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Norway ki Lok Kathayen-1/ नॉर्वे की लोक कथाएँ-1

केटी वुडिनक्लोक: नॉर्वे की लोक-कथा

एक बार नौर्वे देश में एक राजा था जिसकी रानी मर गयी थी। उसकी इस रानी से एक बेटी थी। उसकी यह बेटी इतनी चतुर और प्यारी थी कि उसके जैसा चतुर और प्यारा दुनिया में और कोई नहीं था।

राजा अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था। वह उसके मरने का काफी दिन तक उसका गम मनाता रहा पर फिर अकेले रहते रहते थक गया और उसने दूसरी शादी कर ली।

उसकी यह नयी रानी एक विधवा थी और इसके भी एक बेटी थी पर इसकी यह बेटी उतनी ही बुरी और बदसूरत थी जितनी राजा की बेटी प्यारी, दयावान और चतुर थी।

सौतेली माँ और उसकी बेटी दोनों राजा की बेटी से बहुत जलती थीं क्योंकि वह बहुत ही प्यारी थी। जब तक राजा घर में रहता था वे दोनों राजा की बेटी को कुछ भी नहीं कह सकती थीं क्योंकि राजा उसको बहुत प्यार करता था।

कुछ समय बाद उस राजा को किसी दूसरे राजा के साथ लड़ाई के लिये जाना पड़ा तो राजकुमारी की सौतेली माँ ने सोचा कि यह मौका अच्छा है अब वह उस लड़की के साथ जैसा चाहे वैसा बरताव कर सकती है।

सो उन दोनों माँ बेटी ने उस लड़की को भूखा रखना और पीटना शुरू कर दिया। वे दोनों जहाँ भी वह जाती सारे घर में उसके पीछे पड़ी रहतीं।

आखिर उसकी सौतेली माँ ने सोचा कि यह सब तो उसके लिये कुछ जरा ज़्यादा ही अच्छा है सो उसने उसे जानवर चराने के लिये भेजना शुरू दिया।

अब वह बेचारी जानवर चराने के लिये जंगल और घास के मैदानों में चली जाती। जहाँ तक खाने का सवाल था कभी उसको कुछ थोड़ा सा खाना मिल जाता और कभी बिल्कुल नहीं। इससे वह बहुत ही दुबली होती चली गयी और हमेशा दुखी रहती और रोती रहती।

उसके जानवरों में कत्थई रंग का एक बैल था जो हमेशा अपने आपको बहुत साफ और सुन्दर रखता था। वह अक्सर ही राजकुमारी के पास आ जाता था और जब राजकुमारी उसको थपथपाती तो वह उसको थपथपाने देता।

एक दिन वह दुखी बैठी हुई थी और सुबक रही थी कि वह बैल उसके पास आया और सीधे सीधे उससे पूछा कि वह इतनी दुखी क्यों थी। लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया और बस रोती ही रही।

बैल एक लम्बी सी साँस ले कर बोला — “आह, हालाँकि तुम मुझे बताओगी नहीं पर मैं सब जानता हूँ। तुम इसी लिये रोती रहती हो न क्योंकि रानी तुमको ठीक से नहीं रखती। वह तुमको भूखा मारना चाहती है।

पर देखो खाने के लिये तुमको कोई चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि मेरे बाँये कान में एक कपड़ा है। जब तुमको खाना खाने की इच्छा हो तो उस कपड़े को मेरे कान में से निकाल लो और घास पर फैला दो। बस तुमको जो खाना चाहिये वही मिल जायेगा। ”

राजकुमारी को उस समय बहुत भूख लगी थी सो उसने उस बैल के बाँये कान में रखा कपड़ा निकाल लिया और उसे घास पर बिछा दिया। उसको उस कपड़े से खाने के लिये फिर बहुत सारी चीज़ें मिल गयीं। उस खाने में शराब भी थी, माँस भी था और केक भी थी।

अब जब भी उसको भूख लगती तो वह बैल के कान में से कपड़ा निकालती उसको घास पर बिछाती और जो उसको खाने की इच्छा होती वह खाती। कुछ ही दिनों में उसके शरीर का माँस और रंगत दोनों वापस आने लगीं।

जल्दी ही वह थोड़ी मोटी और गोरी गुलाबी हो गयी यह देख कर उसकी सौतेली माँ और उसकी बेटी गुस्से से लाल पीली होने लगीं। उस सौतेली माँ की समझ में यही नहीं आया कि उसकी वह सौतेली बेटी जो इतनी बुरी हालत में थी अब ऐसी तन्दुरुस्त कैसे हो गयी।

उसने अपनी एक नौकरानी को बुलाया और उसको राजकुमारी के पीछे पीछे जंगल जाने के लिये कहा और कहा कि वह जा कर वहाँ देखे कि वहाँ सब ठीक चल रहा है या नहीं क्योंकि उसका खयाल था कि घर का कोई नौकर राजकुमारी को खाना दे रहा होगा।

वह नौकरानी राजकुमारी के पीछे पीछे जंगल तक गयी। वहाँ जा कर उसने देखा कि किस तरह से उस सौतेली बेटी ने बैल के कान में से एक कपड़ा निकाला, उसे घास पर बिछाया और फिर किस तरह से उस कपड़े ने उस राजकुमारी को खाना दिया। सौतेली बेटी ने उसे खाया और वह खाना खा कर वह बहुत खुश हुई।

जो कुछ भी उस नौकरानी ने जंगल में देखा वह सब उसने जा कर रानी को बताया।

उधर राजा भी लड़ाई से वापस आ गया था। क्योंकि वह दूसरे राजा को जीत कर आया था इसलिये सारे राज्य में खूब खुशियाँ मनायी जा रही थीं। पर सबसे ज़्यादा खुश थी राजा की अपनी बेटी।

राजा के आते ही रानी ने बीमार पड़ने का बहाना किया और बिस्तर पर जा कर लेट गयी। उसने डाक्टर को यह कहने के लिये बहुत पैसे दिये कि “रानी तब तक ठीक नहीं हो सकती जब तक उसको कत्थई रंग के बैल का माँस खाने को न मिल जाये। ”

राजा और महल के नौकर आदि सबने डाक्टर से पूछा कि रानी की बीमारी की क्या कोई और दवा नहीं थी पर डाक्टर ने कहा “नहीं।” सबने उस कत्थई रंग के बैल की ज़िन्दगी के लिये प्रार्थना की क्योंकि वह बैल सभी को बहुत प्यारा था।

लोगों ने कोई दूसरा कत्थई बैल ढूँढने की कोशिश भी की पर सबने यह भी कहा कि उस बैल के जैसा और कोई बैल नहीं था। उसी बैल को मारा जाना चाहिये और किसी बैल के माँस के बिना रानी ठीक नहीं हो सकती।

जब राजकुमारी ने यह सुना तो वह बहुत दुखी हुई और जानवरों के बाड़े में बैल के पास गयी। वहाँ भी वह बैल अपना सिर लटकाये हुए नीची नजर किये इस तरह दुखी खड़ा था कि राजकुमारी उसके ऊपर अपना सिर रख कर रोने लगी।

बैल ने पूछा — “तुम क्यों रो रही हो राजकुमारी?”

तब राजकुमारी ने उसे बताया कि राजा लड़ाई पर से वापस आ गया था और रानी बहाना बना कर बीमार पड़ गयी है। उसने डाक्टर को यह कहने पर मजबूर कर दिया है कि रानी तब तक ठीक नहीं हो सकती जब तक उसको कत्थई रंग के बैल का माँस खाने को नहीं मिलता। और अब उसको मारा जायेगा।

बैल बोला — “अगर वे लोग पहले मुझे मारेंगे तो जल्दी ही वे तुमको भी मार देंगे। तो अगर तुम मेरी बात मानो तो हम दोनों यहाँ से आज रात को ही भाग चलते हैं। ”

राजकुमारी को यह अच्छा नहीं लगा कि वह अपने पिता को यहाँ अकेली छोड़ कर चली जाये पर रानी के साथ उसी घर में रहना तो उससे भी ज़्यादा खराब था। इसलिये उसने बैल से वायदा किया कि वह वहाँ से भाग जाने के लिये रात को उसके पास आयेगी।

रात को जब सब सोने चले गये तो राजकुमारी जानवरों के बाड़े में आयी। बैल ने उसको अपनी पीठ पर बिठाया और वहाँ से उसको ले कर बहुत तेज़ी से भाग चला।

अगले दिन सुबह सवेरे जब लोग उस बैल को मारने के लिये उठे तो उन्होंने देखा कि बैल तो जा चुका है। जब राजा उठा और उसने अपनी बेटी को बुलाया तो वह भी उसको कहीं नहीं मिली। वह भी जा चुकी थी।

राजा ने चारों तरफ अपने आदमी उन दोनों को ढूँढने के लिये भेजे। उनको उसने चर्च में भी भेजा पर दोनों का कहीं पता नहीं था। किसी ने भी उनको कहीं भी नहीं देखा था।

इस बीच वह बैल राजकुमारी को अपनी पीठ पर बिठाये बहुत सी जगहें पार कर एक ऐसे जंगल में आ पहुँचा था जहाँ हर चीज़ ताँबे की थी – पेड़, शाखाएँ, पत्ते, फूल, हर चीज़।

पर इससे पहले कि वे इस जंगल में घुसते बैल ने राजकुमारी से कहा — “जब हम इस जंगल में घुस जायेंगे तो ध्यान रखना कि तुम इस जंगल की एक पत्ती भी नहीं तोड़ना। नहीं तो यह सब मेरे और तुम्हारे ऊपर भी आ जायेगा।

क्योंकि यहाँ एक ट्रौल रहता है जिसके तीन सिर हैं और वही इस जंगल का मालिक भी है। ”

“नहीं नहीं। भगवान मेरी रक्षा करे। ” उसने कहा कि वह वहाँ से कुछ भी नहीं तोड़ेगी।

वे दोनों उस जँगल में घुसे। राजकुमारी किसी भी चीज़ को छूने तक के लिये बहुत सावधान थी। वह जान गयी थी कि किसी भी शाख को छूने से कैसे बचना था। पर वह बहुत घना जंगल था और उसमें से हो कर जाना बहुत मुश्किल था।

बचते बचते भी उससे उस जंगल के एक पेड़ की एक पत्ती टूट ही गयी और वह उसने अपने हाथ में पकड़ ली।

बैल बोला — “अरे यह तुमने क्या किया। अब तो ज़िन्दगी और मौत के लिये लड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं है। पर ध्यान रखना वह पत्ती तुम्हारे हाथ में सुरक्षित रहे उसे फेंकना नहीं। ”

जल्दी ही वे जंगल के आखीर तक पहुँच गये और जैसे ही वे वहाँ पहुँचे कि एक तीन सिर वाला ट्रौल वहाँ आ गया।

उसने पूछा — “किसने मेरा जंगल छुआ?”

बैल बोला — “यह जंगल तो जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है। ”

ट्रौल चीखा — “वह तो हम लड़ाई से तय करेंगे। ”

बैल बोला — “जैसा तुम चाहो। ”

सो दोनों एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़े और एक दूसरे से गुँथ गये। ट्रौल बैल को खूब मार रहा था पर बैल भी अपनी पूरी ताकत से ट्रौल को मार रहा था।

यह लड़ाई सारा दिन चली। आखीर में बैल जीत गया। पर उसके शरीर पर बहुत सारे घाव थे और वह इतना थक गया था कि उससे तो उसकी एक टाँग भी नहीं उठ पा रही थी सो उन दोनों को वहाँ एक दिन के लिये आराम करने के लिये रुकना पड़ा।

बैल ने राजकुमारी से कहा कि वह ट्रौल की कमर की पेटी से लटका हुआ मरहम का एक सींग ले ले और वह मरहम उसके शरीर पर मल दे। राजकुमारी ने ऐसा ही किया तब कहीं जा कर बैल कुछ ठीक हुआ। तीसरे दिन वे फिर अपनी यात्रा पर चल दिये।

वे फिर कई दिनों तक चलते रहे। कई दिनों की यात्रा के बाद वे एक चाँदी के जंगल में आये। यहाँ हर चीज़ चाँदी की थी – पेड़, शाखाएँ, पत्ते, फूल, हर चीज़।

पर इससे पहले कि वे इस जंगल में घुसते पहले की तरह से बैल ने इस बार भी राजकुमारी से कहा — “जब हम इस जंगल में घुस जायेंगे तो ध्यान रखना कि तुम इस जंगल की एक पत्ती भी नहीं नहीं तोड़ोगी नहीं तो यह सब मेरे और तुम्हारे ऊपर भी आ जायेगा।

क्योंकि यहाँ एक छह सिर वाला ट्रौल रहता है जो इस जंगल का मालिक है और मुझे नहीं लगता कि मैं उसको किसी भी तरह जीत पाऊँगा। ”

राजकुमारी बोली — “नहीं नहीं। मैं ख्याल रखूँगी कि मैं यहाँ से कुछ न तोड़ूँ और तुम भी मेरे लिये यह दुआ करते रहना कि यहाँ से मुझसे कुछ टूट न जाये। ”

पर जब वे उस जंगल में घुसे तो वह इतना ज़्यादा घना था कि वे दोनों उसमें से बड़ी मुश्किल से जा पा रहे थे। राजकुमारी बहुत सावधान थी कि वह वहाँ की कोई भी चीज़ छूने से पहले ही दूसरी तरफ को झुक जाती थी पर हर मिनट पर शाखें उसकी आँखों के सामने आ जातीं।

बचते बचते भी ऐसा हुआ कि उससे एक पेड़ की एक पत्ती टूट ही गयी।

बैल फिर चिल्लाया — “उफ। यह तुमने क्या किया राजकुमारी? अब हम अपनी ज़िन्दगी और मौत के लिये लड़ने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते। पर ध्यान रहे इस पत्ती को भी खोना नहीं। सँभाल कर रखना। ”

जैसे ही वह यह कह कर चुका कि वह छह सिर वाला ट्रौल वहाँ आ गया और उसने पूछा — “वह कौन है जिसने मेरा यह जंगल छुआ?”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “यह जंगल जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है। ”

ट्रौल बोला — “यह तो हम लड़ कर देखेंगे। ”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “जैसे तुम्हारी मरजी। ”

कह कर वे दोनों एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़े। बैल ने ट्रौल की आँखें निकाल लीं और उसकेे सींग उसके शरीर में घुसा दिये। इससे उसके शरीर में से उसकी आँतें निकल कर बाहर आ गयीं।

पर वह ट्रौल क्योंकि उस बैल के मुकाबले का था सो बैल को उस ट्रौल को मारने में तीन दिन लग गये सो वे तीन दिन तक लड़ते ही रहे।

पर इस ट्रौल को मारने के बाद बैल भी इतना कमजोर हो गया और थक गया कि वह हिल भी नहीं सका। उसके घाव भी ऐसे थे कि उनसे खून की धार बह रही थी।

इस ट्रौल की कमर की पेटी से भी एक मरहम वाला सींग लटक रहा था सो बैल ने राजकुमारी से कहा कि वह उस ट्रौल की कमर से वह सींग निकाल ले और उसका मरहम उसके घावों पर लगा दे।

राजकुमारी ने वैसा ही किया तब जा कर वह कुछ ठीक हुआ। इस बार बैल को ठीक होने में एक हफ्ता लग गया तभी वे आगे बढ़ सके।

आखिर वे आगे चले पर बैल अभी भी बिल्कुल ठीक नहीं था सो वह बहुत धीरे चल रहा था।

राजकुमारी को लगा कि बैल को चलने में समय ज़्यादा लग रहा था सो समय बचाने के लिये उसने बैल से कहा कि क्योंकि वह छोटी थी और उसके अन्दर ज़्यादा ताकत थी वह जल्दी चल सकती थी वह उसको पैदल चलने की इजाज़त दे दे पर बैल ने उसको इस बात की इजाज़त नहीं दी। उसने कहा कि उसको अभी उसकी पीठ पर बैठ कर ही चलना चाहिये।

