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Iran ki Lok Kathayen-4(ईरान की लोक कथाएँ-4)

कहानी- संत का आदर: ईरानी लोक-कथा

तुर्की और ईरान के बीच कई सालों से लड़ाई चलती चली आ रही थी। तुर्की को बार-बार हार का मुंह देखना पड़ रहा था।

किन्तु एक दिन संयोगवश ईरान के प्रसिद्ध सन्त पुरुष अत्तारी साहब तुर्कों के हाथ में पड़ गये। तुर्क तो ईरानियों से खार खाये हुए हो थे। इसलिए वे अत्तारी साहब को मार डालने के लिए तैयार हो गए।

ईरान के कुछ लोगों को इसका पता चला। इस पर एक भले धनवान पुरुष ने अत्तारी साहब के वजन के बराबर हीरे देने की तैयारी दिखाई और मांग की कि सन्त पुरुष को छोड़ दिया जाय, लेकिन तुर्क नहीं माने।

जब ईरान के बादशाह को इस बात की खबर लगी तो वे खुद तुर्की के सुलतान के सामने हाजिर हुए और बोले, “मेरे राज्य के लिए आपकी न जाने कितनी पीढ़ियां हमसे लड़ती आ रही हैं, फिर भी आप हमसे हमारा राज्य छीन नहीं सके हैं, लेकिन आज मैं आपसे यह कहने आया हूं कि आप हमसे राज्य ले लीजिए और हमारे अत्तारी साहब को हमें वापस सौंप दीजिये। धन नाशवान है, राज्य भी नाशवान है; किन्तु सन्त तो सदा अमर हैं। अत्तारी साहब को खोकर ईरान कलंकित नहीं होना चाहता।”

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Iran ki Lok Kathayen-3(ईरान की लोक कथाएँ-3)

कहानी-मखमल की चप्पल: ईरानी लोक कथा

शादाब बेगम अपने गरीब माता-पिता की आखिरी संतान थी । उसके छह भाई-बहन थे जो उससे बड़े थे । उसके माता-पिता ने उसके भाई-बहनों का विवाह कर दिया था ।

शादाब का पिता अक्सर बीमार रहने लगा था । वह चाहता था कि उसके जीते जी शादाब का विवाह हो जाए । हालांकि अभी उसके खेलने-कूदने की उम्र थी । वह अभी केवल चौदह बरस की थी, परंतु उसके माता-पिता को उसका विवाह करने की जल्दी थी ।

तभी किसी ने एक धनी नि:संतान बूढ़े के बारे में शादाब के पीता को बताया जो अक्सर बीमार रहता था, परंतु विवाह करना चाहता था । शादाब के पिता ने सोचा कि बूढ़ा जैसा भी है, उसे से विवाह कर देना ठीक है । वह कम से कम अमीर तो बहुत है । वहां उसकी बेटी को खूब आराम-चैन मिलेगा ।

शादाब बेगम की उम्र पन्द्रह बरस पूरी होने से पहले बूढ़े व्यक्ति से विवाह हो गया । बूढ़ा अनीसुद्दीन शादाब की हर इच्छा पूरी करता था । परंतु अपनी बीमारी के कारण उसे कहीं बाहर नहीं ले जा पाता था ।

शादाब को ऊंची एड़ी के चप्पल पहनना बहुत अच्छा लगता था । इस कारण वह जिधर से निकलती, उधर से ठक-ठक की आवाज सुनाई देती थी । अक्सर अनीसुद्दीन शादाब के चप्पल की आवाज से ही अंदाज लगाता था कि वह किधर है और क्या कर रही है ।

शादाब अपने बीमार पति की हरदम सेवा करती रहती थी और समय से दवा-दूध आदि दिया करती थी । धीरे-धीरे बूढ़ा अनीस स्वस्थ होने लगा । पति-पत्नी अक्सर घर के नौकर-नौकरानियों की प्रशंसा करते रहते थे ।

