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Tibet ki Lok Kathayen-2/ तिब्बत की लोक कथाएँ-2

कहानी-राख की रस्सी: तिब्बती लोक-कथा

लोनपो गार तिब्बत के बत्तीसवें राजा सौनगवसैन गांपो के मंत्री थे। वे अपनी चालाकी और हाज़िरजवाबी के लिए दूर-दूर तक मशहूर थे। कोई उनके सामने टिकता न था। चैन से जिंदगी चल रही थी। मगर जब से उनका बेटा बड़ा हुआ था उनके लिए चिंता का विषय बना हुआ था। कारण यह था कि वह बहुत भोला था। होशियारी उसे छूकर भी नहीं गयी थी। लोनपो गार ने सोचा, “मेरा बेटा बहुत सीधा-सादा है। मेरे बाद इसका काम कैसे चलेगा!”

एक दिन लोनपो गार ने अपने बेटे को सौ भेड़ें देते हुए कहा, “तुम इन्हें लेकर शहर जाओ। मगर इन्हें मारना या बेचना नहीं। इन्हें वापस लाना सौ जौ के बोरों के साथ। वरना मैं तुम्हें घर में नहीं घुसने दूँगा।” इसके बाद उन्होंने बेटे को शहर की तरफ रवाना किया।

लोनपो गार का बेटा शहर पहुँच गया। मगर इतने बोरे जौ खरीदने के लिए उसके पास रुपए ही कहाँ थे? वह इस समस्या पर सोचने-विचारने के लिए सड़क किनारे बैठ गया। मगर कोई हल उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था। वह बहुत दुखी था। तभी एक लड़की उसके सामने आ खड़ी हुई।

“क्या बात है तुम इतने दुखी क्यों हो?” लोनपो गार के बेटे ने अपना हाल कह सुनाया। “इसमें इतना दुखी होने की कोई बात नहीं। मैं इसका हल निकाल देती हूँ।” इतना कहकर लड़की ने भेड़ों के बाल उतारे और उन्हें बाज़ार में बेच दिया। जो रुपए मिले उनसे जौ के सौ बोरे खरीद कर उसे घर वापस भेज दिया।

लोनपो गार के बेटे को लगा कि उसके पिता बहुत खुश होंगे। मगर उसकी आपबीती पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया। वे उठकर कमरे से बाहर चले गए। दूसरे दिन उन्होंने अपने बेटे को बुलाकर कहा, “पिछली बार भेड़ों के बाल उतारकर बेचना मुझे ज़रा भी पसंद नहीं आया। अब तुम दोबारा उन्हीं भेड़ों को लेकर जाओ। उनके साथ जौ के सौ बोरे लेकर ही लौटना।”

एक बार फिर निराश लोनपो गार का बेटा शहर में उसी जगह जा बैठा। न जाने क्यों उसे यकीन था कि वह लड़की उसकी मदद के लिये जरूर आएगी । और हुआ भी कुछ ऐसा ही, वह लड़की आई। उससे उसने अपनी मुशिकल कह सुनाई, “अब तो बिना जौ के सौ बोरों के मेरे पिता मुझे घर में नहीं घुसने देंगे।”

लड़की सोचकर बोली, “एक तरीका है।” उसने भेड़ों के सींग काट लिए। उन्हें बेचकर जो रुपए मिले उनसे सौ बोरे जौ खरीदे। बोरे लोनपो गार के बेटे को सौंपकर लड़की ने उसे घर भेज दिया।

भेड़ें और जौ के बोरे पिता के हवाले करते हुए लोनपो गार का बेटा खुश था। उसने विजयी भाव से सारी कहानी कह सुनाई। सुनकर लोनपो गार बोले,”उस लड़की से कहो कि हमें नौ हाथ लंबी राख की रस्सी बनाकर दे।” उनके बेटे ने लड़की के पास जाकर पिता का संदेश दोहरा दिया। लड़की ने एक शर्त रखी, “मैं रस्सी बना तो दूँगी। मगर तुम्हारे पिता को वह गले में पहननी होगी।” लोनपो गार ने सोचा ऐसी रस्सी बनाना ही असंभव है। इसलिए लड़की की शर्त मंज़ूर कर ली।

