दुकान ‘सबसे सुंदर जूतों वाली दुकान’ के रूप में शहर भर में मशहूर हो गई।

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Germany ki Lok Kathayen-5/ जर्मनी की लोक कथाएँ-5

कहानी-सिंड्रेला: जर्मनी की लोक कथा

एक छोटे से शहर में एक अमीर आदमी रहता था। उसकी पत्नी प्रायः बीमार रहती थी। एक बार वह बहुत बीमार पड़ी तो उसे लगा कि वह अब नहीं बचेगी। उसने अपनी इकलौती बेटी सिंड्रेला को अपने पास बुलाया और प्यार से समझाया, ‘मेरी प्यारी बच्ची, तू सदा ईमानदारी और अच्छे बने रहना। अच्छे और सच्चे आदमी की मदद भगवान् भी करता है। इसलिए ईश्वर सदा तेरे साथ रहेगा। मैं भी स्वर्ग से तेरा ध्यान रखूँगी और जब तुझे जरूरत होगी, मैं तेरे आस-पास ही रहूँगी।’ इतना कहकर उस महिला ने सदा के लिए आँखें मूँद लीं। सिंड्रेला अपनी माँ की मृत्यु पर बहुत रोई, क्योंकि अब रोने के अलावा और कोई चारा उसके पास नहीं था। वह रोज अपनी माँ की कब्र पर जाती, उसपर फूल चढ़ाती और जी भरकर रोती।

ऐसे ही दिन गुजरते गए। सर्दियों में जब उसकी माँ की कब्र बर्फ से ढक गई तब भी वह बच्ची उस जगह पर रोज जाती, कब्र के ऊपर की बर्फ साफ करती, उसपर फूल चढ़ाती और अपनी माँ के लिए आँसू बहाती।

एक साल भी नहीं बीत पाया था कि उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली। उसकी सौतेली माँ की भी दो बेटियाँ थीं। वे दोनों देखने में तो सफेद थीं, पर दिल से बहुत काली थीं। वे दोनों बहनें अपनी सौतेली बहन सिंड्रेला से बहुत चिढ़ती थीं। जब कभी भी मौका मिलता तो सिंड्रेला को खरी-खोटी सुनाने से बाज नहीं आतीं थीं। इस प्रकार घर में सौतेली माँ और सौतेली बहनों के आने से सिंड्रेला का खराब समय शुरू हो गया। दोनों बहनें घर का कुछ भी काम नहीं करती थीं, पर सिंड्रेला को कभी आराम से नहीं बैठने देती थीं। कभी उसे मूर्ख और गँवार कहकर उसका अपमान करतीं, तो कभी कहतीं, ‘जो रोटी खाना चाहेगा तो उसे इसके लिए काम भी करना पड़ेगा।

तू तो रसोई में ही ठीक रह सकती है। जा रसोई में, यहाँ क्यों बैठी है ?’ उन दोनों बहनों ने सिंड्रेला के सारे खिलौने और सुंदर-सुंदर कपड़े भी उससे छीन लिये तथा अपने पुराने तथा भद्दे से कपड़े उसे पहनने के लिए दे दिए और उसके सुंदर से जूतों की जगह उसे लकड़ी के जूते बनवाकर दिए, ताकि जल्दी-जल्दी वह जूते न तोड़े। उसे भद्दे और मैले कपड़ें पहनाकर दोनों सौतेली बहन जी भरकर उसका मजाक बनातीं। अपने पिता से भी अपना दुःख कह नहीं सकती थी, क्योंकि एक तो वह सारा दिन व्यापार में व्यस्त रहता और दूसरे, वह अपनी दूसरी पत्नी के मामले में दखल देना नहीं चाहता था। इसलिए जैसा उसकी सौतेली माँ और बहनें करतीं या कहतीं, वह भी चुपचाप सहन करती रहती। अब रसोई के सारे काम उसे ही करने पड़ते। उसे सुबह-सुबह जल्दी उठा दिया जाता, क्योंकि उसके सोने का स्थान अब उसका रसोईघर ही था। रोज सुबह-सुबह वह पानी भरकर लाती, घर के सभी लोगों के लिए नाश्ता-खाना बनाती, उनके कपड़े धोती और पूरे घर की सफाई करती। इन सब कामों के बाद भी उसकी सौतेली माँ और दोनों बहनें खरी-खोटी सुनाती रहतीं।

