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Japan ki Lok Kathayen-1/ जापान की लोक कथाएँ-1

कहानी-प्यार के बदले प्यार: जापानी लोक कथा

एक गांव के किनारे बनी कुटिया में एक साधु रहता था । वह दिन भर ईश्वर का भजन-कीर्तन करके समय बिताता था । उसे न तो अपने भोजन की चिंता रहती थी और न ही धन कमाने की । गांव के लोग स्वयं ही उसे भोजन दे जाते थे । साधू उसी भोजन से पेट भर लिया करता था । उसे न तो किसी चीज की ख्वाहिश थी और न ही लालच । वह बहुत उदार और कोमल हृदय का व्यक्ति था । यदि कोई दुष्ट व्यक्ति उसे कभी कटु शब्द भी बोल देता, तो साधु उसका बुरा नहीं मानता था ।

सभी लोग साधु के व्यवहार की प्रशंसा किया करते थे । इसी कारण वे उसकी हर प्रकार से सहायता किया करते थे ।

एक बार कड़ाके की सर्दियों के दिन थे । साधु अपनी कुटिया में आग जलाकर गर्मी पाने का प्रयास कर रहा था । तभी उसे अपने दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी । साधु सोचने लगा कि सर्दी की रात में इस वक्त कौन आ सकता है ?

साधु ने दरवाजा खोला तो देखा की एक लोमड़ी बाहर खड़ी थी, जो सर्दी से कांप रही थी । लोमड़ी बोली – “मैं सामने के पहाड़ों में रहती हूं । वहां आजकल बर्फ गिर रही है, इस कारण मेरा जीना मुश्किल हो गया है । आप कृपा करके मुझे रात्रि में थोड़ी-सी जगह दे दीजिए । मैं सुबह होते ही चली जाउंगी ।”

साधु ने नम्रतापूर्वक उसे भीतर बुला लिया और कहा – “परेशान होने की कोई बात नहीं है । तुम जब तक चाहो यहां रह सकती हो ।”

कुटिया में जली आग के कारण लोमड़ी को राहत महसूस होने लगी । तब साधु ने लोमड़ी को दूध और रोटी खाने को दी । लोमड़ी ने पेट भर कर भोजन किया और एक कोने में सो गई ।

सुबह होते ही लोमड़ी ने साधु से बाहर जाने की आज्ञा मांगी । साधु ने उससे कहा कि वह इसे अपना ही घर समझकर जब चाहे आ सकती है ।

रात्रि होने पर लोमड़ी फिर आ गई । साधु ने उससे दिन भर की बातें कीं, थोड़ा भोजन दिया । फिर लोमड़ी एक कोने में सो गई ।

इसी तरह दिन बीतने लगे । लोमड़ी प्रतिदिन रात्रि होने पर आ जाती और सुबह होते ही जगंल की ओर चली जाती । साधु को लोमड़ी से एक बालक के समान प्यार हो गया ।

अब जब कभी लोमड़ी को आने में थोड़ी देर हो जाती तो साधु दरवाजे पर खड़े होकर उसकी प्रतीक्षा करता, और उससे देर से आने का कारण पूछता । लोमड़ी भी साधु से हिल-मिल गई थी और उसे बहुत प्यार करने लगी थी ।

कुछ महीने बीत जाने पर मौसम बदलने लगा । एक दिन लोमड़ी बोली – “आपने मेरी इतनी देखभाल और सेवा की है, मैं इसके बदले आपके लिए कोई कार्य करना चाहती हूं ।”

साधु ने कहा – “मैंने तुम्हारी देखभाल करके तुम पर कोई उपकार नहीं किया है । यह तो मेरा कर्तव्य था । इस तरह की बातें करके तुम मुझे शर्मिन्दा मत करो ।”

लोमड़ी बोली – “मैं किसी उपकार का बदला नहीं चुकाना चाहती । मुझे आपके साथ रहते-रहते आपसे प्यार हो गया है । इस कारण मैं आपकी सेवा करके स्वयं को गर्वान्वित महसूस करना चाहती हूं । मेरी हार्दिक इच्छा है कि मैं आपके काम आऊं ।”

साधु को लोमड़ी की प्यार भरी बातें सुनकर हार्दिक प्रसन्नता हुई । वह खुशी से गद्गद हो उठा और लोमड़ी के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला – “मुझे न तो किसी चीज की आवश्यकता है और न ही कोई विशेष इच्छा । गांव के लोग कुटिया में ही मेरा भोजन पहुंचा जाते हैं, मेरी बीमारी में वे मेरा ध्यान रखते हैं, मुझे और क्या चाहिए ?”