अगले दिन लड़की ने नौ हाथ लंबी रस्सी ली। उसे पत्थर के सिल पर रखा और जला दिया। रस्सी जल गई, मगर रस्सी के आकार की राख बच गई। इसे वह सिल समेत लोनपो गार के पास ले गई और उसे पहनने के लिए कहा। लोनपो गार रस्सी देखकर चकित रह गए। वे जानते थे कि राख की रस्सी को गले में पहनना तो दूर, उठाना भी मुशिकल है। हाथ लगाते ही वह टूट जाएगी। लड़की की समझदारी के सामने उनकी अपनी चालाकी धरी रह गई। बिना वक्त गँवाए लोनपो गार ने अपने बेटे की शादी का प्रस्ताव लड़की के सामने रख दिया। धूमधाम से उन दोनों की शादी हो गई।

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Tibet ki Lok Kathayen-3/ तिब्बत की लोक कथाएँ-3

कहानी-बुद्धि-परीक्षा: तिब्बती लोक-कथा

सातवीं शताब्दी की बात थी, चीन के केन्द्रीय भाग में थांग राजवंश का राज्य था और तिब्बत में थुबो राजवंश का शासन। जब तिब्बती थुबो राज्य के राजा सोंगजान गाम्बो गद्दी पर बैठे, उस के सुशासन में तिब्बत की शक्ति बहुत बढ़ी और राजा सोंगजान गाम्बो थांग राजवंश के सम्राट से उस की पुत्री का हाथ मांगने के लिए अपना एक दूत थांग दरबार में भेजा। तिब्बती राजदूत का नाम गोलतुंगजान था, जो प्रकांड बुद्धिमता से देश भर में प्रसिद्ध था। थांग राजवंश के सम्राट ने अपनी पुत्री देने की शर्त पर पांच पहेलियां परीक्षा हेतु पेश कीं, जिस देश के दूत इन पहेलियों को हल करने में सफल हुए हो, तो सम्राट उसी राज्य को अपनी पुत्री देने को मंजूर होगा।

थांग सम्राट ने बुद्धि-परीक्षा के लिए जो पहली पहेली दी, वह थी कि पतले महीन रेशमी धागे को एक नौ मोड़ों वाले मोती के अन्दर से गुजार कर जोड़ दे। मोती के अन्दर नौ मोड़ों का छेद था, नर्म पतले धागे को उस के अन्दर घुसेड़कर निकालना कांटे का काम था, अन्य सभी राज्यों के दूतों को हार मानना पड़ा। लेकिन तिब्बती दूत गोलतुंगजान असाधारण बुद्धिमान था, उस ने धागे को एक छोटी चिउटी की कमर में बांधा और उसे मोती के छेद पर रखा और उस पर हल्की सांस का एक फूंक मारा, तो चिउटी धीरे धीरे मोती के अन्दर घुसकर दूसरे छोर से बाहर निकला, इस तरह मोती से धागा जोड़ने की पहेली हल हो गयी।

दूसरी बुद्धि की परीक्षा थी कि सभी राज्यों के दूतों को सौ सौ बकरी तथा सौ सौ जार शराब दिए गए और सौ बकरियों का वधकर उन्हें शराब के साथ खा डालने का हुक्म दिया गया। अन्य सभी दूत सौ बकरी और सौ जार शरीब खाने में असमर्थ साबित हुए और जल्दी ही शराब से चूर हो गए। तिब्बती दूत गोलतुंगजान ने अपने मातहतों को छोटे प्याले से धीमी गति से शराब पीते हुए बकरी का वधकर चमड़ा उतारने तथा पकाकर खाने को कहा। अंत में सम्राट का दिया काम अच्छा पूरा किया गया।