जरा सा भी नुकसान होने पर उसे मार भी पड़ती। घर का सारा काम खत्म करने के बाद अगर कुछ समय बचता तो सौतेली माँ उसके आगे अनाज और दालें साफ करने को रख देती। पानी की कमी की वजह से सिंड्रेला रोज-रोज स्नान भी नहीं कर पाती थी। इसलिए गंदे कपड़ों और उलझे हुए बालों से उसकी शक्ल एक नौकरानी जैसी हो गई। उसे देककर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह किसी अमीर बाप की बेटी है।

एक बार उसका पिता एक मेले में जाने के लिए तैयार हुआ तो उसने पहले अपनी दोनों सौतेली बेटियों से पूछा, ‘तुम्हें मेले से क्या मँगाना है ?’ बड़ी लड़की ने कहा, ‘मुझे सुंदर-सुंदर कपड़े चाहिए।’ दूसरी लड़की ने कहा, ‘मुझे मोतियों और बहुमूल्य पत्थरों की मालाएँ चाहिए।’ आखिर में उसने सिंड्रेला से पूछा, ‘तुम मेले से अपने लिए क्या मँगाना चाहती हो ?’ सिंड्रेला बोली,‘पिताजी, मेरे लिए आप चिलगोजे का एक छोटा सा पौधा लाइएगा। जब आप वापस घर आएँगे तो रास्ते में जरूर मिल जाएगा।’

मेले में अमीर आदमी ने अपनी पत्नी और दोनों सौतेली बेटियों के लिए वह सबकुछ खरीदा जो उन्होंने मँगाया था, पर अपनी सिंड्रेला के लिए पौधा उसे मेले में कहीं नहीं मिला। जब वह अपने घर जाने लगा तो रास्ते में उसे चिलगोजे का एक छोटा सा पौधा लगा दिखाई दिया, उसने उसे उखाड़ लिया। वह सोचने लगा कि सिंड्रेला ने कोई भी कीमती चीज न माँगकर चिलगोजे का एक नन्हा सा पौधा ही क्यों माँगा ? पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया। घर पहुँचकर उसने मेले से लाए उपहार तीनों बेटियों के दिए। सिंड्रेला ने वह नन्हा पौधा ले जाकर अपनी माँ की कब्र के पास लगा दिया। पौधा लगाते समय उसे इतना रोना आया कि पौधे की सारी मिट्टी उसके आँसुओं से गीली हो गई।

धीरे-धीरे वह पौधा बड़ा होने लगा। सिंड्रेला हर रोज सुबह-शाम अपनी माँ की कब्र पर जाती, उसके पास अपने सारे दुःख सुनाती और जी भरकर रो लेती। पौधा बड़ा होने लगा। चिलगोजे के उस छोटे से पेड़ पर एक सफेद चिड़िया आकर रहने लगी। जब कभी सिंड्रेला अपनी माँ की कब्र पर अपनी कोई इच्छा प्रकट करती तब वह सफेद चिड़िया उसकी हर इच्छा को पूरा कर देती।

एक बार की बात है। वहाँ के राजा ने अपने राजकुमार की पसंद की लड़की ढूँढ़ने के लिए एक उत्सव आयोजित किया। यह उत्सव तीन दिनों तक चलना था। इस उत्सव में उसने अपने राज्य की सभी सुंदर और अमीर घरों की लड़कियों को निमंत्रण भेजा। सिंड्रेला की दोनों सौतेली बहनें, जो सुंदर भी थीं और अमीर बाप की बेटी भी, इस उत्सव के लिए आमंत्रित थीं। राजमहल से निमंत्रण पाकर दोनों बहनें खुशी से फूली न समाईं। उन्होंने सिंड्रेला को बुलाकर अपनी कंधी करवाई। फिर उससे अपने जूतों पर पालिश करवाई, उसी से उन जूतों के फीते बँधवाए और फिर अच्छी तरह सज-धजकर दोनों बहनें बोलीं, ‘तू घर का सारा काम ठीक ढंग से करना। हम दोनों राजमहल के उत्सव में जा रही हैं।’

