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Pakistan ki Lok Kathayen-1/ पाकिस्तानी लोक कथाएँ-1

झोंपड़ी और महल: पाकिस्तानी लोक-कथा

सिंध के सक्खर नामक शहर में एक धनी मनुष्य रहता था। रहने के लिए उसके पास कई बड़े-बड़े महल थे। उसकी सेवा के लिए उसके पास बहुत से नौकर-चाकर थे। उसके पास किसी चीज की कमी नहीं थी। यदि कभी एक महल से दूसरे महल तक जाना होता था तो वह घोड़े पर चढ़कर जाता था।

एक दिन रात के समय वह धनी अपने एक महल के सामने टहल रहा था कि सामने से एक बूढ़ा आता हुआ दिखाई दिया। बूढ़े के कपड़े फटे हुए थे और वह अपने सिर पर भार उठाए हुए था। धनी मनुष्य को देखकर उसने अपना भार धरती पर फेंक दिया और प्रणाम करता हुआ बोला-“श्रीमान्‌ जी! बहुत थक गया हूं।”

“तो ?”

“यदि आप आज्ञा दें तो आपके यहां रात काट लूं?”

“यह हमारा महल है, धर्मशाला नहीं है।”

“मैं केवल आपकी घुड़साल के बाहर पड़ा रहूंगा। पौ फटते ही चला जाऊंगा।”

“परंतु यहां तुम्हारी देख-भाल कौन करेगा?”

“मुझे किसी चीज की आवश्यकता नहीं है।”

“हमें क्या मालूम कि तुम कौन हो। एक मनुष्य हमें रात-भर तुम्हारा पहरा देने के लिए लगाना होगा।”

“क्यों, महाराज?”

“इसलिए कि रात को तुम कोई वस्तु उठाकर न भाग जाओ ।”

“राम-राम!” इतना कहकर बूढ़े ने । अपने कानों को हाथ लगाए और धनी को नमस्कार करने के बाद उसने अपना भार सिर पर उठा लिया और वह वहां से चल दिया।

रात अंधेरी थी। आकाश में बादल छा रहे थे। कभी-कभी कुछ बूंदा-बांदी भी होने लगती थी। आंधी आने का डर था। बूढ़ा बुरी तरह से थक रहा था। उसके हाथ-पैर कांप रहे थे। चलना कठिन था परंतु धनी मनुष्य के कटु शब्दों ने उसे ऐसा व्यथित किया था कि उसने अब सक्खर नगर के किसी भी शहरी के पास जाकर विश्राम करने का विचार छोड़ दिया। वर्षा जोरों से आ गई। जिस तरह रात का अंधकार बढ़ता जा रहा था उसी तरह बूढ़ा भी अपना भार उठाये हुए आगे ही चला जा रहा था।

कुछ दिनों के बाद वह सिंधी अमीर अपने मित्रों और सेवकों के साथ शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। शिकार खेलते समय उसने अपना घोड़ा एक हिरण के पीछे लगा दिया। बहुत यत्न करने पर भी वह शिकार उसके हाथ नहीं आया। इस दौड़-धूप में वह अपने साथियों से बिछुड़ गया। घने जंगल में घुस जाने पर वह अपने नगर का मार्ग भी भूल गया और घंटों तक जंगल में भटकता रहा। इतने में रात हो गई। आंधी चलने लगी। बादल छा गए। कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो सिंधी अमीर की कुछ भी सहायता करता। बेचारा थककर चूर-चूर हो गया। जब उसे कोई मार्ग नहीं सूझा तो अपने घोड़े की पीठ से नीचे उतरकर वह एक वृक्ष के नीचे बैठ गया।

आंधी इतने जोरों से बढ़ने लगी कि जंगल के वृक्ष टूट-टूटकर गिरने लगे। तूफान के कारण अंधेरा बढ़ने लगा। हाथ को हाथ सुझाई नहीं देता था। प्रकृति के इस प्रकोप से घबराकर घोड़ा अपने बचाव के लिए इधर-उधर भागने लगा। घोड़े का मालिक इतना थका हुआ था कि उसे कोई होश ही नहीं था।

थोड़ी देर के बाद आंधी शांत हो गई। थोड़ी-थोड़ी वर्षा होने से चारों ओर की फैली हुई धूल बैठ गई। आकाश कुछ-कुछ साफ हो गया। सूर्य अभी छिपा नहीं था। उसकी धीमी-धीमी किरणों के प्रकाश में सिंधी अमीर ने देखा कि उसका घोड़ा भी उससे जुदा हो गया था। वह घोड़ा उसने दो हजार रुपए में खरीदा था और बहुत चाव से पाला था। अब तो उस अमीर को घर पहुंचने की कोई आशा ही नहीं थी।

कहते हैं कि सवेरा होने के आस-पास रात का अंधकार बहुत बढ़ जाता है। इसी तरह आशा और सुख की किरणों के पहुंचने से पहले निराशा और दुःख का अंधेरा भी बहुत अधिक होता है। बहुत अधिक दुःखी और निराश हो जाने पर उस सिंधी अमीर को दूर से एक व्यक्ति आता हुआ दिखाई दिया। पहले तो वह डर गया कि कहीं कोई चोर या डाकू न हो, परंतु जब उस व्यक्ति ने पास आकर नमस्कार करते हुए अपने होंठों की मुस्कान से धनी मनुष्य के हृदय को शांत कर दिया तो निराश सिंधी को आशा का प्रकाश दिखाई देने लगा। हंसते हुए उस व्यक्ति ने अमीर से पूछा-“आप इतनी घबराहट में क्यों हैं?”

“साथियों के बिछुड़नें से, राह भटकने से और किसी सहायक के न मिलने से ।” ऐसा कहते-कहते अमीर ने अपनी सारी कथा सुना दी।

निस्सहाय अमीर की करुणाजनक कहानी सुनकर उस व्यक्ति को उस पर दया आ गई। वह उसे अपनी झोंपड़ी में ले गया। वहां जाकर वह बोला-”यहां मैं अपने बूढ़े पिता के साथ रहता हूं। जो रूखा-सूखा भोजन हम खाते हैं वह आप भी खायें, और फिर विश्राम करें।”

“परंतु मेरे घोड़े का क्या होगा?” अमीर ने घबराते हुए पूछा।

“सुबह होने से पहले ही मैं आपके घोड़े को भी ढूंढ लाऊंगा।” वह व्यक्ति बोला।

“कैसे ?”

“मैं इस जंगल के कोने-कोने से परिचित हूं।”

“तो क्याज तुम मेरे साथियों को भी ढूंढ सकोगे?”

“यदि वे इस जंगल में हुए तो मैं उन्हें अवश्य ढूंढ निकालूंगा ।”

इस उत्तर से सिंधी अमीर को बहुत संतोष हुआ। अब वह निश्चित होकर लेट गया। अभी वह सोया नहीं था कि उस व्यक्ति ने अमीर के सामने दूध का कटोरा लाकर रख दिया।

“यह क्या है, महाशय?”’ अमीर ने पूछा।

उत्तर मिला, “हमारी बकरी का दूध ।”

“तुम्हारे पास कितनी बकरियां हैं?

“केवल एक ।”

“क्या एक बकरी इतना अधिक दूध दे सकती है?”

“यह एक सेर से अधिक नहीं होगा ।”

“तुम भी पियो।”

“पिताजी ने कहा है कि आज का दूध केवल अतिथि-सेवा में ही लगाया जा सकता है। आज हम लोग दूध नहीं पियेंगे।”

“क्यों ?”

“हमारे यहां सबसे बढ़िया चीज दूध और पूत को समझा जाता है। अतिथि की सेवा में हम लोग इन दोनों वस्तुओं को पेश कर देते हैं। मैं पिताजी का इकलौता पुत्र हूं, और दूध हमारे यहां सर्वोत्तम भोजन समझा जाता है। पिताजी ने ये दोनों वस्तुएं आपकी सेवा में भेज दी हैं।”

“तुम सचमुच देवता हो ।”

“नहीं साहब! देवता तो बहुत दूर की चीज है, हम तो पूरी तरह मानवता को भी नहीं अपना सके ।”

“नहीं भैया! मानवता तो आप लोगों में कूट-कूटकर भरी हुई है।”

इस तरह बातें करते-करते सिंधी अमीर सो गया।

अपने अतिथि की सच्ची सेवा करने वाला वह व्यक्ति चुपके से उठा और हाथ में मशाल लेकर अपने अतिथि का घोड़ा ढूंढ़ने के लिए चल दिया।

पौ फटने के समय के आस-पास वह अपने अतिथि का घोड़ा लेकर अपनी झोंपड़ी पर लौटा। उसकी माता ने जब देखा कि अतिथि का घोड़ा मिल गया है तो वह उठकर घोड़े के लिए दाना दलने लगी। वह जानती थी कि घोड़ा जंगल में घास चरकर आया होगा परंतु फिर भी उसने अतिथि के थोड़े की सेवा करना अपना कर्त्तव्य समझा।

घोड़े को यदि दाना न मिलता तो शायद अतिथि-सेवा अधूरी समझी जाती।

प्रातःकाल जब सिंधी अमीर सोकर उठा तो उसने देखा कि उसका घोड़ा दाना खा रहा था और अतिथि-सेवक किसान उसके सामने हाथ जोड़े हुए कह रहा था- “आज ईश्वर ने हमारी लाज रख ली।”

“कैसे ?” अमीर ने पूछा।

“आपका घोड़ा सकुशल मिल गया। यदि वह सामने की ओर निकल गया होता तो शायद बाघ उसे अपना शिकार बना लेता।”

यह सुनकर अमीर ने उस व्यक्ति को बड़ा धन्यवाद दिया। इसी समय उस व्यक्ति की वृद्ध माता ने अतिथि के लिए दूध का एक कटोरा भरकर भेज दिया।

दूध पी लेने के बाद अमीर ने घर लौटने की इच्छा प्रकट करते हुए कहा-“मैं तुम्हारे पिता से मिलना चाहता हूं।”

नवयुवक अपने पिता को बुलाने गया और कहने लगा-“पिताजी, अतिथि महाशय आपको याद कर रहे हैं।”

“किसलिए?” पिता ने पूछा।

“वे जाना चाहते हैं।”

“उनसे कहो कुछ दिन और ठहरें।”

“मैंने कहा था परंतु वे मानते नहीं।”

“अच्छा तो उन्हें सक्खर शहर तक छोड़ आओ।”

“जाने से पहले वे आपके दर्शन करना चाहते हैं।”

“बेटा! अच्छा तो यही होगा कि मैं उनसे न मिलूं।”

पिता की यह बात सुनकर पुत्र को कुछ आश्चर्य हुआ। उसने अपने पिता के सामने मुख से कभी ‘क्यों’ का शब्द नहीं बोला था। अतः वह पिता को इस प्रकार देखने लगा मानो उसकी आंखों में ‘क्यों’ का शब्द लिखा हो। वृद्ध पिता ने पुत्र के इस प्रश्न को पढ़ लिया और उसे धीरे से समझाते हुए बोला-“तुम शायद यही पूछना चाहते हो कि मैं अतिथि से इस प्रकार दूर रहकर उसका निरादर क्यों  कर रहा हूं। असल में मेरी इस बात में भी अतिथि-सत्कार का भाव भरा हुआ है।”

“मैं इस अनादर में आदर की भावना को समझ नहीं सका, पिताजी!”

“समझाऊं भी कैसे?”

“ऐसी कौन-सी कठिन बात है जो मुझे न समझा सकें।”

“यूं ही एक व्यर्थ-सी घटना है जिसे मैं बताना नहीं चाहता।”

“अच्छा तो मैं अतिथि महोदय से आपके बारे में क्या कहूं?”

“यही कि पिताजी बूढ़े भी हैं और रोगी भी। वे चल-फिर नहीं सकते। अतः उनका बाहर आना कठिन है।”

पुत्र ने अपने पिता का संदेश सिंधी अमीर तक पहुंचा दिया। यह बात सुनकर अमीर बोला-“इस पवित्र स्थान पर आकर मैं ऐसे महात्मा को देखे बिना कैसे जाऊं जिसके घर में भूले-भटकों को मार्ग दिखाया जाता है, जहां अतिथि की सेवा जी-जान से की जाती है, जहां अपरिचित अतिथि के घोड़े को ढूंढने के लिए घरवाले अपनी जान संकट में डाल सकते हैं, और जहां गृहिणी अपना खान-पान उठाकर अतिथि के घोड़े का पेट भरने के लिए तैयार रहती है। तुम्हारे पिता को देखकर ही मेरा जीवन सफल हो सकता है।”

पुत्र ने अतिथि का संदेश पिता से कह सुनाया। अब वृद्ध क्या करता! उसे अतिथि के सामने आना ही पड़ा।

सिंधी अमीर ने जब उसे देखा तो उसी समय पहचान गया कि यह तो वही बूढ़ा है जो कुछ दिन हुए सक्खर में उसके महलों के सामने बोझ उठाए हुए आया था। एक रात के लिए वह आश्रय मांगता था। अमीर ने उसे चोर तक कह दिया था। कितनी दानवता थी उस दुर्व्यवहार में! इस वृद्ध के पुत्र ने अपनी मानवता का परिचय देकर सिंधी अमीर के हृदय को बिलकुल ही बदल दिया। सिंधी अमीर हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और अपने दुर्व्यवहार के लिए क्षमा-याचना करने लगा।

वृद्ध ने कहा-“आपकी ओर से क्षमा-याचना का प्रश्न पैदा ही नहीं होता, क्योंकि मैं बाहर आकर आपको उस पुरानी घटना की याद दिलाना नहीं चाहता था। आपके आग्रह को मैं टाल भी नहीं सका। इसीलिए मुझे यहां आना पड़ा। इससे शायद आपको दुःख हुआ हो। अतः मुझे आपसे क्षमा मांगनी चाहिए ।”

“कितना ऊंचा है आपका व्यक्तित्व!” यह कहकर सिंधी अमीर वृद्ध के चरणों में गिर पड़ा। उसके नेत्रों से पश्चाताप के आंसू गिर रहे थे। उसके होंठ फड़फड़ा रहे थे, मानो वह यही कह रहा हो-“इस बूढ़े की झोपड़ी महलों से बहुत ऊंची है क्योंकि यहां मानवता का निवास है।”

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Turkey ki Lok Kathayen-1/ तुर्की लोक कथाएँ-1

धूप निकले, बारिश हो: तुर्किस्तान/टर्की की लोक-कथा

एक गांव में हैदर नाम का एक व्यापारी रहता था । गांव में उसकी परचून की दुकान थी । दुकान खूब अच्छी चलती थी क्योंकि परचून की गांव में वह एकमात्र दुकान थी ।

हैदर की सुंदर और गुणी दो बेटियां थीं । नाम था अलीजा और सोरा । दोनों बहनों में खूब प्यार था । वे दोनों अपने पिता का खूब खयाल रखती थीं । तरह-तरह के पकवान बनाकर पिता को खिलाती थीं । मां को भी घर के हर काम में मदद करती थीं । दोनों एक दूसरे से हरदम हंसी-मजाक करती रहती थीं । वे दोनों साथ भोजन करतीं व सोती थीं, दोनों का एक दूसरे के बिना मन न लगता था । यदि एक बीमार हो जाती तो दूसरी बहुत उदास रहती और दिन-रात अपनी बहन की तीमारदारी करती रहती ।