तीसरी परीक्षा थी कि सौ मादा घोड़ों और सौ बछेड़ों का संबंध पहचाना जाएगा। गोलतुंगजान ने सौ बछेड़ों को मादा घोड़ों से अलग कर बाड़ों में एक रात बन्द करवाया और उन्हें भूखे रहने दिया गया। दूसरे दिन, जब उन्हें बाहर छोड़ा गया, तो भूखे बछेड़ा अपनी अपनी मातृ घोड़े के पास दौड़ कर जा पहुंचा और मादा घोड़े का दूध पीने लगा, इस तरह सौ मादा घोड़ों और सौ बछेड़ों का रिश्ता साफ हो गया।

चौथी परीक्षा केलिए थांग सम्राट ने सौ लकड़ी के डंडे सामने रखवाए, दूतों को डंडों के अग्र भाग और पिछड़े भाग में फर्क करने का हुक्म दिया गया। गोलतुंगजान ने लकड़ी के डंडों को पानी में उड़ेल करवाया, लकड़ी के डंडे का अग्र भाग भारी था और पीछे का भाग हल्का, पानी में भारी भाग पानी के नीचे डूबा और हल्का भाग ऊपर निकला। अंततः तिब्बती दूत ने फिर परीक्षा पारित की।

अंतिम परीक्षा ज्यादा कठिन थी, थांग सम्राट ने अपनी पुत्री राजकुमारी वुनछङ को समान वस्त्र पहनी तीन सौ सुन्दरियों की भीड़ में खड़ा कराया और सभी दूतों से उसे अलग पहचाने को कहा। गोलतुंगजान ने राजकुमारी वुनछङ की एक बूढ़ी पूर्व सेविका से राजकुमारी की शक्ल सूरत पूछी और मालूम हुआ कि राजकुमारी के माथे पर भौंहों के बीच एक लाल मसा है। बूढी सेविका के रहस्योद्घाटन के मुताबिक तिब्बती दूत राजकुमारी वुनछङ को पहचाने में सफलता प्राप्त की।

अपनी अद्भुत बुद्धिमता से तिब्बती दूत गोलतुंगजान ने सभी परीक्षाओं में जीत ली और थांग सम्राट ने अपनी पुत्री को तिब्बत के थुबो राजा सोंगजान गाम्बो के साथ विवाह करने की सहमति दी और असंख्य संपत्तियों के साथ राजकुमारी को तिब्बत भेजा। तिब्बत में राजकुमारी वुनछङ ने वहां के विकास तथा बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए योगदान दिया था और अब तक उसे तिब्बती जनता के दिल में सम्मानित किया जाता है।

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Tibet ki Lok Kathayen-5/ तिब्बत की लोक कथाएँ-5

कहानी-माता की वेदना: तिब्बती लोक-कथा

पूरी दुनिया के लोग किसी न किसी प्रकार की पावन एवं पवित्र वस्तु मंदिर पहाड़ एवं नदियों की परिक्रमा करते हैं। यह सृष्टि के रचियता की आराधना एवं उसका सत्कार करने का एक प्राचीन तरीका है। तिब्बती भाषा में किसी स्तूप, मूर्ति, नदी और पर्वत की परिक्रमा को कोरा कहा जाता है।

तिब्बत के स्वायत प्रांत के न्गारी अंचल में खांग रिम्पोचे नाम का पवित्र पर्वत स्थित है जो किसी भी व्यक्ति की स्मृति से कहीं पुराना पवित्र स्थल है। विभिन्न धर्मों को मानने वाले इस पर्वत की परिक्रमा करने के लिए यहां की यात्रा करते हैं जिसे कैलास और मेरू पर्वत के नाम से भी जाना जाता है। यह पावन पर्वत हिंदुओं, बौद्धों, सिखों, जैनियों, बोनपो और भी कई धार्मिक परम्परा को मानने वाले लोगों के लिए समान रूप से आदरणीय है। बोन लोग यह कोरा घड़ी की सुई की विपरीत दिशा में करते हैं जबकि बाकी लोग घड़ी की सुई की दिशा में करते हैं। बौद्धों की यह मान्यता है कि खांग रिम्पोचे के तेरह कोरा करने से अधिक पुण्य प्राप्त होता है। आखिर यह मान्यता कैसे प्रारम्भ हुई।

