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Turkey ki Lok Kathayen-1/ तुर्की लोक कथाएँ-1

धूप निकले, बारिश हो: तुर्किस्तान/टर्की की लोक-कथा

एक गांव में हैदर नाम का एक व्यापारी रहता था । गांव में उसकी परचून की दुकान थी । दुकान खूब अच्छी चलती थी क्योंकि परचून की गांव में वह एकमात्र दुकान थी ।

हैदर की सुंदर और गुणी दो बेटियां थीं । नाम था अलीजा और सोरा । दोनों बहनों में खूब प्यार था । वे दोनों अपने पिता का खूब खयाल रखती थीं । तरह-तरह के पकवान बनाकर पिता को खिलाती थीं । मां को भी घर के हर काम में मदद करती थीं । दोनों एक दूसरे से हरदम हंसी-मजाक करती रहती थीं । वे दोनों साथ भोजन करतीं व सोती थीं, दोनों का एक दूसरे के बिना मन न लगता था । यदि एक बीमार हो जाती तो दूसरी बहुत उदास रहती और दिन-रात अपनी बहन की तीमारदारी करती रहती ।

हैदर को कभी-कभी एक बेटा न होने का दुख होता था, परंतु अपनी प्यारी बेटियों को देखकर वह सब कुछ भूल जाता था । दोनों बेटियां धीरे-धीरे सयानी हो रही थीं । हैदर अपनी बेटियों की शादी जल्दी ही कर देना चाहता था ।

एक दिन हैदर की पत्नी ने कहा – “हमारी बड़ी बेटी अलीजा विवाह योग्य हो गई है, हमें जल्दी ही उसके लिए वर तलाश करके उसका विवाह कर देना चाहिए ।”

हैदर बोला – “मेरी भी इच्छा है कि अलीजा का विवाह खूब धूमधाम से करूं । मैं सोचता हूं कि उसके लिए किसी व्यापारी का बेटा ही ठीक रहेगा ।”

पत्नी बोली – “नहीं-नहीं, किसी व्यापारी के बेटे से अलीजा का विवाह करोगे तो वह भी तुम्हारी तरह दिन-रात काम में लगा रहेगा । मैं चाहती हूं कि अलीजा का विवाह किसी जमींदार के पुत्र से हो ।”

“हां, तुम ठीक कहती हो । मैं पास के गांव के जमींदार को जानता हूं । पर पता नहीं उनका कोई बेटा विवाह योग्य है भी या नहीं ।”

इसके पश्चात हैदर ने गांव के पंडित को जमींदार गेदाना के परिवार व पुत्र की जानकारी लेने के लिए पड़ोस के गांव में भेज दिया । पंडित जमींदार के घर पहुंचा तो यह जानकर बहुत खुश हुआ कि जमींदार का इकलौता पुत्र विवाह योग्य था । पंडित बहुत ज्ञानी होने के साथ-साथ अनुभवी भी था । उसने तुरंत हैदर की बेटी के विवाह का प्रस्ताव जमींदार गेदाना के आगे रख दिया । साथ ही अलीजा के रूप-गुण की खूब प्रशंसा की ।

कुछ ही दिनों में अलीजा का विवाह गेदाना के बेटे समर से हो गया । सोरा अकेली रह गई । वह अब ज्यादा हंसती-बोलती नहीं थी, अक्सर उदास होकर अपनी बहन अलीजा को याद करती रहती थी । अलीजा अपनी ससुराल में बहुत सुख से रहने लगी । उसके पति व ससुर के पास बहुत बड़े खेत थे, जहां हर मौसम की फसल उगाई जाती थी । अलीजा जब भी पिता के घर आती, अपने पिता व ससुराल की प्रशंसा करते न थकती थी ।

एक दिन अलीजा ने अपने पिता से कहा – “पिता जी, मेरा विचार है कि अब आपको सोरा का विवाह करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहिए । सोरा यूं भी अकेली रहने के कारण उदास रहने लगी है । उसको ससुराल में नए लोग मिलेंगे तो मुझे भूल जाएगी । वरना यूं ही सूख कर कांटा हो जाएगी ।”

पिता को अलीजा की बात जंच गई और उसने सोरा की मां से कहा – “तुम सोरा के लिए बुआ से जिक्र करना, हो सकता है कि उनकी जानकारी में सोरा के लायक कोई वर हो । वैसे भी तुम्हारी बुआ जग-बुआ है । वह मोहल्ले-गांव की खूब खोज-खबर रखती है ।”

हैदर की पत्नी बोली – “बुआ तो परसों ही एक लड़का बता रही थी । मैंने ही मना कर दिया कि हमें अभी सोरा का ब्याह नहीं करना है । उसके जाने से हमारा घर बिल्कुल सूना हो जाएगा ।”

हैदर बोला – “वह तो ठीक है, पर यदि अच्छा लड़का मिल रहा हो तो सोरा का विवाह करना ही ठीक रहेगा ।”