अनीस को नौकरों का आपस में अधिक हंसना-बोलना पसंद नहीं था । वह अपने नौकरों की अड़ोस-पड़ोस के नौकरों से दोस्ती भी पसंद नहीं करता था । उसी की आदत के मुताबिक सभी नौकर हरदम चुपचाप रहते थे और अपने-अपने काम में लगे रहे थे ।

शादाब हमेशा अपने बावर्ची की तारीफ़ किया करती थी । वह कहती थी कि वह सदैव समय पर स्वादिष्ट भोजन तैयार करता है । उसने आज तक उस जैसा बावर्ची नहीं देखा जो काम में खूब चुस्त हो और मालिकों का वफादार भी हो ।

अब अक्सर बूढ़ा अनीस घर के बाहर सैर करने भी जाने लगा था । एक दिन उसने शादाब से कहा – “आज तक तुम मेरी सेवा करती रही हो, कल मैं तुम्हें शहर की सबसे खूबसूरत इमारत की सैर करवाऊंगा । वह इमारत मेरे मित्र नवाब साहब की है ।”

सुनकर शादाब बहुत खुश हुई । अनीस अगले दिन घूमने की तैयारी में घर से बाहर कहीं चला गया ।

लेकिन शादाब की खुशी किस्मत को मंजूर नहीं थी । कुछ ही देर में अनीस के बेहोश होकर गिर जाने और मृत्यु हो जाने की खबर शादाब को मिली । उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ ।

शादाब हरदम चुप और उदास रहने लगी । उसने अपने जीवन में पति की सेवा और घर के काम-काज के अलावा कोई खुशी नहीं देखी थी । इस कारण वह दूसरा विवाह करने की सोच भी नहीं सकती थी ।

इसी तरह महीनों और फिर तीस बरस गुजर गए । शादाब के माता-पिता ने बहुत समझाया कि वह दूसरा विवाह कर ले, परंतु वह इसके लिए तैयार नहीं हुई ।

वह अनीस की हवेली में चुपचाप उदास-सी अकेली रहती थी । घर के नौकर-नौकरानी उसका खूब ध्यान रखते थे । वह इस बात से ही खुश रहती थी कि उसके नौकर-नौकरानी उसका खूब ध्यान रखते हैं । बावर्ची समय पर स्वादिष्ट भोजन बनाता था ।

इसी प्रकार उसकी जिंदगी गुजर रही थी । एक दिन घर में सीढ़ियां उतरते वक्त शादाब का पैर अचानक मुड़ गया । वह सीढ़ियों से गिरते-गिरते बची । परंतु उसके पैर में मोच आ गई । उसका घर में चलना-फिरना भी बंद हो गया ।

हकीम को बुलाया गया । हकीम ने सलाह दी कि जब तक शादाब के पैर की मोच ठीक नहीं हो जाती, उसे पूरी तरह आराम करना चाहिए । उसे पांवों में ऊंची एड़ी के चप्पल बिलकुल नहीं पहनने चाहिए और नरम मखमली चप्पलों को पैरों में पहनना चाहिए ।

शादाब हरदम बिस्तर पर लेटी रहती थी । उसका भोजन हर वक्त बिस्तर पर ही पहुंचा दिया जाता था । नौकरानियां पैर की मालिश व दवाइयां दे देती थीं । एक सप्ताह में उसका पैर कुछ ठीक होने लगा और वह थोड़ा बहुत चलने-फिरने लगी ।

हकीम की हिदायत के अनुसार वह नरम मखमली चप्पल पहनने लगी । इन चप्पलों के कारण उसकी ठक-ठक की आवाज बंद हो गई । एक दिन दोपहर को वह अचानक रसोई में गई तो देख कर आश्चर्य में पड़ गई कि उसका बावर्ची पड़ोस के नौकर से हंस-हंसकर बातें कर रहा था ।

शादाब थोड़ा छिपकर खड़ी हो गई । उसने देखा कि कुछ ही देर में पड़ोस का नौकर भगोना भर चीनी और घी उसके यहां से लेकर चला गया । शादाब को रसोई की खाद्य सामग्री जल्दी खत्म होने का राज समझ में आने लगा ।