लोमड़ी बोली – “यह सब तो मैं जानती हूं । इतने महीनों तक आपके साथ रहकर आपकी आत्मसंतोष की प्रवृत्ति को मैंने अच्छी तरह देखा व सीखा है । फिर भी कोई ऐसी इच्छा हो जो पूरी न हो सकती हो तो बताइए । मैं उसे पूरा करने की कोशिश करूंगी ।”

साधु कुछ देर सोचता रहा, फिर सकुचाते हुए बोला – “यूं तो जीते जी मुझे किसी चीज की आवश्यकता नहीं है । फिर भी कभी-कभी सोचता हूं कि मेरे पास एक सोने का टुकड़ा होता जिसमें से कुछ मैं भगवान को चढ़ा देता और कुछ मेरे मरने पर मेरे क्रिया-कर्म के काम आ जाता । मैं गांव वालों की कृपा का बदला अपनी मृत्यु के बोझ से नहीं देना चाहता ।”

लोमड़ी साधु की बात सुनकर बोली – “बस इतनी सी बात है बाबा, इसमें आप इतना सकुचा रहे थे । मैं कल ही आपके लिए सोने का टुकड़ा ला देती हूं ।”

साधु ने कहा – “मुझे कोई भी ऐसा सोने का टुकड़ा नहीं चाहिए जो चोरी किया हुआ हो या किसी से दान में प्राप्त किया हो ।”

लोमड़ी साधु की बात सुनकर सोच में पड़ गई, फिर बोली – “बाबा, मैं आपके लिए ऐसा ही सोना लाकर दूंगी ।”

इसके बाद लोमड़ी बाबा की कुटिया से हर दिन की भांति चली गई । शाम होने पर साधु लोमड़ी का इंतजार करने लगा । परंतु घंटों बीत गए, लोमड़ी वापस नहीं आई ।

साधु को लोमड़ी की फिक्र में ठीक प्रकार नींद नहीं आई । इस प्रकार कई दिन बीत गए । परंतु लोमड़ी नहीं लौटी । साधु के मन में पश्चाताप होने लगा कि उसने बेकार ही ऐसी वस्तु मांग ली जो उसके लिए लाना संभव न था ।

कभी साधु के मन में यह ख्याल आता कि हो सकता है कि लोमड़ी कहीं से सोना चुराने गई हो और पकड़ी गई हो । फिर लोगों के हाथों मारी गई हो या लोमड़ी किसी दुर्घटना का शिकार हो गई हो ।

साधु को लोमड़ी की बहुत याद आती थी । जैसे ही वह रात्रि का भोजन करने बैठता, उसे लोमड़ी की मीठी बातें व साथ में भोजन खाना याद आ जाता था ।

कुछ महीने बीत गए और साधु को लोमड़ी की याद कम सताने लगी । साधु अपने भजन-कीर्तन में मस्त रहने लगा ।

अब लोमड़ी को गए छह महीने बीत चुके थे और सर्दी पड़ने लगी थी । एक दिन अचानक कुटिया के द्वार पर किसी ने दस्तक दी । साधु ने द्वार खोला तो यह देख कर हैरान रह गया कि द्वार पर पतली-दुबली लोमड़ी खड़ी थी ।

साधु ने कहा – “अंदर आओ । तुम इतनी दुबली कैस्से हो गई ?”

