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Nepal ki Lok Kathayen-6/ नेपाली लोक कथाएँ-6

कहानी-सियार का फैसला: नेपाली लोक-कथा

एक था सियार। एक दिन वह अपने शिकार की तलाश में जा रहा था। उसने दूर से देखा, एक आदमी एक बाघ के आगे-आगे चल रहा है। उसे दाल में कुछ काला नजर आया और वह नजर बचाकर चलने लगा। तभी उसे आदमी की आवाज़ सुनाई पड़ी, ‘मंत्री जी, मंत्री जी, जरा रुकिए।’ सियार ने अनसुनी-सी करते हुए अपनी चाल की गति को बढ़ाई। आदमी ने फिर आवाज दी ‘श्रृंगाल महोदय! जरा मेरी फरियाद तो सुनते जाइए। मैं आपके पास ही आ रहा था।’

सियार ने सोचा, ‘यह निश्चय ही सीधा-साधा व्यक्ति संकट में फंस गया है। उसकी सहायता करना तो धर्म है। जरा इसकी बात सुन लें।’

यह विचार आने पर सियार रुक गया और कहने लगा, ‘जल्दी बोलो। मुझे भी कहीं जल्दी पहुंचना है।’

बाघ और आदमी सियार के निकट पहुंच गए। सियार कहने लगा, ‘दूर से, जरा दूर से ही बात करो तो बेहतर हो।’

आदमी कहने लगा, ‘मैं एक गरीब ब्राह्मण हूं। पुरोहिताई करके जीवन गुजारता हूं और इसी सिलसिले में पहाड़ी के उस पास के गांव की ओर जा रहा था। रास्ते में इन बाघ महाशय को एक पिंजड़े में बंद पाया। मुझे देखकर यह सहायता की गुहार करने लगे और इन्होंने मुझे हानि न पहुंचाने और एक मित्र की भांति संकट आने पर मेरी सहायता करने की शपथ ली। संकट में फंसे इस प्राणी के प्रति मेरे मन में दया आ गई। इनके मन में कपट-भाव होने का मुझे तनिक भी एहसास न हुआ। मैं धर्म-कर्म पर आस्था रखने वाला व्यक्ति हूंस सोचा कि इन्हें संकट से उबारकर मैं कुछ धर्म कमा लूंगा। लेकिन अब संकटमुक्त होने पर यह अपने वायदे से मुकर रहे हैं, शपथ तोड़ रहे हैं और मुझे खाकर अपनी भूख मिटाना चाहते हैं। मेरे उपकार का क्या यही फल है, यही जानने के लिए हम आपके पास आ रहे थे। कृपया न्याय कर दीजिए। बड़ी कृपा होगी।’

आदमी की बातों को सुनकर सियार कुछ देर सोच में पड़ गया। उसकी आंखें कुछ देर के लिए बंद हो गईं। उसकी मुद्रा देखकर बाघ के होंठ कुटिल मुस्कुराहट में हिलने लगे। सियार ने आंखें खोलने पर बाघ के चेहरे पर कुटिल मुस्कराहट देखी। उसने गंभीर स्वर में बोलते हुए कहा, ‘बाघ भैया! अब जरा आपकी भी बात सुन ली जाए। पता तो चले कि यह आदमी कितना सच बोल रहा है?’

बाघ कहने लगा, ‘यह सच है कि इसने मुझे एक पिंजड़े से आजाद किया। लेकिन अपने को मुक्त पाने और इसे सामने देखने के बाद मुझे जो भूख जगी, उसे मैं दबा नहीं पा रहा हूं। लेकिन बार-बार यह मेरी शपथ और दोस्ती की बात याद दिलाकर मुझे रोक रहा है। आते हुए रास्ते में मुझे जो भी प्राणी मिले, उनसे भी इसने न्याय का अनुरोध किया, लेकिन सभी प्राणियों का कहना है कि मानव जाति मुंह की जितनी मीठी होती है, उतनी ही स्वार्थी, अविश्वसनीय और कृतघ्न भी होती है। अपना काम निकल जाने पर आदमी किसी के प्रति भी दया-भाव नहीं रखता, भले ही उसने उसी सेवा या सहायता ही क्यों न की हो? इसीलिए तुम भी अपने वायदे को तोड़कर अपनी भूख को मिटाते हो तो इसमें कोई बुराई नहीं है।’

सियार ने पूछा, ‘वे कौन प्राणी थे’

‘वे गाय, भैंस, बैल, ऊंट आदि थे।’ बाघ ने कहा, ‘गाय का कहना है, ‘जब तक मैं दूध देती रही, मेरा मालिक मेरी बड़ी सेवा करता रहा। कभी हरी हरी घास, तो कभी चने-बिनौले खिलाता। लेकिन जब मैंने दूध देना बंद किया तो उसी मालिक ने मुझे जंगल में भटकने और किसी जंगली जानवर का शिकार बनने के लिए छोड़ दिया। यदि भूले भटके मैं उधर उसकी गौशाला की ओर जाती हूं तो वह मुझे डंडे मारकर भगा देता है।’ भैंस, बैल और ऊंट की भी व्यथा ऐसी ही है। वे सभी मानव जाति के स्वार्थ के शिकार बनकर जंगल में भटक रहे हैं। बैल तो बूढ़ा हो गया है और उसमें गाड़ी खींचने या खेत जोतने की शक्ति नहीं रही।’

सियार ने बात काटते हुए कहा, ‘हां, उनकी बातों में कुछ सच्चाई तो दिखती है।’ इतना कहने के बाद सियार उस ओर मुड़ गया, जिस ओर से बाघ और आदमी आ रहे थे।

बाघ को सियार की टिप्पणी से कुछ खुशी हुई और वह आगे कहने लगा, ‘उनका यह भी कहना है कि मानव अत्यंत ही अविश्वसनीय प्राणी हैस क्योंकि वह कब पैंतरा बदल दे, पता नहीं। यदि आदमी कृतघ्न हो सकता है तो मेरा पैंतरा बदलना कोई जुर्म नहीं हो सकता।’

सियार ने कहा, ‘उन प्राणियों की व्यथा तो वास्तव में ही दर्दनाक है। लेकिन बाघ भैया, वह पिंजड़ा कहां है, जिसमें आपको बंद देखकर इसने मुक्त कर दिया था।’

बाघ कहने लगा, ‘थोड़ी ही दूर आगे पिंजड़ा है।’

सियार ने पूछा, ‘तो बाघ भैया, आपने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने की ही ठान ली’

‘हाँ क्योंकि जंगलराज में सबसे बड़ा धर्म है अपना पेट भरना। अतस् इसे अपना शिकार बनाकर भूख मिटाना मेरी दृष्टि में प्रतिज्ञा तोड़ना नहीं होगा।’ बाघ ने कहा। तब तक सियार की नजर पिंजड़े पर पड़ गई। फिर भी अनजान सा बनकर पूछने लगा, ‘अच्छा बाघ भैया, जरा यह तो बताइए पिंजड़ा किस वस्तु का थार लोहे का या लकड़ी का’

बाघ कहने लगा, ‘लोहे का। वह सामने पड़ा है।’

‘क्या बात करते हो, बाघ भैया! लोहे के इस छोटे पिंजड़े में आप कैसे समा सकते हैं’

सियार ने हंसते हुए कहा।‘तुम मुझ पर शक कर रहे हो मैं भला झूठ क्यों बोलूंगा’ बाघ ने उत्तेजित होकर कहा।

‘नहीं, शक नहीं कर रहा हूं बाघ भैया। एक उत्सुकता जगी थी, सो पूछ बैठा, आप नाराज न हों। जरा देखूं तो इस छोटे से पिंजड़े में आप समाए कैसे?’ सियार ने हंसते हुए कहा।

‘लो देखो।’ झल्लाते हुए बाघ ने कहा और इतना कहते हुए वह पिंजड़े के अंदर घुस गया।

बाघ अंदर क्या घुसा, सियार ने पिंजड़े का मुंह बंद कर दिया और कहने लगा, ‘बाघ भैया, आज जैसे विश्वासघाती प्राणी के लिए यही स्थान उपयुक्त है। अब आप विश्राम करिए, हम चले।’