उसे मन ही मन बावर्ची पर क्रोध आने लगा । वह सोचने लगी कि वह बेकार ही बावर्ची को इतना ईमानदार और वफ़ादार समझती रही । वह बड़ी परेशान-सी रहने लगी । एक दिन शाम के वक्त शादाब का मन हुआ कि वह आंगन में चहलकदमी करे और वह उठ कर आंगन में आ गई । तबी उसे एक कमरे में कुछ बातें करने की आहट महसूस हुई ।

शादाब ने छेद से झांककर कर देखा । अंदर का दृश्य देखकर उसे यूं लगा कि जैसे उसके दिल की धड़कन थम गई हो । उसे सहसा अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ । कमरे के अंदर एक नौकर खूब सजा-संवरा कुर्सी पर बैठा था और एक नौकरानी शादाब के कपड़े पहन कर नौकर के बालों में उंगलियां फिरा रही थी ।

वह बड़ी मुश्किल से अपने बिस्तर तक पहुंची और अपने चप्पल पहन कर आंगन तक आई । उसने देखा सभी नौकर-चाकर अपने काम में लगे थे। उसे यूं महसूस हुआ कि वह चक्कर खाकर गिर जाएगी । अब उसे यह समझ में आने लगा कि उन्हीं मखमली चप्पलों के कारण किसी को उसके आने की खबर नहीं लगती थी ।

अब शादाब को अपने नौकर-नौकरानियों और बावर्ची पर हर वक्त क्रोध आने लगा जिससे उसकी तबीयत खराब रहने लगी ।

वह उन नौकरों की नौकरी से निकालकर उनकी नाराजगी से दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहती थी । उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इन बेईमान नौकर-नौकरानियों से कैसे निपटे ? नए नौकरों पर भी आसानी से भरोसा नहीं किया जा सकता था ।

उसने एक योजना बनाई और अपनी हवेली बेच देने का फैसला किया । अगले दिन एक बड़े जमींदार को बुलाकर उसने हवेली बेच दी और वह शहर छोड़कर कहीं दूर गांव में चैन की जिन्दगी बिताने चली गई ।

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Iran ki Lok Kathayen-2(ईरान की लोक कथाएँ-2)

कहानी-निजी संपत्ति -ईरानी लोक कथा

ईरान के शहंशाह अब्बास एक दिन जंगल में शिकार खेलने गए खेलते-खेलते वह रास्ता भटक गए। जब वह रास्ते की खोज के लिए भटक रहे थे, तभी बादशाह को बांसुरी की आवाज सुनाई दी। वह उस स्थान पर पहुंचे जहां से आवाज आ रही थी। देखा एक बालक मस्ती से बांसुरी बजा रहा था। कुछ दूर उसके पशु चर रहे थे।

बादशाह ने बालक का नाम और उसका ठिकाना पूछा। बातचीत के दौरान वह चरवाहे बालक की हाजिरजवाबी और प्रतिभा के बहुत प्रसन्न हो गए। उसे शाही दरबार में लाया गया। आगे चलकर वह एक रत्न सिद्ध हुआ। उसका नाम था- मोहम्मद अली बेग। बादशाह के बाद उसका अवयस्क पौत्र शाह सूफी तख्त पर बैठा कुछ ही समय बीता। जासूसों ने शाह सूफी के कान भरे कि कोषाध्यक्ष मोहम्मद अली बेग शाही खजाने का दुरुपयोग करता है।

शाह उनकी बातों में आ गया। उसने मोहम्मद अली की हवेली का निरीक्षण किया वहां चारों ओर सादगी थी। निराश होकर शाह लौटने लगा कि तभी जासूसों के इशारे पर उसका ध्यान एक कक्ष की ओर गया, जिसमें तीन मजबूत ताले लटक रहे थे।