बस एक घर में सोरा की बात चलाई गई । बात बन गई और सोरा का विवाह हो गया । सोरा के पति के यहां मिट्टी के बर्तनों का व्यापार होता था । सोरा के ससुर गांव के बड़े कुम्हार थे । आस-पास के सभी गांव-मोहल्ले में उनके यहां के बने बर्तन ही प्रयोग में लाए जाते थे ।

सोरा अपनी ससुराल में जाकर सुखी थी । अत: वह नए माहौल में शीघ्र ही मस्त हो गई । एक वर्ष बीत गया तब हैदर ने सोचा कि दोनों बेटियों को देखे बहुत दिन हो गए । अत: दोनों को एक साथ बुला लिया जाए । दोनों बहनें एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश होंगी ।

अलीजा और सोरा अपने पिता के घर हंसी-खुशी पहुंचीं । दोनों एक-दूसरे से प्यार से गले मिलीं और अपनी-अपनी बातें करने लगीं ।

अगले दिन की बात है । हैदर ने सुना कि कमरे के अंदर अलीजा और सोरा की आपस में बहस करने की आवाज आ रही है । वह ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगा । उसे उत्सुकता थी कि सदा हिल-मिल कर रहने वाली बहनें किस बात पर झगड़ रही हैं । हैदर ने सुना, अलीजा कह रही थी – “इस बार तो हम बहुत परेशान हैं । ईश्वर ने इस बार बहुत सूखा डाल दिया है, अकाल पड़ने की नौबत आ गई है । हम तो दिन-रात यही प्रार्थना कर रहे हैं कि खूब बारिश हो ।”

सोरा बोली – “खूब बारिश की प्रार्थना क्यों करती हो ? थोड़ी-सी बारिश की प्रार्थना क्यों नहीं करतीं ? तुम क्यों मेरा बुरा चाहती हो ?”

“मैं तेरा बुरा क्यों चाहने लगी” सोरा बोली – “मैं तो यही प्रार्थना करती हूं कि खूब बारिश हो । ईश्वर करे, इतनी बारिश की झड़ी लगे कि एक दिन भी धूप न निकले ।”

सोरा बोली – “दीदी, तुम बहुत बुरी हो । मेरा बुरा चाहती हो तभी ऐसी प्रार्थना करती हो । मैं तो ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि रोज खूब तेज धूप निकले ताकि हमारे बर्तन-भांडे प्रतिदिन सूख जाएं । एक दिन भी बारिश हो जाए तो हमारे उस दिन के बर्तन गीले रह जाते हैं फिर अगले दिन हमारे यहां काम नहीं हो पाता ।

हैदर हैरान था कि दोनों बहनें अपनी-अपनी दलीलें देकर एक-दूसरे के विपरीत ईश्वर से प्रार्थना कर रही थीं । वह यह देखकर दुखी हो गया कि जो बहनें एक दूसरे पर जान छिड़कती थीं, आज अपने-अपने लाभ के लिए प्रार्थना कर रही थीं । वह यह सोच रहा था कि उसने क्यों अपनी दोनों बेटियों का ऐसे विपरीत व्यवसाय वाले घरों में विवाह किया, एक ही चीज एक के लिए खुशी और दूसरे के लिए गम देने वाली थी ।

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Turkey ki Lok Kathayen-2/ तुर्की लोक कथाएँ-2

मनमौजी डुमरुल: तुर्किस्तान/टर्की की लोक-कथा

ओगुज़ क़बीले में एक शख्स हुआ, जो मनमौजी डुमरुल के नाम से जाना जाता था। वह दूहा कोजा का बेटा था। डुमरुल ने एक सूखी नदी पर पुल बनवा दिया था। जो भी उस पुल से नदी पार करता था, उससे वह ताँबे के तैंतीस सिक्के वसूलता था। जो पुल से नदी पार करने से इनकार करते थे, डुमरुल उनकी पिटाई करके उनसे ज़बरदस्ती चालीस सिक्के ले लेता था। ऐसा मनमौजी डुमरुल उन लोगों को चुनौती देने के लिए करता था, जो यह समझते थे कि वे उससे भी ज़्यादा बहादुर हैं। डुमरुल चाहता था कि सब लोग – यहाँ तक कि अनातोलिया और सीरिया जैसे सुदूर स्थानों के लोग भी – यह कबूल करें कि वह निडर, वीर, और साहसी है।

एक दिन, कुछ लोगों ने डुमरुल के पुल के पास डेरा डाला। उनमें से एक शानदार, खूबसूरत जवान बीमार पड़ गया और अल्लाह के हुक्म से मर गया। जब वह जवान मर गया, तो कुछ लोग “बेटा”कहकर और कुछ लोग “भाई” कहकर मातम करने लगे और बहुत रोना-धोना मच गया।

मनमौजी डुमरुल फ़ौरन वहाँ आ पहुँचा और उसने लोगों से पूछा:

“क्यों रोना-धोना है, दोस्तो?” क्यों है यह शोर मेरे पुल पर? किसका है मातम तुम लोगों को?”