उन दोनों के जाने के बाद सिंड्रेला को बहुत रोना आया, क्योंकि वह खुद भी इस उत्सव में जाना चाहती थी, पर उसके पास न ही सुंदर कपड़े थे और न ही सुंदर जूते। उसने अपनी सौतेली माँ से महल में जाने की अनुमति माँगी, तो वह चीखकर बोली, ‘तू भाग्यहीन तो पूरी तरह से चूल्हे की राख से अटी हुई है। राजकुमार के विवाह में जाएगी ? भाग यहाँ से और चुपचाप घर का काम कर। यह उत्सव तेरे लिए नहीं है।’

सिंड्रेला फिर भी अपनी माँ से अनुनय-विनय करती रही तो सौतेली माँ ने तंग आकर दो-तीन दालें मिलाकर उसे साफ करने के लिए बोली, ‘अगर तू ये तीनों दालें दो घंटे में अलग कर देगी, तो मैं तुझे जाने की अनुमति दे सकती हूं।’ सिंड्रेला ने दालों की वह थाली चुपचाप उठाई और बाहर बाग में बैठकर अपनी माँ को याद करके रोने लगी। वह सोचने लगी कि अगर उसकी अपनी माँ आज जिंदा होती तो वह भी इस उत्सव के लिए जरूर जाती। तभी वह सफेद पक्षी उसके पास आया और थोड़ी ही देर में उसने सारी दालें अलग कर दीं। सिंड्रेला की खुशी का ठिकाना न रहा। वह एक घंटे बाद जब तीनों दालें अलग करके अपनी सौतेली माँ के सामने पहुँची, तो सौतेली माँ हैरान रह गई, क्योंकि उसने तो सोचा था कि सारा दिन लगाने पर भी यह लड़की इन दालों को अलग नहीं कर पाएगी। अब भी वह उसे उस उत्सव में जाने नहीं देना चाहती थी। वह बोली, ‘तू इस राजमहल के उत्सव में कैसे जा सकती है ? न तो तू साफ सुथरी है, न ही तेरे पास सुंदर कपड़े और जूते हैं। राजमहल के सारे लोग तेरा मजाक बनाएँगे और इससे तेरे पिता की भी बदनामी होगी।’ इतना कहकर वह अपनी दोनों बेटियों के साथ घोड़ा गाड़ी में बैठकर राजमहल की ओर चल दी। अब घर में उसके सिवाय और कोई नहीं था, वह दौड़कर अपनी माँ की कब्र पर गई और उस चिलगोजे के पेड़ के नीचे बैठकर रोते हुए बोली-

‘ओ प्यारे नन्हे पेड़,

खुद को थोड़ा हिला-डुला

और मुझपर सोना-चाँदी गिरा।’

इतना कहते ही उस नन्हे से पेड़ से उसकी गोदी में सोने-चाँदी से कढ़े कपड़े आ गिरे और साथ ही मखमल की सुंदर सी जूतियाँ भी, जिनपर चाँदी की कढ़ाई की हुई थी। सिंड्रेला उन दोनों चीजों को लेकर घर की ओर दौड़ी और जल्दी से नहा-धोकर उन कपड़ों और जूतियों को पहनकर महल की ओर चल दी। वह भी पैदलवाले छोटे रास्ते से चलकर नाच शुरू होने से पहले राजमहल में पहुँच गई। उसकी सौतेली माँ और सौतेली बहनों की नजर जब उसपर पड़ी तो वे उसे बिलकुल नहीं पहचान पाईं, क्योंकि वह इस समय सोने-चाँदी से कढ़े कपड़े और मखमली जूते पहनकर पूरी तरह राजकुमारी लग रही थी।

नाच शुरू होने के कुछ देर बाद राजकुमार सिंड्रेला के पास आया और उसके साथ नाचने की इच्छा व्यक्त की। वह खुशी से राजकुमार के साथ नाचने लगी। जब राजकुमार बहुत देर तक सिंड्रेला के साथ ही नाच करता रहा तो उस उत्सव में आई अन्य सभी लड़कियों को राजकुमार पर बहुत गुस्सा आया। जब कोई अन्य लड़की राजकुमार के साथ नाचने के लिए उसके पास जाती तो वह कहता, ‘अभी नहीं, बाद में।’ इस तरह राजकुमार सिंड्रेला के साथ नाचता रहा। धीरे-धीरे शाम होने लगी तो सिंड्रेला का दिल घबराने लगा। वह राजकुमार से अपने घर वापस जाने की आज्ञा माँगने लगी, पर राजकुमार उससे इतना प्रभावित था कि उसका साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। वह खुद भी उसके साथ घर जाना चाहता था, क्योंकि वह यह जानना चाहता था कि इतनी सुंदर बेटी किसकी है और कहाँ रहती है ? इधर सिंड्रेला को अपने घर पहुँचने की जल्दी थी, क्योंकि वह अपनी सौतेली माँ और बहनों से पहले घर पहुँचना चाहती थी। वह बहाना बनाकर राजकुमार से हाथ छुड़ाकर चुपचाप महल के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गई। अपनी सौतेली माँ और दोनों बहनों के घर पहुँचने से पहले ही वह अपने पुराने कपड़े पहनकर घर के काम में लग गई। अपने सुंदर से कपड़े उसने उसी पेड़ की नीचे रख दिए। वह सफेद पक्षी उसे वापस ले गया।