‘इसमें कौन से हीरे-जवाहरात मुहरें बंद कर रखे हैं, मोहम्मद?’ शाह ने पूछा।

मोहम्मद अली सिर झुकाकर बोला “इसमें हीरे – जवाहरात मुहरों से भी कीमती चीजें हैं, जो मेरी निजी संपत्ति है । इस पर शाह ने मोहम्मद को ताले खोलने को कहा । ताले खोल दिए गये । कक्ष के बीचों बीच एक तख्त पर कुछ चीजें करीने से रखी थीं – एक बांसुरी, सुराही, चावल रखने की थैली, लाठी, चरवाहे की पोशाक और दो मोटे ऊनी कंबल। मोहम्मद बोला -‘यही हैं मेरे हीरे जवाहरात, बादशाह जब मुझे पहली बार मिले थे, तब मेरे पास यही चीजें थीं । आज भी निजी कहने को मेरी यही संपत्ति है ।’

बादशाह लज्जित होकर लौट गया।

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Iran ki Lok Kathayen-1(ईरान की लोक कथाएँ-1)

कहानी-भोला सौदागार – ईरानी लोक कथा

एक भोला सौदागर दूर-दूर के देशों से व्यापार करता था। जहां जो चीज़ सस्ती देखता खरीद लेता और दूसरे मुल्कों में जाकर अधिक मूल्य में बेच देता । एक बार उसे ख़बर मिली कि तेहरान में चंदन बहुत महंगा बिकता है। फ़ौरन ही उसने अपनी सारी संपत्ति का चंदन खरीद लिया और उसे बेचने के लिए तेहरान की ओर रवाना हुआ।

जब वह सौदागर तेहरान के नजदीक पहुंचा तो वहां के एक चंदन के व्यापारी ने उस सौदागर के आने का हाल सुना। वह व्यापारी बड़ा चिंतित हुआ और सोचने लगा कि यदि वह सौदागर यहां आकर व्यापार करेगा तो उसकी बिक्री कम हो जाएगी। इस वास्ते कोई ऐसी तरक़ीब करनी चाहिए कि यह सौदागर शहर में दाखिल होने से पहले ही जाल में फंस जाए।

यह सोचकर तेहरान का वह व्यापारी चंदन की कुछ लकड़ियां लेकर उस सौदागर के पास चल दिया। वह उस पड़ाव के करीब आकर रुक गया जहां वह सौदागर ठहरा हुआ था। जब रात हुई तो उसने डेरे में चंदन की लकड़ियां जलाईं। जब उस सौदागर को चंदन की लकड़ियां जलने की खुशबू आई तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ।

तेहरान का व्यापारी चंदन की लकड़ियां जलाकर खाना बना रहा था, यह देखकर उस सौदागर को बड़ा अफसोस हुआ । वह कहने लगा, “मैंने तो सुना था कि तेहरान में चंदन बहुत महंगा बिकता है। इस वास्ते मैं अपने सारे रुपयों का चंदन खरीद लाया हूं, परंतु आप तो इसे ईंधन की लकड़ियों की तरह जला रहे हैं। क्या मेरी मेहनत और लागत व्यर्थ ही जाएगी?”

तेहरान के व्यापारी ने बड़ी सहानुभूति दिखलाते हुए कहा, “अफसोस तुम, बुरी तरह से मारे गए। यहां तेहरान में तो चंदन कौड़ियों के भाव बिकता है।”

यह बात सुनकर सौदागर बड़ा ही निराश हुआ और अपने नुकसान के लिए शोक करने लगा। तेहरान का व्यापारी बोला, “तुम शोक न करो मुझे तुम्हारी दशा पर बड़ा रहम आता है। तुम मेरे मेहमान हो और तुम्हारी सहायता करना मेरा फर्ज है। मैं तुम्हारा सब चंदन खरीद लेता हूं। तुम मेरे साथ तेहरान चलो, वहां इसके बदले में इतने ही वज़न की जो चीज़ चाहो वह ले लेना। मैं खुशी से दे दूंगा। परंतु एक डर है, संभव है, वहां पहुंचकर मेरे घर के लोग मुझे ऐसा न करने दें। इस वास्ते इस संबंध में मेरा और तुम्हारा एक इकरारनामा लिखा जाना चाहिए ताकि हम में से कोई भी अपने वायदे से न मुकर सके ।”

