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Ishhoo Exclusive Lockdown diary

The Great Depression, The Great Recession aur ab ‘2020 Corona’

वैश्विक महामारी के चलते आई आर्थिक मंदी में नौकरियां गवां चुके युवक, युवतियों को प्रेरित करने का एक प्रयास  

नमस्ते! आज बात वैश्विक महामारी के चलते अपनी नौकरी गवांते लोगों की| अर्थव्यवस्था में आई शिथिलता कोई पहली नहीं है, इतिहास के पन्नों को टटोलेंगे तो, “द ग्रेट डिप्रेशन” और “द ग्रेट रिसेशन” जैसे वाकये मिल ही जायेंगे, साथ ही स्पष्ट हो जायेगा कि जब-जब ऐसी मंदी का दौर आता है, व्यवसाय और नौकरी पर संकट गहराता ही है| सीधी सी बात है, व्यवसाय है तो नौकरियां है, यदि व्यवसाय ही न होगा तो कोई कब तक….| आप और हम इस कटुसत्य को जितनी जल्दी अपने ज्ञान में समाहित कर लेंगे, उभरना उतना ही आसान होगा|

वैसे हमारी आपकी पीढ़ी बहुत खुशनसीब है जिसने फ्लॉपी से लेकर क्लाउड स्टोरेज तक की पूरी यात्रा देखी है, वरना पिछली पीढ़ी में, कितने ही कैसेट देख के जन्मे और कैसेट के साथ की गुज़र गए| कभी सोचा था, सुबह छः- छः बजे घंटों सिलेंडर और रिजर्वेशन की लाइन में लगते थे, आज घर बैठे दो चार क्लिक में बुकिंग हो जाती है| कभी सोचा है अपनों के दूर होते भी दूरी का अहसास क्यों नहीं होता, जब चाहो वीडियो कॉल कर लो, वर्ना महीनों घर आने का इंतज़ार करना पड़ता था| अब इतना सब कुछ अच्छा देख लिया है तो महामारी और उसके दुष्प्रभाव भी देख रहे हैं| जीवन में सब कुछ अच्छा ही हो ऐसा ज़रूरी तो नहीं, आखिर कलयुग है|

तो साहब महामारी आई, अर्थव्यवस्था ठप्प और नौकरियां गयीं, अब क्या करें?

पहला सुझाव- दोष देना बंद करें: नौकरी जाना एक दुखद अनुभव है, पर इसमें दोष न आपका है, न किस्मत का और न उस व्यवसायी का जिसके पास आप नौकरी किया करते थे| बड़ी से बड़ी इंडस्ट्री हो या फैक्ट्री, सारा खेल डिमांड और सप्लाई का है| ग्राहक हैं तो उत्पाद की डिमांड है और उत्पाद की डिमांड है तो उसे बनाने और बेचने वालों की| जब बाज़ार में खरीदार ही नहीं होगा, तो बड़े से बड़े बिज़नस हॉउस खर्चों में कटौती करते ही है, जिसमे कईयों की नौकरियां जाती है| एक बात याद रखिये जितने मजबूर आप हैं उससे कहीं ज्यादा मजबूर वो व्यवसायी है|

रही बात किस्मत की तो एक साथ इतनों की किस्मत एक ही तरफ करवट लेगी ऐसा सोचना गलत है, आप इस बात से निश्चिंत हो जाइये कि आप या आपकी किस्मत में कोई दोष है, सभी हालात के शिकार हैं|

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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang

21 डेज टु क्विट अ हैबिट/ 21 days to quit a habit

लॉकडाउन में सिगरेट, शराब और पानमसाला के नशेबाजों पर एक व्यंग. (A satire on smokers and drinkers during lockdown)

नमस्ते! सिगरेट, शराब, पान-मसाला खाने वालों की ज़मात में अक्सर यह नसीहत आम सुनाई देती है कि, आप इक्कीस दिन किसी बुरी आदत से तौबा कीजिये, बाईसवें दिन से आप उस आदत से निजात पा चुके होंगे| सुना तो लगभग सभी ने होता है पर इतना टाइम है किसके पास? एक दो दिन बिना रोटी के तो रह सकते है पर मज़ाल है जो नशे पत्ती का जुगाड़ भूल जायें|

आज नशेबाजों का पक्ष इतनी मजबूती से रख पाने का राज़ यह है कि, हम स्वयं उस दौर से गुज़ार चुके हैं| आदत भी ऐसी की आँख खुलने से पहले तकिया के नीचे टटोल लिया करते थे…अगर सिगरेट है तो ठीक, वर्ना एक दो का तो दिन ख़राब होना ही था| पता ही नहीं था की हम सिगरेट को पी रहे है या सिगरेट हमें| शादी से पहले तक तो बचे हुए टोटों से तंबाखू इकठ्ठा कर आधी सिगरेट जितना जुगाड़ कर लिया करते थे, अब आधी रात कहाँ जाएँ सिगरेट ढूँढने, आलस भी किसी नशे से कम थोड़े ही होता है| शादी हुई तो ऐश-ट्रे से अधजली सिगरेट बटोरने की, और बच्चे के बाद पूरी सिगरेट की आदत छूट ही गयी| खैर मेरी कहानी फिर कभी, आज इतनी बड़ी भूमिका बांधने का उद्देश्य इक्कीस दिन वाली नसीहत पर गौर करना है| तो चलिए शुरू करते हैं…….

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Ishhoo Exclusive Lockdown diary Satire/ Hasya Vyang

लॉकडाउन में वर्क फ्रॉम होम Lockdown mein Work From Home -Vyang

लॉकडाउन में वर्क फ्रॉम होम से पुरुषों की हालत बयां करता एक गुदगुदाता लेख। (Lockdown mein Work From Home se purushon ki haalat bayan karta ek gudgudata lekh)

नमस्ते!! आज बात पुरुष प्रधान युग में गृहकार्य कुशलता के लिए तैयार होती नई खेप की | जी हाँ बात हमारे जैसे लाखों पुरुषों की जो इस करोना काल में न चाहते हुए भी घरेलू कामकाज करने को मज़बूर हैं | वैसे दबाव सिर्फ घर का होता तो कोई बात न थी, आई-गई सी होती, पर यहाँ तो दबाव सामाजिक है | पड़ोसी, दोस्त, आफ़िस के सहयोगी सभी अपनी गृहकार्य कुशलता का बखान कर रहे हैं | और तो और नई- नई डिश, नए- नए पैतरे आग में घी का काम कर रहें है |  एक मिडिल क्लास आदमी के लिए बात यहाँ तक भी होती तो भी चल जाती पर जब से फ़िल्मी जगत के जाने माने सितारे ऐसा ही कुछ काम करते सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगें तो मज़बूरी को पैशन बनाना भी मज़बूरी हो जाती है | आप बोलेंगे लेखक महोदय आप इतने मज़बूर कब से हो गए? तो मैं साफ़ कर दूँ, यहाँ बात हमारी नहीं हमारे जैसे लाखों पुरुषों की हो रही है | रही बात हमारी तो, अंडे उबालने और मैगी बनाने का हुनर तो हमने लड़कपन में ही सीख लिया था | घर में बनने वाली बैगन की सब्ज़ी ने रेबलियन बनने पर मज़बूर किया और अंडे और मैगी ने पैरों पर खड़े होने में मदद की |