लोमड़ी ने खुशी के आंसू बहाते हुए सोने का टुकड़ा साधु के आगे रख दिया और अपना सिर साधु के चरणों में टिका कर बैठ गई ।

साधु लोमड़ी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोला – “तुम्हें इसके लिए इतना परेशान होने की क्या आवश्यकता थी, तुम नहीं जानती कि मैं तुम्हारे लिए कितना परेशान रहता था । तुम मेरे बालक के समान हो ।”

लोमड़ी बोली – “मैं इसके लिए बिल्कुल भी परेशान नहीं थी । मुझे तो अपना कर्तव्य पूरा करना था । आपके प्यार की मैं सदैव ऋणी रहूंगी । यह मेरी छोटी-सी भेंट आप स्वीकार कर लीजिए ।”

साधु का मन भी लोमड़ी का प्यार देखकर विचलित हो उठा । उसकी अश्रुधारा बह निकली । वह बोला – “लेकिन यह तो बताओ कि तुम इतने दिन कहां थीं, यह सोने का टुकड़ा कहां से लाईं ?”

लोमड़ी बोली – “जिन पहाड़ों पर मैं रहती हूं उसी के दूसरी तरफ सोने की खानें हैं । वहां पर खुदाई के वक्त सोने के कण गिरते जाते हैं । मैं उन्हीं कणों को इतने दिन तक इकट्ठा करती रही ।”

यह कह कर लोमड़ी साधु के पैरों में लोट लगाने लगी । साधु लोमड़ी को प्यार करते हुए बोला – “तुमने मेरे लिए इतनी मेहनत की है, इसके बारे में मैं सबको बताऊंगा ।”

लोमड़ी बोली – “मैं नहीं चाहती कि मेरी छोटी-सी सेवा के बारे में लोगों को पता चले । मैंने प्रसिद्धि के लालच में यह कार्य नहीं किया है । यह प्रेरणा मुझे आपके प्यार से ही मिली है । कल मैं जब यहां से चली जाऊं उसके बाद आपका जो जी चाहे कीजिएगा ।”

साधु बोला – “यह कैसे हो सकता है कि तुम्हारी इतनी मेहनत और सेवा को लोग न जानें ? लेकिन तुम यह नहीं चाहती तो यही सही । लेकिन अब मैं तुम्हें यहां से हरगिज जाने नहीं दूंगा । तुम्हें सदैव यहीं मेरे पास रहना होगा ।”

लोमड़ी मान गई और पहले की भांति साधु के साथ रहने लगी । अब वह हर रोज सुबह को चली जाती और शाम क आते वक्त जंगल से थोड़ी लकड़ियां बटोर लाती ताकि बाबा की ईंधन की आवश्यकता पूरी होती रहे । लोमड़ी साधु बाबा के साथ वर्षों तक बालक की भांति सुख से रही ।

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Japan ki Lok Kathayen-2/ जापान की लोक कथाएँ-2

कहानी-बोलने वाली रजाई: जापानी लोक कथा

“अंदर चले आएं, श्रीमान, अंदर चले आएं। मैं आपका ह्रदय से स्वागत करता हूं।” जैसे ही व्यापारी ने सराय के दरवाजे पर पांव रखा, सराय का मालिक खुशी में भर चिल्लाया।

यह सराय उसी दिन खोली गई थी और उस समय तक कोई भी व्यक्ति उस सराय में नहीं आया था। वास्तव में वह सराय प्रथम श्रेणी की सराय न थी। सराय का मालिक बहुत ही निर्धन मनुष्य था। उसका अधिकांश सामान, जैसे चटाइयां, मेजें, बर्तन इत्यादि एक कबाड़ी की दूकान से खरीदा गया था। व्यापारी को सराय पसंद आयी। अपना मन-पसंद भोजन करने के बाद वह बिस्तर पर जा लेटा, अभी वह कुछ ही देर सो पाया होगा कि उसे कमरे में दो आवाजें सुनाई दीं जिससे उसकी नींद उचट गई। ये आवाजें दो छोटे-छोटे लड़कों की मालूम होती थीं।

“प्यारे बड़े भाई, क्या आपको ठण्ड लग रही है? पहली आवाज थीं।

“क्या तुम्हें भी ठण्ड लग रही है? दूसरी आवाज सुनाई पड़ी।

व्यापारी ने सोचा कि शायद भूल से सराय के मालिक के बच्चे कमरे में आ गये हैं। ऐसा होने की संभावना भी अधिक थी, क्योंकि जापानी सरायों के कमरों में दरवाजे नहीं होते जिन्हें बंद किया जा सके। केवल कागज़ के पर्दे होते हैं जिन्हें इधर-उधर खिसका कर आने-जाने का रास्ता बनाया जा सकता है।”

श…श…व्यापारी ने कहा, “बच्चों, यह तुम्हारा कमरा नहीं है।” कुछ देर कमरे में शान्ति रही, पर फिर से वही आवाजें सुनाई दीं।

“प्यारे बड़े भाई, क्या आपको ठण्ड लग रही है?”