हैदर को कभी-कभी एक बेटा न होने का दुख होता था, परंतु अपनी प्यारी बेटियों को देखकर वह सब कुछ भूल जाता था । दोनों बेटियां धीरे-धीरे सयानी हो रही थीं । हैदर अपनी बेटियों की शादी जल्दी ही कर देना चाहता था ।

एक दिन हैदर की पत्नी ने कहा – “हमारी बड़ी बेटी अलीजा विवाह योग्य हो गई है, हमें जल्दी ही उसके लिए वर तलाश करके उसका विवाह कर देना चाहिए ।”

हैदर बोला – “मेरी भी इच्छा है कि अलीजा का विवाह खूब धूमधाम से करूं । मैं सोचता हूं कि उसके लिए किसी व्यापारी का बेटा ही ठीक रहेगा ।”

पत्नी बोली – “नहीं-नहीं, किसी व्यापारी के बेटे से अलीजा का विवाह करोगे तो वह भी तुम्हारी तरह दिन-रात काम में लगा रहेगा । मैं चाहती हूं कि अलीजा का विवाह किसी जमींदार के पुत्र से हो ।”

“हां, तुम ठीक कहती हो । मैं पास के गांव के जमींदार को जानता हूं । पर पता नहीं उनका कोई बेटा विवाह योग्य है भी या नहीं ।”

इसके पश्चात हैदर ने गांव के पंडित को जमींदार गेदाना के परिवार व पुत्र की जानकारी लेने के लिए पड़ोस के गांव में भेज दिया । पंडित जमींदार के घर पहुंचा तो यह जानकर बहुत खुश हुआ कि जमींदार का इकलौता पुत्र विवाह योग्य था । पंडित बहुत ज्ञानी होने के साथ-साथ अनुभवी भी था । उसने तुरंत हैदर की बेटी के विवाह का प्रस्ताव जमींदार गेदाना के आगे रख दिया । साथ ही अलीजा के रूप-गुण की खूब प्रशंसा की ।

कुछ ही दिनों में अलीजा का विवाह गेदाना के बेटे समर से हो गया । सोरा अकेली रह गई । वह अब ज्यादा हंसती-बोलती नहीं थी, अक्सर उदास होकर अपनी बहन अलीजा को याद करती रहती थी । अलीजा अपनी ससुराल में बहुत सुख से रहने लगी । उसके पति व ससुर के पास बहुत बड़े खेत थे, जहां हर मौसम की फसल उगाई जाती थी । अलीजा जब भी पिता के घर आती, अपने पिता व ससुराल की प्रशंसा करते न थकती थी ।

एक दिन अलीजा ने अपने पिता से कहा – “पिता जी, मेरा विचार है कि अब आपको सोरा का विवाह करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाना चाहिए । सोरा यूं भी अकेली रहने के कारण उदास रहने लगी है । उसको ससुराल में नए लोग मिलेंगे तो मुझे भूल जाएगी । वरना यूं ही सूख कर कांटा हो जाएगी ।”

पिता को अलीजा की बात जंच गई और उसने सोरा की मां से कहा – “तुम सोरा के लिए बुआ से जिक्र करना, हो सकता है कि उनकी जानकारी में सोरा के लायक कोई वर हो । वैसे भी तुम्हारी बुआ जग-बुआ है । वह मोहल्ले-गांव की खूब खोज-खबर रखती है ।”

हैदर की पत्नी बोली – “बुआ तो परसों ही एक लड़का बता रही थी । मैंने ही मना कर दिया कि हमें अभी सोरा का ब्याह नहीं करना है । उसके जाने से हमारा घर बिल्कुल सूना हो जाएगा ।”

हैदर बोला – “वह तो ठीक है, पर यदि अच्छा लड़का मिल रहा हो तो सोरा का विवाह करना ही ठीक रहेगा ।”

बस एक घर में सोरा की बात चलाई गई । बात बन गई और सोरा का विवाह हो गया । सोरा के पति के यहां मिट्टी के बर्तनों का व्यापार होता था । सोरा के ससुर गांव के बड़े कुम्हार थे । आस-पास के सभी गांव-मोहल्ले में उनके यहां के बने बर्तन ही प्रयोग में लाए जाते थे ।

सोरा अपनी ससुराल में जाकर सुखी थी । अत: वह नए माहौल में शीघ्र ही मस्त हो गई । एक वर्ष बीत गया तब हैदर ने सोचा कि दोनों बेटियों को देखे बहुत दिन हो गए । अत: दोनों को एक साथ बुला लिया जाए । दोनों बहनें एक दूसरे से मिलकर बहुत खुश होंगी ।

अलीजा और सोरा अपने पिता के घर हंसी-खुशी पहुंचीं । दोनों एक-दूसरे से प्यार से गले मिलीं और अपनी-अपनी बातें करने लगीं ।

अगले दिन की बात है । हैदर ने सुना कि कमरे के अंदर अलीजा और सोरा की आपस में बहस करने की आवाज आ रही है । वह ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगा । उसे उत्सुकता थी कि सदा हिल-मिल कर रहने वाली बहनें किस बात पर झगड़ रही हैं । हैदर ने सुना, अलीजा कह रही थी – “इस बार तो हम बहुत परेशान हैं । ईश्वर ने इस बार बहुत सूखा डाल दिया है, अकाल पड़ने की नौबत आ गई है । हम तो दिन-रात यही प्रार्थना कर रहे हैं कि खूब बारिश हो ।”

सोरा बोली – “खूब बारिश की प्रार्थना क्यों करती हो ? थोड़ी-सी बारिश की प्रार्थना क्यों नहीं करतीं ? तुम क्यों मेरा बुरा चाहती हो ?”

“मैं तेरा बुरा क्यों चाहने लगी” सोरा बोली – “मैं तो यही प्रार्थना करती हूं कि खूब बारिश हो । ईश्वर करे, इतनी बारिश की झड़ी लगे कि एक दिन भी धूप न निकले ।”

सोरा बोली – “दीदी, तुम बहुत बुरी हो । मेरा बुरा चाहती हो तभी ऐसी प्रार्थना करती हो । मैं तो ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि रोज खूब तेज धूप निकले ताकि हमारे बर्तन-भांडे प्रतिदिन सूख जाएं । एक दिन भी बारिश हो जाए तो हमारे उस दिन के बर्तन गीले रह जाते हैं फिर अगले दिन हमारे यहां काम नहीं हो पाता ।

हैदर हैरान था कि दोनों बहनें अपनी-अपनी दलीलें देकर एक-दूसरे के विपरीत ईश्वर से प्रार्थना कर रही थीं । वह यह देखकर दुखी हो गया कि जो बहनें एक दूसरे पर जान छिड़कती थीं, आज अपने-अपने लाभ के लिए प्रार्थना कर रही थीं । वह यह सोच रहा था कि उसने क्यों अपनी दोनों बेटियों का ऐसे विपरीत व्यवसाय वाले घरों में विवाह किया, एक ही चीज एक के लिए खुशी और दूसरे के लिए गम देने वाली थी ।

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Turkey ki Lok Kathayen-2/ तुर्की लोक कथाएँ-2

मनमौजी डुमरुल: तुर्किस्तान/टर्की की लोक-कथा

ओगुज़ क़बीले में एक शख्स हुआ, जो मनमौजी डुमरुल के नाम से जाना जाता था। वह दूहा कोजा का बेटा था। डुमरुल ने एक सूखी नदी पर पुल बनवा दिया था। जो भी उस पुल से नदी पार करता था, उससे वह ताँबे के तैंतीस सिक्के वसूलता था। जो पुल से नदी पार करने से इनकार करते थे, डुमरुल उनकी पिटाई करके उनसे ज़बरदस्ती चालीस सिक्के ले लेता था। ऐसा मनमौजी डुमरुल उन लोगों को चुनौती देने के लिए करता था, जो यह समझते थे कि वे उससे भी ज़्यादा बहादुर हैं। डुमरुल चाहता था कि सब लोग – यहाँ तक कि अनातोलिया और सीरिया जैसे सुदूर स्थानों के लोग भी – यह कबूल करें कि वह निडर, वीर, और साहसी है।

एक दिन, कुछ लोगों ने डुमरुल के पुल के पास डेरा डाला। उनमें से एक शानदार, खूबसूरत जवान बीमार पड़ गया और अल्लाह के हुक्म से मर गया। जब वह जवान मर गया, तो कुछ लोग “बेटा”कहकर और कुछ लोग “भाई” कहकर मातम करने लगे और बहुत रोना-धोना मच गया।

मनमौजी डुमरुल फ़ौरन वहाँ आ पहुँचा और उसने लोगों से पूछा:

“क्यों रोना-धोना है, दोस्तो?” क्यों है यह शोर मेरे पुल पर? किसका है मातम तुम लोगों को?”

उन्होंने कहा: “जनाब, हमने एक अच्छा जवान आदमी खो दिया है, इसीलिए हम रो रहे हैं।”

मनमौजी डुमरुल ने पूछा: “वह कौन है जिसने तुम्हारे दोस्त की जान ली?”

उन्होंने जवाब दिया, “अज़ीम अल्लाह का आदेश था। लाल-डैनों वाले मौत के फरिश्ते हज़रत इज़्राईल ने उसकी जान ली।”

डुमरुल ने कहा: “यह कैसा फरिश्ता है अज़राइल जो लोगों की जान लेता है? ऐ रब, तुम्हारी खुशी, वहदत और वजूद की ख़ातिर मुझे इस इज़्राईल से मिला दो। मैं उससे लड़ूँगा और उसे हराकर इस ख़ूबसूरत जवान की जान बचाऊँगा, ताकि इज़्राईल फिर कभी किसी की जान न ले।” यह कहने के बाद मनमौजी डुमरुल अपने घर चला गया। पर अल्लाह ताला उसकी बातों से नाराज़ हो गए।

उन्होंने कहा: “देखो इस सिर-फिरे आदमी को। यह मेरी वहदत को नहीं मानता है। न ही मेरे प्रति शुक्रगुज़ार है। यह मेरी अज़मत के सामने गुरूर से पेश आ रहा है।” उन्होंने इज़्राईल को हुक्म दिया: “जाओ, इस पागल आदमी की नज़रों के सामने प्रत्यक्ष हो। उसे आतंकित करो, उसकी गरदनमरोड़ो, और उसकी जान ले लो।”

जब मनमौजी डुमरुल अपने चालीस दोस्तों के साथ बैठकर शराब पी रहा था, इज़्राईल अचानक वहाँ आ धमका। न तो डुमरुल के नौकरों ने, न उसके पहरेदारों ने इज़्राईल को आते हुए देखा। मनमौजी डुमरुल अन्धा हो गया, उसके हाथ जकड़ गए। उसके लिए सारी दुनिया बेनूर हो गई।

वह बोलने लगा। तो सुनो, उसने क्या कहा:

“ओ इज़्राईल, क्या ही बलवान, कद्दावर बुज़ुर्ग हो, तुम! मेरे नौकरों ने तुम्हें आते नहीं देखा; मेरे पहरेदारों को तुम्हारी आहट नहीं हुई। मेरी आँखें, जो पहले देख सकती थीं, अब अंधी हो गई हैं; मेरे हाथ, जो पहले पकड़ सकते थे, अब जकड़ गए हैं। मेरी रूह काँप रही है, और मैं भयभीत हूँ। मेरे हाथ से सुनहरा प्याला छूट गया है। मेरा मुँह बर्फ-सा ठंडा है; मेरी हड्डियाँ धूल बन गई हैं। हे सफ़ेददाढ़ीवाले बूढ़ा आदमी , तुम कितने कठोर नज़रों वाले फरिश्ते हो! हे, विशालकाय बूढ़े! यहाँ से भाग जाओ, नहीं तो मैं तुम्हें मार दूँगा।”

ये शब्द सुनकर इज़्राईल को गुस्सा आ गया। उसने डुमरुल से कहा: “अरे ओ, पागल आदमी! क्या तुझे मेरी कठोर नज़रें पसंद नहीं आ रही हैं? कितनी ही कमसिन युवतियों और नव-विवाहिताओं की मैंने जान ली हैं। तब फिर तुझे मेरी सफ़ेद दाढ़ी क्यों पसंद नहीं आ रही है? मैंने तो सफ़ेद दाढ़ीवाले और काली दाढ़ीवाले दोनों ही प्रकार के आदमियों की जानें ली हैं। इसीलिए तो मेरी ख़ुद की दाढ़ीसफ़ेद है!”

फिर इज़्राईल ने आगे यों कहा: “ऐ, पागल आदमी! अभी तुम डींग मार रहे थे कि मैं लाल-डैनोंवाले इज़्राईल को मार दूँगा। तुम मुझे पकड़कर इस ख़ूबसूरत जवान की जान बचाना चाहते थे। पर अब, ऐ मूर्ख, मैं ही तुम्हारी जान लेने आ गया हूँ। बताओ, तुम मुझे अपनी जान दोगे, या मुझसे लड़ोगे?”

मनमौजी डुमरुल ने कहा: “क्या तुम्हीं वह लाल-डैनोंवालेइज़्राईल हो?”

“हाँ, हूँ,” इज़्राईल ने जवाब दिया।

“क्या तुम्हीं वह फ़रिश्ता हो जो इन शानदार युवकों की जानें लेता है?” डुमरुल ने पूछा।

“बेशक,” इज़्राईल ने फ़रमाया।

मनमौजी डुमरुल ने कहा, “अरे ओ, संतरियो, सब दरवाज़े बंद कर दो।” फिर इज़्राईल की तरफ मुड़कर बोला: “ऐ अज़राइल, मैं तुम्हें खुले मैदान में घेरने की उम्मीद कर रहा था, पर तुम इस संकरे कमरे में मेरी पकड़ में आ गए! अब मैं तुम्हें मारकर उस खूबसूरत जवान को जिंदा कराऊँगा।”

उसने अपनी विशाल काली तलवार खींची, और उससे इज़्राईल पर वार करने की कोशिश की। पर इज़्राईल कबूतर बनकर खिड़की से बाहर उड़ गया। तब डुमरुल ने ज़ोर से तालियाँ बजाईं और अट्टहास करने लगा।

उसने कहा: “मेरे दोस्तो, देखो मैंने कैसे इज़्राईल को डरा दिया। वह खुले दरवाज़े के रास्ते नहीं बल्कि संकरे झरोखे से भाग खड़ा हुआ। अपने आपको मुझसे बचाने के लिए, वह कबूतर बनकर उड़ गया। लेकिन मैं उसे अपना बाज़ उड़ाकर पकड़ लूँगा।”

यह कहकर डुमरुल ने अपने बाज़ को हाथ में लिया और इज़्राईल का पीछा करने के लिए अपने घोड़े पर सवार हो गया। उसने अपना बाज़ छोड़कर कुछ कबूतर मारे। फिर अपने घर लौट चला। रास्ते में इज़्राईल उसके घोड़े की आँखों के सामने प्रकट हुआ। घोड़े ने भयभीत होकर मनमौजी डुमरुल को जमीन पर पटक दिया और भाग खड़ा हुआ। घोड़े से गिरने से बेचारे डुमरुल का सिर घूमने लगा और वह एकदम पस्त हो गया। इज़्राईल उसकी सफ़ेद छाती पर सवार हो गया। कुछ पल डुमरुल बुदबुदाता रहा पर जल्द ही उसके लिए साँस लेना भी मुश्किल हो गया। उसके गले से मौत की घुरघुराहट आने लगी।

वह किसी तरह बोला: “ओ इज़्राईल, मुझ पर रहम करो! ख़ुदा की वहदत पर मुझे कोई शक नहीं है। मुझे तुम्हारे बारे में नहीं मालूम था। मुझे नहीं मालूम था कि तुम चोरों की तरह लोगों की जानले लेते हो। मेरे पास विशाल चोटियों वाले पहाड़ हैं। इन पहाड़ों पर अंगूर के ख़ूबसूरत बागान खिले हुए हैं। इन बागान में काले अंगूरों के बेशुमार गुच्छे हैं, जिन्हें निचोड़ने पर लाल मदिरा प्राप्त होती है। इसे जो पीता है, वह नशे में धुत हो जाता है। मैंने यह मदिरा पी ली थी, इसीलिए मैं तुम्हारे आने की आहट सुन न सका। मुझे नहीं मालूम मैंने नशे में क्या-क्या बक दिया था। मैं मानता था कि मैं दूसरे सब लोगों से ताकतवर हूँ, पर अब जान गया हूँ कि यह सही नहीं है। मैं बस अपनी जवानी के कुछ और बरस जीना चाहता हूँ। ओ इज़्राईल, मेरी जान बख़्श दो।”

इज़्राईल ने कहा: “अरे पगले, मुझसे क्यों रहम की भीख माँग रहा है? मेरे बदले उस अज़ीम अल्लाह से माँग। मेरे हाथ में क्या रखा है? मैं तो बस एक नौकर हूँ।” मनमौजी डुमरुल ने कहा: “तब क्या अज़ीम अल्लाह ही जान बख्शते और लेते हैं?