तिब्बत के पूर्व में स्थित खाम प्रदेश में एक धार्मिक एवं तपस्वी औरत रहती थी जिसने एक पुत्र को जन्म दिया था। वह पुण्य प्रापत करने की अभिलाषा से अभिभूत थी। उसने मन ही मन सोचा, ‘कहते हैं कि खांग रिम्पोचे का कोरा करने से सर्वाधिक पुण्य प्राप्ति होती है अतः मैं अपने पुत्र को साथ लेकर जाऊंगी ताकि हम दोनों को ही पुण्य प्राप्ति हो और हमें भगवान का आर्शीवाद मिले।

अपने परिवार वालों ओर मित्रों को प्रणाम करके वह निकल पड़ी और कई महीनों तक अपने पुत्र के साथ चलती रही। उन लोगों को ठंडे व सूखे मरुस्थलीय और घने घास के मैदानों को पार करना था जहां जंगली गधे झुंडों में दौड़ते थे। वहां काली गर्दन वाले सारस का समूह आसमान में कुड़कुड़ाता रहता था और हिरण घुटनों तक ऊंची-ऊंची घास पर छलांग लगाते थे। उन्हें अपनी यात्रा के दौरान कभी-कभी राह में मुस्कराते हुए और मंत्रों का जाप करते हुए कई धमयात्री भी मिले। बोन ऊं मा त्री मू ये सा ले दू का जाप करते थे और बौद्ध ऊं मणी पद्मे हुं का जाप करते थे। हिमालय के दक्षिणी भाग से आए हुए हिंदु सन्यासी ऊं नमः शिवाय का जाप करते थे। किसी-किसी दिन उन मां-पुत्र को मैदानों में तेज गति से भागते जंगली कुत्तों के अलावा कोई नजर नहीं आता था।

कई महीनों पश्चात आखिरकार वे दोनों खांग रिम्पोचे पहुंच ही गए। माता ने अपने पुत्र को अपनी पीठ पर दुशाला में सुरक्षापूर्ण तरीके से बांधा और अपना कोरा प्रारम्भ किया। जैसे ही वह पहाड़ पर पहुंची तो उसे भूख व प्यास का अनुभव होने लगा परन्तु वह जानती थी कि द्रोल्मा मार्ग कोरा के लिए सबसे ऊंचा स्थान था, अतः उसकी चढ़ाई सम्पन्न करने के पश्चात उसे सांस लेने व सुस्ताने के लिए पहाड़ के दूसरी तरफ आसानी होगी।

अपने पुत्र को अपने सीने से चिपकाकर वह अपनी हर सांस के साथ ओम् मानी पद्मे हम का जाप करती रही और अपनी चढ़ाई को आगे बढ़ाते रही। अंततः उसने द्रोल्मा पास की चढ़ाई सम्पन्न की और अपनी प्रार्थना व धन्यवाद अर्पित किया। उसे बहुत प्यास लग रही थी परंतु वहां पीने के लिए पानी नहीं था और उसके आसपास जमा बर्फ की पतली परत कीचड़ से लथपथ थी। उसे उस जगह से नीचे देखने पर कुछ छोटे तालाब दिखाई दे रहे थे परंतु वे उस रास्ते से लगभग पचास मीटर दूर थे।

माता जानती थी कि ये तालाब डाकिनी के स्नान करने के लिए बने तालाब है। डाकिनी एक देवी थी जिसका स्वभाव अच्छे लोगों के लिए बहुत अच्छा और बुरे लोगों के प्रति क्रोधित होता था। हिंदू उसी तालाब को गौरी जो कि भगवान शिव की पत्नी हैं, के नहाने का कुंड कहते हैं। तिब्बत में डाकिनी को खादरोमा के नाम से जाना जाता है। धर्मशास्त्र आए प्यासे श्रद्धालु ये जानते थे कि किसी के भी द्वारा डाकिनी के घर की शांति को भंग करना डाकिनी को बिल्कुल नहीं भाता था। परंतु अपनी प्यास को सहन कर पाने में असमर्थ वह माता अपने आप को रोक नहीं पायी और तालाब के पास नीचे की ओर उतर कर आई एवं पानी पीने के लिए नीचे झुकी।