दूसरे दिन फिर उसकी सौतेली माँ अपनी दोनों बेटियों को पहले से ज्यादा सजा-धजाकर राजमहल ले गई। उन तीनों के जाने के बाद वह दौड़ी-दौड़ी अपनी माँ की कब्र पर गई और उस पेड़ को हिलाती हुई बोली-

‘ओ मेरे प्यारे नन्हे पेड़,

खुद को थोड़ा हिला-डुला

और मुझ पर सोना-चाँदी गिरा।’

उस पेड़ ने उसपर पहले की तरह सोने-चाँदी की कढ़ाई वाले कपड़े गिरा दिए। आज के कपड़े और जूते पिछले दिन के कपड़ों और जूतों से भी सुंदर थे। उन कपड़ों में वह जैसे ही राजमहल में घुसी, सबकी निगाहें उसी पर टिक गईं। राजकुमार भी उसे ढूँढ़ता हुआ उसके पास पहुँच गया। वह उसका हाथ पकड़कर नाचने वाले हॉल में ले गया और उसीके साथ नाचने लगा। आज भी वह केवल उसके साथ नाचना चाहता था। लड़कियों की भीड़ में उसे केवल यही एक लड़की पसंद आई थी। जैसे ही शाम होनी शुरू हुई, वह घबराने लगी। उसे नाचने में कोई आनंद नहीं आ रहा था। वह अपनी माँ और बहनों से पहले अपने घर पहुँचना चाहती थी। जब उसने घर जाने की इच्छा व्यक्त की तो राजकुमार भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। राजकुमार की नजर बचाकर वह पीछे के दरवाजे से झाड़ियों में गुम हो गई। बेचारा राजकुमार अँधेरे में देख नहीं पाया। राजकुमार महल के पीछेवाले बाग में उस सुंदर लड़की को ढूँढ़ता रह गया और इधर सिंड्रेला ने झट से अपने सुंदर कपड़े उतारकर अपनी माँ की कब्र के पासवाले पेड़ के नीचे रखे और वही मैले-कुचैले कपड़े पहनकर अपने दोनों हाथ और मुँह चूल्हे की राख से ऐसे रँग लिये जैसे लगे कि वह सारा दिन रसोई से बाहर ही नहीं निकली है। उसकी सौतेली माँ जब अपनी दोनों बेटियों के साथ घर पहुँची तो उसे बहुत तसल्ली हुई कि वह सुंदर लड़की सिंड्रेला नहीं थी, जबकि उस लड़की की सूरत उससे बहुत मिलती-जुलती थी।

तीसरे दिन भी जब सौतेली माँ अपनी दोनों बेटियों को लेकर राजमहल के उत्सव के लिए रवाना हुई तो सिंड्रेला दौड़ी-दौड़ी अपनी माँ की कब्र के पास गई और उसने उस पेड़ के नीचे खड़े होकर अपनी पहलेवाला गाना फिर दोहराया तो फिर से उस पेड़ से चमक-धमक वाले सुंदर कपड़े उसके हाथ में आ गिरे और बाद में असली सोने की बनी हुई सैंडिल भी। जल्दी से नहा-धोकर वह सुंदर कपड़े और सोने की सैंडिल पहनकर राजमहल में पहुँची। आज फिर सब उसकी सुंदरता तथा कपड़ों की देखते रह गए। नाच अभी शुरू नहीं हुआ था, क्योंकि राजुकमार अपनी पसंद की सुंदर और सुकोमल लड़की को ढूँढ़ रहा था। जैसे ही सिंड्रेला नाचवाले बड़े हॉल में घुसी तो राजकुमार तेजी से उसके पास आया और उसे अपने साथ नाचने के लिए आमंत्रित किया। अगर कोई और लड़की उसके साथ नाचने की इच्छा व्यक्त करती तो वह यही कह देता, ‘अभी कुछ इंतजार करो। मैं बाद में तुम्हारे साथ नाचूँगा।’