“इसमें क्या शक है,” इज़्राईल ने कहा।

तब मनमौजी डुमरुल इज़्राईलसे बोला:

“तुम एक बुरे आदमी हो। मेरे कामकाज में दखल मत दो। मुझे सीधे अल्लाह से बात करने दो।” फिर मनमौजी डुमरुल ने अल्लाह से बात की। तो सुनो, उसने क्या कहा:

“तुम सर्वोच्च हो। ओ ख़ुदा ताला, कोई नहीं जानता तुम कितने ऊँचे हो। तुम हो अल्लाह महान। मूर्ख तुम्हें आसमान और धरती पर खोजते हैं, पर तुम रहते हो, भक्तों के दिलों में। अजर-अमर-अजय हो तुम, ओ कालजयी और रहम-दिल अल्लाह। यदि तुम मेरी जान लेना ही चाहते हो, तो ख़ुद आकर लो। इज़्राईल को मुझे मारने मत दो।”

इस बार मनमौजी डुमरुल की बातों से ख़ुदा ताला खुश हो गए। उन्होंने इज़्राईल से चिल्लाकर कहा कि चूँकि यह पागल मेरी वहदत पर विश्वास करता है, मैं इसे अशीष देता हूँ और इसकी जान बख़्शता हूँ, बशर्ते यह अपनी जगह मरने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को राज़ी कर सके।

इज़्राईल ने तब डुमरुल के पास आकर कहा: “ओ मनमौजी डुमरुल, अल्लाह ताला का हुक्म है कि तुम अपनी जगह मरने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को ले आओ। तभी मैं तुम्हें छोड़ सकता हूँ।”

मनमौजी डुमरुल ने कहा: “मैं कहाँ से अपनी जगह मरने के लिए किसी दूसरे को लाऊँ? इस दुनिया में मेरे बूढ़े माँ-बाप के सिवा और कोई नहीं है। पर मैं जाकर उनसे पूछता हूँ कि क्या उनमें से कोई मेरे लिए अपनी जान देगा। शायद उनमें से कोई एक कह दे: ‘तुम मेरी जान ले सकते हो और मुक्त हो सकते हो।’

मनमौजी डुमरुल अपने पिता के घर गया और उनके हाथ चूमकर उनसे बात की।

तो आओ सुनें, उसने अपने पिता से क्या कहा: “सफ़ेददाढ़ी वाले मेरे पिता, मैं तुम्हें प्यार करता हूँ और तुम्हारी इज़्ज़त करता हूँ। क्या तुम जानते हो, मेरे साथ क्या हुआ है? मैंने अल्लाह से बदतमीज़ी से बात की और उन्हें मुझ पर गुस्सा आ गया। उन्होंने लाल-डैनों वाले इज़्राईल को आसमान से उड़कर नीचे जाने को कहा। इज़्राईल मेरी सफ़ेद छाती पर उतरा और मेरे शरीर पर बैठ गया। उसने मेरा गला घोंटकर मुझसे लगभग मेरे आख़िरी शब्द निकलवाए और लगभग मेरी जान ले ली। ओ पिता, मैं तुमसे तुम्हारी जान की भीख माँगता हूँ। क्या तुम मेरे लिए मर सकते हो? या मेरे मरने के बाद यह कहते हुए मेरे लिए रोना पसंद करोगे, ‘अरे, मेरा बेटा, मेरा मनमौजी डुमरुल, मर गया!’

उसके पिता ने जवाब दिया: “मेरे बेटे, ओ मेरे बेटे! तुम मेरे कलेजे का टुकड़ा हो, ओ मेरे बेटे! तुम शेर की तरह बहादुर हो। एक बार मैंने तुम्हारे लिए नौ ऊँटों की क़ुर्बानी दी थी। तुम मेरे आलीशान मकान की नींव हो, जिसमें सोने की चिमनियाँ हैं। तुम मेरी हंसजैसी सुंदर बेटियों और बहुओं की तरह एक फूल हो। यदि चाहो तो तुम दूर स्थित काले पहाड़ को आदेश दे सकते हो कि वह इज़्राईल के लिए घास का मैदान बन जाए। यदि तुम चाहो, तो मेरे शीतल झरनों को उसके बगीचे के फ़व्वारे बना सकते हो। यदि तुम चाहो, तो उसे मेरा घर और सुंदर घोड़े भेंट कर सकते हो। यदि तुम चाहो, तो मेरे ऊँटों से उसका सामान ढुलवा सकते हो। यदि तुम चाहो, तो मेरे बाड़ों में खड़ी सफ़ेद भेड़ों को मेरे बावर्चीखाने में भूनकर उसे दावत दे सकते हो। यदि तुम चाहो, तो मेरा सोना-चाँदी उसे दे सकते हो। पर जीना मुझे बहुत प्यारा है और यह दुनिया बड़ी मीठी है। इसलिए मैं तुम्हारे लिए मर नहीं सकता, तुम्हें यह समझना होगा। तुम्हारी माँ भी तो है। वह तुमसे मुझसे भी ज़्यादा प्यार करती है, और तुम भी उसे मुझसे अधिक चाहते हो। तो मेरे बेटे, उसके पास जाओ।”

जब उसके पिता ने उसे ठुकरा दिया, मनमौजी डुमरुल अपनी माँ के पास गया, और उससे बोला: “जानती हो माँ, मेरे साथ क्या हुआ? लाल-डैनों वाला इज़्राईल आसमान से उड़कर आया और मुझ पर सवार हो गया। उसने मेरे सफ़ेद सीने को दबोच लिया। उसने मेरा गला दबाया और लगभग मेरी जान ही ले ली। जब मैंने पिता से मुझे उनकी ज़िंदगी देने को कहा तो उन्होंने नहीं दी। अब मैं तुमसे तुम्हारी ज़िंदगी माँगने आया हूँ, ओ माँ। क्या तुम मुझे अपनी ज़िंदगी दोगी? या फिर मेरे मर जाने के बाद अपने सफ़ेद चेहरे को अपने तीखे नाखूनों से खरोंचते हुए और अपने लंबे सफ़ेदबालों को नोचते हुए, ‘ओ मेरा बेटा, मेरा डुमरुल’ कहकर विलाप करना पसंद करोगी?”

इस पर उसकी माँ ने क्या कहा, आओ, इसे सुनें: “बेटे, ओ मेरे बेटे! मेरे प्यारे बेटे, जिसे मैंने नौ महीने अपनी कोख में पाला, और दसवें महीने जन्म दिया, जिसे मैंने कपड़े पहनाए और पालने में लिटाया, जिसे मैंने अपना भरपूर सफ़ेद दूध पिलाया। ओ मेरे बेटे, काश तुम सफ़ेद मीनारों वाले किले में, भयानक रीति-रिवाजों को मानने वाले काफ़िरों के कब्ज़े में होते, ताकि मैं तुम्हें अपनी ताक़त और पैसे से बचा पाती। पर तुम तो इस भयनाक मुसीबत में फँस गए हो। इसलिए मैं तुम्हारी ओर मदद का हाथ नहीं बढ़ा सकती, मेरे बेटे। यह समझ लो कि दुनिया बहुत मीठी है, और मनुष्य को अपनी जान बहुत प्यारी लगती है। इसलिए मैं अपनी ज़िंदगी नहीं दे सकती। तुम्हें यह समझना होगा।”

इस तरह उसकी माँ ने भी उसे अपनी ज़िंदगी देने से मना कर दिया। इसलिए इज़्राईल मनमौजी डुमरुल की जान लेने के लिए आ पहुँचा। उसे देखकर डुमरुल ने कहा: ‘ओ इज़्राईल जल्दी नहीं करो। इसमें कोई शक नहीं कि अल्लाह एक हैं।’

इज़्राईल बोला: “अरे, पगले, तुम मुझसे क्यों रहम की भीख माँग रहे हो? तुम अपने सफ़ेद दाढ़ी वाले पिता के पास गए, पर उसने तुम्हें अपनी ज़िंदगी देने से मना कर दिया। तुम अपनी सफ़ेद बालों वाली माँ के पास गए, और उसने भी तुम्हें अपनी ज़िंदगी नहीं दी। अब कौन रह गया है जो तुम्हें अपनी ज़िंदगी दे सकता है?”

“मैं एक व्यक्ति से बहुत प्यार करता हूँ”, डुमरुल ने कहा।

मुझे उसके पास जाने की इजाज़त दो,”

“कौन है यह व्यक्ति, ओ पगले इन्सान?”, इज़्राईल ने कहा।

“वह मेरी ब्याहता पत्नी है। वह एक अन्य कबीले के व्यक्ति की बेटी है। और उससे मेरे दो बच्चे भी हैं। मुझे उनसे कुछ बातें कहनी हैं। उनसे मिलने के बाद तुम मेरी जान ले सकते हो।”

तब वह अपनी पत्नी के पास गया और बोला: “क्या तुम्हें पता है मेरे साथ क्या हुआ है? लालडैनोंवाला इज़्राईल आसमान से उड़कर आया और मुझ पर चढ़ बैठा। उसने मेरे सफ़ेद सीने को दबोच लिया। उसने मेरी जान ही ले ली थी। जब मैंने अपने पिता से उनकी ज़िंदगी माँगी, तो उन्होंने मना कर दिया। तब मैं अपनी माँ के पास गया, पर उन्होंने भी अपनी ज़िंदगी मुझे नहीं दी। उन दोनों ने कहा कि जिंदगी बहुत मीठी है और उन्हें बहुत प्यारी है। मेरे ऊँचे काले पहाड़ों को तुम अपनी चरागाह बना लो। मेरे शीतल जल के झरनों को अपना फ़व्वारा बना लो। मेरे अस्तबल के सुंदर घोड़ों को ले लो और उनकी सवारी करो। सोने की चिमनियों वाला मेरा सुंदर घर तुम्हें आश्रय दे। ऊँटों का मेरा कारवाँ तुम्हारा माल ढोए। मेरी सफ़ेद भेड़ें तुम्हारी दावतों का भोजन बनें। जाओ, तुम किसी दूसरे आदमी से शादी कर लो, जिसे भी तुम्हारी आँखें और दिल चाहें। ताकि हमारे दो बेटे यतीम न हो जाएँ।”

यह सुनकर उसकी पत्नी ने क्या कहा, आओ, इसे सुनें: “तुम क्या कह रहे हो? मेरे बलिष्ठ मेढ़, मेरे युवा राजा, जिस पर मुझे पहली नज़र में ही प्यार हो गया था, और जिसे मैंने अपना पूरा दिल दे दिया है? जिसे मैंने अपने मीठे होंठ चूमने के लिए दिए; जिसके साथ मैं एक ही तकिए पर सोई और जिसे मैंने प्यार किया। जब तुम्हीं न रहोगे, तब काले पहाड़ों का मैं क्या करूँगी? यदि मैं कभी अपनी भेड़ों को वहाँ ले जाऊँ, तो मेरी कब्र भी वहीं बने। यदि मैं तुम्हारे शीतल झरनों का पानी पिऊँ, तो मेरा खून फव्वारे की तरह बहे। यदि मैं तुम्हारे सोने के सिक्के खर्च करूँ, तो बस इसलिए कि उनसे मेरे कफन का कपड़ा ख़रीदा जाए। यदि मैं तुम्हारे सुंदर घोड़ों की सवारी करूँ तो वे मेरी लाश को ढोएँ। यदि मैं तुम्हारे बाद किसी से प्यार करूँ, किसी दूसरे युवक को, और उससे शादी करूँ, और उससे सहवास करूँ, तो वह साँप बनकर मुझे डस ले। जीवन में इतना क्या रखा है, कि तुम्हारे अभागे माता-पिता तुम्हें अपनी ज़िंदगी के बदले उनकी ज़िंदगी न दे सके? अब जन्नत, आठ मंजिलों वाली जन्नत, साक्षी रहे; यह धरती और आसमान साक्षी रहें, अल्लाह ताला साक्षी रहें, कि मैं अपनी ज़िंदगी तुम्हारी ज़िंदगी बचाने के लिए क़ुर्बान करती हूँ।”

यह कहकर वह डुमरुल के लिए मरने को तैयार हो गई, और इज़्राईल उस महिला की जान लेने के लिए आ गया। पर मनमौजी डुमरुल नहीं चाहता था कि उसकी पत्नी अपनी जान दे दे। उसने अल्लाह ताला से रहम की भीख माँगी।

आओ सुनें, उसने क्या कहा: “तुम सबसे ऊँचे हो; कोई नहीं जानता तुम कितने ऊँचे हो, ओ अल्लाह, अज़ीमख़ुदा! मूर्ख तुम्हें आसमान और धरती पर खोजते हैं, पर तुम रहते हो, तुम पर विश्वास करने वालों के दिलों में। सनातन और दयावान अल्लाह – यही तुम्हारी पहचान है! मुझे इस इलाके की मुख्य सड़कों के किनारे गरीबों के लिए मकान बनवाने दो। मुझे तुम्हारे नाम से भूखे इन्सानों को भोजन कराने दो। यदि तुम मेरी ज़िंदगी लेना ही चाहते हो तो हम दोनों की ज़िंदगी ले लो। यदि तुम मेरी ज़िंदगी बख़्शोगे तो हम दोनों की ज़िंदगी बख्श दो, ओ रहम-दिल अल्लाह!”