इतना कहकर सियार आगे बढ़ा। आदमी ने दोनों हाथ जोड़कर सियार के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। सियार कहने लगा, ‘देखो भाई, अपने से बलशाली और कपटी प्राणी के साथ मित्रता कायम करना हमेशा हानिकर और प्राणघातक होती है। अब भागो यहां से, मुझे भी अपनी राह जाने दो।’

फैसला सुनाकर सियार भागते हुए आगे निकल गया।

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Nepal ki Lok Kathayen-5/ नेपाली लोक कथाएँ-5

कहानी- मुफ्त की चाकरी: नेपाली लोक-कथा

गोटिया बहुत ही नटखट लड़का था । उसका दिमाग हरदम शैतानियों में ही लगा रहता था । सब लोग गोटिया की शरारतों से तंग आ चुके थे । गोटिया के मामा चाहते थे कि वह उनके कामों में हाथ बंटाए, परंतु गोटिया का न तो काम में मन लगता था, न ही वह कोई काम तसल्ली से करता था ।

गोटिया के मां-बाप का बचपन में ही देहांत हो गया था । अत: उसके लिए जो कुछ भी परिवार के नाम पर था, वह उसके मामा-मामी थे । गोटिया का एक बड़ा भाई भी था, जो दिन-रात मेहनत करके मामा-मामी की सेवा करता था ।

एक दिन गोटिया के मामा ने उसे डांटते हुए कहा – “तू न तो काम का न धाम का, दिन भर मुफ्त की रोटियां तोड़ता रहता है । जब खुद कमाएगा तो पता लगेगा कि मेहनत की कमाई क्या होती है ।” गोटिया को मामा की बात दिल में चुभ गई । उसने सोचा कि यदि मामा के साथ काम करूंगा भी तो बदले में वह कुछ नहीं देंगे, इससे बेहतर है कि मैं कहीं और काम करूं ताकि कमाई भी हो जिसमें से कुछ पैसा वह मामा-मामी के हाथ पर रख सके । यही सोचकर एक दिन गोटिया चुपचाप घर से चला गया ।

चलते-चलते गोटिया पास के गांव में पहुंच गया । वहां एक सेठ रहते थे । नाम था – मोहरचन्द । बड़े धनी सेठ थे, पर थे बड़े कंजूस । लोगो से मुफ्त की चाकरी कराने में उन्हें बड़ा आनंद आता था । गोटिया सेठ मोहरचन्द के यहां पहुंचा और उसने काम देने की गुहार की ।

सेठ ने कहा – “मैं तुम्हें नौकरी पर रख सकता हूं, पर मेरी कुछ शर्तें हैं ।”

गोटिया अपने को बहुत चालाक समझता था, वह बोला – “सेठ जी, आप अपनी शर्तें बताइए । मैं हर हाल में काम करके पैसा कमाना चाहता हूं । बस मुझे तनख्वाह अच्छी चाहिए ।”

सेठ ने कहा – “तनख्वाह की फिक्र तुम मत करो । मेरे पास पैसे की कोई कमी नहीं है । मैं तुम्हें पांच सोने की मोहरे प्रतिमाह दूंगा । पर मेरी शर्त यह है कि तुम हरदम मेरी इच्छानुसार काम करोगे । यह हमेशा ध्यान रखना कि मुझे किसी बात पर क्रोध न आए । यदि मुझे महीने में एक बार भी क्रोध आ गया तो मैं तुम्हें उस माह की तनख्वाह नहीं दूंगा ।”

गोटिया हंसते हुए बोला – “यह कौन सी बड़ी बात है सेठ जी । मैं इतनी मेहनत और लगन से काम करूंगा कि आपको क्रोध का मौका ही नहीं दूंगा । लेकिन सेठ जी, आपसे एक प्रार्थना है कि आप मेरे रहने व भोजन का प्रबंध कर दें ताकि मैं आपकी खूब सेवा कर सकूं ।”

सेठ ने बहुत प्यार से कहा – “गोटिया, मैं तुम्हारे रहने का इंतजाम कर दूंगा । पर याद रखना कि दोनों वक्त तुम्हें एक पत्ता भर भोजन ही मिला करेगा ।”

गोटिया ने बाहर की दुनिया देखी न थी और न कहीं नौकरी की थी । वह सेठ की चालाकी भांप नहीं सका और बोला – “सेठ जी, मैं थोड़ा-सा ही भोजन खाता हूं, आज से ही काम पर लग जाता हूं ।”

गोटिया सेठ मोहरचन्द के यहां खूब मन लगाकर काम करने लगा । अत: सेठ का क्रोध करने का सवाल ही न था । वह दिन-रात काम में लगा रहता, ताकि कहीं कोई काम गलती से छूट न जाए । लेकिन गोटिया परेशान था कि पत्ते पर बहुत थोड़ा-सा ही भोजन आता था ।

सेठ के घर के बाहर एक शहतूत का पेड़ था । गोटिया रोज पेड़ पर चढ़ कर खूब बड़ा पत्ता ढूंढ़ने की कोशिश करता । परंतु पत्ते पर थोड़े से ही चावल आते थे, जिससे गोटिया का पेट नहीं भरता था । उसे हरदम यूं लगता था कि उसे भूख लग रही है । फिर भी गोटिया खुश था कि उसे महीने के अंत में पांच सोने की मोहरें मिलेंगी । वह सोचता था कि कुछ माह पश्चात जब वह ढेर सारी मोहरें इकट्ठी कर लेगा, तब वह अपने गांव जाकर मामा को देगा तो मामा खुश हो जाएगा ।

गोटिया को काम करते 20 दिन बीत चुके थे । वह खुश था कि जल्दी ही एक महीना पूरा हो जाएगा तब उसे सोने की मोहरें मिलेंगी ।

अगले दिन सेठ जी ने सुबह ही गोटिया को अपने पास बुलाया और कहा – “आज तुम खेत पर चले जाओ और सारे खेतों में पानी लगाकर आओ ।”

गोटिया ने कहा – “जो आज्ञा सेठ जी ।” और खेतों की तरफ चल दिया । यूं तो गोटिया ने कभी मेहनत की नहीं थी, परंतु जब उसे धन कमाने की धुन सवार थी तो खूब काम में लगा रहता था । वह खेत पर पहुंचा तो उसने देखा कि सेठ के खेत मीलों दूर तक फैले हैं । यहां तो पूरे खेत में पानी लगाने में एक हफ्ता भी लग सकता है । लेकिन वह घबराया नहीं । कुएं से पानी खींच कर मेड़ों के सहारे पानी खेतों में पहुंचाने लगा ।

सारा दिन लगे रहने के बावजूद मुश्किल से एक चौथाई खेत में ही पानी लग पाया, तभी शाम हो गई । गोटिया बेचारा थक कर सुस्ताने लगा, तभी उसे याद आया कि देर से वापस पहुंचा तो भोजन भी नहीं मिलेगा । वह तुरंत घर चल दिया । वहां पहुंचते ही सेठ मोहरचन्द ने पूछा – “क्या पुरे खेत में पानी लगा कर आए हो ?”

“नहीं सेठ जी, अभी तो चार दिन लगेंगे पुरे खेत में पानी देने के लिए ।” गोटिया ने शांति से जवाब दिया ।

सेठ से जोर से कहा – “फिर अभी वापस क्यों आ गए ? मैंने तुम्हें पुरे खेत में पानी देने को कहा था ।”

गोटिया धीरे से बोला – “सेठ जी, अंधेरा हो गया था, सूरज डूब गया था ।”

“तो… ? सूरज डूब गया तो क्या, चांद की रोशनी खेतों में नहीं फैली है ?” सेठ ने क्रोधित होकर कहा ।

गोटिया को सेठ के क्रोधित होने का ही डर था, वही हुआ । सेठ क्रोध में बोला – “मुझे नहीं पता, जाओ खेतों में पानी दो ।”

गोटिया भूखा ही घर से निकल गया । वह थका हुआ था । खेत के किनारे सो गया । आधी रात बीतने पर उसकी आंख खुली तो वह खेत में पानी देने लगा । पुरे दिन काम में लगा रहा । रात्रि होने लगी तब तक खेत में जैसे-तैसे पानी लगा दिया, फिर वह थका-हारा सेठ के घर लौट आया । सेठ ने उससे कुछ नहीं पूछा । गोटिया भोजन खाकर सो गया ।

