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Pakistan ki Lok Kathayen-1/ पाकिस्तानी लोक कथाएँ-1

झोंपड़ी और महल: पाकिस्तानी लोक-कथा

सिंध के सक्खर नामक शहर में एक धनी मनुष्य रहता था। रहने के लिए उसके पास कई बड़े-बड़े महल थे। उसकी सेवा के लिए उसके पास बहुत से नौकर-चाकर थे। उसके पास किसी चीज की कमी नहीं थी। यदि कभी एक महल से दूसरे महल तक जाना होता था तो वह घोड़े पर चढ़कर जाता था।

एक दिन रात के समय वह धनी अपने एक महल के सामने टहल रहा था कि सामने से एक बूढ़ा आता हुआ दिखाई दिया। बूढ़े के कपड़े फटे हुए थे और वह अपने सिर पर भार उठाए हुए था। धनी मनुष्य को देखकर उसने अपना भार धरती पर फेंक दिया और प्रणाम करता हुआ बोला-“श्रीमान्‌ जी! बहुत थक गया हूं।”

“तो ?”

“यदि आप आज्ञा दें तो आपके यहां रात काट लूं?”

“यह हमारा महल है, धर्मशाला नहीं है।”

“मैं केवल आपकी घुड़साल के बाहर पड़ा रहूंगा। पौ फटते ही चला जाऊंगा।”

“परंतु यहां तुम्हारी देख-भाल कौन करेगा?”

“मुझे किसी चीज की आवश्यकता नहीं है।”

“हमें क्या मालूम कि तुम कौन हो। एक मनुष्य हमें रात-भर तुम्हारा पहरा देने के लिए लगाना होगा।”

“क्यों, महाराज?”

“इसलिए कि रात को तुम कोई वस्तु उठाकर न भाग जाओ ।”

“राम-राम!” इतना कहकर बूढ़े ने । अपने कानों को हाथ लगाए और धनी को नमस्कार करने के बाद उसने अपना भार सिर पर उठा लिया और वह वहां से चल दिया।

रात अंधेरी थी। आकाश में बादल छा रहे थे। कभी-कभी कुछ बूंदा-बांदी भी होने लगती थी। आंधी आने का डर था। बूढ़ा बुरी तरह से थक रहा था। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। चलना कठिन था परंतु धनी मनुष्य के कटु शब्दों ने उसे ऐसा व्यथित किया था कि उसने अब सक्खर नगर के किसी भी शहरी के पास जाकर विश्राम करने का विचार छोड़ दिया। वर्षा जोरों से आ गई। जिस तरह रात का अंधकार बढ़ता जा रहा था उसी तरह बूढ़ा भी अपना भार उठाये हुए आगे ही चला जा रहा था।

कुछ दिनों के बाद वह सिंधी अमीर अपने मित्रों और सेवकों के साथ शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। शिकार खेलते समय उसने अपना घोड़ा एक हिरण के पीछे लगा दिया। बहुत यत्न करने पर भी वह शिकार उसके हाथ नहीं आया। इस दौड़-धूप में वह अपने साथियों से बिछुड़ गया। घने जंगल में घुस जाने पर वह अपने नगर का मार्ग भी भूल गया और घंटों तक जंगल में भटकता रहा। इतने में रात हो गई। आंधी चलने लगी। बादल छा गए। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो सिंधी अमीर की कुछ भी सहायता करता। बेचारा थककर चूर-चूर हो गया। जब उसे कोई मार्ग नहीं सूझा तो अपने घोड़े की पीठ से नीचे उतरकर वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गया।

आंधी इतने जोरों से बढ़ने लगी कि जंगल के वृक्ष टूट-टूटकर गिरने लगे। तूफान के कारण अंधेरा बढ़ने लगा। हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था। प्रकृति के इस प्रकोप से घबराकर घोड़ा अपने बचाव के लिए इधर-उधर भागने लगा। घोड़े का मालिक इतना थका हुआ था कि उसे कोई होश ही नहीं था।

थोड़ी देर के बाद आंधी शांत हो गई। थोड़ी-थोड़ी वर्षा होने से चारों ओर की फैली हुई धूल बैठ गई। आकाश कुछ-कुछ साफ हो गया। सूर्य अभी छिपा नहीं था। उसकी धीमी-धीमी किरणों के प्रकाश में सिंधी अमीर ने देखा कि उसका घोड़ा भी उससे जुदा हो गया था। वह घोड़ा उसने दो हजार रुपए में खरीदा था और बहुत चाव से पाला था। अब तो उस अमीर को घर पहुंचने की कोई आशा ही नहीं थी।

कहते हैं कि सवेरा होने के आस-पास रात का अंधकार बहुत बढ़ जाता है। इसी तरह आशा और सुख की किरणों के पहुंचने से पहले निराशा और दुःख का अंधेरा भी बहुत अधिक होता है। बहुत अधिक दुःखी और निराश हो जाने पर उस सिंधी अमीर को दूर से एक व्यक्ति आता हुआ दिखाई दिया। पहले तो वह डर गया कि कहीं कोई चोर या डाकू न हो, परंतु जब उस व्यक्ति ने पास आकर नमस्कार करते हुए अपने होंठों की मुस्कान से धनी मनुष्य के हृदय को शांत कर दिया तो निराश सिंधी को आशा का प्रकाश दिखाई देने लगा। हंसते हुए उस व्यक्ति ने अमीर से पूछा-“आप इतनी घबराहट में क्यों हैं?”

“साथियों के बिछुड़नें से, राह भटकने से और किसी सहायक के न मिलने से ।” ऐसा कहते-कहते अमीर ने अपनी सारी कथा सुना दी।

निस्सहाय अमीर की करुणाजनक कहानी सुनकर उस व्यक्ति को उस पर दया आ गई। वह उसे अपनी झोंपड़ी में ले गया। वहां जाकर वह बोला-”यहां मैं अपने बूढ़े पिता के साथ रहता हूं। जो रूखा-सूखा भोजन हम खाते हैं वह आप भी खायें, और फिर विश्राम करें।”

“परंतु मेरे घोड़े का क्या होगा?” अमीर ने घबराते हुए पूछा।

“सुबह होने से पहले ही मैं आपके घोड़े को भी ढूंढ लाऊंगा।” वह व्यक्ति बोला।

“कैसे ?”

“मैं इस जंगल के कोने-कोने से परिचित हूं।”

“तो क्याज तुम मेरे साथियों को भी ढूंढ सकोगे?”

“यदि वे इस जंगल में हुए तो मैं उन्हें अवश्य ढूंढ निकालूंगा ।”

इस उत्तर से सिंधी अमीर को बहुत संतोष हुआ। अब वह निश्चित होकर लेट गया। अभी वह सोया नहीं था कि उस व्यक्ति ने अमीर के सामने दूध का कटोरा लाकर रख दिया।

“यह क्या है, महाशय?”’ अमीर ने पूछा।

उत्तर मिला, “हमारी बकरी का दूध ।”

“तुम्हारे पास कितनी बकरियां हैं?

“केवल एक ।”

“क्या एक बकरी इतना अधिक दूध दे सकती है?”

“यह एक सेर से अधिक नहीं होगा ।”

“तुम भी पियो।”

“पिताजी ने कहा है कि आज का दूध केवल अतिथि-सेवा में ही लगाया जा सकता है। आज हम लोग दूध नहीं पियेंगे।”

“क्यों ?”

“हमारे यहां सबसे बढ़िया चीज दूध और पूत को समझा जाता है। अतिथि की सेवा में हम लोग इन दोनों वस्तुओं को पेश कर देते हैं। मैं पिताजी का इकलौता पुत्र हूं, और दूध हमारे यहां सर्वोत्तम भोजन समझा जाता है। पिताजी ने ये दोनों वस्तुएं आपकी सेवा में भेज दी हैं।”

“तुम सचमुच देवता हो ।”

“नहीं साहब! देवता तो बहुत दूर की चीज है, हम तो पूरी तरह मानवता को भी नहीं अपना सके ।”

“नहीं भैया! मानवता तो आप लोगों में कूट-कूटकर भरी हुई है।”

इस तरह बातें करते-करते सिंधी अमीर सो गया।

अपने अतिथि की सच्ची सेवा करने वाला वह व्यक्ति चुपके से उठा और हाथ में मशाल लेकर अपने अतिथि का घोड़ा ढूंढ़ने के लिए चल दिया।

पौ फटने के समय के आस-पास वह अपने अतिथि का घोड़ा लेकर अपनी झोंपड़ी पर लौटा। उसकी माता ने जब देखा कि अतिथि का घोड़ा मिल गया है तो वह उठकर घोड़े के लिए दाना दलने लगी। वह जानती थी कि घोड़ा जंगल में घास चरकर आया होगा परंतु फिर भी उसने अतिथि के थोड़े की सेवा करना अपना कर्त्तव्य समझा।

घोड़े को यदि दाना न मिलता तो शायद अतिथि-सेवा अधूरी समझी जाती।

प्रातःकाल जब सिंधी अमीर सोकर उठा तो उसने देखा कि उसका घोड़ा दाना खा रहा था और अतिथि-सेवक किसान उसके सामने हाथ जोड़े हुए कह रहा था- “आज ईश्वर ने हमारी लाज रख ली।”

“कैसे ?” अमीर ने पूछा।

“आपका घोड़ा सकुशल मिल गया। यदि वह सामने की ओर निकल गया होता तो शायद बाघ उसे अपना शिकार बना लेता।”

यह सुनकर अमीर ने उस व्यक्ति को बड़ा धन्यवाद दिया। इसी समय उस व्यक्ति की वृद्ध माता ने अतिथि के लिए दूध का एक कटोरा भरकर भेज दिया।

दूध पी लेने के बाद अमीर ने घर लौटने की इच्छा प्रकट करते हुए कहा-“मैं तुम्हारे पिता से मिलना चाहता हूं।”

नवयुवक अपने पिता को बुलाने गया और कहने लगा-“पिताजी, अतिथि महाशय आपको याद कर रहे हैं।”

“किसलिए?” पिता ने पूछा।

“वे जाना चाहते हैं।”

“उनसे कहो कुछ दिन और ठहरें।”

“मैंने कहा था परंतु वे मानते नहीं।”

“अच्छा तो उन्हें सक्खर शहर तक छोड़ आओ।”

“जाने से पहले वे आपके दर्शन करना चाहते हैं।”

“बेटा! अच्छा तो यही होगा कि मैं उनसे न मिलूं।”

पिता की यह बात सुनकर पुत्र को कुछ आश्चर्य हुआ। उसने अपने पिता के सामने मुख से कभी ‘क्यों’ का शब्द नहीं बोला था। अतः वह पिता को इस प्रकार देखने लगा मानो उसकी आंखों में ‘क्यों’ का शब्द लिखा हो। वृद्ध पिता ने पुत्र के इस प्रश्न को पढ़ लिया और उसे धीरे से समझाते हुए बोला-“तुम शायद यही पूछना चाहते हो कि मैं अतिथि से इस प्रकार दूर रहकर उसका निरादर क्यों  कर रहा हूं। असल में मेरी इस बात में भी अतिथि-सत्कार का भाव भरा हुआ है।”

“मैं इस अनादर में आदर की भावना को समझ नहीं सका, पिताजी!”

“समझाऊं भी कैसे?”

“ऐसी कौन-सी कठिन बात है जो मुझे न समझा सकें।”

“यूं ही एक व्यर्थ-सी घटना है जिसे मैं बताना नहीं चाहता।”

“अच्छा तो मैं अतिथि महोदय से आपके बारे में क्या कहूं?”

“यही कि पिताजी बूढ़े भी हैं और रोगी भी। वे चल-फिर नहीं सकते। अतः उनका बाहर आना कठिन है।”

पुत्र ने अपने पिता का संदेश सिंधी अमीर तक पहुंचा दिया। यह बात सुनकर अमीर बोला-“इस पवित्र स्थान पर आकर मैं ऐसे महात्मा को देखे बिना कैसे जाऊं जिसके घर में भूले-भटकों को मार्ग दिखाया जाता है, जहां अतिथि की सेवा जी-जान से की जाती है, जहां अपरिचित अतिथि के घोड़े को ढूंढने के लिए घरवाले अपनी जान संकट में डाल सकते हैं, और जहां गृहिणी अपना खान-पान उठाकर अतिथि के घोड़े का पेट भरने के लिए तैयार रहती है। तुम्हारे पिता को देखकर ही मेरा जीवन सफल हो सकता है।”

पुत्र ने अतिथि का संदेश पिता से कह सुनाया। अब वृद्ध क्या करता! उसे अतिथि के सामने आना ही पड़ा।

सिंधी अमीर ने जब उसे देखा तो उसी समय पहचान गया कि यह तो वही बूढ़ा है जो कुछ दिन हुए सक्खर में उसके महलों के सामने बोझ उठाए हुए आया था। एक रात के लिए वह आश्रय मांगता था। अमीर ने उसे चोर तक कह दिया था। कितनी दानवता थी उस दुर्व्यवहार में! इस वृद्ध के पुत्र ने अपनी मानवता का परिचय देकर सिंधी अमीर के हृदय को बिलकुल ही बदल दिया। सिंधी अमीर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा-याचना करने लगा।

वृद्ध ने कहा-“आपकी ओर से क्षमा-याचना का प्रश्न पैदा ही नहीं होता, क्योंकि मैं बाहर आकर आपको उस पुरानी घटना की याद दिलाना नहीं चाहता था। आपके आग्रह को मैं टाल भी नहीं सका। इसीलिए मुझे यहां आना पड़ा। इससे शायद आपको दुःख हुआ हो। अतः मुझे आपसे क्षमा मांगनी चाहिए ।”

“कितना ऊंचा है आपका व्यक्तित्व!” यह कहकर सिंधी अमीर वृद्ध के चरणों में गिर पड़ा। उसके नेत्रों से पश्चाताप के आंसू गिर रहे थे। उसके होंठ फड़फड़ा रहे थे, मानो वह यही कह रहा हो-“इस बूढ़े की झोपड़ी महलों से बहुत ऊंची है क्योंकि यहां मानवता का निवास है।”

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Peru ki Lok Kathayen-1/ पेरू की लोक कथाएँ-1

मन का जादू: पेरू की लोक-कथा

बहुत पुरानी कहानी है। तब पेरू में एक शक्तिशाली राजा राज्य करता था। उसका साम्राज्य दूर-दूर तक फैला हुआ था। राजा के सन्देश लाने-ले जाने के लिए दरबार में सन्देशवाहकों की एक पूरी टोली काम करती थी।

हुलाची नाम का व्यक्ति उस टुकड़ी का मुखिया था। राजा हुलाची पर बहुत विश्वास करता था। अगर राजा को कोई अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और गुप्त सन्देश भेजना होता हो वह हुलाची को ही सौंपता था।

हुलाची बहुत वीर और दयालु स्वभाव का था। शुरू-शुरू में तो सब ठीक-ठाक चला, लेकिन अब उसका स्वभाव ही उसके रास्ते का रोड़ा बनने लगा। हुलाची किसी को दुःखी नहीं देख सकता था। अगर वह रास्ते में किसी दीन-दुःखी को देखता, तो सारा काम-काज छोड़कर उसकी देखभाल में जुट जाता। उस समय वह बिल्कुल भूल जाता था कि राजा ने उसे एक महत्त्वपूर्ण सन्देश देकर भेजा है, जिसे तुरन्त पहुंचाना है। कई बार इस कारण से राजा के सन्देश विलम्ब से पहुंचते। इससे कभी-कभी नुक्सान भी हो जाता।

राजा को पता चला तो वह बहुत गुस्सा हुआ। उसने हुलाची को खूब डांटा-फटकारा। चेतावनी दी कि अगर अब कभी सन्देश विलम्ब से पहुंचा तो उसे कड़ा दण्ड दिया जाएगा।

हुलाची सिर झुकाए सुनता रहा । लेकिन वह अपना स्वभाव न बदल सका। एक बार वह राजा का सन्देश लेकर जा रहा था तो उसने एक व्यक्ति को बेहोश पड़े देखा । वह वहां रुकने को हुआ, लेकिन तभी उसे राजा की चेतावनी याद हो आयी । वह मन मारकर आगे बढ़ गया। पर सारे रास्ते उसका मन उसे कचोटता रहा।

एक बार हुलाची सन्देश लेकर पहाड़ी रास्ते से जा रहा था। आकाश में बादल घिरे थे, वर्षा हो रही थी। तभी उसने एक बुढ़िया को फिसलकर गिरते देखा। उसने झट दौड़कर बुढ़िया को पकड़ लिया। अगर हुलाची समय पर वहां न पहुंच जाता तो बुढ़िया हज़ारों फीट गहरी खाई में गिर जाती।

लेकिन फिर भी बुढ़िया को काफी चोट आयी थी। पत्थर से टकराकर उसका सिर फट गया था और खून बह रहा था। बुढ़िया बेहोश हो गई थी।

हुलाची धर्म-संकट में पड़ गया। अगर बुढ़िया की देखभाल करता है तो सन्देश पहुंचने में विलम्ब हो जाएगा, राजा क्रोधित होंगे। और अगर सन्देश देने जाता है तो देखभाल न होने से न जाने बुढ़िया की क्या दशा हो। वहां कोई था भी नहीं, जिसे हुलाची बुढ़िया की देखभाल के लिए छोड़ जाता। हुलाची सोचता रहा, सोचता रहा। आखिर उसने निर्णय लिया कि चाहे जो हो, वह बुढ़िया के स्वस्थ होने के बाद ही आगे जाएगा।

हुलाची ने वहीं बुढ़िया के लिए एक झोंपड़ा बनाया। उसकी मरहमपट्टी की और जब वह ठीक हो गई तो उसे एक गांव में छोड़कर आगे बढ़ चला। बुढ़िया ने हुलाची को खूब आशीर्वाद दिए।

सन्देश पहुंचने में बहुत देर हो गई थी। हुलाची समझ गया कि राजा इस बार अवश्य दण्ड देंगे। और यही हुआ भी। जब राजा को पता चला तो उसने हुलाची को न सिर्फ नौकरी से हटा दिया बल्कि अपना राज्य छोड़कर चले जाने का भी आदेश दिया।