और उत्तर में आवाज आई, “क्या तुम्हें भी ठण्ड लग रही है?

व्यापारी बिस्तर से झुंझलाकर उठ बैठा। उसने मोमबत्ती जलाई और कमरे का ध्यानपूर्वक निरीक्षण किया। किन्तु कहीं कोई चुहिया का बच्चा भी तो नहीं मिला। उसने मोमबत्ती को जलता रहने दिया और चुपचाप बिस्तर पर जा लेटा।

कुछ क्षण बाद फिर दो आवाजें आईं, “प्यारे बड़े भाई, क्या आपको ठण्ड लग रही है”

और उत्तर में, “क्या तुम्हें भी ठण्ड लग रही है?” सुनाई पड़ीं।

आवाजें एक रजाई में से आ रही थीं। व्यापारी ने ध्यानपूर्वक दोनों आवाजों को सुना। जब उसे विश्वास हो गया कि आवाजें रजाई में से ही आ रही हैं तो उसने जल्दी-जल्दी अपना सामान बटोरा और एक गठरी बनाई। गठरी को लेकर वह सीधी से नीचे उतरा और सराय के मालिक से सारा हाल कह सुनाया।

“जनाब”, गुस्से में भरकर सराय का मालिक चीखा, “लगता है कि, आपने खाने के समय बहुत तेज शराब पी ली है इसलिए आपको बुरे स्वप्न दिखाई दिए। कहीं रजाइयां भी बोलती हैं?”

व्यापारी ने उत्तर दिया, “आपकी रजाइयों में से एक रजाई बोलती है। आप मुझसे असभ्यता पूर्वक बोले, इसलिए अब मैं इस सराय में एक घड़ी भी नहीं ठहरूंगा।” यह कह व्यापारी ने अपनी जेब से कुछ नोट निकाले और उन्हें सराय के मालिक की ओर फेंककर कहा, “यह रहा आपका किराया। मैं जा रहा हूं।” और वह चला गया।

अगले दिन कोई दूसरा व्यक्ति सराय में आया। उसने खाने के समय शराब भी नहीं पी, लेकिन वह सोने के कमरे में थोड़ी ही देर रहा होगा कि उसे भी वही आवाजें सुनाई दीं। वह भी सीढ़ी से नीचे आया और उसने भी सराय के मालिक से कहा कि एक रजाई में से दो आवाजें आती हैं।

“महोदय”, सराय का मालिक चिल्लाया, “मैंने आपको अधिक से अधिक आराम पहुंचाने की कोशिश की, इसका बदला आप मुझे ऐसी बेवकूफी से भरी कहानी सुनाकर चुकाना चाहते हैं। आप मुझे परेशान करना चाहते हैं।”

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, “जी नहीं, यह बेवकूफी से भरी कहानी नहीं है। मैं आपसे कसम खाकर कहता हूं कि मैंने एक रजाई से दो लड़कों की आवाजें आती सुनी हैं। मैं इस सराय में हरगिज नहीं रहूंगा।”

जब दूसरा ग्राहक भी नाराज होकर चला गया तो सराय के मालिक का माथा ठनका। वह ऊपर गया और उसने एक के बाद दूसरी रजाई उलटना-पलटना शुरू कर दिया। उसे भी एक रजाई में से दो आवाजें आती सुनाई दीं।-

“प्यारे बड़े भाई, क्या आपको ठण्ड लग रही है?”

“क्या तुम्हें भी ठण्ड लग रही है?”

सराय का मालिक उस रजाई को अपने कमरे में ले गया और रात भर उसे ओढकर सोया। रात भर दोनों लड़के एक से यही प्रश्न करते रहे अगले दिन सराय का मालिक उस रजाई को लेकर उस कबाड़ी की दूकान पर गया जहां से उसने उसे खरीदा था।

उसने कबाडी से पूछा, “क्या तुम्हें याद है कि यह रजाई तुमने मुझे बेचीं थी?”

“क्यों, क्या बात है?”