ख़ुदा मनमौजी डुमरुल के इन शब्दों से खुश हो गए। उन्होंने इज़्राईलको आदेश दिया: “मनमौजी डुमरुल के माता और पिता की ज़िंदगी ले लो। इस नेक दंपति को मैंने 140 सालों की उम्र दी है जो अब पूरी हो चली है। इज़्राईल ने तुरंत जाकर उन दोनों की जान ले ली, लेकिन मनमौजी डुमरुल अपनी पत्नी के साथ 140 साल और जिंदा रहा।

डेडे कोरकुट आया, और उसने कहानियाँ सुनाईं और वीरगाथाएँ गाईं। उसने कहा: “मेरे बाद वीर ओजस्वी गवैए आएँगे और मनमौजी डुमरुल की गाथा सबको सुनाएँगे, और ऊँची पेशानी वाले उदार दिल इन्सान उन्हें सुनेंगे। मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे काली चट्टानों वाले पहाड़ सदा ऊँचे खड़े रहें, कि तुम्हारे छायादार पेड़ कभी काटे न जाएँ, कि तुम्हारे बहते झरने कभी न सूखें। मैंने तुम्हारे सफ़ेद माथे के लिए प्रार्थना के पाँच शब्द कहे हैं। कि अल्लाह ताला कभी भी तुम्हें बुरे लोगों के क़ब्ज़े में न आने दें। मैं आशा करता हूँ कि अल्लाह यह प्रार्थना क़बूल करेंगे। मुझे यह भी उम्मीद है कि वे तुम्हारे गुनाहों को हज़रत मुहम्मद की ख़ातिर और अपनी अज़मत की ख़ातिर माफ़ कर देंगे।

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Turkey ki Lok Kathayen-3/ तुर्की लोक कथाएँ-3

तैमूर लंग की कीमत: तुर्किस्तान/टर्की की लोक-कथा

इतिहास में तैमूर लंग को एक बेहद क्रूर और निर्दयी व्यक्ति के रूप याद किया जाता था। कहते हैं वह दुनिया भर में अपनी सेना लेकर लूटपाट करता घूमता था। लोगों का क़त्ल करना उसके लिए मनोरंजन जैसा था। वह जहां जहां गया उसने अनगिनत लोगों को मारा और जी भर कर लूटा।

उस जमाने में लोग तैमूर लंग के नाम से कांपते थे लेकिन इसी तैमूर लंग के बारे में एक किस्सा ऐसा भी मशहूर है जब एक निडर कवि ने उसकी बोलती बंद कर दी थी। किस्सा कुछ यूं है –

एक बार उसके सैनिक तुर्किस्तान के एक मशहूर कवि अहमदी को पकड़ लाये। उस समय तैमूर लंग सरेआम कुछ गुलामों को मौत की सजा सुना रहा था। जब उसने कवि अहमदी को देखा तो बोला – “सुना है कवि लोग इंसानों के बड़े पारखी होते हैं। ज़रा बताओ तो इन गुलामों की कीमत क्या होगी ?”

अहमदी बहुत निडर और स्वाभिमानी कवि थे। बोले – “इनमें से कोई भी गुलाम पांच सौ अशर्फियों से कम का नहीं है।।”

तैमूर लंग, जिसकी नजर में गुलामों की कोई कीमत नहीं थी, यह सुनकर बोला – “अच्छा, इन तुच्छ गुलामों की इतनी अधिक कीमत है तो फिर मेरी कीमत क्या होगी ?”

अहमदी बोले – “आप यह न पूछें तो अच्छा है …”

तैमूर को क्रोध आ गया। बोला – “जो मैं पूछूँ तुम्हें बताना ही पड़ेगा … वरना तुम्हें भी मौत के घाट उतार दिया जाएगा…”

कवि अहमदी बोले – “और यदि में आपकी सही कीमत बता दूँ तो …?”

“तो तुम्हें ससम्मान जाने दिया जाएगा …” – तैमूर लंग बोला। दरअसल वह सोच रहा था कि अहमदी उसकी कीमत करोड़ों में आंकेंगा।

लेकिन कवि बोले – “तो सुनिए हुजूर, मेरी नजर में आपकी कीमत 25 अशर्फियों से ज्यादा नहीं है …”

यह सुनते ही तैमूर तिलमिला गया। बोला – “इन मामूली गुलामों की कीमत पांच सौ अशर्फियाँ और मेरी सिर्फ 25 अशर्फियाँ ! तुम्हें मालूम है इतनी कीमत की तो मेरी पगड़ी है !”

“मैंने उसी की कीमत बताई है …” – कवि अहमदी बोले, “क्योंकि जिसके दिल में दया, प्रेम और न्याय नहीं है उसके शरीर की भला क्या कीमत होगी ? दो कौड़ी भी नहीं !”

तैमूर लंग इस जवाब से तिलमिला कर रह गया लेकिन वह सबके सामने कवि को छोड़ देने का वादा कर चुका था इसलिए उसके पास अहमदी को जाने देने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

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New Zealand ki Lok Kathayen-1/ न्यूजीलैंड की लोक कथाएँ-1

माउई, आग लाने वाला: न्यूजीलैंड की लोक-कथा

पृथ्वी का कुछ भाग जल के भीतर तथा कुछ भाग ऊपर होता है। यह वीर माउई ही है जिसने न्यूज़ीलैंड द्वीप को जल से ऊपर निकाला, जहां यह आजकल स्थित है। यह माउई ही है जिसने मछली फंसाने के कांटे का आविष्कार किया। माउई ही ने मनुष्य जाति को आग पैदा करने का उपाय बताया और माउई ही ने दिन को बड़ा बनाया ताकि लोगों को अधिक समय मिले और वे अपना काम भली-भांति कर सकें।

माउई का जब जन्म हुआ तो वह बहुत ही छोटा और कुरूप था। उसकी मां ने उसे समुद्रतट पर किसी सुनसान स्थान पर छोड़ दिया। समुद्र के देवताओं ने उस पर कृपा की और उसका पालन-पोषण किया। उसके पूर्वज टामानुईकीटेरेंगी ने स्वर्ग में शिक्षा देकर उसे बुद्धिमान बना दिया। जब वह युवावस्था को प्राप्त हुआ तो वह अपने परिवार की खोज-खबर लेने के लिए पृथ्वी पर आया। उसने अपने भाइयों को खेलते देखा। माउई के विकृत अंगों को देखकर वे हँसने लगे। माउई ने अपना नाम बताकर कहा कि वह उनका सबसे छोटा भाई है। उन लोगों ने इस पर विश्वास न किया। उसकी मां ने भी यही कहा कि तुम मेरे पुत्र नहीं हो।

माउई ने कहा, “आपने मुझे समुद्रतट पर छोड़ दिया था ।” मां को सहसा पिछली बातें याद हो आयीं। वह बोली-“हां, बेटे! मैं भूल गई थी। तुम मेरे पुत्र हो।”

माउई अपने परिवार में रहने लगा। एक दिन जब उसके भाई नाव में मछली का शिकार करने जाने लगे तो उसने भी साथ जाने का हठ किया परंतु उन्होंने उसे अपने साथ ले जाने से मना कर दिया। परंतु माउई कहां मानने वाला था! वह छिपकर चुपचाप उनका पीछा करने लगा।

माउई के भाइयों के पास मछली पकड़ने का कांटा न था। स्वर्ग में अपने पूर्वजों से सभी विद्याओं में पारंगत होने के कारण, माउई ने अपने भाइयों को बताया कि मछली पकड़ने के लिए किस प्रकार कांटा लगाया जाता है। पर उसके भाइयों को माउई का साथ अच्छा न लगता और वे उसे अपने साथ कभी नाव में न ले जाते।

एक दिन माउई पहले से ही जाकर नाव में छिप गया और लकड़ी के तख्तों से उसने अपने को ढक लिया। जब उसके भाई समुद्र में कुछ दूर चले गए तो उनमें से एक ने कहा, “माउई को अपने साथ नहीं लाए, बहुत ही अच्छा किया ।” यह सुनकर माउई तख्तों के नीचे से बोला-“मैं तो यहां हूं।” और वह तख्तों को हटाकर बाहर निकल आया। जब उसके भाइयों ने देखा कि वे समुद्र में काफी दूर आ गए हैं और उसे लौटाना कठिन है, तो उन्होंने कहा-“हम लोग तुम्हें मछली पकड़ने के लिए कांटा न देंगे।”

यह सुनकर माउई चुप रहा। उसने अपनी पेटी के नीचे से जादू का कांटा निकाला जो उसके किसी पूर्वज के दांत का बना था। उसके भाइयों ने उसमें लगाने के लिए चारा भी देने से मना कर दिया। यह देखकर माउई ने अपनी नाक पर घूंसा मारा और खून निकाला। उस खून से अपने कांटे को तर करके उसने पानी में फेंक दिया। उसके भाइयों को क्योंकि कोई मछली न मिली थी, उन्हें विश्वास था कि माउई को भी कोई मछली न मिलेगी।

माउई का कांटा समुद्र में नीचे डूबता गया और समुद्र-तल में जाकर रुका। भाइयों ने कहा, “यहां मछलियां नहीं हैं। आओ, हम लोग कहीं और चलें ।” माउई केवल हँसता रहा और प्रतीक्षा करता रहा। थोड़ी देर बाद उसकी रस्सी में खिंचाव जान पड़ा। वह उसे मजबूती से पकड़े रहा। उसके भाइयों ने भी इसमें उसकी सहायता की। धीरे-धीरे कोई जीव ऊपर आता हुआ दिखाई पड़ा। जब वह जीव पानी के ऊपर आया तो माउई के भाई डर से चिल्लाने लगे क्योंकि जहां तक उनकी दृष्टि जाती थी उससे भी आगे तक वह जीव पानी पर तैर रहा था। यह बड़ा जीव “’टीकाएमाउई’ नामक मछली अर्थात्‌ न्यूजीलैंड का द्वीप था। उस जीव की पीठ पर, मांस काटने के लिए माउई के भाई कूद पड़े परंतु वे असफल रहे। जहां-जहां उन लोगों ने चाकू से काटने का प्रयत्न किया वहां-वहां बड़े-बड़े खड्ड बन गए। जहां-जहां उन लोगों ने मछली को पीटा था, वहां-वहां उसकी खाल सिकुड़ गई और वे स्थान पर्वत बन गए। इस प्रकार न्यूज़ीलैंड द्वीप समुद्र से निकला जो अब माउरी लोगों का निवासस्थान है।

कुछ समय बीत जाने के पश्चात्‌, माउई ने अनुभव किया कि दिन बहुत छोटे होते हैं। दिन छोटे होने से, लोगों को भोजन आदि एकत्रित करने के लिए समय नहीं मिलता था। माउई ने निश्चय किया कि वह सूर्य को धीरे-धीरे चलने के लिए बाध्य करेगा ताकि दिन बड़े हों।

उसने अपने भाइयों से कहा, “आओ, हम लोग सूर्य को बांधकर उससे धीरे-धीरे चलने के लिए कहें ताकि लोगों को काम करने के लिए अधिक समय मिल सके ।”

भाइयों ने कहा, “सूर्य के निकट जानेवाला भस्म हो जाता है।”

माउई ने कहा-“तुम लोगों ने देखा है कि मैंने इस द्वीप को जल से बाहर निकाला है। मैं इससे भी आश्चर्यजनक काम कर सकता हूं।”

माउई की बातों को सुनकर उसके भाई सहमत हो गए। माउई ने अपनी बहन हीना के सिर से बाल लिए और हरा सन (पटुआ) भी लिया। अपने भाइयों की सहायता से उसने रस्सी बंटी और जादू के प्रभाव से रस्सी को बहुत ही मजबूत बना लिया। उस रस्सी से उन लोगों ने एक जाल तैयार किया। जाल बन जाने के उपरांत, माउई अपने भाइयों के साथ उस दिशा की ओर चल दिया जहां से सूर्य निकलता था। कई महीने लगातार चलने के बाद, वे संसार के किनारे पहुंचे और रात्रि के समय उन्होंने अपने जाल को उस सूराख पर रख दिया जहां से सूर्य निकला करते थे।

प्रातःकाल होने पर जब सूर्य निकला तो वह जाल में फंस गया और बहुत प्रयत्न करने पर भी वे जाल में से निकल न सके। माउई ने जाल को मजबूती से पकड़ रखा था। उसने एक रस्सा सूर्य की ओर फेंककर उसे लपेट लिया। सूर्य ने रस्से को तोड़ने का बहुत प्रयत्त किया परंतु वह टूट न सका।

माउई ने अपनी जादू की गदा उठायी और सूर्य पर प्रहार करने लगा। सूर्य अपनी किरणों से भीषण गर्मी फैलाने लगा। माउई के भाई तो डरकर भाग खड़े हुए, परंतु माउई सूर्य से लड़ता रहा।

अंत में सूर्य ने कहा, “अरे! तुम मुझे नहीं जानते । मुझसे व्यर्थ लड़ रहे हो ।”

माउई ने कहा, “तुम उदय होकर, आकाश में बड़ी शीघ्रता से एक किनारे से दूसरे किनारे पहुंच जाते हो। इसलिए दिन छोटा होता है और लोगों को अन्न इकट्ठा करने के लिए समय नहीं मिलता ।”

पर सूर्य ने माउई की बातों पर ध्यान न दिया। दोनों में लड़ाई होती रही। अंत में माउई ने क्रोधित होकर ज़ोर से प्रहार किया जिससे सूर्य घायल हो गया। घायल हो जाने पर सूर्य ने कहा, “मैं वचन देता हूं, अब मैं आकाश में धीरे-धीरे चलूंगा ।” यह सुनकर माउई बहुत प्रसन्नन हुआ और उसने सूर्य को जाल से मुक्त कर दिया। सूर्य ने अपना वचन पूरा किया। उसी दिन से वह धीरे-धीरे चलने लगा और अब लोगों को दिन बड़ा हो जाने के कारण काफी समय मिलता है।

तब लोगों को आग पैदा करना नहीं आता था। अतः माउई ने यह निश्चय किया कि वह धरती के भीतर जाकर आग का पता लगायेगा। पृथ्वी में एक सूराख करके वह भीतर घुसा और अग्नि की माता माफुइक से मिला। उसने उससे एक चिनगारी मांगी। अग्नि की मां ने अपनी अंगुलियों के जलते नख में से एक नख उसे दे दिया। माउई उसे लेकर जब कुछ दूर चला गया तो उसने सोचा, यह तो आग है। आग उत्पन्न करने की विधि तो बताई ही नहीं। यह सोचते ही उसने आग को नदी में डाल दिया। वह लौटकर फिर अग्नि की मां के पास गया और चिनगारी ली। इस प्रकार वह नौ बार आग लाया और नदी में फेंकता गया। दसवीं बार जब वह गया तो आग की मां बहुत ही क्रोधित हुईं । गुस्से में भर उसने अपनी अंगुली का दसवां नख उस पर फेंका। जंगल के वृक्ष, घास आदि जलने लगे। जब आग बहुत ही भयंकर हो गई तो माउई ने वर्षा से प्रार्थना की । शीघ्र ही वर्षा होने लगी जिससे आग बुझ गई। अग्नि को बुझते देखकर उसकी मां ने कुछ चिनगारियों को वृक्षों में छिपा दिया। तभी से वृक्षों में आग छिपी हुई है और अब मनुष्य जान गया है कि किस प्रकार दो लकड़ियों को आपस में रगड़ने से आग उत्पन्न हो जाती है।

