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Malaysia ki Lok Kathayen-1/ मलेशिया/मलाया की लोक कथाएँ-1

कुमारी वाह-वाह: मलेशिया/मलाया की लोक-कथा

बहुत समय पहले की बात है,  पूर्व के एक देश में एक आदमी तथा उसकी औरत रहते थे। उनके केवल एक बेटी थी। उन्हें अपनी बेटी से बहुत स्नेह था। इतना स्नेह कि उसमे दोनों पति-पत्नी मूर्ख हो चले थे। जब वह लड़की छोटी ही थी तब से वे उसके मुंह की ओर निहारते हुए बोल उठते – “अहा! हमारी बेटी कितनी रूपवती है! इस गांव में तो क्या, दूर-दूर तक के गांवों में भी हमारी बेटी जैसी सुंदर लड़की ढूंढने पर भी न मिलेगी। हमारी ‘वाह-वाह’ तो सचमुच ही एक अप्सरा है, अप्सरा!”

वाह-वाह-जो उस लड़की का नाम था यह सब कुछ सुनती रहती थी और बचपन से ही अपने मन में इसको सोचती रहती थी। दिन बीतते गए और वाह-वाह भी अपनी बुद्धि की कसौटी पर इस बात को तोलने लगी। उसके मन में समय के साथ-साथ यह बात घर कर गई कि वह बहुत रूपवती है और उसकी जैसी सुंदरी इस दुनिया में कहीं भी नहीं है।

साल-पर-साल बीतते गए। वाह-वाह भी बड़ी होती गई और सचमुच ही वह युवती होने पर एक सुंदरी प्रकट हुई। उसको जवान होते देखकर माता-पिता को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। वे सोचने लगे-‘हमारी रूप-गुण-यौवन-संपन्न वाह-वाह के लिए ऐसा ही पति होना चाहिए।’

कई जवानों के नाम उसके सामने नाते के लिए पेश किए गए, परंतु उन्हें उनमें से कोई भी पसंद न आया । दूर-दूर के शहरों और गांवों से वाह-वाह से शादी करने के लिए जवान आते रहे लेकिन या तो वाह-वाह के माता-पिता को ही वे मंजूर न हुए, या वाह-वाह ने उनमें दोष निकाला। यदि उसके माता-पिता किसी जवान को अपना दामाद बनाने पर सहमत भी हो जाते तो वाह- वाह राजी न होती। वाह-वाह के नाराज़गी दिखाने का एक अनोखा तरीका यह था कि वह अपने कमरे के दरवाज़े-खिड़कियां बंद करके बैठ जाती थी। जब उसके माता-पिता कारण पूछने आते तो कहती-“मुझे यह वर पसंद नहीं है।”

दिन बीतते देर नहीं लगती। वाह-वाह अब एक पूरी बालिग स्त्री हो चली थी परंतु उसका विवाह कहीं भी तय न हो पाया। उसके माता-पिता इस कारण बहुत दुःखी रहने लगे। उन्हें और भी दुःख तब होता था जब वे अपने पास-पड़ोस की तथा वाह-वाह से कम सुंदरी युवतियों को विवाह करते, घर बसाते और सुख का जीवन बिताते देखते थे। वे मन-ही-मन में सोचते-‘हाय! हमारी वाह-वाह का भी विवाह हुआ होता, तो हम भी सुख की सांस लेते होते!’

इसी बीच वाह-वाह की मां एक दिन रसोईघर में खाना बनाने में लगी हुई थी। वाह-वाह भी उसी के पास बैठी हुई थी। उसने अपनी ठोड़ी अपनी हथेली पर रखी हुई थी और न मालूम क्या सोच रही थी। फिर एकदम उसकी विचारधारा मानो भंग हुई और वह बोल उठी-“माँ, प्यारी माँ, मैंने अब विवाह करने का निश्चय कर लिया है।”

उसकी मां ने ये शब्द सुने तो मानो उसे अपने कानों पर भरोसा न हुआ। उसने उसके सिर पर प्रेम-भरा हाथ फेरते हुए कहा, “प्यारी बिटिया! अच्छी बिटिया! कितनी अच्छी हो तुम। मुझे तुमसे यही आशा थी। कितने ख़ुश होंगे तुम्हारे पिता यह बात सुनकर और कितनी जल्दीय वह तुम्हारे योग्य वर ढूंढ निकालेंगे ।”

परंतु वाह-वाह ने उसकी बात को काटते हुए अपने गंभीर भाव से कहा,

“जानती हो मां, मैंने किससे विवाह करने का निश्चय किया है?”

“नहीं तो, बिटिया!”

“मैं अपने से सुंदर वर को वरूंगी और वह है सूर्य! सूर्य के चमकते हुए मुखड़े से मेरा प्रेम हो गया है। सुनहरे रथ पर चढ़ा मुझे वह कितना प्यारा लगता है! जब वह मेरी ओर देखता है तो मैं इतनी प्रसन्न हो उठती हूं कि मेरा चेहरा दमक उठता है।”

सुनकर उसकी मां पर मानो बिजली गिरी और वह घबराकर बोली, “बेटी, क्या कह रही है तू? पागल तो नहीं हो गई! कहां सूर्य और कहां तू?”

“तो आप मेरी सत्य बात को पागलपन समझती हैं?

उसकी मां ने एक लम्बी आह भरकर कहा, “बेटी, यह पागलपन नहीं तो और क्या है? क्या सूर्य देवता ने भी आज तक किसी साधारण स्त्री से विवाह किया है!”