बेचारा हुलाची क्या करता! वह चुपचाप राज्य छोड़कर चला गया। वह सारा दिन इधर-उधर फिरता रहता। जंगली फल-फूल खाकर पेट भरता। कहीं किसी दीन-दुःखी को देखता, या घायल जानवर पर नजर पड़ती, तो सब कुछ भूलकर उसकी सेवा में लग जाता।

लेकिन हमेशा तो ऐसे नहीं चल सकता था। हुलाची को कई-कई दिन खाना न मिलता ।

एक दिन वह जंगल में घूम रहा था। उसने वहां एक झोंपड़ी देखी। शायद कुछ खाने-पीने को मिल जाए, यह सोचकर वह उस ओर बढ़ चला। जैसे ही हुलाची झोंपड़ी के पास पहुंचा, एक बुढ़िया अन्दर से निकली। यह वही बुढ़िया थी, जिसे हुलाची ने खड्ड में गिरने से बचाया था। बुढ़िया भी उसे पहचान गई। वह हुनाची को झोंपड़ी में ले गई और उसे भरपेट भोजन कराया।

खाना खाते समय हुलाची की आंखों में आंसू आ गए। आज न जाने कितने दिन बाद उसने भरपेट भोजन किया था। बुढ़िया ने पूछा तो हुलाची ने सारी कहानी बता दी।

सुनकर बुढ़िया ने एक जोड़ी चप्पल हुलाची को दीं। बोली, “बेटा, इन्हें पहन ले ।”

हुलाची आश्चर्य से बुढ़िया को देखता रहा । बात उसकी समझ में नहीं आयी थी। बुढ़िया हुलाची के मन की बात समझ गई। मुस्करा कर बोली, “बेटा, ये चप्पलें उड़ने वाली हैं। मैं एक जादूगरनी हूं। मैं इतने दिनों से किसी ऐसे आदमी की तलाश में थी, जो निःस्वार्थ भाव से परोपकार करता हो। तू सचमुच बहुत अच्छा इन्सान है। ये चप्पलें तेरे बहुत काम आएंगी। इन्हें पहनकर तू जहां चाहे जा सकेगा। जरा भी देर नहीं लगेगी।”

हुलाची जादुई चप्पलें पहनकर बाहर आया। उसने उड़ने की बात सोची तो सचमुच वह हवा में उड़ने लगा। यह देख वह बहुत प्रसन्नब हुआ और बुढ़िया को धन्यवाद देकर वापस चल दिया।

अब हुलाची फिर राजा के पास पहुंचा। राजा से कहा कि उसे फिर से नौकरी पर रख लिया जाए। अब वह बिल्कुल ठीक-ठीक काम करेगा। राजा हुलाची को अच्छा आदमी समझता था। उसका गुस्सा भी उतर चुका था। उसने हुलाची को फिर से नौकरी पर रख लिया।

हुलाची उन जादुई चप्पलों की मदद से पलक झपकते ही सन्देश यहां से वहां पहुंचा देता था। इससे राजा बहुत खुश हुआ।

एक दिन हुलाची सन्देश लेकर उड़ा जा रहा था। एकाएक उसने नीचे देखा-एक आदमी एक चट्टान पर खून से लथपथ बेहोश पड़ा था। हुलाची आगे न जा सका। उसने वहीं उतरकर उस आदमी की मरहम-पट्टी की, फिर आगे बढ़ा।

इस बार सन्देश पहुंचाने में फिर देर हो गई थी। राजा ने फिर उसे बुरा-भला कहा। हुलाची ने मन-ही-मन निश्चय किया कि वह अपने काम-से-काम रखेगा, किसी ओर नहीं देखेगा और खाली समय में ही दीन-दुखियों की सहायता का काम करेगा।

एक दिन हुलाची एक जंगल से जा रहा था। तभी न जाने क्या  हुआ, उसने देखा वह जमीन पर खड़ा है। वह उड़ते-उड़ते एकाएक धरती पर उतर आया था। हुलाची ने फिर से उड़ने की इच्छा की, लेकिन कई बार इच्छा करने के बाद भी वह उड़ा नहीं। उसी जगह खड़ा रहा। हुलाची ने सोचा, शायद जादुई चप्पलों का प्रभाव जाता रहा। वह खड़ा-खड़ा सोच ही रहा था कि तभी वही बुढ़िया वहां आयी । उसे देखते ही हुलाची ने सब कुछ बता दिया।

सुनकर बुढ़िया ने आश्चर्य से सिर हिला दिया। बोली, “बेटा, ऐसा कभी नहीं हो सकता। ये चप्पलें तो बहुत चमत्कारी हैं। ला, मैं देखूं, क्या बात है।”

बुढ़िया ने चप्पलें स्वयं पहनीं तो वह एकदम आकाश में उड़ने लगी। यह देखकर हुलाची चक्कर में पड़ गया। यह मामला क्या था। उसने बुढ़िया से चप्पलें लेकर पहनी, लेकिन वह नहीं उड़ सका।

फिर तो कई बार ऐसा हुआ। बुढ़िया ने जब भी चप्पलें पहनीं वह आकाश में उड़ने लगी और हुलाची उड़ने में सफल नहीं हुआ।

यह देख बुढ़िया बोली, “बात मेरी समझ में नहीं आ रही है कि यह रहस्य क्याा है?”

तभी हुलाची की नजर सामने गई। उसने देखा, एक गाड़ी के नीचे एक घायल कबूतर पड़ा हुआ है। वह दौड़कर वहां पहुंचा। उसने कबूतर की मरहम-पट्टी कर दी।

और इस बार जब उसने चप्पलें पहनीं तो वह एकदम आकाश में उड़ गया।

हुलाची तुरन्त नीचे उतर आया। उसने चप्पलें बुढ़िया के सामने रख दीं।

बोला, “अम्मा, ये उड़ने वाली चप्पलें तुम्हें ही मुबारक हों।”

“क्यों , बेटा ?” बुढ़िया ने पूछा।

“अब मैं समझ गया हूँ कि मैं पहले क्यों  नहीं उड़ पा रहा था और अब कैसे उड़ सका। असल में चप्पलें तो ठीक हैं। खराबी मेरे मन में ही है।” हुलाची ने कहा।

बुढ़िया चुपचाप उसकी बात सुन रही थी।

हुलाची कहता गया, “सामने घायल कबूतर पड़ा था और मैं उसे छोड़कर उड़ जाना चाहता था। इसलिए मेरे मन ने मुझे रोक दिया। तेरी जादुई चप्पलें भी मन के सामने बेबस हो गईं। मेरा मन उस घायल कबूतर की आवाज़ सुन रहा था। यही कारण था कि कबूतर के ठीक होते ही चप्पलों का जादू वापस आ गया। इसलिए मैं तो इनके बिना ही ठीक हूं। आज मैं समझ गया हूं कि मुझे क्या करना चाहिए। मैं वही करूंगा। और उस काम के लिए मुझे इन जादुई चप्पलों की कोई आवश्यकता नहीं है।”

सुनकर बुढ़िया हँस पड़ी। बोली, “बेटा, तूने ठीक कहा। मन के जादू के सामने हर जादू बेकार है। तू दीन-दुखियों की सेवा कर। उसी जादू से तुझे सुख मिलेगा ।”

बस, उस दिन से हुलाची ने सारे काम छोड़ दिए। वह दीन-दुखियों की सेवा करता हुआ घूमने लगा। कहते हैं हुलाची आज भी अमर है।

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France ki Lok Kathayen-1/ फ्रांस की लोक कथाएँ-1

करामाती दाना: फ्रांस की लोक-कथा

बहुत पहले की बात है । एक भिखारी सड़क के किनारे रहा करता था । उसका न तो कोई रहने का ठिकाना था और न ही कमाई का कोई निश्चित जरिया ।

वह कंधे पर एक झोला लटकाए सुबह से शाम तक भीख मांगा करता था । कहीं से उसे रोटी मिल जाती तो दूसरी जगह से सब्जी मांग कर पेट भर लेता था । लोग उस वैगी कह कर पुकारते थे ।

एक दिन वैगी को सुबह से शाम तक कुछ भी खाने को नहीं मिला । उसका भूख के मारे बुरा हाल था । वह परेशान होकर इधर-उधर घूम रहा था । तभी एक बूढ़ी स्त्री ने उसे अपने पास बुलाया और उसकी परेशानी का कारण पूछा ।

स्त्री ने वैगी को एक गेहूं का दाना देते हुए कहा – “यह गेहूं का दाना करामाती है, इसे अपने पास संभाल कर रखना । जब तक यह दाना तुम्हारे पास रहेगा तुम्हें भोजन की कोई कमी नहीं होगी ।”

वैगी दाने को उलट-पलट कर देखने लगा, फिर उसने सिर उठाकर स्त्री से कुछ पूछना चाहा, परंतु तब तक स्त्री गायब हो चुकी थी ।

वैगी दाने को अपने थैले में डालकर भोजन की तलाश में पास के एक होटल की तरफ से गुजर रहा था । तभी एक व्यक्ति ने उसे रोककर कहा – “तुम यहां आकर पेट भर कर भोजन खा सकते हो । यहां आज हमारे सेठ जी का जन्मदिन मनाया जा रहा है ।”

वैगी मन ही मन बहुत खुश हुआ और होटल से पेट भर खाना खाकर बाहर निकला । वह सोचने लगा कि यह गेहूं के दाने की करामात है या केवल एक संयोग कि उसे मुफ्त में पेट भर भोजन मिल गया ।

अगले दिन वह घूमते-घूमते थक गया तो भोजन के लिए एक घर पर पहुंच गया । वहां उसने दरवाजे पर दस्तक दी । एक सभ्य व पढ़ी-लिखी स्त्री ने उसे आदरपूर्वक भीतर बुलाया और कहा – “आप यहां रात्रि को विश्राम कर सकते हैं । पहले आप भोजन कर लीजिए ।”

वैगी को अब यकीन हो गया कि गेहूं का दाना वाकई करामाती है । उसने पेट भर भोजन किया और फिर सोने जाने लगा । तभी उसे शिष्टाचार की बात याद आई तो उसने अपने थैले से अपना चाकू व प्लेट निकालकर मेजबान स्त्री को दे दी । फिर उसने गेहूं का दाना स्त्री को देते हुए कहा – “मेडम, यह दाना मेरे लिए बहुत कीमती है, इसे संभाल कर रख लीजिए । सुबह को जाते वक्त यह दाना मैं आपसे वापस ले लूंगा ।”

मेजबान स्त्री ने गेहूं का दाना संभाल कर मेज पर रखी प्लेट में रख दिया और सोने चली गई ।

प्रतिदिन की भांति स्त्री सुबह को जल्दी उठ गई और अपनी मुर्गियों को बाड़े में दाना खिलाने लगी । फिर अपनी रसोई में काम करने चली गई ।

तभी एक मुर्गी खुले दरवाजे से कमरे के भीतर आकर जमीन से बचा-खुचा खाना उठा कर खाने लगी । इसी बीच वैगी की आंख खुली । उसने देखा कि एक मुर्गी कमरे में घूम रही है ।

वैगी मुर्गी के पीछे दौड़ा । मुर्गी बचने के लिए मेज पर चढ़ कर बैठ गई । उसने प्लेट में गेहूं का दाना देखा तो झट से खा गई । जब तक वैगी मुर्गी को पकड़ता, मुर्गी दाना खा चुकी थी ।

वैगी ने शोर मचाना शुरू कर दिया । घर के सभी लोग जाग गए । घर का मालिक बहुत ही ईमानदार व शरीफ इंसान था । वह पूछने लगा – “आप हमारे मेहमान हैं, क्या बात हो गई, जिससे आप इतने नाराज हैं ?”

वैगी बोला – “मैंने मैडम को कह दिया था कि मेरा गेहूं का दाना संभाल कर रखिएगा, पर उन्होंने मेज पर रख दिया, उसे आपकी मुर्गी खा गई, मुझे वही गेहूं का दाना चाहिए ।”

मेजबान लोग यह तो जानते नहीं थे कि उस दाने में क्या खासियत थी । वे खुशामद करने लगे कि आप जितने गेहूं चाहें ले जा सकते हैं । वह स्त्री एक कटोरी भर गेहूं ले आई, परंतु वैगी रोने लगा कि उसे वही दाना चाहिए । मेजबान ने कहा – “वह दाना तो मुर्गी के पेट में जा चुका है । आप चाहें तो उस मुर्गी को ले जा सकते हैं ।”

वैगी को बात जंच गई । उसने वह मुर्गी लेकर अपने थैले में डाल ली और वहां से चल दिया । सारा दिन इधर-उधर घूमने के बाद वह शाम को एक घर के सामने पहुंचा । वहां भी उसको आदरपूर्वक भीतर बुलाया गया और स्वादिष्ट पकवान खिलाए गए ।

वैगी ने मकान की मालिकिन को मुर्गी और थैला संभाल कर रखने को दे दिया और सो गया । सुबह उठ कर वैगी ने मालिकिन से अपनी मुर्गी मांगी । मालिकिन मुर्गी लेने गई तो देखा कि वैगी की मुर्गी के पंख बिखरे पड़े हैं ।

मालिकिन के नौकर ने बताया कि नई मुर्गी देखकर मालिकिन की मुर्गियों ने बाड़े में उस पर आक्रमण कर दिया और अपनी चोंचें मार-मार कर लहूलुहान कर दिया था । इससे वैगी की मुर्गी जान बचाने के लिए बाहर भागी थी । बरामदे में ही मालिकिन का कुत्ता बैठा था जो मुर्गी को मार कर खा गया । वैगी रोने-चिल्लाने लगा कि उसे अपनी वही मुर्गी चाहिए ।

मालिकिन की समझ में नहीं आ रहा था कि वैगी को कैसे शांत कराए । उसने विनती करते हुए कहा कि आप उसके बदले में कोई-सी मुर्गी ले सकते हैं परंतु वैगी नहीं माना । तब मालिकिन ने हार कर अपना पालतू कुत्ता वैगी को दे दिया ।

वैगी ने उस कुत्ते को अपने थैले में डाल लिया और आगे चल दिया । आगे जाकर वह एक शानदार बंगले के आगे रुका । बंगले में राजकुमारी अपने परिवार के साथ रहती थी । बंगले की मालिकिन ने वैगी को भीतर बुलाया । नहला-धुला कर कपड़े दिए, फिर पेट भर भोजन खाने को दिया ।

बंगले में रहने वाली राजकुमारी को देखकर वैगी के दिल में लालच आ गया । वह सोचने लगा कि एक गेहूं के दाने की करामात के कारण उसे मुर्गी और फिर मालिकिन का प्यारा कुत्ता मिल गया । यदि किसी तरह यह कुत्ता मर जाए तो बदले में मैं राजकुमारी को मांग लूं और उससे विवाह कर लूं, फिर मेरा जीवन सुखमय हो जाएगा ।

वैगी ने जानबूझकर कुत्ते को राजकुमारी के पीछे लगा दिया । जब राजकुमारी अपनी सखियों के साथ बगीचे में खेल रही थी, तभी कुत्ता जोर से राजकुमारी पर झपट पड़ा । राजकुमारी ने अपने बचाव में एक बड़ा पत्थर कुत्ते को दे मारा । कुत्ते को चोट लगी, पर कुत्ता फिर उठकर राजकुमारी के पीछे भागा । इस बार राजकुमारी ने क्रोध में आकर कुत्ते पर डंडे से वार कर दिया । कुत्ता वहीं मर कर ढेर हो गया ।

वैगी जब बंगले से बाहर जाने लगा तो उसने बंगले की मालिकिन से अपना कुत्ता मांगा । परंतु मालिकिन ने सकुचाते हुए कुत्ते के मरने का सारा किस्सा बयान कर दिया ।

वैगी जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगा कि उसे अपना ही कुत्ता चाहिए । बगंले की मालिकिन ने बहुत समझाया कि वह दूसरा कुत्ते ले लो, परंतु वह नहीं माना । तब बंगले की मालिकिन ने असमर्थता प्रकट कर दी । वैगी बोला – “जिसने मेरे कुत्ते को मारा है, मुझे वही दे दीजिए, मैं उसी से संतुष्ट हो जाऊंगा ।”

मालिकिन को वैगी की बात सुनकर बहुत क्रोध आया कि एक आदमी कुत्ते के बदले उनकी बेटी मांग रहा था ।

मालिकिन ने कहा – “तुम्हें मैं एक हजार मोहरें देती हूं । यदि तुममें कोई हुनर है या किसी कला में निपुण हो तो इन्हें एक महीने में अपनी कमाई से दोगुना कर लाओ । यदि तुम यह कर सके तो अपनी बेटी का हाथ तुम्हें दे दूंगी ।”

वैगी को धन का लालच आ गया और मोहरें लेने को तैयार हो गया । उसने मोहरें लेकर अपने थैले में डाल लीं और चल दिया ।

रास्ते में वैगी ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगा । परंतु वह यह नहीं समझ पा रहा था कि वह किस तरह का व्यापार करके इन मोहरों को दुगुना करे । वैगी को भीख मांगने के सिवा कुछ काम नहीं आता था । भीख मांग कर एक महीने में तो क्या एक वर्ष में भी इतनी मोहरें कमाना संभव नहीं होगा ।

तभी वैगी ने सोचा कि वह पहले कुछ मोहरें खर्च करके आराम से जीवन बिताएगा । फिर बाद में कमाई के बारे में सोचेगा ।

रास्ते में एक जगह रुक कर वैगी ने मोहर निकालने के लिए थैले में हाथ डाला तो उसे यूं लगा कि हाथ में कुछ चुभ गया हो । उसने तुरंत हाथ बाहर निकाल लिया । उसने थैला खोल कर देखना चाहा तो सैकड़ों कीड़े-मकौड़े उड़कर उसे काटने लगे ।

वैगी ने थैला उठा कर दूर नदी में फेंक दिया । वैगी खाली हाथ रह गया । अब उसके सामने भीख मांगने के सिवा कोई चारा नहीं था । उसे लालच का फल मिल गया था ।

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Turkey ki Lok Kathayen-1/ तुर्की लोक कथाएँ-1