इस तरह से वे काफी दिनों तक चलते हुए बहुत जगह होते हुए फिर एक जंगल में आ पहुँचे। यह जंगल सारा सोने का था। उस जंगल के हर पेड़, शाख, डंडी, फूल, पत्ते सभी कुछ सोने के थे। इस जंगल में भी वही हुआ जो ताँबे और चाँदी के जंगलों में हुआ था।

बैल ने राजकुमारी से कहा कि वह उस जंगल में से भी कुछ न तोड़े क्योंकि इस जंगल का राजा एक नौ सिर वाला ट्रौल था और यह ट्रौल पिछले दोनों ट्रौल को मिला कर उनसे भी ज़्यादा बड़ा और ताकतवर था। बैल तो इसको जीत ही नहीं सकता था।

बैल जानता था कि राजकुमारी इस बात का पूरा ध्यान रखेगी कि वह उस जंगल की कोई चीज़ न तोड़े पर फिर भी वही हुआ। जब वे जंगल में घुसे तो यह जंगल ताँबे और चाँदी के जंगलों से भी कहीं ज़्यादा घना था।

इसके अलावा वे लोग जितना उस जंगल के अन्दर चलते जाते थे वह जंगल और ज़्यादा घना होता जाता था। आखिर वह इतना ज़्यादा घना हो गया कि राजकुमारी को लगा कि अब वह उस जंगल में से बिना किसी चीज़ को छुए निकल ही नहीं सकती।

उसको पल पल पर यही लग रहा था कि किसी भी समय पर उससे वहाँ कोई भी चीज़ टूट जायेगी।

इस डर से वह कभी बैठ जाती, कभी अपने आपको किसी तरफ झुका लेती, कभी मुड़ जाती पर फिर भी उन पेड़ों की शाखाएँ हर पल उसकी आँखों के सामने आ रही थीं।

इसका नतीजा यह हुआ कि उसको पता ही नहीं चला कि वह उन सोने की शाखाओं, फूलों, पत्तों से बचने के लिये कर क्या रही है। और इससे पहले कि उसको यह पता चलता कि क्या हुआ उसके हाथ में एक सोने का सेब आ गया।

उसको देख कर तो उसको इस बात का इतना ज़्यादा दुख हुआ कि वह बहुत ज़ोर से रो पड़ी और उसको फेंकना चाहती थी कि बैल बीच में ही बोल पड़ा — “अरे इसको फेंकना नहीं। इसे सँभाल कर रख लो और इसका ध्यान रखना। ” पर राजकुमारी का तो रोना ही नहीं रुक रहा था।

बैल ने उसको जितनी भी तसल्ली वह दे सकता था दी पर उसको लग रहा था कि अबकी बार उस बैल को केवल उसकी वजह से बहुत भारी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा और उसको यह भी शक था कि यह सब कैसे होगा क्योंकि इस जंगल का मालिक ट्रौल बहुत बड़ा और ताकतवर था।

तभी उस जंगल का मालिक वह नौ सिर वाला ट्रौल वहाँ आ गया। वह इतना बदसूरत था कि राजकुमारी तो उसकी तरफ देखने की भी हिम्मत नहीं कर सकी।

वहाँ आ कर वह गरजा — “यह किसने मेरा जंगल छुआ?”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “यह जंगल जितना तुम्हारा है उतना ही मेरा भी है। ”

ट्रौल बोला — “यह तो हम लड़ कर देखेंगे। ”

बैल ने फिर वही जवाब दिया — “जैसे तुम्हारी मरजी। ”

कह कर वे दोनों एक दूसरे की तरफ दौड़ पड़े। बहुत ही भयानक दृश्य था। राजकुमारी तो उसको देख कर ही बेहोश होते होते बची।

इस बार भी बैल ने ट्रौल की आँखें निकाल लीं और उसके सींग उसके पेट में घुसा दिये जिससे उसकी आँतें उसके पेट से बाहर निकल आयीं। फिर भी ट्रौल बहुत बहादुरी से लड़ता रहा।

जब बैल ने ट्रौल का एक सिर मार दिया तो उसके दूसरे सिरों से उस मरे हुए सिर को ज़िन्दगी मिलने लगी। इस तरह वह लड़ाई एक हफ्ता चली क्योंकि जब भी बैल उस ट्रौल के एक सिर को मारता तो उसके दूसरे सिर उसके मरे हुए सिर को जिला देते थे।

उसके सारे सिरों को मारने में उस बैल को पूरा एक हफ्ता लग गया तभी वह उस ट्रौल को मार सका।

अबकी बार तो बैल इतना घायल हो गया था और इतना थक गया था कि वह अपना पैर भी नहीं हिला सका। वह तो राजकुमारी से इतना भी नहीं कह सका कि वह ट्रौल की कमर की पेटी में लगे मरहम के सींग में से मरहम निकाल कर उसके घावों पर लगा दे।

पर राजकुमारी को तो यह मालूम था सो उसने ट्रौल की कमर की पेटी से मरहम का सींग निकाला और उसमें से मरहम निकाल कर बैल के घावों पर लगा दिया। इससे बैल के घावों को काफी आराम मिला और वह धीरे धीरे ठीक होने लगा।

इस बार बैल को आगे जाने के लिये तीन हफ्ते तक आराम करना पड़ा। इतने आराम के बाद भी बैल घोंघे की चाल से ही चल पा रहा था।

बैल ने राजकुमारी को बताया कि इस बार उनको काफी दूर जाना है। उन्होंने कई ऊँची ऊँची पहाड़ियाँ पार कीं, कई घने जंगल पार किये और फिर एक मैदान में आ निकले।

बैल ने राजकुमारी से पूछा — “क्या तुमको यहाँ कुछ दिखायी दे रहा है?”

राजकुमारी ने जवाब दिया — “नहीं, मुझे तो यहाँ कुछ दिखायी नहीं दे रहा सिवाय आसमान के और जंगली मैदान के। ”

वे कुछ और आगे बढ़े तो वह मैदान कुछ और एकसार हो गया और वे कुछ और आगे का देख पाने के लायक हो गये।

बैल ने फिर पूछा — “क्या तुमको अब कुछ दिखायी दे रहा है?”

राजकुमारी बोली — “हाँ अब मुझे दूर एक छोटा सा किला दिखायी दे रहा है। ”

बैल बोला — “अब वह छोटा किला इतना छोटा भी नहीं है राजकुमारी जी। ”

काफी देर तक चलने के बाद वे एक पत्थरों के ढेर के पास आये जहाँ लोहे का एक खम्भा सड़क के आर पार पड़ा हुआ था।

बैल ने फिर पूछा — “क्या तुमको अब कुछ दिखायी दे रहा है?”

राजकुमारी बोली — “हाँ अब मुझे किला साफ साफ दिखायी दे रहा है और अब वह बहुत बड़ा भी है। ”

बैल बोला — “तुमको वहाँ जाना है और तुमको वहीं रहना है। किले के ठीक नीचे एक जगह है जहाँ सूअर रहते हैं तुम वहाँ चली जाना।

वहाँ पहुँचने पर तुमको लकड़ी का एक क्लोक मिलेगा जो लकड़ी के पतले तख्तों से बना हुआ होगा। तुम उसको पहन लेना।

उस क्लोक को पहन कर तुम उस किले में जाना और अपना नाम केटी वुडिनक्लोक बताना और उनसे अपने रहने के लिये जगह माँगना।

पर इससे पहले कि तुम वहाँ जाओ तुम अपना छोटा वाला चाकू लो और मेरा गला काट दो। फिर मेरी खाल निकाल कर लपेट कर पास की एक चट्टान के नीचे छिपा दो।

उस खाल के नीचे वह ताँबे और चाँदी की दोनों पत्तियाँ और सोने का सेब रख देना। और फिर उस चट्टान के सहारे एक डंडी खड़ी कर देना।

उसके बाद जब भी तुम कोई चीज़ चाहो तो उस चट्टान की दीवार पर वह डंडी मार देना। तुमको वह चीज़ मिल जायेगी। ”

पहले तो राजकुमारी ऐसा कुछ भी करने को तैयार नहीं हुई पर जब बैल ने उससे कहा कि उसने जो कुछ भी राजकुमारी के लिये किया उस सबको करने के लिये धन्यवाद देने का यही एक तरीका था तो राजकुमारी के पास यह करने के अलावा और कोई चारा न रहा।

उसने अपना छोटा वाला चाकू निकाला और उससे उस बैल का गला काट दिया। फिर उसने बैल की खाल निकाल कर लपेट कर पास में पड़ी एक चट्टान के नीचे रख दी।

खाल के नीचे उसने वे ताँबे और चाँदी की दोनों पत्तियाँ और सोने का सेब रख दिया। और उसके बाद में उसने उस चट्टान के सहारे एक डंडी खड़ी कर दी।

वहाँ से वह किले के नीचे सूअरों के रहने की जगह गयी जहाँ उसको वह लकड़ी के पतले तख्तों से बना हुआ क्लोक मिल गया। उसने उस क्लोक को पहना और ऊपर किले में आयी। यह सब करते हुए वह बैल को याद कर करके रोती और सुबकती रही।

फिर वह सीधी शाही रसोईघर में गयी और वहाँ जा कर उसने अपना नाम केटी वुडिनक्लोक बताया और रहने के लिये जगह माँगी।

रसोइया बोला कि हाँ उसको वहाँ रहने की जगह मिल सकती थी। रसोईघर के पीछे वाले छोटे कमरे में वह रह सकती थी और उसके बरतन धो सकती थी क्योंकि उसकी बरतन धोने वाली अभी अभी काम छोड़ कर चली गयी थी।

रसोइया बोला — “पर जैसे ही तुम यहाँ रहते रहते थक जाओगी तो तुम यहाँ से चली जाओगी। ”

राजकुमारी बोली — “नहीं, मैं ऐसा नहीं करूँगी। ”

और वह वहाँ रहने लगी। वह बहुत अच्छे से रहती और बरतन भी बहुत ही आसानी से साफ करती रहती।

रविवार के बाद वहाँ कुछ अजीब से मेहमान आये तो केटी ने रसोइये से पूछा कि क्या वह राजकुमार के नहाने का पानी ऊपर ले जा सकती थी।

यह सुन कर वहाँ खड़े सब लोग हँस पड़े और बोले — “पर तुम वहाँ क्या करोगी? तुम्हें क्या लगता है कि क्या राजकुमार तुम्हारी तरफ देखेगा भी? तुम तो बहुत ही डरावनी दिखायी देती हो। ”

पर उसने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी और उनसे पा्रर्थना करती रही और बार बार राजकुमार के लिये नहाने का पानी ले जाने के लिये कहती रही। आखिर उसको वहाँ उसके नहाने का पानी ले जाने की इजाज़त मिल ही गयी।

जब वह ऊपर गयी तो उसके लकड़ी के क्लोक ने आवाज की तो राजकुमार अन्दर से निकल कर आया और उससे पूछा — “तुम कौन हो?”

राजकुमारी बोली — “मैं राजकुमार के लिये नहाने का पानी ले कर आ रही थी। ”

“तुम क्या समझती हो कि इस समय तुम्हारे लाये पानी से मैं कुछ करूँगा?” और यह कर उसने वह पानी राजकुमारी के ऊपर ही फेंक दिया।

वह वहाँ से चली आयी और फिर उसने रसोइये से चर्च जाने की इजाज़त माँगी। चर्च पास में ही था सो उसको वह इजाज़त भी मिल गयी।

पर सबसे पहले वह उस चट्टान के पास गयी और जैसा कि बैल ने उससे कहा था उसने डंडी से चट्टान को मारा। तुरन्त ही उसमें से एक आदमी निकला और उसने पूछा — “तुम्हारी क्या इच्छा है?”

राजकुमारी बोली कि उसने चर्च जाने की और पादरी का भाषण सुनने के लिये छुट्टी ले रखी है पर उसके पास चर्च जाने लायक कपड़े नहीं हैं।

उस आदमी ने एक गाउन निकाला जो ताँबे जैसा चमकदार था। उसने उसको वह दिया और उसके साथ ही उसको एक घोड़ा भी दिया जिस पर उस घोड़े का साज भी सजा था। वह साज भी ताँबे के रंग का था और खूब चमक रहा था।

उसने तुरन्त अपना वह गाउन पहना और घोड़े पर चढ़ कर चर्च चल दी। जब वह चर्च पहुँची तो वह बहुत ही प्यारी और शानदार लग रही थी।

सब लोग उसको देख कर सोच रहे थे कि यह कौन है। उन सबमें से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने उस दिन पादरी का भाषण सुना होगा क्योंकि वे सब उसी को देखते रहे।

वहाँ राजकुमार भी आया था। वह तो उसके प्यार में बिल्कुल पागल सा ही हो गया था। उसकी तो उस लड़की के ऊपर से आँख ही नहीं हट रही थी।

जैसे ही राजकुमारी चर्च से बाहर निकली तो राजकुमार उसके पीछे भागा। राजकुमारी तो दरवाजे से बाहर चली गयी पर उसका एक दस्ताना दरवाजे में अटक गया। राजकुमार ने उसका वह दस्ताना वहाँ से निकाल लिया।

जब वह घोड़े पर चढ़ गयी तो राजकुमार फिर उसके पास गया और उससे पूछा कि वह कहाँ से आयी थी तो केटी बोली — “मैं बैथ से आयी हूँ। ”

और जब राजकुमार ने उसको देने के लिये उसका दस्ताना निकाला तो वह बोली —

रोशनी आगे और अँधेरा पीछे, बादल आओ हवा पर

ताकि यह राजकुमार कभी न देख सके जहाँ मेरा यह अच्छा घोड़ा मेरे साथ जाये

राजकुमार ने वैसा दस्ताना पहले कभी नहीं देखा था। वह उस शानदार लड़की को ढूँढने के लिये चारों तरफ घूमा जो बिना दस्ताने पहने ही वहाँ से घोड़े पर चढ़ कर चली गयी थी। उसने उसे बताया भी था कि वह बैथ से आयी थी पर वहाँ यह कोई नहीं बता सका कि बैथ कहाँ है।

अगले रविवार को किसी को राजकुमार के लिये उसका तौलिया ले कर जाना था। तो केटी ने फिर कहा — “क्या मैं राजकुमार का तौलिया ले कर जा सकती हूँ?”