“तो क्या मैं एक साधारण स्त्री हूं! यह नहीं हों सकता। आप लोग ही तो कहते रहे हैं कि मैं अन्य स्त्रियों से अलग हूं, और है भी सत्य। मैं और स्त्रियों से अधिक रूपवती हूं।”

“परंतु बेटी, तुम इतनी नहीं हो कि सूर्यदेव तुम्हें वर लें। हम तो इस लोक के हैं और वह अलग लोक के।”

इस पर वाह-वाह ने और भी जोरदार शब्दों में कहा, “मेरा निश्चय अटल है। मैं विवाह करूंगी तो सूर्य से नहीं तो किसी से भी नहीं ।”

उसकी मां को अब और भी चिंता सताने लगी। शाम को वह अपने पति के साथ बहुत समय तक अपनी बेटी की मूर्खता की बातों पर विचार करती रही। वे कहने लगे, “हाय-हाय! हम लोगों ने स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाई है। हमने ही इसको इतना घमंडी बनाया है। अब हो तो क्या हो? पास-पड़ोसवालों से भी अपने दुःख की बात कैसे कहें? उन्हें तो हमने कभी आदर की दृष्टि से देखा भी नहीं।”

इस पर उसकी मां ने कहा, “पतिदेव, बेटी बहुत बिगड़ गई है। अब उसे किसी ऐसे आदमी को सौंप दिया जाए जो बड़ा क्रूर हो और इसको अपने अधीन कर पाए और इसका दिमाग ठिकाने लाए।”

यह बात तय करके वे सो गए। सुबह हुई तो क्या देखा कि वाह-वाह घर पर नहीं थी। न मालूम वह किस समय और कहां चल पड़ी थी। अब वे उसको तलाश करने लगे परंतु उसका पता कहीं न चला।

उधर वाह-वाह सूर्यदेव से शादी करने के लिए रात के अंधेरे में ही चल पड़ी थी। वह कई दिनों तक घने जंगलों में आगे ही बढ़ती गई। वह आगे-आगे जाती थी और सूर्यदेव की ओर एकटक देखती जाती थी। अंत में एक समय ऐसा आया कि सूर्य उसकी आंखों से बिलकुल ओझल हो गया। उसके चारों ओर अंधेरा-ही-अंधेरा छा गया। उसे कुछ न सूझा पर उसे मालूम न था कि वह सूर्यदेव की ओर जाने के पथ पर सीधी जा रही है, इसीलिए वह और भी आगे जाने लगी। चलती-चलती वह न मालूम कहां पहुंच गई । एक दिन सूर्य ने उसे फिर अपना मुखड़ा दिखाया और उस पर मुस्कराए। वह इतनी तेज़ी से मुस्कराए कि वाह-वाह से उसका मुस्कराना सहन न हो सका। जितना वह सूर्य के समीप पहुंचती गई उतनी ही तेज़ गर्मी उसको लगने लगी, यहां तक कि वह अब उसकी ओर देख भी न सकती थी। अब उसकी आंखें दुखने लगीं। वह बिना देखे आगे-ही-आगे बढ़ती गई। उसने अपने मन में सोचा, ‘मैं कदापि घर न लौटूँगी, चाहे कुछ भी हो, मैं सूर्य से विवाह करके ही दम लूंगी।’

वह मन में यह सोच रही थी और सूर्य और भी तेज़ प्रकाश से उस पर चमकता रहा। जो उसे उसका मुस्कराना लगता था अब उससे सहन न हो सका। वह भय से कांप उठी, तो भी अपने घमंड ने उसे यह आज्ञा न दी कि वह भली लड़की की तरह घर लौट जाए। उसका रास्ता खो गया और वह एक अत्यंत घने जंगल में भटकने लगी। जंगल इतना घना था कि दिन में भी रात का-सा अंधेरा था और हाथ को हाथ नहीं सूझता था।

उधर वाह-वाह का मुंह जो झुलस गया था । उसकी आंखें मानो किसी मशीन के पेचों की तरह कसी जाने लगीं। वह अगर कुछ बोलती तो अपनी बात भी उसके कानों को उसकी एक अजीब-सी बोली प्रतीत होने लगती। यह देख वह भयभीत हो गई और चिल्ला उठी, “हाय-हाय! मुझे यह क्या हो गया? मैं भागकर घर जाऊंगी और मां से पूछूंगी कि मेरा यह क्या हाल हो गया है?”

वह एकदम उल्टे पांव भाग खड़ी हुई | वह वायु जैसी तेज़ी से घर की ओर भागने लगी। वह भागती चली और भागती चली, यहां तक कि अपने घर पहुंच गई। परंतु वाह-वाह अब सुंदरी न रही थी। उसके सारे शरीर पर झुर्रियां पड़ी हुई थीं, उसकी कमल-सी आंखें घट-घटकर छोटी हो चली थीं और वह बहुत कुरूप हो गई थी। उसे अब कोई न पहचान सकता था। उसे तो सूर्य ने अपनी तेज़ गर्मी से झुलस दिया था और उसकी शक्ल एक बंनदी की-सी हो गई थी। उसका घमंड अब दूर  हो गया था। अब उसने एक ऐसे बूढ़े आदमी से विवाह किया जिसके सारे मुंह पर मांस लटक गया था और वह कब्र के समीप पहुंच चुका था।

वाह-वाह को अब सब बंनदी कहने लगे पर वह चुपचाप सुनती रही। उनके जो संतान हुई वे तो पूरे बंदर थे। आप अगर आजकल भी उस देश में जाएंगे तो शाम के समय वाह-वाह बंनदी की आवाज़ जो वहां होती है, अवश्य सुनेंगे। वह पेड़ पर बैठकर आज भी सूर्य को पुकार रही होती है।