इसी तरह नाच करते-करते शाम होने लगी और सिंड्रेला को घर जाने की जल्दी होने लगी। राजकुमार के सामने उसने बहाना बनाया और तेजी से राजमहल से गायब हो गई। राजकुमार काफी देर तक उस लड़की के वापस आने की प्रतीक्षा करता रहा। बाद में वह महल के पिछली ओर गया, क्योंकि पहले भी वह लड़की पीछे की ओर से निकलकर कहीं गायब हो गई थी। वहाँ पर उसे सोने की एक सैंडिल मिली। उसने झट से उस सैंडिल को उठाकर देखा कि वह खूबसूरत सैंडिल सोने से बुनी हुई थी। राजकुमार ने अपने पिता के सामने शर्त रखी कि वह उसी लड़की से विवाह करेगा, जिसके पैर में सोने की यह सैंडिल ठीक-ठीक आ जाएगी। राजा ने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि राजकुमार उसी लड़की को अपनी पत्नी बनाएगा, जिसके पैर में वह सोने की सैंडिल ठीक आएगी, जो उसे महल के पीछेवाले बाग में मिला था।

राज्य की सभी सुंदर लड़कियों और सिंड्रेला की दोनों सौतेली बहनों ने भी उस सैंडिल को पहनकर देखा, पर वह किसी के पैर में पूरी तरह ठीक नहीं आई। सिंड्रेला की बड़ी सौतेली बहन ने तो रानी बनने के लालच में अपने पैर की अंगुली भी घायल कर ली, पर सैंडिल पहनकर एक कदम भी आगे नहीं चल सकी, क्योंकि वह उसके पैर के लिए बहुत छोटी थी। फिर भी सौतेली माँ ने राजमहल में खबर भेज दी कि उसकी बड़ी बेटी को वह सैंडिल पूरी आ गई है। राजकुमार खुद आकर देख लें। राजकुमार उस अमीर आदमी के घर पहुँचा, जिसकी बेटी के पैरों में सोने की सैंडिल पूरी आई थी। उसने वहाँ जाकर देखा कि लड़की सचमुच ही वह सैंडिल पहने खड़ी है। वह उस लड़की को अपने घोड़े पर बैठाकर अपने महल की ओर चल दिया; पर जैसे ही उसका घोड़ा सिंड्रेला की माँ की कब्र के पास से गुजरा, तभी उसे पेड़ से एक पक्षी की आवाज सुनाई दी-

‘गुटर-गूँ गुटर-गूँ,

इसको लेकर जाता कहाँ तू।

सैंडिल छोटी है इसके पैर में,

तेरी रानी बैठी है घर में।’

राजकुमार ने जब यह गाना सुना तो उसने घोड़ा रोककर उस लड़की के पैर को देखा, तो पाया कि सचमुच ही वह सैंडिल उसके पैर के लिए छोटी थी और इसी वजह से उस लड़की के पैर का अँगूठा और अँगुलियाँ घायल हो गई थीं तथा सैंडिल खून से लाल हो गया था। राजकुमार को उस लड़की की धूर्तता पर बहुत गुस्सा आया। उसने झट से अपना घोड़ा सिंड्रेला के घर की ओर मोड़ दिया। वहाँ पहुँचकर बोला, ‘यह मेरी पत्नी नहीं हो सकती, क्योंकि यह सैंडिल इसके पैर में सही नहीं है। शायद इसकी कोई और बहन होगी, जिसे यह जूता पूरा आता हो।’ सौतेली माँ ने झट से अपनी दूसरी बेटी को बुलाया और उसे वह सैंडिल पहनाकर देखा, पर उसके पाँव की अँगुलियाँ कुछ बड़ी थीं, फिर भी लालची माँ ने उस लड़की को यह सैंडिल जबरदस्ती पहना दी। लड़की बड़ी मुश्किल से चार-पाँच कदम चलकर राजकुमार के पास पहुँची। राजकुमार ने उसे अपने घोड़े पर बैठाया और महल की ओर चल दिया। जैसे ही वह सिंड्रेला की माँ की कब्र के पास पहुँचा तो उसे फिर वही गाना सुनाई दिया। वह घोड़ा रोककर नीचे उतरा तो उसने देखा कि बड़ी बहन की तरह उसके पैर से भी खून निकल रहा था। वह फिर अपने घोड़े को वापस उस लड़की के घर ले गया और उसकी माँ से बोला, ‘यह लड़की भी मेरी रानी नहीं बन सकती, क्योंकि यह सैंडिल इसके पैर के लिए भी छोटी है। क्या तुम्हारी और कोई बेटी है ?’