दूसरे लोग बोले — “तुम्हारे जाने से क्या होगा। तुमको तो पता ही है कि पिछली बार तुम्हारे साथ क्या हुआ था। ”

फिर भी केटी ने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी और उसको राजकुमार का तौलिया ले जाने की इजाज़त मिल गयी। बस वह तौलिया ले कर सीढ़ियों से ऊपर भाग गयी।

इस भागने से उसके लकड़ी के पतले तख्ते का बने क्लोक ने फिर से आवाज की तो राजकुमार फिर से अन्दर से निकल कर आया और जब उसने देखा कि वह तो केटी थी तो उसने उसके हाथ से उस तौलिये को ले कर फाड़ दिया और उसके मुँह पर फेंक दिया।

वह बोला — “तुम यहाँ से चली जाओ ओ बदसूरत ट्रौल। तुम क्या सोचती हो कि मैं वह तौलिया इस्तेमाल करूँगा जिसको तुम्हारी गन्दी उँगलियों ने छू लिया हो?” और उसके बाद वह चर्च चला गया।

जब राजकुमार चर्च चला गया तो केटी ने भी चर्च जाने की छुट्टी माँगी। पर सबने उससे पूछा कि वह चर्च में क्या करने जाना चाहती थी।

उसके पास तो चर्च में पहनने के लिये उस लकड़ी के क्लोक के अलावा और कुछ था ही नहीं। और वह क्लोक भी बहुत ही भद्दा और काला था।

पर केटी बोली कि चर्च का पादरी बहुत ही अच्छा भाषण देता है। और जो कुछ भी उसने पिछले हफ्ते कहा था उसने केटी का काफी भला किया था। इस बात पर उसको चर्च जाने की छुट्टी मिल गयी।

वह फिर से दौड़ी हुई उसी चट्टान के पास गयी और जा कर उसके पास रखी डंडी से उसे मारा। उस चट्टान में से फिर वही आदमी निकला और अबकी बार उसने उसको पिछले गाउन से भी कहीं ज़्यादा अच्छा गाउन दिया।

वह सारा गाउन चाँदी के काम से ढका हुआ था और चाँदी की तरह से ही चमक रहा था। साथ में एक बहुत बढ़िया घोड़ा भी दिया जिसके साज पर चाँदी का काम था। और उसको चाँदी का एक टुकड़ा भी दिया।

उस सबको पहन कर जब वह राजकुमारी चर्च पहुँची तो बहुत सारे लोग चर्च के आँगन में ही खड़े हुए थे। उसको आते देख कर सब फिर सोचने लगे कि यह लड़की कौन हो सकती है।

राजकुमार तो तुरन्त ही वहाँ आ गया कि जब वह उस घोड़े पर से उतरेगी तो वह उसका घोड़ा पकड़ेगा। पर वह तो उस पर से कूद गयी और बोली कि उसका घोड़ा पकड़ने की उसको कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उसका घोड़ा बहुत सधा हुआ था।

वह घोड़ा वहीं खड़ा रहा जहाँ वह उसको छोड़ कर गयी थी। जब वह वहाँ वापस आयी और जब उसने उसे बुलाया तो वह उसके पास आ गया।

सब लोग चर्च के अन्दर चले गये पर पिछली बार की तरह से शायद ही कोई आदमी होगा जिसने उस दिन भी उस पादरी का भाषण सुना होगा क्योंकि उस दिन भी वे सब उसी की तरफ देखते रहे।

और राजकुमार तो उससे पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगा था।

जब पादरी का भाषण खत्म हो गया तो वह चर्च से बाहर चली गयी। वह अपने घोड़े पर बैठने ही वाली थी कि राजकुमार फिर वहाँ आया और उससे पूछा कि वह कहाँ से आयी है।

इस बार उसने जवाब दिया — “मैं टौविललैंड से आयी हूँ। ” यह कह कर उसने अपना कोड़ा गिरा दिया। यह देख कर राजकुमार उसको उठाने के लिये झुका तो इस बीच राजकुमारी ने कहा —

रोशनी आगे और अँधेरा पीछे, बादल आओ हवा पर

ताकि यह राजकुमार कभी न देख सके जहाँ मेरा यह अच्छा घोड़ा मेरे साथ जाये

और वह वहाँ से भाग गयी। राजकुमार यह भी न बता सका कि उसका हुआ क्या। वह फिर से यह जानने के लिये चारों तरफ घूमा फिरा कि टौविललैंड कहाँ है पर कोई उसको यह नहीं बता सका कि वह जगह कहाँ है। इसलिये अब राजकुमार को केवल उसी से काम चलाना था जो उसके पास था।

अगले रविवार को किसी को राजकुमार को कंघा देने के लिये जाना था। केटी ने फिर कहा कि क्या वह राजकुमार को कंघा देने जा सकती है। पर दूसरे लोगों ने फिर से उसका मजाक बनाया और कहा कि उसको पिछले दो रविवारों की घटनाएँ तो याद होंगी ही।

और साथ में उसको डाँटा कि वह किस तरह अपने उस भद्दे काले लकड़ी के क्लोक में राजकुमार के सामने जाने की हिम्मत करती है। पर वह फिर उन लोगों के पीछे पड़ी रही जब तक कि उन लोगों ने उसको हाँ नहीं कर दी।

वह फिर से कंघा ले कर ऊपर दौड़ी गयी। उसके लकड़ी के क्लोक की आवाज सुन कर राजकुमार फिर बाहर निकल कर आया और केटी को फिर से वहाँ देख कर उसने उससे कंघा छीन कर उसके मुँह पर मारा और बिना कुछ कहे सुने वहाँ से चर्च चला गया।

जब राजकुमार चर्च चला गया तो केटी ने भी चर्च जाने की इजाज़त माँगी। उन लोगों ने उससे फिर पूछा कि वहाँ उसका काम ही क्या था – उसमें से बदबू आती थी, वह काली थी, उसके पास वहाँ पहनने के लिये ठीक से कपड़े भी नहीं थे। हो सकता है कि राजकुमार या कोई और उसको वहाँ देख ले तो उसकी वहाँ बदनामी होगी।

पर केटी बोली कि लोगों के पास उसकी तरफ देखने की फुरसत ही कहाँ थी उनके पास तो और बहुत सारे काम थे। और वह उनसे चर्च जाने की इजाज़त माँगती ही रही। आखिर उन्होंने उसको वहाँ जाने की इजाज़त फिर से दे दी।

इस बार भी वही हुआ जो दो बार पहले हो चुका था। वह फिर से दौड़ी हुई उसी चट्टान के पास गयी और जा कर उसके पास रखी डंडी से उसे मारा। उस चट्टान में से फिर वही आदमी निकला और अबकी बार उसने उसको पिछले दोनों गाउन से भी ज़्यादा अच्छा गाउन दिया।

इस बार वह सारा गाउन सुनहरी था और उसमें हीरे जड़े हुए थे। साथ में एक बहुत बढ़िया घोड़ा भी दिया जिसके साज पर सोने का काम था। उसने उसको एक सोने का टुकड़ा भी दिया।

जब राजकुमारी चर्च पहुँची तो वहाँ के आँगन में पादरी और चर्च में आये सारे लोग उसके इन्तजार में खड़े थे।

राजकुमार वहाँ भागता हुआ आया और उसने उसका घोड़ा पकड़ना चाहा पर राजकुमारी पहले की तरह ही उस पर से कूद कर उतर गयी और बोली — “मेरे घोड़े को पकड़ने की जरूरत नहीं है। वह बहुत सधा हुआ है जहाँ मैं इसको खड़े होने को कहती हूँ यह वहीं खड़ा रहता है। ”

फिर सब चर्च के अन्दर चले गये। पादरी भी अपनी जगह चला गया। उस दिन भी किसी ने उसके भाषण का एक शब्द भी नहीं सुना क्योंकि पहले की तरह से सभी लोग केवल उसी लड़की को देखते रहे और सोचते रहे कि वह कहाँ से आती है और कहाँ चली जाती है।

और राजकुमार तो उसको पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगा। उसकी तो कोई इन्द्रिय काम ही नहीं कर रही थी वह तो बस उसको घूरे ही जा रहा था।

जब पादरी का भाषण खत्म हुआ तो राजकुमारी चर्च से बाहर निकली। अबकी बार राजकुमार ने चर्च के बाहर कुछ चिपकने वाली चीज़ डाल दी ताकि वह उसको वहाँ से जाने से रोक सके।

पर राजकुमारी ने उसकी कोई चिन्ता नहीं की और उसने अपना पैर उस चिपकने वाली चीज़ के ठीक बीच में रख दिया और उसके उस पार कूद गयी। पर इस कूदने में उसका एक सुनहरी जूता उस जगह पर चिपक गया।

जैसे ही वह अपने घोड़े पर चढ़ी राजकुमार चर्च में से बाहर आ कर उसके पास आया और उससे पूछा कि वह कहाँ से आयी है। इस बार वह बोली मैं कौम्बलैंड से आयी हूँ।

इस पर राजकुमार उसको उसका सुनहरा जूता देना चाहता था कि राजकुमारी बोली —

रोशनी आगे और अँधेरा पीछे, बादल आओ हवा पर

ताकि यह राजकुमार कभी न देख सके जहाँ मेरा यह अच्छा घोड़ा मेरे साथ जाये

और वह तो राजकुमार की आँखों के सामने सामने गायब हो गयी और राजकुमार उसे ढूँढता रहा पर कोई उसको कोई यह न बता सका कि कौम्बलैंड कहाँ है।

फिर उसने दूसरी तरकीब इस्तेमाल की। उसके पास उसका एक सुनहरी जूता रह गया था सो उसने सब जगह यह घोषणा करवा दी कि वह उसी लड़की से शादी करेगा जिसके पैर में यह सुनहरी जूता आ जायेगा।

बहुत सारी लड़कियाँ बहुत सारी जगहों से उस जूते को पहनने के लिये वहाँ आयीं पर किसी का पैर इतना छोटा नहीं था जिसके पैर में वह जूता आ जाता।

काफी दिनों बाद सोचो ज़रा कौन आया? केटी की सौतेली बहिन और सौतेली माँ। आश्चर्य उस लड़की के पैर में वह जूता आ गया। पर वह तो बहुत ही बदसूरत थी।

पर राजकुमार ने अपनी इच्छा के खिलाफ अपनी जबान रखी। उसने शादी की दावत रखी और वह सौतेली बहिन दुलहिन की तरह सज कर चर्च चली तो चर्च के पास वाले एक पेड़ पर बैठी एक चिड़िया ने गाया —

उसकी एड़ी एक टुकड़ा और उसकी उँगलियों का एक टुकड़ा

केटी वुडिनक्लोक का छोटा जूता खून से भरा है, मैं बस इतना जानती हूँ

यह सुन कर उस लड़की का जूता देखा गया तो उनको पता चला कि वह चिड़िया तो सच ही बोल ही रही थी। जूता निकालते ही उसमें से खून की धार निकल पड़ी।

फिर महल में जितनी भी नौकरानियाँ और लड़कियाँ थीं सभी वहाँ जूता पहन कर देखने के लिये आयीं पर वह जूता किसी के पैर में भी नहीं आया।

जब उस जूते को सबने पहन कर देख लिया तो राजकुमार ने पूछा — “पर वह केटी वुडिनक्लोक कहाँ है?” क्योंकि राजकुमार ने चिड़िया के गाने को ठीक से समझ लिया था कि वह क्या गा रही थी।

वहाँ खड़े लोगों ने कहा — “अरे वह? उसका यहाँ आना ठीक नहीं है। ”

“क्यों?”

“उसकी टाँगें तो घोड़े की टाँगों के जैसी हैं। ”

राजकुमार बोला — “आप लोग सच कहते हैं। मुझे मालूम है पर जब सबने यहाँ इस जूते को पहन कर देखा है तो उसको भी इसे पहन कर देखना चाहिये। ”

उसने दरवाजे के बाहर झाँक कर आवाज लगायी — “केटी। ” और केटी धम धम करती हुई ऊपर आयी। उसका लकड़ी का क्लोक ऐसे शोर मचा रहा था जैसे किसी फौज के घुड़सवार चले आ रहे हों।

वहाँ खड़ी दूसरी नौकरानियों ने उससे हँस कर उसका मजाक बनाते हुए कहा — “जाओ जाओ। तुम भी वह जूता पहन कर देखो और तुम भी राजकुमारी बन जाओ। ”

केटी वहाँ गयी और उसने वह जूता ऐसे पहन लिया जैसे कोई खास बात ही न हो और अपना लकड़ी का क्लोक उतार कर फेंक दिया।

लकड़ी का क्लोक उतारते ही वह वहाँ अपने सुनहरे गाउन में खड़ी थी। उसमें से सुनहरी रोशनी ऐसे निकल रही थी जैसे सूरज की किरनें फूट रही हों। और लो, उसके दूसरे पैर में भी वैसा ही सुनहरा जूता आ गया।

अब राजकुमार उसको पहचान गया कि यह तो वही चर्च वाली लड़की थी। वह तो इतना खुश हुआ कि वह उसकी तरफ दौड़ गया और उसके गले में बाँहें डाल दीं।

तब राजकुमारी ने उसको बताया कि वह भी एक राजा की बेटी थी। दोनों की शादी हो गयी और फिर एक बहुत बड़ी शादी की दावत का इन्तजाम हुआ।

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Germany ki Lok Kathayen-1/ जर्मनी की लोक कथाएँ-1

ग्रिम ब्रदर्स कहानी-स्नो व्हाइट और सात बौने: जर्मनी की लोक-कथा

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सुदूर प्रदेश में एक राजा और रानी राज्य करते थे। रानी बहुत ही दयालु और प्यारी थी और राज्य के सभी लोग उसका आदर करते थे । लेकिन रानी के जीवन में केवल एक दुविधा थी कि उसको संतान की इच्छा थी लेकिन उसके कोई संतान नहीं थी। एक बार रानी सर्दियों के समय खिड़की के पास बैठकर स्वेटर बुन रही थी और उसी समय एक स्नो व्हाइट चिड़िया खिड़की के पास आकर बैठ गई जिससे रानी का ध्यान भटक गया और उसकी उंगली में सुई चुभ गई।

तभी रानी ने एक इच्छा मांगी कि उसको एक बहुत ही खूबसूरत बेटी हो और उसका चेहरा स्नो जैसा हो । वह बहुत सुंदर और परी की तरह खूबसूरत हो।

काफी समय गुजर जाने के बाद रानी को एक बेटी पैदा हुई वह बहुत खूबसूरत थी जैसा उसने इच्छा मांगी थी । वह बहुत सुंदर थी । रानी ने उसका नाम स्नो व्हाइट रखा। राज्य के सभी लोग बहुत खुश थे।

स्नो व्हाइट की एक सौतेली मां थी। उसकी सौतेली मां स्नो व्हाइट को पसंद नहीं करती थी और उसे अपनी खूबसूरती पर भी घमंड था।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां के पास एक जादुई आईना था । जादुई आईने से वह रोज पूछती थी कि इस दुनिया में सबसे ज्यादा खूबसूरत कौन है । इस पर आईना जवाब देता -आपके अलावा भला कौन हो सकता है । इससे रानी बहुत खुश हो जाती। दूसरी तरफ रानी राज्य के निर्णय भी लेने लगी थी जिससे राज्य को बहुत नुकसान होने लगा। राज्य के नुकसान की भरपाई के लिए राजा को राज्य से बाहर जाना पड़ा और वह राजा के बाहर जाने पर अपनी मनमानी करने लगी।

समय बहुत तेजी से बीत रहा था और अब स्नो व्हाइट एक खूबसूरत युवती हो गई थी। जब एक बार स्नो व्हाइट बाग में बने तालाब के किनारे पानी पी रही थी तभी एक राजकुमार को स्नो व्हाइट की छाया दिखाई दी । वह राजकुमार देखता ही रह गया लेकिन उसे पक्षियों के सिवा उधर कुछ नहीं दिखा।

उधर रोज की तरह रानी आज भी आईने के पास पहुंची और उसने आईने से पूछा कि सबसे खूबसूरत कौन है । थोड़ी देर तो आईना हिचकिचाया लेकिन उसने कहा कि स्नो व्हाइट। अब रानी बहुत परेशान हो गई।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां ने उसे अपने पास बुलाया और उससे कहा कि मुझे लगता है कि तुम महल में पड़ी-पड़ी बोर हो रही हो इसलिए तुम्हें जंगल की सैर पर जाना चाहिए इससे तुम्हारा मन बहल जाएगा । और मैं तुम्हारे साथ अपने सबसे जांबाज सुरक्षाकर्मी को भेज रही हूं। रानी ने अपने सुरक्षाकर्मी को जंगल में भेजा और उससे बोला कि स्नो व्हाइट को मारकर सबूत के तौर पर उसका दिल लेकर आना।

