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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Kahani: Credit Card ki Barsi/ हास्य कहानी: क्रेडिटकार्ड की बरसी

नमस्ते! आज बात किसी ऐसे की जिसको साथ होने पर हम कोसते रहते है पर जब पास न हो तो याद ज़रूर आती है| इंसान के जीवन में लगभग हर मोड़ पर ऐसा कोई मिलता ही है, चाहे यार हो या रिश्तेदार| अजी वो छोड़िये अपनी ही औलाद जब हाथ से निकल जाए तो क्या हम कोसते नहीं है? पर अपने तो अपने ही होते हैं, जब छोड़ कर चले जाते हैं तो हर छोटी से छोटी बात याद आती है|
आज इमोशनल होने का कारण और तिथी दोनों ही वाज़िब है, आज हमारे ऐसे ही सुख दुःख के साथी की दूसरी बरसी जो है| मैट ब्लैक फिनिश, उस पर चमकदार रंग से उभरता हमारा नाम साथ ही चमचमाता मास्टर कार्ड का लोगो…..जी हाँ हमारा अपना क्रेडिटकार्ड,….ठीक दो साल पहले आज ही के दिन एक्सपायर हुआ था| ना –ना करते हुए भी तेरह- चौदह साल का साथ तो रहा ही होगा| आज जब दीपावली की सफाई का ड्राई-रन चल रहा था तो अचानक पुराना लिफाफा हाथ में आ गया और वो दिन, वो सारी यादें आँख के सामने आ गई…..लगा मानों कल की ही बात हो……
नौकरी करते करीब तीन-चार साल बीत चुके थे और शुरुआती पड़ाव में ही हम बम्बई की चहल-पहल और लखनऊ की तहजीब देख चुके थे| जैसे ही लखनऊ छोड़ जबलपुर पहुंचे लगा कि गृहस्ती के नाम पर जो कुल जमा दो अटैची लिए फिरते थे अब उसको आगे बढ़ाने का समय आ चुका था| हालाँकि बैचलर थे पर लगा कब तक? आज नहीं तो कल गले मैं माला तो चढ़नी ही है…तो सबसे पहले 2BHK का बड़ा सा घर किराए पर ले लिया| पूरे घर में एक गद्दा, दो अटैची और हम….गलती से भी छींक निकल जाए तो ऐसा लगता था मानो किसी हिल स्टेशन के ईको पॉइंट पर खड़े हो….अपनी ही छींक घूम फिर कर तीन चार बार गूंजती थी| बड़े कॉर्पोरेट की नौकरी थी तो ऑफिस के सहकर्मियों के घर आने से पहले, घर रहने लायक दिखे ऐसा बनाना था….ऐसा नहीं था कि इसके पहले की नौकरियां बुरी थी जो गृहस्ती न जुटा पाए, पर लड़कपन की खुमारी उतरते- उतरते हम बंबई से लखनऊ और लखनऊ से जबलपुर पहुँच चुके थे|
वो उदाहरण तो आप ने सुना ही होगा न कि ‘दो पेपर कप लीजिये और उसके तले में सुराख़ कर दीजिए…एक में एक दो महीन सुराख़ और दुसरे कप में बहुत बड़ा छेद…फिर दोनों कप में पानी डालिए, बारीक सुराग वाले कप में पानी ठहरेगा और धीरे धीरे कर गिरेगा’, यह हुआ उधाहरण उनका जिनकी कमाई और खर्चे में बड़ा अंतर होता है….ठहरने वाला पानी यानी सेविंग| अब अगला उदाहरण हमारे जैसों के लिए….वही बड़े छेद वाला पेपर कप….जितना कमाया सब बाहर बिना किसी देरी के….काहे की सेविंग| माता-पिता तो कह-कह कर थक गए पर हमें तो यही लगता था कि जो आता है वो जाता ही है….एविंग-सेविंग सब मोह माया है|
खैर देर से ही सही सद्बुद्धि आई, लगा कि धीरे-धीरे ही सही पर अब गृहस्ती का सामान जोड़ा जाय| दोस्तों और सहकर्मियों से बात की तो सभी ने अपनी बुद्धि, विवेक और अनुभव के आधार पर अपनी –अपनी राय रख दी….शादी शुदा की राय अलग थी और कुवारों की अलग| न जाने क्यों ऐसी ही किसी राय में क्रेडिटकार्ड का जिक्र चल निकला…नाम तो याद नहीं पर ज़रूर कोई कुंवारा ही होगा, वरना शादी शुदा ऐसी राय दे, कम ही सुना है| हमने खुद शादी के बारह साल में कभी ऐसी सलाह न दी होगी|
तो ज़नाब क्रेडिटकार्ड में दिलचस्पी बढ़ी और थोड़ी रिसर्च के बाद एक नामी बैंक का क्रेडिटकार्ड अप्लाई कर दिया गया..घबराहट तो हो रही थी पर उस ज़माने में क्रेडिटकार्ड अपने आप में स्टेटस सिंबल हुआ करता था, तो एक अलग तरह का एक्साईटमेंट भी था|
सीना तो तब चौड़ा हुआ जब पूरे ऑफिस के सामने ब्लू-डार्ट के कुरियर बॉय ने हमारा नाम पुकारा और एक कड़क शानदार पैकेट हाथ में थमा गया| पूरी जिंदगी खाकी रंग के डाकिये को देखने वाले और बेहद ही इमरजेंसी में मधुर या मारुती कूरियर की सेवा लेने वाले को ब्लू-डार्ट का पैकेट आना वो भी ऑफिस के दसियों लोगों के बीच…..समान की और सामान को रिसीव करने वाले की पर्सीव्ड वैल्यू तो ऐसे ही बढ़ जानी थी|
खैर सारे एक्साईटमेंट और उस ब्लू-डार्ट के पैकेट को हमने डाला दराज़ में और लग गए अपनी दिनचर्या निपटाने| शाम बिना भूले पैकेट अपने बैग में डाला और पहुच गए अपने ईको पॉइंट अर्थात 2BHK फ्लैट पर| एक्साईटमेंट इतना था की खाना पैक कराना ही भूल गए थे, वैसे भी भूख किसे थी| बस फटाफट पैकेट निकला और बिना पलक झपके क्रेडिटकार्ड की अनबॉक्सिंग कर डाली| बीसियों कागज के बीच एक काले रंग का कार्ड….मैट फिनिश और उसपर चमकदार रंग से उभरा हमारा नाम….वाह! लगा मानों देखते ही रहें| कुछ कागजों को उलटने पलटने पर ज्ञात हुआ की निन्यानबे हज़ार की लिमिट थी ….मतलब निन्यानबे हज़ार की खरीददारी….मतलब बहुत सारी| फिर क्या, बाकी कागजों को पलटने की ज़हमत ही नहीं उठाई…वैसे भी इतने बारीक अक्षरों में लिखे थे कि आँख न भी ख़राब हो तो आदमी शक़ में आई-टेस्ट करवा ले|
वो पहला दिन था जब हम, हमारा क्रेडिटकार्ड और हमारा लेदर का पर्स एक दुसरे के पूरक हुए थे, उसके बाद तो दीवान..घड़ी…जूते…टीवी….म्यूजिक सिस्टम…किचन का सामान…….बस एक बार दुकानदार कह भर दे की ‘जी हाँ क्रेडिटकार्ड एक्सेप्ट करते हैं!’, मजाल है जो हम दुकान से खाली हाथ उतर जाएं| पैंतालिस दिन का रोटेशन सर्किल वाकई मज़े दे रहा था…..शापिंग का सिलसिला यूँ की चलता रहा जब तक कि हमारे 2BHK फ्लैट में प्रतिध्वनि होना बंद न हो गया….| अब क्रेडिट पर लिया था तो चुकाना भी था, शुरू-शुरू में तो 2-3 हज़ार का सामन आता था पर चार-पांच महीने बीतते पेमेंट का सिलसिला किश्तों में तब्दील हो गया| हर महीन सात-आठ हज़ार चुकाना ही था| खैर अकेले थे तो संभव था, बस पेपर कप के नीचे जो बड़ा छेद था उस पर टेप मार कर छेद छोटा करना था, और इकठ्ठा होने वाले पानी से क्रेडिटकार्ड की किश्त चुकानी थी| मजबुरी थी तो किया और चुकाते –चुकाते साल बीत गया| अब हम जबलपुर को टाटा –बॉय बोल कर राजस्थान आ चुके थे| नयी नौकरी, नयी जगह, नए लोग…पहले तो लगता था की सभी बड़ी-बड़ी मूछों वाले और पगड़ी पहनने वाले होंगे पर हकीकत अलग थी..जब जयपुर में उतरे तो पता चला विज्ञापन में दिखने वाला राजस्थान और हमारी कर्मभूमि बनने जा रहा राजस्थान दोनों अलग थे|
बैचलर अभी भी थे पर 2BHK का चस्का लग चुका था, वैसे भी मकान ईको पॉइंट न बने जितना सामान तो अब इकठ्ठा हो चुका था तो ब्रोकर की मदद से एक 2BHK जयपुर शहर में भी ले लिया| शुरुवाती कुछ दिन तो क्रेडिटकार्ड की सेवा को विराम दिया पर जुआ, शराब और क्रेडिटकार्ड की लत एक बार लग जाए तो छुटाए नहीं छूटती….वही हुआ जिसका डर था क्रेडिटकार्ड की घिसाई वापस शुरू|
दिन बीते और देखते ही देखते वो दिन भी आ गया जिसका इंतज़ार हर कुंवारा करता है…जी हाँ हमारी शादी तय हो गई थी, अब शादी तय हुई थी तो शादी से जुड़े खर्चे भी होंगे….मोटे तौर पर दिखने वाले और बड़े खर्चों की जिम्मेदारी माता-पीता ने उठा ली थी पर हमारा भी कुछ फ़र्ज़ बनता था आखिरकार अपने ही घर की शादी थी..वो भी अपनी…, ताल ठोक कर कह दिया की अपने कपड़े और हनीमून का खर्चा हम खुद उठाएँगे| घरवालों को भी लगा कि बेटे को जिम्मेदारी का अहसास है तो सभी ने हामी भर दी|