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Germany ki Lok Kathayen-1/ जर्मनी की लोक कथाएँ-1

ग्रिम ब्रदर्स कहानी-स्नो व्हाइट और सात बौने: जर्मनी की लोक-कथा

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सुदूर प्रदेश में एक राजा और रानी राज्य करते थे। रानी बहुत ही दयालु और प्यारी थी और राज्य के सभी लोग उसका आदर करते थे । लेकिन रानी के जीवन में केवल एक दुविधा थी कि उसको संतान की इच्छा थी लेकिन उसके कोई संतान नहीं थी। एक बार रानी सर्दियों के समय खिड़की के पास बैठकर स्वेटर बुन रही थी और उसी समय एक स्नो व्हाइट चिड़िया खिड़की के पास आकर बैठ गई जिससे रानी का ध्यान भटक गया और उसकी उंगली में सुई चुभ गई।

तभी रानी ने एक इच्छा मांगी कि उसको एक बहुत ही खूबसूरत बेटी हो और उसका चेहरा स्नो जैसा हो । वह बहुत सुंदर और परी की तरह खूबसूरत हो।

काफी समय गुजर जाने के बाद रानी को एक बेटी पैदा हुई वह बहुत खूबसूरत थी जैसा उसने इच्छा मांगी थी । वह बहुत सुंदर थी । रानी ने उसका नाम स्नो व्हाइट रखा। राज्य के सभी लोग बहुत खुश थे।

स्नो व्हाइट की एक सौतेली मां थी। उसकी सौतेली मां स्नो व्हाइट को पसंद नहीं करती थी और उसे अपनी खूबसूरती पर भी घमंड था।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां के पास एक जादुई आईना था । जादुई आईने से वह रोज पूछती थी कि इस दुनिया में सबसे ज्यादा खूबसूरत कौन है । इस पर आईना जवाब देता -आपके अलावा भला कौन हो सकता है । इससे रानी बहुत खुश हो जाती। दूसरी तरफ रानी राज्य के निर्णय भी लेने लगी थी जिससे राज्य को बहुत नुकसान होने लगा। राज्य के नुकसान की भरपाई के लिए राजा को राज्य से बाहर जाना पड़ा और वह राजा के बाहर जाने पर अपनी मनमानी करने लगी।

समय बहुत तेजी से बीत रहा था और अब स्नो व्हाइट एक खूबसूरत युवती हो गई थी। जब एक बार स्नो व्हाइट बाग में बने तालाब के किनारे पानी पी रही थी तभी एक राजकुमार को स्नो व्हाइट की छाया दिखाई दी । वह राजकुमार देखता ही रह गया लेकिन उसे पक्षियों के सिवा उधर कुछ नहीं दिखा।

उधर रोज की तरह रानी आज भी आईने के पास पहुंची और उसने आईने से पूछा कि सबसे खूबसूरत कौन है । थोड़ी देर तो आईना हिचकिचाया लेकिन उसने कहा कि स्नो व्हाइट। अब रानी बहुत परेशान हो गई।

स्नो व्हाइट की सौतेली मां ने उसे अपने पास बुलाया और उससे कहा कि मुझे लगता है कि तुम महल में पड़ी-पड़ी बोर हो रही हो इसलिए तुम्हें जंगल की सैर पर जाना चाहिए इससे तुम्हारा मन बहल जाएगा । और मैं तुम्हारे साथ अपने सबसे जांबाज सुरक्षाकर्मी को भेज रही हूं। रानी ने अपने सुरक्षाकर्मी को जंगल में भेजा और उससे बोला कि स्नो व्हाइट को मारकर सबूत के तौर पर उसका दिल लेकर आना।

रानी का सुरक्षाकर्मी जब स्नो व्हाइट को मारने लगा तो उसे दया आ गई और उसने स्नो व्हाइट को वहां से जाने के लिए बोला । तब स्नो व्हाइट ने उसे कहा कि वह अपना फर्ज पूरा करे। लेकिन सुरक्षाकर्मी ने उसे वहां से जाने दिया। और सबूत के तौर पर वह किसी जानवर का दिल निकाल कर ले गया । उसने वह दिल रानी के सामने पेश किया जिससे रानी बहुत खुश हो गई।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट जंगल मैं इधर उधर भटक रही थी । उसे बहुत डर लग रहा था उसे लगा जैसे कोई पीछे बात कर रहा है जिससे वह डर गई और वहां तेजी से आगे बढ़ने लगी। थोड़ा दूर चलने पर तितलियां उसके चारों ओर मंडराने लगी। तितलियां स्नो व्हाइट का स्कार्फ खींचने लगी और स्नो व्हाइट को लगा जैसे वह तितलियां कहीं जाने के लिए इशारा कर रही हैं। स्नो व्हाइट उन तितलियों के साथ साथ चलने लगी ।

वहां स्नो व्हाइट को एक घर दिखाई दिया । वह उस घर में चली गई । वहां उसने देखा कि एक मेज बिछी हुई है और उस पर 7 प्लेट लगी हुई हैं । और उन में स्वादिष्ट खाना लगा हुआ है ।और वहीं बगल वाले कमरे में सात बिस्तर लगे हुए हैं। स्नो व्हाइट ने जी भर के उन प्लेटो में से खाना खाया । स्नो व्हाइट बहुत थक गई थी इसलिए वह एक बिस्तर पर वहीं सो गई।

वह घर 7 बौनों का था। वो बौने सोने की खुदाई करते थे । जब शाम को बौने घर लौटे तो बौनों ने देखा कि मेज पर प्लेटो में से किसी ने खाना खाया है । जब सातवें बौने ने अपने बिस्तर की तरफ गौर से देखा तो वहां पर एक लड़की एक बिस्तर पर सोए हुई थी। सभी बौने उसके बिस्तर की तरफ बड़े । तब उन्होंने देखा कि वहां एक सुंदर लड़की सोए हुए हैं । बौनों ने उस लड़की को नहीं जगाया और वह वहीं उस लड़की को घेरते हुए सो गए। जब सुबह स्नो व्हाइट नींद से जगी तो बौनों को देखकर वह डर गई।

बौने बोले- हे लड़की तुम्हें हम से डरने की जरूरत नहीं है। बौने स्नो व्हाइट के बारे में पूछा तब स्नो व्हाइट ने अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई। बौने बोले कि तुम यहां रह सकती हो तुम्हें हमारे लिए खाना बनाना होगा, घर की साफ सफाई करनी होगी और हमारे बिस्तर लगाने होंगे। स्नो व्हाइट मान गई।

बौने जब भी शाम को घर वापस आते तो घर को देखकर और अपने लिए खाना बना देखकर खुश हो जाते ।

दूसरी तरफ स्नो व्हाइट की सौतेली माँ ने जब आईने से पूछा कि सबसे सुंदर कौन है तब आईने ने जवाब दिया रानी माफ करें सबसे सुंदर तुम हो लेकिन तुम से भी सुंदर सात बोनो के साथ पहाड़ों पर रहने वाली स्नो व्हाइट है। तब रानी को महसूस हुआ कि स्नो व्हाइट अभी जिंदा है उसने अब स्नो व्हाइट को जान से मारने का प्लान बनाया ।

उसने जादू से बूढ़ी औरत का रूप धारण कर लिया और ताजे सेव में विष डालकर वह पहाड़ों पर स्थित स्नो व्हाइट के पास पहुंची। बौने उस समय सोने की खोज में जा चुके थे।

स्नो व्हाइट घर पर अकेली थी। जब रानी बूढ़ी औरत के वेश में वहां पहुंची और उसने सेब लेने के लिए उस स्नो व्हाइट को बोला । तब स्नो व्हाइट बोली कि मां जी माफ करें मैं दरवाजा नहीं खोल सकती। तब बूढ़ी औरत बोली कि तुम दरवाजा मत खोलो। तुम मुझे एक रोटी का टुकड़ा दे दो । स्नो व्हाइट ने ऐसा ही किया और सेव ले लिए । जैसे ही उसने सेव खाए वह गिर गई और मर गई ।

जब बौने घर पर लेटे तब उन्होंने वहां स्नो् व्हाइट को जमीन पर गिरे देखा। उन्होंने स्नो व्हाइट को उठाया और उसे जगाने की कोशिश की। लेकिन स्नो व्हाइट अब मर चुकी थी तब बौने ने उसके मरने का मातम मनाया और उसे दफनाने के लिए ले जाने लगे। लेकिन तब उन्होंने महसूस किया कि स्नो व्हाइट का चेहरा अभी भी उतना फ्रेश है उसके गाल अभी भी लाल हैं ।वह मरी हुई नहीं लग रही थी। तब उन्होंने सोचा के स्नो व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद किया जाए जिससे उसका शरीर मरने के बाद भी बेदाग बना रहे। उन्होंने ऐसा ही किया और स्नो् व्हाइट को एक शीशे के बॉक्स में बंद कर दिया।

तभी किसी राज्य का राजकुमार शिकार करते हुए वहां पहुंचा तब उन्होंने देखा कि कुछ बौने एक लड़की को घेरे हुए मातम मना रहे हैं। वह राजकुमार स्नो व्हाइट को देखते ही रह गया और उन बौने से स्नो व्हाइट को अपने साथ ले जाने की इच्छा जाहिर की। लेकिन बौने बोले कि यह तो मर चुकी है तुम इसका क्या करोगे । तब राजकुमार बोला कि मैं इसे अपने राज्य में ले जाकर इसके लिए एक सुंदर सा स्मारक बनाऊंगा। क्योंकि मैं इससे प्रेम करने लगा हूं ।यह बहुत सुंदर है ।

जब राजकुमार के सैनिक उसे डोली में उठा कर ले जा रहे थे तभी एक सैनिक को ठोकर लगी और वह गिरने ही वाला था, जिससे स्नो व्हाइट को झटका लगा और उसके मुंह में फंसा हुआ जहरीले सेब का टुकड़ा निकल गया। जिससे स्नो व्हाइट की जान वापस आ गई। स्नो व्हाइट अब जिंदा थी। राजकुमार ने स्नो व्हाइट से शादी करने की इच्छा जाहिर की। लेकिन स्नो व्हाइट बोली कि वह अपने पिता जी का आशीर्वाद पाना चाहती है।

राजकुमार को पता लगा कि रानी जादूगर है और बहुत क्रूर है । तब राजकुमार ने रानी के किले पर हमला करके उसे परास्त कर दिया और रानी राज्य छोड़ कर भाग गई। तब राजकुमार ने स्नो व्हाइट के पिता को गिरफ्त में से बाहर निकाला। राजकुमार और स्नो व्हाइट ने अपने पिताजी का आशीर्वाद लिया और शादी कर ली।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Germany ki Lok Kathayen-2/ जर्मनी की लोक कथाएँ-2

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी-नीली रोशनी: जर्मनी की लोक कथा

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एक सैनिक बहुत साल तक अपने राजा की सेवा करता रहा, पर अन्त में उसे बिना वेतन या इनाम के निकाल दिया गया। अब उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी रोटी कमाने के लिए क्याि करे। वह बड़े उदास मन से घर की तरफ चल दिया। पूरा दिन चलने के बाद शाम को वह एक घने जंगल के पास पहुँचा। अभी कुछ ही दूर गया था कि उसे पेड़ों के बीच से रोशनी चमकती दिखाई दी। उसने अपने थके हुए पैरों को उधर ही बढ़ा दिया। जल्दीक ही उसे एक झोंपड़ी दिखी जिसमें एक बुढ़िया चुड़ैल रहती थी। उस बेचारे ने उसकी खुशामद की कि वह उसे रात को वहाँ ठहर जाने दे और कुछ खाने-पीने के लिए भी दे दे। वह कुछ सुनने को तैयार नहीं थी, पर इस आदमी से पीछा छुड़ाना भी आसान नहीं था। आखिर वह बोली, “चलो, मैं तुम पर दया कर दूँगी, पर बदले में तुम्हें सुबह मेरा पूरा बगीचा खोदना पड़ेगा ।” सैनिक उसकी हर बात मानने को तैयार था, इसलिए उसका मेहमान बन गया।

अगले दिन उसने अपनी बात पूरी की, और बड़ी सफाई से पूरा बगीचा खोद डाला। यह काम करने में उसका पूरा दिन लग गया। शाम को उसे चले जाना था, तब वह बुढ़िया से बोला, “सारा दिन काम करने से मैं बेहद थक गया हूँ, मुझे एक रात और ठहर जाने दो।” पहले तो उसने मना कर दिया, पर फिर इस शर्त पर राजी हुई कि वह अगले दिन एक गाड़ी भरकर लकड़ी काट देगा।

उस दिन भी उसने काम तो पूरा कर दिया, पर करते-करते फिर रात हो गई। इसके अलावा वह इतना थक गया था कि उसने फिर एक रात रुकने की आज्ञा माँगी। अबकी बार बुढ़िया ने उससे यह वचन माँगा कि वह कुएँ में नीचे जलती नीली रोशनी उसे ला देगा।

सुबह होते ही वह उसे कुएँ तक ले गई, उसकी कमर में एक लम्बी रस्सी बाँधी और उसे नीचे उतार दिया । कुएँ में, जैसा कि चुड़ैल ने बताया था, नीली रोशनी थी। उसने रस्सी हिलाकर उसे इशारा दिया कि वह उसे ऊपर खींच ले। पर उसने सैनिक को बस इतना ऊपर खींचा कि वह हाथ बढ़ाकर रोशनी ले सके और बोली, “पहले मुझे रोशनी पकड़ा दो, मैं सँभाल लूँगी।” सैनिक भाँप गया कि इसका इरादा ठीक नहीं है। सच ही वह रोशनी लेकर सैनिक को कुएँ में वापिस धकेलने की सोच रही थी। सैनिक उसके बुरे इरादे को भाँप गया और बोला, “मैं जब तक कुएँ से सही-सलामत बाहर नहीं निकल आऊँगा तब तक तुम्हें रोशनी नहीं दूँगा।” यह सुनते ही वह बहुत नाराज हो गई और उसने उसे रोशनी समेत नीचे फेंक दिया। वह सालों से उस रोशनी को हासिल करना चाहती थी। इधर बेचारा गरीब सैनिक कुछ देर निराश होकर नीचे की गीली मिट्टी पर पड़ा रहा और सोचने लगा कि अब उसका अन्त पास ही है। उसकी जेब में आधा भरा चुरुट था। उसने सोचा “क्यों न इसे पीकर खत्म कर दूँ। दुनिया में अपना आखिरी मजा ले लूँ।” उसने नीली रोशनी से उसे जलाया और पीने लगा।