धीरे-धीरे एक महीना बीत गया । गोटिया जानता था कि उसे वेतन नहीं मिलेगा । वाकई सेठ ने उसे उस माह वेतन नहीं दिया । अगले माह वह हर रोज ध्यानपूर्वक कार्य करता रहा, परंतु माह के अंत में सेठ किसी बहाने क्रोधित हो गया और उसे उस माह फिर तनख्वाह नहीं मिली ।

इस प्रकार छह माह बीत गए परंतु गोटिया को एक बार भी वेतन नहीं मिला । गोटिया भोजन कम मिलने से दिन पर दिन दुबला होता जा रहा था, साथ ही साथ वेतन न मिलने से दुखी भी था ।”

गोटिया का भाई रामफल गोटिया के चले जाने से बहुत दुखी था । वह उसे खोजते-खोजते सेठ मोहरचन्द के घर तक पहुंच गया । वहां अपने नटखट भाई की हालत देखकर वह बहुत दुखी हुआ । उसने गोटिया को समझाया कि किसी न किसी बहाने वह नौकरी छोड़ दे । अगले दिन गोटिया सुबह देर तक सोता रहा । दोपहर खाने के वक्त भोजन लेने पहुंच गया । सेठ को पता लगा कि गोटिया ने आज दिन भर काम नहीं किया है । अत: सेठ ने गोटिया को खूब डांटा, गोटिया रोने लगा । सेठ ने कहा – “ठीक है, तुम्हें अपने घर जाना है तो जा सकते हो, मुझे लगता है कि तुम्हें अपने घर की याद आ रही है, परंतु दो दिन में जरूर लौट आना ।”

गोटिया का मन खुश करने के लिए सेठ ने उसके हाथ पर एक चांदी का सिक्का रख दिया ताकि धन के लालच में गोटिया वापस आ जाए । सेठ मोहरचन्द को मुफ्त में नौकर चले जाने का डर था ।

अगले दिन रामफल सेठ के पास काम मांगने पहुंचा तो सेठ मन ही मन बहुत खुश हुआ कि चलो एक नौकर गया तो दूसरा लड़का नौकरी मांगने आ गया । उसने कहा – “रामफल, हम तुम्हें नौकरी पर रख सकते हैं पर हमारी कुछ शर्ते हैं ।”

रामफल बोला – “सेठ जी, आप अपनी शर्तें बताइए । आप यह भी बताइए कि आप मुझे कितना वेतन देंगे ।”

सेठ जानता था कि वह अपने नौकरों से मुफ्त में काम कराता था अत: बहुत अच्छी तनख्वाह का लालच देता था ताकि नौकर चुपचाप काम करता रहे । सेठ बोला – “देखो, मैं तुम्हें हर माह दस सोने की मोहरें दूंगा, पर मेरी शर्त यह है कि पूरे माह मुझे तुम पर क्रोध नहीं आना चाहिए । मुझे उम्मीद है कि तुम इतना अच्छा काम करोगे कि मुझे क्रोधित न होना पड़े । यदि एक बार भी मुझे क्रोध आ गया तो तुम्हें उस माह का वेतन नहीं मिलेगा ।”

रामफल ने भोलेपन से कहा – “सेठ जी, मुझे क्या पता कि आपको किस बात पर क्रोध आता है । हर आदमी अपने क्रोध पर काबू रख सकता है, किसी दूसरे के क्रोध पर नहीं ।”

सेठ बहुत अक्लमंद था, वह तुरंत बात को संभालते हुए बोला – “ठीक है, यदि तुम्हें किसी बात पर किसी माह क्रोध आया तो तुम्हें उस माह का वेतन नहीं मिलेगा और यदि मुझे क्रोध आ गया तो 10 कि जगह 15 सोने की मोहरें वेतन में मिलेंगी ।”

रामफल बोला – “यह मुझे मंजूर है परंतु मैं अपने भोजन की बात भी तय कर लूं कि मैं दोनों वक्त भोजन आपके यहां ही खाऊंगा ।”

सेठ ने तुरंत स्वीकृति देते हुए कहा – “ठीक है, तुम्हें एक वक्त में एक पत्ता भर भोजन मिलेगा ।”

रामफल तुरंत तैयार हो गया और बोला – “मैं चाहता हूं कि यह भी तय हो जाए कि आप मुझे नौकरी से निकालेंगे नहीं ।” सेठ को रामफल की बात सुनकर कुछ आशंका हुई तुरंत उसे अपनी चतुराई पर पूर्ण भरोसा था । सेठ बोला – “यदि मैं तुम्हें एक वर्ष से पहले नौकरी से निकालूंगा तो 100 मोहरें तुम्हें हरजाने के तौर पर दूंगा, परंतु यदि तुमने बीच में नौकरी छोड़ी तो तुम जुर्माने के तौर पर 50 मोहरें दोगे ।”

यह सुनकर रामफल भीतर ही भीतर थोड़ा डर गया कि सेठ ने मुझ पर जुर्म किया तो मुझे नौकरी छोड़नी पड़ेगी तब मैं जुर्माना कहां से भरूंगा । परंतु फिर रामफल ने सारी बात ईश्वर पर छोड़कर नौकरी स्वीकार कर ली ।

अगले ही दिन रामफल काम पर लग गया और ठीक प्रकार काम करने लगा । जब भोजन का वक्त आया तो रामफल पत्ता लेकर रसोइए के पास पहुंचा । रसोइया पत्ते का आकार देखकर विस्मित था । रामफल बड़ा-सा केले का पत्ता लाया था, जिस पर पूरे घर के लिए बना भोजन समा गया । परंतु शर्त के अनुसार रसोइए को पत्ता भरना पड़ा । रामफल सारा भोजन लेकर पास में बनी अपनी झोंपड़ी में आ गया जहां गोटिया इंतजार कर रहा था । दोनों भाइयों ने पेट भर भोजन किया बाकी भोजन कुत्तों व कौओं को डाल दिया ।

सेठ को पता लगा तो उसे रामफल की चालाकी पर बड़ा क्रोध आया, परंतु वह रामफल के आगे क्रोध प्रकट नहीं कर सकता था । रामफल ठीक प्रकार पूरे माह काम करता रहा । माह के अंत में सेठ ने रामफल को अपने गोदाम भेजा और कहा कि सारा अनाज बोरों में भर दो । शाम तक रामफल आधे बोरों में अनाज भर कर सेठ के यहां वापस आ गया । सेठ ने सोचा कि किसी तरह इसे क्रोध दिलाया जाए ताकि उसे रामफल का वेतन न देना पड़े । सेठ प्यार से बोला – “तुम वापस क्यों आ गए, जब सारा अनाज थैलों में नहीं भरा था ?”

रामफल ने शांति से कहा, “क्योंकि मैं थक गया था, अब मैं कल काम करूंगा ।”

सेठ को अचानक क्रोध आ गया और बोला – “कल-कल क्या करते हो, अभी जाओ और सारा अनाज भर कर आओ ।”

रामफल जोर से हंसा और बोला – “सेठ जी, अब तो मैं कल ही काम करूंगा । और हां, कल आपको मुझे तनख्वाह में 15 मोहरें देनी होंगी ।”

सेठ अपने क्रोध की उलटी शर्त भूल चुका था, क्रोध में चिल्लाया – “एक तो काम नहीं करते ऊपर से हंसते हो । मैं तुम्हें 15 मोहरें क्यों दूंगा ?”