उन्होंने कहा: “जनाब, हमने एक अच्छा जवान आदमी खो दिया है, इसीलिए हम रो रहे हैं।”

मनमौजी डुमरुल ने पूछा: “वह कौन है जिसने तुम्हारे दोस्त की जान ली?”

उन्होंने जवाब दिया, “अज़ीम अल्लाह का आदेश था। लाल-डैनों वाले मौत के फरिश्ते हज़रत इज़्राईल ने उसकी जान ली।”

डुमरुल ने कहा: “यह कैसा फरिश्ता है अज़राइल जो लोगों की जान लेता है? ऐ रब, तुम्हारी खुशी, वहदत और वजूद की ख़ातिर मुझे इस इज़्राईल से मिला दो। मैं उससे लड़ूँगा और उसे हराकर इस ख़ूबसूरत जवान की जान बचाऊँगा, ताकि इज़्राईल फिर कभी किसी की जान न ले।” यह कहने के बाद मनमौजी डुमरुल अपने घर चला गया। पर अल्लाह ताला उसकी बातों से नाराज़ हो गए।

उन्होंने कहा: “देखो इस सिर-फिरे आदमी को। यह मेरी वहदत को नहीं मानता है। न ही मेरे प्रति शुक्रगुज़ार है। यह मेरी अज़मत के सामने गुरूर से पेश आ रहा है।” उन्होंने इज़्राईल को हुक्म दिया: “जाओ, इस पागल आदमी की नज़रों के सामने प्रत्यक्ष हो। उसे आतंकित करो, उसकी गरदनमरोड़ो, और उसकी जान ले लो।”

जब मनमौजी डुमरुल अपने चालीस दोस्तों के साथ बैठकर शराब पी रहा था, इज़्राईल अचानक वहाँ आ धमका। न तो डुमरुल के नौकरों ने, न उसके पहरेदारों ने इज़्राईल को आते हुए देखा। मनमौजी डुमरुल अन्धा हो गया, उसके हाथ जकड़ गए। उसके लिए सारी दुनिया बेनूर हो गई।

वह बोलने लगा। तो सुनो, उसने क्या कहा:

“ओ इज़्राईल, क्या ही बलवान, कद्दावर बुज़ुर्ग हो, तुम! मेरे नौकरों ने तुम्हें आते नहीं देखा; मेरे पहरेदारों को तुम्हारी आहट नहीं हुई। मेरी आँखें, जो पहले देख सकती थीं, अब अंधी हो गई हैं; मेरे हाथ, जो पहले पकड़ सकते थे, अब जकड़ गए हैं। मेरी रूह काँप रही है, और मैं भयभीत हूँ। मेरे हाथ से सुनहरा प्याला छूट गया है। मेरा मुँह बर्फ-सा ठंडा है; मेरी हड्डियाँ धूल बन गई हैं। हे सफ़ेददाढ़ीवाले बूढ़ा आदमी , तुम कितने कठोर नज़रों वाले फरिश्ते हो! हे, विशालकाय बूढ़े! यहाँ से भाग जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें मार दूँगा।”

ये शब्द सुनकर इज़्राईल को गुस्सा आ गया। उसने डुमरुल से कहा: “अरे ओ, पागल आदमी! क्या तुझे मेरी कठोर नज़रें पसंद नहीं आ रही हैं? कितनी ही कमसिन युवतियों और नव-विवाहिताओं की मैंने जान ली हैं। तब फिर तुझे मेरी सफ़ेद दाढ़ी क्यों पसंद नहीं आ रही है? मैंने तो सफ़ेद दाढ़ीवाले और काली दाढ़ीवाले दोनों ही प्रकार के आदमियों की जानें ली हैं। इसीलिए तो मेरी ख़ुद की दाढ़ीसफ़ेद है!”

फिर इज़्राईल ने आगे यों कहा: “ऐ, पागल आदमी! अभी तुम डींग मार रहे थे कि मैं लाल-डैनोंवाले इज़्राईल को मार दूँगा। तुम मुझे पकड़कर इस ख़ूबसूरत जवान की जान बचाना चाहते थे। पर अब, ऐ मूर्ख, मैं ही तुम्हारी जान लेने आ गया हूँ। बताओ, तुम मुझे अपनी जान दोगे, या मुझसे लड़ोगे?”

मनमौजी डुमरुल ने कहा: “क्या तुम्हीं वह लाल-डैनोंवालेइज़्राईल हो?”