वह सौदागर रजामंद हो गया और इस प्रकार का एक प्रतिज्ञा-पत्र लिखकर गवाहों के दस्तखत कराए गए। इसके बाद वे दोनों व्यापारी तेहरान आए। सौदागर एक सराय में जाकर ठहर गया। उस सराय का मालिक एक प्रतिष्ठित व्यापारी भी था। बातचीत में उस सौदागर ने चंदन का भाव मालूम किया। भटियारे ने उत्तर दिया कि चंदन तो यहां हीरे से भी महंगा बिकता है।

यह सुनकर उस सौदागर को बड़ा दुःख हुआ। वह सोचने लगा कि यहां के व्यापारी ने उसे ठगने के लिए यह षड्यंत्र रचा है। परंतु अब हो ही क्या सकता था। सौदागर मन मार कर रह गया।

दूसरे दिन वह अपना मन बहलाने के लिए नगर की सैर को निकला तो एक जगह देखा कि कुछ लोग शतरंज खेल रहे हैं। उसने उनसे कहा कि मैं भी तुम्हारे साथ शतरंज खेलना चाहता हूं। उन्होंने उत्तर दिया कि हम तो एक शर्त पर खेलते हैं कि हारनेवाला जीतनेवाले की आज्ञा का पालन करे।

जब आदमी के बुरे दिन आते हैं तो उसकी बुद्धि भी नष्ट हो जाती है। सौदागर इस बात पर राज़ी हो गया और शतरंज खेलने लगा, थोड़ी हे देर बीती थी की सौदागर खेल हार गया और जीतनेवाले ने शर्त पूरी करने के लिए कहा |

सौदागर ने कहा कि जो हुक्म आप देंगे ज़रूर पूरा करूंगा। जीतनेवाले ने कहा कि मेरा हुक्म है कि तुम समुद्र का पानी पी जाओ। यह बात सुनकर सौदागर को बड़ा क्रोध आया। वह कहने लगा, “ऐसी असंभव बात को कौन पूरा कर सकता है?” इस बात को लेकर दोनों में झगड़ा होने लगा और वहां बहुत से लोग इकट्ठा हो गए।

उस भीड़ में से एक काना आगे बढ़ा और कहने लगा कि वास्तव में यह सौदागर बड़ा ही धूर्त है। इसने मेरी एक आंख चुरा ली है। मेरी आंख ठीक ऐसी ही थी जैसी इस सौदागर की है। काना अपनी बात पूरी भी नहीं कह पाया था कि दूसरा आदमी आगे निकल आया। वह अपने हाथों में एक पत्थर लिए हुए था। वह लोगों से कहने लगा कि मेरे पास इस तरह के पत्थर का एक पाजामा था। वह इस आदमी ने चुरा लिया है। इस आदमी से मेरा पाजामा दिलवा दें।

यह सुनकर लोगों ने सौदागर को पकड़ लिया और उससे पत्थर का पाजामा तथा काने की आंखें मांगने लगे। सौदागर यह चीजें कहां से देता? वह बेचारा भौंचक्का-सा रह गया और अपने दुर्भाग्य पर पछताने लगा। उस समय उसे कुछ भी नहीं सूझ पड़ता था। इतने में ही वह व्यापारी, जिसकी सराय में वह सौदागर ठहरा हुआ था, उधर आ पहुंचा।

उसे सौदागर की इस दुर्दशा को देखकर बड़ा दुःख हुआ। बड़ी मिन्नत करके उसने लोगों से कहा कि तुम इसे मेरी जमानत पर छोड़ दो। जिस दिन और जिस अदालत में कहोगे मैं इसे पेश कर दूंगा।

तेहरान में व्यापारी की ईमानदारी की बड़ी शोहरत थी। लोग उसका विश्वास करते थे। उन्होंने यह बात मान ली और व्यापारी सौदागर को साथ लेकर सराय में वापस आ गया।

सौदागर ने उसको अपना पूरा किस्सा कह सुनाया। व्यापारी ने कहा, “यह शहर ठगों और बदमाशों से भरा हुआ है और तुम उनके जाल में बुरी तरह फंस गए हो परंतु मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूं। संभव है, उससे तुम्हारा छुटकारा हो जाए।