धूप निकले, बारिश हो: तुर्किस्तान/टर्की की लोक-कथा

एक गांव में हैदर नाम का एक व्यापारी रहता था । गांव में उसकी परचून की दुकान थी । दुकान खूब अच्छी चलती थी क्योंकि परचून की गांव में वह एकमात्र दुकान थी ।

हैदर की सुंदर और गुणी दो बेटियां थीं । नाम था अलीजा और सोरा । दोनों बहनों में खूब प्यार था । वे दोनों अपने पिता का खूब खयाल रखती थीं । तरह-तरह के पकवान बनाकर पिता को खिलाती थीं । मां को भी घर के हर काम में मदद करती थीं । दोनों एक दूसरे से हरदम हंसी-मजाक करती रहती थीं । वे दोनों साथ भोजन करतीं व सोती थीं, दोनों का एक दूसरे के बिना मन न लगता था । यदि एक बीमार हो जाती तो दूसरी बहुत उदास रहती और दिन-रात अपनी बहन की तीमारदारी करती रहती ।

हैदर को कभी-कभी एक बेटा न होने का दुख होता था, परंतु अपनी प्यारी बेटियों को देखकर वह सब कुछ भूल जाता था । दोनों बेटियां धीरे-धीरे सयानी हो रही थीं । हैदर अपनी बेटियों की शादी जल्दी ही कर देना चाहता था ।

एक दिन हैदर की पत्नी ने कहा – “हमारी बड़ी बेटी अलीजा विवाह योग्य हो गई है, हमें जल्दी ही उसके लिए वर तलाश करके उसका विवाह कर देना चाहिए ।”

हैदर बोला – “मेरी भी इच्छा है कि अलीजा का विवाह खूब धूमधाम से करूं । मैं सोचता हूं कि उसके लिए किसी व्यापारी का बेटा ही ठीक रहेगा ।”

पत्नी बोली – “नहीं-नहीं, किसी व्यापारी के बेटे से अलीजा का विवाह करोगे तो वह भी तुम्हारी तरह दिन-रात काम में लगा रहेगा । मैं चाहती हूं कि अलीजा का विवाह किसी जमींदार के पुत्र से हो ।”

“हां, तुम ठीक कहती हो । मैं पास के गांव के जमींदार को जानता हूं । पर पता नहीं उनका कोई बेटा विवाह योग्य है भी या नहीं ।”

इसके पश्चात हैदर ने गांव के पंडित को जमींदार गेदाना के परिवार व पुत्र की जानकारी लेने के लिए पड़ोस के गांव में भेज दिया । पंडित जमींदार के घर पहुंचा तो यह जानकर बहुत खुश हुआ कि जमींदार का इकलौता पुत्र विवाह योग्य था । पंडित बहुत ज्ञानी होने के साथ-साथ अनुभवी भी था । उसने तुरंत हैदर की बेटी के विवाह का प्रस्ताव जमींदार गेदाना के आगे रख दिया । साथ ही अलीजा के रूप-गुण की खूब प्रशंसा की ।

कुछ ही दिनों में अलीजा का विवाह गेदाना के बेटे समर से हो गया । सोरा अकेली रह गई । वह अब ज्यादा हंसती-बोलती नहीं थी, अक्सर उदास होकर अपनी बहन अलीजा को याद करती रहती थी । अलीजा अपनी ससुराल में बहुत सुख से रहने लगी । उसके पति व ससुर के पास बहुत बड़े खेत थे, जहां हर मौसम की फसल उगाई जाती थी । अलीजा जब भी पिता के घर आती, अपने पिता व ससुराल की प्रशंसा करते न थकती थी ।

एक दिन अलीजा ने अपने पिता से कहा – “पिता जी, मेरा विचार है कि अब आपको सोरा का विवाह करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहिए । सोरा यूं भी अकेली रहने के कारण उदास रहने लगी है । उसको ससुराल में नए लोग मिलेंगे तो मुझे भूल जाएगी । वरना यूं ही सूख कर कांटा हो जाएगी ।”

पिता को अलीजा की बात जंच गई और उसने सोरा की मां से कहा – “तुम सोरा के लिए बुआ से जिक्र करना, हो सकता है कि उनकी जानकारी में सोरा के लायक कोई वर हो । वैसे भी तुम्हारी बुआ जग-बुआ है । वह मोहल्ले-गांव की खूब खोज-खबर रखती है ।”

हैदर की पत्नी बोली – “बुआ तो परसों ही एक लड़का बता रही थी । मैंने ही मना कर दिया कि हमें अभी सोरा का ब्याह नहीं करना है । उसके जाने से हमारा घर बिल्कुल सूना हो जाएगा ।”

हैदर बोला – “वह तो ठीक है, पर यदि अच्छा लड़का मिल रहा हो तो सोरा का विवाह करना ही ठीक रहेगा ।”

बस एक घर में सोरा की बात चलाई गई । बात बन गई और सोरा का विवाह हो गया । सोरा के पति के यहां मिट्टी के बर्तनों का व्यापार होता था । सोरा के ससुर गांव के बड़े कुम्हार थे । आस-पास के सभी गांव-मोहल्ले में उनके यहां के बने बर्तन ही प्रयोग में लाए जाते थे ।

सोरा अपनी ससुराल में जाकर सुखी थी । अत: वह नए माहौल में शीघ्र ही मस्त हो गई । एक वर्ष बीत गया तब हैदर ने सोचा कि दोनों बेटियों को देखे बहुत दिन हो गए । अत: दोनों को एक साथ बुला लिया जाए । दोनों बहनें एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश होंगी ।

अलीजा और सोरा अपने पिता के घर हंसी-खुशी पहुंचीं । दोनों एक-दूसरे से प्यार से गले मिलीं और अपनी-अपनी बातें करने लगीं ।

अगले दिन की बात है । हैदर ने सुना कि कमरे के अंदर अलीजा और सोरा की आपस में बहस करने की आवाज आ रही है । वह ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगा । उसे उत्सुकता थी कि सदा हिल-मिल कर रहने वाली बहनें किस बात पर झगड़ रही हैं । हैदर ने सुना, अलीजा कह रही थी – “इस बार तो हम बहुत परेशान हैं । ईश्वर ने इस बार बहुत सूखा डाल दिया है, अकाल पड़ने की नौबत आ गई है । हम तो दिन-रात यही प्रार्थना कर रहे हैं कि खूब बारिश हो ।”

सोरा बोली – “खूब बारिश की प्रार्थना क्यों करती हो ? थोड़ी-सी बारिश की प्रार्थना क्यों नहीं करतीं ? तुम क्यों मेरा बुरा चाहती हो ?”

“मैं तेरा बुरा क्यों चाहने लगी” सोरा बोली – “मैं तो यही प्रार्थना करती हूं कि खूब बारिश हो । ईश्वर करे, इतनी बारिश की झड़ी लगे कि एक दिन भी धूप न निकले ।”

सोरा बोली – “दीदी, तुम बहुत बुरी हो । मेरा बुरा चाहती हो तभी ऐसी प्रार्थना करती हो । मैं तो ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि रोज खूब तेज धूप निकले ताकि हमारे बर्तन-भांडे प्रतिदिन सूख जाएं । एक दिन भी बारिश हो जाए तो हमारे उस दिन के बर्तन गीले रह जाते हैं फिर अगले दिन हमारे यहां काम नहीं हो पाता ।

हैदर हैरान था कि दोनों बहनें अपनी-अपनी दलीलें देकर एक-दूसरे के विपरीत ईश्वर से प्रार्थना कर रही थीं । वह यह देखकर दुखी हो गया कि जो बहनें एक दूसरे पर जान छिड़कती थीं, आज अपने-अपने लाभ के लिए प्रार्थना कर रही थीं । वह यह सोच रहा था कि उसने क्यों अपनी दोनों बेटियों का ऐसे विपरीत व्यवसाय वाले घरों में विवाह किया, एक ही चीज एक के लिए खुशी और दूसरे के लिए गम देने वाली थी ।

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Turkey ki Lok Kathayen-2/ तुर्की लोक कथाएँ-2

मनमौजी डुमरुल: तुर्किस्तान/टर्की की लोक-कथा

ओगुज़ क़बीले में एक शख्स हुआ, जो मनमौजी डुमरुल के नाम से जाना जाता था। वह दूहा कोजा का बेटा था। डुमरुल ने एक सूखी नदी पर पुल बनवा दिया था। जो भी उस पुल से नदी पार करता था, उससे वह ताँबे के तैंतीस सिक्के वसूलता था। जो पुल से नदी पार करने से इनकार करते थे, डुमरुल उनकी पिटाई करके उनसे ज़बरदस्ती चालीस सिक्के ले लेता था। ऐसा मनमौजी डुमरुल उन लोगों को चुनौती देने के लिए करता था, जो यह समझते थे कि वे उससे भी ज़्यादा बहादुर हैं। डुमरुल चाहता था कि सब लोग – यहाँ तक कि अनातोलिया और सीरिया जैसे सुदूर स्थानों के लोग भी – यह कबूल करें कि वह निडर, वीर, और साहसी है।

एक दिन, कुछ लोगों ने डुमरुल के पुल के पास डेरा डाला। उनमें से एक शानदार, खूबसूरत जवान बीमार पड़ गया और अल्लाह के हुक्म से मर गया। जब वह जवान मर गया, तो कुछ लोग “बेटा”कहकर और कुछ लोग “भाई” कहकर मातम करने लगे और बहुत रोना-धोना मच गया।

मनमौजी डुमरुल फ़ौरन वहाँ आ पहुँचा और उसने लोगों से पूछा:

“क्यों रोना-धोना है, दोस्तो?” क्यों है यह शोर मेरे पुल पर? किसका है मातम तुम लोगों को?”

उन्होंने कहा: “जनाब, हमने एक अच्छा जवान आदमी खो दिया है, इसीलिए हम रो रहे हैं।”

मनमौजी डुमरुल ने पूछा: “वह कौन है जिसने तुम्हारे दोस्त की जान ली?”

उन्होंने जवाब दिया, “अज़ीम अल्लाह का आदेश था। लाल-डैनों वाले मौत के फरिश्ते हज़रत इज़्राईल ने उसकी जान ली।”

डुमरुल ने कहा: “यह कैसा फरिश्ता है अज़राइल जो लोगों की जान लेता है? ऐ रब, तुम्हारी खुशी, वहदत और वजूद की ख़ातिर मुझे इस इज़्राईल से मिला दो। मैं उससे लड़ूँगा और उसे हराकर इस ख़ूबसूरत जवान की जान बचाऊँगा, ताकि इज़्राईल फिर कभी किसी की जान न ले।” यह कहने के बाद मनमौजी डुमरुल अपने घर चला गया। पर अल्लाह ताला उसकी बातों से नाराज़ हो गए।

उन्होंने कहा: “देखो इस सिर-फिरे आदमी को। यह मेरी वहदत को नहीं मानता है। न ही मेरे प्रति शुक्रगुज़ार है। यह मेरी अज़मत के सामने गुरूर से पेश आ रहा है।” उन्होंने इज़्राईल को हुक्म दिया: “जाओ, इस पागल आदमी की नज़रों के सामने प्रत्यक्ष हो। उसे आतंकित करो, उसकी गरदनमरोड़ो, और उसकी जान ले लो।”

जब मनमौजी डुमरुल अपने चालीस दोस्तों के साथ बैठकर शराब पी रहा था, इज़्राईल अचानक वहाँ आ धमका। न तो डुमरुल के नौकरों ने, न उसके पहरेदारों ने इज़्राईल को आते हुए देखा। मनमौजी डुमरुल अन्धा हो गया, उसके हाथ जकड़ गए। उसके लिए सारी दुनिया बेनूर हो गई।

वह बोलने लगा। तो सुनो, उसने क्या कहा:

“ओ इज़्राईल, क्या ही बलवान, कद्दावर बुज़ुर्ग हो, तुम! मेरे नौकरों ने तुम्हें आते नहीं देखा; मेरे पहरेदारों को तुम्हारी आहट नहीं हुई। मेरी आँखें, जो पहले देख सकती थीं, अब अंधी हो गई हैं; मेरे हाथ, जो पहले पकड़ सकते थे, अब जकड़ गए हैं। मेरी रूह काँप रही है, और मैं भयभीत हूँ। मेरे हाथ से सुनहरा प्याला छूट गया है। मेरा मुँह बर्फ-सा ठंडा है; मेरी हड्डियाँ धूल बन गई हैं। हे सफ़ेददाढ़ीवाले बूढ़ा आदमी , तुम कितने कठोर नज़रों वाले फरिश्ते हो! हे, विशालकाय बूढ़े! यहाँ से भाग जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें मार दूँगा।”

ये शब्द सुनकर इज़्राईल को गुस्सा आ गया। उसने डुमरुल से कहा: “अरे ओ, पागल आदमी! क्या तुझे मेरी कठोर नज़रें पसंद नहीं आ रही हैं? कितनी ही कमसिन युवतियों और नव-विवाहिताओं की मैंने जान ली हैं। तब फिर तुझे मेरी सफ़ेद दाढ़ी क्यों पसंद नहीं आ रही है? मैंने तो सफ़ेद दाढ़ीवाले और काली दाढ़ीवाले दोनों ही प्रकार के आदमियों की जानें ली हैं। इसीलिए तो मेरी ख़ुद की दाढ़ीसफ़ेद है!”

फिर इज़्राईल ने आगे यों कहा: “ऐ, पागल आदमी! अभी तुम डींग मार रहे थे कि मैं लाल-डैनोंवाले इज़्राईल को मार दूँगा। तुम मुझे पकड़कर इस ख़ूबसूरत जवान की जान बचाना चाहते थे। पर अब, ऐ मूर्ख, मैं ही तुम्हारी जान लेने आ गया हूँ। बताओ, तुम मुझे अपनी जान दोगे, या मुझसे लड़ोगे?”

मनमौजी डुमरुल ने कहा: “क्या तुम्हीं वह लाल-डैनोंवालेइज़्राईल हो?”

“हाँ, हूँ,” इज़्राईल ने जवाब दिया।

“क्या तुम्हीं वह फ़रिश्ता हो जो इन शानदार युवकों की जानें लेता है?” डुमरुल ने पूछा।

“बेशक,” इज़्राईल ने फ़रमाया।

मनमौजी डुमरुल ने कहा, “अरे ओ, संतरियो, सब दरवाज़े बंद कर दो।” फिर इज़्राईल की तरफ मुड़कर बोला: “ऐ अज़राइल, मैं तुम्हें खुले मैदान में घेरने की उम्मीद कर रहा था, पर तुम इस संकरे कमरे में मेरी पकड़ में आ गए! अब मैं तुम्हें मारकर उस खूबसूरत जवान को जिंदा कराऊँगा।”

उसने अपनी विशाल काली तलवार खींची, और उससे इज़्राईल पर वार करने की कोशिश की। पर इज़्राईल कबूतर बनकर खिड़की से बाहर उड़ गया। तब डुमरुल ने ज़ोर से तालियाँ बजाईं और अट्टहास करने लगा।

उसने कहा: “मेरे दोस्तो, देखो मैंने कैसे इज़्राईल को डरा दिया। वह खुले दरवाज़े के रास्ते नहीं बल्कि संकरे झरोखे से भाग खड़ा हुआ। अपने आपको मुझसे बचाने के लिए, वह कबूतर बनकर उड़ गया। लेकिन मैं उसे अपना बाज़ उड़ाकर पकड़ लूँगा।”

यह कहकर डुमरुल ने अपने बाज़ को हाथ में लिया और इज़्राईल का पीछा करने के लिए अपने घोड़े पर सवार हो गया। उसने अपना बाज़ छोड़कर कुछ कबूतर मारे। फिर अपने घर लौट चला। रास्ते में इज़्राईल उसके घोड़े की आँखों के सामने प्रकट हुआ। घोड़े ने भयभीत होकर मनमौजी डुमरुल को जमीन पर पटक दिया और भाग खड़ा हुआ। घोड़े से गिरने से बेचारे डुमरुल का सिर घूमने लगा और वह एकदम पस्त हो गया। इज़्राईल उसकी सफ़ेद छाती पर सवार हो गया। कुछ पल डुमरुल बुदबुदाता रहा पर जल्द ही उसके लिए साँस लेना भी मुश्किल हो गया। उसके गले से मौत की घुरघुराहट आने लगी।

वह किसी तरह बोला: “ओ इज़्राईल, मुझ पर रहम करो! ख़ुदा की वहदत पर मुझे कोई शक नहीं है। मुझे तुम्हारे बारे में नहीं मालूम था। मुझे नहीं मालूम था कि तुम चोरों की तरह लोगों की जानले लेते हो। मेरे पास विशाल चोटियों वाले पहाड़ हैं। इन पहाड़ों पर अंगूर के ख़ूबसूरत बागान खिले हुए हैं। इन बागान में काले अंगूरों के बेशुमार गुच्छे हैं, जिन्हें निचोड़ने पर लाल मदिरा प्राप्त होती है। इसे जो पीता है, वह नशे में धुत हो जाता है। मैंने यह मदिरा पी ली थी, इसीलिए मैं तुम्हारे आने की आहट सुन न सका। मुझे नहीं मालूम मैंने नशे में क्या-क्या बक दिया था। मैं मानता था कि मैं दूसरे सब लोगों से ताकतवर हूँ, पर अब जान गया हूँ कि यह सही नहीं है। मैं बस अपनी जवानी के कुछ और बरस जीना चाहता हूँ। ओ इज़्राईल, मेरी जान बख़्श दो।”

इज़्राईल ने कहा: “अरे पगले, मुझसे क्यों रहम की भीख माँग रहा है? मेरे बदले उस अज़ीम अल्लाह से माँग। मेरे हाथ में क्या रखा है? मैं तो बस एक नौकर हूँ।” मनमौजी डुमरुल ने कहा: “तब क्या अज़ीम अल्लाह ही जान बख्शते और लेते हैं?