“सेठ जी, क्योंकि आपको क्रोध आ रहा है ।”रामफल बोला ।

सेठ ने अचानक अपना रुख बदला और नकली हंसी के अन्दाज में बोला – “ओह… अच्छा… ठीक है ।” फिर अगले दिन सेठ ने रामफल को तनख्वाह की 15 मोहरें दे दीं, लेकिन मन ही मन निश्चय किया कि कम से कम 6 माह तक उसे कोई वेतन नहीं दूंगा । फिर बेचारा खुद ही परेशान होकर नौकरी छोड़ देगा और जुर्माने के तौर पर 50 मोहरें मुझे देगा ।

लेकिन रामफल भी कम चालाक न था । वह तनख्वाह लेकर अगले दिन सुबह काम पर आ गया । सेठ ने उसे गोदाम पर जाने को कहा और अपने काम में लग गया । थोड़ी देर बाद सेठ जब उधर आया तो देखा कि रामफल सर्दी की धूप सेंक रहा है, अभी तक गोदाम नहीं गया । सेठ को रामफल पर बहुत क्रोध आया, लेकिन वह उससे कुछ कह नहीं सकता था, अत: प्यार से उसे गोदाम का काम करने को कहकर कर चला गया ।

अब रामफल अपनी मर्जी से कभी काम करता, कभी नहीं । एक सप्ताह बीत गया, परंतु रामफल ठीक प्रकार से काम नहीं कर रहा था । वह सेठ के अन्य नौकरों को भी बातों में उलझाए रखता । सेठ मन ही मन क्रोध में उबल रहा था । एक तरफ तो वह केले के पत्ते पर ढेरों भोजन ले लेता था, दूसरी तरफ ठीक प्रकार से काम भी नहीं करता था ।

एक दिन सेठानी बोली – “यह रामफल हमारे सारे नौकरों को बिगाड़ रहा है । एक दिन यह हमारा जीना मुश्किल कर देगा, आप इसे निकाल क्यों नहीं देते ?”

सेठ ने सेठानी को कारण बताया तो सेठानी बोली – “आप इतने वर्षों से इतने सारे नौकरों से मुफ्त काम कराए आए हैं । लगता है यह नौकर आपको सबक सिखाकर रहेगा, फिर आप किसी से मुफ्त में काम नहीं कराएंगे । आप इसकी आज ही छुट्टी कर दो, वरना सभी नौकर बगावत पर उतर आए तो सबसे निपटना मुश्किल होगा ।”

अगले दिन सेठ ने रामफल को बुलाने भेजा, परंतु रामफल ने कहला भेजा कि वह थोड़ी देर में आएगा । दोपहर में रामफल आया और आकर भोजन खाने बैठ गया । सेठ जोर से चीखा – “रामफल, इधर आओ, मैं आज तुम्हें नौकरी से निकालता हूं ।”

रामफल भोजन खाकर हंसता हुआ आया और बोला – “सेठ जी, मेरा हरजाना दे दीजिए, मैं चला जाऊंगा । सेठ इसके लिए पहले ही तैयार था । उसने तुरंत हरजाने की सौ मोहरें रामफल को दीं और घर से निकलने का आदेश दिया ।”

रामफल रकम लेकर हंसते हुए चल दिया । सेठ मोहरचन्द को क्रोध बहुत आ रहा था, परंतु तसल्ली थी कि ऐसे नौकर से छुटकारा मिल गया । उसने बाहर झांक कर देखा, रामफल एक छोटे लड़के का हाथ पकड़े अपनी पोटली लिए जा रहा था । सेठ ने ध्यान से पहचानने का प्रयास किया तो उसे समझने में देर न लगी कि वह लड़का गोटिया था । अब सेठ ने कसम खाई कि किसी से मुफ्त में चाकरी नहीं कराएगा ।

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Nepal ki Lok Kathayen-4/ नेपाली लोक कथाएँ-4

कहानी-किस्मत: नेपाली लोक-कथा

चंदन नगर का राजा चंदन सिंह बहुत ही पराक्रमी एवं शक्तिशाली था । उसका राज्य भी धन-धान्य से पूर्ण था । राजा की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी ।

एक बार चंदन नगर में एक ज्योतिषी पधारे । उनका नाम था भद्रशील । उनके बारे में विख्यात था कि वह बहुत ही पहुंचे हुए ज्यातिषी हैं और किसी के भी भविष्य के बारे में सही-सही बता सकते हैं । वह नगर के बाहर एक छोटी कुटिया में ठहरे थे ।

उनकी इच्छा हुई कि वह भी राजा के दर्शन करें । उन्होंने राजा से मिलने की इच्छा व्यक्त की और राजा से मिलने की अनुमति उन्हें सहर्ष मिल गई । राज दरबार में राजा ने उनका हार्दिक स्वागत किया । चलते समय राजा ने ज्योतिषी को कुछ हीरे-जवाहरात देकर विदा करना चाहा, परंतु ज्योतिषी ने यह कह कर मना कर दिया कि वह सिर्फ अपने भाग्य का खाते हैं । राजा की दी हुई दौलत से वह अमीर नहीं बन सकते ।

राजा ने पूछा – “इससे क्या तात्पर्य है आपका गुरुदेव ?”

“कोई भी व्यक्ति अपनी किस्मत और मेहनत से गरीब या अमीर होता है । यदि राजा भी किसी को अमीर बनाना चाहे तो नहीं बना सकता । राजा की दौलत भी उसके हाथ से निकल जाएगी ।”

यह सुनकर राजा को क्रोध आ गया ।

“गुरुदेव ! आप किसी का हाथ देखकर यह बताइए कि उसकी किस्मत में अमीर बनना लिखा है या गरीब, मैं उसको उलटकर दिखा दूंगा ।” राजा बोले ।

“ठीक है, आप ही किसी व्यक्ति को बुलाइए, मैं बताता हूं उसका भविष्य और भाग्य ।” ज्योतिषी ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया ।

राजा ने अपने मंत्री को चुपचाप कुछ आदेश दिया और कुछ ही क्षणों में एक सजा-धजा नौजवान ज्योतिषी के सामने हाजिर था । ज्योतिषी भद्रशील ने ध्यान से उस व्यक्ति का माथा देखा फिर हाथ देखकर कहा – “यह व्यक्ति गरीबी में जन्मा है और जिन्दगी भर गरीब ही रहेगा । इसे खेतों और पेड़ों के बीच कुटिया में रहने की आदत है और वहीं रहेगा ।”

राजा चंदन सिंह सुनकर हैरत में पड़ गया, बोला – “आप ठीक कहते हैं, यह सजा-धजा नौजवान महल के राजसी वस्त्र पहनकर आया है, परंतु वास्तव में यह महल के बागों की देखभाल करने वाला गरीब माली है । परंतु गुरुदेव एक वर्ष के भीतर मैं इसे अमीर बना दूंगा । यह जिन्दगी भर गरीब नहीं रह सकता ।”

राजा का घमंड देखकर ज्योतिषी ने कहा – “ठीक है, आप स्वयं आजमा लीजिए, मुझे आज्ञा दीजिए ।” और ज्योतिषी भद्रशील चंदन नगर से चले गए ।

राजा ने अगले दिन माली दयाल को बुलाकर एक पत्र दिया और साथ में यात्रा करने के लिए कुछ धन दिया । फिर उससे कहा – “यहां से सौ कोस दूर बालीपुर में मेरे परम मित्र भानुप्रताप रहते हैं, वहां जाओ और यह पत्र उन्हें दे आओ ।”

सुनकर दयाल का चेहरा लटक गया । वह पत्र लेकर अपनी कुटिया में आ गया और सोचने लगा यहां तो पेड़ों की थोड़ी-बहुत देखभाल करके दिन भर आराम करता हूं । अब इतनी गर्मी में इतनी दूर जाना पड़ेगा ।

परंतु राजा की आज्ञा थी, इसलिए अगले दिन सुबह तड़के वह चंदन नगर से पत्र लेकर निकल गया । दो गांव पार करते-करते वह बहुत थक चुका था और धूप चढ़ने लगी थी । इस कारण उसे भूख और प्यास भी जोर की लगी थी । वह उस गांव में बाजार से भोजन लेकर एक पेड़ के नीचे खाने बैठ गया । अभी आधा भोजन ही कर पाया था कि उसका एक अन्य मित्र, जो खेती ही करता था, मिल गया ।

दयाल ने अपनी परेशानी अपने मित्र टीकम को बताई । सुनकर टीकम हंसने लगा, बोला – “इसमें परेशानी की क्या बात है ? राजा के काम से जाओगे, खूब आवभगत होगी । तुम्हारी जगह मैं होता तो खुशी-खुशी जाता ।” यह सुनकर दयाल का चेहरा खुशी से खिल उठा, “तो ठीक है भैया टीकम, तुम ही यह पत्र लेकर चले जाओ, मैं एक दिन यहीं आराम करके वापस चला जाऊंगा ।”

टीकम ने खुशी-खुशी वह पत्र ले लिया और दो दिन में बाली नगर पहुंच गया । वहां का राजा भानुप्रताप था । टीकम आसानी से भानुप्रताप के दरवाजे तक पहुंच गया और सूचना भिजवाई कि चंदन नगर के राजा का दूत आया है । उसे तुरंत अंदर बुलाया गया ।