“हाँ, हूँ,” इज़्राईल ने जवाब दिया।

“क्या तुम्हीं वह फ़रिश्ता हो जो इन शानदार युवकों की जानें लेता है?” डुमरुल ने पूछा।

“बेशक,” इज़्राईल ने फ़रमाया।

मनमौजी डुमरुल ने कहा, “अरे ओ, संतरियो, सब दरवाज़े बंद कर दो।” फिर इज़्राईल की तरफ मुड़कर बोला: “ऐ अज़राइल, मैं तुम्हें खुले मैदान में घेरने की उम्मीद कर रहा था, पर तुम इस संकरे कमरे में मेरी पकड़ में आ गए! अब मैं तुम्हें मारकर उस खूबसूरत जवान को जिंदा कराऊँगा।”

उसने अपनी विशाल काली तलवार खींची, और उससे इज़्राईल पर वार करने की कोशिश की। पर इज़्राईल कबूतर बनकर खिड़की से बाहर उड़ गया। तब डुमरुल ने ज़ोर से तालियाँ बजाईं और अट्टहास करने लगा।

उसने कहा: “मेरे दोस्तो, देखो मैंने कैसे इज़्राईल को डरा दिया। वह खुले दरवाज़े के रास्ते नहीं बल्कि संकरे झरोखे से भाग खड़ा हुआ। अपने आपको मुझसे बचाने के लिए, वह कबूतर बनकर उड़ गया। लेकिन मैं उसे अपना बाज़ उड़ाकर पकड़ लूँगा।”

यह कहकर डुमरुल ने अपने बाज़ को हाथ में लिया और इज़्राईल का पीछा करने के लिए अपने घोड़े पर सवार हो गया। उसने अपना बाज़ छोड़कर कुछ कबूतर मारे। फिर अपने घर लौट चला। रास्ते में इज़्राईल उसके घोड़े की आँखों के सामने प्रकट हुआ। घोड़े ने भयभीत होकर मनमौजी डुमरुल को जमीन पर पटक दिया और भाग खड़ा हुआ। घोड़े से गिरने से बेचारे डुमरुल का सिर घूमने लगा और वह एकदम पस्त हो गया। इज़्राईल उसकी सफ़ेद छाती पर सवार हो गया। कुछ पल डुमरुल बुदबुदाता रहा पर जल्द ही उसके लिए साँस लेना भी मुश्किल हो गया। उसके गले से मौत की घुरघुराहट आने लगी।

वह किसी तरह बोला: “ओ इज़्राईल, मुझ पर रहम करो! ख़ुदा की वहदत पर मुझे कोई शक नहीं है। मुझे तुम्हारे बारे में नहीं मालूम था। मुझे नहीं मालूम था कि तुम चोरों की तरह लोगों की जानले लेते हो। मेरे पास विशाल चोटियों वाले पहाड़ हैं। इन पहाड़ों पर अंगूर के ख़ूबसूरत बागान खिले हुए हैं। इन बागान में काले अंगूरों के बेशुमार गुच्छे हैं, जिन्हें निचोड़ने पर लाल मदिरा प्राप्त होती है। इसे जो पीता है, वह नशे में धुत हो जाता है। मैंने यह मदिरा पी ली थी, इसीलिए मैं तुम्हारे आने की आहट सुन न सका। मुझे नहीं मालूम मैंने नशे में क्या-क्या बक दिया था। मैं मानता था कि मैं दूसरे सब लोगों से ताकतवर हूँ, पर अब जान गया हूँ कि यह सही नहीं है। मैं बस अपनी जवानी के कुछ और बरस जीना चाहता हूँ। ओ इज़्राईल, मेरी जान बख़्श दो।”

इज़्राईल ने कहा: “अरे पगले, मुझसे क्यों रहम की भीख माँग रहा है? मेरे बदले उस अज़ीम अल्लाह से माँग। मेरे हाथ में क्या रखा है? मैं तो बस एक नौकर हूँ।” मनमौजी डुमरुल ने कहा: “तब क्या अज़ीम अल्लाह ही जान बख्शते और लेते हैं?

“इसमें क्या शक है,” इज़्राईल ने कहा।

तब मनमौजी डुमरुल इज़्राईलसे बोला:

“तुम एक बुरे आदमी हो। मेरे कामकाज में दखल मत दो। मुझे सीधे अल्लाह से बात करने दो।” फिर मनमौजी डुमरुल ने अल्लाह से बात की। तो सुनो, उसने क्या कहा:

“तुम सर्वोच्च हो। ओ ख़ुदा ताला, कोई नहीं जानता तुम कितने ऊँचे हो। तुम हो अल्लाह महान। मूर्ख तुम्हें आसमान और धरती पर खोजते हैं, पर तुम रहते हो, भक्तों के दिलों में। अजर-अमर-अजय हो तुम, ओ कालजयी और रहम-दिल अल्लाह। यदि तुम मेरी जान लेना ही चाहते हो, तो ख़ुद आकर लो। इज़्राईल को मुझे मारने मत दो।”

इस बार मनमौजी डुमरुल की बातों से ख़ुदा ताला खुश हो गए। उन्होंने इज़्राईल से चिल्लाकर कहा कि चूँकि यह पागल मेरी वहदत पर विश्वास करता है, मैं इसे अशीष देता हूँ और इसकी जान बख़्शता हूँ, बशर्ते यह अपनी जगह मरने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को राज़ी कर सके।