“इसमें क्या शक है,” इज़्राईल ने कहा।

तब मनमौजी डुमरुल इज़्राईलसे बोला:

“तुम एक बुरे आदमी हो। मेरे कामकाज में दखल मत दो। मुझे सीधे अल्लाह से बात करने दो।” फिर मनमौजी डुमरुल ने अल्लाह से बात की। तो सुनो, उसने क्या कहा:

“तुम सर्वोच्च हो। ओ ख़ुदा ताला, कोई नहीं जानता तुम कितने ऊँचे हो। तुम हो अल्लाह महान। मूर्ख तुम्हें आसमान और धरती पर खोजते हैं, पर तुम रहते हो, भक्तों के दिलों में। अजर-अमर-अजय हो तुम, ओ कालजयी और रहम-दिल अल्लाह। यदि तुम मेरी जान लेना ही चाहते हो, तो ख़ुद आकर लो। इज़्राईल को मुझे मारने मत दो।”

इस बार मनमौजी डुमरुल की बातों से ख़ुदा ताला खुश हो गए। उन्होंने इज़्राईल से चिल्लाकर कहा कि चूँकि यह पागल मेरी वहदत पर विश्वास करता है, मैं इसे अशीष देता हूँ और इसकी जान बख़्शता हूँ, बशर्ते यह अपनी जगह मरने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को राज़ी कर सके।

इज़्राईल ने तब डुमरुल के पास आकर कहा: “ओ मनमौजी डुमरुल, अल्लाह ताला का हुक्म है कि तुम अपनी जगह मरने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को ले आओ। तभी मैं तुम्हें छोड़ सकता हूँ।”

मनमौजी डुमरुल ने कहा: “मैं कहाँ से अपनी जगह मरने के लिए किसी दूसरे को लाऊँ? इस दुनिया में मेरे बूढ़े माँ-बाप के सिवा और कोई नहीं है। पर मैं जाकर उनसे पूछता हूँ कि क्या उनमें से कोई मेरे लिए अपनी जान देगा। शायद उनमें से कोई एक कह दे: ‘तुम मेरी जान ले सकते हो और मुक्त हो सकते हो।’

मनमौजी डुमरुल अपने पिता के घर गया और उनके हाथ चूमकर उनसे बात की।

तो आओ सुनें, उसने अपने पिता से क्या कहा: “सफ़ेददाढ़ी वाले मेरे पिता, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और तुम्हारी इज़्ज़त करता हूँ। क्या तुम जानते हो, मेरे साथ क्या हुआ है? मैंने अल्लाह से बदतमीज़ी से बात की और उन्हें मुझ पर गुस्सा आ गया। उन्होंने लाल-डैनों वाले इज़्राईल को आसमान से उड़कर नीचे जाने को कहा। इज़्राईल मेरी सफ़ेद छाती पर उतरा और मेरे शरीर पर बैठ गया। उसने मेरा गला घोंटकर मुझसे लगभग मेरे आख़िरी शब्द निकलवाए और लगभग मेरी जान ले ली। ओ पिता, मैं तुमसे तुम्हारी जान की भीख माँगता हूँ। क्या तुम मेरे लिए मर सकते हो? या मेरे मरने के बाद यह कहते हुए मेरे लिए रोना पसंद करोगे, ‘अरे, मेरा बेटा, मेरा मनमौजी डुमरुल, मर गया!’

उसके पिता ने जवाब दिया: “मेरे बेटे, ओ मेरे बेटे! तुम मेरे कलेजे का टुकड़ा हो, ओ मेरे बेटे! तुम शेर की तरह बहादुर हो। एक बार मैंने तुम्हारे लिए नौ ऊँटों की क़ुर्बानी दी थी। तुम मेरे आलीशान मकान की नींव हो, जिसमें सोने की चिमनियाँ हैं। तुम मेरी हंसजैसी सुंदर बेटियों और बहुओं की तरह एक फूल हो। यदि चाहो तो तुम दूर स्थित काले पहाड़ को आदेश दे सकते हो कि वह इज़्राईल के लिए घास का मैदान बन जाए। यदि तुम चाहो, तो मेरे शीतल झरनों को उसके बगीचे के फ़व्वारे बना सकते हो। यदि तुम चाहो, तो उसे मेरा घर और सुंदर घोड़े भेंट कर सकते हो। यदि तुम चाहो, तो मेरे ऊँटों से उसका सामान ढुलवा सकते हो। यदि तुम चाहो, तो मेरे बाड़ों में खड़ी सफ़ेद भेड़ों को मेरे बावर्चीखाने में भूनकर उसे दावत दे सकते हो। यदि तुम चाहो, तो मेरा सोना-चाँदी उसे दे सकते हो। पर जीना मुझे बहुत प्यारा है और यह दुनिया बड़ी मीठी है। इसलिए मैं तुम्हारे लिए मर नहीं सकता, तुम्हें यह समझना होगा। तुम्हारी माँ भी तो है। वह तुमसे मुझसे भी ज़्यादा प्यार करती है, और तुम भी उसे मुझसे अधिक चाहते हो। तो मेरे बेटे, उसके पास जाओ।”

जब उसके पिता ने उसे ठुकरा दिया, मनमौजी डुमरुल अपनी माँ के पास गया, और उससे बोला: “जानती हो माँ, मेरे साथ क्या हुआ? लाल-डैनों वाला इज़्राईल आसमान से उड़कर आया और मुझ पर सवार हो गया। उसने मेरे सफ़ेद सीने को दबोच लिया। उसने मेरा गला दबाया और लगभग मेरी जान ही ले ली। जब मैंने पिता से मुझे उनकी ज़िंदगी देने को कहा तो उन्होंने नहीं दी। अब मैं तुमसे तुम्हारी ज़िंदगी माँगने आया हूँ, ओ माँ। क्या तुम मुझे अपनी ज़िंदगी दोगी? या फिर मेरे मर जाने के बाद अपने सफ़ेद चेहरे को अपने तीखे नाखूनों से खरोंचते हुए और अपने लंबे सफ़ेदबालों को नोचते हुए, ‘ओ मेरा बेटा, मेरा डुमरुल’ कहकर विलाप करना पसंद करोगी?”

इस पर उसकी माँ ने क्या कहा, आओ, इसे सुनें: “बेटे, ओ मेरे बेटे! मेरे प्यारे बेटे, जिसे मैंने नौ महीने अपनी कोख में पाला, और दसवें महीने जन्म दिया, जिसे मैंने कपड़े पहनाए और पालने में लिटाया, जिसे मैंने अपना भरपूर सफ़ेद दूध पिलाया। ओ मेरे बेटे, काश तुम सफ़ेद मीनारों वाले किले में, भयानक रीति-रिवाजों को मानने वाले काफ़िरों के कब्ज़े में होते, ताकि मैं तुम्हें अपनी ताक़त और पैसे से बचा पाती। पर तुम तो इस भयनाक मुसीबत में फँस गए हो। इसलिए मैं तुम्हारी ओर मदद का हाथ नहीं बढ़ा सकती, मेरे बेटे। यह समझ लो कि दुनिया बहुत मीठी है, और मनुष्य को अपनी जान बहुत प्यारी लगती है। इसलिए मैं अपनी ज़िंदगी नहीं दे सकती। तुम्हें यह समझना होगा।”

इस तरह उसकी माँ ने भी उसे अपनी ज़िंदगी देने से मना कर दिया। इसलिए इज़्राईल मनमौजी डुमरुल की जान लेने के लिए आ पहुँचा। उसे देखकर डुमरुल ने कहा: ‘ओ इज़्राईल जल्दी नहीं करो। इसमें कोई शक नहीं कि अल्लाह एक हैं।’

इज़्राईल बोला: “अरे, पगले, तुम मुझसे क्यों रहम की भीख माँग रहे हो? तुम अपने सफ़ेद दाढ़ी वाले पिता के पास गए, पर उसने तुम्हें अपनी ज़िंदगी देने से मना कर दिया। तुम अपनी सफ़ेद बालों वाली माँ के पास गए, और उसने भी तुम्हें अपनी ज़िंदगी नहीं दी। अब कौन रह गया है जो तुम्हें अपनी ज़िंदगी दे सकता है?”

“मैं एक व्यक्ति से बहुत प्यार करता हूँ”, डुमरुल ने कहा।

मुझे उसके पास जाने की इजाज़त दो,”

“कौन है यह व्यक्ति, ओ पगले इन्सान?”, इज़्राईल ने कहा।

“वह मेरी ब्याहता पत्नी है। वह एक अन्य कबीले के व्यक्ति की बेटी है। और उससे मेरे दो बच्चे भी हैं। मुझे उनसे कुछ बातें कहनी हैं। उनसे मिलने के बाद तुम मेरी जान ले सकते हो।”

तब वह अपनी पत्नी के पास गया और बोला: “क्या तुम्हें पता है मेरे साथ क्या हुआ है? लालडैनोंवाला इज़्राईल आसमान से उड़कर आया और मुझ पर चढ़ बैठा। उसने मेरे सफ़ेद सीने को दबोच लिया। उसने मेरी जान ही ले ली थी। जब मैंने अपने पिता से उनकी ज़िंदगी माँगी, तो उन्होंने मना कर दिया। तब मैं अपनी माँ के पास गया, पर उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी मुझे नहीं दी। उन दोनों ने कहा कि जिंदगी बहुत मीठी है और उन्हें बहुत प्यारी है। मेरे ऊँचे काले पहाड़ों को तुम अपनी चरागाह बना लो। मेरे शीतल जल के झरनों को अपना फ़व्वारा बना लो। मेरे अस्तबल के सुंदर घोड़ों को ले लो और उनकी सवारी करो। सोने की चिमनियों वाला मेरा सुंदर घर तुम्हें आश्रय दे। ऊँटों का मेरा कारवाँ तुम्हारा माल ढोए। मेरी सफ़ेद भेड़ें तुम्हारी दावतों का भोजन बनें। जाओ, तुम किसी दूसरे आदमी से शादी कर लो, जिसे भी तुम्हारी आँखें और दिल चाहें। ताकि हमारे दो बेटे यतीम न हो जाएँ।”

यह सुनकर उसकी पत्नी ने क्या कहा, आओ, इसे सुनें: “तुम क्या कह रहे हो? मेरे बलिष्ठ मेढ़, मेरे युवा राजा, जिस पर मुझे पहली नज़र में ही प्यार हो गया था, और जिसे मैंने अपना पूरा दिल दे दिया है? जिसे मैंने अपने मीठे होंठ चूमने के लिए दिए; जिसके साथ मैं एक ही तकिए पर सोई और जिसे मैंने प्यार किया। जब तुम्हीं न रहोगे, तब काले पहाड़ों का मैं क्या करूँगी? यदि मैं कभी अपनी भेड़ों को वहाँ ले जाऊँ, तो मेरी कब्र भी वहीं बने। यदि मैं तुम्हारे शीतल झरनों का पानी पिऊँ, तो मेरा खून फव्वारे की तरह बहे। यदि मैं तुम्हारे सोने के सिक्के खर्च करूँ, तो बस इसलिए कि उनसे मेरे कफन का कपड़ा ख़रीदा जाए। यदि मैं तुम्हारे सुंदर घोड़ों की सवारी करूँ तो वे मेरी लाश को ढोएँ। यदि मैं तुम्हारे बाद किसी से प्यार करूँ, किसी दूसरे युवक को, और उससे शादी करूँ, और उससे सहवास करूँ, तो वह साँप बनकर मुझे डस ले। जीवन में इतना क्या रखा है, कि तुम्हारे अभागे माता-पिता तुम्हें अपनी ज़िंदगी के बदले उनकी ज़िंदगी न दे सके? अब जन्नत, आठ मंजिलों वाली जन्नत, साक्षी रहे; यह धरती और आसमान साक्षी रहें, अल्लाह ताला साक्षी रहें, कि मैं अपनी ज़िंदगी तुम्हारी ज़िंदगी बचाने के लिए क़ुर्बान करती हूँ।”

यह कहकर वह डुमरुल के लिए मरने को तैयार हो गई, और इज़्राईल उस महिला की जान लेने के लिए आ गया। पर मनमौजी डुमरुल नहीं चाहता था कि उसकी पत्नी अपनी जान दे दे। उसने अल्लाह ताला से रहम की भीख माँगी।

आओ सुनें, उसने क्या कहा: “तुम सबसे ऊँचे हो; कोई नहीं जानता तुम कितने ऊँचे हो, ओ अल्लाह, अज़ीमख़ुदा! मूर्ख तुम्हें आसमान और धरती पर खोजते हैं, पर तुम रहते हो, तुम पर विश्वास करने वालों के दिलों में। सनातन और दयावान अल्लाह – यही तुम्हारी पहचान है! मुझे इस इलाके की मुख्य सड़कों के किनारे गरीबों के लिए मकान बनवाने दो। मुझे तुम्हारे नाम से भूखे इन्सानों को भोजन कराने दो। यदि तुम मेरी ज़िंदगी लेना ही चाहते हो तो हम दोनों की ज़िंदगी ले लो। यदि तुम मेरी ज़िंदगी बख़्शोगे तो हम दोनों की ज़िंदगी बख्श दो, ओ रहम-दिल अल्लाह!”

ख़ुदा मनमौजी डुमरुल के इन शब्दों से खुश हो गए। उन्होंने इज़्राईलको आदेश दिया: “मनमौजी डुमरुल के माता और पिता की ज़िंदगी ले लो। इस नेक दंपति को मैंने 140 सालों की उम्र दी है जो अब पूरी हो चली है। इज़्राईल ने तुरंत जाकर उन दोनों की जान ले ली, लेकिन मनमौजी डुमरुल अपनी पत्नी के साथ 140 साल और जिंदा रहा।

डेडे कोरकुट आया, और उसने कहानियाँ सुनाईं और वीरगाथाएँ गाईं। उसने कहा: “मेरे बाद वीर ओजस्वी गवैए आएँगे और मनमौजी डुमरुल की गाथा सबको सुनाएँगे, और ऊँची पेशानी वाले उदार दिल इन्सान उन्हें सुनेंगे। मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे काली चट्टानों वाले पहाड़ सदा ऊँचे खड़े रहें, कि तुम्हारे छायादार पेड़ कभी काटे न जाएँ, कि तुम्हारे बहते झरने कभी न सूखें। मैंने तुम्हारे सफ़ेद माथे के लिए प्रार्थना के पाँच शब्द कहे हैं। कि अल्लाह ताला कभी भी तुम्हें बुरे लोगों के क़ब्ज़े में न आने दें। मैं आशा करता हूँ कि अल्लाह यह प्रार्थना क़बूल करेंगे। मुझे यह भी उम्मीद है कि वे तुम्हारे गुनाहों को हज़रत मुहम्मद की ख़ातिर और अपनी अज़मत की ख़ातिर माफ़ कर देंगे।

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Turkey ki Lok Kathayen-3/ तुर्की लोक कथाएँ-3

तैमूर लंग की कीमत: तुर्किस्तान/टर्की की लोक-कथा

इतिहास में तैमूर लंग को एक बेहद क्रूर और निर्दयी व्यक्ति के रूप याद किया जाता था। कहते हैं वह दुनिया भर में अपनी सेना लेकर लूटपाट करता घूमता था। लोगों का क़त्ल करना उसके लिए मनोरंजन जैसा था। वह जहां जहां गया उसने अनगिनत लोगों को मारा और जी भर कर लूटा।

उस जमाने में लोग तैमूर लंग के नाम से कांपते थे लेकिन इसी तैमूर लंग के बारे में एक किस्सा ऐसा भी मशहूर है जब एक निडर कवि ने उसकी बोलती बंद कर दी थी। किस्सा कुछ यूं है –

एक बार उसके सैनिक तुर्किस्तान के एक मशहूर कवि अहमदी को पकड़ लाये। उस समय तैमूर लंग सरेआम कुछ गुलामों को मौत की सजा सुना रहा था। जब उसने कवि अहमदी को देखा तो बोला – “सुना है कवि लोग इंसानों के बड़े पारखी होते हैं। ज़रा बताओ तो इन गुलामों की कीमत क्या होगी ?”

अहमदी बहुत निडर और स्वाभिमानी कवि थे। बोले – “इनमें से कोई भी गुलाम पांच सौ अशर्फियों से कम का नहीं है।।”

तैमूर लंग, जिसकी नजर में गुलामों की कोई कीमत नहीं थी, यह सुनकर बोला – “अच्छा, इन तुच्छ गुलामों की इतनी अधिक कीमत है तो फिर मेरी कीमत क्या होगी ?”

अहमदी बोले – “आप यह न पूछें तो अच्छा है …”

तैमूर को क्रोध आ गया। बोला – “जो मैं पूछूँ तुम्हें बताना ही पड़ेगा … वरना तुम्हें भी मौत के घाट उतार दिया जाएगा…”

कवि अहमदी बोले – “और यदि में आपकी सही कीमत बता दूँ तो …?”

“तो तुम्हें ससम्मान जाने दिया जाएगा …” – तैमूर लंग बोला। दरअसल वह सोच रहा था कि अहमदी उसकी कीमत करोड़ों में आंकेंगा।

लेकिन कवि बोले – “तो सुनिए हुजूर, मेरी नजर में आपकी कीमत 25 अशर्फियों से ज्यादा नहीं है …”

यह सुनते ही तैमूर तिलमिला गया। बोला – “इन मामूली गुलामों की कीमत पांच सौ अशर्फियाँ और मेरी सिर्फ 25 अशर्फियाँ ! तुम्हें मालूम है इतनी कीमत की तो मेरी पगड़ी है !”

“मैंने उसी की कीमत बताई है …” – कवि अहमदी बोले, “क्योंकि जिसके दिल में दया, प्रेम और न्याय नहीं है उसके शरीर की भला क्या कीमत होगी ? दो कौड़ी भी नहीं !”