उसे इतनी अधिक प्यास लगी थी कि वह तालाब में नीचे झुक कर पानी पीने लगी। अचानक ही उसका पुत्र जिसे उसने अपनी दुशाला की सहायता से अपनी पीठ पर बांध रखा था वह फिसल कर तालाब के बर्फ जितने ठंडे पानी में जा गिरा।

‘नहीं, नहीं, नहीं, नहीं! वह चिल्लाई। उसने घबराते हुए तेजी से अपने पुत्र को बाहर खींचने का प्रयास किया परंतु तालाब के अत्यंत ठंडे पानी के कारण उस बच्चे की मृत्यु हो गयी।

उस माता का हृदय शोक में डूब गया। वह अपने चेहरे को नोचने लगी और अपनी छाती पीटते हुए बिलख-बिलख कर रोने लगी। अपने बालों में मिट्टी में डालकर वो विलाप करते हुए भगवान से अपने पुत्र को पुनर्जीवित करने की विनती करने लगी। परंतु देवताओं ने उसे पुनर्जीवित नहीं किया। तत्पश्चात उसने अपने पुत्र को कस कर अपने सीने से लगा लिया परंतु उसके हृदय की धड़कन भी उसके पुत्र के हृदय की धड़कन को ना जगा पाई। माता के आंसुओं को गरम धार उस बच्चे के चेहरे पर पड़ रही थी परंतु फिर भी उसके शरीर में ताप उत्पन्न नहीं हुआ।

खांग रिंपोचे की परिक्रमा के फलस्वरूप मिलने वाले पुण्य को अर्जित करने वह वहां आयी थी परंतु एक ही क्षण की लापरवाही ने उससे उसका सब कुछ छीन लिया था। एक पुत्र की मृत्यु का कारण उसकी मांग हो इससे बड़ा अपराधबोध किसी मां के लिए और क्या हो सकता है।

पूरी रात वह औरत अपने बच्चे के शोक में रोती रही व विलाप करती रही। सुबह के समय जब रो-रो के उसका गला दर्द करने लगा व उसकी आंखों के आंसू सूखने लगे तब पश्चाताप करने के उद्देश्य से उसने निर्णल लिया कि उसे अपना कोरा पूरा करना चाहिए ताकि उसके द्वारा घटित पाप का पश्चाताप हो सके। वह पर्वत के आगे प्रार्थना करने लगी, ‘ओ खांग रिम्पोचे! मैं तुमसे अनुरोध करती हूं मेरे पापों को क्षमा कर दो और इस असहनीय विपत्ति से मुझे बचा लो। जब तक मुझे ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता कि तुमने मुझे क्षमा कर दिया है, मैं तुम्हारे चारों ओर यूं ही चक्कर लगाती रहूंगी। अब या तो मुझे पूर्ण रूप से पाप से मुक्ति नहीं तो मृत्यु ही अब मुझे यहां से दूर कर सकती है।

अतः अपने हृदय के बोझ को हल्का करने हेतु उसने कोरा करना आरम्भ किया। उसने प्रार्थना करते हुए पूर्व तीर्थ यात्रियों के स्वयं के शरीर द्वारा मापित बावन किलोमीटर की लम्बाई वाला रास्ता पार किया। गुफाओं में योग और साधना करने वाले लम्बे बालों वाले सन्यासियों को पीछे छोड़ते हुए वह अपनी यात्रा पर आगे बढ़ती रही। उसने किसी से भी खाने या पीने के लिए कुछ नहीं मांगा। जब-जब वह द्रोल्मा पास पर चढ़ाई करती थी तब तब वह अभिलाषा एवं तृष्णा भरी आंखों से उस तालाब की ओर देखती थी जहां उसने अपने पुत्र को खोया था।