हाँ तो कर दिया था पर लाते कैसे पेपर कप का छेद अब भी काफी बड़ा था, तो बस….. ‘हारे का सहारा….क्रेडिट कार्ड हमारा’…,लिस्ट बनाई और चल पड़े शॉपिंग करने, सूट-शेरवानी…घड़ी…जूते…बेल्ट सब खरीद डाला, करना क्या था बस काले कार्ड को घिसना था और पिन डालना था …इतना ही नहीं हनीमून का होटल….फ्लाइट का टिकट सब बुक हो गया….भला हो क्रेडिट कार्ड का|
लोग भले ही दिन रात कोसे पर उम्मीदों की उड़ान के लिए जिन पंखों की ज़रुरत होती है वो पंख क्रेडिटकार्ड की लगता है ….भले ही कुछ दिन बाद हवा में ही उखाड़ भी दे और आप औंधे मुह ज़मीन पर आ गिरें| वही हुआ क्रेडिटकार्ड की किश्त अब तनख्वाह का मोटा हिस्सा खाने लगी थी पर वाह रे नशा, मजाल है जो एक भी दुकान पर दाम सुन कर शिकन आई हो|
खैर शादी अभी तय हुई थी…हुई नहीं थी, हम अब भी अकेले थे और किस फ़िज़ूल खर्ची पर मेढ़ बाँध कर रोकना है और उस पैसे की नहर से कैसे क्रेडिट कार्ड की सिचाई करनी है हम मैनेज कर ले रहे थे….वैसे भी हम उस विचारधारा के समर्थक थे जिसमें नहाते समय बनियान को पैरों के नीचे रख देते है ताकी शरीर पर लगने वाला साबुन शरीर से होता हुआ बनियान पर गिरे और कपड़े धोने के साबुन के खर्चों में कटौती हो….साथ खुशबू वो बोनस|
पर आप की विचारधारा तब तक ही कारगर है जब तक आप कुंवारें है…एक बार आपने दाम्पत्य जीवन में प्रवेश किया तो सारी विचारधारा की पुड़िया बना कर आप ही की शेरवानी की जेब में डाल दिया जाता है…और आप की पत्नी की विचारधारा ही आप की विचारधारा बन जाती है| सुनने में अजीब लगेगा पर शादी-शुदा लोग हमारी बात से सहमत होंगे ऐसा हमें द्रढ़ विश्वास है| हमारे साथ भी कुछ वैसा ही हुआ…हमारी विचारधारा बदलने लगी…शॉपिंग का एक्सपीरियंस ही बदल गया….एक समय था जब दूर से ऊँगली दिखा कर ही बोल दिया करते थे कि फलां घड़ी या फलां जूता पैक कर दो, पर एक उस हादसे के बाद से तो हमे कल्चरल शॉक लग गया था…कभी सोचा नहीं था की शॉपिंग का ये प्रारूप भी होता होगा….
हुआ यूँ की शादी के कुछ दिन बाद हमारी श्रीमती जी हमारे साथ जयपुर आ गईं, दांपत्य जीवन सुखमय बीतने लगा…हमारी पहली सालगिरह आने वाली थी तो हमने श्रीमति जी को सोने की चेन दिलाने का वादा कर डाला| दोनों खुश थे, वो इस बात से कि पति को साल गिरह याद थी और हम इस बात से कि श्रीमति जी खुश थीं| सालगिरह का दिन आया, प्लान यह बना की पहले शॉपिंग करेंगे फिर शाम किसी शानदार रेस्टोरेंट में डिनर करेंगे..कॉकटेल के साथ| ख़ुशी-ख़ुशी हम दोनों एक बड़ी ज्वेलरी शॉप में पहुचे और सेल्समेन को अपनी आमद का कारण कह सुनाया| हमें क्या पता था कि सोने की चमक में खोना क्या होता था…एक मिडिल क्लास आदमी की नज़र में सोने की चेन, मतलब …वो पतली वाली…एक या सवा तोले की, पर इनसेंटिव पाने वाले ‘स्टार ऑफ़ द मंथ’ सेल्समैन क्या होते है वो तो हमने उस दिन ही महसूस किया| दिखाते ही दिखाते उसने एक तोले से होते हुए चेन का वज़न और हमारी श्रीमति जी का मानस कब साढ़े तीन तोले तक पंहुचा दिया पता ही न चला| आखिरकार एक चेन को देख हमारी श्रीमति जी की आँखों में चमक आ ही गई, उन्होंने हलके से मुस्कुरा कर हमें देखा और बोलीं, ‘ये वाली कैसी है’| हम क्या बोलते, उड़ता तीर भी तो हमने ही लिया था सो बोल दिया, ‘अच्छी है’| इधर चेन से श्रीमतीजी की आँखें चमक रही थी और उधर वजन का कांटा देख हमारे सर पर सितारे चमक रहे थे| दर्द छुपाते हुए सेल्समेन से बोले, ‘हाँ भाई कितने की है…?’ सेल्समेन की वो कुटिल मुस्कान हम आज तक न भूल पाए| वो तो भला को क्रेडिटकार्ड का जो उस समय हमारा सम्मान बच गया, यह बात अलग है की क्रेडिटकार्ड की किश्ते भरते-भरते हमारा आत्मसम्मान ही हमें धिक्कारने लगा था|
खैर समझदार वही होता है जो अपनी गलतियों से सीखता है, उस हादसे के बाद तो हमने तौबा कर लिया कि आगे से चलकर कभी कोई वादा नहीं करेंगे…सरप्राइज गिफ्ट दे दो वो बात अलग है|
धीरे-धीरे समय बदला तो शॉपिंग का नजरिया भी बदला, अब हमारा एक प्रमुख काम कोचवान की तरह गाड़ी इस दुकान से उस दुकान ले जाना भी था| श्रीमति जी का क्या था एक –एक घंटे दुकान पर पचासों कपड़े निकलवाने के बाद कहा ‘पसंद नहीं आया, कही और चलते हैं’, अच्छा ऐसा भी नहीं था की खुद बोल दें, दुकानदार को नए- नए बहाने सुनाकर वहां से बाहर निकालने की जिम्मेदारी भी हमारी थी| समय के साथ समझ आ ही गया कि लेडीज कपड़ों के व्यापारी सिद्ध बाबाओं से कम नही होते…चेहरा पढ़ लेते हैं| शुरू-शुरू में तो लगता था कि आज पिटे या कल पर कसम से पिछले बारह साल में ऐसा मौका आया ही नहीं…इस धैर्य के लिए हम पूरे लेडीज शॉपिंग से जुड़े व्यापारी वर्ग के कृतज्ञ हैं|
लेडीज शॉपिंग के चलते दुकानदारों की महिमा के साथ साथ एक और बात का दिव्यज्ञान हुआ कि शॉपिंग में हमारी राय कोई खास मायने नहीं रखती हम तो बस सपोर्ट के लिए ले जाये जाते हैं….ताकी कल को कोई ऊँच-नीच हो तो बोल सकें ‘आप भी तो थे!’
खैर बात वापस क्रेडिटकार्ड पर…अब जिम्मेदारी और बढ़ गई थी, एक तो क्रेडिटकार्ड की बढती किश्त ऊपर से लेडीज शॉपिंग के लिए घंटों दुकान पर इंतज़ार करना| इतना ही नहीं, हर वो सामान जो हमने नग के हिसाब से खरीद रखा था अब वो सेट में था और वो भी स्टील, मेलामाइन और बोन-चाइना की वैरायटी में| ढाई लोगों की गृहस्ती में तीन अलग-अलग साइज़ के कूकर और दो अलग-अलग साइज़ की कढ़ाई क्यों चाहिए भला, ये बात न हम शॉपिंग करते समय समझ पाए थे न आज|
क्रेडिटकार्ड की बदौलत देखते ही देखते ढाई लोगों के परिवार में कब 2BHK छोटा पड़ने लगा पता ही न चला और क्रेडिटकार्ड की किश्तों का सिलसिला जबलपुर से होता हुआ, जयपुर, दिल्ली और हैदराबाद पहुच गया| जब भी किसी माल या दुकान के पास से गुज़रते मन की इच्छा उम्मीद की उड़ान भरना चाहती, क्रेडिटकार्ड पर्स से निकलता और उड़ान को पंख लगा जाता…और जाते जाते किश्तों की बेड़ियाँ पैर में डाल जाता|
खैर हर किसी की जिंदगी में वो दिन आता ही है जब उनका कोई ख़ास, कोई अपना उन्हें छोड़ कर चला जाता है..हमारे साथ भी यही होने वाला था..पता तो था पर इस बार हम अपना दिल मज़बूत कर चुके थे|
आखिरकार दो साल पहले आज ही के दिन हमारा क्रेडिटकार्ड एक्सपायर हो गया| आज इस बात को बीते दो साल हो चुके है पर हमने हिम्मत दिखाई और क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख ही लिया|
अगर आप भी क्रेडिटकार्ड के बिना जीना सीख चुकें है तो आप बधाई के पात्र हैं और उम्मीद है सुखी होंगे और यदि किसी करणवश आप यह मोह अभी तक नहीं छोड़ पाए है तो हिम्मत जुटाइये और धीरे- धीरे ही सही पर इसको अपनी जीवनशैली से अलग करना शुरू कीजिये….विश्वास दिलाता हूँ इसके बिना जीवन कहीं ज्यादा सुखमय महसूस कीजियेगा|