रानी का सुरक्षाकर्मी जब स्नो व्हाइट को मारने लगा तो उसे दया आ गई और उसने स्नो व्हाइट को वहां से जाने के लिए बोला । तब स्नो व्हाइट ने उसे कहा कि वह अपना फर्ज पूरा करे। लेकिन सुरक्षाकर्मी ने उसे वहां से जाने दिया। और सबूत के तौर पर वह किसी जानवर का दिल निकाल कर ले गया । उसने वह दिल रानी के सामने पेश किया जिससे रानी बहुत खुश हो गई।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट जंगल मैं इधर उधर भटक रही थी । उसे बहुत डर लग रहा था उसे लगा जैसे कोई पीछे बात कर रहा है जिससे वह डर गई और वहां तेजी से आगे बढ़ने लगी। थोड़ा दूर चलने पर तितलियां उसके चारों ओर मंडराने लगी। तितलियां स्नो व्हाइट का स्कार्फ खींचने लगी और स्नो व्हाइट को लगा जैसे वह तितलियां कहीं जाने के लिए इशारा कर रही हैं। स्नो व्हाइट उन तितलियों के साथ साथ चलने लगी ।

वहां स्नो व्हाइट को एक घर दिखाई दिया । वह उस घर में चली गई । वहां उसने देखा कि एक मेज बिछी हुई है और उस पर 7 प्लेट लगी हुई हैं । और उन में स्वादिष्ट खाना लगा हुआ है ।और वहीं बगल वाले कमरे में सात बिस्तर लगे हुए हैं। स्नो व्हाइट ने जी भर के उन प्लेटो में से खाना खाया । स्नो व्हाइट बहुत थक गई थी इसलिए वह एक बिस्तर पर वहीं सो गई।

वह घर 7 बौनों का था। वो बौने सोने की खुदाई करते थे । जब शाम को बौने घर लौटे तो बौनों ने देखा कि मेज पर प्लेटो में से किसी ने खाना खाया है । जब सातवें बौने ने अपने बिस्तर की तरफ गौर से देखा तो वहां पर एक लड़की एक बिस्तर पर सोए हुई थी। सभी बौने उसके बिस्तर की तरफ बड़े । तब उन्होंने देखा कि वहां एक सुंदर लड़की सोए हुए हैं । बौनों ने उस लड़की को नहीं जगाया और वह वहीं उस लड़की को घेरते हुए सो गए। जब सुबह स्नो व्हाइट नींद से जगी तो बौनों को देखकर वह डर गई।

बौने बोले- हे लड़की तुम्हें हम से डरने की जरूरत नहीं है। बौने स्नो व्हाइट के बारे में पूछा तब स्नो व्हाइट ने अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई। बौने बोले कि तुम यहां रह सकती हो तुम्हें हमारे लिए खाना बनाना होगा, घर की साफ सफाई करनी होगी और हमारे बिस्तर लगाने होंगे। स्नो व्हाइट मान गई।

बौने जब भी शाम को घर वापस आते तो घर को देखकर और अपने लिए खाना बना देखकर खुश हो जाते ।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट की सौतेली माँ ने जब आईने से पूछा कि सबसे सुंदर कौन है तब आईने ने जवाब दिया रानी माफ करें सबसे सुंदर तुम हो लेकिन तुम से भी सुंदर सात बोनो के साथ पहाड़ों पर रहने वाली स्नो व्हाइट है। तब रानी को महसूस हुआ कि स्नो व्हाइट अभी जिंदा है उसने अब स्नो व्हाइट को जान से मारने का प्लान बनाया ।

उसने जादू से बूढ़ी औरत का रूप धारण कर लिया और ताजे सेव में विष डालकर वह पहाड़ों पर स्थित स्नो व्हाइट के पास पहुंची। बौने उस समय सोने की खोज में जा चुके थे।

स्नो व्हाइट घर पर अकेली थी। जब रानी बूढ़ी औरत के वेश में वहां पहुंची और उसने सेब लेने के लिए उस स्नो व्हाइट को बोला । तब स्नो व्हाइट बोली कि मां जी माफ करें मैं दरवाजा नहीं खोल सकती। तब बूढ़ी औरत बोली कि तुम दरवाजा मत खोलो। तुम मुझे एक रोटी का टुकड़ा दे दो । स्नो व्हाइट ने ऐसा ही किया और सेव ले लिए । जैसे ही उसने सेव खाए वह गिर गई और मर गई ।

जब बौने घर पर लेटे तब उन्होंने वहां स्नो् व्हाइट को जमीन पर गिरे देखा। उन्होंने स्नो व्हाइट को उठाया और उसे जगाने की कोशिश की। लेकिन स्नो व्हाइट अब मर चुकी थी तब बौने ने उसके मरने का मातम मनाया और उसे दफनाने के लिए ले जाने लगे। लेकिन तब उन्होंने महसूस किया कि स्नो व्हाइट का चेहरा अभी भी उतना फ्रेश है उसके गाल अभी भी लाल हैं ।वह मरी हुई नहीं लग रही थी। तब उन्होंने सोचा के स्नो व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद किया जाए जिससे उसका शरीर मरने के बाद भी बेदाग बना रहे। उन्होंने ऐसा ही किया और स्नो् व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद कर दिया।

तभी किसी राज्य का राजकुमार शिकार करते हुए वहां पहुंचा तब उन्होंने देखा कि कुछ बौने एक लड़की को घेरे हुए मातम मना रहे हैं। वह राजकुमार स्नो व्हाइट को देखते ही रह गया और उन बौने से स्नो व्हाइट को अपने साथ ले जाने की इच्छा जाहिर की। लेकिन बौने बोले कि यह तो मर चुकी है तुम इसका क्या करोगे । तब राजकुमार बोला कि मैं इसे अपने राज्य में ले जाकर इसके लिए एक सुंदर सा स्मारक बनाऊंगा। क्योंकि मैं इससे प्रेम करने लगा हूं ।यह बहुत सुंदर है ।

जब राजकुमार के सैनिक उसे डोली में उठा कर ले जा रहे थे तभी एक सैनिक को ठोकर लगी और वह गिरने ही वाला था, जिससे स्नो व्हाइट को झटका लगा और उसके मुंह में फंसा हुआ जहरीले सेब का टुकड़ा निकल गया। जिससे स्नो व्हाइट की जान वापस आ गई। स्नो व्हाइट अब जिंदा थी। राजकुमार ने स्नो व्हाइट से शादी करने की इच्छा जाहिर की। लेकिन स्नो व्हाइट बोली कि वह अपने पिता जी का आशीर्वाद पाना चाहती है।

राजकुमार को पता लगा कि रानी जादूगर है और बहुत क्रूर है । तब राजकुमार ने रानी के किले पर हमला करके उसे परास्त कर दिया और रानी राज्य छोड़ कर भाग गई। तब राजकुमार ने स्नो व्हाइट के पिता को गिरफ्त में से बाहर निकाला। राजकुमार और स्नो व्हाइट ने अपने पिताजी का आशीर्वाद लिया और शादी कर ली।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Germany ki Lok Kathayen-2/ जर्मनी की लोक कथाएँ-2

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी-नीली रोशनी: जर्मनी की लोक कथा

ishhoo story

एक सैनिक बहुत साल तक अपने राजा की सेवा करता रहा, पर अन्त में उसे बिना वेतन या इनाम के निकाल दिया गया। अब उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी रोटी कमाने के लिए क्याि करे। वह बड़े उदास मन से घर की तरफ चल दिया। पूरा दिन चलने के बाद शाम को वह एक घने जंगल के पास पहुँचा। अभी कुछ ही दूर गया था कि उसे पेड़ों के बीच से रोशनी चमकती दिखाई दी। उसने अपने थके हुए पैरों को उधर ही बढ़ा दिया। जल्दीक ही उसे एक झोंपड़ी दिखी जिसमें एक बुढ़िया चुड़ैल रहती थी। उस बेचारे ने उसकी खुशामद की कि वह उसे रात को वहाँ ठहर जाने दे और कुछ खाने-पीने के लिए भी दे दे। वह कुछ सुनने को तैयार नहीं थी, पर इस आदमी से पीछा छुड़ाना भी आसान नहीं था। आखिर वह बोली, “चलो, मैं तुम पर दया कर दूँगी, पर बदले में तुम्हें सुबह मेरा पूरा बगीचा खोदना पड़ेगा ।” सैनिक उसकी हर बात मानने को तैयार था, इसलिए उसका मेहमान बन गया।

अगले दिन उसने अपनी बात पूरी की, और बड़ी सफाई से पूरा बगीचा खोद डाला। यह काम करने में उसका पूरा दिन लग गया। शाम को उसे चले जाना था, तब वह बुढ़िया से बोला, “सारा दिन काम करने से मैं बेहद थक गया हूँ, मुझे एक रात और ठहर जाने दो।” पहले तो उसने मना कर दिया, पर फिर इस शर्त पर राजी हुई कि वह अगले दिन एक गाड़ी भरकर लकड़ी काट देगा।

उस दिन भी उसने काम तो पूरा कर दिया, पर करते-करते फिर रात हो गई। इसके अलावा वह इतना थक गया था कि उसने फिर एक रात रुकने की आज्ञा माँगी। अबकी बार बुढ़िया ने उससे यह वचन माँगा कि वह कुएँ में नीचे जलती नीली रोशनी उसे ला देगा।

सुबह होते ही वह उसे कुएँ तक ले गई, उसकी कमर में एक लम्बी रस्सी बाँधी और उसे नीचे उतार दिया । कुएँ में, जैसा कि चुड़ैल ने बताया था, नीली रोशनी थी। उसने रस्सी हिलाकर उसे इशारा दिया कि वह उसे ऊपर खींच ले। पर उसने सैनिक को बस इतना ऊपर खींचा कि वह हाथ बढ़ाकर रोशनी ले सके और बोली, “पहले मुझे रोशनी पकड़ा दो, मैं सँभाल लूँगी।” सैनिक भाँप गया कि इसका इरादा ठीक नहीं है। सच ही वह रोशनी लेकर सैनिक को कुएँ में वापिस धकेलने की सोच रही थी। सैनिक उसके बुरे इरादे को भाँप गया और बोला, “मैं जब तक कुएँ से सही-सलामत बाहर नहीं निकल आऊँगा तब तक तुम्हें रोशनी नहीं दूँगा।” यह सुनते ही वह बहुत नाराज हो गई और उसने उसे रोशनी समेत नीचे फेंक दिया। वह सालों से उस रोशनी को हासिल करना चाहती थी। इधर बेचारा गरीब सैनिक कुछ देर निराश होकर नीचे की गीली मिट्टी पर पड़ा रहा और सोचने लगा कि अब उसका अन्त पास ही है। उसकी जेब में आधा भरा चुरुट था। उसने सोचा “क्यों न इसे पीकर खत्म कर दूँ। दुनिया में अपना आखिरी मजा ले लूँ।” उसने नीली रोशनी से उसे जलाया और पीने लगा।

अचानक धुएँ का बादल उठा और उसके बीच से एक काला बौना आता दिखाई दिया। वह बोला, “सैनिक तुम्हें क्या चाहिए?” उसने जवाब दिया “कुछ नहीं ।” तब बौने ने कहा, “तुम नीली रोशनी के मालिक हो, इसलिए मुझे तुम्हारी हर बात माननी होगी।” उसने कहा, “सबसे पहले मुझे इस कुएँ से बाहर निकालो ।” उसके कहने की देर थी कि बौना उसका हाथ पकड़कर उसे नीली रोशनी समेत ऊपर ले आया। सैनिक फिर बोला, “अब एक दया और करो, उस बुढ़िया को मेरी जगह कुएँ में डाल दो ।” बौने ने यह भी कर दिया। अब उन्होंने उसका खजाना ढूँढ़ना शुरू कर दिया। सैनिक जितना सोना-चाँदी ले जा सकता था, उतना उठाने लगा। फिर बौने ने कहा, “अगर कभी मेरी जरूरत पड़े तो तुम सिर्फ नीली रोशनी से अपना पाइप जलाना और मैं फौरन तुम्हारे पास पहुँच जाऊँगा।”

सैनिक अपनी खुशकिस्मती से बहुत खुश था | वह पहले शहर की सबसे महँगी सराय में गया। उसने कुछ बढ़िया कपड़े बनवाये और अपने लिए एक अच्छा-सा कमरा तैयार करने को कहा। यह सब हो जाने पर उसने बौने को बुलाया और बोला, “राजा ने मुझे एक पैसा भी न देकर भूख-प्यास से मरने को छोड़ दिया था। अब मैं उसे दिखाना चाहता हूँ कि अब मैं मालिक हूँ। आज शाम को राजा की बेटी को यहाँ लाओ, उसे मेरी सेवा करनी होगी ।” बौना बोला, “यह खतरनाक काम है।” पर चला गया। फिर गहरी नींद में सोती राजकुमारी को सैनिक के पास ले आया।

अगले दिन बहुत सुबह वह उसे वापिस छोड़ आया। राजकुमारी अपने पिता को देखते ही कहने लगी, “मैंने पिछली रात एक अजीब-सा सपना देखा; मुझे लगा कि मुझे हवा में उड़ाकर एक सैनिक के घर ले जाया गया। वहाँ मैंने नौकरानी की तरह उसकी सेवा की ।” राजा इस अजीब कहानी के बारे में सोचता रहा। फिर उसने अपनी बेटी से कहा कि वह अपनी जेब में छेद करके मटर भर ले। जो वह कह रही है वह अगर सपना नहीं, सच हुआ तो गली में मटर के दानों के गिरने से यह पता चल जाएगा कि वह किधर गई थी। उसने वैसा ही किया पर बौने ने भी यह बात सुन ली थी। शाम होने पर सैनिक ने फिर से राजकुमारी को लाने के लिए कहा। बौने ने दूसरी गलियों में भी मटर के दाने बिखेर दिए। अब यह जानना मुश्किल हो गया कि कौन-से राजकुमारी की जेब से गिरे । इधर लोग-बाग सारा दिन मटर के दाने बटोरते रहे और साथ ही यह भी सोचते रहे कि इतने सारे दाने कहाँ से आए।

राजकुमारी ने फिर पिता को बताया कि उसके साथ दुबारा वैसा ही हुआ, तब राजा ने कहा, “तुम अपने साथ अपना एक जूता ले जाना और वहाँ छिपा देना जहाँ तुम्हें ले जाया जाएगा।” बौने ने यह भी सुन लिया। जब सैनिक ने फिर से राजकुमारी को लाने को कहा तब बौना बोला, “इस बार मैं तुम्हें नहीं बचा सकता। मुझे लगता है कि इस बार तुम जरूर पकड़े जाओगे, और यह दुर्भाग्य होगा ।” पर सैनिक नहीं माना। तब बौने ने समझाया कि “ध्यान रखना, सुबह जल्दी शहर के दरवाजे से बाहर निकल जाना।” राजकुमारी ने पिता के कहे के अनुसार सैनिक के कमरे में एक जूता छिपा दिया। उसके वापिस पहुँचने के बाद राजा ने पूरे शहर में जूता ढूँढ़ने का आदेश दिया। जूता जहाँ छिपाया गया था, वहाँ मिल गया। सैनिक भागा तो सही पर जल्दी न करने की वजह से पकड़ा गया और जंजीरों से बाँधकर जेल में डाल दिया गया। सबसे बुरी बात यह हुई कि शहर छोड़ने की जल्दी में वह नीली रोशनी, सोना-चाँदी सब अपने कमरे में ही छोड़ गया। अब उसकी जेब में सिर्फ एक अशर्फी थी।