उसने सात, दस, बारह कोरा सम्पन्न किए परंतु अभी भी अपराध बोध से मुक्ति के कोई संकेत नहीं मिल रहे थे। उसने सभी पवित्र पर्वतों की परिक्रमा की परंतु अपने तेरहवें कोरा तक वह थक कर चूर हो चुकी थी और खुली आंखों से एक और कदम आगे बढ़ा पाने में असमर्थ थी। अतः वह झपकी लेने के लिए वहीं पास एक चट्टान पर लेट गयी।

जब उसकी आंख खुली तो उसने पाया की जिस चट्टान पर वह लेटी थी वहां उसके हाथ, पैर और शरीर के गहरे निशान बने हुए थे। उसे समझते देर ना लगी कि खांग रिम्पोचे ने उसे क्षमा कर दिया था और उसके दुःख व विषाद को दूर कर दिया था। चट्टान पर बने निशान इस बात के सूचक थे। उसने पर्वत को प्रणाम किया और नए सिरे से जीवन की शुरूआत करने के उद्देश्य से अपने गांव आमदो की ओर रवाना हुई।

जो भी तीर्थयात्री खांग रिम्पोचे अथवा कैलास पर्वती की यात्रा पर जाते है वे अभी भी हाथ पैरों के निशान उस चट्टान पर देख सकते हैं जो कि उस माता के हैं जिसने अपने पुत्र को खो दिया था और उसी दुःख में उसने तेरहवां कोरा किया था। चट्टान पर बने निशानों के कारण ही बौद्ध लोगों की यह मान्यता है यदि तेरहवां कोरा दक्षिणावर्त दिशा में किया जाए तो उसके परिणामस्वरूप अधिक पुण्य प्राप्त हो।

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Tibet ki Lok Kathayen-6/ तिब्बत की लोक कथाएँ-6

कहानी-नीली लोमड़ी बनी राजा: तिब्बती लोक-कथा

एक लोभी खाऊ लोमड़ी थी, वह गांव के सभी घरों में खाने की चीजों की चोरी करने जाया करती थी। एक दिन, वह रंगसाज के घर में घुस गयी, असावधानी के कारण वह एक नील के बड़े बड़े मग में जा गिरा और उस का पूरा शरीर नील के रंग से सना हुआ। मग से बाहर निकलने के बाद लोमड़ी का देह एकदम बेरूप हो गया, नील के रंग को नहाकर धोने के लिए लोमड़ी जल्दबाजी से नदी में कूद पड़ी । लेकिन नदी में नहाने के बाद जब वह तट पर आयी, तो पाया कि सूर्य की किरणों में उस का नीला शरीर चमकीला दिखाई देता है और बिलकुल नीलमणि की भांति प्रतीत हुआ है।

उसे देखकर दूसरी लोमड़ी बड़ी आश्चर्यचकित हुईं और कुतुहल से पूछा:”तुम कौन हो?” मैं काच्वो हूं” लोमड़ी ने जवाब दिया। तिब्बती भाषा में काच्वो का अर्थ है इंद्र होने वाला । इसलिए स्वर्ग में इंद्र ने सुना कि इस लोमड़ी का नाम इंद्र से नाते-रिश्ते का है, तो उस ने तुरंत लोमड़ी को जानवरों का राजा घोषित किया। नीली लोमड़ी बहुत खुश हुई और उस ने लोमड़ियों को उसे दूसरे जंगली जानवरों से परिचित करने की हुक्म दी।

दूसरे जानवरों ने भी लोमड़ी के इस प्रकार के नील रंग को कभी नहीं देखा और उन्हें बड़ा ताज्जुब हुआ । अचंभे में आकर सभी जानवरों ने नीली लोमड़ी को राजा माना और उससे हाथी की पीठ पर बैठे घूमने का सुझाव दिया। इस के बाद हर शुभा यात्रा के वक्त आगे आगे शेर, शेर के पीछे बाघ और बाघ के पीछे अन्य जंगली जानवर रास्ता बनाते थे और उन के पीछे पीछे लोमड़ी हाथी पर शान से बैठे इतराते हुए चल रही थी।