तैमूर लंग इस जवाब से तिलमिला कर रह गया लेकिन वह सबके सामने कवि को छोड़ देने का वादा कर चुका था इसलिए उसके पास अहमदी को जाने देने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

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New Zealand ki Lok Kathayen-1/ न्यूजीलैंड की लोक कथाएँ-1

माउई, आग लाने वाला: न्यूजीलैंड की लोक-कथा

पृथ्वी का कुछ भाग जल के भीतर तथा कुछ भाग ऊपर होता है। यह वीर माउई ही है जिसने न्यूज़ीलैंड द्वीप को जल से ऊपर निकाला, जहां यह आजकल स्थित है। यह माउई ही है जिसने मछली फंसाने के कांटे का आविष्कार किया। माउई ही ने मनुष्य जाति को आग पैदा करने का उपाय बताया और माउई ही ने दिन को बड़ा बनाया ताकि लोगों को अधिक समय मिले और वे अपना काम भली-भांति कर सकें।

माउई का जब जन्म हुआ तो वह बहुत ही छोटा और कुरूप था। उसकी मां ने उसे समुद्रतट पर किसी सुनसान स्थान पर छोड़ दिया। समुद्र के देवताओं ने उस पर कृपा की और उसका पालन-पोषण किया। उसके पूर्वज टामानुईकीटेरेंगी ने स्वर्ग में शिक्षा देकर उसे बुद्धिमान बना दिया। जब वह युवावस्था को प्राप्त हुआ तो वह अपने परिवार की खोज-खबर लेने के लिए पृथ्वी पर आया। उसने अपने भाइयों को खेलते देखा। माउई के विकृत अंगों को देखकर वे हँसने लगे। माउई ने अपना नाम बताकर कहा कि वह उनका सबसे छोटा भाई है। उन लोगों ने इस पर विश्वास न किया। उसकी मां ने भी यही कहा कि तुम मेरे पुत्र नहीं हो।

माउई ने कहा, “आपने मुझे समुद्रतट पर छोड़ दिया था ।” मां को सहसा पिछली बातें याद हो आयीं। वह बोली-“हां, बेटे! मैं भूल गई थी। तुम मेरे पुत्र हो।”

माउई अपने परिवार में रहने लगा। एक दिन जब उसके भाई नाव में मछली का शिकार करने जाने लगे तो उसने भी साथ जाने का हठ किया परंतु उन्होंने उसे अपने साथ ले जाने से मना कर दिया। परंतु माउई कहां मानने वाला था! वह छिपकर चुपचाप उनका पीछा करने लगा।

माउई के भाइयों के पास मछली पकड़ने का कांटा न था। स्वर्ग में अपने पूर्वजों से सभी विद्याओं में पारंगत होने के कारण, माउई ने अपने भाइयों को बताया कि मछली पकड़ने के लिए किस प्रकार कांटा लगाया जाता है। पर उसके भाइयों को माउई का साथ अच्छा न लगता और वे उसे अपने साथ कभी नाव में न ले जाते।

एक दिन माउई पहले से ही जाकर नाव में छिप गया और लकड़ी के तख्तों से उसने अपने को ढक लिया। जब उसके भाई समुद्र में कुछ दूर चले गए तो उनमें से एक ने कहा, “माउई को अपने साथ नहीं लाए, बहुत ही अच्छा किया ।” यह सुनकर माउई तख्तों के नीचे से बोला-“मैं तो यहां हूं।” और वह तख्तों को हटाकर बाहर निकल आया। जब उसके भाइयों ने देखा कि वे समुद्र में काफी दूर आ गए हैं और उसे लौटाना कठिन है, तो उन्होंने कहा-“हम लोग तुम्हें मछली पकड़ने के लिए कांटा न देंगे।”

यह सुनकर माउई चुप रहा। उसने अपनी पेटी के नीचे से जादू का कांटा निकाला जो उसके किसी पूर्वज के दांत का बना था। उसके भाइयों ने उसमें लगाने के लिए चारा भी देने से मना कर दिया। यह देखकर माउई ने अपनी नाक पर घूंसा मारा और खून निकाला। उस खून से अपने कांटे को तर करके उसने पानी में फेंक दिया। उसके भाइयों को क्योंकि कोई मछली न मिली थी, उन्हें विश्वास था कि माउई को भी कोई मछली न मिलेगी।

माउई का कांटा समुद्र में नीचे डूबता गया और समुद्र-तल में जाकर रुका। भाइयों ने कहा, “यहां मछलियां नहीं हैं। आओ, हम लोग कहीं और चलें ।” माउई केवल हँसता रहा और प्रतीक्षा करता रहा। थोड़ी देर बाद उसकी रस्सी में खिंचाव जान पड़ा। वह उसे मजबूती से पकड़े रहा। उसके भाइयों ने भी इसमें उसकी सहायता की। धीरे-धीरे कोई जीव ऊपर आता हुआ दिखाई पड़ा। जब वह जीव पानी के ऊपर आया तो माउई के भाई डर से चिल्लाने लगे क्योंकि जहां तक उनकी दृष्टि जाती थी उससे भी आगे तक वह जीव पानी पर तैर रहा था। यह बड़ा जीव “’टीकाएमाउई’ नामक मछली अर्थात्‌ न्यूजीलैंड का द्वीप था। उस जीव की पीठ पर, मांस काटने के लिए माउई के भाई कूद पड़े परंतु वे असफल रहे। जहां-जहां उन लोगों ने चाकू से काटने का प्रयत्न किया वहां-वहां बड़े-बड़े खड्ड बन गए। जहां-जहां उन लोगों ने मछली को पीटा था, वहां-वहां उसकी खाल सिकुड़ गई और वे स्थान पर्वत बन गए। इस प्रकार न्यूज़ीलैंड द्वीप समुद्र से निकला जो अब माउरी लोगों का निवासस्थान है।

कुछ समय बीत जाने के पश्चात्‌, माउई ने अनुभव किया कि दिन बहुत छोटे होते हैं। दिन छोटे होने से, लोगों को भोजन आदि एकत्रित करने के लिए समय नहीं मिलता था। माउई ने निश्चय किया कि वह सूर्य को धीरे-धीरे चलने के लिए बाध्य करेगा ताकि दिन बड़े हों।

उसने अपने भाइयों से कहा, “आओ, हम लोग सूर्य को बांधकर उससे धीरे-धीरे चलने के लिए कहें ताकि लोगों को काम करने के लिए अधिक समय मिल सके ।”

भाइयों ने कहा, “सूर्य के निकट जानेवाला भस्म हो जाता है।”

माउई ने कहा-“तुम लोगों ने देखा है कि मैंने इस द्वीप को जल से बाहर निकाला है। मैं इससे भी आश्चर्यजनक काम कर सकता हूं।”

माउई की बातों को सुनकर उसके भाई सहमत हो गए। माउई ने अपनी बहन हीना के सिर से बाल लिए और हरा सन (पटुआ) भी लिया। अपने भाइयों की सहायता से उसने रस्सी बंटी और जादू के प्रभाव से रस्सी को बहुत ही मजबूत बना लिया। उस रस्सी से उन लोगों ने एक जाल तैयार किया। जाल बन जाने के उपरांत, माउई अपने भाइयों के साथ उस दिशा की ओर चल दिया जहां से सूर्य निकलता था। कई महीने लगातार चलने के बाद, वे संसार के किनारे पहुंचे और रात्रि के समय उन्होंने अपने जाल को उस सूराख पर रख दिया जहां से सूर्य निकला करते थे।

प्रातःकाल होने पर जब सूर्य निकला तो वह जाल में फंस गया और बहुत प्रयत्न करने पर भी वे जाल में से निकल न सके। माउई ने जाल को मजबूती से पकड़ रखा था। उसने एक रस्सा सूर्य की ओर फेंककर उसे लपेट लिया। सूर्य ने रस्से को तोड़ने का बहुत प्रयत्त किया परंतु वह टूट न सका।

माउई ने अपनी जादू की गदा उठायी और सूर्य पर प्रहार करने लगा। सूर्य अपनी किरणों से भीषण गर्मी फैलाने लगा। माउई के भाई तो डरकर भाग खड़े हुए, परंतु माउई सूर्य से लड़ता रहा।

अंत में सूर्य ने कहा, “अरे! तुम मुझे नहीं जानते । मुझसे व्यर्थ लड़ रहे हो ।”

माउई ने कहा, “तुम उदय होकर, आकाश में बड़ी शीघ्रता से एक किनारे से दूसरे किनारे पहुंच जाते हो। इसलिए दिन छोटा होता है और लोगों को अन्न इकट्ठा करने के लिए समय नहीं मिलता ।”

पर सूर्य ने माउई की बातों पर ध्यान न दिया। दोनों में लड़ाई होती रही। अंत में माउई ने क्रोधित होकर ज़ोर से प्रहार किया जिससे सूर्य घायल हो गया। घायल हो जाने पर सूर्य ने कहा, “मैं वचन देता हूं, अब मैं आकाश में धीरे-धीरे चलूंगा ।” यह सुनकर माउई बहुत प्रसन्नन हुआ और उसने सूर्य को जाल से मुक्त कर दिया। सूर्य ने अपना वचन पूरा किया। उसी दिन से वह धीरे-धीरे चलने लगा और अब लोगों को दिन बड़ा हो जाने के कारण काफी समय मिलता है।

तब लोगों को आग पैदा करना नहीं आता था। अतः माउई ने यह निश्चय किया कि वह धरती के भीतर जाकर आग का पता लगायेगा। पृथ्वी में एक सूराख करके वह भीतर घुसा और अग्नि की माता माफुइक से मिला। उसने उससे एक चिनगारी मांगी। अग्नि की मां ने अपनी अंगुलियों के जलते नख में से एक नख उसे दे दिया। माउई उसे लेकर जब कुछ दूर चला गया तो उसने सोचा, यह तो आग है। आग उत्पन्न करने की विधि तो बताई ही नहीं। यह सोचते ही उसने आग को नदी में डाल दिया। वह लौटकर फिर अग्नि की मां के पास गया और चिनगारी ली। इस प्रकार वह नौ बार आग लाया और नदी में फेंकता गया। दसवीं बार जब वह गया तो आग की मां बहुत ही क्रोधित हुईं । गुस्से में भर उसने अपनी अंगुली का दसवां नख उस पर फेंका। जंगल के वृक्ष, घास आदि जलने लगे। जब आग बहुत ही भयंकर हो गई तो माउई ने वर्षा से प्रार्थना की । शीघ्र ही वर्षा होने लगी जिससे आग बुझ गई। अग्नि को बुझते देखकर उसकी मां ने कुछ चिनगारियों को वृक्षों में छिपा दिया। तभी से वृक्षों में आग छिपी हुई है और अब मनुष्य जान गया है कि किस प्रकार दो लकड़ियों को आपस में रगड़ने से आग उत्पन्न हो जाती है।

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Norway ki Lok Kathayen-1/ नॉर्वे की लोक कथाएँ-1

केटी वुडिनक्लोक: नॉर्वे की लोक-कथा

एक बार नौर्वे देश में एक राजा था जिसकी रानी मर गयी थी। उसकी इस रानी से एक बेटी थी। उसकी यह बेटी इतनी चतुर और प्यारी थी कि उसके जैसा चतुर और प्यारा दुनिया में और कोई नहीं था।

राजा अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था। वह उसके मरने का काफी दिन तक उसका गम मनाता रहा पर फिर अकेले रहते रहते थक गया और उसने दूसरी शादी कर ली।

उसकी यह नयी रानी एक विधवा थी और इसके भी एक बेटी थी पर इसकी यह बेटी उतनी ही बुरी और बदसूरत थी जितनी राजा की बेटी प्यारी, दयावान और चतुर थी।

सौतेली माँ और उसकी बेटी दोनों राजा की बेटी से बहुत जलती थीं क्योंकि वह बहुत ही प्यारी थी। जब तक राजा घर में रहता था वे दोनों राजा की बेटी को कुछ भी नहीं कह सकती थीं क्योंकि राजा उसको बहुत प्यार करता था।

कुछ समय बाद उस राजा को किसी दूसरे राजा के साथ लड़ाई के लिये जाना पड़ा तो राजकुमारी की सौतेली माँ ने सोचा कि यह मौका अच्छा है अब वह उस लड़की के साथ जैसा चाहे वैसा बरताव कर सकती है।

सो उन दोनों माँ बेटी ने उस लड़की को भूखा रखना और पीटना शुरू कर दिया। वे दोनों जहाँ भी वह जाती सारे घर में उसके पीछे पड़ी रहतीं।

आखिर उसकी सौतेली माँ ने सोचा कि यह सब तो उसके लिये कुछ जरा ज़्यादा ही अच्छा है सो उसने उसे जानवर चराने के लिये भेजना शुरू दिया।

अब वह बेचारी जानवर चराने के लिये जंगल और घास के मैदानों में चली जाती। जहाँ तक खाने का सवाल था कभी उसको कुछ थोड़ा सा खाना मिल जाता और कभी बिल्कुल नहीं। इससे वह बहुत ही दुबली होती चली गयी और हमेशा दुखी रहती और रोती रहती।

उसके जानवरों में कत्थई रंग का एक बैल था जो हमेशा अपने आपको बहुत साफ और सुन्दर रखता था। वह अक्सर ही राजकुमारी के पास आ जाता था और जब राजकुमारी उसको थपथपाती तो वह उसको थपथपाने देता।

एक दिन वह दुखी बैठी हुई थी और सुबक रही थी कि वह बैल उसके पास आया और सीधे सीधे उससे पूछा कि वह इतनी दुखी क्यों थी। लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया और बस रोती ही रही।

बैल एक लम्बी सी साँस ले कर बोला — “आह, हालाँकि तुम मुझे बताओगी नहीं पर मैं सब जानता हूँ। तुम इसी लिये रोती रहती हो न क्योंकि रानी तुमको ठीक से नहीं रखती। वह तुमको भूखा मारना चाहती है।

पर देखो खाने के लिये तुमको कोई चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि मेरे बाँये कान में एक कपड़ा है। जब तुमको खाना खाने की इच्छा हो तो उस कपड़े को मेरे कान में से निकाल लो और घास पर फैला दो। बस तुमको जो खाना चाहिये वही मिल जायेगा। ”

राजकुमारी को उस समय बहुत भूख लगी थी सो उसने उस बैल के बाँये कान में रखा कपड़ा निकाल लिया और उसे घास पर बिछा दिया। उसको उस कपड़े से खाने के लिये फिर बहुत सारी चीज़ें मिल गयीं। उस खाने में शराब भी थी, माँस भी था और केक भी थी।

अब जब भी उसको भूख लगती तो वह बैल के कान में से कपड़ा निकालती उसको घास पर बिछाती और जो उसको खाने की इच्छा होती वह खाती। कुछ ही दिनों में उसके शरीर का माँस और रंगत दोनों वापस आने लगीं।

जल्दी ही वह थोड़ी मोटी और गोरी गुलाबी हो गयी यह देख कर उसकी सौतेली माँ और उसकी बेटी गुस्से से लाल पीली होने लगीं। उस सौतेली माँ की समझ में यही नहीं आया कि उसकी वह सौतेली बेटी जो इतनी बुरी हालत में थी अब ऐसी तन्दुरुस्त कैसे हो गयी।

उसने अपनी एक नौकरानी को बुलाया और उसको राजकुमारी के पीछे पीछे जंगल जाने के लिये कहा और कहा कि वह जा कर वहाँ देखे कि वहाँ सब ठीक चल रहा है या नहीं क्योंकि उसका खयाल था कि घर का कोई नौकर राजकुमारी को खाना दे रहा होगा।

वह नौकरानी राजकुमारी के पीछे पीछे जंगल तक गयी। वहाँ जा कर उसने देखा कि किस तरह से उस सौतेली बेटी ने बैल के कान में से एक कपड़ा निकाला, उसे घास पर बिछाया और फिर किस तरह से उस कपड़े ने उस राजकुमारी को खाना दिया। सौतेली बेटी ने उसे खाया और वह खाना खा कर वह बहुत खुश हुई।

जो कुछ भी उस नौकरानी ने जंगल में देखा वह सब उसने जा कर रानी को बताया।

उधर राजा भी लड़ाई से वापस आ गया था। क्योंकि वह दूसरे राजा को जीत कर आया था इसलिये सारे राज्य में खूब खुशियाँ मनायी जा रही थीं। पर सबसे ज़्यादा खुश थी राजा की अपनी बेटी।

राजा के आते ही रानी ने बीमार पड़ने का बहाना किया और बिस्तर पर जा कर लेट गयी। उसने डाक्टर को यह कहने के लिये बहुत पैसे दिये कि “रानी तब तक ठीक नहीं हो सकती जब तक उसको कत्थई रंग के बैल का माँस खाने को न मिल जाये। ”

राजा और महल के नौकर आदि सबने डाक्टर से पूछा कि रानी की बीमारी की क्या कोई और दवा नहीं थी पर डाक्टर ने कहा “नहीं।” सबने उस कत्थई रंग के बैल की ज़िन्दगी के लिये प्रार्थना की क्योंकि वह बैल सभी को बहुत प्यारा था।

लोगों ने कोई दूसरा कत्थई बैल ढूँढने की कोशिश भी की पर सबने यह भी कहा कि उस बैल के जैसा और कोई बैल नहीं था। उसी बैल को मारा जाना चाहिये और किसी बैल के माँस के बिना रानी ठीक नहीं हो सकती।

जब राजकुमारी ने यह सुना तो वह बहुत दुखी हुई और जानवरों के बाड़े में बैल के पास गयी। वहाँ भी वह बैल अपना सिर लटकाये हुए नीची नजर किये इस तरह दुखी खड़ा था कि राजकुमारी उसके ऊपर अपना सिर रख कर रोने लगी।

बैल ने पूछा — “तुम क्यों रो रही हो राजकुमारी?”