इज़्राईल ने तब डुमरुल के पास आकर कहा: “ओ मनमौजी डुमरुल, अल्लाह ताला का हुक्म है कि तुम अपनी जगह मरने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को ले आओ। तभी मैं तुम्हें छोड़ सकता हूँ।”

मनमौजी डुमरुल ने कहा: “मैं कहाँ से अपनी जगह मरने के लिए किसी दूसरे को लाऊँ? इस दुनिया में मेरे बूढ़े माँ-बाप के सिवा और कोई नहीं है। पर मैं जाकर उनसे पूछता हूँ कि क्या उनमें से कोई मेरे लिए अपनी जान देगा। शायद उनमें से कोई एक कह दे: ‘तुम मेरी जान ले सकते हो और मुक्त हो सकते हो।’

मनमौजी डुमरुल अपने पिता के घर गया और उनके हाथ चूमकर उनसे बात की।

तो आओ सुनें, उसने अपने पिता से क्या कहा: “सफ़ेददाढ़ी वाले मेरे पिता, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और तुम्हारी इज़्ज़त करता हूँ। क्या तुम जानते हो, मेरे साथ क्या हुआ है? मैंने अल्लाह से बदतमीज़ी से बात की और उन्हें मुझ पर गुस्सा आ गया। उन्होंने लाल-डैनों वाले इज़्राईल को आसमान से उड़कर नीचे जाने को कहा। इज़्राईल मेरी सफ़ेद छाती पर उतरा और मेरे शरीर पर बैठ गया। उसने मेरा गला घोंटकर मुझसे लगभग मेरे आख़िरी शब्द निकलवाए और लगभग मेरी जान ले ली। ओ पिता, मैं तुमसे तुम्हारी जान की भीख माँगता हूँ। क्या तुम मेरे लिए मर सकते हो? या मेरे मरने के बाद यह कहते हुए मेरे लिए रोना पसंद करोगे, ‘अरे, मेरा बेटा, मेरा मनमौजी डुमरुल, मर गया!’

उसके पिता ने जवाब दिया: “मेरे बेटे, ओ मेरे बेटे! तुम मेरे कलेजे का टुकड़ा हो, ओ मेरे बेटे! तुम शेर की तरह बहादुर हो। एक बार मैंने तुम्हारे लिए नौ ऊँटों की क़ुर्बानी दी थी। तुम मेरे आलीशान मकान की नींव हो, जिसमें सोने की चिमनियाँ हैं। तुम मेरी हंसजैसी सुंदर बेटियों और बहुओं की तरह एक फूल हो। यदि चाहो तो तुम दूर स्थित काले पहाड़ को आदेश दे सकते हो कि वह इज़्राईल के लिए घास का मैदान बन जाए। यदि तुम चाहो, तो मेरे शीतल झरनों को उसके बगीचे के फ़व्वारे बना सकते हो। यदि तुम चाहो, तो उसे मेरा घर और सुंदर घोड़े भेंट कर सकते हो। यदि तुम चाहो, तो मेरे ऊँटों से उसका सामान ढुलवा सकते हो। यदि तुम चाहो, तो मेरे बाड़ों में खड़ी सफ़ेद भेड़ों को मेरे बावर्चीखाने में भूनकर उसे दावत दे सकते हो। यदि तुम चाहो, तो मेरा सोना-चाँदी उसे दे सकते हो। पर जीना मुझे बहुत प्यारा है और यह दुनिया बड़ी मीठी है। इसलिए मैं तुम्हारे लिए मर नहीं सकता, तुम्हें यह समझना होगा। तुम्हारी माँ भी तो है। वह तुमसे मुझसे भी ज़्यादा प्यार करती है, और तुम भी उसे मुझसे अधिक चाहते हो। तो मेरे बेटे, उसके पास जाओ।”

जब उसके पिता ने उसे ठुकरा दिया, मनमौजी डुमरुल अपनी माँ के पास गया, और उससे बोला: “जानती हो माँ, मेरे साथ क्या हुआ? लाल-डैनों वाला इज़्राईल आसमान से उड़कर आया और मुझ पर सवार हो गया। उसने मेरे सफ़ेद सीने को दबोच लिया। उसने मेरा गला दबाया और लगभग मेरी जान ही ले ली। जब मैंने पिता से मुझे उनकी ज़िंदगी देने को कहा तो उन्होंने नहीं दी। अब मैं तुमसे तुम्हारी ज़िंदगी माँगने आया हूँ, ओ माँ। क्या तुम मुझे अपनी ज़िंदगी दोगी? या फिर मेरे मर जाने के बाद अपने सफ़ेद चेहरे को अपने तीखे नाखूनों से खरोंचते हुए और अपने लंबे सफ़ेदबालों को नोचते हुए, ‘ओ मेरा बेटा, मेरा डुमरुल’ कहकर विलाप करना पसंद करोगी?”