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Hasya Lekh: Diwali Ki Jhalar/ हास्य लेख : दिवाली की झालर

नमस्ते! उम्मीद है आप सब अच्छे होंगे, अजी उम्मीद क्या पूरा विश्वास है| वैसे कई दिनों से लिखने की सोच रहा था पर लिख नहीं पा रहा था….वो क्या कहते है…करंट नहीं पहुँच रहा था| अब दिन में तो हजारों काम होते है…और लिखने के लिए चाहिए शांति और सुकून, तो हमारे जैसों के लिए तो रात ही अनुकूल है| कल रात की भी यही सोच थी कि खा–पी कर रात को लिखने की महफ़िल जमाएंगे….बस हम, हमारी डायरी और हमारा पेन| अब बस एक छोटा सा बहाना चाहिए था जिससे श्रीमति जी को अल्पावधि के लिए नाराज़ कर सकें ताकी महफ़िल में कोई बाधा न आए| काम लगता आसान है पर नाराज़गी की श्रेणी में सूत के धागे जितना ही फ़र्क होता है, बात ज़रा इधर से उधर हुई नहीं कि लेने के देने पड़ सकते हैं| खैर साल बीतते –बीतते शादी के ये हुनर अपने आप ही विकसित हो जाते है|

फिर क्या, खाना खाने और रसोई का ताम झाम निपटाने के बाद जैसे ही श्रीमति जी बेडरूम में आईं और डबल बेड पर बैठते ही हाथ पैर पर लगाने के लिए बॉडी लोशन उठाया, हमने छेड़ दिया, “ये सूट छोटा हो गया है क्या…थोड़ी मोटी लग रही हो”, बस फिर क्या उनके जवाब मिलते गए और योजनानुसार हम उन जवाबों में मिर्च मसाला लपेट कर उन्हे वापस सवालों में तब्दील कर श्रीमति जी की तरफ दागते गए….तीन-चार सवालों के बाद तो हम, हमारा तकिया और चादर तीनों कमरे के बाहर थे|

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Hasya Kahani: Karan -Arjun aur Hum/ हास्य कहानी : करन – अर्जुन और हम

यू-ट्यूब पर श्रीमती जी करन-अर्जुन देखने बैठीं तो हमारी करीब पच्चीस साल पुरानी प्रतीज्ञा आज टूट ही गई…जिस बेबाकी से आज कल के बच्चे माँ बाप से बोल देते है कि पापा इस गर्मी की छुट्टी में डिजनी लैंड चलेंगे, उन दिनों शायद इतनी बेबेकी हम किराये पर वीसीआर और फिल्म के कैसेट लाने में ही दिखा पाते थे|

बात सन पिन्चान्बे-छियानबे की होगी…गर्मियों का दिन था और हमारे मोहल्ले के एक परिवार के जेष्ठ पुत्र का विवाह एक दिन पहले ही संपन्न हुआ था| घर में नए सदस्य का आगमन हुआ था तो सभी नात- रिश्तेदार उत्साहित थे….

घर मेहमानों से भरा हुआ था और हम उनके घर में पूरे हक से मेज़बान की भूमिका में थे| सलाद कटवाने, दौड़ –दौड़ कर पूरियां लाने…और बड़ों को खाना खिलवाने के बाद जब बच्चों के खाने की बारी आई तो हम भी पंगत में शामिल थे और जम के गरमा गरम पूरी दबा रहे थे| तभी उड़ती –उड़ती खबर सुनाई पड़ी कि रात में फिल्म का प्रोग्राम है…वीसीआर किराए पर आने वाला है| एक तो इतने सारे लोगों का जमावड़ा ऊपर से वीसीआर पर पिक्चर का कार्यक्रम…उत्साहित होना स्वाभाविक था| हमने फटा-फट खाना ख़त्म किया और हाथ धो कर पहुँच गए उस झुंड के पास जहाँ शाम के कार्यक्रम की तैयारियों की समीक्षा चल रही थी….छत पर कितने गद्दे-तकिये लगने हैं, बड़े कहाँ बैठेंगे….बच्चे कहाँ पसरेंगे| रात में फिल्म देखना हो वो भी खुले आसमान के नीचे, उसका मज़ा ही कुछ और होता था|                  

खैर जब बैठने की व्यवस्था का मंथन समाप्त हुआ तो बात दूसरे ज़रूरी मुद्दे पर आई कि कैसेट कौन से आने है…हर किसी ने अपने विवेक और सूझबूझ से अपनी राय रखी और बहुमत से चित्रहार, कुली नंबर- 1 और करन-अर्जुन का चुनाव हुआ| चित्रहार में हमें कोई ख़ास रूचि न थी…कुली नंबर-1 हमने पहले ही निपटा दी थी, अब बची थी करन-अर्जुन… फिल्म जबरदस्त थी, हर कोई जिसने देख रखी थी तारीफ करते न थकता था…शाहरुख़-सलमान की जुगलबंदी…. “जाती हूँ मैं”….जैसा शानदार गाना और जबरदस्त फाइट….दिल पहले से ही इस पिक्चर पर फ़िदा था पर जब पता चला कि इतने शानदार माहौल में एक और मनपसंद पिक्चर देखने का मौका है तो रहा न गया..अन्दर से ख़ुशी इतनी हो रही थी कि बर्दाश्त  के बाहर थी….जल्द किसी अपने को बताना था|   

हमारे हम उमर मौसेरे भाई करीब ही रहा करते थे, फिर क्या, पहुँच गए मौसी के घर, भाई को इशारा किया और दोनों भाई छत पर| साथ में हमने कई फिल्में निपटाई थी तो समझाना और सहमति हासिल करना कठिन न था…बस घर पर यह बोलना था की आज एक भाई दूसरे भाई के घर पढ़ाई करेगा और रात वहीँ सोएगा|

किला फतह कर हम अपने घर चले आए और रात का इंतज़ार करने लगे, देर शाम कॉपी-किताब ले कर हमारे भाई भी आ गए और दोनों भाई मन लगा कर पढ़ने भी लगे…घर में कुछ ऐसा दिखाना था की लड़के पढ़ाई को ले कर संकल्पित है| शाम रात में बदल गई, सारे होमवर्क, सारे असाइनमेंट बिना किसी नाज़ नखरे ख़तम कर लिए गए, बीच –बीच में अपनी कर्मठता का प्रदर्शन करते दोनों भाई हमारे पिता जी से ना समझ में आने वाले सवालों पर मंत्रणा भी कर आते कि लगे लड़के पढ़ाई को लेकर वाकई गंभीर हैं| इधर दोनों भाई पढ़ाई निपटाने में लगे थे, उधर पिता जी छत पर पानी डाल रहे थे| उन दिनों गरमी में छत तर कर उस पर चटाई और चद्दर डाल कर सोना आम चलन में था |

हमारे घर की छत सूख चुकी थी और खाने की थालियाँ लग चुकी थी| हम दोनों की नज़रों में संतोषजनक पढ़ाई हो चुकी थी, लगा कि बस खाना खाते- खाते पिता जी से बोल देंगे और वीसीआर पर करन-अर्जुन की अनुमति हासिल कर लेंगे|

खाना शुरू हुआ और पिता जी ने पढ़ाई से जुड़ा मुद्दा छेड़ दिया…हमें अपनी बात रखने का मौका ही न मिला| धड़कन बढ़ गई थी|

हर ख़त्म होती चपाती के साथ ही हमारे भाई टेबल के नीचे से हमें ठोकर मार बोलने का इशारा करते पर हम सही मौके की ताक में थे| ऐसा न हो गलत समय पर प्रस्ताव रख दें और मनाही हो जाए| इस चक्कर में एक चपाती ज्यादा खा ली पर सही समय का इंतज़ार ख़त्म ही न हुआ| हरकत ऐसी थी कि भाई से नज़रें नहीं मिला पा रहे थे सो थाली रखी, हाथ मुंह धोया और चुप-चाप कमरे में आ गए| अभी सोच ही रहे थे कि भाई ने कमरे में आते ही ताना मारना शुरू कर दिया, अभी हम समझा ही रहे थे कि अभी देर नहीं हुई है, तभी पीछे से पिता जी की आवाज़ आई कि चलो छत पर बिस्तर लग गए हैं… इशारा समय पर सोने का था, अगले दिन स्कूल जो जाना था|

अब धड़कन राजधानी एक्सप्रेस सी हो चुकी थी, बस एक ही डर था कहीं मनाही न हो जाए…करन –अर्जुन का सारा जोश, सारा प्लान धरा का धरा रह जाता, ऊपर से पूरी जिंदगी भाई से ताने सुनने मिलता वो अलग|

माता जी तो कूलर में सोने चली गई और हम, हमारे भाई और पिताजी छत पर खुले आसमान के नीचे लेट गए| आसमान साफ़ था, सप्त-ऋषि तारामंडल और ध्रुव तारा साफ़ नज़र आ रहे थे, धीमी- धीमी चलने वाली हवा अब ठंडी होने लगी थी और नींद के लिए माहौल बिलकुल अनुकूल था, लेकिन नींद न हमारी आँखों में थी और न हमारे भाई की, बस दोनों भाई आसमान को देखते मना रहे थे कि काश कोई पुच्छल तारा दिख जाए और हमारी दुआ कबूल हो जाए| अभी सोच ही रहे थे कि भाई ने हमें कोहनी मारते हुए हमारा फ़र्ज़ याद दिलाया| हमने हिम्मत जुटाई, गला साफ़ किया और बोले, “पिता जी, भईया के घर वीसीआर लगा है और नई पिक्चर का कैसेट भी है…हम देखने जा सकते हैं क्या?”

पिता जी इन सब बातों से अनभिज्ञ थे और हल्की नींद में आ चुके थे सो बोले, “ठीक है, कल स्कूल से आ कर चले जाना पर पहले होमवर्क!” उन्हें लगा दिन की बात है, बच्चे पढ़ाई कर दो –तीन घंटे फिल्म देख भी लेंगे तो क्या हर्ज़ है, पर यहाँ तो कार्यक्रम ही रात का था वो भी आज रात का| अभी सोच ही रहे थे कि भाई ने उर्जा का संचार करने के लिए एक बार फिर कोहनी टिका दी….इस बार उनकी कोहनी के वार में फ्रश्टेशन और गुस्सा साफ़ झलक रहा था|

हमने उनको हाथ रोकने का इशारा किया और वापस पिता जी के मुखातिब हुए और बोले, “पिता जी….वो वीसीआर आज रात के लिए आया है…सब लोग इकठ्ठा हैं तो आज रात ही फिल्म देखनी है|”

पिता जी दिन भर के थके थे और सुबह जल्द दफ्तर भी जाना था सो नींद के आगोश में थे, बोले, “रात में नहीं!….सुबह स्कूल है!….”