तब राजकुमारी ने उसे बताया कि राजा लड़ाई पर से वापस आ गया था और रानी बहाना बना कर बीमार पड़ गयी है। उसने डाक्टर को यह कहने पर मजबूर कर दिया है कि रानी तब तक ठीक नहीं हो सकती जब तक उसको कत्थई रंग के बैल का माँस खाने को नहीं मिलता। और अब उसको मारा जायेगा।

बैल बोला — “अगर वे लोग पहले मुझे मारेंगे तो जल्दी ही वे तुमको भी मार देंगे। तो अगर तुम मेरी बात मानो तो हम दोनों यहाँ से आज रात को ही भाग चलते हैं। ”

राजकुमारी को यह अच्छा नहीं लगा कि वह अपने पिता को यहाँ अकेली छोड़ कर चली जाये पर रानी के साथ उसी घर में रहना तो उससे भी ज़्यादा खराब था। इसलिये उसने बैल से वायदा किया कि वह वहाँ से भाग जाने के लिये रात को उसके पास आयेगी।

रात को जब सब सोने चले गये तो राजकुमारी जानवरों के बाड़े में आयी। बैल ने उसको अपनी पीठ पर बिठाया और वहाँ से उसको ले कर बहुत तेज़ी से भाग चला।

अगले दिन सुबह सवेरे जब लोग उस बैल को मारने के लिये उठे तो उन्होंने देखा कि बैल तो जा चुका है। जब राजा उठा और उसने अपनी बेटी को बुलाया तो वह भी उसको कहीं नहीं मिली। वह भी जा चुकी थी।

राजा ने चारों तरफ अपने आदमी उन दोनों को ढूँढने के लिये भेजे। उनको उसने चर्च में भी भेजा पर दोनों का कहीं पता नहीं था। किसी ने भी उनको कहीं भी नहीं देखा था।

इस बीच वह बैल राजकुमारी को अपनी पीठ पर बिठाये बहुत सी जगहें पार कर एक ऐसे जंगल में आ पहुँचा था जहाँ हर चीज़ ताँबे की थी – पेड़, शाखाएँ, पत्ते, फूल, हर चीज़।

पर इससे पहले कि वे इस जंगल में घुसते बैल ने राजकुमारी से कहा — “जब हम इस जंगल में घुस जायेंगे तो ध्यान रखना कि तुम इस जंगल की एक पत्ती भी नहीं तोड़ना। नहीं तो यह सब मेरे और तुम्हारे ऊपर भी आ जायेगा।

क्योंकि यहाँ एक ट्रौल रहता है जिसके तीन सिर हैं और वही इस जंगल का मालिक भी है। ”

“नहीं नहीं। भगवान मेरी रक्षा करे। ” उसने कहा कि वह वहाँ से कुछ भी नहीं तोड़ेगी।

वे दोनों उस जँगल में घुसे। राजकुमारी किसी भी चीज़ को छूने तक के लिये बहुत सावधान थी। वह जान गयी थी कि किसी भी शाख को छूने से कैसे बचना था। पर वह बहुत घना जंगल था और उसमें से हो कर जाना बहुत मुश्किल था।

बचते बचते भी उससे उस जंगल के एक पेड़ की एक पत्ती टूट ही गयी और वह उसने अपने हाथ में पकड़ ली।

बैल बोला — “अरे यह तुमने क्या किया। अब तो ज़िन्दगी और मौत के लिये लड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं है। पर ध्यान रखना वह पत्ती तुम्हारे हाथ में सुरक्षित रहे उसे फेंकना नहीं। ”

जल्दी ही वे जंगल के आखीर तक पहुँच गये और जैसे ही वे वहाँ पहुँचे कि एक तीन सिर वाला ट्रौल वहाँ आ गया।

उसने पूछा — “किसने मेरा जंगल छुआ?”

बैल बोला — “यह जंगल तो जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है। ”

ट्रौल चीखा — “वह तो हम लड़ाई से तय करेंगे। ”

बैल बोला — “जैसा तुम चाहो। ”

सो दोनों एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़े और एक दूसरे से गुँथ गये। ट्रौल बैल को खूब मार रहा था पर बैल भी अपनी पूरी ताकत से ट्रौल को मार रहा था।

यह लड़ाई सारा दिन चली। आखीर में बैल जीत गया। पर उसके शरीर पर बहुत सारे घाव थे और वह इतना थक गया था कि उससे तो उसकी एक टाँग भी नहीं उठ पा रही थी सो उन दोनों को वहाँ एक दिन के लिये आराम करने के लिये रुकना पड़ा।

बैल ने राजकुमारी से कहा कि वह ट्रौल की कमर की पेटी से लटका हुआ मरहम का एक सींग ले ले और वह मरहम उसके शरीर पर मल दे। राजकुमारी ने ऐसा ही किया तब कहीं जा कर बैल कुछ ठीक हुआ। तीसरे दिन वे फिर अपनी यात्रा पर चल दिये।

वे फिर कई दिनों तक चलते रहे। कई दिनों की यात्रा के बाद वे एक चाँदी के जंगल में आये। यहाँ हर चीज़ चाँदी की थी – पेड़, शाखाएँ, पत्ते, फूल, हर चीज़।

पर इससे पहले कि वे इस जंगल में घुसते पहले की तरह से बैल ने इस बार भी राजकुमारी से कहा — “जब हम इस जंगल में घुस जायेंगे तो ध्यान रखना कि तुम इस जंगल की एक पत्ती भी नहीं नहीं तोड़ोगी नहीं तो यह सब मेरे और तुम्हारे ऊपर भी आ जायेगा।

क्योंकि यहाँ एक छह सिर वाला ट्रौल रहता है जो इस जंगल का मालिक है और मुझे नहीं लगता कि मैं उसको किसी भी तरह जीत पाऊँगा। ”

राजकुमारी बोली — “नहीं नहीं। मैं ख्याल रखूँगी कि मैं यहाँ से कुछ न तोड़ूँ और तुम भी मेरे लिये यह दुआ करते रहना कि यहाँ से मुझसे कुछ टूट न जाये। ”

पर जब वे उस जंगल में घुसे तो वह इतना ज़्यादा घना था कि वे दोनों उसमें से बड़ी मुश्किल से जा पा रहे थे। राजकुमारी बहुत सावधान थी कि वह वहाँ की कोई भी चीज़ छूने से पहले ही दूसरी तरफ को झुक जाती थी पर हर मिनट पर शाखें उसकी आँखों के सामने आ जातीं।

बचते बचते भी ऐसा हुआ कि उससे एक पेड़ की एक पत्ती टूट ही गयी।

बैल फिर चिल्लाया — “उफ। यह तुमने क्या किया राजकुमारी? अब हम अपनी ज़िन्दगी और मौत के लिये लड़ने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते। पर ध्यान रहे इस पत्ती को भी खोना नहीं। सँभाल कर रखना। ”

जैसे ही वह यह कह कर चुका कि वह छह सिर वाला ट्रौल वहाँ आ गया और उसने पूछा — “वह कौन है जिसने मेरा यह जंगल छुआ?”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “यह जंगल जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है। ”

ट्रौल बोला — “यह तो हम लड़ कर देखेंगे। ”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “जैसे तुम्हारी मरजी। ”

कह कर वे दोनों एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़े। बैल ने ट्रौल की आँखें निकाल लीं और उसकेे सींग उसके शरीर में घुसा दिये। इससे उसके शरीर में से उसकी आँतें निकल कर बाहर आ गयीं।

पर वह ट्रौल क्योंकि उस बैल के मुकाबले का था सो बैल को उस ट्रौल को मारने में तीन दिन लग गये सो वे तीन दिन तक लड़ते ही रहे।

पर इस ट्रौल को मारने के बाद बैल भी इतना कमजोर हो गया और थक गया कि वह हिल भी नहीं सका। उसके घाव भी ऐसे थे कि उनसे खून की धार बह रही थी।

इस ट्रौल की कमर की पेटी से भी एक मरहम वाला सींग लटक रहा था सो बैल ने राजकुमारी से कहा कि वह उस ट्रौल की कमर से वह सींग निकाल ले और उसका मरहम उसके घावों पर लगा दे।

राजकुमारी ने वैसा ही किया तब जा कर वह कुछ ठीक हुआ। इस बार बैल को ठीक होने में एक हफ्ता लग गया तभी वे आगे बढ़ सके।

आखिर वे आगे चले पर बैल अभी भी बिल्कुल ठीक नहीं था सो वह बहुत धीरे चल रहा था।

राजकुमारी को लगा कि बैल को चलने में समय ज़्यादा लग रहा था सो समय बचाने के लिये उसने बैल से कहा कि क्योंकि वह छोटी थी और उसके अन्दर ज़्यादा ताकत थी वह जल्दी चल सकती थी वह उसको पैदल चलने की इजाज़त दे दे पर बैल ने उसको इस बात की इजाज़त नहीं दी। उसने कहा कि उसको अभी उसकी पीठ पर बैठ कर ही चलना चाहिये।

इस तरह से वे काफी दिनों तक चलते हुए बहुत जगह होते हुए फिर एक जंगल में आ पहुँचे। यह जंगल सारा सोने का था। उस जंगल के हर पेड़, शाख, डंडी, फूल, पत्ते सभी कुछ सोने के थे। इस जंगल में भी वही हुआ जो ताँबे और चाँदी के जंगलों में हुआ था।

बैल ने राजकुमारी से कहा कि वह उस जंगल में से भी कुछ न तोड़े क्योंकि इस जंगल का राजा एक नौ सिर वाला ट्रौल था और यह ट्रौल पिछले दोनों ट्रौल को मिला कर उनसे भी ज़्यादा बड़ा और ताकतवर था। बैल तो इसको जीत ही नहीं सकता था।

बैल जानता था कि राजकुमारी इस बात का पूरा ध्यान रखेगी कि वह उस जंगल की कोई चीज़ न तोड़े पर फिर भी वही हुआ। जब वे जंगल में घुसे तो यह जंगल ताँबे और चाँदी के जंगलों से भी कहीं ज़्यादा घना था।

इसके अलावा वे लोग जितना उस जंगल के अन्दर चलते जाते थे वह जंगल और ज़्यादा घना होता जाता था। आखिर वह इतना ज़्यादा घना हो गया कि राजकुमारी को लगा कि अब वह उस जंगल में से बिना किसी चीज़ को छुए निकल ही नहीं सकती।

उसको पल पल पर यही लग रहा था कि किसी भी समय पर उससे वहाँ कोई भी चीज़ टूट जायेगी।

इस डर से वह कभी बैठ जाती, कभी अपने आपको किसी तरफ झुका लेती, कभी मुड़ जाती पर फिर भी उन पेड़ों की शाखाएँ हर पल उसकी आँखों के सामने आ रही थीं।

इसका नतीजा यह हुआ कि उसको पता ही नहीं चला कि वह उन सोने की शाखाओं, फूलों, पत्तों से बचने के लिये कर क्या रही है। और इससे पहले कि उसको यह पता चलता कि क्या हुआ उसके हाथ में एक सोने का सेब आ गया।

उसको देख कर तो उसको इस बात का इतना ज़्यादा दुख हुआ कि वह बहुत ज़ोर से रो पड़ी और उसको फेंकना चाहती थी कि बैल बीच में ही बोल पड़ा — “अरे इसको फेंकना नहीं। इसे सँभाल कर रख लो और इसका ध्यान रखना। ” पर राजकुमारी का तो रोना ही नहीं रुक रहा था।

बैल ने उसको जितनी भी तसल्ली वह दे सकता था दी पर उसको लग रहा था कि अबकी बार उस बैल को केवल उसकी वजह से बहुत भारी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा और उसको यह भी शक था कि यह सब कैसे होगा क्योंकि इस जंगल का मालिक ट्रौल बहुत बड़ा और ताकतवर था।

तभी उस जंगल का मालिक वह नौ सिर वाला ट्रौल वहाँ आ गया। वह इतना बदसूरत था कि राजकुमारी तो उसकी तरफ देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकी।

वहाँ आ कर वह गरजा — “यह किसने मेरा जंगल छुआ?”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “यह जंगल जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है। ”

ट्रौल बोला — “यह तो हम लड़ कर देखेंगे। ”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “जैसे तुम्हारी मरजी। ”

कह कर वे दोनों एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़े। बहुत ही भयानक दृश्य था। राजकुमारी तो उसको देख कर ही बेहोश होते होते बची।

इस बार भी बैल ने ट्रौल की आँखें निकाल लीं और उसके सींग उसके पेट में घुसा दिये जिससे उसकी आँतें उसके पेट से बाहर निकल आयीं। फिर भी ट्रौल बहुत बहादुरी से लड़ता रहा।

जब बैल ने ट्रौल का एक सिर मार दिया तो उसके दूसरे सिरों से उस मरे हुए सिर को ज़िन्दगी मिलने लगी। इस तरह वह लड़ाई एक हफ्ता चली क्योंकि जब भी बैल उस ट्रौल के एक सिर को मारता तो उसके दूसरे सिर उसके मरे हुए सिर को जिला देते थे।

उसके सारे सिरों को मारने में उस बैल को पूरा एक हफ्ता लग गया तभी वह उस ट्रौल को मार सका।

अबकी बार तो बैल इतना घायल हो गया था और इतना थक गया था कि वह अपना पैर भी नहीं हिला सका। वह तो राजकुमारी से इतना भी नहीं कह सका कि वह ट्रौल की कमर की पेटी में लगे मरहम के सींग में से मरहम निकाल कर उसके घावों पर लगा दे।

पर राजकुमारी को तो यह मालूम था सो उसने ट्रौल की कमर की पेटी से मरहम का सींग निकाला और उसमें से मरहम निकाल कर बैल के घावों पर लगा दिया। इससे बैल के घावों को काफी आराम मिला और वह धीरे धीरे ठीक होने लगा।

इस बार बैल को आगे जाने के लिये तीन हफ्ते तक आराम करना पड़ा। इतने आराम के बाद भी बैल घोंघे की चाल से ही चल पा रहा था।

बैल ने राजकुमारी को बताया कि इस बार उनको काफी दूर जाना है। उन्होंने कई ऊँची ऊँची पहाड़ियाँ पार कीं, कई घने जंगल पार किये और फिर एक मैदान में आ निकले।

बैल ने राजकुमारी से पूछा — “क्या तुमको यहाँ कुछ दिखायी दे रहा है?”

राजकुमारी ने जवाब दिया — “नहीं, मुझे तो यहाँ कुछ दिखायी नहीं दे रहा सिवाय आसमान के और जंगली मैदान के। ”

वे कुछ और आगे बढ़े तो वह मैदान कुछ और एकसार हो गया और वे कुछ और आगे का देख पाने के लायक हो गये।

बैल ने फिर पूछा — “क्या तुमको अब कुछ दिखायी दे रहा है?”

राजकुमारी बोली — “हाँ अब मुझे दूर एक छोटा सा किला दिखायी दे रहा है। ”

बैल बोला — “अब वह छोटा किला इतना छोटा भी नहीं है राजकुमारी जी। ”

काफी देर तक चलने के बाद वे एक पत्थरों के ढेर के पास आये जहाँ लोहे का एक खम्भा सड़क के आर पार पड़ा हुआ था।

बैल ने फिर पूछा — “क्या तुमको अब कुछ दिखायी दे रहा है?”

राजकुमारी बोली — “हाँ अब मुझे किला साफ साफ दिखायी दे रहा है और अब वह बहुत बड़ा भी है। ”

बैल बोला — “तुमको वहाँ जाना है और तुमको वहीं रहना है। किले के ठीक नीचे एक जगह है जहाँ सूअर रहते हैं तुम वहाँ चली जाना।

वहाँ पहुँचने पर तुमको लकड़ी का एक क्लोक मिलेगा जो लकड़ी के पतले तख्तों से बना हुआ होगा। तुम उसको पहन लेना।

उस क्लोक को पहन कर तुम उस किले में जाना और अपना नाम केटी वुडिनक्लोक बताना और उनसे अपने रहने के लिये जगह माँगना।

पर इससे पहले कि तुम वहाँ जाओ तुम अपना छोटा वाला चाकू लो और मेरा गला काट दो। फिर मेरी खाल निकाल कर लपेट कर पास की एक चट्टान के नीचे छिपा दो।

उस खाल के नीचे वह ताँबे और चाँदी की दोनों पत्तियाँ और सोने का सेब रख देना। और फिर उस चट्टान के सहारे एक डंडी खड़ी कर देना।

उसके बाद जब भी तुम कोई चीज़ चाहो तो उस चट्टान की दीवार पर वह डंडी मार देना। तुमको वह चीज़ मिल जायेगी। ”

पहले तो राजकुमारी ऐसा कुछ भी करने को तैयार नहीं हुई पर जब बैल ने उससे कहा कि उसने जो कुछ भी राजकुमारी के लिये किया उस सबको करने के लिये धन्यवाद देने का यही एक तरीका था तो राजकुमारी के पास यह करने के अलावा और कोई चारा न रहा।

उसने अपना छोटा वाला चाकू निकाला और उससे उस बैल का गला काट दिया। फिर उसने बैल की खाल निकाल कर लपेट कर पास में पड़ी एक चट्टान के नीचे रख दी।

खाल के नीचे उसने वे ताँबे और चाँदी की दोनों पत्तियाँ और सोने का सेब रख दिया। और उसके बाद में उसने उस चट्टान के सहारे एक डंडी खड़ी कर दी।

वहाँ से वह किले के नीचे सूअरों के रहने की जगह गयी जहाँ उसको वह लकड़ी के पतले तख्तों से बना हुआ क्लोक मिल गया। उसने उस क्लोक को पहना और ऊपर किले में आयी। यह सब करते हुए वह बैल को याद कर करके रोती और सुबकती रही।

फिर वह सीधी शाही रसोईघर में गयी और वहाँ जा कर उसने अपना नाम केटी वुडिनक्लोक बताया और रहने के लिये जगह माँगी।

रसोइया बोला कि हाँ उसको वहाँ रहने की जगह मिल सकती थी। रसोईघर के पीछे वाले छोटे कमरे में वह रह सकती थी और उसके बरतन धो सकती थी क्योंकि उसकी बरतन धोने वाली अभी अभी काम छोड़ कर चली गयी थी।

रसोइया बोला — “पर जैसे ही तुम यहाँ रहते रहते थक जाओगी तो तुम यहाँ से चली जाओगी। ”

राजकुमारी बोली — “नहीं, मैं ऐसा नहीं करूँगी। ”

और वह वहाँ रहने लगी। वह बहुत अच्छे से रहती और बरतन भी बहुत ही आसानी से साफ करती रहती।

रविवार के बाद वहाँ कुछ अजीब से मेहमान आये तो केटी ने रसोइये से पूछा कि क्या वह राजकुमार के नहाने का पानी ऊपर ले जा सकती थी।

यह सुन कर वहाँ खड़े सब लोग हँस पड़े और बोले — “पर तुम वहाँ क्या करोगी? तुम्हें क्या लगता है कि क्या राजकुमार तुम्हारी तरफ देखेगा भी? तुम तो बहुत ही डरावनी दिखायी देती हो। ”

पर उसने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी और उनसे पा्रर्थना करती रही और बार बार राजकुमार के लिये नहाने का पानी ले जाने के लिये कहती रही। आखिर उसको वहाँ उसके नहाने का पानी ले जाने की इजाज़त मिल ही गयी।

जब वह ऊपर गयी तो उसके लकड़ी के क्लोक ने आवाज की तो राजकुमार अन्दर से निकल कर आया और उससे पूछा — “तुम कौन हो?”