टीकम की खूब आवभगत हुई । दरबार में मंत्रियों के साथ उसे बिठाया । गया जब उसने पत्र दिया तो भानुप्रताप ने पत्र खोला । पत्र में लिखा था – “प्रिय मित्र, यह बहुत योग्य एवं मेहनती व्यक्ति है । इसे अपने राज्य में इसकी इच्छानुसार चार सौ एकड़ जमीन दे दो और उसका मालिक बना दो । यह मेरे पुत्र समान है । यदि तुम चाहो तो इससे अपनी पुत्री का विवाह कर सकते हो । वापस आने पर मैं भी उसे अपने राज्य के पांच गांव इनाम में दे दूंगा ।”

राजा भानुप्रताप को लगा कि यह सचमुच में योग्य व्यक्ति है, उसने अपनी पुत्री व पत्नी से सलाह करके पुत्री का विवाह टीकम से कर दिया और चलते समय ढेरों हीरे-जवाहारात देकर विदा किया ।

उधर, आलसी दयाल थका-हारा अपनी कुटिया में पहुंचा और जाकर सो गया । दो दिन सोता रहा । फिर सुबह उठकर पेड़ों में पानी देने लगा । सुबह जब राजा अपने बाग में घूमने निकले तो दयाल से पत्र के बारे में पूछा । दयाल ने डरते-डरते सारी राजा को बता दी ।

राजा को बहुत क्रोध आया और साथ ही ज्योतिषी की भविष्यवाणी भी याद आई । परंतु राजा ने सोचा कि कहीं भूल-चूक भी हो सकती है । अत: वह एक बार फिर प्रयत्न करके देखेगा कि दयाल को धनी किस प्रकार बनाया जाए ? तीन-चार दिन पश्चात् दयाल राजा का गुस्सा कम करने की इच्छा से खेत से बड़े-बड़े तरबूज तोड़कर लाया । और बोला – “सरकार, इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है । देखिए, खेत में कितने बड़े-बड़े तरबूज हुए हैं । राजा खुश हो गया । उसने चुपचाप अपने मंत्री को इशारा कर दिया । मंत्री एक बड़ा तरबूज लेकर अंदर चला गया और उसे अंदर से खोखला कर उसमें हीरे-जवाहारात भरवाकर ज्यों का त्यों चिपकाकर ले आया ।

राजा ने दयाल से कहा – “हम आज तुमसे बहुत खुश हुए हैं । तुम्हें इनाम में यह तरबूज देते हैं ।”

सुनकर दयाल का चेहरा फिर लटक गया । वह सोचने लगा कि राजा ने इनाम दिया भी तो क्या ? वह बड़े उदास मन से तरबूज लेकर जा रहा था, तभी उसका परिचित लोटन मिल गया । वह बोला – “क्यों भाई, इतने उदास होकर तरबूज लिए कहां चले जा रहे हो ?”

दयाल बोला – “क्या करूं, बात ही कुछ ऐसी है । आज राजा मुझसे खुश हो गए, पर इनाम में दिया यह तरबूज । भला तरबूज भी इनाम में देने की चीज है ? मैं किसे खिलाऊंगा इतना बड़ा तरबूज ?”

लोटन बोला – “निराश क्यों होते हो भाई, इनाम तो इनाम ही है । मुझे ऐसा इनाम मिलता तो मेरे बच्चे खुश हो जाते ।”

“फिर ठीक है, तुम्हीं ले लो यह तरबूज ।” और दयाल तरबूज देकर कुटिया पर आ गया ।

अगले दिन राजा ने दयाल का फिर वही फटा हाल देखा तो पूछा – “क्यों, तरबूज खाया नहीं ?”

दयाल ने सारी बात चुपचाप बता दी । राजा को दयाल पर बड़ा क्रोध आया ? पर कर क्या सकता था ।

अगले दिन दयाल ने लोटन को बड़े अच्छे-अच्छे कपड़े पहने बग्घी में जाते देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । दयाल ने अचानक धनी बनने का राज लोटन से पूछा तो उसने तरबूज का किस्सा बता दिया । सुनकर दयाल हाथ मलकर रह गया । तभी उसने देखा कि किसी राजा की बारात – सी आ रही है । उसने पास जाकर पता किया तो पता लगा कि कोई राजा अपनी दुल्हन को ब्याह कर ला रहा था । ज्यों ही उसने राजा का चेहरा देखा तो उसके हाथों के तोते उड़ गए । उसने देखा, राजसवारी पर टीकम बैठा था । अगले दिन टीकम से मिलने पर उसे पत्र की सच्चाई पता लगी, परंतु अब वह कर ही क्या सकता था ?

राजा ने भी किस्मत के आगे हार मान ली और सोचने लगा – ‘ज्योतिषी ने सच ही कहा था, राजा भी गरीब को अमीर नहीं बना सकता, यदि उसकी किस्मत में गरीब रहना लिखा है ।’ अब राजा ने ज्योतिषी भद्रशील को बहुत ढ़ुंढ़वाया, पर उनका कहीं पता न लगा ।

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Nepal ki Lok Kathayen-3/ नेपाली लोक कथाएँ-3

कहानी- छोटी सी चीज़: नेपाली लोक-कथा

किसी देश में एक बहुत ही न्यायप्रिय राजा था । वह अपनी प्रजा के हितों की रक्षा करना भली-भांति जानता था । उसने अनेक गुप्तचरों को नियुक्त कर रखा था, जो देश के लोगों के हालात की सही जानकारी दे सकें ।

राजा को फिर भी पूरी तसल्ली नहीं होती थी । वह अक्सर शाम को भेष बदल कर लोगों की स्थिति का पता लगाने निकल जाता, फिर देर रात्रि तक महल वापस लौटता था ।

एक दिन एक गली में कुछ डकैतों को उसने डकैती की योजना बनाते देखा । राजा का खून खौल उठा कि उसके देश में चोर-लुटेरे भी रहते हैं । राजा के उन डाकुओं को ललकारा तो डाकू राजा के ऊपर झपट पड़े । राजा उनसे लड़ाई लड़ ही रहा था कि चार-पांच युवक उधर से आ निकले । उन युवकों ने एक अकेले व्यक्ति को लुटेरों से लड़ाई करते देखा तो तुरंत उसे बचा लिया और डाकुओं पर टूट पड़े ।

डाकू घबराकर भाग गए । युवकों ने राजा को पहचाना नहीं था । एक युवक बोला – “क्षमा कीजिए, आपको इन डाकुओं से अकेले भिड़ना पड़ा । आप हमें बताइए कि आप कहां रहते हैं, हम आपको वहीं छोड़ देंगे ।”

राजा ने कहा – “नहीं, इसकी आवश्यकता नहीं है, आप जैसे योग्य युवक हमारे देश में रहते हैं तो मैं अकेला कहा हूं । आप भी मेरे मित्र ही हैं ।”

राजा कुछ देर बातें करता हुआ उनके साथ चल दिया और बातों-बातों में उन युवकों का नाम पता आदि पूछ लिया । वे सभी अलग स्थानों पर रहते थे । कुछ दूर तक सब साथ चलते रहे, फिर आधी रात हो जाने पर सब अपने-अपने घर चले गए । राजा भी चुपचाप पिछले दरवाजे से राजमहल में जाकर सो गया । सुबह को राजा ने उठकर उन युवकों को राजदरबार में आने का न्योता भेजा । वे सभी युवक यह सुनकर बहुत हैरान हुए कि राजा ने उन्हें बुलाया है । उनमें से कुछ युवक डर के मारे घबरा रहे थे कि कहीं उनसे अनजाने में कोई गलती हो गई है, जिसकी उन्हें सजा मिलने वाली है ।

जब युवक राजमहल में पहुंचे तो उन युवकों को बैठक में बिठा दिया गया । कुछ देर बाद सिपाही अपने साथ युवकों को राजा के सामने ले गए । युवक यह देखकर विस्मित रह गए कि रात में डकैतों से टक्कर लेने वाला व्यक्ति और कोई नहीं बल्कि उस देश का राजा था । उन्होंने राजा को झुक कर प्रणाम किया ।

राजा ने कहा – “तुम सब मेरे मित्र हो अत: तुम्हें प्रणाम नहीं, मेरे गले से लगना चाहिए ।