अमीर आदमी बोला, ‘नहीं, पर मेरी पहली पत्नी की लड़की है, जो अब इस घर में नौकरानी का काम करती है। वह तुम्हारी रानी बनने के लायक नहीं है।’

राजकुमार ने जब उस लड़की से मिलने की इच्छा व्यक्त की तो सौतेली माँ बोली, ‘नहीं-नहीं, तुम उस गंदी लड़की से न ही मिलो तो अच्छा है, वह बहुत गँवार है।’ पर राजकुमार उसी क्षण उसी लड़की से मिलना चाहता था। अतः हारकर सौतेली माँ को राजकुमार के सामने सिंड्रेला को उपस्थित करने के लिए तैयार होना ही पड़ा। सिंड्रेला ने झट से अपने हाथ-पैर और मुँह धोया और साफ कपड़े पहनकर राजकुमार के सामने आकर खडी हो गई। राजकुमर को वह चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा, फिर भी वह चुप रहा। उसने सिंड्रेला को सोने की वह सैंडिल पहनने का हुक्म दिया। सिंड्रेला ने अपनी लकड़ी की सैंडिल उतारकर जब उस सोने की सैंडिल में पैर डाला तो उसके पैर में ऐसी सही आई, जैसे यह सैंडिल उसी के लिए बनाई गई हो। अब राजकुमार को पूरा विश्वास हो गया कि यह वही सुंदर लड़की है जिसने तीन दिनों तक उसके साथ नृत्य किया था। वह उसे पाकर बहुत खुश हुआ। राजकुमार ने उस लड़की को अपने घोड़े पर बैठाया और उसके पिता से बोला, ‘मुझे मेरी पसंद की लड़की मिल गई। यही मेरी असली पत्नी है, क्योंकि तीन दिनों तक मैंने इसी लड़की के साथ नृत्य किया था।’

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Germany ki Lok Kathayen-6/ जर्मनी की लोक कथाएँ-6

कहानी-मेहनत का फल: जर्मनी की लोक कथा

राजकुमारी रोजी की खूबसूरती की हर जगह चर्चा थी । सुनहरी आंखें, तीखे नयन-नक्श, दूध-सी गोरी काया, कमर तक लहराते बाल सभी सुंदरता में चार चांद लगाते थे ।

एक बार की बात है । राजकुमारी रोजी को अचानक खड़े-खड़े चक्कर आ गया और वह बेहोश होकर गिर पड़ी ।

राजवैद्य ने हर प्रकार से रोजी का इलाज किया, पर राजकुमारी रोजी को होश नहीं आ रहा था । राजा अपनी इकलौती बेटी को बहुत चाहते थे ।

उस देश के रजउ नामक ग्राम में विलियम और जॉन नाम के दो भाई रहा करते थे ।

विलियम बहुत मेहनती और चुस्त था और जॉन अव्वल दर्जे का आलसी था । सारा दिन खाली पड़ा बांसुरी बजाया करता था । विलियम पिता के साथ सुबह खेत पर जाता, हल जोतता व अन्य कामों में हाथ बंटाता ।

एक दिन विलियम ने जंगल में तोतों को आदमी की भाषा में बात करते सुना । एक तोता बोला – “यहां के राजा की बेटी अपना होश खो बैठी है, क्या कोई इलाज है ?”