राजकुमारी बोली — “मैं राजकुमार के लिये नहाने का पानी ले कर आ रही थी। ”

“तुम क्या समझती हो कि इस समय तुम्हारे लाये पानी से मैं कुछ करूँगा?” और यह कर उसने वह पानी राजकुमारी के ऊपर ही फेंक दिया।

वह वहाँ से चली आयी और फिर उसने रसोइये से चर्च जाने की इजाज़त माँगी। चर्च पास में ही था सो उसको वह इजाज़त भी मिल गयी।

पर सबसे पहले वह उस चट्टान के पास गयी और जैसा कि बैल ने उससे कहा था उसने डंडी से चट्टान को मारा। तुरन्त ही उसमें से एक आदमी निकला और उसने पूछा — “तुम्हारी क्या इच्छा है?”

राजकुमारी बोली कि उसने चर्च जाने की और पादरी का भाषण सुनने के लिये छुट्टी ले रखी है पर उसके पास चर्च जाने लायक कपड़े नहीं हैं।

उस आदमी ने एक गाउन निकाला जो ताँबे जैसा चमकदार था। उसने उसको वह दिया और उसके साथ ही उसको एक घोड़ा भी दिया जिस पर उस घोड़े का साज भी सजा था। वह साज भी ताँबे के रंग का था और खूब चमक रहा था।

उसने तुरन्त अपना वह गाउन पहना और घोड़े पर चढ़ कर चर्च चल दी। जब वह चर्च पहुँची तो वह बहुत ही प्यारी और शानदार लग रही थी।

सब लोग उसको देख कर सोच रहे थे कि यह कौन है। उन सबमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने उस दिन पादरी का भाषण सुना होगा क्योंकि वे सब उसी को देखते रहे।

वहाँ राजकुमार भी आया था। वह तो उसके प्यार में बिल्कुल पागल सा ही हो गया था। उसकी तो उस लड़की के ऊपर से आँख ही नहीं हट रही थी।

जैसे ही राजकुमारी चर्च से बाहर निकली तो राजकुमार उसके पीछे भागा। राजकुमारी तो दरवाजे से बाहर चली गयी पर उसका एक दस्ताना दरवाजे में अटक गया। राजकुमार ने उसका वह दस्ताना वहाँ से निकाल लिया।

जब वह घोड़े पर चढ़ गयी तो राजकुमार फिर उसके पास गया और उससे पूछा कि वह कहाँ से आयी थी तो केटी बोली — “मैं बैथ से आयी हूँ। ”

और जब राजकुमार ने उसको देने के लिये उसका दस्ताना निकाला तो वह बोली —

रोशनी आगे और अँधेरा पीछे, बादल आओ हवा पर

ताकि यह राजकुमार कभी न देख सके जहाँ मेरा यह अच्छा घोड़ा मेरे साथ जाये

राजकुमार ने वैसा दस्ताना पहले कभी नहीं देखा था। वह उस शानदार लड़की को ढूँढने के लिये चारों तरफ घूमा जो बिना दस्ताने पहने ही वहाँ से घोड़े पर चढ़ कर चली गयी थी। उसने उसे बताया भी था कि वह बैथ से आयी थी पर वहाँ यह कोई नहीं बता सका कि बैथ कहाँ है।

अगले रविवार को किसी को राजकुमार के लिये उसका तौलिया ले कर जाना था। तो केटी ने फिर कहा — “क्या मैं राजकुमार का तौलिया ले कर जा सकती हूँ?”

दूसरे लोग बोले — “तुम्हारे जाने से क्या होगा। तुमको तो पता ही है कि पिछली बार तुम्हारे साथ क्या हुआ था। ”

फिर भी केटी ने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी और उसको राजकुमार का तौलिया ले जाने की इजाज़त मिल गयी। बस वह तौलिया ले कर सीढ़ियों से ऊपर भाग गयी।

इस भागने से उसके लकड़ी के पतले तख्ते का बने क्लोक ने फिर से आवाज की तो राजकुमार फिर से अन्दर से निकल कर आया और जब उसने देखा कि वह तो केटी थी तो उसने उसके हाथ से उस तौलिये को ले कर फाड़ दिया और उसके मुँह पर फेंक दिया।

वह बोला — “तुम यहाँ से चली जाओ ओ बदसूरत ट्रौल। तुम क्या सोचती हो कि मैं वह तौलिया इस्तेमाल करूँगा जिसको तुम्हारी गन्दी उँगलियों ने छू लिया हो?” और उसके बाद वह चर्च चला गया।

जब राजकुमार चर्च चला गया तो केटी ने भी चर्च जाने की छुट्टी माँगी। पर सबने उससे पूछा कि वह चर्च में क्या करने जाना चाहती थी।

उसके पास तो चर्च में पहनने के लिये उस लकड़ी के क्लोक के अलावा और कुछ था ही नहीं। और वह क्लोक भी बहुत ही भद्दा और काला था।

पर केटी बोली कि चर्च का पादरी बहुत ही अच्छा भाषण देता है। और जो कुछ भी उसने पिछले हफ्ते कहा था उसने केटी का काफी भला किया था। इस बात पर उसको चर्च जाने की छुट्टी मिल गयी।

वह फिर से दौड़ी हुई उसी चट्टान के पास गयी और जा कर उसके पास रखी डंडी से उसे मारा। उस चट्टान में से फिर वही आदमी निकला और अबकी बार उसने उसको पिछले गाउन से भी कहीं ज़्यादा अच्छा गाउन दिया।

वह सारा गाउन चाँदी के काम से ढका हुआ था और चाँदी की तरह से ही चमक रहा था। साथ में एक बहुत बढ़िया घोड़ा भी दिया जिसके साज पर चाँदी का काम था। और उसको चाँदी का एक टुकड़ा भी दिया।

उस सबको पहन कर जब वह राजकुमारी चर्च पहुँची तो बहुत सारे लोग चर्च के आँगन में ही खड़े हुए थे। उसको आते देख कर सब फिर सोचने लगे कि यह लड़की कौन हो सकती है।

राजकुमार तो तुरन्त ही वहाँ आ गया कि जब वह उस घोड़े पर से उतरेगी तो वह उसका घोड़ा पकड़ेगा। पर वह तो उस पर से कूद गयी और बोली कि उसका घोड़ा पकड़ने की उसको कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उसका घोड़ा बहुत सधा हुआ था।

वह घोड़ा वहीं खड़ा रहा जहाँ वह उसको छोड़ कर गयी थी। जब वह वहाँ वापस आयी और जब उसने उसे बुलाया तो वह उसके पास आ गया।

सब लोग चर्च के अन्दर चले गये पर पिछली बार की तरह से शायद ही कोई आदमी होगा जिसने उस दिन भी उस पादरी का भाषण सुना होगा क्योंकि उस दिन भी वे सब उसी की तरफ देखते रहे।

और राजकुमार तो उससे पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगा था।

जब पादरी का भाषण खत्म हो गया तो वह चर्च से बाहर चली गयी। वह अपने घोड़े पर बैठने ही वाली थी कि राजकुमार फिर वहाँ आया और उससे पूछा कि वह कहाँ से आयी है।

इस बार उसने जवाब दिया — “मैं टौविललैंड से आयी हूँ। ” यह कह कर उसने अपना कोड़ा गिरा दिया। यह देख कर राजकुमार उसको उठाने के लिये झुका तो इस बीच राजकुमारी ने कहा —

रोशनी आगे और अँधेरा पीछे, बादल आओ हवा पर

ताकि यह राजकुमार कभी न देख सके जहाँ मेरा यह अच्छा घोड़ा मेरे साथ जाये

और वह वहाँ से भाग गयी। राजकुमार यह भी न बता सका कि उसका हुआ क्या। वह फिर से यह जानने के लिये चारों तरफ घूमा फिरा कि टौविललैंड कहाँ है पर कोई उसको यह नहीं बता सका कि वह जगह कहाँ है। इसलिये अब राजकुमार को केवल उसी से काम चलाना था जो उसके पास था।

अगले रविवार को किसी को राजकुमार को कंघा देने के लिये जाना था। केटी ने फिर कहा कि क्या वह राजकुमार को कंघा देने जा सकती है। पर दूसरे लोगों ने फिर से उसका मजाक बनाया और कहा कि उसको पिछले दो रविवारों की घटनाएँ तो याद होंगी ही।

और साथ में उसको डाँटा कि वह किस तरह अपने उस भद्दे काले लकड़ी के क्लोक में राजकुमार के सामने जाने की हिम्मत करती है। पर वह फिर उन लोगों के पीछे पड़ी रही जब तक कि उन लोगों ने उसको हाँ नहीं कर दी।

वह फिर से कंघा ले कर ऊपर दौड़ी गयी। उसके लकड़ी के क्लोक की आवाज सुन कर राजकुमार फिर बाहर निकल कर आया और केटी को फिर से वहाँ देख कर उसने उससे कंघा छीन कर उसके मुँह पर मारा और बिना कुछ कहे सुने वहाँ से चर्च चला गया।

जब राजकुमार चर्च चला गया तो केटी ने भी चर्च जाने की इजाज़त माँगी। उन लोगों ने उससे फिर पूछा कि वहाँ उसका काम ही क्या था – उसमें से बदबू आती थी, वह काली थी, उसके पास वहाँ पहनने के लिये ठीक से कपड़े भी नहीं थे। हो सकता है कि राजकुमार या कोई और उसको वहाँ देख ले तो उसकी वहाँ बदनामी होगी।

पर केटी बोली कि लोगों के पास उसकी तरफ देखने की फुरसत ही कहाँ थी उनके पास तो और बहुत सारे काम थे। और वह उनसे चर्च जाने की इजाज़त माँगती ही रही। आखिर उन्होंने उसको वहाँ जाने की इजाज़त फिर से दे दी।

इस बार भी वही हुआ जो दो बार पहले हो चुका था। वह फिर से दौड़ी हुई उसी चट्टान के पास गयी और जा कर उसके पास रखी डंडी से उसे मारा। उस चट्टान में से फिर वही आदमी निकला और अबकी बार उसने उसको पिछले दोनों गाउन से भी ज़्यादा अच्छा गाउन दिया।

इस बार वह सारा गाउन सुनहरी था और उसमें हीरे जड़े हुए थे। साथ में एक बहुत बढ़िया घोड़ा भी दिया जिसके साज पर सोने का काम था। उसने उसको एक सोने का टुकड़ा भी दिया।

जब राजकुमारी चर्च पहुँची तो वहाँ के आँगन में पादरी और चर्च में आये सारे लोग उसके इन्तजार में खड़े थे।

राजकुमार वहाँ भागता हुआ आया और उसने उसका घोड़ा पकड़ना चाहा पर राजकुमारी पहले की तरह ही उस पर से कूद कर उतर गयी और बोली — “मेरे घोड़े को पकड़ने की जरूरत नहीं है। वह बहुत सधा हुआ है जहाँ मैं इसको खड़े होने को कहती हूँ यह वहीं खड़ा रहता है। ”

फिर सब चर्च के अन्दर चले गये। पादरी भी अपनी जगह चला गया। उस दिन भी किसी ने उसके भाषण का एक शब्द भी नहीं सुना क्योंकि पहले की तरह से सभी लोग केवल उसी लड़की को देखते रहे और सोचते रहे कि वह कहाँ से आती है और कहाँ चली जाती है।

और राजकुमार तो उसको पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगा। उसकी तो कोई इन्द्रिय काम ही नहीं कर रही थी वह तो बस उसको घूरे ही जा रहा था।

जब पादरी का भाषण खत्म हुआ तो राजकुमारी चर्च से बाहर निकली। अबकी बार राजकुमार ने चर्च के बाहर कुछ चिपकने वाली चीज़ डाल दी ताकि वह उसको वहाँ से जाने से रोक सके।

पर राजकुमारी ने उसकी कोई चिन्ता नहीं की और उसने अपना पैर उस चिपकने वाली चीज़ के ठीक बीच में रख दिया और उसके उस पार कूद गयी। पर इस कूदने में उसका एक सुनहरी जूता उस जगह पर चिपक गया।

जैसे ही वह अपने घोड़े पर चढ़ी राजकुमार चर्च में से बाहर आ कर उसके पास आया और उससे पूछा कि वह कहाँ से आयी है। इस बार वह बोली मैं कौम्बलैंड से आयी हूँ।

इस पर राजकुमार उसको उसका सुनहरा जूता देना चाहता था कि राजकुमारी बोली —

रोशनी आगे और अँधेरा पीछे, बादल आओ हवा पर

ताकि यह राजकुमार कभी न देख सके जहाँ मेरा यह अच्छा घोड़ा मेरे साथ जाये

और वह तो राजकुमार की आँखों के सामने सामने गायब हो गयी और राजकुमार उसे ढूँढता रहा पर कोई उसको कोई यह न बता सका कि कौम्बलैंड कहाँ है।

फिर उसने दूसरी तरकीब इस्तेमाल की। उसके पास उसका एक सुनहरी जूता रह गया था सो उसने सब जगह यह घोषणा करवा दी कि वह उसी लड़की से शादी करेगा जिसके पैर में यह सुनहरी जूता आ जायेगा।

बहुत सारी लड़कियाँ बहुत सारी जगहों से उस जूते को पहनने के लिये वहाँ आयीं पर किसी का पैर इतना छोटा नहीं था जिसके पैर में वह जूता आ जाता।

काफी दिनों बाद सोचो ज़रा कौन आया? केटी की सौतेली बहिन और सौतेली माँ। आश्चर्य उस लड़की के पैर में वह जूता आ गया। पर वह तो बहुत ही बदसूरत थी।

पर राजकुमार ने अपनी इच्छा के खिलाफ अपनी जबान रखी। उसने शादी की दावत रखी और वह सौतेली बहिन दुलहिन की तरह सज कर चर्च चली तो चर्च के पास वाले एक पेड़ पर बैठी एक चिड़िया ने गाया —

उसकी एड़ी एक टुकड़ा और उसकी उँगलियों का एक टुकड़ा

केटी वुडिनक्लोक का छोटा जूता खून से भरा है, मैं बस इतना जानती हूँ

यह सुन कर उस लड़की का जूता देखा गया तो उनको पता चला कि वह चिड़िया तो सच ही बोल ही रही थी। जूता निकालते ही उसमें से खून की धार निकल पड़ी।

फिर महल में जितनी भी नौकरानियाँ और लड़कियाँ थीं सभी वहाँ जूता पहन कर देखने के लिये आयीं पर वह जूता किसी के पैर में भी नहीं आया।

जब उस जूते को सबने पहन कर देख लिया तो राजकुमार ने पूछा — “पर वह केटी वुडिनक्लोक कहाँ है?” क्योंकि राजकुमार ने चिड़िया के गाने को ठीक से समझ लिया था कि वह क्या गा रही थी।

वहाँ खड़े लोगों ने कहा — “अरे वह? उसका यहाँ आना ठीक नहीं है। ”

“क्यों?”

“उसकी टाँगें तो घोड़े की टाँगों के जैसी हैं। ”

राजकुमार बोला — “आप लोग सच कहते हैं। मुझे मालूम है पर जब सबने यहाँ इस जूते को पहन कर देखा है तो उसको भी इसे पहन कर देखना चाहिये। ”

उसने दरवाजे के बाहर झाँक कर आवाज लगायी — “केटी। ” और केटी धम धम करती हुई ऊपर आयी। उसका लकड़ी का क्लोक ऐसे शोर मचा रहा था जैसे किसी फौज के घुड़सवार चले आ रहे हों।

वहाँ खड़ी दूसरी नौकरानियों ने उससे हँस कर उसका मजाक बनाते हुए कहा — “जाओ जाओ। तुम भी वह जूता पहन कर देखो और तुम भी राजकुमारी बन जाओ। ”

केटी वहाँ गयी और उसने वह जूता ऐसे पहन लिया जैसे कोई खास बात ही न हो और अपना लकड़ी का क्लोक उतार कर फेंक दिया।

लकड़ी का क्लोक उतारते ही वह वहाँ अपने सुनहरे गाउन में खड़ी थी। उसमें से सुनहरी रोशनी ऐसे निकल रही थी जैसे सूरज की किरनें फूट रही हों। और लो, उसके दूसरे पैर में भी वैसा ही सुनहरा जूता आ गया।

अब राजकुमार उसको पहचान गया कि यह तो वही चर्च वाली लड़की थी। वह तो इतना खुश हुआ कि वह उसकी तरफ दौड़ गया और उसके गले में बाँहें डाल दीं।

तब राजकुमारी ने उसको बताया कि वह भी एक राजा की बेटी थी। दोनों की शादी हो गयी और फिर एक बहुत बड़ी शादी की दावत का इन्तजाम हुआ।

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Norway ki Lok Kathayen-2/ नॉर्वे की लोक कथाएँ-2

भालू ने अपनी पूँछ कैसे खोयी: नॉर्वे की लोक-कथा

बच्चो, क्या तुम जानते हो कि भालू करीब करीब हर जानवर पर जो भी उसको जंगल में मिलता है क्यों गुर्राता है? वह ऐसा हमेशा से नहीं था।

पहले जब भी कोई उसके पास आता था तो उसको देख कर वह बड़े दोस्ताना अन्दाज़ में अपनी लम्बी पूँछ हिलाता था जैसे कि कुत्ते हिलाते हैं और बहुत प्यार से बात करता था।

पर आजकल? आजकल ऐसा नहीं है। तो फिर वह ऐसा कैसे हुआ?