“तुमने यह रजाई कहां से खरीदी थी? इसके उत्तर में कबाडी ने पास की एक दूकान की ओर संकेत किया और बताया कि वह रजाई उस दूकान से खरीदी गयी थी।

सराय का मालिक उस पास वाली दूकान पर गया, किन्तु उसे पता चला कि उसके मालिक ने भी उसे किसी अन्य दूकान से खरीदी थी।

इस तरह वह कई दुकानों की धूल फांकता अंत में एक छोटे से मकान के मालिक के पास पहुंचा। उस मकान के मालिक ने यह रजाई अपने एक किरायेदार से वसूल करके बेची थी। इस किरायेदार के परिवार में केवल चार सदस्य थे –एक गरीब मां-बाप और उनके दो छोटे-छोटे बच्चे। पिता की आय बहुत कम थी। एक बार जाड़े के मौसम में ठण्ड खाकर पिता बीमार पड़ गया। एक सप्ताह तक भयंकर पीड़ा सहने के बाद वह चल बसा और उसके शरीर को दफना दिया गया। बच्चों की मां इस आघात को सहन न कर सकी और उसकी भी मृत्यु हो गयी।

अब दोनों भाई घर में बिलकुल अकेले रह गए थे। बड़े की उमर आठ साल थी और छोटे की छः साल। दोनों भाइयों का कोई मित्र न था जो उनकी इस विपत्ति में सहायता करता। उन्होंने भोजन-सामग्री जुटाने के लिए एक के बाद एक वस्तु को बेचना आरम्भ कर दिया। अंत में उनके पास केवल एक रजाई रह गई। बर्फ़ बहुत तेज गिरने लगी थी। दोनों भाई एक-दूसरे से सटकर रजाई ओढ़ कर लेट गए।

छोटे भाई ने बड़े से पूछा- “प्यारे बड़े भाई, क्या आपको ठण्ड लग रही है?”

बड़े ने उत्तर दिया, “क्यों, तुम्हें भी ठण्ड लग रही है?”

ये आवाजें रजाई में भरी रुई में होकर गुजरीं और जादू से उसमें गूंजने लगीं। तभी मकान-मालिक अपने मकान का किराया लेने आ पहुंचा। कुछ देर तो वह त्योरी चढाए मकान में टहलता रहा, फिर लड़कों को जगाकर कहा, “मकान का किराया लाओ।”

बड़े लड़के ने उत्तर दिया, “महोदय, हमारे पास इस रजाई के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।”

मकान-मालिक गुस्से में चिल्लाया, “मैं कुछ नहीं जानता। या तो मकान खाली कर दो या मकान का किराया लाओ। अभी मैं इस रजाई को किराए के रूप में रखे लेता हूं।”

दोनों भाई यह सुनकर थर-थर कांपने लगे। बड़े लड़के ने कहा, “महोदय बाहर बर्फ़ की मोटी तह जमी हुई है। हम कहां जाएंगे?

मकान-मालिक जोर से चिल्लाया, “बकवास मत करो और यहां से रफूचक्कर हो जाओ।” अंत में उन्हें बाहर निकलना ही पड़ा।

उनमें से हरेक केवल एक पतली कमीज पहने था। शेष कपड़े रोटी खरीदने में बिक चुके थे। वे उस मकान के पिछवाड़े जाकर, एक-दूसरे से सटकर बर्फ़ से पटी सड़क पर लेट गए। उनके ऊपर बर्फ़ की तह पर तह जमती चली गई। अब उनके चेतना-शून्य शरीरों को ठण्ड नहीं लग रही थी। अब वे सदा के लिए सो गए थे।

सुबह को एक राहगीर उधर से गुजरा। वह इन दोनों के मृत शरीर को दया की देवी के मंदिर में ले गया। जापानी मंदिरों में इस पवित्र देवी को जिसका सुंदर और दयावान मुख है और एक हजार हाथ भी हैं देखा जा सकता है। ऐसा कहा जाता है कि इस देवी के लिए स्वर्ग के दरवाजे खुले पड़े रहते हैं जहां इसको हर प्रकार का आराम और शांति मिलेगी। लेकिन फिर भी वह वहां इसलिए नहीं जाती क्योंकि उसे उन लाखों गरीब आत्माओं की, जो संसार में दुःख, बीमारी और अनेक विपत्तियां सहन कर रही हैं, चिंता है। उसका कहना है कि वह उनके साथ रहना पसंद करती है और उनकी अपने एक हजार हाथों से सहायता करेगी।