बस वही हुआ जिसका डर था, सारी प्लानिंग, सारे जुगाड़ धरे के धरे रह गए थे….जिस चक्कर में गणित के एक आध असाइनमेंट ज्यादा कर डाले उसका नतीजा सिफर निकला, करते क्या मन मसोस कर रह गए| दिल और कान दोनों चार घर छोड़ बने मकान की छत पर लगे थे, वहां अब हलचल बढ़ गई थी, फिल्म शुरू होने ही वाली थी| आखें तारे देख रहीं थी पर पुतलियों पर आई नमी से तारे अब धुंधले दिख रहे थे|

करीब साढ़े दस हुए होंगे कि अचानक कुछ धुन कानो में पड़ी…हमें लगा चलो अभी समय है शायद पहले चित्रहार लगा हो..अभी मना ही रहे थे कि वापस एक भारी भरकम आवाज़ कानों में पड़ी, “…ये कहानी विश्वास पर आधारित है…विश्वास जो अनहोनी को होनी कर सकता है”…अभी कुछ समझ पाते कि कौन सी फिल्म है कि तभी एक और आवाज़ आई, “करन सिंह-अर्जुन सिंह मेरा हफ्ता…” अब बस दिल बैठ गया…जो नहीं होना था वही हुआ….बिना हमारी मौजूदगी के करन-अर्जुन शुरू हो चुकी थी| भाई भी गुस्से से भरा हुआ था पर ठोकर और कोहनी मारने के अलावा करता भी क्या|

फिर आया पहला गाना…..“सूरज कब दूर गगन से…..”अभी मुखड़ा पूरा भी नहीं हुआ था कि एक दुलत्ती जोर से हमारी टांगों से टकराई…हम समझ गए कि सिर्फ हम ही नहीं थे जो फिल्म के लिए कलप रहे थे| आसमान साफ था और रात का समय था तो हर डायलाग कान पर साफ़- साफ़ गिर रहा था| अभी 15-20 मिनट बीते होंगे कि अमरीशपुरी की रौबीली आवाज़ कानों में सुनाई पड़ी, रोंगटे खड़े हो गए, हमसे न रहा गया, लगा एक बार और कोशिश कर के देखते हैं…..एक दो बार धीमी आवाज़ में पिता जी को पुकारा भी पर पिता जी अब तक गहरी नींद के आगोश में जा चुके थे, उनकी तरफ से कोई रिस्पांस न मिला| अमरीशपुरी जी की आवाज़ में दमदार डायलाग, घोड़ों की टाप, चीखने चिल्लाने की आवाज़ मानो जैसे आसमान में गूँज रही थी कि तभी मंदिर की घंटियों के बीच किसी औरत के रोने की आवाज़ आई, और जैसे ही वह बोली, “मेरे करन- अर्जुन नहीं मर सकते…तुझे मेरे करन- अर्जुन लौटाने होंगे माँ….” सस्पेंस हम दोनों भाइयों की नस –नस में भर चुका था, अब हमसे रहा न गया, घंटियों की आवाज़ जैसे तेज़ हुई तो हमने भी भगवान का नाम ले कर एक ट्राई और मारने का फैसला किया| पिता जी को हल्के हाथ से हिलाया और जब उन्होंने आश्रय पूछा तो हमने अपनी इच्छा फिर से जाहिर कर दी….|

होना क्या था दिन भर के थके आदमी को शाहरुख-सलमान के लिए कच्ची नींद में जगाओगे तो डांट ही मिलेगी, और हुआ भी वही| इस बार पिता जी का लहज़ा सख्त था, इसके बाद हमारी पूछने की और हमारे भाई की कोहनी मारने की हिम्मत न हुई| दोनो भाई पथराई आँखों से आसमान को देखते रहे…| एक के बाद एक दमदार डायलाग, “जाती हूँ मै” जैसे गाने… पूरी फिल्म हम दोनों भाइयों ने नम आँखों से तारों को देखते हुए सुन डाली|

भाई का तो पता नहीं पर हमने कसम ज़रूर खा ली थी कि आज के बाद करन- अर्जुन या आने वाली किसी भी फिल्म जिसमे शाहरुख-सलमान एक साथ हों कभी नहीं देखेंगे| अब तक ऊपर वाला भी शायद हमें हमारी कसम पूरी कराने में शिद्दत से लगा था, तभी शायद इतने सालों में दोनों की कोई पिक्चर एक साथ न आई|

वो तो श्रीमती जी शाहरुख की सारी फिल्में निपटा चुकी थीं और यू-ट्यूब पर करन- अर्जुन ओरिजिनल  प्रिंट में उपलब्ध थी तो उन्होंने आज हमें उनके संग बैठ कर यह पिक्चर देखने पर मजबूर कर दिया और हमारी कसम तुड़वा ही दी| अब सोचते है एक कसम टूट गई है तो दूसरी भी टूट ही जाए, इसी बहाने दोनों को वापस एक बार सुनहरे परदे पर देखने का मौका तो मिलेगा|

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Ishhoo Exclusive Satire/ Hasya Vyang Story

Hasya Kahani: Pocket Radio /हास्य कहानी : पॉकेट रेडियो -छोटी उम्र की खुराफात का एक नमूना

पिछले पंद्रह मिनट से हम तीन फिट की दीवार पर कान पकड़े खड़े थे और माता जी गुस्से से हाथ में हमारा ही प्लास्टिक का बैट लिए इंतजार कर रहीं थी कि ज़रा हिले तो दो चार लगा दें| हमें तो समझ ही नहीं आ रहा था कि ऐसा भला क्या हो गया जो इतनी ज़बरदस्त सजा दे दी गई थी, पर माता जी का पारा गरम था, एक तो उनके आदेश का उल्लंघन ऊपर से एक बड़ा कांड…..

बात उन दिनों की है जब हम शर्ट और हाफ पैंट पहना करते थे, वैसे हाफ पैंट तो अब भी पहनते है पर शौखिया, उस समय वो हमारा ऑफिशियल ड्रेसकोड हुआ करता था| जी हाँ उमर होगी कोई आठ या नौ साल| इलाहाबाद में हम अपने माता पिता और छोटी बहन के साथ किराये के मकान में रहा करते थे| पिता जी टेलीफोन डिपार्टमेंट में टेक्निकल इंजिनियर थे और माता जी ने घर परिवार का बीड़ा उठा रखा था|

ज़िन्दगी सुकून भरी थी, घर से स्कूल और स्कूल से घर, न मोबाइल था न केबल टीवी| लकड़ी के शटर वाले ब्लैक एंड वाइट टीवी पर दूरदर्शन और लगभग उतने ही बड़े रेडियो में बिनाका गीतमाला| घूमने के लिए गर्मियों की छुट्टीयों में कानपुर अपनी दादी – नानी का घर|

सितम्बर या अक्टूबर की बात होगी, मौसम ने करवट लेना शुरू ही किया था कि एक रोज़ कानपुर से हमारे बड़े पापा के ज्येष्ठ पुत्र और हम सब में सबसे बड़े, भाई साहब अपने घनिष्ट मित्र के साथ इलाहाबाद आए| एस.एस.सी. का इम्तहान था और सेंटर इलाहाबाद पड़ा था| घर में मेहमान आए तो कौन खुश नहीं होता, न खेलने जाने की रोक-टोक, न डांट का डर और पूड़ी-पकवान अलग से| हमारा भी हाल वही था, इन बातों से एक अलग ही ख़ुशी थी मन में|          

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हास्य कहानी- रील कट गई…. Hasya Kahani

नमस्ते! कभी इंटरनेट के महासागर से निकले गूगल रूपी यक्ष से पूछियेगा ‘Hangover meaning in Hindi’, जवाब मिलेगा ‘अत्यधिक नशा’…..अगर आप सोच रहे हो कि आज लेखनी का श्रम, ‘हैंगओवर में क्या करें? हैंगओवर के बचाव, या हैंगओवर क्या होता है? जैसे विषयों पर है तो आप निराश होंगे…आज जो स्याही घिसी है, वह हॉस्टल लाइफ या नौकरी के शुरुआती पड़ाव पर हैंगओवर के अलग रूप का वर्णन करती है, जिसे हम आंग्लभाषा में ब्लैकआउट (Blackout) और आम भाषा में ‘रील कटना’ कहते है| जो अनुभवी हैं, वो मन ही मन मुस्करा रहें होंगे और जो अनभिज्ञ हैं, उनका ज्ञानवर्धन इस कहानी के दरमियान हो ही जायेगा…..   

हास्य कहानी- रील कट गई….

दूर कहीं जानी पहचानी धुन बज रही थी, लगा की सुनी सुनाई सी है, कान के पट थोड़े और खोले तो जान पड़ा कि अपने ही मोबाइल की रिंगटोन थी, छह….पूरी नीद टूट गयी| भारी पलकों से आँख खोली तो ऑटोमोड में हाथ मोबाइल ढूँढने लगा, ज़ोर लगा कर देखने पर भी आँखें धुंधली तस्वीर ही उतार  पा रहीं थीं, लगा की कुछ मिस्ड-काल जैसा लिखा है| मरी-थकी उँगलियों से जब गौर करवाया तो देखा आठ मिस्ड-काल थे, उसमें से तीन तो बॉस के, तब कहीं जा कर मुकुंद के शरीर में उर्जा का संचार हुआ| अब दिमाग तो इशारा कर रहा था कि उठ जाओ पर शरीर था कि अलग ही सुर पकड़े बैठा था| सर दर्द, बदन दर्द, गले में खराश, पेट में भारीपन, पूरा शरीर जैसे टूट रहा था| खैर मुकुंद को समझते देर न लगी की वह अत्यधिक नशे यानी हैंगओवर का शिकार हुआ था| उठ कर बैठा तो एक और अचम्भा, अरे, यह तो अपना ही बिस्तर है, यानी अपने ही घर| रजाई से पैर बाहर निकाला तो बाकायदा, टी-शर्ट और पायजामा पहन रखा था|

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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang

21 डेज टु क्विट अ हैबिट/ 21 days to quit a habit

लॉकडाउन में सिगरेट, शराब और पानमसाला के नशेबाजों पर एक व्यंग. (A satire on smokers and drinkers during lockdown)

नमस्ते! सिगरेट, शराब, पान-मसाला खाने वालों की ज़मात में अक्सर यह नसीहत आम सुनाई देती है कि, आप इक्कीस दिन किसी बुरी आदत से तौबा कीजिये, बाईसवें दिन से आप उस आदत से निजात पा चुके होंगे| सुना तो लगभग सभी ने होता है पर इतना टाइम है किसके पास? एक दो दिन बिना रोटी के तो रह सकते है पर मज़ाल है जो नशे पत्ती का जुगाड़ भूल जायें|

आज नशेबाजों का पक्ष इतनी मजबूती से रख पाने का राज़ यह है कि, हम स्वयं उस दौर से गुज़ार चुके हैं| आदत भी ऐसी की आँख खुलने से पहले तकिया के नीचे टटोल लिया करते थे…अगर सिगरेट है तो ठीक, वर्ना एक दो का तो दिन ख़राब होना ही था| पता ही नहीं था की हम सिगरेट को पी रहे है या सिगरेट हमें| शादी से पहले तक तो बचे हुए टोटों से तंबाखू इकठ्ठा कर आधी सिगरेट जितना जुगाड़ कर लिया करते थे, अब आधी रात कहाँ जाएँ सिगरेट ढूँढने, आलस भी किसी नशे से कम थोड़े ही होता है| शादी हुई तो ऐश-ट्रे से अधजली सिगरेट बटोरने की, और बच्चे के बाद पूरी सिगरेट की आदत छूट ही गयी| खैर मेरी कहानी फिर कभी, आज इतनी बड़ी भूमिका बांधने का उद्देश्य इक्कीस दिन वाली नसीहत पर गौर करना है| तो चलिए शुरू करते हैं…….