अचानक धुएँ का बादल उठा और उसके बीच से एक काला बौना आता दिखाई दिया। वह बोला, “सैनिक तुम्हें क्या चाहिए?” उसने जवाब दिया “कुछ नहीं ।” तब बौने ने कहा, “तुम नीली रोशनी के मालिक हो, इसलिए मुझे तुम्हारी हर बात माननी होगी।” उसने कहा, “सबसे पहले मुझे इस कुएँ से बाहर निकालो ।” उसके कहने की देर थी कि बौना उसका हाथ पकड़कर उसे नीली रोशनी समेत ऊपर ले आया। सैनिक फिर बोला, “अब एक दया और करो, उस बुढ़िया को मेरी जगह कुएँ में डाल दो ।” बौने ने यह भी कर दिया। अब उन्होंने उसका खजाना ढूँढ़ना शुरू कर दिया। सैनिक जितना सोना-चाँदी ले जा सकता था, उतना उठाने लगा। फिर बौने ने कहा, “अगर कभी मेरी जरूरत पड़े तो तुम सिर्फ नीली रोशनी से अपना पाइप जलाना और मैं फौरन तुम्हारे पास पहुँच जाऊँगा।”

सैनिक अपनी खुशकिस्मती से बहुत खुश था | वह पहले शहर की सबसे महँगी सराय में गया। उसने कुछ बढ़िया कपड़े बनवाये और अपने लिए एक अच्छा-सा कमरा तैयार करने को कहा। यह सब हो जाने पर उसने बौने को बुलाया और बोला, “राजा ने मुझे एक पैसा भी न देकर भूख-प्यास से मरने को छोड़ दिया था। अब मैं उसे दिखाना चाहता हूँ कि अब मैं मालिक हूँ। आज शाम को राजा की बेटी को यहाँ लाओ, उसे मेरी सेवा करनी होगी ।” बौना बोला, “यह खतरनाक काम है।” पर चला गया। फिर गहरी नींद में सोती राजकुमारी को सैनिक के पास ले आया।

अगले दिन बहुत सुबह वह उसे वापिस छोड़ आया। राजकुमारी अपने पिता को देखते ही कहने लगी, “मैंने पिछली रात एक अजीब-सा सपना देखा; मुझे लगा कि मुझे हवा में उड़ाकर एक सैनिक के घर ले जाया गया। वहाँ मैंने नौकरानी की तरह उसकी सेवा की ।” राजा इस अजीब कहानी के बारे में सोचता रहा। फिर उसने अपनी बेटी से कहा कि वह अपनी जेब में छेद करके मटर भर ले। जो वह कह रही है वह अगर सपना नहीं, सच हुआ तो गली में मटर के दानों के गिरने से यह पता चल जाएगा कि वह किधर गई थी। उसने वैसा ही किया पर बौने ने भी यह बात सुन ली थी। शाम होने पर सैनिक ने फिर से राजकुमारी को लाने के लिए कहा। बौने ने दूसरी गलियों में भी मटर के दाने बिखेर दिए। अब यह जानना मुश्किल हो गया कि कौन-से राजकुमारी की जेब से गिरे । इधर लोग-बाग सारा दिन मटर के दाने बटोरते रहे और साथ ही यह भी सोचते रहे कि इतने सारे दाने कहाँ से आए।

राजकुमारी ने फिर पिता को बताया कि उसके साथ दुबारा वैसा ही हुआ, तब राजा ने कहा, “तुम अपने साथ अपना एक जूता ले जाना और वहाँ छिपा देना जहाँ तुम्हें ले जाया जाएगा।” बौने ने यह भी सुन लिया। जब सैनिक ने फिर से राजकुमारी को लाने को कहा तब बौना बोला, “इस बार मैं तुम्हें नहीं बचा सकता। मुझे लगता है कि इस बार तुम जरूर पकड़े जाओगे, और यह दुर्भाग्य होगा ।” पर सैनिक नहीं माना। तब बौने ने समझाया कि “ध्यान रखना, सुबह जल्दी शहर के दरवाजे से बाहर निकल जाना।” राजकुमारी ने पिता के कहे के अनुसार सैनिक के कमरे में एक जूता छिपा दिया। उसके वापिस पहुँचने के बाद राजा ने पूरे शहर में जूता ढूँढ़ने का आदेश दिया। जूता जहाँ छिपाया गया था, वहाँ मिल गया। सैनिक भागा तो सही पर जल्दी न करने की वजह से पकड़ा गया और जंजीरों से बाँधकर जेल में डाल दिया गया। सबसे बुरी बात यह हुई कि शहर छोड़ने की जल्दी में वह नीली रोशनी, सोना-चाँदी सब अपने कमरे में ही छोड़ गया। अब उसकी जेब में सिर्फ एक अशर्फी थी।

वह उदास खड़ा जेल की जाली के बाहर देख रहा था, तभी उसे अपना एक दोस्त जाता दिखा। उसने उसे पुकारकर कहा, “मेरा एक बण्डल सराय में छूट गया है, अगर तुम ला दोगे तो मैं तुम्हें एक अशर्फी दूँगा।” उसके दोस्त को लगा, इतने से काम के बदले में एक अशर्फी तो काफी है। वह गया और लाकर सैनिक को दे दिया। सैनिक ने फौरन पाइप जलाया, धुआँ उठने के साथ उसका दोस्त वह बौना आ गया। वह बोला, “मालिक डरना मत। बस जब आपकी पेशी होगी तब नीली रोशनी को साथ ले जाना मत भूलना। बाकी हिम्मत रखना, सब कुछ अपनी गति से चलने देना ।” जल्दी ही पेशी हुई, मामले की पूरी छानबीन हुई, कैदी को दोषी पाया गया। जब फैसला सुनाया गया तो उसे फाँसी की सज़ा दी गई।

उसे ले जाया जा रहा था, तब उसने राजा से एक बात की अनुमति माँगी। राजा ने पूछा “क्या चाहिए?” वह बोला, “मुझे रास्ते में एक पाइप पी लेने दो ।” राजा ने कहा, “एक नहीं दो पियो ।” तब उसने नीली रोशनी से अपना पाइप जलाया, पल-भर में बौना उसके सामने खड़ा था। सैनिक ने हुक्म दिया, “इस सारी भीड़ को या तो भगा दो या मार दो। रही राजा की बात, तो उसे तीन टुकड़ों में काट दो।” बौने ने सब काम करना शुरू कर दिया, जल्दी ही भीड़ हटा दी; पर राजा ने दया की भीख माँगी। अपनी जान के बदले में वह सैनिक को अपनी बेटी देने के लिए तैयार हो गया। उसने यह भी मान लिया कि उसके बाद पूरे राजपाट का मालिक वह सैनिक ही होगा।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Germany ki Lok Kathayen-3/ जर्मनी की लोक कथाएँ-3

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी- सुनहरा हंस: जर्मनी की लोक-कथा

एक आदमी के तीन बेटे थे। सबसे छोटे को वे डमलिंग पुकारते थे। पूरा परिवार हर वक्ती उससे चिढ़ता था और उसके साथ दुर्व्यवहार करता था। एक दिन बड़े बेटे के दिमाग में आया कि वह जंगल जाकर ईंधन के लिए लकड़ी काट लाये। उसकी माँ ने उसके लिए बढ़िया ख़ाना और शराब की एक बोतल साथ में दी जिससे वह काम के बीच ताजा हो सके। जब वह जंगल पहुँचा तो एक बूढ़े आदमी ने उसे सुप्रभात कहा, फिर बोला, “मुझे बहुत भूख और प्यास लगी है, क्या तुम अपने खाने में से थोड़ा-सा मुझे दोगे?” उस होशियार युवक ने कहा, “तुम्हें अपना खाना और शराब दूँ? जी नहीं, यह मेरे लिए भी पूरा नहीं होगा ।” और चला गया। उसने पेड़ काटना शुरू किया पर अभी ज्यादा देर काम किया भी नहीं था कि उसका वार चूक गया और उसने खुद को घायल कर लिया। उसे घर लौटना पड़ा ताकि घाव की मरहम-पट्टी करवा सके। ये गड़बड़ी उस बूढ़े आदमी की शैतानी से हुई थी।

अगली बार दूसरा बेटा- काम के लिए निकला, माँ ने उसके साथ भी खाना पानी दिया; उसे भी वह बूढ़ा मिला । फिर उसने खाने-पीने को माँगा । यह लड़का भी अपने को समझदार मानता था, इसलिए बोला, “जो तुम्हें दूँगा वह कम नहीं हो जाएगा? तुम अपने रास्ते जाओ।” छोटे आदमी ने यह ध्यान रखा कि उसे उसका इनाम मिले। लड़के ने अगला वार जो पेड़ पर किया वह उसकी टाँग पर लगा, उसे भी घर लौटना पड़ा।

अब डमलिंग ने पिता से कहा, “पिताजी, मैं भी लकड़ी काटने जाना चाहता हूँ।” उन्होंने जवाब दिया “तुम्हारे भाई तो लँगड़े होकर आ गए, बेहतर होगा कि तुम घर पर रहो क्योंकि तुम इस बारे में कुछ भी नहीं जानते ।” पर वह जिद करता रहा तो पिता ने कहा, “जाओ, चोट खाओगे तो अक्ल आ जाएगी ।” उसकी माँ ने उसे सूखी डबलरोटी और एक खट्टी बीयर दी। तब वह जंगल में गया तो उसे भी बूढ़ा आदमी मिला जिसने इससे खाना-पानी माँगा। डमलिंग बोला, “मेरे पास तो सिर्फ सूखी डबलरोटी और खट्टी बीयर है। अगर यह तुम्हें ठीक लगे तो हम मिलकर खा लेंगे। वे बैठे, जब लड़के ने खाना निकाला तो सूखी डबलरोटी की जगह बढ़िया खाना और खट्टी बीयर की जगह बढ़िया शराब थी। उन्होंने पेट-भर कर खाया। जब ये निकट गए तो बूढ़े ने कहा, “तुम बड़े दयालु हो। तुमने मेरे साथ सब कुछ बाँटा, मैं तुम्हें वरदान देता हूँ। वहाँ एक पुराना पेड़ है। उसे काटो, उसकी जड़ में तुम्हें कुछ मिलेगा ।” फिर उसने लड़के से विदा ली और चला गया।

डमलिंग काम में लग गया। उसने पेड़ काटा, जब पेड़ गिरा तो जड़ के नीचे की खोखली जगह में शुद्ध सोने के पंखों वाला एक हंस मिला। लड़के ने उसे उठा लिया। वह रात बिताने के लिए एक सराय में ठहर गया। सराय के मालिक की तीन बेटियाँ थीं। उन्होंने जब हंस को देखा तो उसे अच्छी तरह देखने जाने को बेचैन हो उठीं। वे उसका एक पंख उखाड़ना चाहती थीं। सबसे बड़ी बोली, “मैं उखाड़ती हूँ।” वह उसके घूमने का इन्तजार करती रही, फिर हंस को उसके पंखों से पकड़ लिया, पर जब हाथ हटाने की कोशिश करने लगी तो ताज्जुब में पड़ गई क्योंकि वह तो जैसे पंखों से चिपक ही गई। तभी दूसरी बहिन आई, वह भी एक पंख लेना चाहती थी, पर जैसे ही उसने अपनी बहिन को छुआ वह उससे चिपक गई। तीसरी आई वह भी पंख लेना चाहती थी, पर दोनों बहनें चिल्लाई, “दूर रहो, भगवान के लिए दूर रहो।” उसकी समझ में ही नहीं आया कि वे दोनों क्या कहना चाह रही हैं। उसने सोचा, “अगर ये दोनों यहाँ हैं तो मैं भी यहीं जाती हूँ और वह उधर ही चली गई, पर बहिनों को छूने की देर थी कि वह भी हंस के साथ वैसे ही चिपक गई जैसे उसकी बहिनें चिपकी थीं। वे सारी रात हंस के साथ रहीं।

अगली सुबह डमलिंग ने हंस को बगल में दबाया और चल दिया। वे तीनों बहिनें हंस के साथ चिपकी थीं पर उसने ध्यान ही नहीं दिया, वह जहाँ जाता, जितनी तेज जाता, उन्हें भी जाना पड़ता था चाहे वे चाहें या नहीं क्योंकि वे चिपकी थीं।

जाते-जाते उन्हें खेत के बीच एक पादरी मिला। उसने जब यह कतार जाती देखी तो लड़कियों से बोला, “तुम्हें मैदान के बीच से एक युवक के पीछे इस तरह भागते हुए शरम नहीं आती? क्या यह ठीक है?” और उसने सबसे छोटी लड़की का हाथ पकड़ा ताकि उसे खींचकर रोक ले, पर वह तो खुद भी चिपक गया। अब कतार में लड़कियों के बाद पादरी भी जुड़ गया। उधर से पादरी का मुंशी निकल रहा था। उसने जब अपने मालिक को तीन लड़कियों के पीछे भागते देखा तो वह ताज्जुब में पड़ गया और चिल्लाकर पूछने लगा, “मालिक, इतनी जल्दी में कहाँ जा रहे हैं? आज तो किसी के घर नामकरण करने जाना है।” जवाब न मिलने पर उसने दौड़कर पादरी का चोगा पकड़ लिया जिससे उसे रोक ले, पर वह भी चिपक गया। अब ये पाँचों एक-दूसरे से चिपके हुए भागे जा रहे थे। तभी इन्हें काम से लौटते हुए दो मजदूर दिखे जो फावड़े लिये हुए थे। पादरी चिल्लाया, “मुझे छुड़ा दो ।” पर छूने की देर थी कि वे दोनों भी चिपक गए। अब ये सातों डमलिंग और उसके हंस के पीछे दौड़ रहे थे।

आखिर वे एक ऐसे शहर में पहुँचे जहाँ के राजा की केवल एक बेटी थी और वह भी बिल्कुल उदास हो गई थी। कोई उसे हँसा नहीं पा रहा था। यहाँ तक कि राजा ने सब तरफ यह एलान करवा दिया कि जो उसे हँसा पाएगा, उससे उसकी शादी कर दी जाएगी। यह बात सुनकर वह युवक अपने हंस और उसकी कतार के साथ उसके सामने गया। जैसे ही राजकुमारी ने सातों को एक दूसरे से चिपके हुए और एक-दूसरे के पीछे भागते हुए देखा तो वह ऊँची आवाज में हँस पड़ी और देर तक हँसती रही। राजा के वचन के अनुसार डमलिंग और राजकुमारी की शादी हो गई, वह राजा का वारिस बना और बहुत साल तक अपनी पत्नी के साथ खुशी की जिन्दगी जीया।

(ग्रिम ब्रदरज़)

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Germany ki Lok Kathayen-4/ जर्मनी की लोक कथाएँ-4

ग्रिम ब्रदर्स की कहानी-बौने और मोची: जर्मनी की लोक कथा

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एक शहर में एक मोची अपने परिवार के साथ रहता था। उसके घर के पास ही उसकी एक छोटी सी दुकान थी, जहाँ वह जूते बनाने और बेचने का काम किया करता था। जूते बेचकर उसे जो पैसे मिलते, उससे उसका और उसके परिवार का गुजारा चलता था।

वह अपने काम में निपुण था और मेहनती भी। इसके बावजूद भी एक समय ऐसा आया कि जब उसके बनाये जूते बिकने कम हो गए। जो बिकते, वे भी बहुत कम दाम पर।

उचित दाम न मिल पाने के कारण उसका धंधा मंदा चलने लगा। उसकी दुकान पर आने वाले ग्राहकों की संख्या कम हो गई। नतीजतन उसकी जमा-पूंजी समाप्त होने लगी। स्थिति ये आ गई कि घर चलाने के लिए उसे पत्नी के गहनें गिरवी रखने पड़े, घर का सामान बेचना पड़ा।