नीली लोमड़ी की मां भी जीवित थी, वह एक दूसरी पहाड़ी गुफा में रहती थी। नीली लोमड़ी ने अपनी माता के नाम पत्र लिखकर उसे भी शुभा-यात्रा में शामिल होने का निमंत्रण दिया। लोमड़ी के संदेश वाहक के हाथों से पत्र माता लोमड़ी को पहुंचाया गया।

पत्र में लिखा गया था:”पूज्य माता जी, तुम्हरा पुत्र अब राजा बन गया है, कृपया आप मेरे पास आएं और एक साथ सुखमय जीवन का साझा करें।”माता लोमड़ी ने संदेश वाहक से पूछा :”राजा लोमड़ी के मातहत कौन कौन हैं?”तो जवाब मिला:”हमारी लोमड़ियों के अलावा शेर, बाघ और हाथी आदि भी हैं।” सुनकर माता लोमड़ी बड़ी घबराते हुए बोली:”यह कोई खुशखबरी नहीं है, मैं नहीं जाऊंगी।”

संदेश वाहक खाली हाथ लौटा और जंगली जानवरों के बीच घूमते हुए चिल्लाया:”गजब की बात है, हमारा राजा असल में एक लोमड़ी है, मैं अभी अभी उस की माता से मिल कर लौटा हूं। मैं ने खुद आंखों से देखा है कि वह असली लोमड़ी है।” अन्य लोमड़ियों ने संदेश वाहक की बातें सुनने के बाद असलियत जानना चाहा और एक साथ ऊंची आवाज में चिल्लाए: तुम असलियत बताओ, नहीं तो हम तुम्हारे शरीर के रंग को झाड़कर साफ करेंगे।”

फिर भी नीली लोमड़ी धैर्य का स्वांग करती रही, किन्तु हाथी की पीठ पर बैठे हुए नाराजगी की वजह से उस के मुंह से लोमड़ी की ची ची ची जैसी ध्वनि निकली, इस तरह उस का पोल एकदम खुल गया।

हाथी को बड़ा अपमानित होने का महसूस हुआ और वह आगबबुला होकर बोला :”तु लोमड़ी है, कैसे मेरी पीठ पर बैठने का साहस हुआ हो!”उस ने लोमड़ी को पकड़ कर जोर से जमीन पर पटका दिया, फिर अपने एक मजबूत बड़े बड़े पांव को लोमड़ी पर दबाकर उसे जान से मारा।

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Tibet ki Lok Kathayen-7/ तिब्बत की लोक कथाएँ-7

कहानी- स्नान उत्सव: तिब्बती लोक-कथा

हर साल की गर्मियों के अंत और शरद के प्रारंभिक काल की रात में ल्हासा के दक्षिण पूर्व आकाश में एक नया रोशनीदार तार चमकता हुए निकलता है। इसी रात से तिब्बती जाति का स्नान उत्सव आरंभ होता है। इस चमकदार तार मात्र सात रातों तक मौजूद होने के कारण तिब्बत का स्नान उत्सव भी सात दिन मनाया जाता है। इस प्रथा के पीछे एक कहानी प्रचलित है।

कहा जाता है कि बहुत बहुत पहले, तिब्बती घास मैदान में एक मशहूर वैद्य था, उस का नाम युथ्वो. युनतांगकुंगबू । चिकित्सा और औषध में पारंगत होने की वजह से वह किसी भी कठिन व जटिल बीमारियों का इलाज करने में दक्ष था। यही कारण था कि तिब्बती राजा ने भी उसे राजमहल में बुलवाकर राजसी चिकित्सक बनाया, जो विशेष तौर पर राजा और रानियों को चिकित्सीय सेवा देता था। लेकिन राजमहल में आने पर भी युथ्वो. युनतांकुंगबू के दिल में जन साधारण की याद रहती थी। वह अकसर जड़ी-बूटी तोड़ने व बीनने के मौके का फायदा उठाकर राजमहल से बाहर जाकर आम लोगों के रोगों का उपचार करता था। एक साल, घास मैदान में भयानक महामारी फैली, बेशुमार किसान और चरवाह बीमारी के कारण पलंग से नहीं उठ सकते, और कुछ लोगों की जान भी चली गयी।