वह उदास खड़ा जेल की जाली के बाहर देख रहा था, तभी उसे अपना एक दोस्त जाता दिखा। उसने उसे पुकारकर कहा, “मेरा एक बण्डल सराय में छूट गया है, अगर तुम ला दोगे तो मैं तुम्हें एक अशर्फी दूँगा।” उसके दोस्त को लगा, इतने से काम के बदले में एक अशर्फी तो काफी है। वह गया और लाकर सैनिक को दे दिया। सैनिक ने फौरन पाइप जलाया, धुआँ उठने के साथ उसका दोस्त वह बौना आ गया। वह बोला, “मालिक डरना मत। बस जब आपकी पेशी होगी तब नीली रोशनी को साथ ले जाना मत भूलना। बाकी हिम्मत रखना, सब कुछ अपनी गति से चलने देना ।” जल्दी ही पेशी हुई, मामले की पूरी छानबीन हुई, कैदी को दोषी पाया गया। जब फैसला सुनाया गया तो उसे फाँसी की सज़ा दी गई।

उसे ले जाया जा रहा था, तब उसने राजा से एक बात की अनुमति माँगी। राजा ने पूछा “क्या चाहिए?” वह बोला, “मुझे रास्ते में एक पाइप पी लेने दो ।” राजा ने कहा, “एक नहीं दो पियो ।” तब उसने नीली रोशनी से अपना पाइप जलाया, पल-भर में बौना उसके सामने खड़ा था। सैनिक ने हुक्म दिया, “इस सारी भीड़ को या तो भगा दो या मार दो। रही राजा की बात, तो उसे तीन टुकड़ों में काट दो।” बौने ने सब काम करना शुरू कर दिया, जल्दी ही भीड़ हटा दी; पर राजा ने दया की भीख माँगी। अपनी जान के बदले में वह सैनिक को अपनी बेटी देने के लिए तैयार हो गया। उसने यह भी मान लिया कि उसके बाद पूरे राजपाट का मालिक वह सैनिक ही होगा।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Germany ki Lok Kathayen-3/ जर्मनी की लोक कथाएँ-3

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी- सुनहरा हंस: जर्मनी की लोक-कथा

एक आदमी के तीन बेटे थे। सबसे छोटे को वे डमलिंग पुकारते थे। पूरा परिवार हर वक्ती उससे चिढ़ता था और उसके साथ दुर्व्यवहार करता था। एक दिन बड़े बेटे के दिमाग में आया कि वह जंगल जाकर ईंधन के लिए लकड़ी काट लाये। उसकी माँ ने उसके लिए बढ़िया ख़ाना और शराब की एक बोतल साथ में दी जिससे वह काम के बीच ताजा हो सके। जब वह जंगल पहुँचा तो एक बूढ़े आदमी ने उसे सुप्रभात कहा, फिर बोला, “मुझे बहुत भूख और प्यास लगी है, क्या तुम अपने खाने में से थोड़ा-सा मुझे दोगे?” उस होशियार युवक ने कहा, “तुम्हें अपना खाना और शराब दूँ? जी नहीं, यह मेरे लिए भी पूरा नहीं होगा ।” और चला गया। उसने पेड़ काटना शुरू किया पर अभी ज्यादा देर काम किया भी नहीं था कि उसका वार चूक गया और उसने खुद को घायल कर लिया। उसे घर लौटना पड़ा ताकि घाव की मरहम-पट्टी करवा सके। ये गड़बड़ी उस बूढ़े आदमी की शैतानी से हुई थी।

अगली बार दूसरा बेटा- काम के लिए निकला, माँ ने उसके साथ भी खाना पानी दिया; उसे भी वह बूढ़ा मिला । फिर उसने खाने-पीने को माँगा । यह लड़का भी अपने को समझदार मानता था, इसलिए बोला, “जो तुम्हें दूँगा वह कम नहीं हो जाएगा? तुम अपने रास्ते जाओ।” छोटे आदमी ने यह ध्यान रखा कि उसे उसका इनाम मिले। लड़के ने अगला वार जो पेड़ पर किया वह उसकी टाँग पर लगा, उसे भी घर लौटना पड़ा।

अब डमलिंग ने पिता से कहा, “पिताजी, मैं भी लकड़ी काटने जाना चाहता हूँ।” उन्होंने जवाब दिया “तुम्हारे भाई तो लँगड़े होकर आ गए, बेहतर होगा कि तुम घर पर रहो क्योंकि तुम इस बारे में कुछ भी नहीं जानते ।” पर वह जिद करता रहा तो पिता ने कहा, “जाओ, चोट खाओगे तो अक्ल आ जाएगी ।” उसकी माँ ने उसे सूखी डबलरोटी और एक खट्टी बीयर दी। तब वह जंगल में गया तो उसे भी बूढ़ा आदमी मिला जिसने इससे खाना-पानी माँगा। डमलिंग बोला, “मेरे पास तो सिर्फ सूखी डबलरोटी और खट्टी बीयर है। अगर यह तुम्हें ठीक लगे तो हम मिलकर खा लेंगे। वे बैठे, जब लड़के ने खाना निकाला तो सूखी डबलरोटी की जगह बढ़िया खाना और खट्टी बीयर की जगह बढ़िया शराब थी। उन्होंने पेट-भर कर खाया। जब ये निकट गए तो बूढ़े ने कहा, “तुम बड़े दयालु हो। तुमने मेरे साथ सब कुछ बाँटा, मैं तुम्हें वरदान देता हूँ। वहाँ एक पुराना पेड़ है। उसे काटो, उसकी जड़ में तुम्हें कुछ मिलेगा ।” फिर उसने लड़के से विदा ली और चला गया।

डमलिंग काम में लग गया। उसने पेड़ काटा, जब पेड़ गिरा तो जड़ के नीचे की खोखली जगह में शुद्ध सोने के पंखों वाला एक हंस मिला। लड़के ने उसे उठा लिया। वह रात बिताने के लिए एक सराय में ठहर गया। सराय के मालिक की तीन बेटियाँ थीं। उन्होंने जब हंस को देखा तो उसे अच्छी तरह देखने जाने को बेचैन हो उठीं। वे उसका एक पंख उखाड़ना चाहती थीं। सबसे बड़ी बोली, “मैं उखाड़ती हूँ।” वह उसके घूमने का इन्तजार करती रही, फिर हंस को उसके पंखों से पकड़ लिया, पर जब हाथ हटाने की कोशिश करने लगी तो ताज्जुब में पड़ गई क्योंकि वह तो जैसे पंखों से चिपक ही गई। तभी दूसरी बहिन आई, वह भी एक पंख लेना चाहती थी, पर जैसे ही उसने अपनी बहिन को छुआ वह उससे चिपक गई। तीसरी आई वह भी पंख लेना चाहती थी, पर दोनों बहनें चिल्लाई, “दूर रहो, भगवान के लिए दूर रहो।” उसकी समझ में ही नहीं आया कि वे दोनों क्या कहना चाह रही हैं। उसने सोचा, “अगर ये दोनों यहाँ हैं तो मैं भी यहीं जाती हूँ और वह उधर ही चली गई, पर बहिनों को छूने की देर थी कि वह भी हंस के साथ वैसे ही चिपक गई जैसे उसकी बहिनें चिपकी थीं। वे सारी रात हंस के साथ रहीं।

अगली सुबह डमलिंग ने हंस को बगल में दबाया और चल दिया। वे तीनों बहिनें हंस के साथ चिपकी थीं पर उसने ध्यान ही नहीं दिया, वह जहाँ जाता, जितनी तेज जाता, उन्हें भी जाना पड़ता था चाहे वे चाहें या नहीं क्योंकि वे चिपकी थीं।

जाते-जाते उन्हें खेत के बीच एक पादरी मिला। उसने जब यह कतार जाती देखी तो लड़कियों से बोला, “तुम्हें मैदान के बीच से एक युवक के पीछे इस तरह भागते हुए शरम नहीं आती? क्या यह ठीक है?” और उसने सबसे छोटी लड़की का हाथ पकड़ा ताकि उसे खींचकर रोक ले, पर वह तो खुद भी चिपक गया। अब कतार में लड़कियों के बाद पादरी भी जुड़ गया। उधर से पादरी का मुंशी निकल रहा था। उसने जब अपने मालिक को तीन लड़कियों के पीछे भागते देखा तो वह ताज्जुब में पड़ गया और चिल्लाकर पूछने लगा, “मालिक, इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं? आज तो किसी के घर नामकरण करने जाना है।” जवाब न मिलने पर उसने दौड़कर पादरी का चोगा पकड़ लिया जिससे उसे रोक ले, पर वह भी चिपक गया। अब ये पाँचों एक-दूसरे से चिपके हुए भागे जा रहे थे। तभी इन्हें काम से लौटते हुए दो मजदूर दिखे जो फावड़े लिये हुए थे। पादरी चिल्लाया, “मुझे छुड़ा दो ।” पर छूने की देर थी कि वे दोनों भी चिपक गए। अब ये सातों डमलिंग और उसके हंस के पीछे दौड़ रहे थे।

आखिर वे एक ऐसे शहर में पहुँचे जहाँ के राजा की केवल एक बेटी थी और वह भी बिल्कुल उदास हो गई थी। कोई उसे हँसा नहीं पा रहा था। यहाँ तक कि राजा ने सब तरफ यह एलान करवा दिया कि जो उसे हँसा पाएगा, उससे उसकी शादी कर दी जाएगी। यह बात सुनकर वह युवक अपने हंस और उसकी कतार के साथ उसके सामने गया। जैसे ही राजकुमारी ने सातों को एक दूसरे से चिपके हुए और एक-दूसरे के पीछे भागते हुए देखा तो वह ऊँची आवाज में हँस पड़ी और देर तक हँसती रही। राजा के वचन के अनुसार डमलिंग और राजकुमारी की शादी हो गई, वह राजा का वारिस बना और बहुत साल तक अपनी पत्नी के साथ खुशी की जिन्दगी जीया।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Germany ki Lok Kathayen-5/ जर्मनी की लोक कथाएँ-5

कहानी-सिंड्रेला: जर्मनी की लोक कथा

एक छोटे से शहर में एक अमीर आदमी रहता था। उसकी पत्नी प्रायः बीमार रहती थी। एक बार वह बहुत बीमार पड़ी तो उसे लगा कि वह अब नहीं बचेगी। उसने अपनी इकलौती बेटी सिंड्रेला को अपने पास बुलाया और प्यार से समझाया, ‘मेरी प्यारी बच्ची, तू सदा ईमानदारी और अच्छे बने रहना। अच्छे और सच्चे आदमी की मदद भगवान् भी करता है। इसलिए ईश्वर सदा तेरे साथ रहेगा। मैं भी स्वर्ग से तेरा ध्यान रखूँगी और जब तुझे जरूरत होगी, मैं तेरे आस-पास ही रहूँगी।’ इतना कहकर उस महिला ने सदा के लिए आँखें मूँद लीं। सिंड्रेला अपनी माँ की मृत्यु पर बहुत रोई, क्योंकि अब रोने के अलावा और कोई चारा उसके पास नहीं था। वह रोज अपनी माँ की कब्र पर जाती, उसपर फूल चढ़ाती और जी भरकर रोती।

ऐसे ही दिन गुजरते गए। सर्दियों में जब उसकी माँ की कब्र बर्फ से ढक गई तब भी वह बच्ची उस जगह पर रोज जाती, कब्र के ऊपर की बर्फ साफ करती, उसपर फूल चढ़ाती और अपनी माँ के लिए आँसू बहाती।

एक साल भी नहीं बीत पाया था कि उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली। उसकी सौतेली माँ की भी दो बेटियाँ थीं। वे दोनों देखने में तो सफेद थीं, पर दिल से बहुत काली थीं। वे दोनों बहनें अपनी सौतेली बहन सिंड्रेला से बहुत चिढ़ती थीं। जब कभी भी मौका मिलता तो सिंड्रेला को खरी-खोटी सुनाने से बाज नहीं आतीं थीं। इस प्रकार घर में सौतेली माँ और सौतेली बहनों के आने से सिंड्रेला का खराब समय शुरू हो गया। दोनों बहनें घर का कुछ भी काम नहीं करती थीं, पर सिंड्रेला को कभी आराम से नहीं बैठने देती थीं। कभी उसे मूर्ख और गँवार कहकर उसका अपमान करतीं, तो कभी कहतीं, ‘जो रोटी खाना चाहेगा तो उसे इसके लिए काम भी करना पड़ेगा।

तू तो रसोई में ही ठीक रह सकती है। जा रसोई में, यहाँ क्यों बैठी है ?’ उन दोनों बहनों ने सिंड्रेला के सारे खिलौने और सुंदर-सुंदर कपड़े भी उससे छीन लिये तथा अपने पुराने तथा भद्दे से कपड़े उसे पहनने के लिए दे दिए और उसके सुंदर से जूतों की जगह उसे लकड़ी के जूते बनवाकर दिए, ताकि जल्दी-जल्दी वह जूते न तोड़े। उसे भद्दे और मैले कपड़ें पहनाकर दोनों सौतेली बहन जी भरकर उसका मजाक बनातीं। अपने पिता से भी अपना दुःख कह नहीं सकती थी, क्योंकि एक तो वह सारा दिन व्यापार में व्यस्त रहता और दूसरे, वह अपनी दूसरी पत्नी के मामले में दखल देना नहीं चाहता था। इसलिए जैसा उसकी सौतेली माँ और बहनें करतीं या कहतीं, वह भी चुपचाप सहन करती रहती। अब रसोई के सारे काम उसे ही करने पड़ते। उसे सुबह-सुबह जल्दी उठा दिया जाता, क्योंकि उसके सोने का स्थान अब उसका रसोईघर ही था। रोज सुबह-सुबह वह पानी भरकर लाती, घर के सभी लोगों के लिए नाश्ता-खाना बनाती, उनके कपड़े धोती और पूरे घर की सफाई करती। इन सब कामों के बाद भी उसकी सौतेली माँ और दोनों बहनें खरी-खोटी सुनाती रहतीं।

जरा सा भी नुकसान होने पर उसे मार भी पड़ती। घर का सारा काम खत्म करने के बाद अगर कुछ समय बचता तो सौतेली माँ उसके आगे अनाज और दालें साफ करने को रख देती। पानी की कमी की वजह से सिंड्रेला रोज-रोज स्नान भी नहीं कर पाती थी। इसलिए गंदे कपड़ों और उलझे हुए बालों से उसकी शक्ल एक नौकरानी जैसी हो गई। उसे देककर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह किसी अमीर बाप की बेटी है।

एक बार उसका पिता एक मेले में जाने के लिए तैयार हुआ तो उसने पहले अपनी दोनों सौतेली बेटियों से पूछा, ‘तुम्हें मेले से क्या मँगाना है ?’ बड़ी लड़की ने कहा, ‘मुझे सुंदर-सुंदर कपड़े चाहिए।’ दूसरी लड़की ने कहा, ‘मुझे मोतियों और बहुमूल्य पत्थरों की मालाएँ चाहिए।’ आखिर में उसने सिंड्रेला से पूछा, ‘तुम मेले से अपने लिए क्या मँगाना चाहती हो ?’ सिंड्रेला बोली,‘पिताजी, मेरे लिए आप चिलगोजे का एक छोटा सा पौधा लाइएगा। जब आप वापस घर आएँगे तो रास्ते में जरूर मिल जाएगा।’

मेले में अमीर आदमी ने अपनी पत्नी और दोनों सौतेली बेटियों के लिए वह सबकुछ खरीदा जो उन्होंने मँगाया था, पर अपनी सिंड्रेला के लिए पौधा उसे मेले में कहीं नहीं मिला। जब वह अपने घर जाने लगा तो रास्ते में उसे चिलगोजे का एक छोटा सा पौधा लगा दिखाई दिया, उसने उसे उखाड़ लिया। वह सोचने लगा कि सिंड्रेला ने कोई भी कीमती चीज न माँगकर चिलगोजे का एक नन्हा सा पौधा ही क्यों माँगा ? पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया। घर पहुँचकर उसने मेले से लाए उपहार तीनों बेटियों के दिए। सिंड्रेला ने वह नन्हा पौधा ले जाकर अपनी माँ की कब्र के पास लगा दिया। पौधा लगाते समय उसे इतना रोना आया कि पौधे की सारी मिट्टी उसके आँसुओं से गीली हो गई।