सभी युवक राजा की बात सुनकर बहुत खुश हो गए । राजा ने उन पांचों युवकों को गले लगाते हुए कहा – “तुम सभी मेरे मित्र हो । मैं चाहता हूं कि तुम लोग अपनी-अपनी एक इच्छा बताओ । यदि मेरे वश में हुआ तो मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूरी करूंगा । वैसे जब कभी तुम्हें कोई चीज की आवश्यकता हो तो तुम मेरे पास आ सकते हो ।”

राजा की बात सुनकर सभी एक दूसरे का चेहरा देखने लगे और सोचने लगे कि राजा से क्या मांगा जाए ? एक युवक ने कहा – “मैं एक टूटी-फूटी झोंपड़ी में रहता हूं, यदि हो सके तो आप उसकी मरम्मत करा दीजिए ।”

राजा ने अपने मंत्री को आदेश दिया कि इस युवक को एक बड़ा मकान तैयार करा कर दिया जाए, फिर राजा ने दूसरे युवक से पूछा तो उसने कहा – “मेरे घर की हालत बहुत ही खराब है । हम बहुत गरीब हैं । मुझे कुछ धन मिल जाता तो मेरे पिता और मैं कोई व्यवसाय शुरू कर देते ।”

राजा ने आदेश दिया कि इस व्यक्ति को ढेर सारा धन दिया जाए ताकि यह अपना व्यापार जमा सके । फिर तीसरे युवक ने अपनी इच्छा इस प्रकार प्रकट की – “मैं पढ़ा-लिखा बेकार युवक हूं । मेरे माता-पिता चाहते हैं कि मैं नौकरी पर लग जाऊं ताकि कुछ कमा सकूं । मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मेरी नौकरी कहीं लगवा दीजिए ।”

राजा ने उस युवक को एक अच्छे पद पर नौकरी दिलवाने का आदेश दिया और वह युवक खुश हो गया । अब चौथे युवक की बारी थी । वह कुछ देर तक सोचता रहा कि राजा से क्या मांगूं । राजा ने कहा – “प्रिय मित्र ! तुम्हें जो कुछ चाहिए, नि:संकोच मांगो । यदि मेरे वश में हुआ तो अवश्य दिलवाने का प्रबन्ध करूंगा ।”

तब वह युवक बोला – “महाराज, मैं जानता हूं कि आप मेरी सभी इच्छाएं पूरी कर सकते हैं । मेरा घर यहां से तीस कोस दूर है और मुझे कच्ची व उबड़-खाबड़ सड़क से होकर घर पहुंचना पड़ता है । यदि हो सके तो मेरे घर तक जाने वाली सड़क को पक्का करा दीजिए ।”

राजा ने अपने सिपाहियों व कर्मचारियों को आदेश दिया कि इस युवक के घर के आस-पास तक सभी सड़कें पक्की बनवा दी जाएं । चारों युवक खुश थे कि उनकी इच्छा जल्दी ही पूरी होने वाली है । वे सोच रहे थे कि उनका पांचवां मित्र तो सुंदर कन्या से विवाह कराने की प्रार्थना करेगा, क्योंकि उसके माता-पिता उसके लिए सुंदर व होशियार बहू की तलाश में हैं ।

तभी पांचवें युवक ने राजा से कहा – “महाराज, छोटा मुंह बड़ी बात न समझें तो मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूं ।”

राजा ने कहा – “तुम्हें जो भी कहना हो, नि:संकोच कहो ।”

इस पर युवक ने कहा – “महाराज, मैं चाहता हूं कि आप वर्ष में एक बार मेरे घर अतिथि बनकर आएं ।”

चारों युवक अपने मित्र की ओर अजीब-सी नजरों से देखने लगे कि उनके मित्र ने मांगा भी तो क्या मांगा । वे सोचने लगे कि आज इसकी अक्ल घास चरने गई जो इसने ऐसी बेतुकी इच्छा जाहिर की है ।

राजा युवक की इच्छा सुनकर थोड़ा असमंजस में पड़ गया । चूंकि उसने वायदा किया था कि यदि उसके वश में होगा तो उसकी इच्छा अवश्य पूरी करेगा । अत: राजा ने उसकी इच्छा पूरी करने की स्वीकृति दे दी ।

सभी युवक अपने-अपने घर चले गए । कुछ दिन यूं ही बीत गए । चूंकि उस पांचवें युवक के यहां राजा को अतिथि बन कर जाना था, इस कारण उसके लिए एक बड़े और आलीशान मकान के निर्माण की तैयारी शुरू कर दी गई और उस युवक को उस आलीशान मकान में अपने परिवार के साथ रहने के लिए भेज दिया गया ।

फिर उस युवक के घर के कामों के लिए अलग अनेक नौकरों-चाकरों का प्रबन्ध किया गया ताकि जब राजा वहां रहने जाएं तो उन्हें किसी प्रकार की असुविधा न हो ।

अब उसके इतने सारे खर्च इतनी आसानी से नहीं चल सकते थे, इस कारण उसके लिए राजकोष से एक बड़ी धनराशि नियमित रूप से भिजवाने का इंतजाम कर दिया गया । उसके घर राजा को अतिथि बनकर जाना था और राजा ऊंची-नीची और ऊबड़-खाबड़ सड़कों से यात्रा नहीं कर सकता था, इसलिए उस युवक के मकान तक चारों ओर से नई सड़कों का निर्माण किया गया ।

वह युवक बहुत खुश था कि उसे अपने मित्रों से कहीं अधिक मिल चुका था । तभी राजा को पता लगा कि वह युवक कोई छोटा-मोटा काम करता है । यह राजा की शान के खिलाफ था कि वह किसी छोटे आदमी के घर मेहमान बन कर जाए, वह भी चौबीस घंटे यानी रात्रि तक के लिए ।

राजा ने आदेश दिया कि उस युवक को राजदरबार में अच्छे पद पर नियुक्त किया जाए । युवक को मुख्य राजदरबारी की नौकरी भी दे गई । अब राजा का उस युवक के यहां जाने का दिन निश्चित हो गया, लेकिन एक समस्या फिर भी आ रही थी । शाही कानूनों के अनुसार राजा किसी अजनबी युवक के यहां मेहमान बनकर नहीं जा सकता था ।

राजा ने अपने मंत्री से सलाह की । मंत्री ने बताया कि वह युवक बहुत ही होनहार व बुद्धिमान है । क्यों न इसका विवाह आपकी पुत्री से कर दिया जाए ? राजा को बात जंच गई और राजा ने उस युवक के यहां सूचना भिजवाई कि वह अपनी पुत्री का विवाह उस युवक से करना चाहता है । वह युवक खुशी से फूला नहीं समाया ।

कुछ ही दिनों में उस युवक का राजकुमारी से विवाह हो गया । अब राजा उस युवक के यहां हर वर्ष एक दिन के लिए मेहमान बन कर जाने लगे, क्योंकि अब वह युवक अजनबी नहीं बल्कि उनका दामाद बन गया था । राजा अपने दामाद की बुद्धिमत्ता से बेहद खुश था कि उस युवक ने देखने में छोटी-सी चीज मांगकर इतनी बड़ी चीज मांग ली थी ।

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Nepal ki Lok Kathayen-2/ नेपाली लोक कथाएँ-2

कहानी-सेवा और भक्ति नेपाली लोक-कथा

राजा सुशर्मा अपने दरबारियों के हर प्रश्न का जवाब देते थे ।

एक बार एक व्यक्ति ने दरबार में उनसे पूछा, ‘राजन, मनुष्य के जीवन में भक्ति और सेवा में किसका महत्व ज्यादा है ?’ उस समय वह उस प्रश्न का जवाब नहीं दे पाए लेकिन वह इस बारे में लगातार सोचते रहे । कुछ समय बाद राजा शिकार के लिए जंगल की ओर निकले लेकिन उन्होने किसी को साथ में नहीं लिया । घने जंगल में वह रास्ता भटक गए । शाम हो गयी । प्यास से उनका बुरा हाल ले गया था ।

काफी देर भटकने के बाद उन्हें एक कुटिया दिखाई पड़ी । वह किसी संत की कुटिया थी ।

राजा किसी तरह कुटिया तक पहुंचे और ‘पानी – पानी’ कहते हुए मूर्छित हो गए । कुटिया में संत समाधि में लीन थे । राजा के शब्द संत के कानों में गये,