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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang

चटोरों की व्यथा/Chatoron ki vyatha

लॉकडाउन में स्ट्रीट फूड को तरसता एक वर्ग।(Lockdown mein Street food ko tarasta ek varg)

नमस्कार! आज आपका ध्यान उन कुछ मुद्दों पर जो समाज़ ने नकार रखा है….न तो मीडिया में कवरेज मिलेगी न सोशल मीडिया में। घरों को पलायन करते कामगार मज़दूर हो, बिगड़ती अर्थव्यवस्था हो, चाइना हो या पेट्रोल के दाम, हर मुद्दे पर बात करने के लिए दसियों बुद्धिजीवी बैठे है टीवी चैनलों पर।
पर आज बात एक ऐसे मुद्दे की जो भले ही इतना ज्वलंत न लगें पर समाज़ के एक वर्ग के लिए काफी मायने रखता है । खैर किसी न किसी को तो पक्ष रखना ही था , मीडिया न सही हमारी कलम सही । उम्मीद करता हूँ, उस वर्ग के दर्द को आप तक पहुंचा पाऊंगा।
आज बात उस वर्ग की जो बिना किसी स्वार्थ या हीनभावना के समाज में स्वाद की परिभाषा का विस्तारीकरण करता रहा है। जी हां बात जंक-फूड , स्ट्रीट-फूड के उन निष्ठावान उपभोक्ताओं की जिन्हें हम आम बोल चाल की भाषा में “चटोरे” बोलते आये हैं।
वैश्विक महामारी क्या आई बेचारे स्वाद ही भूल गए ….क्या बच्चे, क्या आदमी और क्या औरतें, चटोरों की बिरादरी पर ऐसी गाज़ गिरी कि दर्द भी बयां न कर सके। सरकार ने तो खानापूर्ति कर दी, बोल दिया कि टेक-अवे चालू हैं। अब सरकार को भला कौन समझाए कि पानीपुरी की दुकान पर सी-सी करते बोलना कि “भईया, एक सूखी पापड़ी देना मीठी चटनी के साथ”, ये वाली फीलिंग कौन से टेक-अवे में आती है।
कहां रोज़ शाम ऑफिस से लौटते समय ट्रांस्पेरेंट थैली में अखबार के लिफ़ाफ़े में रखे समोसे…..लिफ़ाफ़े पर उभरने वाले तेल के निशान बता दिया करते थे कि समोसे गरम हैं। गेट की आवाज़ सुनते ही बीवियां चाय चढ़ा दिया करतीं थी। अब तो वर्क फ्रॉम होम है। अच्छा, ऐसा नहीं है कि कोशिश न की हो पर समझ ही न आया कि समोसा खा रहे है या आलू भरी पूरी। अब कहाँ प्रोफेशनल हलवाई और कहाँ यू-ट्यूब के नौसीखिये। अरमान दिल के दिल में ही रह गये।
ऐसी ही हालत कुछ लाल , नीली , पीली मोटरसाइकिल पर उसी रंग के हेलमेट में आने वाले दूतों का इंतज़ार करने वालों की है। अब तो ऐसा लगता है जैसे आंखे पत्थर हो गयी हो। एक समय था कि सोसाइटी में विज़िटर के नाम पर सिर्फ डिलेवरी बॉय ही दिखते थे। हालत ये थी कि सोसाइटी का वॉच मैन मोटरसाइकिल का रंग देख कर बता देता था कि किस फ्लैट का आर्डर है….। क्या पिज़्ज़ा, क्या बर्गर, क्या हक्का नूड्ल्स सारे स्वाद छिन गए। अब कहां बाज़ार का स्वाद और कहां घर का, लगता ही नहीं वही डिश खा रहे हों।


एक और दर्द इसी वर्ग की महिला शाखा का जिनकी सारी सहूलियत ही छीन ली इस लॉकडाउन ने। कहां हर चौथे दिन स्पीड डायल पर पती को फ़ोन किया और बोला, “सुनो! आज कुछ बाहर से आर्डर कर लेते है….।” पती भी बेचारा, कौन दिमाग खपाए, अभी मना कर दो तो दो दिन ख़राब। ऐसे पीड़ित पतियों को तो जैसे बदले का मौका मिल गया हो। टेक-अवे तो था पर करोना -करोना बोल कर सारा हिसाब पूरा कर लिया। ऊपर से रोज़ नया वीडियो पकड़ा देते हैैं कि, “जानू! आज ये वाली डिश ट्राई करते हैं।” यू-टयूबर्स का क्या है सब्सक्राइबर बढ़ाने के लिए बोल दिया बाज़ार जैसा कबाब घर पर बनाएं , कभी ट्राई किजिए और बोलिये क्या है वही स्वाद? अजी कितनों ने तो मन्नत मांग ली है कि, करोना ख़तम हो और ये वर्क फ्रॉम होम की बला टले।
अब समाज़ को कौन समझाये कि, एक भोलेनाथ थे जिन्होंने पृथ्वी बचाने के लिए हलाहल पी लिया था, और एक ये चटोरे है जो जंक फ़ूड खा खा कर न सिर्फ अपना पेट भरते है बल्कि लोकल से ले कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कितने ही कर्मचारियों का पेट पालते हैं।
एक जिम्मेदार लेखक कि तरह मैंने तो चटोरों की व्यथा आप तक पहुंचा दी। अब दुआ कीजिए कि जल्द करोना खत्म हो और बाज़ारों में वापस वही रौनक लौटे।

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शादी और लॉकडाउन (Shaadi aur Lockdown) Ch-4

पार्ट 4 – लॉकडाउन और हनीमून :

परम और कविता का तो बनता था, लॉकडाउन मे उनका हनीमून जो बर्बाद हो गया था और जाना भी केरल था| भाई साहब और भाभी को टिकट मिला केरल का, तो केरल हि सही| पिता जी की ट्रेन पहुंची कन्याकुमारी वहां दर्शन किया और माँ से बोले चलो केरल यहाँ से पास है बीच चलते हैं, तुम्हारी बचपन की इच्छा आज पूरी कर देते है| कन्याकुमारी से बस पकड़ी और पहुंच गए कोवलम बीच| सुना बहुत था पर इतना सुन्दर बीच देख न सिर्फ पिता जी बल्कि माँ का भी मन जवान हो गया| होटल के पास से तीन चश्में खरीद लिए गए और शाम को बीच घूमने निकल पड़े|

उधर परम और कविता बहुत खुश थे, परम को इस बात की ख़ुशी कि, जो वादा किया वो पूरा किया, और कविता को केरल घूमने की ख़ुशी| शाम होते ही दोनों ऐसे निकले जैसे अक्सर टूरिस्ट प्लेस पर नव विवाहित दम्पति| हाफ पैंट, शर्ट और छह- छह इंच के लाल चूड़े पहने कविता और थ्री फोर्थ पैंट और टी-शर्ट पहने परम| 

चलो यह तो फिर भी नव विवाहित दम्पति थे, इनका तो बनता था, उधर बड़े भाईसाहब से भी न रहा गया, ऐसा लगा शादी के बाद घूमने न जा पाने के पश्च्याताप का प्रायश्चित आज ही कर लेंगे| बाज़ार से जीन्स और टी-शर्ट ले आये साथ दो चश्मे| जिसने बारह साल में सलवार सूट भी सिर्फ मायके में पहना हो, उसको जीन्स….खैर भाईसाहब ने कसम दे दी तो भाभी के पास आप्शन न बचा, मन तो उनका भी था पर मोहल्ला, समाज और लोग क्या कहेंगे वाले प्रश्नों के चलते कभी हिम्मत न जुटा पायीं| यहाँ न मोहल्ला था, न समाज| शाम होते ही भाई साहब और भाभी अपने नए अवतार में बीच घूमने निकल पड़े|