धीरे-धीरे वह पौधा बड़ा होने लगा। सिंड्रेला हर रोज सुबह-शाम अपनी माँ की कब्र पर जाती, उसके पास अपने सारे दुःख सुनाती और जी भरकर रो लेती। पौधा बड़ा होने लगा। चिलगोजे के उस छोटे से पेड़ पर एक सफेद चिड़िया आकर रहने लगी। जब कभी सिंड्रेला अपनी माँ की कब्र पर अपनी कोई इच्छा प्रकट करती तब वह सफेद चिड़िया उसकी हर इच्छा को पूरा कर देती।

एक बार की बात है। वहाँ के राजा ने अपने राजकुमार की पसंद की लड़की ढूँढ़ने के लिए एक उत्सव आयोजित किया। यह उत्सव तीन दिनों तक चलना था। इस उत्सव में उसने अपने राज्य की सभी सुंदर और अमीर घरों की लड़कियों को निमंत्रण भेजा। सिंड्रेला की दोनों सौतेली बहनें, जो सुंदर भी थीं और अमीर बाप की बेटी भी, इस उत्सव के लिए आमंत्रित थीं। राजमहल से निमंत्रण पाकर दोनों बहनें खुशी से फूली न समाईं। उन्होंने सिंड्रेला को बुलाकर अपनी कंधी करवाई। फिर उससे अपने जूतों पर पालिश करवाई, उसी से उन जूतों के फीते बँधवाए और फिर अच्छी तरह सज-धजकर दोनों बहनें बोलीं, ‘तू घर का सारा काम ठीक ढंग से करना। हम दोनों राजमहल के उत्सव में जा रही हैं।’

उन दोनों के जाने के बाद सिंड्रेला को बहुत रोना आया, क्योंकि वह खुद भी इस उत्सव में जाना चाहती थी, पर उसके पास न ही सुंदर कपड़े थे और न ही सुंदर जूते। उसने अपनी सौतेली माँ से महल में जाने की अनुमति माँगी, तो वह चीखकर बोली, ‘तू भाग्यहीन तो पूरी तरह से चूल्हे की राख से अटी हुई है। राजकुमार के विवाह में जाएगी ? भाग यहाँ से और चुपचाप घर का काम कर। यह उत्सव तेरे लिए नहीं है।’

सिंड्रेला फिर भी अपनी माँ से अनुनय-विनय करती रही तो सौतेली माँ ने तंग आकर दो-तीन दालें मिलाकर उसे साफ करने के लिए बोली, ‘अगर तू ये तीनों दालें दो घंटे में अलग कर देगी, तो मैं तुझे जाने की अनुमति दे सकती हूं।’ सिंड्रेला ने दालों की वह थाली चुपचाप उठाई और बाहर बाग में बैठकर अपनी माँ को याद करके रोने लगी। वह सोचने लगी कि अगर उसकी अपनी माँ आज जिंदा होती तो वह भी इस उत्सव के लिए जरूर जाती। तभी वह सफेद पक्षी उसके पास आया और थोड़ी ही देर में उसने सारी दालें अलग कर दीं। सिंड्रेला की खुशी का ठिकाना न रहा। वह एक घंटे बाद जब तीनों दालें अलग करके अपनी सौतेली माँ के सामने पहुँची, तो सौतेली माँ हैरान रह गई, क्योंकि उसने तो सोचा था कि सारा दिन लगाने पर भी यह लड़की इन दालों को अलग नहीं कर पाएगी। अब भी वह उसे उस उत्सव में जाने नहीं देना चाहती थी। वह बोली, ‘तू इस राजमहल के उत्सव में कैसे जा सकती है ? न तो तू साफ सुथरी है, न ही तेरे पास सुंदर कपड़े और जूते हैं। राजमहल के सारे लोग तेरा मजाक बनाएँगे और इससे तेरे पिता की भी बदनामी होगी।’ इतना कहकर वह अपनी दोनों बेटियों के साथ घोड़ा गाड़ी में बैठकर राजमहल की ओर चल दी। अब घर में उसके सिवाय और कोई नहीं था, वह दौड़कर अपनी माँ की कब्र पर गई और उस चिलगोजे के पेड़ के नीचे बैठकर रोते हुए बोली-

‘ओ प्यारे नन्हे पेड़,

खुद को थोड़ा हिला-डुला

और मुझपर सोना-चाँदी गिरा।’

इतना कहते ही उस नन्हे से पेड़ से उसकी गोदी में सोने-चाँदी से कढ़े कपड़े आ गिरे और साथ ही मखमल की सुंदर सी जूतियाँ भी, जिनपर चाँदी की कढ़ाई की हुई थी। सिंड्रेला उन दोनों चीजों को लेकर घर की ओर दौड़ी और जल्दी से नहा-धोकर उन कपड़ों और जूतियों को पहनकर महल की ओर चल दी। वह भी पैदलवाले छोटे रास्ते से चलकर नाच शुरू होने से पहले राजमहल में पहुँच गई। उसकी सौतेली माँ और सौतेली बहनों की नजर जब उसपर पड़ी तो वे उसे बिलकुल नहीं पहचान पाईं, क्योंकि वह इस समय सोने-चाँदी से कढ़े कपड़े और मखमली जूते पहनकर पूरी तरह राजकुमारी लग रही थी।

नाच शुरू होने के कुछ देर बाद राजकुमार सिंड्रेला के पास आया और उसके साथ नाचने की इच्छा व्यक्त की। वह खुशी से राजकुमार के साथ नाचने लगी। जब राजकुमार बहुत देर तक सिंड्रेला के साथ ही नाच करता रहा तो उस उत्सव में आई अन्य सभी लड़कियों को राजकुमार पर बहुत गुस्सा आया। जब कोई अन्य लड़की राजकुमार के साथ नाचने के लिए उसके पास जाती तो वह कहता, ‘अभी नहीं, बाद में।’ इस तरह राजकुमार सिंड्रेला के साथ नाचता रहा। धीरे-धीरे शाम होने लगी तो सिंड्रेला का दिल घबराने लगा। वह राजकुमार से अपने घर वापस जाने की आज्ञा माँगने लगी, पर राजकुमार उससे इतना प्रभावित था कि उसका साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। वह खुद भी उसके साथ घर जाना चाहता था, क्योंकि वह यह जानना चाहता था कि इतनी सुंदर बेटी किसकी है और कहाँ रहती है ? इधर सिंड्रेला को अपने घर पहुँचने की जल्दी थी, क्योंकि वह अपनी सौतेली माँ और बहनों से पहले घर पहुँचना चाहती थी। वह बहाना बनाकर राजकुमार से हाथ छुड़ाकर चुपचाप महल के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गई। अपनी सौतेली माँ और दोनों बहनों के घर पहुँचने से पहले ही वह अपने पुराने कपड़े पहनकर घर के काम में लग गई। अपने सुंदर से कपड़े उसने उसी पेड़ की नीचे रख दिए। वह सफेद पक्षी उसे वापस ले गया।

दूसरे दिन फिर उसकी सौतेली माँ अपनी दोनों बेटियों को पहले से ज्यादा सजा-धजाकर राजमहल ले गई। उन तीनों के जाने के बाद वह दौड़ी-दौड़ी अपनी माँ की कब्र पर गई और उस पेड़ को हिलाती हुई बोली-

‘ओ मेरे प्यारे नन्हे पेड़,

खुद को थोड़ा हिला-डुला

और मुझ पर सोना-चाँदी गिरा।’

उस पेड़ ने उसपर पहले की तरह सोने-चाँदी की कढ़ाई वाले कपड़े गिरा दिए। आज के कपड़े और जूते पिछले दिन के कपड़ों और जूतों से भी सुंदर थे। उन कपड़ों में वह जैसे ही राजमहल में घुसी, सबकी निगाहें उसी पर टिक गईं। राजकुमार भी उसे ढूँढ़ता हुआ उसके पास पहुँच गया। वह उसका हाथ पकड़कर नाचने वाले हॉल में ले गया और उसीके साथ नाचने लगा। आज भी वह केवल उसके साथ नाचना चाहता था। लड़कियों की भीड़ में उसे केवल यही एक लड़की पसंद आई थी। जैसे ही शाम होनी शुरू हुई, वह घबराने लगी। उसे नाचने में कोई आनंद नहीं आ रहा था। वह अपनी माँ और बहनों से पहले अपने घर पहुँचना चाहती थी। जब उसने घर जाने की इच्छा व्यक्त की तो राजकुमार भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। राजकुमार की नजर बचाकर वह पीछे के दरवाजे से झाड़ियों में गुम हो गई। बेचारा राजकुमार अँधेरे में देख नहीं पाया। राजकुमार महल के पीछेवाले बाग में उस सुंदर लड़की को ढूँढ़ता रह गया और इधर सिंड्रेला ने झट से अपने सुंदर कपड़े उतारकर अपनी माँ की कब्र के पासवाले पेड़ के नीचे रखे और वही मैले-कुचैले कपड़े पहनकर अपने दोनों हाथ और मुँह चूल्हे की राख से ऐसे रँग लिये जैसे लगे कि वह सारा दिन रसोई से बाहर ही नहीं निकली है। उसकी सौतेली माँ जब अपनी दोनों बेटियों के साथ घर पहुँची तो उसे बहुत तसल्ली हुई कि वह सुंदर लड़की सिंड्रेला नहीं थी, जबकि उस लड़की की सूरत उससे बहुत मिलती-जुलती थी।

तीसरे दिन भी जब सौतेली माँ अपनी दोनों बेटियों को लेकर राजमहल के उत्सव के लिए रवाना हुई तो सिंड्रेला दौड़ी-दौड़ी अपनी माँ की कब्र के पास गई और उसने उस पेड़ के नीचे खड़े होकर अपनी पहलेवाला गाना फिर दोहराया तो फिर से उस पेड़ से चमक-धमक वाले सुंदर कपड़े उसके हाथ में आ गिरे और बाद में असली सोने की बनी हुई सैंडिल भी। जल्दी से नहा-धोकर वह सुंदर कपड़े और सोने की सैंडिल पहनकर राजमहल में पहुँची। आज फिर सब उसकी सुंदरता तथा कपड़ों की देखते रह गए। नाच अभी शुरू नहीं हुआ था, क्योंकि राजुकमार अपनी पसंद की सुंदर और सुकोमल लड़की को ढूँढ़ रहा था। जैसे ही सिंड्रेला नाचवाले बड़े हॉल में घुसी तो राजकुमार तेजी से उसके पास आया और उसे अपने साथ नाचने के लिए आमंत्रित किया। अगर कोई और लड़की उसके साथ नाचने की इच्छा व्यक्त करती तो वह यही कह देता, ‘अभी कुछ इंतजार करो। मैं बाद में तुम्हारे साथ नाचूँगा।’

इसी तरह नाच करते-करते शाम होने लगी और सिंड्रेला को घर जाने की जल्दी होने लगी। राजकुमार के सामने उसने बहाना बनाया और तेजी से राजमहल से गायब हो गई। राजकुमार काफी देर तक उस लड़की के वापस आने की प्रतीक्षा करता रहा। बाद में वह महल के पिछली ओर गया, क्योंकि पहले भी वह लड़की पीछे की ओर से निकलकर कहीं गायब हो गई थी। वहाँ पर उसे सोने की एक सैंडिल मिली। उसने झट से उस सैंडिल को उठाकर देखा कि वह खूबसूरत सैंडिल सोने से बुनी हुई थी। राजकुमार ने अपने पिता के सामने शर्त रखी कि वह उसी लड़की से विवाह करेगा, जिसके पैर में सोने की यह सैंडिल ठीक-ठीक आ जाएगी। राजा ने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि राजकुमार उसी लड़की को अपनी पत्नी बनाएगा, जिसके पैर में वह सोने की सैंडिल ठीक आएगी, जो उसे महल के पीछेवाले बाग में मिला था।

राज्य की सभी सुंदर लड़कियों और सिंड्रेला की दोनों सौतेली बहनों ने भी उस सैंडिल को पहनकर देखा, पर वह किसी के पैर में पूरी तरह ठीक नहीं आई। सिंड्रेला की बड़ी सौतेली बहन ने तो रानी बनने के लालच में अपने पैर की अंगुली भी घायल कर ली, पर सैंडिल पहनकर एक कदम भी आगे नहीं चल सकी, क्योंकि वह उसके पैर के लिए बहुत छोटी थी। फिर भी सौतेली माँ ने राजमहल में खबर भेज दी कि उसकी बड़ी बेटी को वह सैंडिल पूरी आ गई है। राजकुमार खुद आकर देख लें। राजकुमार उस अमीर आदमी के घर पहुँचा, जिसकी बेटी के पैरों में सोने की सैंडिल पूरी आई थी। उसने वहाँ जाकर देखा कि लड़की सचमुच ही वह सैंडिल पहने खड़ी है। वह उस लड़की को अपने घोड़े पर बैठाकर अपने महल की ओर चल दिया; पर जैसे ही उसका घोड़ा सिंड्रेला की माँ की कब्र के पास से गुजरा, तभी उसे पेड़ से एक पक्षी की आवाज सुनाई दी-

‘गुटर-गूँ गुटर-गूँ,

इसको लेकर जाता कहाँ तू।

सैंडिल छोटी है इसके पैर में,

तेरी रानी बैठी है घर में।’

राजकुमार ने जब यह गाना सुना तो उसने घोड़ा रोककर उस लड़की के पैर को देखा, तो पाया कि सचमुच ही वह सैंडिल उसके पैर के लिए छोटी थी और इसी वजह से उस लड़की के पैर का अँगूठा और अँगुलियाँ घायल हो गई थीं तथा सैंडिल खून से लाल हो गया था। राजकुमार को उस लड़की की धूर्तता पर बहुत गुस्सा आया। उसने झट से अपना घोड़ा सिंड्रेला के घर की ओर मोड़ दिया। वहाँ पहुँचकर बोला, ‘यह मेरी पत्नी नहीं हो सकती, क्योंकि यह सैंडिल इसके पैर में सही नहीं है। शायद इसकी कोई और बहन होगी, जिसे यह जूता पूरा आता हो।’ सौतेली माँ ने झट से अपनी दूसरी बेटी को बुलाया और उसे वह सैंडिल पहनाकर देखा, पर उसके पाँव की अँगुलियाँ कुछ बड़ी थीं, फिर भी लालची माँ ने उस लड़की को यह सैंडिल जबरदस्ती पहना दी। लड़की बड़ी मुश्किल से चार-पाँच कदम चलकर राजकुमार के पास पहुँची। राजकुमार ने उसे अपने घोड़े पर बैठाया और महल की ओर चल दिया। जैसे ही वह सिंड्रेला की माँ की कब्र के पास पहुँचा तो उसे फिर वही गाना सुनाई दिया। वह घोड़ा रोककर नीचे उतरा तो उसने देखा कि बड़ी बहन की तरह उसके पैर से भी खून निकल रहा था। वह फिर अपने घोड़े को वापस उस लड़की के घर ले गया और उसकी माँ से बोला, ‘यह लड़की भी मेरी रानी नहीं बन सकती, क्योंकि यह सैंडिल इसके पैर के लिए भी छोटी है। क्या तुम्हारी और कोई बेटी है ?’