इस पर उसकी माँ ने क्या कहा, आओ, इसे सुनें: “बेटे, ओ मेरे बेटे! मेरे प्यारे बेटे, जिसे मैंने नौ महीने अपनी कोख में पाला, और दसवें महीने जन्म दिया, जिसे मैंने कपड़े पहनाए और पालने में लिटाया, जिसे मैंने अपना भरपूर सफ़ेद दूध पिलाया। ओ मेरे बेटे, काश तुम सफ़ेद मीनारों वाले किले में, भयानक रीति-रिवाजों को मानने वाले काफ़िरों के कब्ज़े में होते, ताकि मैं तुम्हें अपनी ताक़त और पैसे से बचा पाती। पर तुम तो इस भयनाक मुसीबत में फँस गए हो। इसलिए मैं तुम्हारी ओर मदद का हाथ नहीं बढ़ा सकती, मेरे बेटे। यह समझ लो कि दुनिया बहुत मीठी है, और मनुष्य को अपनी जान बहुत प्यारी लगती है। इसलिए मैं अपनी ज़िंदगी नहीं दे सकती। तुम्हें यह समझना होगा।”

इस तरह उसकी माँ ने भी उसे अपनी ज़िंदगी देने से मना कर दिया। इसलिए इज़्राईल मनमौजी डुमरुल की जान लेने के लिए आ पहुँचा। उसे देखकर डुमरुल ने कहा: ‘ओ इज़्राईल जल्दी नहीं करो। इसमें कोई शक नहीं कि अल्लाह एक हैं।’

इज़्राईल बोला: “अरे, पगले, तुम मुझसे क्यों रहम की भीख माँग रहे हो? तुम अपने सफ़ेद दाढ़ी वाले पिता के पास गए, पर उसने तुम्हें अपनी ज़िंदगी देने से मना कर दिया। तुम अपनी सफ़ेद बालों वाली माँ के पास गए, और उसने भी तुम्हें अपनी ज़िंदगी नहीं दी। अब कौन रह गया है जो तुम्हें अपनी ज़िंदगी दे सकता है?”

“मैं एक व्यक्ति से बहुत प्यार करता हूँ”, डुमरुल ने कहा।

मुझे उसके पास जाने की इजाज़त दो,”

“कौन है यह व्यक्ति, ओ पगले इन्सान?”, इज़्राईल ने कहा।

“वह मेरी ब्याहता पत्नी है। वह एक अन्य कबीले के व्यक्ति की बेटी है। और उससे मेरे दो बच्चे भी हैं। मुझे उनसे कुछ बातें कहनी हैं। उनसे मिलने के बाद तुम मेरी जान ले सकते हो।”

तब वह अपनी पत्नी के पास गया और बोला: “क्या तुम्हें पता है मेरे साथ क्या हुआ है? लालडैनोंवाला इज़्राईल आसमान से उड़कर आया और मुझ पर चढ़ बैठा। उसने मेरे सफ़ेद सीने को दबोच लिया। उसने मेरी जान ही ले ली थी। जब मैंने अपने पिता से उनकी ज़िंदगी माँगी, तो उन्होंने मना कर दिया। तब मैं अपनी माँ के पास गया, पर उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी मुझे नहीं दी। उन दोनों ने कहा कि जिंदगी बहुत मीठी है और उन्हें बहुत प्यारी है। मेरे ऊँचे काले पहाड़ों को तुम अपनी चरागाह बना लो। मेरे शीतल जल के झरनों को अपना फ़व्वारा बना लो। मेरे अस्तबल के सुंदर घोड़ों को ले लो और उनकी सवारी करो। सोने की चिमनियों वाला मेरा सुंदर घर तुम्हें आश्रय दे। ऊँटों का मेरा कारवाँ तुम्हारा माल ढोए। मेरी सफ़ेद भेड़ें तुम्हारी दावतों का भोजन बनें। जाओ, तुम किसी दूसरे आदमी से शादी कर लो, जिसे भी तुम्हारी आँखें और दिल चाहें। ताकि हमारे दो बेटे यतीम न हो जाएँ।”

यह सुनकर उसकी पत्नी ने क्या कहा, आओ, इसे सुनें: “तुम क्या कह रहे हो? मेरे बलिष्ठ मेढ़, मेरे युवा राजा, जिस पर मुझे पहली नज़र में ही प्यार हो गया था, और जिसे मैंने अपना पूरा दिल दे दिया है? जिसे मैंने अपने मीठे होंठ चूमने के लिए दिए; जिसके साथ मैं एक ही तकिए पर सोई और जिसे मैंने प्यार किया। जब तुम्हीं न रहोगे, तब काले पहाड़ों का मैं क्या करूँगी? यदि मैं कभी अपनी भेड़ों को वहाँ ले जाऊँ, तो मेरी कब्र भी वहीं बने। यदि मैं तुम्हारे शीतल झरनों का पानी पिऊँ, तो मेरा खून फव्वारे की तरह बहे। यदि मैं तुम्हारे सोने के सिक्के खर्च करूँ, तो बस इसलिए कि उनसे मेरे कफन का कपड़ा ख़रीदा जाए। यदि मैं तुम्हारे सुंदर घोड़ों की सवारी करूँ तो वे मेरी लाश को ढोएँ। यदि मैं तुम्हारे बाद किसी से प्यार करूँ, किसी दूसरे युवक को, और उससे शादी करूँ, और उससे सहवास करूँ, तो वह साँप बनकर मुझे डस ले। जीवन में इतना क्या रखा है, कि तुम्हारे अभागे माता-पिता तुम्हें अपनी ज़िंदगी के बदले उनकी ज़िंदगी न दे सके? अब जन्नत, आठ मंजिलों वाली जन्नत, साक्षी रहे; यह धरती और आसमान साक्षी रहें, अल्लाह ताला साक्षी रहें, कि मैं अपनी ज़िंदगी तुम्हारी ज़िंदगी बचाने के लिए क़ुर्बान करती हूँ।”