हल्की- हल्की बारिश शुरू हुई तो माँ, पिताजी का हाथ पकड़ते हुए बोलीं, ज्यादा हीरो न बनिए, कही आड़ देख के रुक जाइये, बारिश थमेगी तो फिर चलेंगे| पिताजी एक चाय की दुकान पर रुक गए, शाम थी सो चाय पीने भी बैठ गए, दो चाय और एक फ्रूटी भी बोल दी| अभी चाय आ ही रही थी कि माँ के चेहरे के भाव बदलने लगे, भुनभुनाते हुए बोलीं, “शर्म नहीं आती, आजकल के बच्चे फैशन के नाम पर क्या वाहियात कपड़े पहनते है, एक पल को तो लगा अपनी ही बहू है फिर याद आया उसकी तो तबियत ख़राब है|” पिताजी बोले, “तबियत नहीं ख़राब है मामा जी मरे हैं| याददास्त घर पर रख आई हो क्या?” माँ ने तेवर बदले और बोली, “लगता है आपको समुंदर की हवा लग गयी है…. याददास्त अपनी सुधारो, मामा जी मरे है बड़ी बहू के, हम बात कर रहे है छोटी बहू की|” पिता जी ने माँ को देखा फिर उधर देखा जिधर माँ देख रहीं थी…. यह क्या? यह भी!, माँ बोली, “यह भी से क्या मतलब|” तब तक समीर की नज़र अपनी मम्मी पर जा चुकी थी, चिल्लाया “मम्मी!!”, बड़ी मुश्किल से पिताजी ने मुहं पर हाथ रख कर चुप कराया| पर वाह रे ममता, इतनी भीड़ में भी भाभी को “मम्मी” सुनाई दे गया, मुड़ कर एक दो बार देखा भी फिर सोचा टीवी पर संतूर का एड चल रहा होगा| आगे बढ़ती भाईसाहब से बोलीं, “लगा समीर बुला रहा है…..|” भाई साहब भी मुस्कुराये और सर पर हांथ फेरते हुए बोले, “माँ हो ना, बच्चे की याद तो आयेगी ही|” उधर पिता जी समीर को समझा रहे थे, बेटा हम लोग सरप्राइज टूर पे है ना, घर चल के सबको सरप्राइज करेंगे, पर मन ही मन में गुस्से और डर का भाव बना हुआ था| माँ से बोले, “तुम काहे बुत बनी बैठी हो कुछ बोलती क्यों नहीं….|” थोड़ा संभलने के बाद माँ बोली, सारे के सारे निकम्मे है, हमें बेवक़ूफ़ बना कर समुंदर घूम रहे हैं… उधर मनीष और बड़ी बहू और इधर परम और छोटी| पिताजी का गुस्सा डबल था पर बोले, “अरे लेकिन कहेंगे क्या? हम भी तो समुंदर घूमने आये है, बच्चे क्या कहेंगे, गाँव बोल कर केरल घुमने आ गए|” माँ बोली, “चलो सोचेंगे, फिलहाल यहाँ से चलो घर चलते है|”

पिता जी अगली सुबह ही बस पकड़ कर तत्काल का टिकट कराने त्रिवेंदम पहुँचे और लग गए तत्काल की लाइन में| वहीँ परम और कविता स्टेशन पहुचें कन्याकुमारी की ट्रेन पकड़ने, प्लान के हिसाब से केरल से कन्याकुमारी और वहां से रामेश्वरम फिर भोपाल| अभी थोड़ा ही आगे बढ़े थे कि कविता बोली देखो एकदम पिता जी का हमशक्ल| परम ने देखा तो घिग्गी बंध गयी, कहे का हमशक्ल, जिसने पैदा किया हो उसको भूल सकता है क्या?, एक नजर में पहचान लिया, फिर छुपते हुए बोला, हमशक्ल नहीं है पिता जी ही हैं, लेकिन यहाँ क्या कर रहे हैं? दोनों की हवाइयां उड़ चुकी थीं, समझ नहीं आ रहा था घर पर क्या जवाब देंगे| एक नेक, होनहार मेधावी बेटा शादी होते ही माँ – बाप से झूठ बोलने लगा…पूरे समाज में थू- थू हो जायेगी| कुछ सोचने के बाद परम कविता से बोला, “चलो बाकी का टूर गया भाड़ में, बच गए तो फिर कभी घूम लेंगे, वर्ना जिंदगी भर सुनना पड़ेगा| चलो एअरपोर्ट चलते है वहां से फ्लाइट पकड़ के सीधे भोपाल|” ऑटो पकड़ी और पहुंच गए एअरपोर्ट, हालत तो ख़राब थी पर था तो अपने ही बाप का बेटा, विषम परिस्थिति में दिमाग को संतुलित रखना वो जानता था| परम बुकिंग काउंटर पर सर खपा रहा था और कविता बेंच पर बैठी नाखून चबा रही थी, साथ ही अपनी आगे की ज़िन्दगी और कुछ डेली सोप को जोड़ कर सोच रही थी| इधर उधर नज़रें फिराते अचानक उसकी नज़र कही रुकी, बोली, जेठ जी! का भी हमशक्ल या जेठ जी खुद ही हैं?….चेहरे के भाव बदलती भागते हुए परम के पास पहुंची और बोली, “जेठ जी!”, परम के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गयी, मन ही मन बोला, ये हो क्या रहा है? पहले पिता जी अब भाईसाहब…., मुड़ कर देखा तो वाकई भाईसाहब, बाहर की ओर फ़ोन पर बातें कर रहे थे| मन ही मन बोला, “घूमना न हुआ मुसीबात हो गया, न जाने किस घड़ी में…”, मुहं से इतना ही निकला था कि कविता पर नजर पड़ी, चेहरे के भाव तीन चार साल पुरानी पत्नियों से हो रहे थे सो अपने शब्दों को वही रोक दिया और बोला चलो चलते है, शाम पांच बजे का टिकट मिला है, त्रिवेंद्रम से बैंगलोर और वहां से भोपाल| जो नहीं बताया वो यह की सस्ती टिकट के फेर में कुल यात्रा का समय था चौबीस घंटे| दोनों बचते बचाते एअरपोर्ट से निकले और बोले पांच-छह घंटे की बात है किसी रेस्टोरेंट में काट लेंगे|

उधर भाई साहब फ़ोन पर भाभी से कह रहे थे, टिकट अभी तीन बजे का है, तुम फटाफट सामन पैक करो, ऑटो पकड़ो और एअरपोर्ट आ जाओ| भाभी झुंझलाई, “हर काम जल्दी का, टिकट लेना ही था तो शाम या रात का ले लेते इतनी जल्दी क्या थी|” अब उन्हें कौन बताये, सर्ज प्राइस का दर्द, अभी बैठे बैठाए एक दो घंटे के फेर में हज़ारों के वारे न्यारे हो जाते| खैर भाभी झुंझलाती जरूर थीं पर करती वही थीं जो भाईसाहब सुझाते| फ़ौरन सामन पैक किया और होटल वाले से बोला एक ऑटो बुला दो….टूरिस्ट डेस्टिनेशन है तो ऑटो टैक्सी भी टूरिस्ट से ज्यादा दिखते है सो पांच मिनट में ऑटो भी आ गया, भाभी ऑटो में बैठी और बोली, “भईया एअरपोर्ट”| ऑटो अभी मुश्किल से 200 मीटर ही गया होगा की सामने से पिता जी पैदल आते दिख गए, भाभी ने दुपट्टे को घूंघट की तरह ओढ़ लिया और लगी ज़ोर ज़ोर से साँसें लेने| धड़कन कुछ वैसी थीं जैसे टीवी सीरियल में ट्विस्ट आने से पहले एड ब्रेक आ गया हो| फ़ौरन भाई साहब को फ़ोन लगाया| इधर भाईसाहब इंतज़ार करने कॉफ़ी शॉप की ओर बढ़ ही रहे थे की नजर अन्दर बैठे परम और कविता पर पड़ गयी| गुस्से और डर का भाव तो था पर मिश्रण में गुस्सा कम डर ज्यादा था| तभी भाभी का फ़ोन बजा, फ़ोन उठाया और बोले, “परम और कविता”, उधर भाभी बोलीं, “अरे वो दोनों ठीक ही होंगे यहाँ मैंने पिता जी को देखा है|” सुनते ही भाईसाहब के शरीर में फिर से केमिकल रिएक्शन हुआ और गुस्से के भाव उड़ गए, रिक्त स्थान की पूर्ति डर ने कर दी थी| थोड़ी देर तो चुप रहे फिर बोले, “क्या बकवास कर रही हो, मज़ाक मत करो, यहाँ वैसे ही मेरी हालत खराब है, परम और कविता मेरे सामने बैठे कॉफ़ी पी रहे हैं”| भाभी बोलीं, “केरल? कविता की तो तबियत ख़राब थी|” भाई साहब झुंझला कर बोले, “ऐसे तो तुम्हारे मामा जी भी मरे है, अब क्या करें|” भाभी बोलीं, “पर यहाँ तो पिता जी को देखा है …अब क्या होगा|” भाई साहब बोले, “अभी कुछ नहीं सूझ रहा, रास्ते में सोचेंगे, तुम जल्दी आ जाओ|”

उधर पिताजी होटल पहुंचें और बोले, चलो जुगाड़ से टिकट मिल गयी है, आज रात की ही है| चेहरे के भाव में गुस्से, डर के साथ अफ़सोस भी था…इतने सालों में पहली बार सीनियर सिटीजन की छूट जो न ले पाए थे|

खैर, कोई और होता तो ऐसे हालात पर तरस खाता, पर विधाता को शायद चुटकी लेने में आनंद आ रहा था…. संजोग कुछ ऐसा बना कि दो रिक्शा और एक ऑटो एक साथ घर के गेट पर रुके, एक में माँ पिताजी और समीर, एक में भाईसाहब और भाभी और एक में परम और कविता| सभी के सभी रंगमंच के मंझे हुए कलाकारों की तरह लग गए अपना अपना किरदार मंचन करने| परम बोला, अरे, आप लोग एक साथ….अभी अभी कविता को डॉक्टर से दिखा के लौट रहा हूँ| डॉक्टर बोले सब ठीक है, ज्यादा खाने से तबियत बिगड़ गयी थी| पिता जी मन मसोस कर रह गए, जानते तो सब थे फिर भी रहा न गया बोले, “और ये सूटकेस?”, परम भी तैयारी से था बोला, “वो कविता की कुछ  साड़ियाँ थीं, ड्राईक्लीनर को दी थी|” भाईसाहब बोले, “पिताजी! गाँव की यात्रा कैसी रही? सब ठीक- ठाक? गाँव में सब कैसे हैं?| पिताजी मन ही मन गरियाते हुए बोले,” सब ठीक, सब तुम्हे पूछ रहे थे,  तुम बताओ बहू के वहां सब ठीक-ठाक हो गया? जल्दी जल्दी में ये भी न पूछ पाए कौन से वाले मामा जी का देहांत हुआ था?” भाभी लपक कर बोलीं, “पिताजी, दूसरे नंबर वाले मामा जी का|” पिता जी को कौन सा याद था, खैर ताना मारना था सो मार दिया|