चिंतित होकर वैद्य युथ्वो. युनतांकुंगबू ने दौड़े दौड़े विशाल घास मैदान में जाकर बीमारी से पीड़ित किसानों और चरवाहों का इलाज करता फिरता था। उस ने हिमच्छादित पहाड़ों और घने जंगलों में भांति भांति की जड़ी-बूटियां तोड़ बीन कर रामावण औषधियां तैयार कीं, जिन के सेवन से रोगी जल्द ही चंगे हो गए। उस की मेहरबानी से न जाने कितने मौत से जूझा रहे रोगी काल से बच गए और पुनः स्वस्थ हो गए। इसतरह युथ्वो. युनतांकुंगबू की ख्याति-प्रसिद्धि जगजग फैल गयी, और वह वैद्य-राजा के नाम से संबोधित किया गया। लेकिन दुर्भाग्य की बात थी कि वैद्य युथ्वो का भी स्वर्गवास हो गया। उस के देहांत के बाद घास मैदान में फिर एक बार महामारी पनपी, जिस ने पहले की महामारी से भी भयानक रूप ले लिया था।

बेशुमार बीमारी से जान गंवाए। रोग के शैय्या पर छटछपा रहे लोगों ने जमीन पर गिरकर स्वर्ग से उन की रक्षा करने की प्रार्थना की। संयोग की बात मानी, न मानी, एक दिन रोग से बुरी तरह पीड़ित एक नारी ने सपना में देखा कि वैद्य युथ्वो. युनतांकुंगबू ने उस के पास आकर बताया:” कल की रात, जब दक्षिण पूर्व के आकाश में एक चमकदार तारा उदित हो उठा, तो तुम ची छु नदी में जाकर पानी से नहा लो, इस से तुम बीमारी से पिंड छूटेगी।”सपना सच में आया, चीछु नदी में स्नान करने के बाद उस नारी की बीमारी खत्म हुई, वह चंगी हो गयी और पीली, पतली दुबली रोगी नदी के पानी से नहाने के बाद तुरंत सेहतमंद हुई और चेहरा चमकने लगा। खबरी कानोंकान फैली, सभी रोगी नदी में नहाने चले गए। नदी में नहाने के बाद वे सभी भी सेहतमंद हुए और एक बिलकुल स्वस्थ लोग बन गए। लोग कहते थे कि आकाश में चमकता हुआ वह तारा वैद्य योथ्वो का अवतार है।

स्वर्ग लोक में जब युथ्वो ने देखा कि नीचे धरती पर प्रजा महामारी से पीड़ित रही है, और वे खुद नीचे नहीं आ पाए, तो उस ने अपने को एक तारा के रूप में बदला और दिव्य आलोक शक्ति से नदी के पानी को औषध जल में परिवर्तित किया। और लोगों को बीमारी से छुटकारा पाने के लिए लोग नदी में पानी नहाने का संदेश भेजा। स्वर्ग राजा ने युथ्वो को केवल सात दिन का समय दिया, इसलिए यह तारा आकाश में सिर्फ सात रात में दृष्टिगोचर रहा। इस के बाद तिब्बती जनता ने इन सात दिनों को स्नान उत्सव घोषित किया। हर साल के इन सात दिनों में तिब्बत के विभिन्न स्थानों में तिब्बती जनता आसपास के नदी में जाकर नहाती है । माना जाता है कि नदी में स्नान करने के बाद लोग स्वस्थ और प्रसन्न हो उठते हैं और बीमारी नहीं लगती है।