बात यह है कि इस शहर में जितने भी ठग और बदमाश हैं, उन सबका एक उस्ताद है, जो आंखों से अंधा है। यह सब लोग शाम को उसके पास जाकर अपनी-अपनी करतूत सुनाया करते हैं और वह अंधा उनकी बातें सुनकर ठगने की तरह-तरह की तरकीबें बताया करता है।

जिस प्रकार भी हो सके तुम भी आज रात को ठगों का वेश बनाकर उस अंधे उस्ताद के पास पहुंच जाना। जिन लोगों ने तुम्हें फंसाया है वे भी ज़रूर पहुंचेंगे। ठगों का उस्ताद जो परामर्श इन लोगों को दे उसे ध्यानपूर्वक सुनते रहना । मेरा खयाल है कि तुम्हारे फायदे की बात ज़रूर निकल आएगी।”

वह नवयुवक सौदागर ठग का रूप बनाकर बदमाशों के अड्डे पर जा पहुंचा और एक कोने में छिपकर बैठ गया।

थोड़ी देर में वे ठग भी वहां आ पहुंचे। सबसे पहले चंदन वाले व्यापारी ने अपना किस्सा सुनाया। उसने अपनी चालाकी की खूब तारीफ की और कहने लगा कि उस्ताद यह तरकीब कामयाब हो गई तो लाखों के वारे-न्यारे हैं।

अंधा उस्ताद यह सुनकर हँसा और बोला, “साहबजादे, तुम तो अपनी चालाकी से खुद ही सौदागर के पंजे में फंस गए। तुमने इकरारनामे में लिखा है कि चंदन के बदले में जो चाहोगे दूंगा। अब ज़रा सोचकर देखो, अगर सौदागर ने बदले में पिस्सू नामक जानवर मांगा तो कहां से दोगे?

पिस्सू इतना हल्का होता है कि अगर तुम सारी उम्र भी सिर पटकते रहो तो भी केवल पावभर पिस्सू एकत्र नहीं कर सकोगे। तुमने इस चीज़ का खयाल तक भी न किया होगा ।”

चंदन का व्यापारी यह सुनकर हक्का-बक्का रह गया। फिर ज़रा होश संभालकर बोला, “उस्ताद! भला उस मूर्ख सौदागर के दिमाग में यह बात कहां आ सकती है?”

इसके बाद शतरंज खेलनेवाले ने अपना किस्सा बयान किया। अंधे ने कहा, “तुम भी धोखा खा गए। अगर नवयुवक तुमसे कहे कि मैं तुम्हारी शर्त के अनुसार सारे समुद्र का पानी पीने के लिए तैयार हूं, पहले तुम उन नदियों को बंद करो जो हर समय समुद्र में गिरती रहती हैं और पानी बढ़ाती रहती हैं तो तुम क्या जवाब दोगे?” शर्त लगानेवाला यह सुनकर खामोश हो गया।

इसके बाद तीसरे ठग ने अपनी कथा सुनाई कि मैंने पत्थर के पाजामे की चोरी का इलज़ाम लगाया है और अदालत में कहूंगा कि यदि वह मेरा पाजामा न दे तो उसकी कीमत के एक हजार रुपए मुझे दिलाये जाएं।

अंधे उस्ताद ने कहा कि तुमने बड़ी गलती की। मान लो कि वह सौदागर तुम से यह कहे कि मैं पत्थर का पाजामा सीने को तैयार हूं, पहले तुम पत्थर का धागा लाओ तो तुम क्या जवाब दोगे? अंधे उस्ताद की यह बात सुनकर उस ठग को बड़ी निराशा हुई।

सबसे आखिर में उस काने ने अपनी मक्कारी का किस्सा सुनाया जिसने उस सौदागर पर अपनी एक आंख चुराने का इलज़ाम लगाया था।