“पानी – पानी” की पुकार सुनने से संत की समाधि भंग हो गयी । वह अपना आसन छोड़ राजा के पास गए और उन्हें पानी पिलाया । पानी पीकर राजा की चेतना लौट आयी ।

राजा पिलाकर को जब पता चला कि संत समाधिस्थ थे तो उन्होने कहा ‘मुनिवर मेरी वजह से आपके ध्यान में खलल पड़ा । मैं दोषी हूं । मुझे प्रायश्चित करना होगा ।’ संत ने कहा -‘राजन आप दोषी नहीं हैं इसलिए प्रायश्चित करने का प्रश्न ही नहीं है । प्यासा पानी मांगता है और प्यास बुझाने वाला पानी देता है । आपने अपना कर्म किया है और मैंने अपना । यदि आप पानी की पुकार नहीं करते तो आपका जीवन खतरे में पड़ जाता और यदि मैं समाधि छेड़कर आपको पानी नहीं पिलाता, तब भी आपका जीवन खतरे में पड़ता । आपको पानी पिलाकर जो संतुष्टि मिल रही, वह कभी समाधि की अवस्था में भी नहीं मिलती, भक्ति और सेवा दोनों ही मोक्ष के रास्ते हैं, लेकिन यदि आप आज प्यासे रह जाते तो मेरी अब तक की सारी साधना व्यर्थ हो जाती ।’

राजा को उत्तर मिल गया कि सेवा का महत्त्व भक्ति से अधिक है ।

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Nepal ki Lok Kathayen-1/ नेपाली लोक कथाएँ-1

कहानी-स्वर्णकेशी: नेपाली लोक-कथा

एक ब्राह्मण था। उसकी दो स्त्रियां थीं। पहली स्त्री मर चुकी थी। उसके दो बच्चे थे-एक लड़का, एक लड़की । दूसरी स्त्री की एक लड़की थी। वह लड़की बदसूरत और कानी थी, पर सौतेली लड़की बहुत सुंदर थी। उसके बाल सुनहरे थे। इसलिए पास-पड़ोस के लोग उसे ‘स्वर्णकेशी’ कहकर पुकारते थे। उसकी मां मर चुकी थी। इसलिए सौतेली मां का व्यवहार उन दोनों भाई-बहनों के प्रति बहुत बुरा था। स्वर्णकेशी के भाई को तो उसने मार-मारकर भगा दिया था। स्वर्णकेशी को भी वह चैन से नहीं रहने देती थी। उसने एक मेंड़ा पाल रखा था। स्वर्णकेशी को रोज मेंडा चराने के लिए भेज देती लेकिन उसकी अपनी लड़की मौज मारती।

स्वर्णकेशी सौतेली मां के इस व्यवहार को समझती थी। प्यार तो दूर रहा, सौतेली मां उसे भरपेट खाना भी न देती थी। कभी स्वर्णकेशी सोचती-“मेरी मां जिंदा होती तो” और उसकी आंखों में आंसू आ जाते। एक दिन वह यों ही रो रही थी कि मेंड़े ने उसे देख लिया।

उसने पूछा, “तू रोती क्योंी है, बहन?”

“अपने दुर्भाग्य पर!” वह और भी रोने लगी, “मेरी सौतेली मां मुझे प्यार नहीं करती। अपनी बेटी को खाना देती है, मुझे नहीं देती ।”

“कोई बात नहीं!” मेंड़ा बोला, जैसे कि पहले से ही वह बात समझता हो, “मेरा कहा मानो। उस पेड़ की जड़ को खोदो, नीचे एक डंडा मिलेगा। उस डंडे से मेरे सींग पर चोट करो।”

स्वर्णकेशी की समझ में नहीं आया, पर मेंड़े ने बाध्य किया। आखिर उसने पेड़ के नीचे खोदना शुरू किया। डंडा मिला, एक चोट मेंड़े के सींग पर मारी तो फल, मेवे, मिठाई आदि कई खाने की चीजें निकलीं। स्वर्णकेशी ने खूब छककर खाया । बस, तब से वह रोज ऐसा ही करती और खूब खुश रहने लगी। फिर तो वह कुछ-कुछ तंदुरुस्त  भी होने लगी। रूप भी निखरने लगा।

‘बात क्याव है?’ एक दिन उसकी सौतेली मां ने सोचा- “मैं इसे खाना भी नहीं देती, इससे इतना काम भी लेती हूं, फिर भी यह इतनी मोटी होती जा रही है।’ फिर उसने अपनी लड़की को बुलाया और बोली, “तुझे क्या हो रहा है? इतना खिलाती हूं, फिर भी तू मरने को होती जा रही है। स्वर्णकेशी को तो देख” और दूसरे दिन से उसने अपनी बेटी को भी उसके साथ लगा दिया और समझा दिया कि मालूम करना कि वह क्या खाती है, और क्याक करती है।

स्वर्णकेशी सब समझती थी। सौतेली बहन हर वक्त‍ साथ रहती थी। इसलिए मेंड़े के पास जाने की उसे हिम्मत न पड़ती थी-शिकायत का डर जो था।

फिर तीन-चार दिन ऐसे ही बीत गए। आखिर जब एक दिन भूख ने उसे बहुत सताया तो स्वर्णकेशी ने सौतेली बहन को टालने की बहुत कोशिश की और एक बार किसी बहाने उसे दूर भेज ही दिया। वह चली तो गई, पर थी बहुत होशियार-आंखें उसकी पीछे ही लगी रहीं। उसने केशी को मेंड़े के सींग पर डंडा मारते और मिठाई खाते देख लिया। लौटते ही बोली, “केशी दीदी, तू क्या खा रही है? मुझे भी दे न!” केशी ने थोड़ी मिठाई उसे भी दे दी।

संध्या को दोनों घर लौटीं। मां ने हमेशा की तरह अपनी बेटी से पूछा,

“कुछ मालूम हुआ?”

“हां, मां!” बेटी तो पहले से ही कहने को तैयार थी। बोली, “केशी मिठाई खाती है ।” और उसने सारी बात बता दी कि किस प्रकार मेंड़े के सींग पर डंडा मारकर वह मिठाई खाती है। सौतेली मां मेंड़े पर बिगड़ी, “उसे जिंदा नहीं छोडूंगी ।” उसकी बेटी इस पर बहुत खुश हुई।

स्वर्णकेशी तभी से उदास रहने लगी। वह मेंड़े को सदा की भांति चराने तो ले गई पर दिनभर पेड़ के नीचे बैठी रोती रही। उस दिन उसने मिठाई नहीं खायी। मेंड़े ने उससे पूछा, “तू उदास क्योंब है, बहन?” स्वर्णकेशी बोली, “भैया, मैं अभागिन हूं। सौतेली मां को सब कुछ मालूम हो गया है। वह तुम्हें मार डालना चाहती है।”

मेंड़े ने कहा, “मारने भी दो, केशी! तेरे लिए मैं तब भी नहीं मरूंगा। ये सब मेरा मांस खाएंगे पर तू न खाना। तू मेरी हड्डियों को उठाकर एक जगह पर गाड़ देना। जब किसी चीज की जरूरत हो, उसे खोदना-तेरी मनचाही चीज़ तुझे मिलेगी ।”

मेंड़ा मारा गया। स्वर्णकेशी ने वैसा ही किया। अब उसकी जिंदगी और भी बुरी हो गई। पहले तो वह मेंड़े के साथ वन में जाकर मन बहला लेती थी, अब उसे घर में ही काम करने पड़ते थे । खाने-पीने का भी वही हाल था-रो-रोकर अब उसके दिन बीतते थे। उसका कोई अपना न था।

उसकी सौतेली मां और बहन तो मजे से बैठी रहती थीं और उसको कोई-न-कोई काम दे दिया जाता था। एक दिन की बात है पास ही शहर में मेला लगा। दोनों मां-बेटी सजकर मेले में चल दीं किंतु केशी के लिए खूब सारे चावलों में कंकड़ मिलाकर साफ करने को छोड़ गईं। मेले में जाने की केशी की भी इच्छा थी पर उसके वश की बात न थी। वह चावल साफ करती और रोती रही। इतने में कूछ गोरैया उड़ती हुई उधर आयीं, उन्होंने उसे रोते देखकर पूछा, “बहन, रोती क्योंन है?” केशी ने उत्तर दिया, “आज इतना बड़ा मेला लगा है। मेरी सौतेली मां और बहन तो मेले में चली गई हैं पर मुझे इतने चावल साफ करने का काम दे रखा है।”