तो हुआ यों कि एक बार जाड़े के एक दिन में एक मछियारे ने बहुत सारी मछलियाँ पकड़ीं और उन सबको एक रस्सी में बाँध कर पानी में वहीं छोड़ दिया ताकि वे ताजा रहें।

चालाक लोमड़े ने यह देख लिया कि मछियारे ने मछलियाँ पकड़ीं और उनको पकड़ कर पानी में ही छोड़ दीं और वह चला गया। सो जब वह मछियारा उधर नहीं देख रहा था तो उसने उसकी उन मछलियों को चुरा लिया और उनको ले कर घर चल दिया।

घर जाते समय उसको रास्ते में बैठा एक भालू दिखायी दे गया। भालू ने लोमड़े को बहुत सारी मछलियाँ ले जाते देखा तो उसको देख कर उसने अपने दोस्ताना अन्दाज में उसकी तरफ अपनी पूँछ हिलायी।

उसको वे मछलियाँ देखने और खुशबू में बहुत ही अच्छी लग रहीं थीं सो भालू ने लोमड़े से पूछा — “लोमड़े भाई, ये मछलियाँ तुमको कहाँ से मिलीं?”

लोमड़े ने झूठ बोला — “मिलेंगी कहाँ से? मैंने इनको पकड़ा है। ”

असल में लोमड़े को बहुत शरम आ रही थी क्योंकि उसको लगा कि भालू ने उसको वे मछलियाँ चुराते हुए देख लिया था। पर ऐसा कुछ नहीं था। भालू को तो यह पता ही नहीं था कि लोमड़े ने ये मछलियाँ चुरायी थीं।

भालू ने फिर पूछा — “लेकिन तुमने इनको पकड़ा कैसे लोमड़े भाई, झील तो सारी जमी पड़ी है?”

लोमड़े ने फिर झूठ बोला — “मेरे पास इनको पकड़ने का एक खास तरीका है। ”

भालू बोला — “ये मछलियाँ तो दिखायी भी बहुत अच्छी दे रही हैं लोमड़े भाई और खुशबूदार भी बहुत लग रही हैं। क्या तुम इनमें से थोड़ी सी मुझे भी दोगे?”

लोमड़ा बोला — “नहीं भाई। तुम अपनी मछलियाँ अपने आप पकड़ो। ”

भालू बड़ी नम्रता से बोला — “मैं भी ऐसी मछली पकड़ना चाहता हूँ। क्या तुम मुझको मछली पकड़ने का अपना वह खास तरीका बताओगे जिससे मैं भी इस जमे हुए बरफ में से ऐसी ही मछलियाँ पकड़ सकूँ?” और ऐसा कह कर उसने अपनी पूँछ फिर से हिलायी।

लोमड़ा भालू के साथ उस झील पर फिर से जाना नहीं चाहता था क्योंकि उसको डर था कि वह मछियारा कहीं उसको पकड़ न ले जिसकी मछलियाँ उसने चुरायी थीं।

पर उसको भालू का उसकी तरफ देख कर बार बार पूँछ हिलाना भी अच्छा नहीं लग रहा था सो उसने भालू से एक और झूठ बोलने का निश्चय किया।

लोमड़े ने भालू से कहा — “मछलियाँ पकड़ना बहुत आसान है भालू भाई। मैं तुम्हें बताता हूँ। पहले तुम बरफ में एक छेद करो फिर तुम उस छेद पर ऐसे बैठ जाओ जिससे तुम्हारी पूँछ उस छेद में नीचे गिर जाये। पर तुमको अपनी पूँछ पानी में काफी देर तक लटकानी पड़ेगी।

सो अगर तुम्हारी पूँछ को थोड़ी तकलीफ भी हो तो चिन्ता मत करना क्योंकि उस तकलीफ का मतलब होगा कि मछलियाँ तुम्हारी पूँछ को काट रही हैं। जितनी ज़्यादा देर तक तुम अपनी पूँछ पानी में रखोगे उतनी ही ज़्यादा मछलियाँ तुम पकड़ पाओगे।

जब तुम देखो कि अब तुम अपनी पूँछ हिला भी नहीं पा रहे हो तो समझना कि अब तुम अपनी पूँछ बाहर निकालने के लिये तैयार हो। बस फिर तुम एक दम से उठ कर खड़े हो जाना और जितनी जल्दी से अपनी पूँछ बाहर निकाल सको निकाल लेना। ”

उफ़, यह चालाक लोमड़ा भालू से कितना झूठ बोला?

भालू ने उसको बड़ी नरमी से धन्यवाद दिया और एक बार फिर से अपनी लम्बी पूँछ हिलाता हुआ उस जमी हुई झील की तरफ चल दिया।

रास्ते में भालू ने एक मछियारे से बरफ खोदने वाला औजार और एक आरी उधार माँगी और उनसे उसने जमी हुई झील की बरफ में एक छेद किया।

जैसे लोमड़े ने उस मछियारे की बिना इजाज़त के उसकी मछलियाँ चुरा ली थीं भालू ने ऐसा नहीं किया।

जब भालू का छेद तैयार हो गया तो उसने उस मछियारे के औजार वापस किये और उससे इजाज़त ले कर वह उस छेद पर आ कर बैठ गया। उसने अपनी लम्बी पूँछ उस छेद में अन्दर डाल दी।

उतनी कड़ी सरदी में उस ठंडे पानी में अपनी पूँछ डाल कर बैठना उसको बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था पर वैसी ही सुन्दर, ताजा और खुशबूदार मछलियाँ पकड़ने के लिये वह यह भी करने को तैयार था।

वह बेचारा वहाँ तब तक बैठा रहा जब तक पानी ने उसकी पूँछ के चारों तरफ जमना नहीं शुरू किया।

पानी जमने की वजह से अब उसकी पूँछ में दर्द होना शुरू हो गया था तो उसको लोमड़े की बात याद आयी कि “अगर तुम्हारी पूँछ में थोड़ा बहुत दर्द भी हो तो चिन्ता मत करना, यह समझना कि मछलियाँ तुम्हारी पूँछ को काट रही हैं। ”

इसलिये वह वहाँ खुशी खुशी बैठा रहा और तब तक बैठा रहा जब तक उसकी पूँछ के चारों तरफ का पानी ठोस तरीके से जम नहीं गया।

जब भालू को लगा कि अब वह अपनी पूँछ बिल्कुल भी नहीं हिला पा रहा है तो उसने सोचा कि लगता है कि अब उसकी पूँछ से बहुत सारी मछलियाँ चिपक गयी हैं इसलिये अब खड़े होने का समय आ गया है। वह खड़ा हो गया और एक झटके से उसने अपनी पूँछ पानी में से बाहर खींच ली।

भालू तो बहुत ताकतवर जानवर होता है सो जैसे ही उसने अपनी पूँछ बाहर खींची वह बाहर तो निकल आयी। पर यह क्या?

उसकी पूँछ तो अभी भी पानी में रह गयी थी। वह इसलिये कि पानी में जमी रहने की वजह से उसकी पूरी पूँछ निकल ही नहीं पायी और झटके से खींचने की वजह से टूट गयी।

जो पूँछ उसकी बाहर थी उसमें कोई मछली नहीं थी और बाकी की पूँछ उसकी पानी के अन्दर ही रह गयी थी। बस अब तो वह एक बहुत ही छोटी सी पूँछ वाला जानवर रह गया था।

भालू को लोमड़े पर बहुत गुस्सा आया कि लोमड़े ने उसके साथ इतने नीच किस्म की यह चालाकी खेली।

उस दिन के बाद से भालू की पूँछ बढ़ी ही नहीं, वह उतनी की उतनी ही है। और तभी से वह जंगल में जब किसी से भी मिलता है तो उससे वह प्रेम का बरताव नहीं करता और हर एक पर गुर्राता ही रहता है।

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Germany ki Lok Kathayen-1/ जर्मनी की लोक कथाएँ-1

ग्रिम ब्रदर्स कहानी-स्नो व्हाइट और सात बौने: जर्मनी की लोक-कथा

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सुदूर प्रदेश में एक राजा और रानी राज्य करते थे। रानी बहुत ही दयालु और प्यारी थी और राज्य के सभी लोग उसका आदर करते थे । लेकिन रानी के जीवन में केवल एक दुविधा थी कि उसको संतान की इच्छा थी लेकिन उसके कोई संतान नहीं थी। एक बार रानी सर्दियों के समय खिड़की के पास बैठकर स्वेटर बुन रही थी और उसी समय एक स्नो व्हाइट चिड़िया खिड़की के पास आकर बैठ गई जिससे रानी का ध्यान भटक गया और उसकी उंगली में सुई चुभ गई।

तभी रानी ने एक इच्छा मांगी कि उसको एक बहुत ही खूबसूरत बेटी हो और उसका चेहरा स्नो जैसा हो । वह बहुत सुंदर और परी की तरह खूबसूरत हो।

काफी समय गुजर जाने के बाद रानी को एक बेटी पैदा हुई वह बहुत खूबसूरत थी जैसा उसने इच्छा मांगी थी । वह बहुत सुंदर थी । रानी ने उसका नाम स्नो व्हाइट रखा। राज्य के सभी लोग बहुत खुश थे।

स्नो व्हाइट की एक सौतेली मां थी। उसकी सौतेली मां स्नो व्हाइट को पसंद नहीं करती थी और उसे अपनी खूबसूरती पर भी घमंड था।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां के पास एक जादुई आईना था । जादुई आईने से वह रोज पूछती थी कि इस दुनिया में सबसे ज्यादा खूबसूरत कौन है । इस पर आईना जवाब देता -आपके अलावा भला कौन हो सकता है । इससे रानी बहुत खुश हो जाती। दूसरी तरफ रानी राज्य के निर्णय भी लेने लगी थी जिससे राज्य को बहुत नुकसान होने लगा। राज्य के नुकसान की भरपाई के लिए राजा को राज्य से बाहर जाना पड़ा और वह राजा के बाहर जाने पर अपनी मनमानी करने लगी।

समय बहुत तेजी से बीत रहा था और अब स्नो व्हाइट एक खूबसूरत युवती हो गई थी। जब एक बार स्नो व्हाइट बाग में बने तालाब के किनारे पानी पी रही थी तभी एक राजकुमार को स्नो व्हाइट की छाया दिखाई दी । वह राजकुमार देखता ही रह गया लेकिन उसे पक्षियों के सिवा उधर कुछ नहीं दिखा।

उधर रोज की तरह रानी आज भी आईने के पास पहुंची और उसने आईने से पूछा कि सबसे खूबसूरत कौन है । थोड़ी देर तो आईना हिचकिचाया लेकिन उसने कहा कि स्नो व्हाइट। अब रानी बहुत परेशान हो गई।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां ने उसे अपने पास बुलाया और उससे कहा कि मुझे लगता है कि तुम महल में पड़ी-पड़ी बोर हो रही हो इसलिए तुम्हें जंगल की सैर पर जाना चाहिए इससे तुम्हारा मन बहल जाएगा । और मैं तुम्हारे साथ अपने सबसे जांबाज सुरक्षाकर्मी को भेज रही हूं। रानी ने अपने सुरक्षाकर्मी को जंगल में भेजा और उससे बोला कि स्नो व्हाइट को मारकर सबूत के तौर पर उसका दिल लेकर आना।

रानी का सुरक्षाकर्मी जब स्नो व्हाइट को मारने लगा तो उसे दया आ गई और उसने स्नो व्हाइट को वहां से जाने के लिए बोला । तब स्नो व्हाइट ने उसे कहा कि वह अपना फर्ज पूरा करे। लेकिन सुरक्षाकर्मी ने उसे वहां से जाने दिया। और सबूत के तौर पर वह किसी जानवर का दिल निकाल कर ले गया । उसने वह दिल रानी के सामने पेश किया जिससे रानी बहुत खुश हो गई।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट जंगल मैं इधर उधर भटक रही थी । उसे बहुत डर लग रहा था उसे लगा जैसे कोई पीछे बात कर रहा है जिससे वह डर गई और वहां तेजी से आगे बढ़ने लगी। थोड़ा दूर चलने पर तितलियां उसके चारों ओर मंडराने लगी। तितलियां स्नो व्हाइट का स्कार्फ खींचने लगी और स्नो व्हाइट को लगा जैसे वह तितलियां कहीं जाने के लिए इशारा कर रही हैं। स्नो व्हाइट उन तितलियों के साथ साथ चलने लगी ।

वहां स्नो व्हाइट को एक घर दिखाई दिया । वह उस घर में चली गई । वहां उसने देखा कि एक मेज बिछी हुई है और उस पर 7 प्लेट लगी हुई हैं । और उन में स्वादिष्ट खाना लगा हुआ है ।और वहीं बगल वाले कमरे में सात बिस्तर लगे हुए हैं। स्नो व्हाइट ने जी भर के उन प्लेटो में से खाना खाया । स्नो व्हाइट बहुत थक गई थी इसलिए वह एक बिस्तर पर वहीं सो गई।

वह घर 7 बौनों का था। वो बौने सोने की खुदाई करते थे । जब शाम को बौने घर लौटे तो बौनों ने देखा कि मेज पर प्लेटो में से किसी ने खाना खाया है । जब सातवें बौने ने अपने बिस्तर की तरफ गौर से देखा तो वहां पर एक लड़की एक बिस्तर पर सोए हुई थी। सभी बौने उसके बिस्तर की तरफ बड़े । तब उन्होंने देखा कि वहां एक सुंदर लड़की सोए हुए हैं । बौनों ने उस लड़की को नहीं जगाया और वह वहीं उस लड़की को घेरते हुए सो गए। जब सुबह स्नो व्हाइट नींद से जगी तो बौनों को देखकर वह डर गई।

बौने बोले- हे लड़की तुम्हें हम से डरने की जरूरत नहीं है। बौने स्नो व्हाइट के बारे में पूछा तब स्नो व्हाइट ने अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई। बौने बोले कि तुम यहां रह सकती हो तुम्हें हमारे लिए खाना बनाना होगा, घर की साफ सफाई करनी होगी और हमारे बिस्तर लगाने होंगे। स्नो व्हाइट मान गई।

बौने जब भी शाम को घर वापस आते तो घर को देखकर और अपने लिए खाना बना देखकर खुश हो जाते ।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट की सौतेली माँ ने जब आईने से पूछा कि सबसे सुंदर कौन है तब आईने ने जवाब दिया रानी माफ करें सबसे सुंदर तुम हो लेकिन तुम से भी सुंदर सात बोनो के साथ पहाड़ों पर रहने वाली स्नो व्हाइट है। तब रानी को महसूस हुआ कि स्नो व्हाइट अभी जिंदा है उसने अब स्नो व्हाइट को जान से मारने का प्लान बनाया ।

उसने जादू से बूढ़ी औरत का रूप धारण कर लिया और ताजे सेव में विष डालकर वह पहाड़ों पर स्थित स्नो व्हाइट के पास पहुंची। बौने उस समय सोने की खोज में जा चुके थे।

स्नो व्हाइट घर पर अकेली थी। जब रानी बूढ़ी औरत के वेश में वहां पहुंची और उसने सेब लेने के लिए उस स्नो व्हाइट को बोला । तब स्नो व्हाइट बोली कि मां जी माफ करें मैं दरवाजा नहीं खोल सकती। तब बूढ़ी औरत बोली कि तुम दरवाजा मत खोलो। तुम मुझे एक रोटी का टुकड़ा दे दो । स्नो व्हाइट ने ऐसा ही किया और सेव ले लिए । जैसे ही उसने सेव खाए वह गिर गई और मर गई ।

जब बौने घर पर लेटे तब उन्होंने वहां स्नो् व्हाइट को जमीन पर गिरे देखा। उन्होंने स्नो व्हाइट को उठाया और उसे जगाने की कोशिश की। लेकिन स्नो व्हाइट अब मर चुकी थी तब बौने ने उसके मरने का मातम मनाया और उसे दफनाने के लिए ले जाने लगे। लेकिन तब उन्होंने महसूस किया कि स्नो व्हाइट का चेहरा अभी भी उतना फ्रेश है उसके गाल अभी भी लाल हैं ।वह मरी हुई नहीं लग रही थी। तब उन्होंने सोचा के स्नो व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद किया जाए जिससे उसका शरीर मरने के बाद भी बेदाग बना रहे। उन्होंने ऐसा ही किया और स्नो् व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद कर दिया।

तभी किसी राज्य का राजकुमार शिकार करते हुए वहां पहुंचा तब उन्होंने देखा कि कुछ बौने एक लड़की को घेरे हुए मातम मना रहे हैं। वह राजकुमार स्नो व्हाइट को देखते ही रह गया और उन बौने से स्नो व्हाइट को अपने साथ ले जाने की इच्छा जाहिर की। लेकिन बौने बोले कि यह तो मर चुकी है तुम इसका क्या करोगे । तब राजकुमार बोला कि मैं इसे अपने राज्य में ले जाकर इसके लिए एक सुंदर सा स्मारक बनाऊंगा। क्योंकि मैं इससे प्रेम करने लगा हूं ।यह बहुत सुंदर है ।

जब राजकुमार के सैनिक उसे डोली में उठा कर ले जा रहे थे तभी एक सैनिक को ठोकर लगी और वह गिरने ही वाला था, जिससे स्नो व्हाइट को झटका लगा और उसके मुंह में फंसा हुआ जहरीले सेब का टुकड़ा निकल गया। जिससे स्नो व्हाइट की जान वापस आ गई। स्नो व्हाइट अब जिंदा थी। राजकुमार ने स्नो व्हाइट से शादी करने की इच्छा जाहिर की। लेकिन स्नो व्हाइट बोली कि वह अपने पिता जी का आशीर्वाद पाना चाहती है।

राजकुमार को पता लगा कि रानी जादूगर है और बहुत क्रूर है । तब राजकुमार ने रानी के किले पर हमला करके उसे परास्त कर दिया और रानी राज्य छोड़ कर भाग गई। तब राजकुमार ने स्नो व्हाइट के पिता को गिरफ्त में से बाहर निकाला। राजकुमार और स्नो व्हाइट ने अपने पिताजी का आशीर्वाद लिया और शादी कर ली।

(ग्रिम ब्रदरज़)