उस दिन से हालात ऐसे हो गए की, सब कुछ सामान्य होते हुए भी असामान्य लग रहा था | सबसे ज्यादा सुखी कोई था तो वह था “समीर”, घूमने की बात छेड़ता और अपनी फरमाइश पूरी करा लेता|                          

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शादी और लॉकडाउन (Shaadi aur Lockdown) Ch-3

पार्ट 3 – गॉडस ओन कंट्री : 

वैसे समय बड़ा बलवान होता है, हर घाव भुला देता है, परम भी अब संभलने लगा था और इंतज़ार के साथ आगे की सोचने लगा| एक वेब सीरीज की तरह, लॉकडाउन 1.0, 2.0, 3.0 और 4.0 आते चले गए पर परम को कविता नहीं मिली| फिर वह दिन आया जिसका इंतज़ार परम दिन-रात किया करता था, खुशखबरी आई कि सरकार ने अनलॉक 1.0 का एलान कर दिया है| थोड़ी देर तो परम को अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ, फिर संभलते हुए कविता को फ़ोन लगा दिया| कविता भी बहुत खुश थी आखिर लगभग तीन महीनें बाद दोनों मिलने वाले थे|

परम ने सारे जुगाड़ लगा दिए और कविता को घर ले ही आया| आज उसकी हालत उस बच्चे सी थी, जिसे नाश्ते में मैगी, लंच में बर्गर और डिनर में पिज़्ज़ा मिल गया हो| सब ठीक ठाक हो गया था, सभी खुश थे| सिर्फ एक बात खटक रही थी, इतने प्यार से बनाया घूमने का प्लान चौपट हो गया था| न तो वादियाँ दिखीं न समुंदर, फोटो के नाम पर सिर्फ शादी का एलबम|

कितने ही दोस्तों को शादी के बाद घूमने की कहानियां सुनाते सुना था, परम ये बात भूल नहीं पाया था और दिन रात सोचता रहता| घर पर कैसे बोलूं, होटल बुकिंग के सारे पैसे तो डूब गए, पिता जी तो सुनते ही नाराज़ हो जाएंगे, पर कुछ तो करना ही होगा, हमारा हनीमून ऐसे ही जाने न देंगे| हॉलिडे लिस्ट चेक करी तो एक ही आप्शन दिखा, अक्टूबर में नवरात्रि की छुट्टियाँ| पर यह क्या, पिता जी ने तो पहले से सबका टिकट करा रखा है, शादी के बाद सपरिवार गाँव जाना था और कुलदेवी की पूजा करनी थी| पिता जी से बात करूँगा तो भड़क उठेंगे, एक तो टिकट के पैसे का नुक्सान ऊपर से पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का खंडन| क्या करता, जोश- जोश में कविता को भी वादा कर चुका था, “ये हमारी जुबान है, जब तक वो खुशियाँ, तुम्हे दे न दें, हम चैन से न बैठेंगे|” परम जुगाड़ लगाने में लग गया, आखिर माँ को समझाना, पिता जी को समझाने से थोड़ा आसान लगा| पिता जी भले कितने कड़क हों, माँ के सामने न पहले चली थी, न अब| एक बार माँ मान गयी तो सब हाथ में, लेकिन प्लान ऐसा हो कि माँ मना न कर पाएं| मन ही मन बोला, “क्या करें? क्या करें?….हाँ, एक तरीका है माँ को बोलेंगे कविता की तबियत ख़राब है, चक्कर और उल्टी आ रही है, और हर घर की तरह माँ का भी पोता- पोती का नाम सोचना शुरू…..|” फिर क्या था यही पक्का हुआ, यात्रा से दो दिन पहले कविता चक्कर और उलटी का बहाना करेगी और दोनों घर पर ही रुकेंगे और सबके जाते ही ताला मार के घूमने चल देंगे| सब सेट था, इन्टरनेट पर चुपचाप टिकट भी बुक करवा लिए| होटल भी फाइनल कर लिया, सब कुछ वैसा ही हो रहा था जैसा सोचा था, दोनों बहुत खुश थे|

उधर दूसरे कमरे में अलग ही महाभारत चल रही थी….. भाभी, भाईसाहब से नाराज़गी में बोलीं, “बारह साल हो गए शादी को….गाँव, मायके और शिर्डी के अलावा कहीं घुमाने नहीं ले गए|” बड़े भाईसाहब की स्टेशनरी की दुकान थी और फुर्सत कम ही मिलती थी| मन तो उनका भी था, बोले, “कुछ करता हूँ…..” भाभी से पूछा, “मायके में कोई ऐसा रिश्तेदार है जिसको दोबारा मार सकती हो”| पहले तो भाभी भड़की फिर बोलीं, “क्या बकवास कर रहे हो जी|” भाईसाहब बोले, “अरे ऐसा कोई बताओ जो पहले से स्वर्गवासी हो, उसे ही स्वर्गवासी बना देंगे, काम का काम हो जायेगा और पाप भी न लागेगा|” पहले तो भाभी हिचकिचाईं पर घूमने के सामने ये काण्ड करने को भी मान गयीं| फिर क्या था पूरी प्लानिंग हो गई, जिस दिन गाँव जाने का टिकट है, उसी दिन मरे हुए रिश्तेदार के दोबारा मारेंगे और मायके जाने के बजाय घूम के आएंगे| रही बात समीर की तो वह माँ पिता जी के साथ गाँव घूम लेगा| बात जंच गयी और तैयारी शुरू हो गयी|

समय बीता अक्टूबर आ गया था, तैयारियों को अंजाम देने का समय आ चुका था| परम, माँ के पास आया और घबरा कर बोला, “माँ , कविता की तबियत कुछ ख़राब लग रही है एक बार चल के देख लो”, योजनानुसार कह दिया गया चक्कर आ रहा है और एक दो उल्टी भी हुई है, बस, माँ के अन्दर की दादी अचानक जाग गई और बोलीं, “बेटा तुम आराम करो”| सब कुछ वैसा ही चल रहा था जैसा परम चाहता था| माँ ने कविता को आराम करने को बोला और परम से बोलीं, “तुम बहू के साथ रुक जाओ और उसका ख्याल रखना|” उनके चेहरे की हल्की मुस्कराहट बता रही थी कि जल्द ही उनकी मुराद पूरी होने वाली थी|

रात में सारी तैयारियां शुरू हो गयी, बैग पैक होने लगे, तभी बड़ी भाभी के रोने की आवाज़ आई, भाईसाहब घबराए हुए बाहर आये और उदास मन से बोले, “संजना के बड़े मामा गुजर गए है, अभी अभी फ़ोन आया है|” भाईसाहब और भाभी की अदाकारी देख ऐसा लगा जैसे मंझे हुए कलाकार….एक पल को तो माँ और कविता की भी रुलाई छूट गयी| भाभी के सात मामा थे सो कनफ्यूज़न हमेशा बना रहता था| 

मंथन के बाद विचार यह बना कि, भाईसाहब सुबह माँ –पिताजी को ट्रेन में बैठा कर उधर से ही भाभी के मायके इंदौर निकल जायेंगे, समीर माँ पिताजी के साथ ही जाएगा और परम और कविता घर पर रहेंगे|

सब कुछ प्लान के मुताबिक चला, सुबह भाईसाहब, भाभी, माँ-पिताजी और समीर स्टेशन गए | भाई साहब ने पिताजी को जबलपुर – कन्याकुमारी एक्सप्रेस के एस-3 कोच में बैठा दिया, पैर छुआ और बाहर खिड़की पर आ गए, भाभी की एक्टिंग अभी भी फिल्मफेयर के लिए नामांकित होने लायक थी| ट्रेन चली और जैसे ही कोच आगे बढ़ा दोनों के चेहरे के भाव बदल गए….. दोनों ने एक लम्बी सांस ली और चल दिए प्लेटफार्म नंबर 6 की ओर, दिल्ली से चलकर त्रिवंद्रम जाने वाली ट्रेन के आने का समय होने वाला था| भाभी आज बहुत खुश थी, शादी के बारह साल बाद कहीं घूमने जा रहीं थी, वो भी समुंदर के पास| ट्रेन समय पर थी और टिकट भी एडवांस में करवा लिया था सो दोनों ट्रेन में बैठ गए | भाईसाहब और भाभी दोनों ही एक दूसरे को देखकर नव विवाहित दम्पति की तरह मंद- मंद मुस्काए और ट्रेन में सामान जमाने लग गए|

परम की भी तैयारी पूरी हो चुकी थी, ऑटो बाहर खड़ी थी, शाम चार बजे की ट्रेन थी| ट्रेन भोपाल से ही चलनी थी सो टिकट मिलना भी आसन था, वैसे तो सारी बुकिंग एडवांस थी| परम ने ताला मारा और दोनों स्टेशन के लिए चल दिए| 

उधर पिता जी की ट्रेन में अलग ही कांड शुरू हो गया था, अचानक दो आदमी आए और बोले, “ये हमारी सीट है|” पिता जी भड़क गए और लगे धौंस जमाने| तभी एक आदमी टिकट दिखाते बोला, “बड़े भाई, ये देखिये रिजर्वेशन हमारा है|” तेज़ होती बहस को सुन टी.टी. भी आ गया और लगा कुशल जज की तरह दोनों पक्ष की ज़िरह सुनने| अब समय था सबूत पेश करने का, दोनों के ही टिकट सही थे| पिता जी टी.टी. को टिकट दिखाते हुए बोले, “आज- कल एक ही बर्थ कि दो –दो बुकिंग कर देते हो क्या….?” टी.टी. साहब ने टिकट को देखा, फिर पिता जी को देखा, फिर बोले, “बाऊ जी आप गलत ट्रेन में बैठ गए है…यह ट्रेन जबलपुर नहीं कन्याकुमारी जा रही है|” पिता जी का पारा गरम, लगे भाई साहब को कोसने, नालायक, निकम्मा, किसी काम का नहीं, एक काम बोला था वो भी ठीक से नहीं किया| माँ भी परेशान थी बोली, “अब क्या…?” टी.टी. बोला, “बाबू जी जरा इधर आइए, आप काफी आगे आ गए हैं, फाइन बनाना पड़ेगा|” पिता जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था, माँ और समीर से बोले, तुम समान संभालो, हम कुछ करते हैं| वैसे तो पिता जी गरम दिमाग के थे पर ऐसी परिस्थितियों में दिमाग खूब चला लेते थे| अपने आप को शांत करते हुए टी.टी. के पास पहुँच गए|         