यह बुरा दौर उसकी चिंता का कारण बन गया। वह हर समय चिंता में डूबा रहता। उसे चिंतित देख उसकी पत्नी हमेशा ढाढस बंधाती, “देखिये, ऊपर वाला सब देख रहा है। उस पर भरोसा रखिये। यकीन मानिये सब ठीक हो जायेगा।” पत्नी की बात पर वह मुस्कुरा देता। लेकिन अंदर ही अंदर चिंता में घुलता रहता।

उसकी दुकान में जूते बनाने का सामान भी ख़त्म हो चला था। तैयार जूतों में बस एक जोड़ी जूते बचे थे, जिसे ख़रीदने दुकान पर कोई ग्राहक नहीं आ रहा था। एक दिन वह अपने बनाये आखिरी जूते बेचने बाजार चला गया। जूते बिक गए। जो पैसे मिले, उससे उसने घर की ज़रूरत का कुछ सामान ख़रीदा और घर वापस आने लगा। रास्ते में उसे एक गरीब बूढ़ी औरत दिखाई दी। उसने कुछ पैसे देकर उसकी मदद की और घर चला आया।

शाम को जब वह अपनी दुकान में गया, तो देखा कि वहाँ चमड़े का बस एक छोटा टुकड़ा बचा हुआ है। उस टुकड़े से सिर्फ़ एक जूता बन सकता था। उसने जूते बनाने के लिए चमड़ा तो काट लिया, लेकिन रात हो जाने के कारण जूते नहीं बना पाया। अगले दिन जूते बनाने का सोच वह घर आकर सो गया।

अगली सुबह वह जब अपनी दुकान पर गया, तो चकित रह गया। जहाँ वह चमड़ा काटकर रख गया था, वहाँ बहुत ही सुंदर जूते रखे हुए थे। इतने सुंदर जूते उसने कभी देखे ही नहीं थे। उन्हें बेचने जब वह बाज़ार गया, तो उसे उसके बहुत अच्छे दाम मिले।

वापसी में घर के लिए कुछ सामान के साथ ही उसने जूते बनाने का सामान भी खरीदा। कुछ पैसे उसने ज़रूरतमंदों को दान में भी दिए।

उस रात उसने दो जूते बनाने के लिए चमड़ा काटकर रखा। अगली सुबह दुकान में उसे दो जोड़ी सुंदर जूते मिले। वह हैरान था। जब उसने यह बात अपनी पत्नी को बताई, तो पत्नी बोली, “देखा मैंने कहा था न कि ऊपरवाला सब देख रहा है। उसका ही आशीर्वाद है कि कोई नेकदिल इंसान हमारी मदद कर रहा है।”

मोची के चमड़े काटकर छोड़ने और फिर अगले दिन बने-बनाए जूते मिलने का सिलसिला जारी रहा। एक से दो, दो से तीन और फिर रोज़ उसे कई जोड़ी जूते मिलने लगे। वे जूते ग्राहकों को बहुत पसंद आने लगे। बाज़ार में उसका नाम हो गया और उसकी दुकान में ग्राहकों की भीड़ लगने लगी। अच्छे दाम में जूते बिकने से मोची ने अच्छा-ख़ासा पैसा कमा लिया। उसकी आर्थिक स्थिति सुधर गई।

वह और उसकी पत्नी सदा मन ही मन उन नेकदिल लोगों का धन्यवाद करते थे, जो रोज़ रात उनकी दुकान पर आकर जूते बना जाते थे। एक दिन मोची की पत्नी बोली, “इतने समय से कोई हमारी इतनी मदद कर रहा है और हमें उनके बारे में कुछ भी पता नहीं। क्यों ना आज रात जागकर हम दुकान की रखवाली करें और देंखे कि कौन रोज़ हमारी मदद के लिए आता है?”

मोची को पत्नी की बात जंच गई। उस रात दोनों सोये नहीं, बल्कि दुकान में जाकर छुप गए। कुछ घंटे इंतज़ार करने के बाद उन्होंने देखा कि खिड़की के रास्ते तीन बौने दुकान के भीतर आये और गीत गुनगुनाते हुए कटे हुए चमड़ों से जूते बनाने लगे। मोची और उसकी पत्नी उन्हें छुपकर देखते रहे। रात भर मेहनत कर जूते बनाने के बाद तीनों बौने खिड़की के रास्ते ही वापस चले गए।

उनके जाने के बाद मोची और उसकी पत्नी आपस में बात करने लगे। मोची की पत्नी बोली, “उन तीन बौनों ने हमारी बहुत मदद की है। हमें उन्हें उपहार देकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।”

“तुम ही बताओ, हमें उन्हें उपहार में क्या देना चाहिए? मोची ने पूछा।

“तुमने ध्यान दिया, उनके कपड़े और जूते पुराने हो चुके थे। मैं उनके लिए नए कपड़े सिल देती हूँ और तुम उनके लिए नए जूते बना देना।”

मोची मान गया। बाज़ार से सामान लाकर वे बौनों के लिए कपड़े और जूते बनाने लगे। कुछ दिनों में कपड़े और जूते तैयार हो गये। कपड़े बहुत ही सुंदर बने थे और जूते शानदार थे। उस रात चमड़े के स्थान पर उन्होंने बौनों के लिए तैयार किये कपड़े और जूते रख दिए।

रात जब तीनों बौने दुकान के भीतर आये, तो चमड़े के स्थान पर अपने नाप के कपड़े और जूते देखकर बड़े ख़ुश हुए। कपड़े और जूते पहनकर वे नाचने-गाने लगे। उन्हें नाचता-गाता देख मोची और उसकी पत्नी बहुत ख़ुश हुए। वे समझ गए कि बौनों को उनका उपहार पसंद आ गया है।

उस रात के बाद कुछ रोज़ तक मोची ने देखा कि उसके काटे गए चमड़े दुकान में जस-के-तस पड़े हुए हैं। बौनों ने वहाँ आना बंद कर दिया था। मोची समझ गया कि बौने अब कभी नहीं आयेंगे।

बौनों को मोची की जितनी मदद करनी थी, वे कर चुके थे। अब मोची ने अपनी मेहनत से जूते बनाने का निश्चय किया। इतने दिनों में उसे ग्राहकों की पसंद-नापसंद का अंदाज़ा लग चुका था और हुनर की उसमें कोई कमी नहीं थी। मेहनत से वह जूते बनाने की अपनी कला को और निखारने लगा। अब उसके बनाये जूते भी बौनों द्वारा बनाये गए जूतों जैसे सुंदर थे। ग्राहकों को उसके बनाये जूते भी पसंद आने लगे। वे उसकी दुकान में आते रहे और उसकी दुकान ‘सबसे सुंदर जूतों वाली दुकान’ के रूप में शहर भर में मशहूर हो गई।

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Germany ki Lok Kathayen-5/ जर्मनी की लोक कथाएँ-5

कहानी-सिंड्रेला: जर्मनी की लोक कथा

एक छोटे से शहर में एक अमीर आदमी रहता था। उसकी पत्नी प्रायः बीमार रहती थी। एक बार वह बहुत बीमार पड़ी तो उसे लगा कि वह अब नहीं बचेगी। उसने अपनी इकलौती बेटी सिंड्रेला को अपने पास बुलाया और प्यार से समझाया, ‘मेरी प्यारी बच्ची, तू सदा ईमानदारी और अच्छे बने रहना। अच्छे और सच्चे आदमी की मदद भगवान् भी करता है। इसलिए ईश्वर सदा तेरे साथ रहेगा। मैं भी स्वर्ग से तेरा ध्यान रखूँगी और जब तुझे जरूरत होगी, मैं तेरे आस-पास ही रहूँगी।’ इतना कहकर उस महिला ने सदा के लिए आँखें मूँद लीं। सिंड्रेला अपनी माँ की मृत्यु पर बहुत रोई, क्योंकि अब रोने के अलावा और कोई चारा उसके पास नहीं था। वह रोज अपनी माँ की कब्र पर जाती, उसपर फूल चढ़ाती और जी भरकर रोती।

ऐसे ही दिन गुजरते गए। सर्दियों में जब उसकी माँ की कब्र बर्फ से ढक गई तब भी वह बच्ची उस जगह पर रोज जाती, कब्र के ऊपर की बर्फ साफ करती, उसपर फूल चढ़ाती और अपनी माँ के लिए आँसू बहाती।

एक साल भी नहीं बीत पाया था कि उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली। उसकी सौतेली माँ की भी दो बेटियाँ थीं। वे दोनों देखने में तो सफेद थीं, पर दिल से बहुत काली थीं। वे दोनों बहनें अपनी सौतेली बहन सिंड्रेला से बहुत चिढ़ती थीं। जब कभी भी मौका मिलता तो सिंड्रेला को खरी-खोटी सुनाने से बाज नहीं आतीं थीं। इस प्रकार घर में सौतेली माँ और सौतेली बहनों के आने से सिंड्रेला का खराब समय शुरू हो गया। दोनों बहनें घर का कुछ भी काम नहीं करती थीं, पर सिंड्रेला को कभी आराम से नहीं बैठने देती थीं। कभी उसे मूर्ख और गँवार कहकर उसका अपमान करतीं, तो कभी कहतीं, ‘जो रोटी खाना चाहेगा तो उसे इसके लिए काम भी करना पड़ेगा।

तू तो रसोई में ही ठीक रह सकती है। जा रसोई में, यहाँ क्यों बैठी है ?’ उन दोनों बहनों ने सिंड्रेला के सारे खिलौने और सुंदर-सुंदर कपड़े भी उससे छीन लिये तथा अपने पुराने तथा भद्दे से कपड़े उसे पहनने के लिए दे दिए और उसके सुंदर से जूतों की जगह उसे लकड़ी के जूते बनवाकर दिए, ताकि जल्दी-जल्दी वह जूते न तोड़े। उसे भद्दे और मैले कपड़ें पहनाकर दोनों सौतेली बहन जी भरकर उसका मजाक बनातीं। अपने पिता से भी अपना दुःख कह नहीं सकती थी, क्योंकि एक तो वह सारा दिन व्यापार में व्यस्त रहता और दूसरे, वह अपनी दूसरी पत्नी के मामले में दखल देना नहीं चाहता था। इसलिए जैसा उसकी सौतेली माँ और बहनें करतीं या कहतीं, वह भी चुपचाप सहन करती रहती। अब रसोई के सारे काम उसे ही करने पड़ते। उसे सुबह-सुबह जल्दी उठा दिया जाता, क्योंकि उसके सोने का स्थान अब उसका रसोईघर ही था। रोज सुबह-सुबह वह पानी भरकर लाती, घर के सभी लोगों के लिए नाश्ता-खाना बनाती, उनके कपड़े धोती और पूरे घर की सफाई करती। इन सब कामों के बाद भी उसकी सौतेली माँ और दोनों बहनें खरी-खोटी सुनाती रहतीं।

जरा सा भी नुकसान होने पर उसे मार भी पड़ती। घर का सारा काम खत्म करने के बाद अगर कुछ समय बचता तो सौतेली माँ उसके आगे अनाज और दालें साफ करने को रख देती। पानी की कमी की वजह से सिंड्रेला रोज-रोज स्नान भी नहीं कर पाती थी। इसलिए गंदे कपड़ों और उलझे हुए बालों से उसकी शक्ल एक नौकरानी जैसी हो गई। उसे देककर कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह किसी अमीर बाप की बेटी है।

एक बार उसका पिता एक मेले में जाने के लिए तैयार हुआ तो उसने पहले अपनी दोनों सौतेली बेटियों से पूछा, ‘तुम्हें मेले से क्या मँगाना है ?’ बड़ी लड़की ने कहा, ‘मुझे सुंदर-सुंदर कपड़े चाहिए।’ दूसरी लड़की ने कहा, ‘मुझे मोतियों और बहुमूल्य पत्थरों की मालाएँ चाहिए।’ आखिर में उसने सिंड्रेला से पूछा, ‘तुम मेले से अपने लिए क्या मँगाना चाहती हो ?’ सिंड्रेला बोली,‘पिताजी, मेरे लिए आप चिलगोजे का एक छोटा सा पौधा लाइएगा। जब आप वापस घर आएँगे तो रास्ते में जरूर मिल जाएगा।’

मेले में अमीर आदमी ने अपनी पत्नी और दोनों सौतेली बेटियों के लिए वह सबकुछ खरीदा जो उन्होंने मँगाया था, पर अपनी सिंड्रेला के लिए पौधा उसे मेले में कहीं नहीं मिला। जब वह अपने घर जाने लगा तो रास्ते में उसे चिलगोजे का एक छोटा सा पौधा लगा दिखाई दिया, उसने उसे उखाड़ लिया। वह सोचने लगा कि सिंड्रेला ने कोई भी कीमती चीज न माँगकर चिलगोजे का एक नन्हा सा पौधा ही क्यों माँगा ? पर उसकी समझ में कुछ नहीं आया। घर पहुँचकर उसने मेले से लाए उपहार तीनों बेटियों के दिए। सिंड्रेला ने वह नन्हा पौधा ले जाकर अपनी माँ की कब्र के पास लगा दिया। पौधा लगाते समय उसे इतना रोना आया कि पौधे की सारी मिट्टी उसके आँसुओं से गीली हो गई।

धीरे-धीरे वह पौधा बड़ा होने लगा। सिंड्रेला हर रोज सुबह-शाम अपनी माँ की कब्र पर जाती, उसके पास अपने सारे दुःख सुनाती और जी भरकर रो लेती। पौधा बड़ा होने लगा। चिलगोजे के उस छोटे से पेड़ पर एक सफेद चिड़िया आकर रहने लगी। जब कभी सिंड्रेला अपनी माँ की कब्र पर अपनी कोई इच्छा प्रकट करती तब वह सफेद चिड़िया उसकी हर इच्छा को पूरा कर देती।

एक बार की बात है। वहाँ के राजा ने अपने राजकुमार की पसंद की लड़की ढूँढ़ने के लिए एक उत्सव आयोजित किया। यह उत्सव तीन दिनों तक चलना था। इस उत्सव में उसने अपने राज्य की सभी सुंदर और अमीर घरों की लड़कियों को निमंत्रण भेजा। सिंड्रेला की दोनों सौतेली बहनें, जो सुंदर भी थीं और अमीर बाप की बेटी भी, इस उत्सव के लिए आमंत्रित थीं। राजमहल से निमंत्रण पाकर दोनों बहनें खुशी से फूली न समाईं। उन्होंने सिंड्रेला को बुलाकर अपनी कंधी करवाई। फिर उससे अपने जूतों पर पालिश करवाई, उसी से उन जूतों के फीते बँधवाए और फिर अच्छी तरह सज-धजकर दोनों बहनें बोलीं, ‘तू घर का सारा काम ठीक ढंग से करना। हम दोनों राजमहल के उत्सव में जा रही हैं।’