दोनों भाइयों को दया की देवी के मंदिर के एक कोने में दफना दिया गया। एक दिन उस सराय का मालिक उस मंदिर में आया और उसने मंदिर के पुजारी को तथा अन्य उपस्थित व्यक्तियों को उन आवाजों की दर्दभरी कहानी सुनाई। कहानी सुनाने के बाद उसने उस रजाई को पुजारी को दे दिया। उस दर्द-भरी कहानी को सुनकर पुजारी तथा अन्य व्यक्तियों के दृदय करुणा और पश्चाताप से भर गए। उन सब ने उन दोनों बच्चों की अकाल मृत्यु पर बड़ा दुःख प्रकट किया। रजाई में से अब आवाजें भी आनी बंद हो गईं, क्योंकि उसने अपना सन्देश सब को पहुंचा दिया। पुजारी तथा अन्य व्यक्तियों को यह जानकर अत्यधिक ग्लानि हुई कि उनके नगर के दो छोटे-छोटे बच्चे भूख और ठण्ड से मर गए थे।

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Japan ki Lok Kathayen-3/ जापान की लोक कथाएँ-3

कहानी-बुज़ुर्ग बोझ नहीं, अनमोल धरोहर: जापानी लोक-कथा

जापान के एक राज्य में किसी वक्त क़ानून था कि बुजुर्गों को एक निश्चित उम्र में पहुंचने के बाद जंगल में छोड़ आया जाए…जो इसका पालन नहीं करता था, उसे संतान समेत फांसी की सज़ा दी जाती थी…उसी राज्य में पिता-पुत्र की एक जोड़ी रहती थी…दोनों में आपस मे बहुत प्यार था…उस पिता को भी एक दिन जंगल में छोड़ने का वक्त आ गया…पुत्र का पिता से अलग होने का बिल्कुल मन नहीं था…लेकिन क्या करता…क़ानून तो क़ानून था…न मानों तो फांसी की तलवार पिता-पुत्र दोनों के सिर पर लटकी हुई थी… पुत्र पिता को कंधे पर लादकर जंगल की ओर चल दिया…जंगल के बीच पहुंचने के बाद पुत्र ऐसी जगह रूका जहां पेड़ों पर काफी फल लगे हुए थे और पानी का एक चश्मा भी था…पुत्र ने सोचा कि पिता की भूख-प्यास का तो यहां इतंज़ाम है…रहने के लिए एक झोंपड़ी और बना देता हूं… दो दिन तक वो वहीं लकड़ियां काट कर झोंपड़ी बनाने में लगा रहा…पिता के विश्राम के लिए एक तख्त भी बना दिया…पिता ने फिर खुद ही पुत्र से कहा…अब तुम्हे लौट जाना चाहिए…भरे मन से पुत्र ने पिता से विदाई ली तो पिता ने उसे एक खास किस्म के पत्तों की पोटली पकड़ा दी…

पुत्र ने पूछा कि ये क्या दे रहे हैं..तो पिता ने बताया…बेटा जब हम आ रहे थे तो मैं रास्ते भर इन पत्तों को गिराता आया था…इसलिए कि कहीं तुम लौटते वक्त रास्ता न भूल जाओ…ये सुना तो पुत्र ज़ोर ज़ोर से रोने लगा…अब पुत्र ने कहा कि चाहे जो कुछ भी हो जाए वो पिता को जंगल में अकेले नहीं छोड़ेगा…ये सुनकर पिता ने समझाया…बेटा ये मुमकिन नहीं है…राजा को पता चल गया तो दोनों की खाल खींचने के बाद फांसी पर चढ़ा देगा…पुत्र बोला…अब चाहे जो भी हो, मैं आपको वापस लेकर ही जाऊंगा…पुत्र की जिद देखकर पिता को उसके साथ लौटना ही पड़ा…दोनों रात के अंधेरे में घर लौटे…पुत्र ने घर में ही तहखाने में पिता के रहने का इंतज़ाम कर दिया…जिससे कि और कोई पिता को न देख सके…