न जाने क्या बात हुई, जब वो माँ के पास लौटे तो चेहरे से गुस्सा गायब था| बोले, “चलो सामान उठाओ|” माँ बोली, “अरे ट्रेन तो अभी चल रही है स्टेशन तो आने दो, तब न उतरेंगे|” पिताजी ने सूटकेस उठाया और चलते- चलते बोले, “अरे! इसी डिब्बे में आगे की दो सीट मिली है, हम कन्याकुमारी जा रहे हैं|” माँ एक मिनट को रुकी फिर बोली, “अरे.. क्या बोल रहे हो जी, कहाँ जबलपुर और कहाँ कन्याकुमारी|” पिता जी बोले, “चलो चलो बताता हूँ…. इतने सालों कहती रही हम कभी समुंदर न देख पाए, ट्रेन कन्याकुमारी जा रही है और हमने टी.टी. से बात कर ली है| जबलपुर हम फिर कभी चले चलेंगे, वैसे भी विकास, परम और बहुएं नहीं है, अभी समुंदर देखने चलते हैं|” माता जी को शादी का पहला वचन याद आ गया|

पिता जी ने माँ को मना हि लिया कि बच्चों को अभी इस यात्रा के बारे में नहीं बताएँगे, जब घर पहुंच जायेंगे तो सरप्राइज देंगे|

सब कुछ वैसा हो जैसा प्लान किया है ऐसा ज़रूरी तो नहीं, होता वही है जो प्रभु करवाते हैं| इस बार प्रभु की इच्छा कुछ मज़ेदार करवाने की थी सो पिताजी को माँ और समीर से साथ, भाई साहब को भाभी के साथ और परम को कविता के साथ घूमने भेज दिया….बस ट्विस्ट यह डाल दिया कि तीनों जोड़े पहुंच गए “केरल”, गॉडस ओन कंट्री ।

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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang Story

शादी और लॉकडाउन (Shaadi aur Lockdown) Ch-2

पार्ट 2 – जनता कर्फ्यू :

सुबह जब नींद खुली तो भोपाल स्टेशन आ चुका था | परम के बड़े भाईसाहब लेने आये थे और थोड़ी ही देर में परम घर पर था| शरीर तो घर पर था पर मन कही और….| देखते- देखते चार दिन और बीत गए, परम मन ही मन बहुत उत्साहित था, “19 तारीख हो गयी है, 26 तारीख को कविता का टिकट है और फिर 29 मार्च को केरल का टिकट”| मन ही मन घूमने फिरने और सेल्फी के हर पोज़ की प्लानिंग हो चुकी थी| तभी व्हाट्सएप पर मैसेज आया: “प्रधानमंत्री जी का देश के नाम सन्देश आज शाम 4 बजे”, पढ़ते- पढ़ते ही टीवी के ब्रेकिंग न्यूज़ वाले फोटो भी आने शुरू हो गए| पाकिस्तान, कश्मीर, डीमोनाटाइजेशन, सब दिमाग में घूमने लगे, फिर टीवी देखा तो वाकई हर चैनल यही बोल रहा था “पीएम् का राष्ट्र के नाम संबोधन शाम 4 बजे सबसे पहले हमारे चैनल पर”| मन के भाव काफी मिले जुले से थे समझ नहीं आ रहा था देशभक्ति, देशप्रेम या अर्थशास्त्र, ये संबोधन किस ओर है…|

परम दोस्तों के साथ ऑफिस के बाहर वाली चाय की दुकान पर पंहुचा और चाय ऑर्डर कर दी| बहस शुरू ही थी की चाय वाले ने टीवी की आवाज़ बढ़ा दी| संबोधन को सिर्फ 2 मिनट बचे थे, अपने आप ही सब शांत हो गए | इतने शांत तो किसी की मौन सभा में भी नहीं होते, सभी के कान ब्रेकिंग न्यूज़ सबसे पहले सुनने को बेताब थे | प्रधानमंत्री जी टीवी स्क्रीन पर आये और सभी कयासों के इतर करोना की बात कर दी| इस वैश्विक महामारी की असल गंभीरता तब समझ में आई | कुछ लोगों ने तो उसी वक़्त रुमाल निकल के चेहरे पर बांध लिया| बात यही नहीं रुकी, एलान हुआ कि 22 मार्च को जनता कर्फ्यू मनाएंगे और शाम को ताली और थाली पीटेंगे| भाषण ख़तम और चर्चा शुरू, उधर टीवी पर और इधर चाय की दुकानों पर|

शाम बीती, परम घर पंहुचा तो माँ ने हाथ आगे बढ़ाने को कहा, परम को लगा प्रसाद होगा पर हाथ पे गिरा सैनीटाइज़र| प्रधानमंत्री जी का आवाहन और परम के घर पर टल जाये मजाल है| डिनर टेबल पर जनता कर्फ्यू की तैयारियों का जाएजा लिया गया, कितनी सब्जियां, कितना राशन रखना है पूरी रणनीति तैयार थी|

22 तारीख आई, सभी नहा धो के तैयार थे, बड़े- बुजुर्ग एवं समाजसेवियों ने ज़िम्मेदारी के साथ गुडमार्निंग के साथ जनता कर्फ्यू के पालन का मेसेज आगे बढ़ा दिया| कुछ वालंटियर तो शंख और घंटे की आवाज़ वाली आडियो क्लिप भी जुगाड़ लाये और फॉरवर्ड का सिलसिला चल पड़ा| सभी को 5 बजे का इंतज़ार था, समय आ गया था परम ने टेबल सरका कर  स्पीकर बालकनी में लगा लिया था, स्पीकर मोबाइल से कनेक्टेड था, दूसरे मोबाइल के साथ बड़े भाई साहब फोटो खींचने को तैयार थे, तभी दूर कहीं थाली पीटने की आवाज़ आने लगी, अभी 4:50 ही हुए थे| लगता है समय पर पहुंचने की होड़ में आगे बढ़ाई गयी घड़ियों ने 5 बजा दिया था| खैर क्या ताली, क्या थाली, स्पीकर, घंटा, शंख, हूटिंग शुरू तो शुरू| सच मानिए काफी सालों बाद एहसास हुआ परिवार वालों के साथ एन्जॉय करना क्या होता है| दस मिनट बीते और त्योहारों कि तरह रिश्तेदारों को फ़ोन लगाना शुरू| परम और कविता ने भी परम्परागत तरीके से एक दूसरे को फोटो और विडिओ शेयर कर दिए|

खैर, दिन जनता कर्फ्यू की तैयारी और शाम जश्न में बीत गया, जश्न भी ऐसा मना की कुछ शहरों में लोग ढ़ोल-नगाड़े ले कर चौराहों पर उतर आये ऐसा लग रहा था जैसे 2007 का टी-20 वर्ल्डकप का जश्न हो| बेवकूफी का अंदाजा तो अगले दिन सुबह लगा, जब अखबार में छपे देखा|

एक दिन और बीता, लोगों में सतर्कता ज्यादा दिखने लगी थी, शाम होते होते खबर आई, प्रधानमंत्री जी रात 8 बजे देश को फिर से संबोधित करेंगे…..परम और भाईसाहब जल्दी घर आ गए, चेहरे पर चिंता की लकीरें, देशभक्ति वाले भाव को दबा चुके थे|           

घड़ी में 8:00 बजा…, प्रधानमंत्री जी आये और लॉकडाउन का सन्देश दे दिया, साथ ही कड़ाई से पालन की सीख भी| नयी पीढ़ी ने लॉकडाउन न कभी सुना था, न देखा था| बड़े- बुजुर्गों ने जरूर इमरजेंसी सुन रखी थी| सब चर्चा में लग गए पर परम की व्यथा या तो परम जनता था या उसके जैसे कुछ और जिन्होंने रस्म निभाने के चक्कर में नयी नवेली बीवी को मायके भेज दिया था| जैसे तैसे खाना खाया और अपने कमरे में आ कर जोर – जोर से टहलने लगा| क्या करें? कविता की कल ट्रेन है और न्यूज़ में दिखा रहा है कि सारी ट्रेनें कैंसल, सब कुछ ठप्प…| कार से चला जाऊं, बस बदल-बदल के चला जाऊं, हवाई जहाज़ का टिकट देख लूं जैसे सैकड़ों विचार उसके मन में घूम रहे थे कि तभी फ़ोन की घंटी बजी…| कविता का फ़ोन था, लपक कर फ़ोन उठाया और बिना रुके , “ये क्या हो गया? कैसे होगा? क्या करेंगे?” जैसे सवालों की झड़ी लगा दी| कविता की हालत भी कुछ वैसी ही थी पर उसकी आवाज़ में कुछ दृढ़ता दिखी, परम को ढाढस बंधाते हुए बोली, “परेशान मत हो कुछ न कुछ तो हल निकलेगा|”

हल क्या ख़ाक निकलता, सोशल मीडिया पर पिटाई के ऐसे ऐसे वीडियो वायरल होने लगे की जो हिम्मत कविता ने दिलाई थी सब धरी की धरी रह गयी| खैर आठ –दस फ़ोन लगाए पर सब ने ही तौबा कर ली| ऐसा लग रहा था जैसे पूरी कायनात परम को कविता से मिलने से रोक रही हो| परम की हालत गोलगप्पे की लाइन में लगे उस आदमी की तरह थी जो अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा हो और बारी आने से पहले चाट वाला बोले, “भइया जी मसाला ख़तम हो गया है थोड़ा रुकिए|”

झक मार के सारे ट्रेन टिकट, सारे होटल बुकिंग कैंसल करा दिए| अब तो बस जगजीत सिंह की ग़ज़लों का सहारा था, हालत यह हो गयी की न घर में मन लगता न बाहर| सामान्य परिस्थिति होती तो घरवाले ही बोलते जाओ कहीं घूम आओ पर समस्या की सारी जड़ ही लॉकडाउन था|