यह कहकर वह डुमरुल के लिए मरने को तैयार हो गई, और इज़्राईल उस महिला की जान लेने के लिए आ गया। पर मनमौजी डुमरुल नहीं चाहता था कि उसकी पत्नी अपनी जान दे दे। उसने अल्लाह ताला से रहम की भीख माँगी।

आओ सुनें, उसने क्या कहा: “तुम सबसे ऊँचे हो; कोई नहीं जानता तुम कितने ऊँचे हो, ओ अल्लाह, अज़ीमख़ुदा! मूर्ख तुम्हें आसमान और धरती पर खोजते हैं, पर तुम रहते हो, तुम पर विश्वास करने वालों के दिलों में। सनातन और दयावान अल्लाह – यही तुम्हारी पहचान है! मुझे इस इलाके की मुख्य सड़कों के किनारे गरीबों के लिए मकान बनवाने दो। मुझे तुम्हारे नाम से भूखे इन्सानों को भोजन कराने दो। यदि तुम मेरी ज़िंदगी लेना ही चाहते हो तो हम दोनों की ज़िंदगी ले लो। यदि तुम मेरी ज़िंदगी बख़्शोगे तो हम दोनों की ज़िंदगी बख्श दो, ओ रहम-दिल अल्लाह!”

ख़ुदा मनमौजी डुमरुल के इन शब्दों से खुश हो गए। उन्होंने इज़्राईलको आदेश दिया: “मनमौजी डुमरुल के माता और पिता की ज़िंदगी ले लो। इस नेक दंपति को मैंने 140 सालों की उम्र दी है जो अब पूरी हो चली है। इज़्राईल ने तुरंत जाकर उन दोनों की जान ले ली, लेकिन मनमौजी डुमरुल अपनी पत्नी के साथ 140 साल और जिंदा रहा।

डेडे कोरकुट आया, और उसने कहानियाँ सुनाईं और वीरगाथाएँ गाईं। उसने कहा: “मेरे बाद वीर ओजस्वी गवैए आएँगे और मनमौजी डुमरुल की गाथा सबको सुनाएँगे, और ऊँची पेशानी वाले उदार दिल इन्सान उन्हें सुनेंगे। मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे काली चट्टानों वाले पहाड़ सदा ऊँचे खड़े रहें, कि तुम्हारे छायादार पेड़ कभी काटे न जाएँ, कि तुम्हारे बहते झरने कभी न सूखें। मैंने तुम्हारे सफ़ेद माथे के लिए प्रार्थना के पाँच शब्द कहे हैं। कि अल्लाह ताला कभी भी तुम्हें बुरे लोगों के क़ब्ज़े में न आने दें। मैं आशा करता हूँ कि अल्लाह यह प्रार्थना क़बूल करेंगे। मुझे यह भी उम्मीद है कि वे तुम्हारे गुनाहों को हज़रत मुहम्मद की ख़ातिर और अपनी अज़मत की ख़ातिर माफ़ कर देंगे।

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Turkey ki Lok Kathayen-3/ तुर्की लोक कथाएँ-3

तैमूर लंग की कीमत: तुर्किस्तान/टर्की की लोक-कथा

इतिहास में तैमूर लंग को एक बेहद क्रूर और निर्दयी व्यक्ति के रूप याद किया जाता था। कहते हैं वह दुनिया भर में अपनी सेना लेकर लूटपाट करता घूमता था। लोगों का क़त्ल करना उसके लिए मनोरंजन जैसा था। वह जहां जहां गया उसने अनगिनत लोगों को मारा और जी भर कर लूटा।

उस जमाने में लोग तैमूर लंग के नाम से कांपते थे लेकिन इसी तैमूर लंग के बारे में एक किस्सा ऐसा भी मशहूर है जब एक निडर कवि ने उसकी बोलती बंद कर दी थी। किस्सा कुछ यूं है –

एक बार उसके सैनिक तुर्किस्तान के एक मशहूर कवि अहमदी को पकड़ लाये। उस समय तैमूर लंग सरेआम कुछ गुलामों को मौत की सजा सुना रहा था। जब उसने कवि अहमदी को देखा तो बोला – “सुना है कवि लोग इंसानों के बड़े पारखी होते हैं। ज़रा बताओ तो इन गुलामों की कीमत क्या होगी ?”