अंधे उस्ताद ने कहा, “तुम बड़ी भारी मुसीबत में फंस गए। अगर वह सौदागर तुमसे कहने लगे कि यदि तुम्हारा दावा सच है, तो पहले तुम अपनी दूसरी आंख बाहर निकालो, मैं अपनी एक आंख निकालकर उसके साथ तोलूंगा और अगर आंखों का वज़न ठीक हुआ तो मैं अपनी आंख तुम्हें दे दूंगा अन्यथा तुम्हारा दावा झूठा है।”

काने ने यह बात सुनी तो होश उड़ गए। वह सोचने लगा कि कहीं इस झगड़े में मेरी दूसरी आंख भी न चली जाए।

इसके बाद सब बदमाश मशविरा करने लगे और फिर सोच-समझकर बोले, “उस्ताद, वह सौदागर बिलकुल मूर्ख है। ऐसी बुद्धिमानी के सवाल करने की उसमें समझ कहां है! हम उस पर दावे ज़रूर करेंगे। आगे जो ईश्वर की मर्जी होगी, होगा वैसा ही।”

अंधे उस्ताद ने कहा, “तुम्हारे बयानों में जो कमज़ोरियां हैं, वह मैंने तुमको अच्छी तरह बता दी हैं। अब तुम्हें अधिकार है जो चाहो सो करो ।” भोला सौदागर सब बातें सुनता रहा और फिर सराय में लौट आया।

तय तिथि पर व्यापारी सौदागर को साथ लेकर अदालत में हाज़िर हुआ।

काजी ने सबसे पहले चंदन के व्यापारी का मामला पेश किया और सौदागर से बोला कि तुम इसके बारे में क्या कहना चाहते हो। सौदागर ने कहा कि मैं अपने वायदे के अनुसार चंदन देने के लिए तैयार हूं, परंतु इसके बदले में इसी वज़न का पिस्सू नामक जानवर मुझे दिलाया जाए।

काजी ने तेहरान के सौदागर की ओर देखकर कहा कि यह सौदागर बेईमान नहीं है। यह प्रतिज्ञा-पत्र के अनुसार माल देने के लिए तैयार है। अब तुम अपने वायदे के अनुसार चंदन के बराबर पिस्सू तोल दो। जितना चंदन उसके पास है, सब तुम्हें दिलवा दिया जाएगा।

तेहरान के व्यापारी ने यह बात सुनी तो उसके होश उड़ गए। अंधे उस्ताद ने जो बात कही थी वही सामने आयी। उसने काज़ी से गिड़गिड़ाकर कहा कि मैं अपने दावे को वापस लेता हूं। नवयुवक सौदागर जिस कीमत पर चाहे अपने चंदन को बेच सकता है।

काजी ने कहा कि तुमने अपनी प्रतिज्ञा का पालन नहीं किया और इस भोले सौदागर को मुफ्त में ही तंग किया इसलिए तुम पर दो हज़ार रुपए जुर्माना किया जाता है, जिसमें से आधी रकम सौदागर को दी जाएगी।

तेहरान का व्यापारी बहुत रोया-गिड़गिड़ाया परंतु न्यायप्रिय काजी ने उसकी एक न सुनी और जुर्माने के रुपए वसूल करके उनमें से एक हज़ार रुपए सौदागर को दिलवा दिए।

अब दूसरे आदमी की पेशी हुई। वह डरता-कांपता सामने आया। उसने पत्थर के कुरते और पाज़ामे की चोरी का इलज़ाम सौदागर पर लगाया।

उस भोले सौदागर ने काज़ी से कहा, “हजूर! यह आदमी बिलकुल झूठ बोलता है। मैंने इसका कुरता और पाजामा कुछ नहीं चुराया। मेरी राय में तो पत्थर का पाज़ामा और कुरता बन ही नहीं सकता और अगर बन सकते हैं तो यह मुझे पत्थर का धागा यह चीज़ें सिलवाने के लिए दिला दे।”

काज़ी ने उस आदमी से पत्थर का धागा लाने को कहा, परंतु पत्थर का धागा कहां से आता! वह आदमी कुछ भी जवाब न दे सका और काजी के भय से थर-थर कांपने लगा।