पिता को सब खाने-पीने का सामान वो वही तहखाने में पहुंचा देता…ऐसे ही दिन बीतने लगे…एक दिन अचानक राजा ने राज्य भर में मुनादी करा दी कि जो भी राख़ की रस्सी लाकर देगा, उसे मालामाल कर दिया जाएगा…अब भला राख़ की रस्सी कैसे बन सकती है…उस पुत्र तक भी ये बात पहुंची…उसने पिता से भी इसका ज़िक्र किया…पिता ने ये सुनकर कहा कि इसमें कौन सी बड़ी बात है…एक तसले पर रस्सी को रखकर जला दो…पूरी जल जाने के बाद रस्सी की शक्ल बरकरार रहेगी…यही राख़ की रस्सी है, जिसे राजा को ले जाकर दिखा दो..(कहावत भी है रस्सी जल गई पर बल नहीं गए…)…बेटे ने वैसा ही किया जैसा पिता ने कहा था…राजा ने राख़ की रस्सी देखी तो खुश हो गया…वादे के मुताबिक पुत्र को अशर्फियों से लाद दिया गया…

थोड़े दिन बात राजा की फिर सनक जागी…इस बार उसने शर्त रखी कि ऐसा ढोल लाया जाए जिसे कोई आदमी बजाए भी नहीं लेकिन ढोल में से थाप की आवाज़ लगातार सुनाई देती रहे…अब भला ये कैसे संभव था…गले में ढोल लटका हो, उसे कोई हाथ से बजाए भी नहीं और उसमें से थाप सुनाई देती रहे…कोई ढोल वाला ये करने को तैयार नहीं हुआ…

ये बात भी उसी पुत्र ने पिता को बताई…पिता ने झट से कहा कि इसमें भी कौन सी बड़ी बात है…पिता ने पुत्र को समझाया कि ढोल को दोनों तरफ से खोल कर उसमें मधुमक्खियां भर दो…फिर दोनों तरफ़ से ढोल को बंद कर दो…अब मधुमक्खियां इधर से उधर टकराएंगी और ढोल से लगातार थाप की आवाज़ आती रहेगी…पुत्र ने जैसा पिता ने बताया, वैसा ही किया और ढोल गले में लटका कर राजा के पास पहुंच गया…ढोल से बिना बजाए लगातार आवाज़ आते देख राजा खुश हो गया…फिर उसे मालामाल किया…लेकिन इस बार राजा का माथा भी ठनका…

उसने लड़के से कहा कि तुझे इनाम तो मिल ही गया लेकिन एक बात समझ नहीं आ रही कि क्या पूरे राज्य में अकेला तू ही समझदार है…कुछ राज़ तो है…राज़ बता तो तुझे दुगना इनाम मिलेगा…इस पर लड़के ने कहा कि ये राज़ वो किसी कीमत पर नहीं बता सकता…राजा के बहुत ज़ोर देने पर लड़के ने कहा कि पहले उसे वचन दिया जाए कि उसकी एक मांग को पूरा किया जाएगा…राजा के वचन देने पर लड़के ने सच्चाई बता दी…साथ ही मांग बताई कि उसी दिन से बुज़ुर्गों को जंगल में छोड़कर आने वाले क़ानून को खत्म कर दिया जाए और जो बुज़ुर्ग ऐसे हालत में जंगल में रह भी रहे हैं उन्हें सम्मान के साथ वापस लाया जाए…राजा ने वचन के अनुरूप फौरन ही लड़के की मांग मानते हुए उस क़ानून को निरस्त कर दिया…साथ ही जंगल से सब बुज़ुर्गों को वापस लाने का आदेश दिया…

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Japan ki Lok Kathayen-4/ जापान की लोक कथाएँ-4

कहानी-मैले कपड़े: जापानी लोक-कथा

जापान में ओसाका शहर के निकट गांव में एक विद्वान संत रहते थे। एक दिन संत अपने एक अनुयायी के साथ सुबह की सैर कर रहे थे। अचानक एक व्यक्ति उनके निकट आया और उन्हें भला बुरा कहने लगा। संत मुस्कराकर चल दिए। संत पर कोई असर न देख वह व्यक्ति परेशान हो गया। वह गुस्से से तमतमा उठा और उनके पूर्वजों को गालियां देने लगा। फिर भी संत मुस्कराते रहे। संत पर जब कोई असर नहीं हुआ तो वह व्यक्ति निराश होकर रास्ते से हट गया।

उस व्यक्ति के जाते ही एक अनुयायी ने संत से पूछा- ‘आपने उस दुष्ट की बातों का कोई जवाब क्यों नहीं दिया, वह बोलता रहा और आप मुस्कराते रहे। क्या आपको उसकी बातों से जरा भी कष्ट नहीं हुआ?’

