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Misr (Egypt) ki Lok Kathayen-4 (मिस्र की लोक कथाएँ-4)

कहानी-समझदार बीवी (Samajhdaar Biwi): मिस्र की लोक-कथा

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काहिरा का काजी बहुत ईमानदार था। उसके न्याय की तराजू बहुत प्रसिद्ध थी वह पैसे वाला भी था। काजी की बेटी बहुत सुंदर थी और उसकी दुनिया भर में बड़ी चर्चा थी। उसकी मुलाकात अमीन नामक एक युवक से हो गई, वह शादीशुदा था, एक गुणी और बुद्धिमती पत्नी का पति। अमीन का बाप काहिरा का एक अमीर व्यापारी था, इस नाते अमीन को काम से कम ही फुर्सत मिल पाती। लेकिन दोनों की आँख लड़ ही गई और दोनों में गजब का प्रेम हो गया। जवानी के प्यार का मामला ठहरा, अब दोनों मेल-मुलाकात का मौका ढूंढते। फिर ऐसी स्थिति आ गई दोनों एक दूसरे के बिना रह नही सकते थे। संदेशो और चिट्ठियों से बात करते और किसी पुरानी खण्डहरनुमा हवेली में मिलने भी लगे थे।

शहर का कोतवाल काजी का बहुत बड़ा दुश्मन था। किसी मामले में काजी ने उस को डांट-फटकार लगा दी थी। इस प्रकरण को देखकर उसकी तो बांछे खिल गई। कोतवाल काजी को फसाने के लिए मौके की तलाश में रहता ही था। उसने अपना एक सिपाही अमीन और काजी की बेटी के पीछे लगा दिया। एक दिन जब काजी की बेटी जिसका नाम सित्त-अल-हुस्न था वह अमीन से किसी पुरानी इमारत में छुपकर मिल रही थी, कोतवाल को इसकी खबर लग गई। कोतवाल ने उन्हें चारों ओर से घेर कर पकड़ लिया।

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Misr (Egypt) ki Lok Kathayen-3 (मिस्र की लोक कथाएँ-3)

कहानी-राहगीर की बुद्धिमत्ता (Rahgir ki Buddhimata): मिस्र की लोक कथा

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बहुत पुरानी बात है, एक व्यापारी था । जिसका नाम था ज़बारी। उसने अपने पिता का व्यापार कुछ समय पहले ही संभाला था । एक बार वह अपने ऊंट पर कुछ सामान लादकर दूसरे शहर के लिए चल पड़ा। बहुत तेज गर्मी थी और रास्ते कंटीले व रेतीले थे| अचानक तेज़ आंधी चलने लगी, ज़बारी एक ठीक-ठाक सी सराय देखकर वहां रुक गया।

उसने ऊंट से सामान उतारा और ऊंट को बाहर ही बांध दिया । वह दिन भर का थका हुआ था तो उसे लेटते ही गहरी नींद आ गई । सुबह को जब वह सोकर उठा तो ऊंट गायब था यह देखकर वह घबरा गया । तभी उसने देखा कि उसका सामान भी वहां नहीं है, वह रोने लगा ।

ज़बारी रोते-रोते सराय के मालिक से पूछने पहुंचा पर सराय मालिक को ऊंट के बारे में कोई भी जानकारी नहीं थी । ज़बारी ऊंट की खोज में तेजी से शहर की ओर चल दिया । परंतु दूर- दूर तक सड़कें सुनसान थीं । ऊंट तो क्या,  कोई आदमी भी नजर नहीं आ रहा था । काफी दूर चलने पर उसे एक राहगीर मिला, ज़बारी ने उस राहगीर से पूछा, “भाई, क्या आपने इधर से किसी आदमी को ऊंट ले जाते देखा है ?”

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Misr (Egypt) ki Lok Kathayen-2 (मिस्र की लोक कथाएँ-2)

कहानी – जैसे को तैसा (Jaise ko Taisa): मिस्र की लोक कथा

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बुबाश का गरीबी के मारे बुरा हाल था, उसके घर में कई दिनों से खाने को कुछ भी नहीं था । उसकी पत्नी फ़ातिमा उसे रोज समझाती कि समझ और मेहनत से काम किया करो, परंतु बुबाश बहुत सीधा, भोला-भाला, मासूम था । इसी कारण हर जगह धोखा खा जाता था । कभी सीधेपन के कारण उससे भूल हो जाती तो कभी कोई उसे धोखा दे देता, जिससे उसे अपनी दिहाड़ी तक पूरी नहीं मिलती थी ।

एक दिन बुबाश की पत्नी ने समझाया कि क्यों न तुम अपने मित्र गामाल के पास जाकर कोई काम मांगो । कम से कम वह धोखा तो न देगा । उसके पास ढेर सारी जमीन, घोड़े, बैल हैं । वह तुम्हें खेतों या जानवरों की देखभाल का काम ज़रूर दे देगा । फिर हमें हर महीने गुजारे लायक कुछ न कुछ अवश्य मिल जाएगा ।

अपनी पत्नी की सलाह मानकर बुबाश गामाल के पास पहुंच गया । गामाल बहुत चालाक और स्वार्थी बन चुका था । फिर भी अपनापन दिखाते हुए बुबाश से बोला, “ठीक है, अपने एक खेत की जिम्मेदारी हम तुम्हें दे देते हैं । इस पर सारी खेती तुम करोगे । जो भी फसल होगी, आधी तुम्हारी आधी मेरी ।”

बुबाश ने घर जाकर खुशखबरी अपनी पत्नी फ़ातिमा को सुनाई । पत्नी खुश हो गई और सोचने लगी – अब हमारे दिन बदल जाएंगे । हमें पैसे की कमी नहीं रहेगी ।

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Misr (Egypt) ki Lok Kathayen-1 (मिस्र की लोक कथाएँ-1)

कहानी- बिन मां के बच्चे (Bin Maa ke bachhe): मिस्र की लोक-कथा

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बहुत समय पहले की बात है। एक आदमी अपने परिवार के साथ एक छोटे से गांव में रहता था। जब उसके बच्चे छोटे ही थे तभी उनके माँ की मृत्यु हो गयी। बच्चों की देखभाल के लिए पति को दूसरी शादी करनी पड़ी। कुछ सालों के बाद सौतेली माँ ने भी दो बच्चों को जन्म दिया। अब चारों भाई-बहन एक साथ रहते थे।

समय बीतते सौतेली माँ एकदम बदल गयी। वह अपने बच्चों को अच्छा खाना खिलाती और रंगीन कपड़े पहनाती थी और सौतेले बच्चों को पुराने कपड़े पहनाती थी। कुछ दिनों बाद सौतेली माँ ने उन्हें सूखी रोटी देकर गौशाला भेजना शुरू कर दिया। अब वे दिन भर गौशाला में रहते और भूखे-प्यासे शाम को घर आते थे। ऐसे में उन्हें अपनी माँ की बहुत याद आती थी।

एक दिन दोनों बच्चों ने अपने हाथ की सूखी रोटी, अपनी काली गाय को देते हुए कहा, “माँ तुम हम पर ऐसी दया करो, जैसी हमारी माँ हम पर करती थी।” इतना कहना था कि गाय के थनों से दूध निकल आया। दोनों बच्चों ने खुश होकर भरपेट दूध पिया। अब वे रोज हाथ की रोटी उसे देते और गाय उन्हें भरपेट दूध पिलाती थी। इससे वे खुश रहते थे और उन्हें गौशाला जाना भी अच्छा लगने लगा।