अहमदी बहुत निडर और स्वाभिमानी कवि थे। बोले – “इनमें से कोई भी गुलाम पांच सौ अशर्फियों से कम का नहीं है।।”

तैमूर लंग, जिसकी नजर में गुलामों की कोई कीमत नहीं थी, यह सुनकर बोला – “अच्छा, इन तुच्छ गुलामों की इतनी अधिक कीमत है तो फिर मेरी कीमत क्या होगी ?”

अहमदी बोले – “आप यह न पूछें तो अच्छा है …”

तैमूर को क्रोध आ गया। बोला – “जो मैं पूछूँ तुम्हें बताना ही पड़ेगा … वरना तुम्हें भी मौत के घाट उतार दिया जाएगा…”

कवि अहमदी बोले – “और यदि में आपकी सही कीमत बता दूँ तो …?”

“तो तुम्हें ससम्मान जाने दिया जाएगा …” – तैमूर लंग बोला। दरअसल वह सोच रहा था कि अहमदी उसकी कीमत करोड़ों में आंकेंगा।

लेकिन कवि बोले – “तो सुनिए हुजूर, मेरी नजर में आपकी कीमत 25 अशर्फियों से ज्यादा नहीं है …”

यह सुनते ही तैमूर तिलमिला गया। बोला – “इन मामूली गुलामों की कीमत पांच सौ अशर्फियाँ और मेरी सिर्फ 25 अशर्फियाँ ! तुम्हें मालूम है इतनी कीमत की तो मेरी पगड़ी है !”

“मैंने उसी की कीमत बताई है …” – कवि अहमदी बोले, “क्योंकि जिसके दिल में दया, प्रेम और न्याय नहीं है उसके शरीर की भला क्या कीमत होगी ? दो कौड़ी भी नहीं !”

तैमूर लंग इस जवाब से तिलमिला कर रह गया लेकिन वह सबके सामने कवि को छोड़ देने का वादा कर चुका था इसलिए उसके पास अहमदी को जाने देने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

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Turkey ki Lok Kathayen-4/ तुर्की लोक कथाएँ-4

संतोष: तुर्किस्तान/तुर्की की लोक-कथा

तुर्की मे एक लोक कथा प्रचलित है की एक बार एक संत किसी नदी के किनारे खड़े अत्यंत ध्यान से उसकी लहरो को देख रहे थे , इतने मे एक दरिद्र व्यक्ति उनके पास पहुंचा और बोला “हे महान संत ! मै धन के अभाव मे दर दर भीख मांग रहा हूं । मेरे बच्चे भूख से बिलख रहे है । मेरा जीवन अत्यंत दुःख मय हो गया हैं ।

यदि आप जैसे तपस्वी संत की कृपा द्रष्टि हो जाये तो मेरी स्थिति सुधर सकती है ।” संत ने अत्यंत स्नेह से पूछा बताओ मैं तुम्हारी किस तरह मदद कर सकता हूँ निर्धन व्यक्ति ने कहा आप मेरे लिए कुछ धन की व्यवस्था करा दीजिये । संत ने कहा , मेरे पास तो ऐसा धन हैं नही लेकिन नदी के उस पार जहाँ बालू का ढेर हैं, वहाँ जाकर देखो ,शायद तुम्हारा भाग्य चमक जाये । कल मैंने वहाँ पारस मणि पड़ी देखी थी ।

निर्धन व्यक्ति यह जानकारी पाकर अत्यंत प्रसन्न हुआ तुरंत बालू के ढेर की ओर दौड़ गया । वहां जाकर वह पारसमणि को खोजने लगा । थोड़ी देर में उसे वास्तव में वह मणि पड़ी हुयी मिल गयी ।

उस गरीब व्यक्ति के हाथ मे लाठी थी, जिसके किनारे पर थोड़ा लोहा लगा हुआ था । उसने उस लोहे को पारसमणि से छुवा दिया, सारा लोहा , सोने मे बदल गया । उस निर्धन के आनंद की सीमा न रही , वह ख़ुशी से नाचने लगा ।

लेकिन तभी अचानक उसके मन मे एक ख्याल आया, आखिर संत के पास ऐसी कौन सी चीज या पारस है, जिसकी वजह से उन्हें पारसमणि भी व्यर्थ जान पड़ी । वह फिर संत के पास वापस पहुंचा और बोला

“करुणामय संत जी । इस बार मै कुछ मांगने नहीं आया हूँ, सिर्फ एक जानकारी चाहता हूँ । कृपया यह बता दीजिये की वह कौन सी चीज हैँ जिसे पाकर आपने पारसमणि को भी पत्थर की तरह तुच्छ समझा और उसे आप वही छोड़कर आ गए?

इसके उत्तर मे संत ने केवल तीन अक्षरों का एक छोटा सा शब्द अपने मुख से निकाला – “संतोष”।