अमीर आदमी बोला, ‘नहीं, पर मेरी पहली पत्नी की लड़की है, जो अब इस घर में नौकरानी का काम करती है। वह तुम्हारी रानी बनने के लायक नहीं है।’

राजकुमार ने जब उस लड़की से मिलने की इच्छा व्यक्त की तो सौतेली माँ बोली, ‘नहीं-नहीं, तुम उस गंदी लड़की से न ही मिलो तो अच्छा है, वह बहुत गँवार है।’ पर राजकुमार उसी क्षण उसी लड़की से मिलना चाहता था। अतः हारकर सौतेली माँ को राजकुमार के सामने सिंड्रेला को उपस्थित करने के लिए तैयार होना ही पड़ा। सिंड्रेला ने झट से अपने हाथ-पैर और मुँह धोया और साफ कपड़े पहनकर राजकुमार के सामने आकर खडी हो गई। राजकुमर को वह चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा, फिर भी वह चुप रहा। उसने सिंड्रेला को सोने की वह सैंडिल पहनने का हुक्म दिया। सिंड्रेला ने अपनी लकड़ी की सैंडिल उतारकर जब उस सोने की सैंडिल में पैर डाला तो उसके पैर में ऐसी सही आई, जैसे यह सैंडिल उसी के लिए बनाई गई हो। अब राजकुमार को पूरा विश्वास हो गया कि यह वही सुंदर लड़की है जिसने तीन दिनों तक उसके साथ नृत्य किया था। वह उसे पाकर बहुत खुश हुआ। राजकुमार ने उस लड़की को अपने घोड़े पर बैठाया और उसके पिता से बोला, ‘मुझे मेरी पसंद की लड़की मिल गई। यही मेरी असली पत्नी है, क्योंकि तीन दिनों तक मैंने इसी लड़की के साथ नृत्य किया था।’

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Germany ki Lok Kathayen-6/ जर्मनी की लोक कथाएँ-6

कहानी-मेहनत का फल: जर्मनी की लोक कथा

राजकुमारी रोजी की खूबसूरती की हर जगह चर्चा थी । सुनहरी आंखें, तीखे नयन-नक्श, दूध-सी गोरी काया, कमर तक लहराते बाल सभी सुंदरता में चार चांद लगाते थे ।

एक बार की बात है । राजकुमारी रोजी को अचानक खड़े-खड़े चक्कर आ गया और वह बेहोश होकर गिर पड़ी ।

राजवैद्य ने हर प्रकार से रोजी का इलाज किया, पर राजकुमारी रोजी को होश नहीं आ रहा था । राजा अपनी इकलौती बेटी को बहुत चाहते थे ।

उस देश के रजउ नामक ग्राम में विलियम और जॉन नाम के दो भाई रहा करते थे ।

विलियम बहुत मेहनती और चुस्त था और जॉन अव्वल दर्जे का आलसी था । सारा दिन खाली पड़ा बांसुरी बजाया करता था । विलियम पिता के साथ सुबह खेत पर जाता, हल जोतता व अन्य कामों में हाथ बंटाता ।

एक दिन विलियम ने जंगल में तोतों को आदमी की भाषा में बात करते सुना । एक तोता बोला – “यहां के राजा की बेटी अपना होश खो बैठी है, क्या कोई इलाज है ?”

“क्यों नहीं, वह जो उत्तर दिशा में पहाड़ी पर सुनहरे फलों वाला पेड़ है वहां से यदि कोई फल तोड़कर उसका रस राजकुमारी को पिलाए तो राजकुमारी ठीक हो सकती है ।” तोते ने कहा, “पर ढालू पहाड़ी से ऊपर जाना तो बहुत कठिन काम है, उससे फिसलकर तो कोई बच नहीं सकता ।”

विलियम ने घर आकर सारी बात बताई तो जॉन जिद करने लगा कि वह फल मैं लाऊंगा और राजा से हीरे-जवाहरात लेकर आराम की बंसी बजाऊंगा । फिर जॉन अपने घर से चल दिया । मां ने रास्ते के लिए जॉन को खाना व पानी दे दिया ।

जॉन अपनी बांसुरी बजाता पहाड़ी की ओर चल दिया । पहाड़ी की तलहटी में उसे एक बुढ़िया मिली, वह बोली – “मैं बहुत भूखी हूँ । कुछ खाने को दे दो ।”

जॉन बोला – “हट बुढ़िया, मैं जरूरी काम से जा रहा हूं । खाना तुझे दे दूंगा तो मैं क्या खाऊंगा ?” और जॉन आगे चल दिया ।

पर पहाड़ी के ढलान पर पहुचंते ही जॉन का पांव फिसल गया और वह गिरकर मर गया ।

कई दिन इंतजार करने के पश्चात् विलियम घर से चला । उसके लिए भी मां ने खाना व पानी दिया । उसे भी वही बुढ़िया मिली । बुढ़िया के भोजन मांगने पर विलियम ने आधा खाना बुढ़िया को दे दिया और स्वयं आगे बढ़ गया ।

विलियम जब ढलान पर पहुंचा तो उसका पांव भी थोड़ा-थोड़ा फिसल रहा था, वह घास पकड़-पकड़ कर चढ़ रहा था । पर उसे तभी वहां दो तोते दिखाई दिए और उनमें एक-एक तड़पकर उसके आगे गिर गया ।

विलियम को चढ़ते-चढ़ते प्यास भी लग रही थी और उसके पास थोड़ा ही पानी बचा था, फिर भी उसने तोते की चोंच में पानी डाल दिया ।

चोंच पर पानी पड़ते ही तोता उड़ गया और न जाने तभी विलियम का पैर फिसलना रुक गया । विलियम तेजी से ऊपर पहुंचा और सुनहरे पेड़ तक पहुंच गया ।

उसने पेड़ से एक फल तोड़ लिया । फल को तोड़ते ही उसमें जादुई शक्ति आ गई । उसने आंख मुंद ली और जब आंखें खोली तो स्वयं को पहाड़ी से नीचे पाया और उसके सामने वही बुढ़िया खड़ी मुस्करा रही थी ।

वह फल लेकर राजा के महल में पहुंचा और राजा की आज्ञा लेकर उसने फल का रस निकाल कर राजकुमारी के मुंह में डाल दिया ।

रस मुंह में पड़ते ही राजकुमारी ने आंखें खोल दीं । राजकुमारी बोली – “हे राजकुमार, तुम कौन हो ?”

विलियम बोला – “मैं कोई राजकुमार नहीं, एक गरीब किसान हूं ।” इतने में राजा व उसके सिपाही आ गए । राजा बोले – “आज से तुम राजकुमार ही हो वत्स । तुमने रोजी को नई जिन्दगी दी है । बताओ, तुम्हें क्या इनाम दिया जाए ?”

विलियम बोला – “मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, मेरे पास बहुत थोड़ी जमीन है । यदि आप मुझे पांच एकड़ जमीन दिलवा दें तो मैं ज्यादा खेती करके आराम से रह सकूंगा ।”

राजा बोला – “सचमुच तुम मेहनती और ईमानदार हो । तभी तुमने इतना छोटा इनाम मांगा है । हम तुम्हारा विवाह अपनी बेटी रोजी से करके तुम्हारा राजतिलक करना चाहते हैं ।”

विलियम बोला – “पहले मैं अपने माता-पिता की आज्ञा लेना अपना फर्ज समझता हूं ।”

राजा विलियम की मातृ-पितृ भक्ति देखकर गद्गद हो उठा और बोला – “उनसे हम स्वयं ही विवाह की आज्ञा प्राप्त करेंगे । सचमुच तुम्हारे माता-पिता धन्य हैं जो उन्होंने तुम जैसा मेहनती व होनहार पुत्र पाया है ।”

फिर राजा ने विलियम के पिता की आज्ञा से विलियम व रोजी का विवाह कर दिया और उसके पिता को रहने के लिए बड़ा मकान, खेती के लिए जमीन व काफी धन दिया ।

विलियम राजकुमारी के साथ महल में तथा उसके माता-पिता अपने बड़े वैभवशाली मकान में सुखपूर्वक रहने लगे ।

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Japan ki Lok Kathayen-4/ जापान की लोक कथाएँ-4

कहानी-मैले कपड़े: जापानी लोक-कथा

जापान में ओसाका शहर के निकट गांव में एक विद्वान संत रहते थे। एक दिन संत अपने एक अनुयायी के साथ सुबह की सैर कर रहे थे। अचानक एक व्यक्ति उनके निकट आया और उन्हें भला बुरा कहने लगा। संत मुस्कराकर चल दिए। संत पर कोई असर न देख वह व्यक्ति परेशान हो गया। वह गुस्से से तमतमा उठा और उनके पूर्वजों को गालियां देने लगा। फिर भी संत मुस्कराते रहे। संत पर जब कोई असर नहीं हुआ तो वह व्यक्ति निराश होकर रास्ते से हट गया।

उस व्यक्ति के जाते ही एक अनुयायी ने संत से पूछा- ‘आपने उस दुष्ट की बातों का कोई जवाब क्यों नहीं दिया, वह बोलता रहा और आप मुस्कराते रहे। क्या आपको उसकी बातों से जरा भी कष्ट नहीं हुआ?’

संत कुछ नहीं बोले और अपने अनुयायी को पीछे आने का इशारा किया कुछ देर बाद संत के साथ वह अनुयायी कक्ष में पहुंचा। संत बोले- ‘तुम यहीं रुको, मैं अंदर से अभी आता हूं।’

कुछ देर बाद संत अपने कमरे से निकले तो उनके हाथों में कुछ मैले कपड़े थे। उन्होंने बाहर आकर उस अनुयायी से कहा, ‘ये लो, तुम अपने कपड़े उतारकर इन्हें धारण कर लो।’

उस व्यक्ति ने देखा कि उन कपड़ों में बड़ी तेज दुर्गध है, उनसे अजीब-सी बदबू आ रही थी। अनुयायी ने उस कपड़े को हाथ में लेते ही उन कपड़ों को दूर फेंक दिया।

संत बोले- ‘अब समझे ? जब कोई तुमसे बिना मतलब के भला-बुरा कहता है तो तुम क्रोधित होकर उसके फेंके हुए अपशब्द धारण कर लेते हो, लेकिन दूसरे के गंदे कपड़े नहीं पहन सकते जिस तरह तुम अपने साफ-सुथरे कपड़ों की जगह ये मैले कपड़े धारण नहीं कर सकते उसी तरह मैंने भी उस आदमी के फेंके हुए अपशब्दों को धारण नहीं किया। यही वजह थी कि मुझे उसकी बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।’

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Japan ki Lok Kathayen-5/ जापान की लोक कथाएँ-5

कहानी-सम्राट और बूढ़ा आदमी: जापानी लोक कथा

जापान के एक सम्राट के पास बीस सुंदर फूलदानियों का एक दुर्लभ संग्रह था। सम्राट को अपने इस निराले संग्रह पर बड़ा अभिमान था। एक बार सम्राट के एक सरदार से अकस्मात एक फूलदानी टूट गई इससे सम्राट को बहुत गुस्सा आया उसने सरदार को फाँसी का आदेश दे दिया। पर एक बूढ़े ब्यक्ति को इस बात का पता चला वह सम्राट के दरबार में हाजिर हुआ। और बोला, “मै टूटी हुई फूलदानी जोड़ लेता हूँ मै उसे इस तरह जोड़ दूगाँ कि वह पहले जैसी दिखाई देगी।” बूढ़े की बात सुनकर सम्राट बड़ा खुश हुआ। उसने बूढ़े को बची हुई फूलदानियो को दिखाते हुए कहा, “ये कुल उन्नीस फूलदानियाँ है। टूटी हुई फूलदानी इसी समूह की है। अगर तुमने टूटी हुई फूलदानी जोड़ दी तो मैं तुम्हे मुँह माँगा इनाम दूँगा।” सम्राट की बात सुनते हुए बूढ़े ने लाठी उठाई और तड़ातड़ सभी फूलदानियाँ तोड़ दी।

यह देखकर सम्राट गुस्से से आग बबूला हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, “बेवकूफ तूने यह क्या किया। बूढ़े आदमी ने सहजभाव से उत्तर दिया। महाराज मैंने अपना कर्तव्य निभाया है। इनमे से हर फूलदानी के पीछे एक आदमी की जान जानेवाली थी। मगर आप केवल एक आदमी की जान ले सकते हैं। सिर्फ मेरी!”

बूढ़े आदमी की चतुराई और हिम्मत देखकर सम्राट प्रसन्न हो गया। उसने बूढ़े आदमी और अपने सरदार दोनो को माफ कर दिया।

शिक्षा – बुराई से लड़ने के लिए एक ही साहसी व्यक्ति काफी होता है।

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Chinese Lok Kathayen-5/ चीनी लोक कथाएँ-5

कहानी-होंगमन दावत: चीनी लोक कथा

होंगमन प्राचीन काल में छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग के उपनगर में स्थित है, जो आज के पश्चिमोत्तर चीन के शानशी प्रांत की राजधानी शीआन के अधीन लिनथोंग नगर के शिनफ़ंग कस्बे में होंगमनपु गांव में स्थित है। ईसा पूर्व साल 206 में होंगमन दावत का आयोजन किया गया था, जिसमें तत्कालीन छिन राजवंश की विरोधी दो सेनाओं के सेनापतियों श्यांग यु और ल्यू पांग ने भाग लिया। इस दावत का छिन राजवंश के अंत में हुए किसान युद्ध, श्यांग यु और ल्यू पांग के बीच हुए युद्ध पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इस दावत को अप्रत्यक्ष तौर पर श्यांग यु की हार और ल्यू पांग की विजय और बाद में ल्यू पांग के हान राजवंश की स्थापना का मुख्य कारण माना जाता है।

ईसा पूर्व 221 में चीन के प्रथम एकीकृत सामंती राजवंश छिन राजवंश की स्थापना हुई। लेकिन चीन के एकीकरण के बाद छिन राजवंश के सम्राट छिन श हुआंग बेहद तनाशाही, निरंकुश और अहंकार से भरा निकला। अपने सुखभोग के लिए छिन शहुआंग ने बेशुमार धन दौलत खर्च कर आलीशान राजमहल और मकबरा बनवाया और हूणों के आक्रमण को रोकने के लिए लम्बी दीवार का निर्माण करवाया।

छिन राजवंश के शासक प्रजा का बहुत शोषण और अत्याचार करते थे, जिससे प्रजा में उसके विरूद्ध विद्रोह भड़क उठा। इस तरह अपने साम्राज्य की स्थापना के 15 सालों के बाद ही छिन राजवंश का तख्ता पलट दिया गया और राज्य सत्ता छीनने के लिए उसमें मुख्यतः दो शक्तिशाली सेनाएं रह गईं:एक सेना प्राचीन चीन के मशहूर राजा श्यांग यु की थी और दूसरी सेना उपरांत के हान राजवंश के संस्थापक ल्यू पांग की थी।

दोनों सेनाओं के बीच राज्य सत्ता छीनने के लिए भीषण युद्ध चले। शुरू-शुरू में श्यांग यु की सेना बहुत सशक्त थी। राजा श्यांग यु एक बहादुर योद्धा था, लेकिन वह बहुत घमंडी और तानाशाही भी था। जबकि ल्यु पांग शुरू में एक छोटे पद का अधिकारी था। वह स्वभाव में चालाक था, पर दूसरे लोगों को अपने उद्देश्य के लिए वशीभूत करने में कुशल था। पहले छिन राजवंश का तख्ता पलटने के संघर्ष में दोनों सेनाओं के बीच गठबंधन कायम हुआ था, किन्तु छिन राजवंश के खत्म होने के बाद दोनों एक दूसरे का दुश्मन हो गए। श्यांग यू और ल्यू पांग ने एक दूसरे से वादा किया कि जिसकी सेना ने सबसे पहले छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग पर कब्ज़ा करेगी, श्यान यांग का राजा उसी सेना का होगा।