चिड़ियों ने कहा, “तू फिक्र न कर। तेरे बदले का काम हम कर देंगी।’ गौरैयों का झुंड कंकड़ अलग करने लगा। स्वर्णकेशी मेले में जाने को तैयार हुई पर उसके पास अच्छे कपड़े न थे। तभी उसे मेंड़े का कहा याद आया। वह दौड़ती हुई गड्ढे के पास गई। खोदा तो उसमें से सुंदर-सुंदर कपड़े, गहनें, सोने के जूते और एक घोड़ा निकला। केशी ने जी-भरकर श्रृंगार किया और घोड़े पर बैठकर मेले में चल दी।

राजकुमार भी उसी मेले में आया हुआ था। उसने स्वर्णकेशी को देखा तो देखता ही रह गया। उसकी कमल की पंखुड़ियों-सी आंखें, गुलाब-से गाल और सुनहरे बाल राजकुमार के हृदय पर छा गए। उसने अपने सिपाहियों को बुलाया और हुक्म दिया, “मालूम करो यह लड़की कौन है? हम उससे व्याह करेंगे।” सिपाही दौड़े। केशी घबराई। सोचा- “कहीं इन्हें सौतेली मां ने तो नहीं भेजा ।” उसने घोड़ा घर की ओर दौड़ाया। पर इसी बीच उसका सोने का एक जूता उसके पैर से छूट गया। सिपाही उसे तो नहीं पा सके पर उसका एक जूता उठाकर वापस चले आए। राजकुमार ने उन्हें बहुत डाटा और फिर हुक्म दिया, “जाओ, सारे नगर में घूमो। जिसके पैर में यह जूता ठीक आए, उसी के साथ मेरी शादी होगी।” सिपाही जूता लेकर चल पड़े। वे घर-घर में जाते और जूता हर लड़की के पैर में पहनाते। पर वह किसी के पैर में ठीक ही न आता। स्वर्णकेशी के घर में भी सिपाही पहुंचे। सौतेली मां ने अपनी बेटी के पैरों में जूता पहनाया पर वह उसके पैरों में आया ही नहीं। केशी को जान-बूझकर” जूता नहीं पहनाया। पर सिपाहियों ने उसे देख लिया। उन्होंने कहा, “इसे भी पहनाओ!”

सौतेली मां ने कहा, “इसके पैर में नहीं आएगा। और रानी होने की इसकी लियाकत कहां! यह तो हमारी नौकरानी है।” पर सिपाही नहीं माने। डरते-डरते स्वर्णकेशी ने जूता पहना और वह उसके पैर में ठीक आ गया। सिपाही बहुत खुश हुए-किसी के पैर में तो जूता ठीक आया। चलो, जान बची ।

स्वर्णकेशी का विवाह राजकुमार से हो गया। सौतेली मां कुढ़कर रह गई। फिर भी उसे चैन न मिला। वह हर रोज उसे मारने के उपाय सोचती रही। आखिर उसने अपनी बेटी को पट्टी पढ़ानी शुरू की और एक दिन केशी को संदेश भेजा कि मुझे और तेरी छोटी बहन को तेरी याद सता रही है, एक बार मिलने आ जा।

स्नेहवश केशी मायके आयी। अबकी बार सौतेली मां उससे विशेष प्रेम दिखाने लगी। उसकी बेटी भी हमेशा केशी के पीछे-पीछे लगी रहती, उसकी बड़ाई करती और उसे फुसलाती। एक दिन वे साथ-साथ घूमने निकलीं। रास्ते में एक ताल था। दोनों वहां बैठ गईं। फिर बातों-ही-बातों में सौतेली मां की लड़की ने कहा, “केशी दीदी, तू कितनी सुंदर है! ज़रा पानी में अपनी परछाईं तो देख, तू कैसी लग रही है, जैसे आकाश में चन्दा!”

केशी मुस्कराई । मालूम हुआ जैसे फूल झड़े हों।

सौतेली मां की लड़की बोली, “ये कपड़े, ये गहने तुझ पर कैसे सोहते हैं! जरा मुझे दे, दीदी! तू मेरे कपड़े पहन ले, और मैं तेरे! देखूं मैं कैसी लगती हूं?”

इसे विनोद-मात्र समझकर केशी ने अपने कपड़े उसे पहना दिए, उसके कपड़े आप पहन लिए। सौतेली बहन फिर भी सुंदर नहीं लग रही थी। केशी के लिए सौंदर्य की क्या कमी थी!

“केशी दीदी!” उसने कहा, “तू मेरे कपड़ों में भी कितनी सुंदर लग रही है! जरा देख तो पानी में अपनी सूरत!”

स्वर्णकेशी पानी में परछाईं देखने के लिए जैसे ही झुकी, पीछे से सौतेली मां की बेटी ने उसे धक्का देकर डुबा दिया और खुद राजमहल में चली आयी, जैसे वह ही स्वर्णकेशी हो। वहां घूंघट निकालकर बैठ गई। राजकुमार ने देखा तो ताज्जुब में पड़ गया। बोला, “तू बोलती क्योंव नहीं, केशी? रूठी-सी क्यों बैठी है?” पर कुछ उत्तर न मिला। केवल वह कुछ क्षणों तक सकपकाती रही । राजकुमार को संदेह हुआ तो उसने घूंघट खींचा । एक दूसरी ही शक्ल दिखाई दी। कुछ देर तक वह भ्रम में पड़ गया।

“तू काली कैसे हो गई, केशी ?” उसने पूछा।

उत्तर मिला, “धूप सेंकने से ।”

फिर राजकुमार ने उसकी कानी आंख देखी तो पूछा, “और आंख में क्या हुआ?”

“कौवे ने चोंच मार दी।'”

राजकुमार सारी बात भांप गया। उसने उसे खूब पीटा और पूछा, “बता, स्वर्णकेशी कहां है?” आखिर उसने सारा भेद बता दिया। राजकुमार ने स्वर्णकेशी की खोज में जगह-जगह सिपाही भेजे। उन्होंने उसे ताल के किनारे बेहोश पड़ा पाया। सिपाही उठाकर राजमहल में ले आए। दवा-दारू हुई और केशी ठीक हो गई। राजकुमार ने राजधानी में खूब खुशियां मनाईं।

इसी बीच स्वर्णकेशी का भाई ताल के पास पानी पीने आया। उसने पानी में हाथ डाला तो हाथ में सोने कं बाल आए। उसने बाल देखे और वर्षों की याद ताजा हो उठी। ‘ये बाल तो मेरी बहन के जैसे हैं।’ उसने सोचा-‘ये यहां कहां से आए ? कहीं वह मर तो नहीं गई । वह बहन की याद में बावला हो उठा। रोता-कलपता सौतेली मां के पास गया और बोला, “मेरी बहन कहां है?” सौतेली मां ने जवाब दिया, “मर गई।” भाई को विश्वास आ गया। उसने मेंढक की ख़ाल की डफली बनाई और उसे बजाते हुए जगह-जगह बहन के विरह में गाना गाने लगा-

“मेंढक मारकर मैंने डफली बनाई,

अपनी बहन स्वर्णकेशी को कहां जाकर देखूं?”

वह गली-गली, कूचे-कूचे गाता फिरा। एक दिन वह बहन के राजमहल के पास से इसी तरह गाता हुआ गुजरा। बहन ने भाई की आवाज पहचान ली। उसने उसे लेने के लिए बांदी भेजी। बांदी ने कहा, “रानी ने बुलाया है।” भाई बोला, “मुझे क्योंल ले जाते हो? मैंने किसी का क्या बिगाड़ा है?” खैर, उसे पकड़कर लाया गया। भाई ने बहन को देखा, बहन ने भाई को । दोनों एक-दूसरे के गले लग गए। राजकुमार इस मिलन से बड़ा प्रसन्न  हुआ। उसने स्वर्णकेशी के भाई को उसी दिन से अपना मंत्री बना लिया और वे प्रेम से रहने लगे।