संत कुछ नहीं बोले और अपने अनुयायी को पीछे आने का इशारा किया कुछ देर बाद संत के साथ वह अनुयायी कक्ष में पहुंचा। संत बोले- ‘तुम यहीं रुको, मैं अंदर से अभी आता हूं।’

कुछ देर बाद संत अपने कमरे से निकले तो उनके हाथों में कुछ मैले कपड़े थे। उन्होंने बाहर आकर उस अनुयायी से कहा, ‘ये लो, तुम अपने कपड़े उतारकर इन्हें धारण कर लो।’

उस व्यक्ति ने देखा कि उन कपड़ों में बड़ी तेज दुर्गध है, उनसे अजीब-सी बदबू आ रही थी। अनुयायी ने उस कपड़े को हाथ में लेते ही उन कपड़ों को दूर फेंक दिया।

संत बोले- ‘अब समझे ? जब कोई तुमसे बिना मतलब के भला-बुरा कहता है तो तुम क्रोधित होकर उसके फेंके हुए अपशब्द धारण कर लेते हो, लेकिन दूसरे के गंदे कपड़े नहीं पहन सकते जिस तरह तुम अपने साफ-सुथरे कपड़ों की जगह ये मैले कपड़े धारण नहीं कर सकते उसी तरह मैंने भी उस आदमी के फेंके हुए अपशब्दों को धारण नहीं किया। यही वजह थी कि मुझे उसकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।’

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Japan ki Lok Kathayen-5/ जापान की लोक कथाएँ-5

कहानी-सम्राट और बूढ़ा आदमी: जापानी लोक कथा

जापान के एक सम्राट के पास बीस सुंदर फूलदानियों का एक दुर्लभ संग्रह था। सम्राट को अपने इस निराले संग्रह पर बड़ा अभिमान था। एक बार सम्राट के एक सरदार से अकस्मात एक फूलदानी टूट गई इससे सम्राट को बहुत गुस्सा आया उसने सरदार को फाँसी का आदेश दे दिया। पर एक बूढ़े ब्यक्ति को इस बात का पता चला वह सम्राट के दरबार में हाजिर हुआ। और बोला, “मै टूटी हुई फूलदानी जोड़ लेता हूँ मै उसे इस तरह जोड़ दूगाँ कि वह पहले जैसी दिखाई देगी।” बूढ़े की बात सुनकर सम्राट बड़ा खुश हुआ। उसने बूढ़े को बची हुई फूलदानियो को दिखाते हुए कहा, “ये कुल उन्नीस फूलदानियाँ है। टूटी हुई फूलदानी इसी समूह की है। अगर तुमने टूटी हुई फूलदानी जोड़ दी तो मैं तुम्हे मुँह माँगा इनाम दूँगा।” सम्राट की बात सुनते हुए बूढ़े ने लाठी उठाई और तड़ातड़ सभी फूलदानियाँ तोड़ दी।

यह देखकर सम्राट गुस्से से आग बबूला हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, “बेवकूफ तूने यह क्या किया। बूढ़े आदमी ने सहजभाव से उत्तर दिया। महाराज मैंने अपना कर्तव्य निभाया है। इनमे से हर फूलदानी के पीछे एक आदमी की जान जानेवाली थी। मगर आप केवल एक आदमी की जान ले सकते हैं। सिर्फ मेरी!”

बूढ़े आदमी की चतुराई और हिम्मत देखकर सम्राट प्रसन्न हो गया। उसने बूढ़े आदमी और अपने सरदार दोनो को माफ कर दिया।

शिक्षा – बुराई से लड़ने के लिए एक ही साहसी व्यक्ति काफी होता है।