काजी न्यायप्रिय तो था, परंतु स्वभाव से भी बड़ा कठोर भी था। उसे इस आदमी की धोखेबाजी मालूम हुई, तो बड़ा क्रोध आया। उसने हुक्म दिया कि इस बदमाश को हवालात में बंद करके बीस कोड़े लगवाओ। सिपाही उसे पकड़कर जेलखाने में ले गए।

अबकी बार काना खड़ा हुआ और अपनी आंख की चोरी का दावा पेश किया। भोले सौदागर ने कहा, “अन्नदाता! यह भी मेरे ऊपर झूठा इलज़ाम लगाता है। श्रीमान्‌ ख़ुद सोचकर देखें कि भला कहीं आंख भी चुराई जा सकती है। और अगर इसका दावा सच्चा है, तो मैं आंख देने के लिए तैयार हूं। पहले यह अपनी दूसरी आंख निकालकर सामने रखे, फिर मैं अपनी आंख निकालकर इसकी आंख के साथ तोलूंगा। अगर दोनों आंखों का वज़न एक ही हुआ तो मैं वह बड़ी ख़ुशी से दे सकता हूं, वरना इसे झूठ बोलने का उचित दंड दिया जाए। काजी ने काने की आंख निकालने का हुक्म दिया। यह हुक्म सुनकर काने के होश उड़ गए। उसे दूसरे की आंख के लालच में अपनी आंख भी जाती दिखाई पड़ी। वह काजी के पैर पकड़कर रोने लगा और माफी मांगने लगा। काजी ने सिपाहियों से कहा कि इसे भी बीस कोड़े लगाओ और अगर आगे से यह कोई हरकत करे तो आजीवन कैद में रखा जाए।

सबसे आखिर में शर्त लगाने वाला खड़ा हुआ और सौदागर से अपनी शर्त पूरी करने के लिए कहा। सौदागर ने काजी से कहा, “सरकार! यह आदमी भी ठगों की मंडली में से एक है। इसने धोखा देकर मुझसे ऐसी कठिन शर्त करा ली है, परंतु मैं इस असंभव शर्त को भी पूरा करने के लिए तैयार हूं। पहले आप इससे उन समस्त नदियों का पानी रुकवा दें, जो समुद्र में गिरती रहती हैं। यदि यह पानी बराबर उसी तरह समुद्र में गिरता रहा तो मैं कैसे पी सकूंगा?”

काजी ने उससे कहा कि सौदागर ठीक कहता है। तुम पहले नदियों का पानी रोको, बाद में सौदागर से पानी पीने के लिए कहा जाएगा।उसने यह सुना तो पसीना आ गया और आंखें मींचकर काजी की अदालत में लेट गया। काजी ने यह देखा तो उसे बड़ा क्रोध आया। उसने सिपाहियों को आज्ञा दी कि इसको बांध लो और इसकी पीठ पर कोड़े लगाओ। कोड़ों का नाम सुनकर उसने आंखें खोल दीं और रोना-पीटना शुरू किया। वह बार-बार अपने कान पकड़ता था और कहता था कि आइंदा कभी किसी के साथ धोखा न करूँगा। परंतु काजी अपने हुक्म पर अटल था। सिपाही उसको बांधकर जेल में ले जाने लगे।

सौदागर एक सज्जन व्यक्ति था, उसे बड़ी ही दया आयी। वह काजी से बोला, “हुजूर, इन लोगों को जो कुछ मेरे साथ करना था वह तो कर चुके। इन लोगों की करनी इनके साथ है। परंतु मुझे इस प्रकार की शिक्षा मिली है कि शत्रुओं के अपराधों को भी क्षमा कर देना चाहिए। इसलिए मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप इनके अपराधों को माफ कर दीजिए।”

सौदागर की यह बात सुनकर काजी बहुत खुश हुआ और उसने उन्हें क्षमा कर दिया। तीनों धोखेबाजों ने ईश्वर की शपथ खाकर कहा कि हम आगे से किसी के साथ दगा नहीं करेंगे।

सौदागर लाखों रुपए का चंदन बेचकर ख़ुशी-खुशी अपने घर लौट आया।