ईसा पूर्व 207 में श्यांग यु की सेना ने च्यु लू नाम के स्थान पर छिन राजवंश की प्रमुख सेना को परास्त कर दिया, जबकि ल्यू पांग की सेना ने भी तत्कालीन छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग पर कब्जा कर लिया। श्यान यांग पर कब्जा करने के बाद ल्यू पांग ने अपने सलाहकार की सलाह के अनुसार शहर के निकट पा शांग, जो आज के पश्चिमोत्तर चीन के शानशी प्रांत की राजधानी शीआन के पूर्व में स्थित है, पर सेना तैनात की और श्यान यांग शहर में प्रवेश नहीं करने दिया। उसने छिन राजवंश के राजमहल और खजाने को सील करने का आदेश दिया और प्रजा को सांत्वना देने का काम किया, जिससे प्रजा शांत और खुश हो गई और चाहती थी कि ल्यू पांग छिन राज्य का राजा बने।

श्यांग यु को जब पता चला कि ल्यू पांग उससे पहले श्यान यांग शहर में प्रवेश कर चुका है, तो उसे अत्यन्त आक्रोश आया। वह चार लाख सैनिकों की विशाल सेना लेकर श्यान यांग शहर के निकट होंगमन नाम के स्थान पर तैनात हो गया और बल प्रयोग से श्यान यांग शहर को छीनने के लिए तैयार हो गया। श्यांग यु के सैन्य सलाहकार फ़ान जंग ने श्यांग यु को इस मौके पर ल्यू पांग का विनाश करने की सलाह दी। उसने कहा कि ल्यू पांग एक लोभी और विलासी आदमी है, लेकिन इस बार श्यान यांग पर कब्जा करने के बाद उसने वहां से एक भी पैसा नहीं लिया और एक सुन्दरी भी नहीं चाही। इससे जाहिर है कि वे अब बड़ा महत्वाकांक्षी बन चुका है। उसके ज्यादा मजबूत न होने की स्थिति में खत्म करना चाहिए।

खबर ल्यू पांग तक पहुंची। उसके सलाहकार फुंग ल्यांग ने ल्यू पांग को सलाह देते हुए कहा कि अब ल्यू पांग की सेना में सिर्फ़ एक लाख सैनिक हैं, उसकी शक्ति श्यांग यु से बहुत कमज़ोर है, इसलिए उसके लिए श्यांग यु से साधा मोर्चा लेना उचित नहीं है।

फुंग ल्यांग ने अपने मित्र, श्यांग यु के ताऊ श्यांग पो से मदद हुवांग। इसके साथ साथ ल्यू पांग अपने सलाहकार फुंग ल्यांग और अपनी सेना में कुछ जनरलों का नेतृत्व कर होंगमन पहुंचे और श्यांग यू को बताया कि वह खुद श्यान यांग शहर की रक्षा कर रहा है और यहां रहकर श्यांग यू के आने के बाद राजा बनने का इंतज़ार कर रहा है। श्यांग यू को ल्यू पांग की बात पर भरोसा किया और होंगमन पर ल्यू पांग को एक दावत देने का निश्चय किया।

लेकिन वास्तव में श्यांग यू ने दावत में ल्यू पांग को मार डालने की साजिश रची । दावत में ल्यू पांग के साथ उसके सलाहकार फुंग ल्यांग और जनरल फ़ान ख्वाई थे। दावत के दौरान ल्यू पांग ने श्यांग यु को विनम्रता से कहा कि छिन राजवंश की राजधानी श्यान यांग पर कब्जा करने के बाद वह महज शहर पर पहरा दे रहा है और श्यांग यु के छिन का राजा बनने की प्रतीक्षा में है। श्यांग यु ल्यू पांग के धोखे में आ गया और उसके साथ अच्छा बर्ताव करने लगा।

दावत के दौरान श्यांग यु के सैन्य सलाहकार फ़ान जंग ने कई बार श्यांग यु को इशारा दे देकर उसे ल्यू पांग को मार डालने का गोपनीय संकेत दिया, लेकिन श्यांग यु ने न देख पाने का स्वांग किया। लाचार होकर फ़ान जंग ने श्यांग यु के एक जनरल श्यांग च्वांग को दावत में बुलाकर तलवार की कला दिखाने की आड़ में ल्यू पांग को मार डालने का प्रबंध किया। इस नाजुक घड़ी में श्यांग यु के ताऊ, यानी ल्यू पांग के सैन्य सलाहकार फुंग ल्यांग के मित्र श्यांग पो ने भी आगे आकर तलवार की कला दिखाने के बहाने अपने शरीर से श्यांग च्वांग के वार को रोकने की कोशिश की, जिससे श्यांग च्वांग को ल्यू पांग को मारने का मौका हाथ नहीं लगा। खतरनाक स्थिति में फुंग ल्यांग ने तुरंत ल्यू पांग के जनरल फ़ान ख्वाई को मदद के लिए बुलाया। फ़ान ने तलवार और ढाल उठाकर दावत में घुस कर बड़े गुस्से में श्यांग यु की आलोचना करते हुए कहा:“ल्यू पांग ने श्यान यांग शहर पर कब्जा कर लिया है, पर उसने खुद को छिन राज्य का राजा घोषित नहीं किया और महाराज आपके आने की राह देखता रहा, इस प्रकार के योगदान के लिए आपने उसे इनाम तो नहीं दिया, फिर दुष्टों की बातों में आकर उसे मार डालने की सोची। यह कैसा न्याय है।”

फ़ान ख्वाई की बातों पर श्यांग यु को बड़ी शर्म आयी। इस मौके का लाभ उठाकर ल्यू पांग शौचालय जाने का बहाना बनाकर वहां से भाग गया और दावत में भागीदार अन्य जनरल के साथ पा शांग स्थित अपनी सेना के शिविर में वापस लौटा।

उधर श्यांग यु के सलाहकार फ़ान जंग ने जब देखा कि श्यांग यु ने इतने दयालु और नरम दिल का परिचय देकर ल्यू पांग को भागने का मौका दिया, तो बड़े गुस्से में कहा:“श्यांग यु कोई महत्वाकांक्षी व्यक्ति नहीं है। इंतजार करो ल्यू पांग जरूर पूरे देश पर कब्जा करेगा।”

होंगमन स्थान पर हुई दावत की यह कहानी चीन के इतिहास में बहुत मशहूर है। श्यांग यु ने अपनी सेना के शक्तिशाली होने के घमंड में ल्यू पांग पर विश्वास किया और उसे जिन्दा भागने दिया। इसके बाद श्यांग यु ने खुद को पश्चिमी छु यानी शी छू का राजा घोषित किया, जिसका स्थान सम्राट के बराबर था। उसने ल्यू पांग को सुदूर क्षेत्र में“हान राजा”नियुक्त किया, जो स्थानीय राजा के तुल्य था। अपनी शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए ल्यू पांग ने श्यांग यु को शासक मान लिया। लेकिन गुप्त रूप में वह विभिन्न प्रतिभाशाली लोगों को अपने पक्ष में लाने और अपनी सैन्य ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रहा था। अंत में ल्यू पांग की सैन्य शक्ति श्यांग यु से भी मजबूत हो गयी। एक बार श्यांग यू अपनी सेना का नेतृत्व कर दूसरे छोटे राज्य पर आक्रमण करने बाहर निकला, तो ल्यू पांग इस मौके का लाभ उठाकर श्यांग यू के शी छू राज्य की राजधानी श्यान यांग पर हमला कर उस पर कब्ज़ा कर लिया। इस तरह श्यांग यू और ल्यू पांग दोनों के बीच चार साल तक युद्ध चला। इसे चीनी इतिहास में“छू हान का युद्ध”कहा जाता है। छू राज्य की सेना ने अधिक शक्तिशाली होने की वजह से कई बार हान राज्य की सेना को हराया। लेकिन श्यांग यू का स्वभाव क्रूर था और इसके नेतृत्व वाली सेना किसी जगह पर कब्जा करने के बाद हत्या और आगजनी करती थी, इस तरह श्यांग यू की सेना का जनता समर्थन नहीं करती थी। धीरे-धीरे श्यांग यू के शी छू राज्य की सेना शक्तिशाली से कमज़ोर हो गयी। उधर ल्यू पांग जनता का समर्थन हासिल करने के लिए प्रयासरत था। वह सुयोग्य व्यक्तियों का इस्तेमाल करने में निपुण था। ल्यू पांग की शक्ति शक्तिशाली होने लगी और अंत में उसने श्यांग यू को हरा दिया।

ईसा पूर्व 202 में ल्यू पांग की सेना ने काइ श्या, यानी आज के पूर्वी चीन के आनहुइ प्रांत की लिंगपी कांउटी के दक्षिण में स्थित जगह, पर श्यांग यु की सेना को घेरकर खत्म कर दिया। वहां श्यांग यु ने आत्महत्या कर ली। अंत में ल्यू पांग ने चीन के हान राजवंश की स्थापना कर खुद को सम्राट घोषित किया। हान राजवंश चीन के इतिहास में दूसरा एकीकृत सामंती राजवंश था।

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Chinese Lok Kathayen-4/ चीनी लोक कथाएँ-4

कहानी-सफेद नागिन: चीनी लोक कथा

पूर्वी चीन के हानचाओ शहर में स्थित पश्चिमी झील अपने असाधारण प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्वविख्यात है। देश विदेश के अनेक कवियों ने इस पर कविताएँ लिखी हैं और अनेक लोककथाओं में इसका वर्णन है। ऐसी ही लोक कथाओं में से एक है सफेद नागिन की कहानी। कहानी इस प्रकार है-

एक सफेद नागिन ने हजार साल तक कड़ी तपस्या कर अंत में मानव का रूप धारण किया| वह एक सुन्दर युवती में बदल गई और उसका नाम हुआ पाईल्यांगची। एक नीली नागिन ने पाँच सौ साल तपस्या की और एक छोटी लड़की के रूप में बदल गयी, नाम पड़ा श्योछिंग। पाईल्यांगची और श्योछिंग दोनों सहेलियों के रूप में पश्चिमी झील की सैर पर आईं, जब दोनों टूटे पुल के पास पहुँचीं तो श्योछिंग ने अलोकिक शक्ति से वर्षा बुलाई, वर्षा में श्युस्यान नाम का एक सुन्दर युवा छाता उठाए झील के किनारे पर आया। वर्षा के समय पाईल्यांगची और श्योछिंग के पास छाता नहीं था, वे काफी बुरी तरह पानी से भीग रही थीं, उन की मदद के लिए श्युस्यान ने अपना छाता उन दोनों को दे दिया और  स्वयं पानी में भीगता खड़ा रहा। ऐसे अच्छे चरित्र वाला युवा पाईल्यांगची को बहुत पसंद आया और श्युस्यान को भी सुंदर युवती पाईल्यांगची के प्रति प्रेम का अनुभव हुआ। श्योछिंग की मदद से दोनों की शादी हुई और उन्होंने झील के किनारे दवा की एक दुकान खोली। श्युस्यान बीमारियों की चिकित्सा जानता था, दोनों पति पत्नी निस्वार्थ रूप से मरीजों का इलाज करते थे और स्थानीय लोगों में वे बहुत लोकप्रिय हो गए।

शहर के पास स्थित चिनशान मठ के धर्माचार्य फाहाई को पाईल्यांगची के पिछले जन्मों का रहस्य मालूम था। उसने गुप्त रूप से श्य़ुस्यान को उसकी पत्नी का रहस्य बताया कि पिछले जन्म में वह सफेद नागिन थी। उसने श्युस्यान को यह भी बताया कि वह पाईल्यांगची का असली रूप कैसे देख सकता है। श्युस्यान को फाहाई की बातों से आशंका हुई।

इसी बीच त्वानवू पर्व आ गया। चीन का यह पर्व प्राचीन काल से ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव पर लोग चावल से बनायी गई मदिरा पीते हैं, वे मानते हैं कि इससे सब विपत्तियों से रक्षा होती है। इस उत्सव के दिन श्युस्यान ने फाहाई द्वारा बताए तरीके से अपनी पत्नी पाईल्यांगची को मदिरा पिलाई। पाईल्यांगची गर्भवर्ती थी, मदिरा उस के लिए हानिकारक थी, लेकिन पति के बार-बार कहने पर उसने मदिरा पी ली। मदिरा पीने के बाद वह सफेद नागिन के रूप में वापस बदल गई, जिससे भय खा कर श्य़ुस्यान की मौत हो गई।

अपने पति को जीवित करने के लिए गर्भवती पाईल्यांगची हजारों मील दूर तीर्थ खुनलुन पर्वत में रामबाण औषधि गलोदर्म की चोरी करने गयी। गलोदर्म की चोरी के समय उस ने जान हथेली पर रख कर वहाँ के रक्षकों से घमासान युद्ध लड़ा, पाईल्यांगची के सच्चे प्रेम से प्रभावित हो कर रक्षकों ने उसे रामबाण औषधि भेंट की। पाईल्य़ांगची ने अपने पति को फिर से जीवित कर दिया, श्युस्यान भी अपनी पत्नी के सच्चे प्यार के वशीभूत हो गया, दोनों में प्रेम पहले से भी ज्यादा गाढ़ा हो गया।

धर्माचार्य फाहाई का मन दुष्टता से फिर भी न भरा। उसने श्युस्यान को धोखा दे कर चिनशान मठ में बंद कर दिया और उसे भिक्षु बनने पर मजबूर किया। इस पर पाईल्यांगची और श्योछिंग को अत्यन्त क्रोध आया, दोनों ने जल जगत के सिपाहियों को ले कर चिनशान मठ पर हमला बोला और श्युस्यान को बचाना चाहा। उन्होंने बाढ़ बुला कर मठ पर धावा करने की कोशिश की लेकिन धर्माचार्य फाहाई ने भी दिव्य शक्ति दिखा कर हमले का मुकाबला किया। क्योंकि पाईल्यांगची गर्भवती थी और बच्चे को जन्म देने वाली थी, इसलिए वह फाहाई से हार गयी और श्योछिंग की सहायता से पीछे हट कर चली गई। वो दोनों फिर पश्चिमी झील के टूटे पुल के पास आईं, इसी वक्त मठ में नजरबंद श्युश्यान मठ के बाहर चली युद्ध की गड़बड़ी से मौका पाकर भाग निकला, वह भी टूटे पुल के पास आ पहुँचा। संकट से बच कर दोनों पति-पत्नी ने चैन की साँस ली। इसी बीच पाईल्यांगची ने एक पुत्र को जन्म दिया। लेकिन बेरहम फाहाई ने पीछा करके पाईल्यांगची को पकड़ा और उसे पश्चिमी झील के किनारे पर खड़े लेफङ पगोडे के तले दबा दिया और यह शाप दिया कि जब तक पश्चिमी झील का पानी नहीं सूख जाता और लेफङ पगोड़ा नहीं गिरता, तब तक पाईल्यांगची बाहर निकल कर जग में नहीं लौट सकती।

वर्षों की कड़ी तपस्या के बाद श्योछिंग को भी सिद्धि प्राप्त हुई, उसकी शक्ति असाधारण बढ़ी, उसने पश्चिमी झील लौट कर धर्माचार्य फाहाई को परास्त कर दिया, पश्चिमी झील का पानी सोख लिया और लेफङ पगोडा गिरा दिया एवं सफेद नागिन, पाईल्यांगची को बचाया। यह लोककथा पश्चिमी झील के कारण सदियों से चीनियों में अमर रही और पश्चिमी झील का सौंदर्य इस सुन्दर कहानी के कारण और प्रसिद्ध हो गया।