“क्यों नहीं, वह जो उत्तर दिशा में पहाड़ी पर सुनहरे फलों वाला पेड़ है वहां से यदि कोई फल तोड़कर उसका रस राजकुमारी को पिलाए तो राजकुमारी ठीक हो सकती है ।” तोते ने कहा, “पर ढालू पहाड़ी से ऊपर जाना तो बहुत कठिन काम है, उससे फिसलकर तो कोई बच नहीं सकता ।”

विलियम ने घर आकर सारी बात बताई तो जॉन जिद करने लगा कि वह फल मैं लाऊंगा और राजा से हीरे-जवाहरात लेकर आराम की बंसी बजाऊंगा । फिर जॉन अपने घर से चल दिया । मां ने रास्ते के लिए जॉन को खाना व पानी दे दिया ।

जॉन अपनी बांसुरी बजाता पहाड़ी की ओर चल दिया । पहाड़ी की तलहटी में उसे एक बुढ़िया मिली, वह बोली – “मैं बहुत भूखी हूँ । कुछ खाने को दे दो ।”

जॉन बोला – “हट बुढ़िया, मैं जरूरी काम से जा रहा हूं । खाना तुझे दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा ?” और जॉन आगे चल दिया ।

पर पहाड़ी के ढलान पर पहुचंते ही जॉन का पांव फिसल गया और वह गिरकर मर गया ।

कई दिन इंतजार करने के पश्चात् विलियम घर से चला । उसके लिए भी मां ने खाना व पानी दिया । उसे भी वही बुढ़िया मिली । बुढ़िया के भोजन मांगने पर विलियम ने आधा खाना बुढ़िया को दे दिया और स्वयं आगे बढ़ गया ।

विलियम जब ढलान पर पहुंचा तो उसका पांव भी थोड़ा-थोड़ा फिसल रहा था, वह घास पकड़-पकड़ कर चढ़ रहा था । पर उसे तभी वहां दो तोते दिखाई दिए और उनमें एक-एक तड़पकर उसके आगे गिर गया ।

विलियम को चढ़ते-चढ़ते प्यास भी लग रही थी और उसके पास थोड़ा ही पानी बचा था, फिर भी उसने तोते की चोंच में पानी डाल दिया ।

चोंच पर पानी पड़ते ही तोता उड़ गया और न जाने तभी विलियम का पैर फिसलना रुक गया । विलियम तेजी से ऊपर पहुंचा और सुनहरे पेड़ तक पहुंच गया ।

उसने पेड़ से एक फल तोड़ लिया । फल को तोड़ते ही उसमें जादुई शक्ति आ गई । उसने आंख मुंद ली और जब आंखें खोली तो स्वयं को पहाड़ी से नीचे पाया और उसके सामने वही बुढ़िया खड़ी मुस्करा रही थी ।

वह फल लेकर राजा के महल में पहुंचा और राजा की आज्ञा लेकर उसने फल का रस निकाल कर राजकुमारी के मुंह में डाल दिया ।

रस मुंह में पड़ते ही राजकुमारी ने आंखें खोल दीं । राजकुमारी बोली – “हे राजकुमार, तुम कौन हो ?”

विलियम बोला – “मैं कोई राजकुमार नहीं, एक गरीब किसान हूं ।” इतने में राजा व उसके सिपाही आ गए । राजा बोले – “आज से तुम राजकुमार ही हो वत्स । तुमने रोजी को नई जिन्दगी दी है । बताओ, तुम्हें क्या इनाम दिया जाए ?”

विलियम बोला – “मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, मेरे पास बहुत थोड़ी जमीन है । यदि आप मुझे पांच एकड़ जमीन दिलवा दें तो मैं ज्यादा खेती करके आराम से रह सकूंगा ।”

राजा बोला – “सचमुच तुम मेहनती और ईमानदार हो । तभी तुमने इतना छोटा इनाम मांगा है । हम तुम्हारा विवाह अपनी बेटी रोजी से करके तुम्हारा राजतिलक करना चाहते हैं ।”

विलियम बोला – “पहले मैं अपने माता-पिता की आज्ञा लेना अपना फर्ज समझता हूं ।”

राजा विलियम की मातृ-पितृ भक्ति देखकर गद्गद हो उठा और बोला – “उनसे हम स्वयं ही विवाह की आज्ञा प्राप्त करेंगे । सचमुच तुम्हारे माता-पिता धन्य हैं जो उन्होंने तुम जैसा मेहनती व होनहार पुत्र पाया है ।”

फिर राजा ने विलियम के पिता की आज्ञा से विलियम व रोजी का विवाह कर दिया और उसके पिता को रहने के लिए बड़ा मकान, खेती के लिए जमीन व काफी धन दिया ।

विलियम राजकुमारी के साथ महल में तथा उसके माता-पिता अपने बड़े वैभवशाली मकान में सुखपूर्वक रहने लगे ।