उन दोनों के जाने के बाद सिंड्रेला को बहुत रोना आया, क्योंकि वह खुद भी इस उत्सव में जाना चाहती थी, पर उसके पास न ही सुंदर कपड़े थे और न ही सुंदर जूते। उसने अपनी सौतेली माँ से महल में जाने की अनुमति माँगी, तो वह चीखकर बोली, ‘तू भाग्यहीन तो पूरी तरह से चूल्हे की राख से अटी हुई है। राजकुमार के विवाह में जाएगी ? भाग यहाँ से और चुपचाप घर का काम कर। यह उत्सव तेरे लिए नहीं है।’

सिंड्रेला फिर भी अपनी माँ से अनुनय-विनय करती रही तो सौतेली माँ ने तंग आकर दो-तीन दालें मिलाकर उसे साफ करने के लिए बोली, ‘अगर तू ये तीनों दालें दो घंटे में अलग कर देगी, तो मैं तुझे जाने की अनुमति दे सकती हूं।’ सिंड्रेला ने दालों की वह थाली चुपचाप उठाई और बाहर बाग में बैठकर अपनी माँ को याद करके रोने लगी। वह सोचने लगी कि अगर उसकी अपनी माँ आज जिंदा होती तो वह भी इस उत्सव के लिए जरूर जाती। तभी वह सफेद पक्षी उसके पास आया और थोड़ी ही देर में उसने सारी दालें अलग कर दीं। सिंड्रेला की खुशी का ठिकाना न रहा। वह एक घंटे बाद जब तीनों दालें अलग करके अपनी सौतेली माँ के सामने पहुँची, तो सौतेली माँ हैरान रह गई, क्योंकि उसने तो सोचा था कि सारा दिन लगाने पर भी यह लड़की इन दालों को अलग नहीं कर पाएगी। अब भी वह उसे उस उत्सव में जाने नहीं देना चाहती थी। वह बोली, ‘तू इस राजमहल के उत्सव में कैसे जा सकती है ? न तो तू साफ सुथरी है, न ही तेरे पास सुंदर कपड़े और जूते हैं। राजमहल के सारे लोग तेरा मजाक बनाएँगे और इससे तेरे पिता की भी बदनामी होगी।’ इतना कहकर वह अपनी दोनों बेटियों के साथ घोड़ा गाड़ी में बैठकर राजमहल की ओर चल दी। अब घर में उसके सिवाय और कोई नहीं था, वह दौड़कर अपनी माँ की कब्र पर गई और उस चिलगोजे के पेड़ के नीचे बैठकर रोते हुए बोली-

‘ओ प्यारे नन्हे पेड़,

खुद को थोड़ा हिला-डुला

और मुझपर सोना-चाँदी गिरा।’

इतना कहते ही उस नन्हे से पेड़ से उसकी गोदी में सोने-चाँदी से कढ़े कपड़े आ गिरे और साथ ही मखमल की सुंदर सी जूतियाँ भी, जिनपर चाँदी की कढ़ाई की हुई थी। सिंड्रेला उन दोनों चीजों को लेकर घर की ओर दौड़ी और जल्दी से नहा-धोकर उन कपड़ों और जूतियों को पहनकर महल की ओर चल दी। वह भी पैदलवाले छोटे रास्ते से चलकर नाच शुरू होने से पहले राजमहल में पहुँच गई। उसकी सौतेली माँ और सौतेली बहनों की नजर जब उसपर पड़ी तो वे उसे बिलकुल नहीं पहचान पाईं, क्योंकि वह इस समय सोने-चाँदी से कढ़े कपड़े और मखमली जूते पहनकर पूरी तरह राजकुमारी लग रही थी।

नाच शुरू होने के कुछ देर बाद राजकुमार सिंड्रेला के पास आया और उसके साथ नाचने की इच्छा व्यक्त की। वह खुशी से राजकुमार के साथ नाचने लगी। जब राजकुमार बहुत देर तक सिंड्रेला के साथ ही नाच करता रहा तो उस उत्सव में आई अन्य सभी लड़कियों को राजकुमार पर बहुत गुस्सा आया। जब कोई अन्य लड़की राजकुमार के साथ नाचने के लिए उसके पास जाती तो वह कहता, ‘अभी नहीं, बाद में।’ इस तरह राजकुमार सिंड्रेला के साथ नाचता रहा। धीरे-धीरे शाम होने लगी तो सिंड्रेला का दिल घबराने लगा। वह राजकुमार से अपने घर वापस जाने की आज्ञा माँगने लगी, पर राजकुमार उससे इतना प्रभावित था कि उसका साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं था। वह खुद भी उसके साथ घर जाना चाहता था, क्योंकि वह यह जानना चाहता था कि इतनी सुंदर बेटी किसकी है और कहाँ रहती है ? इधर सिंड्रेला को अपने घर पहुँचने की जल्दी थी, क्योंकि वह अपनी सौतेली माँ और बहनों से पहले घर पहुँचना चाहती थी। वह बहाना बनाकर राजकुमार से हाथ छुड़ाकर चुपचाप महल के पिछले दरवाजे से बाहर निकल गई। अपनी सौतेली माँ और दोनों बहनों के घर पहुँचने से पहले ही वह अपने पुराने कपड़े पहनकर घर के काम में लग गई। अपने सुंदर से कपड़े उसने उसी पेड़ की नीचे रख दिए। वह सफेद पक्षी उसे वापस ले गया।

दूसरे दिन फिर उसकी सौतेली माँ अपनी दोनों बेटियों को पहले से ज्यादा सजा-धजाकर राजमहल ले गई। उन तीनों के जाने के बाद वह दौड़ी-दौड़ी अपनी माँ की कब्र पर गई और उस पेड़ को हिलाती हुई बोली-

‘ओ मेरे प्यारे नन्हे पेड़,

खुद को थोड़ा हिला-डुला

और मुझ पर सोना-चाँदी गिरा।’

उस पेड़ ने उसपर पहले की तरह सोने-चाँदी की कढ़ाई वाले कपड़े गिरा दिए। आज के कपड़े और जूते पिछले दिन के कपड़ों और जूतों से भी सुंदर थे। उन कपड़ों में वह जैसे ही राजमहल में घुसी, सबकी निगाहें उसी पर टिक गईं। राजकुमार भी उसे ढूँढ़ता हुआ उसके पास पहुँच गया। वह उसका हाथ पकड़कर नाचने वाले हॉल में ले गया और उसीके साथ नाचने लगा। आज भी वह केवल उसके साथ नाचना चाहता था। लड़कियों की भीड़ में उसे केवल यही एक लड़की पसंद आई थी। जैसे ही शाम होनी शुरू हुई, वह घबराने लगी। उसे नाचने में कोई आनंद नहीं आ रहा था। वह अपनी माँ और बहनों से पहले अपने घर पहुँचना चाहती थी। जब उसने घर जाने की इच्छा व्यक्त की तो राजकुमार भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। राजकुमार की नजर बचाकर वह पीछे के दरवाजे से झाड़ियों में गुम हो गई। बेचारा राजकुमार अँधेरे में देख नहीं पाया। राजकुमार महल के पीछेवाले बाग में उस सुंदर लड़की को ढूँढ़ता रह गया और इधर सिंड्रेला ने झट से अपने सुंदर कपड़े उतारकर अपनी माँ की कब्र के पासवाले पेड़ के नीचे रखे और वही मैले-कुचैले कपड़े पहनकर अपने दोनों हाथ और मुँह चूल्हे की राख से ऐसे रँग लिये जैसे लगे कि वह सारा दिन रसोई से बाहर ही नहीं निकली है। उसकी सौतेली माँ जब अपनी दोनों बेटियों के साथ घर पहुँची तो उसे बहुत तसल्ली हुई कि वह सुंदर लड़की सिंड्रेला नहीं थी, जबकि उस लड़की की सूरत उससे बहुत मिलती-जुलती थी।

तीसरे दिन भी जब सौतेली माँ अपनी दोनों बेटियों को लेकर राजमहल के उत्सव के लिए रवाना हुई तो सिंड्रेला दौड़ी-दौड़ी अपनी माँ की कब्र के पास गई और उसने उस पेड़ के नीचे खड़े होकर अपनी पहलेवाला गाना फिर दोहराया तो फिर से उस पेड़ से चमक-धमक वाले सुंदर कपड़े उसके हाथ में आ गिरे और बाद में असली सोने की बनी हुई सैंडिल भी। जल्दी से नहा-धोकर वह सुंदर कपड़े और सोने की सैंडिल पहनकर राजमहल में पहुँची। आज फिर सब उसकी सुंदरता तथा कपड़ों की देखते रह गए। नाच अभी शुरू नहीं हुआ था, क्योंकि राजुकमार अपनी पसंद की सुंदर और सुकोमल लड़की को ढूँढ़ रहा था। जैसे ही सिंड्रेला नाचवाले बड़े हॉल में घुसी तो राजकुमार तेजी से उसके पास आया और उसे अपने साथ नाचने के लिए आमंत्रित किया। अगर कोई और लड़की उसके साथ नाचने की इच्छा व्यक्त करती तो वह यही कह देता, ‘अभी कुछ इंतजार करो। मैं बाद में तुम्हारे साथ नाचूँगा।’

इसी तरह नाच करते-करते शाम होने लगी और सिंड्रेला को घर जाने की जल्दी होने लगी। राजकुमार के सामने उसने बहाना बनाया और तेजी से राजमहल से गायब हो गई। राजकुमार काफी देर तक उस लड़की के वापस आने की प्रतीक्षा करता रहा। बाद में वह महल के पिछली ओर गया, क्योंकि पहले भी वह लड़की पीछे की ओर से निकलकर कहीं गायब हो गई थी। वहाँ पर उसे सोने की एक सैंडिल मिली। उसने झट से उस सैंडिल को उठाकर देखा कि वह खूबसूरत सैंडिल सोने से बुनी हुई थी। राजकुमार ने अपने पिता के सामने शर्त रखी कि वह उसी लड़की से विवाह करेगा, जिसके पैर में सोने की यह सैंडिल ठीक-ठीक आ जाएगी। राजा ने अपने राज्य में घोषणा करवा दी कि राजकुमार उसी लड़की को अपनी पत्नी बनाएगा, जिसके पैर में वह सोने की सैंडिल ठीक आएगी, जो उसे महल के पीछेवाले बाग में मिला था।

राज्य की सभी सुंदर लड़कियों और सिंड्रेला की दोनों सौतेली बहनों ने भी उस सैंडिल को पहनकर देखा, पर वह किसी के पैर में पूरी तरह ठीक नहीं आई। सिंड्रेला की बड़ी सौतेली बहन ने तो रानी बनने के लालच में अपने पैर की अंगुली भी घायल कर ली, पर सैंडिल पहनकर एक कदम भी आगे नहीं चल सकी, क्योंकि वह उसके पैर के लिए बहुत छोटी थी। फिर भी सौतेली माँ ने राजमहल में खबर भेज दी कि उसकी बड़ी बेटी को वह सैंडिल पूरी आ गई है। राजकुमार खुद आकर देख लें। राजकुमार उस अमीर आदमी के घर पहुँचा, जिसकी बेटी के पैरों में सोने की सैंडिल पूरी आई थी। उसने वहाँ जाकर देखा कि लड़की सचमुच ही वह सैंडिल पहने खड़ी है। वह उस लड़की को अपने घोड़े पर बैठाकर अपने महल की ओर चल दिया; पर जैसे ही उसका घोड़ा सिंड्रेला की माँ की कब्र के पास से गुजरा, तभी उसे पेड़ से एक पक्षी की आवाज सुनाई दी-

‘गुटर-गूँ गुटर-गूँ,

इसको लेकर जाता कहाँ तू।

सैंडिल छोटी है इसके पैर में,

तेरी रानी बैठी है घर में।’

राजकुमार ने जब यह गाना सुना तो उसने घोड़ा रोककर उस लड़की के पैर को देखा, तो पाया कि सचमुच ही वह सैंडिल उसके पैर के लिए छोटी थी और इसी वजह से उस लड़की के पैर का अँगूठा और अँगुलियाँ घायल हो गई थीं तथा सैंडिल खून से लाल हो गया था। राजकुमार को उस लड़की की धूर्तता पर बहुत गुस्सा आया। उसने झट से अपना घोड़ा सिंड्रेला के घर की ओर मोड़ दिया। वहाँ पहुँचकर बोला, ‘यह मेरी पत्नी नहीं हो सकती, क्योंकि यह सैंडिल इसके पैर में सही नहीं है। शायद इसकी कोई और बहन होगी, जिसे यह जूता पूरा आता हो।’ सौतेली माँ ने झट से अपनी दूसरी बेटी को बुलाया और उसे वह सैंडिल पहनाकर देखा, पर उसके पाँव की अँगुलियाँ कुछ बड़ी थीं, फिर भी लालची माँ ने उस लड़की को यह सैंडिल जबरदस्ती पहना दी। लड़की बड़ी मुश्किल से चार-पाँच कदम चलकर राजकुमार के पास पहुँची। राजकुमार ने उसे अपने घोड़े पर बैठाया और महल की ओर चल दिया। जैसे ही वह सिंड्रेला की माँ की कब्र के पास पहुँचा तो उसे फिर वही गाना सुनाई दिया। वह घोड़ा रोककर नीचे उतरा तो उसने देखा कि बड़ी बहन की तरह उसके पैर से भी खून निकल रहा था। वह फिर अपने घोड़े को वापस उस लड़की के घर ले गया और उसकी माँ से बोला, ‘यह लड़की भी मेरी रानी नहीं बन सकती, क्योंकि यह सैंडिल इसके पैर के लिए भी छोटी है। क्या तुम्हारी और कोई बेटी है ?’

अमीर आदमी बोला, ‘नहीं, पर मेरी पहली पत्नी की लड़की है, जो अब इस घर में नौकरानी का काम करती है। वह तुम्हारी रानी बनने के लायक नहीं है।’

राजकुमार ने जब उस लड़की से मिलने की इच्छा व्यक्त की तो सौतेली माँ बोली, ‘नहीं-नहीं, तुम उस गंदी लड़की से न ही मिलो तो अच्छा है, वह बहुत गँवार है।’ पर राजकुमार उसी क्षण उसी लड़की से मिलना चाहता था। अतः हारकर सौतेली माँ को राजकुमार के सामने सिंड्रेला को उपस्थित करने के लिए तैयार होना ही पड़ा। सिंड्रेला ने झट से अपने हाथ-पैर और मुँह धोया और साफ कपड़े पहनकर राजकुमार के सामने आकर खडी हो गई। राजकुमर को वह चेहरा कुछ जाना-पहचाना लगा, फिर भी वह चुप रहा। उसने सिंड्रेला को सोने की वह सैंडिल पहनने का हुक्म दिया। सिंड्रेला ने अपनी लकड़ी की सैंडिल उतारकर जब उस सोने की सैंडिल में पैर डाला तो उसके पैर में ऐसी सही आई, जैसे यह सैंडिल उसी के लिए बनाई गई हो। अब राजकुमार को पूरा विश्वास हो गया कि यह वही सुंदर लड़की है जिसने तीन दिनों तक उसके साथ नृत्य किया था। वह उसे पाकर बहुत खुश हुआ। राजकुमार ने उस लड़की को अपने घोड़े पर बैठाया और उसके पिता से बोला, ‘मुझे मेरी पसंद की लड़की मिल गई। यही मेरी असली पत्नी है, क्योंकि तीन दिनों तक मैंने इसी लड़की के साथ नृत्य किया था।’